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प्रदूषित हवा का कहर: अब कैंसर का नया खतरा बन रहा है Air Pollution

हम जिस हवा में सांस लेते हैं, वही अब हमारी सेहत के लिए सबसे बड़ा दुश्मन बनती जा रही है। कभी जीवन का आधार रही यह हवा आज अदृश्य जहर में बदल चुकी है। यह सिर्फ खांसी, सांस की तकलीफ या एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे यह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी को भी जन्म दे रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बाहरी वायु प्रदूषण और उसमें मौजूद बारीक कणों को ग्रुप-1 कार्सिनोजेन यानी “कैंसर पैदा करने वाले प्रमुख तत्वों” की सूची में रखा है। इसका मतलब यह है कि हवा में मौजूद ये जहरीले तत्व उतने ही खतरनाक हैं जितना तंबाकू का धुआं या एस्बेस्टस। राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस के मौके पर आइए डॉ. मीनू वालिया से समझते हैं कि हवा में घुला यह जहर किस तरह हमारे शरीर को अंदर से बीमार बना रहा है और हम इससे कैसे बच सकते हैं। फेफड़ों की गहराई तक घुसने वाला जहर हवा में मौजूद सबसे घातक तत्व हैं PM2.5 कण- ये इतने छोटे होते हैं कि शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली भी इन्हें रोक नहीं पाती। ये कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचते हैं और वहां से खून में मिल जाते हैं। इनमें अक्सर भारी धातुएं, हाइड्रोकार्बन और दूसरे रासायनिक जहर चिपके रहते हैं। जब ये शरीर में पहुंचते हैं, तो कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे कैंसर की शुरुआत होती है। यही कारण है कि आज गैर-धूम्रपान करने वालों में भी फेफड़ों का कैंसर बढ़ रहा है। ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन का कनेक्शन लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से शरीर लगातार एक सूक्ष्म सूजन की स्थिति में रहता है। इस दौरान शरीर में Reactive Oxygen Species (ROS) नामक तत्व बनते हैं, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं। यह स्थिति ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस कहलाती है- यानी जब शरीर की प्राकृतिक रक्षा क्षमता टूटने लगती है। इससे कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और कैंसर के लिए अनुकूल माहौल बन जाता है। यह प्रभाव सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मूत्राशय और स्तन कैंसर जैसे मामलों में भी देखा गया है। खून के रास्ते पूरे शरीर में फैलता है जहर वायु प्रदूषण का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है। बेहद छोटे प्रदूषक कण खून में घुसकर जिगर, गुर्दे और मस्तिष्क जैसे अन्य अंगों तक पहुंच जाते हैं। हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक ऐसी हवा में रहने वाले लोगों में मस्तिष्क, कोलन और मूत्र तंत्र से जुड़ी कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है। इसका मुख्य कारण है- पूरे शरीर में सूजन और डीएनए मरम्मत प्रणाली का कमजोर होना। जीन्स पर प्रदूषण का असर विज्ञान की नई शाखा एपिजेनेटिक्स बताती है कि प्रदूषण हमारे जीन्स के ढांचे को नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को बदल देता है। हवा में मौजूद रासायनिक तत्व DNA methylation की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जिससे कुछ महत्वपूर्ण जीन्स “खराब” हो जाते हैं जो कैंसर को रोकते हैं, जबकि कुछ जीन्स “एक्टिव” हो जाते हैं जो ट्यूमर को बढ़ावा देते हैं। यह बदलाव अदृश्य होते हैं, लेकिन असर गहरा होता है- यानी हवा हमारे जेनेटिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। शहरों की 'साइलेंट किलर' हवा शहरों में प्रदूषण का असर और भी ज्यादा होता है, क्योंकि यहां हवा के साथ-साथ शोर, तनाव, खराब खानपान और नींद की कमी जैसे अन्य कारक भी शरीर को कमजोर करते हैं। जो लोग मुख्य सड़कों, फैक्टरियों या औद्योगिक क्षेत्रों के पास रहते हैं, वे लगातार कई पर्यावरणीय जोखिमों का सामना करते हैं। यह सब मिलकर शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है और कैंसर जैसी बीमारियों का रास्ता आसान बना देता है। छोटी कोशिशों से होगा बड़ा असर बेशक प्रदूषण को पूरी तरह रोकना सरकारों और नीतियों की जिम्मेदारी है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर भी हम कई कदम उठा सकते हैं जो हमारे जोखिम को कम कर सकते हैं:     घर के अंदर की हवा शुद्ध रखें: एयर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें और पौधे लगाएं।     बाहर निकलते समय सावधानी: स्मॉग या प्रदूषण वाले दिनों में N95 या बेहतर मास्क पहनें।     स्मार्ट ट्रैवल करें: निजी गाड़ियों की बजाय सार्वजनिक परिवहन या कारपूल का उपयोग करें।     खानपान में बदलाव लाएं: हरी सब्जियां, फलों और एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर आहार लें ताकि ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से शरीर लड़ सके।     हेल्थ चेकअप कराएं: नियमित चेकअप से शुरुआती लक्षणों की पहचान जल्दी हो सकती है।  

नई तकनीक: सिर्फ फोन टच से पता चलेगा ब्लड शुगर, दर्दनाक जांच नहीं

नई दिल्ली डायबिटीज पेशेंट को अक्सर बार-बार शुगर चेक करने की जरूरत होती है. घर से दूर नौकरी करने वाले लोगों को काफी परेशानी भी होती है. मार्केट में कुछ खास प्रोडक्ट लिस्टेड हैं, जिनका इस्तेमाल करके मोबाइल पर ब्लड शुगर देखा जा सकेगा. इनका नाम स्मार्ट ग्लुकोज मॉनिटर हैं, जिसका मेडिकल नाम कॉन्टीन्युअस ग्लोस मॉनिटरिंग सिस्टम (CGM) है.  इन ग्लूकोज मीटर को बांह या पेट पर चिपकाया जाता है. इसके बाद मोबाइल पर आसानी से ब्लड शुगर को देख सकते हैं. इसके लिए बार-बार उंगली में सुई चुभाने की जरूरत नहीं होगी.  स्टिकर जैसी शेप और कई सेंसर  मार्केट में अलग-अलग ब्रांड और कंपनियां Blood Glucose Meter Sticker लिस्टेड हैं. जहां कुछ ब्लूटूथ का सपोर्ट देती हैं वहीं कुछ कंपनियां NFC का भी सपोर्ट प्रोवाइड कराती हैं. बहुत सी कंपनियां दोनों का सपोर्ट देती हैं.  NFC सपोर्ट वाले पैच पर सिर्फ स्मार्टफोन को टच करना होता है, उसके बाद ब्लड शुगर लेवल मोबाइल स्क्रीन पर पॉपअप करने लगता है. हालांकि ब्लूटूथ सपोर्ट वाले पैच का डेटा देखने के लिए मोबाइल ऐप की जरूरत होती है.  स्मार्ट ग्लूकोज मीटर पैच ऐसे काम करते हैं     स्मार्ट ग्लूकोज मीटर पैच सेंसर को बांह या पेट पर चिपका जाता है.     यह शरीर के अंदर के इंटरस्टिशियल फ्लूइड में ग्लूकोज की लेवल को मांपता है.     Bluetooth या NFC से डेटा स्मार्टफोन में ट्रांसफर किया जाता है.      ऐप में ग्राफ, हाई/लो अलर्ट और रिपोर्ट दिखाई जाती है.  मार्केट में ढेरों ऑप्शन और इतनी है कीमत  ग्लूकोज मीटर स्टिकर के मार्केट में ढेरों ऑप्शन मौजूद हैं. अलग-अलग कंपनियां अलग-अलग फीचर्स और एक्युरेसी का दावा करते हैं. मार्केट में 3-5 हजार रुपये की कीमत में मिल जाते हैं. एक पैज को करीब 15 दिन तक यूज किया जा सकता है.  ग्लूकोज मीटर स्टिकर किन लोगों के यूजफुल  ग्लूकोज मीटर स्टिकर पैच उन लोगों के लिए यूजफुल हैं, जिनका ब्लड शुगर ज्यादा रहता है और फ्लेक्चुएट करता है. शुगर बढ़ने की वजह से अगर तबियत बिगड़ती है तो पेशेंट आसनी से फोन को पैज पर टैप करके शुगर लेवल जांच सकते हैं. इसके बाद शुगर कंट्रोल करने के लिए काम कर सकते हैं.  ग्लूकोज मॉनिटरिंग उपकरण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी-एम) के शोधकर्ताओं ने मधुमेह रोगियों के लिए एक कम बजट वाला, यूजर फ्रेडली और उपयोग करने में आसान ग्लूकोज मॉनिटरिंग उपकरण विकसित किया है। शोधकर्ताओं की टीम का मानना है कि इसकी मदद से शुगर लेवल को नियमित रूप से जांचने में बिना दर्द के मदद मिल सकती है। यह पेटेंट उपकरण मरीजों को बिना उंगलियों में सुई चुभने के दर्द के भी ग्लूकोज के स्तर को मापने में मददगार हो सकती है।  भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिपोर्ट के मुताबिक देश की लगभग 9 प्रतिशत आबादी मधुमेह से पीड़ित है, इनमें से अधिकतर लोगों को डॉक्टर नियमित रूप से शुगर की जांच करते रहने की सलाह देते हैं।  ग्लूकोमीटर से घर पर डायबिटीज की जांच अभी तक घर पर डायबिटीज की जांच के लिए ग्लूकोमीटर का इस्तेमाल किया जाता रहा है। ये एक छोटा-सा डिवाइस होता है जिससे आप घर पर ही अपने ब्लड शुगर की जांच कर सकते हैं। इसके लिए ग्लूकोमीटर में एक नई टेस्ट स्ट्रिप लगाने के बाद, अपनी उंगली में निडिल या सिरिंज की मदद से पिन करके एक ड्रॉप खून को इसी स्ट्रिप पर लगाना होता है।  कुछ सेकंड में डिवाइस आपकी ब्लड शुगर वैल्यू दिखा देती है।   क्या कहते हैं विशेषज्ञ? इलेक्ट्रॉनिक मटेरियल और थिन फिल्म्स लैब के शोधकर्ताओं ने प्रोफेसर परशुरामन स्वामीनाथन के नेतृत्व में इसे विकसित किया है।  इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे आईआईटी मद्रास के डॉ एल. बालामुरुगन कहते हैं, इस तरह का उपकरण वास्तव में बहुत सहायक है। ग्लूकोज की निगरानी को दर्दरहित बनाने के साथ ये किफायती भी है। यह ग्लूकोज के स्तर की नियमित जांच करने, अपने शरीर के पैटर्न को समझने में जांच के लिए अनावश्यक दौड़ भाग को कम करने में मदद करता है। हालांकि ये डिवाइस किस तरह से काम करती है फिलहाल इसकी स्पष्ट जानकारी साझा नहीं की गई है।  

फैंस को फिर निराशा: GTA 6 की लॉन्च डेट आगे बढ़ी, जानें वजह

  रॉकस्‍टार गेम्‍स के मशहूर गेम GTA 6 का इंतजार गेमिंग के दीवाने काफी वक्‍त से कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, GTA 6 की रिलीज डेट को अब 19 नवंबर 2026 तक के लिए आगे बढ़ा दिया गया है। पहले इसे 26 मई 2026 को यह गेम रिलीज किया जाना था, लेकिन अब करीब 6 महीने का एक्‍सटेंशन गेम की रिलीज के लिए दिया गया है। रॉकस्‍टार गेम्‍स की तरफ से एक्‍स पर इस बारे में जानकारी दी गई है। इसमें कहा गया है कि गेम को बेहतरीन बनाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। जीटीए 6 की रिलीज डेटा लगातार टलती रही है। यह गेम इसी साल लॉन्‍च होना था, लेकिन बार-बार देरी के बाद अब अगले साल नवंबर में आएगा। GTA 6 पर रॉकस्‍टार गेम्‍स का आधि‍कारिक बयान रॉकस्‍टार गेम्‍स ने सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म एक्‍स पर एक पोस्‍ट में कहा- हमें इस अतिरिक्त समय के लिए खेद है। हमें पता है इंतजार लंबा है, लेकिन इस दौरान हमें गेम को उस स्तर की पॉलिश के साथ पूरा करने में मदद मिलेगी, जिसकी उम्‍मीद आप लोगों ने लगाई है और जिसके आप हकदार हैं। GTA 6 में क्‍या-क्‍या आएगा GTA 6 जिसका पूरा नाम ग्रैंड थेफ्ट ऑटो 6 है, उसे प्‍लेस्‍टेशन 5 और एक्‍सबॉक्‍स सीरीज एक्‍स व एस कंसोल पर लाए जाने की तैयारी है। जीटीए 6 में वाइस सिटी मुख्‍य आकर्षण होगी। इसके गेम प्‍ले की स्‍टोरी लूसिया के चारों तरफ घूमेगी। लूसिया, जीटीए फ्रेंचाइजी की पहली महिला कैरेक्‍टर है। क्‍या GTA 6 को 60 एफपीएस पर खेल पाएंगे ऐसा कहा जा रहा है कि जीटीए 6 को 60 एफपीएस यानी फ्रेम प्रति सेकंड पर खेला जा सकेगा। एक्‍स पर ही डिटेक्‍ट‍िव सीड्स नाम का एक यूजर दावा कर चुका है कि जीटीए 6 को प्‍लेस्‍टेशन 5 प्रो पर 60 फ्रेम प्रति सेकंड पर खेला जा सकेगा। बताया जा रहा है कि रॉकस्‍टार गेम्‍स और सोनी मिलकर कंसोल के लिए इस गेम को बेहतर बनाने पर काम कर रहे हैं। कहा जाता है कि इन बदलावों की वजह से ग्राफ‍िक्‍स बेहतर होंगे। रिलीज में होती रही है देरी GTA 6 की रिलीज डेट को पहली बार नहीं टाला गया है। पहले कहा गया था कि गेम इसी साल यानी 2025 में आ जाएगा। फ‍िर इसे मई 2026 तक टाला गया और अब 19 नवंबर 2026 डेट सामने आई है। यह फैसला गेम को बेहतर पॉलिश करने के लिए लिया गया है। अगर यह डेट बरकरार रहती है तो गेमर्स के लिए साल 2026 एक ग्रैंड ईयर बन सकता है।

त्वचा बनेगी दमकती और स्मूद: आज़माएँ ये 5 नेचुरल बॉडी स्क्रब्स

जितना ध्यान हम अपने चेहरे पर देते हैं, उतना ध्यान हम अपने शरीर के बाकी हिस्सों पर नहीं देते। इसके कारण बॉडी पर डेड सेल्स जमा होने लगते हैं और त्वचा रूखी व बेजान नजर आती है। इसलिए हफ्ते में एक बार एक्सफोलिएट करना काफी जरूरी है। बॉडी एक्सफोलिएट करने के लिए आप घर पर भी कुछ नेचुरल चीजों की मदद से बॉडी स्क्रब बना सकते हैं। प्राकृतिक होने की वजह से ये स्किन को नुकसान भी नहीं पहुंचाते और त्वचा मुलायम व चमकदार भी बनती है। आइए जानते हैं ऐसे ही 5 नेचुरल बॉडी स्क्रब्स के बारे में, जो डेड सेल्स को साफ करके आपकी त्वचा में नई जान फूंक देंगे। चीनी और नींबू का स्क्रब चीनी एक नेचुरल एक्सफोलिएंट है। इसके छोटे दाने त्वचा को नुकसान पहुंचाए बिना डेड सेल्स को हटा देते हैं। वहीं, नींबू में मौजूद सिट्रिक एसिड त्वचा की गहराई से सफाई करता है और उसकी रंगत को निखारता है। बनाने की विधि- दो चम्मच चीनी में एक चम्मच नींबू का रस और आधा चम्मच नारियल या बादाम का तेल मिलाएं। इस पेस्ट को शॉवर लेते समय गीली त्वचा पर हल्के हाथों से 2-3 मिनट तक सर्कुलर मोशन में मसाज करें। फिर ठंडे पानी से धो लें। यह स्क्रब त्वचा को कोमल और चमकदार बनाएगा। कॉफी स्क्रब कॉफी न सिर्फ आपको सुबह की एनर्जी देती है, बल्कि यह आपकी त्वचा के लिए भी वरदान साबित हो सकती है। कॉफी के दाने डेड सेल्स को हटाने का बेहतरीन काम करते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स त्वचा को टाइट करते हैं और सेल्युलाईट की समस्या को कम करने में मददगार हैं। बनाने की विधि- दो चम्मच कॉफी पाउडर लें। इसमें एक चम्मच दही और एक चम्मच शहद मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें। इससे पूरे शरीर की मसाज करें और 10 मिनट बाद नहा लें। इससे त्वचा मुलायम और सॉफ्ट हो जाएगी। बेसन और दही का स्क्रब यह नुस्खा सदियों से भारतीय घरों में इस्तेमाल हो रहा है। बेसन त्वचा से गंदगी और डेड सेल्स को साफ करने का काम करता है, वहीं दही में मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा को प्राकृतिक रूप से मॉइश्चराइज और एक्सफोलिएट करता है। बनाने की विधि- दो चम्मच बेसन में दो चम्मच दही और एक चुटकी हल्दी मिलाएं। इसे अपने शरीर पर लगाएं और सूखने दें। जब यह हल्का सूख जाए, तो गीले हाथों से हल्के-हल्के रगड़ते हुए स्क्रब करें और फिर पानी से धो लें। यह स्क्रब रंगत निखारने में भी बहुत कारगर है। ओटमील और शहद का स्क्रब अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है और आसानी से इरिटेट हो जाती है, तो ओटमील और शहद का स्क्रब आपके लिए परफेक्ट है। ओटमील में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो त्वचा को शांत करते हैं, जबकि शहद एक नेचुरल मॉइश्चराइजर और एंटीबैक्टीरियल एजेंट है। बनाने की विधि- दो चम्मच बारीक पिसा ओटमील लें। इसमें एक चम्मच शहद और एक चम्मच गुलाबजल मिलाकर पेस्ट बना लें। इस मिश्रण को नम त्वचा पर लगाएं और 5-7 मिनट तक हल्के हाथों से मसाज करने के बाद धो लें। यह स्क्रब त्वचा को कोमलता और चमक देगा। सी सॉल्ट और ऑलिव ऑयल का स्क्रब सी सॉल्ट में मौजूद मिनरल्स त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। यह शरीर के टॉक्सिन्स को बाहर निकालने और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करता है। ऑलिव ऑयल गहराई से मॉइश्चराइज करता है। बनाने की विधि- आधा कप सी सॉल्ट में एक चौथाई कप एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल मिलाएं। आप इसमें अपनी पसंद के एसेंशियल ऑयल की कुछ बूंदें भी मिला सकते हैं। इस मिश्रण से पूरे बॉडी की स्क्रबिंग करें और फिर गुनगुने पानी से नहा लें। यह स्क्रब आपकी त्वचा और मन दोनों को तरोताजा कर देगा।  

ब्लड ग्रुप से जुड़ा बड़ा खुलासा — जानिए कौन-से लोग हैं अधिक जोखिम में

क्या आप जानते हैं कि आपका रक्त समूह न केवल यह तय करता है कि आप किसे रक्तदान कर सकते हैं या किससे रक्त प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि यह आपके समग्र स्वास्थ्य से भी गहराई से जुड़ा होता है? विशेषज्ञों का कहना है कि हमारा रक्त समूह विभिन्न बीमारियों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को प्रभावित कर सकता है। पोषण विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक डॉ. शेल्डन ज़ब्लो बताते हैं कि व्यक्ति का रक्त समूह उसकी कई शारीरिक प्रवृत्तियों और रोगों के खतरे को निर्धारित करता है। उनका कहना है, “रक्त समूह के आधार पर किसी व्यक्ति में अलग-अलग बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।” हृदय रोग का खतरा डॉ. ज़ब्लो के अनुसार, रक्त समूह AB और B वाले लोगों में हृदय रोग की संभावना अधिक होती है। इसका कारण है, शरीर में उच्च कोलेस्ट्रॉल और प्रोटीन की अधिक मात्रा, जो रक्त के थक्के बनने से जुड़ी होती है। वहीं, रक्त समूह O वाले व्यक्तियों में हृदय संबंधी समस्याएँ अपेक्षाकृत कम पाई जाती हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसे लोग प्रदूषित वातावरण से दूर रहें, घर के अंदर व्यायाम करें, हृदय के लिए संतुलित आहार लें, धूम्रपान से बचें और नियमित रूप से हृदय की जांच करवाएँ। पेट के अल्सर का जोखिम हालाँकि O रक्त समूह वाले लोग हृदय के मामले में कुछ हद तक सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन इन्हें पेट के अल्सर का खतरा अधिक होता है। इसके अलावा, A रक्त समूह वाले व्यक्तियों में पेट के कैंसर का खतरा ज़्यादा देखा गया है। स्वस्थ रहने के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि आहार में साबुत अनाज, मछली, फल और सब्ज़ियाँ शामिल करें, नियमित रूप से कम से कम 40 मिनट व्यायाम करें और धूम्रपान से दूरी बनाए रखें। दृष्टि क्षीणता और स्मृति हानि AB रक्त समूह वाले लोगों में उम्र बढ़ने के साथ दृष्टि कमजोर होने की समस्या विकसित हो सकती है। इसके अलावा, रक्त में प्रोटीन असंतुलन के कारण इन लोगों में स्मृति हानि की संभावना भी बढ़ जाती है। रक्त का थक्का जमना और स्ट्रोक का खतरा A और B रक्त समूह वाले व्यक्तियों में रक्त का थक्का जमने की समस्या अधिक देखी जाती है, जिससे स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। तनाव और मानसिक स्वास्थ्य यदि आपका रक्त समूह A है, तो तनाव प्रबंधन आपके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। डॉ. ज़ब्लो के अनुसार, इस समूह वाले लोग तनाव हार्मोन कोर्टिसोल का अधिक स्राव करते हैं, जिससे उन्हें मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ सकता है। स्वस्थ मानसिक स्थिति बनाए रखने के लिए, नियमित व्यायाम करें और हर रात कम से कम 7 से 9 घंटे की नींद अवश्य लें।

अब Google Maps सड़क पर ऐसे दिखाएगा रास्ता, बदल जाएगा ड्राइविंग एक्सपीरियंस

नई दिल्ली Google Maps के लिए नए फीचर का ऐलान हो गया है,  जिसकी मदद से अब कार चालक को लेन नेविगेशन की भी सुविधा मिलेगी. ये आपके सफर को आसान बनाएगा और गलत रास्तों पर भी जाने से रोकेगा. Google ने इस फीचर की जानकारी ब्लॉग में दी है. यह काफी कुछ आपको एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS) जैसा है.  Google ब्लॉग के मुताबिक, गूगल मैप्स में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) पावर्ड लाइव लेन गाइडेंस फीचर को इंट्रोड्यूस्ड किया है. कंपनी ने इस फीचर को बेहतर तरीके से समझाने के लिए एक छोटा का वीडियो भी ब्लॉग में एम्बेड किया है.  ऐसे काम करेगा AI-पावर्ड लाइव लेन फीचर वीडियो में बताया है कि AI-पावर्ड लाइव लेन गाइडेंस फीचर कैसे काम करेगा. वीडियो में दिखाया है कि जब कार रोड पर बनी लेन से बाहर जाएगी को ड्राइवर को संकेत दिए जाएंगे कि गाड़ी की लेफ्ट या राइट कर लें. मोड़ या फ्लाइओवर से पहले कई बार लेन बदलने की जरूरत होती है.  Google Maps का नया फीचर का फायदा  सफर के दौरान जब कोई मोड़ या फ्लाईओवर आता है तो नई लोकेशन पर कार ड्राइवर को वक्त रहते पता नहीं चल पाता है कि कार को किस लेन में लेकर जाना है. ऐसे में वह गलत रोड या गलती से फ्लाईओवर पर चढ़ जाते हैं. अब नया AI-पावर्ड लाइव लेन गाइडेंस फीचर आने के बाद ये गलती नहीं होगी.  आफ्टर मार्केट के डैशकैम का ADAS जैसा फीचर Google Maps का ये नया फीचर आपको आफ्टर मार्केट में सेल होने वाले डैश कैम के ADAS फीचर जैसा लग सकता है. उन डैशकैम में ADAS के नाम पर लेन बदलने पर अलर्ट मिलता है और ड्राइवर को सही लेन में जाने की सलाह दी जाती है.  इन कार को मिलेगा पहले अपडेट  Google Maps ने AI-पावर्ड लाइव लेन गाइडेंस फीचर की शुरुआत Google बिल्ट-इन वाली कारों से होगी. इस फीचर को सबसे पहले आने वाले महीनों में अमेरिका और स्वीडन में Polestar 4 कारों पर उपलब्ध कराया जाएगा. इसके बाद यह फीचर अन्य रोड टाइप्स और ज्यादा कार मॉडलों पर भी रोलआउट किया जाएगा, जिसके लिए गूगल पार्टनरशिप भी कर रहा है. 

यूज़र्स के लिए बड़ा बदलाव – ChatGPT से नहीं मिल पाएगी मेडिकल, वित्तीय या कानूनी सलाह

नई दिल्ली एआई चैटवाट अपने उपयोग कर्ताओं को मेडिकल, वित्तीय और कानून से संबंधित सलाह नहीं देगा।चैट जीपीटी की पेरेंट कंपनी ने मुकदमे बाजी और जिम्मेदारी से बचने के लिए,भारत के प्लेटफार्म पर यह कदम उठाया है। कंपनी का कहना है, यह कदम चैट जीपीटी का उपयोग करने वाले उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा और उनकी कानूनी जिम्मेदारी से बचने के लिए यह निर्णय लिया है। वर्तमान निर्णय के पश्चात अब चैटवाट मुकदमे से बचने के लिए कानूनी जानकारी, निवेश इत्यादि से संबंधित  तथा स्वास्थ्य से संबंधित दावों के बारे में सुझाव और सलाह की जिम्मेदारी नहीं लेगा। कंपनी को डर है,  जिस तरह की जानकारी चैट जीपीटी द्वारा दी जाती है।भारत में उस जानकारी को लेकर मुकदमेबाजी का शिकार होना पड़ सकता है। जिसके कारण कंपनी ने जिम्मेदारी से हटा लिया है। अब उपयोगकर्ता अपने स्तर पर निर्णय करेगा, उसे वह जानकारी सही लगती है, या गलत है। अब क्या बदल जाएगा? नए नियमों के बाद ChatGPT यूजर्स को दवाओं के नाम, उनकी मात्रा, मुकदमे की टेंपलेट, कानूनी रणनीति और निवेश से जुड़ी सलाह नहीं देगा. अब यह केवल जनरल प्रिंसिपल, बेसिक मैकेनिज्म की जानकारी और लोगों को डॉक्टर, वकीलों और वित्तीय सलाहकारों जैसे प्रोफेशनल्स से कंसल्टेशन करने की सलाह देगा.  29 अक्टूबर से ChatGPT ने इलाज, कानूनी मुद्दों और पैसों के बारे में सलाह देना बंद कर दिया है। यह बॉट अब आधिकारिक तौर पर एक एजुकेशनल टूलहै, न कि एक सलाहकार और नई शर्तें इसे स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं। नए नियमों के तहत, अब चैटजीपीटी न ही आप लोगों को दवा का नाम या खुराक का सुझाव देगा, न ही कानूनी रणनीति बनाने में मदद करेगा और न ही निवेश संबंधी खरीद और बिक्री की सलाह देगा। क्यों किया जा रहा है यह बदलाव? पिछले कुछ समय से कई ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जब लोग ChatGPT से मिली सलाह का पालन कर खुद को नुकसान पहुंचा चुके हैं. अगस्त में एक ऐसा ही मामला सामने आया था, जब एक 60 वर्षीय बुजुर्ग ने ChatGPT से सलाह लेकर नमक की जगह सोडियम ब्रोमाइड खाना शुरू कर दिया था. इससे उसे मानसिक समस्याएं होने लगीं, जिसके बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसी तरह एक और मामले में अमेरिका के एक 37 वर्षीय व्यक्ति को खाना निगलने में समस्या हो रही थी. उसने ChatGPT से इस बारे में पूछा तो चैटबॉट ने बताया कि कैंसर के कारण ऐसा होना बहुत मुश्किल है. वह व्यक्ति इससे संतुष्ट हो गया और उसने समय पर डॉक्टर से संपर्क नहीं किया. बाद में जब कैंसर चौथी स्टेज पर पहुंच गया, तब जाकर वह डॉक्टर के पास पहुंचा.

कैंसर मरीजों को बड़ी राहत, अब जीन थेरेपी से बदलेगा इलाज का तरीका

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने कैंसर मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। सरकार ने जीन थेरेपी के क्षेत्र में अग्रणी कंपनी इम्यूनोएक्ट को फंडिंग प्रदान की है, ताकि जीन वितरण प्रणाली को मजबूत किया जा सके। इससे कैंसर का इलाज सस्ता और सुलभ हो सकेगा। चिमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी-सेल (सीएआर-टी) थेरेपी कैंसर के इलाज में क्रांतिकारी सफलता के रूप में सामने आई है, जो मरीज की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग करके कुछ प्रकार के कैंसर से लड़ती है। विश्व स्तर पर किए गए क्लीनिकल ट्रायल्स में अंतिम चरण के मरीजों, विशेष रूप से एक्यूट लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया से पीड़ितों में यह थेरेपी आशाजनक परिणाम दिखा चुकी है। आईआईटी बॉम्बे की स्पिन-ऑफ कंपनी इम्यूनोएक्ट ने दुनिया की पहली मानवीकृत सीएआर-टी थेरेपी 'नेक्सकार19' को बाजार में उतारा है। आधिकारिक बयान में क्या कहा गया? एक आधिकारिक बयान में बताया गया कि बायोई3 नीति के तहत जैव विनिर्माण पहल के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने उत्पादन बढ़ाने और इस नई चिकित्सीय पद्धति को अधिक किफायती बनाने के लिए इम्यूनोएक्ट को वित्त पोषण दिया है। इसके तहत 200एल जीएमपी लेंटिवायरल वेक्टर और प्लास्मिड प्लेटफॉर्म स्थापित किया जाएगा। बयान में कहा गया कि लेंटिवायरल वेक्टर और प्लास्मिड प्लेटफॉर्म में उन्नत बायोरिएक्टर प्रौद्योगिकियां शामिल की जाएंगी, जो उच्च घनत्व वाली कोशिका वृद्धि और निरंतर उत्पादन को आसान बनाएंगी। इससे लेंटिवायरल वेक्टरों की उच्च पैदावार और बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित होगा। आगे बताया गया कि जीएमपी ग्रेड जीन डिलीवरी वेक्टर प्रति वर्ष कम से कम 1,000 मरीजों को कोशिका और जीन थेरेपी की सुविधा प्रदान कर सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उभरते विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी) में क्यूएसआईपी क्वांटम सुरक्षा चिप और 25-क्यूबिट क्यूपीयू (भारत की पहली क्वांटम कंप्यूटिंग चिप) के साथ भारत के तीन प्रमुख नवाचारों में सीएआर-टी सेल थेरेपी को शामिल किया। बयान में जोर दिया गया कि भारत की पहली जीवित दवा 'नेक्सकार19' ने वैज्ञानिक कठोरता या मरीज सुरक्षा से समझौता किए बिना जीन थेरेपी को सस्ती और सुलभ बना दिया है।  

WiFi राउटर पर एल्युमिनियम फॉयल लगाने का ट्रिक — काम करता है या सिर्फ़ मिथ है?

नई दिल्ली घर में वाई-फाई की स्पीड कम होना आम समस्या है। कभी फिल्म देखते समय बफरिंग होती है, तो कभी मीटिंग में सिग्नल कमजोर पड़ जाता है। ऐसे में लोग कभी राउटर की पोजीशन बदलते हैं तो कभी राउटर ही चेंज कर देते हैं। हालांकि, आपने कभी न कभी तो सुना ही होगया कि एल्युमिनियम फॉयल वाई -फाई राउटर का सिग्नल बढ़ा देती है। ये सुनने में भले अजीब लगे, लेकिन यह थ्योरी खूब फ्लोट होती है। लेकिन क्या सचमुच एक एल्युमिनियम फॉयल वाई-फाई का सिग्नल बढ़ा सकती है? चलिए, जान लेते हैं कि इस बारे में रिसर्च और एक्सपर्ट क्या कहते हैं। वैज्ञानिकों ने क्या बताया? रीडर्स डाइजेस्ट की एक रिपोर्ट बताती है कि डार्टमाउथ कॉलेज के वैज्ञानिकों ने टेस्ट किया। उन्होंने फॉयल से कवर किया आकार बनाया। कुछ जगहों पर सिग्नल 55% तक बढ़ गया। जहां जरूरत नहीं, वहां 63% तक कम हो गया। इससे पूरा कवरेज बेहतर हुआ। रिसर्च में साबित हुआ कि एल्युमिनियम फॉयल का सही से इस्तेमाल किया जाए तो वाई-फाई सिग्नल बढ़ सकता है। डार्टमाउथ यूनिवर्सिटी की कंप्यूटर साइंस टीचर और इस रिसर्च की मुख्य वैज्ञानिक जिया झोउ कहती हैं कि एल्युमिनियम फॉयल वाई-फाई सिग्नल को उछालती है। कैसे काम करती है एल्युमिनियम फॉयल? राउटर में एंटीना होता है जो सिग्नल भेजता है। ये सिग्नल रेडियो Waves की तरह हर तरफ फैलते हैं। जैसे पानी की स्प्रिंकलर चारों ओर छिड़काव करती है। इससे सिग्नल कमजोर हो जाता है। दीवारें, फर्श और खिड़कियां इसे रोकती हैं। कुछ जगहों पर सिग्नल पहुंचता ही नहीं। ऐसे में एल्युमिनियम फॉयल को घुमाकर राउटर के पीछे लगाएं। चमकदार साइड अंदर की ओर रखें। यह सिग्नल को रिफ्लेक्ट करता है। सिग्नल एक दिशा में जाता है जहां जरूरत है। जैसे लिविंग रूम या बेडरूम। खिड़की की तरफ जाने वाला सिग्नल रुक जाता है। इससे स्पीड बढ़ती है। हैकर्स का खतरा भी कम होता है एल्युमिनियम फॉयल सिग्नल को घर के अंदर रखती है, बाहर नहीं जाने देती। इससे हैकर्स का खतरा कम होता है। वे सिग्नल पकड़कर डेटा नहीं चुरा सकते। यह पासवर्ड के साथ एक्स्ट्रा सुरक्षा देता है। घर की प्राइवेसी बनी रहती है। हालांकि बताया दें कि यह हैक सभी के लिए परफेक्ट नहीं। लेकिन सस्ता और आसान तरीका है। वाई-फाई एक्सटेंडर खरीदने से पहले आप इसे भी आजमा सकते हैं।

किड्स ईयरबड्स लॉन्च: सेफ्टी और मज़ेदार फीचर्स के साथ आया यह नया गैजेट

नई दिल्ली स्‍मार्टफोन के बाद अगर कोई गैजेट सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल किया जाता है, तो वो हैं ईयरबड्स। बच्‍चे भी इनके प्रति आकर्षित होते हैं। हालांकि बच्‍चों को ईयरबड्स यूज करने नहीं देने चाहिए, क्‍योंकि उनसे आने वाला साउंड कानों को नुकसान पहुंचा सकता है। इस दिक्‍कत को दूर करने की कोशिश की है जेबीएल ने। किड्स ऑडियो कैटिगरी में कदम रखते हुए कंपनी ने JBL Junior Free (जेबीएल जूनियर फ्री) को लॉन्‍च किया है। ये ओपन-ईयर TWS ईयरबड्स हैं, जिन्‍हें बच्‍चों के लिए बनाया गया है। इनमें ऐसी कई खूबियां हैं, जिन्‍हें आपको जानना चाहिए। जेबीएल जूनियर फ्री में 6 बड़ी खूबियां     JBL Junior Free को इस तरह बनाया गया है कि इनसे 85 डेसिबल से ज्‍यादा साउंड नहीं आता।     पैरंटल कंट्राेल की सुविधा मिलती है और पैरंट्स, ऐप की मदद से वॉल्‍यूम कंट्रोल कर सकते हैं।     इनका बैटरी बैकअप 10 घंटे है और सिर्फ 10 मिनट चार्ज करके इन्‍हें 3 घंटे इस्‍तेमाल किया जा सकता है।     इन्‍हें एकसाथ दो डिवाइस से कनेक्‍ट करके यूज किया जा सकता है।     IPX4 रेटिंग मिलती है, जो इन्‍हें पानी की छीटों से होने वाले नुकसान से बचाती है।     ये किड्स फ्रेंडली हैं। इन्‍हें कंट्रोल करने के लिए ईयरबड्स में बटन भी दिए गए हैं। जेबीएल जूनियर फ्री की कीमत जेबीएल जूनियर फ्री को अभी भारत में नहीं लाया गया है। इनकी यूरोप में कीमत 69.99 यूरो है। ये कई कलर ऑप्‍शंस जैसे- पर्पल, टेल और पीच रंग में आए हैं। जेबीएल जूनियर फ्री के प्रमुख फीचर्स जेबीएल जूनियर फ्री को इसलिए बनाया गया है ताकि बच्‍चों को एक सुरक्ष‍ित और कानों के लिए बेहतर लिसनिंग विकल्‍प मिले। जेबीएल के मुताबिक, ईयरबड्स के ओपन डिजाइन की वजह से बच्‍चे ना सिर्फ अच्‍छा साउंड सुन पाते हैं, बल्कि सेफ साउंड उन्‍हें मिलता है। इनका डिजाइन ऐसा है कि बच्‍चा अपने आसपास के माहौल को भी सुन पाता है। पैरंटल कंट्रोल होने से यह फायदा है कि भले ईयरबड बच्‍चे के कान में लगता है कि लेकिन पैरंट्स उसे अपने स्‍मार्टफोन से कंट्रोल कर सकते हैं। किड्स ईयरबड्स की जरूरत क्‍यों? मौजूदा वक्‍त में ईयरबड्स बड़े पैमान पर इस्‍तेमाल किए जा रहे हैं, लेकिन उन्‍हें बड़े लोगों के कानों के लिए डिजाइन किया जाता है, जो मैक्‍स‍िमम वॉल्‍यूम पर काफी लाउड बजते हैं। इन ईयरबड्स को बच्‍चे इस्‍तेमाल करें तो उनके कानों को नुकसान हो सकता है। किड्स ईयरबड्स इसका विकल्‍प बन रहे हैं। यही वजह है कि अब ऑडियो ब्रैंड इस कैटिगरी में अपने प्रोडक्‍ट लॉन्‍च कर रहे हैं। प्रेम त्रिपाठी