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पिन और ओटीपी की सुरक्षा खतरे में, नया AI बैंकिंग डेटा चोरी करने में सक्षम, भारत में मची हलचल

नई दिल्ली क्या दुनिया के बैंकों में कोई चोर घुस चुका है? क्या बैंक अकाउंट और कंप्यूटरों का सारा डेटा खतरे में आने वाला है? क्या सारे पासवर्ड किसीको पता चल चुके हैं या पता चल सकते हैं? पूरी दुनिया में खलबली क्यों मची हुई है? आपने भी खबर शायद देखी हो कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन ने दिल्ली में एक बहुत महत्वपूर्ण बैठक बुलाई. और देश के बड़े-बड़े बैंकों के प्रमुखों, रिजर्व बैंक के अधिकारियों और IT मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ भी बैठक की. बैंकों को किस खतरे के लिए तैयार रहने के लिए कहा जा रहा है? ये सबको समझने की ज़रूरत है. वित्त मंत्री कह रही हैं कि ये खतरा पहले आए किसी भी खतरे से बहुत अलग है और बहुत गंभीर भी हो सकता है. अभी हुआ तो कुछ नहीं है लेकिन बैंकों को बहुत सतर्क रहना होगा, तैयारी करनी होगी और आपस में बेहतर तरीके से मिलकर काम करना होगा. तो क्या है ये खतरा? इस खतरे का नाम है क्लॉड मिथोस. क्लॉड का नाम तो आपने सुना हो शायद. अमेरिका की एक AI यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस कंपनी है जिसका नाम है ऐंथ्रॉपिक. उसने क्लॉड नाम का AI मॉडल बनाया था जो काफी लोग इस्तेमाल करते हैं आपने भी किया हो शायद. तो इस कंपनी ने एक नया AI मॉडल बनाया क्लॉट मिथोस के नाम से. ये किसलिए बनाया? तो इसका मकसद ये था कि कंपियनों के, बैंकों के, सरकारों के ये किसी के भी जो कंप्यूटर सिस्टम होते हैं उनमें आप जानते ही हैं कि हैकरों का खतरा बना रहता है. कंप्यूटर को हैक कर लेते हैं, किसी के अकाउंट को हैक कर लेते हैं, मतलब कंप्यूटर के अंदर घुसकर डकैती कर लेते हैं ऐसे हैकर. कई कंपनियों की वेबसाइट ठप कर देते हैं, कभी किसी के बैंक के अकाउंट से पैसा साफ कर देते हैं. इसलिए सब कहते रहते हैं कि पासवर्ड बदलते रहा करो, हैकरों से बचाने के लिए अलग-अलग सॉफ़्टवेयर भी मिलने लगे बाज़ार में . ऐंथ्रॉपिक के क्लॉड मिथोस से हिली दुनिया हैकर लोग भी असल में शातिर लोग होते हैं जो कंप्यूटर के अंदर का सब सिस्टम समझते हैं. मतलब वो दिमाग लगाते हैं कि सॉफ्टवेयर के अंदर कैसे घुसना है. कमजोर कड़ी पकड़ते हैं. जैसे वो फिल्मों में नहीं होता कि म्यूज़ियम में चार लेवल की सुरक्षा के बीच हीरा पड़ा हुआ है और चोर पूरा नक़्शा ले कर प्लैन बना कर हीरा चुराने निकल पड़ता है. जब तक सायरन बजता है चोर हीरा ले कर गायब हो चुका होता है. तो हैकर लोग यही काम कंप्यूटर में घुस कर करते हैं. तो ऐंथ्रॉपिक कंपनी ने सोचा कि चोरों से दो कदम आगे रहने के लिए क्यों ना AI को लगा दिया जाए. कंप्यूटर के अंदर कौनसी कमजोर कड़ी है ये AI ढूंढ कर बता दे तो? जैसे चोर तिजोरी का ताला तोड़कर घुसता है या ताले का कॉम्बिनेशन बनाकर तिजोरी खोलता है, वैसे ही तो हैकर लोग पासवर्ड को तोड़कर कंप्यूटर के सिस्टम में घुस जाते हैं. तो AI को अगर इस काम में लगा दें तो वो तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से तो महीनों का काम मिनटों में हो सकता है. AI मॉडल बता देगा कि कहां से हैकर सेंध लगा सकते हैं और कंपनी अपने आप को वहां से मजबूत कर लेगी. सेर को सवा सेर मिल जाएगा. चोर डाल-डाल तो AI पात-पात. तो ये AI मॉडल बनाया ऐंथ्रॉपिक कंपनी ने, क्लॉड मिथोस. और फिर क्या हुआ? 30-30 पुरानी कमजोरी झट से पकड़ में आई कंपनी ने मॉडल को टेस्ट किया. और टेस्ट किया तो कंपनी खुद ही दंग रह गई. AI ने झट से बड़ी से बड़ी कंपनियों के सॉफ़्टवेयर में कहां-कहां छेद है बता दिया. 20-20, 30-30 साल से जो कमज़ोर कड़ियां पड़ी हुई थीं कई कंप्यूटर नेटवर्क में क्लॉड मिथोस ने झट पकड़ लीं. आप कहोगे कि इसपर तो ख़ुश होना चाहिए था. वो तो ठीक है लेकिन कंपनी घबरा भी गई. कंपनी ने ऐलान किया कि टेस्टिंग में जो पता चला है उसके बाद हमने फ़ैसला किया है कि क्लॉड मिथोस को बाज़ार में नहीं उतारा जाएगा. कंपनी ने इतना ख़र्च करके एक चीज़ बनाई लेकिन वो अपने बनाए मॉडल से ही डर गई. क्यों डर गई? क्योंकि उसने देखा कि ये तो कोई भी पासवर्ड, कोई भी सिक्यूरिटी, कोई भी कंप्यूटर का ताला कुछ ही देर में तोड़ कर कंप्यूटर के अंदर घुस जाता है. तो ये किसी के हाथ लग गया और सोचो किसी बैंक के सिस्टम में घुस गया तो सारे अकाउंट ही साफ़ कर के निकल जाएगा? इसको तो कोई पासवर्ड रोक ही नहीं पा रहा? मतलब बनाया तो इसे था चोरी के रास्ते पहचानकर उनको ठीक करने के लिए. लेकिन अगर ये ख़ुद चोरी करने पर आ जाए तो इसको कौन रोकेगा? कहने को तो ये एक सामान्य AI मॉडल है जो लिखने-पढ़ने में, कोडिंग करने में और सोचने में बहुत तेज़ है, लेकिन सबसे ख़ास बात ये है कि कंप्यूटर सुरक्षा के मामले में ये इंसानों से भी ज्यादा स्मार्ट है . क्लॉड मिथोस ताले को खोल देगा मतलब मान लो आपके घर का ताला बहुत पुराना है और उसमें छोटी-छोटी कमज़ोरियाँ हैं जिन्हें पहले किसी ने नहीं देखा. क्लॉड मिथोस बिना किसी मदद के उस ताले को खोलने का तरीका खुद ढूँढ लेता है. इसी तरह ये कंप्यूटर के सॉफ्टवेयर ऐसी कमजोरियाँ पकड़ लेता है जिनके बारे में दुनिया को अभी तक पता भी नहीं है. फिर ये कमजोरियों को जोड़कर पूरा हैकिंग का तरीक़ा भी खुद बना सकता है. इसने टेस्टिंग में एक वेब ब्राउज़र में चार कमज़ोरियाँ मिलाकर ऐसा हमला बनाया कि ब्राउज़र और कंप्यूटर दोनों की सुरक्षा तोड़ दी. ऐसा काम करने के लिए 10-15 साल के अनुभव वाला कोई साइबर एक्सपर्ट चाहिए होता था, लेकिन ये AI मॉडल अकेला और बहुत तेजी से इसको कर सकता है . गलत हाथों में पड़ जाए तो… कंपनी ने खुद टेस्ट किया तो हज़ारों ऐसी कमज़ोरियां मिलीं. ये इतना ख़तरनाक है कि अगर ग़लत हाथों में पड़ जाए तो किसी बैंक के सिस्टम में घुस जाए, किसी सरकार के सिस्टम में घुस जाए, किसी अस्पताल के सिस्टम में घुस जाए, किसी कंपनी … Read more

AI के क्षेत्र में कदम रखने वाली जूते बेचने वाली कंपनी, स्टॉक में 870% का उछाल

 नई दिल्‍ली एक कंपनी अपना काम बदलने जा रही है. इस ऐलान के बाद कंपनी के शेयरों में रिकॉर्डतोड़ उछाल देखी गई है. देखते ही देखते कंपनी के शेयर  870% चढ़ चुका है. यह कंपनी कल तक जूते बेच रही थी, लेकिन अचानक इसने अपना बिजनेस बदल दिया है और कहा है कि वह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया में कदम रख रही है।  इस ऐलान के बाद इसके शेयर एक टेक कंपनी की तरह वैल्‍यू दिखाने लगे. 15 अप्रैल 2026 की रात शेयर ने धुंआधार तेजी दिखाई, जिसे देखकर बड़े-बड़े निवेशक भी हैरान दिखाई दिए.  यह शेयर सिर्फ कुछ मिनटो में 400 फीसदी और आखिरी घंटे तक आते-आते 800 फीसदी से ज्यादा चल गया।  कुछ ही दिनों में इस शेयर ने शानदार तेजी दिखाई है. बुधवार को यह शेयर अमेरिकी बाजार में 6.82 डॉलर पर खुला और जैसे ही कंपनी ने अपने बिजनेस रणनीति को साफ किया, कुछ ही घंटों में शेयर 24.3 डॉलर तक पहुंच गया. यह ओपनिंग प्राइस से 870 फीसदी की उछाल थी।  इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि कुछ ही घंटे में इस शेयर ने 9 गुना से ज्‍यादा का रिटर्न दिया. आखिर में यह शेयर 16.99 डॉलर पर बंद हुआ, जो पिछले बंद भाव के मुकाबले 582% की वन डे उछाल थी. कंपनी का मार्केट कैप बढ़कर करीब 176 मिलियन डॉलर पहुंच गया।  किस कंपनी ने किया ये कमाल  यह कंपनी ऑलबर्ड्स है, जिसने ऐलान किया कि वह अब खुद को NewBird AI के तौर पर रीब्रैंड करने जा रही है. साथ ही ये कंपनी एआई कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बिजनेस में काम करेगी. कंपनी का यह फैसला अचानक नहीं आया, बल्कि कंपनी ने मार्च 2026 के आखिरी में अपना जूते वाला बिजनेस 39 मिलियन डॉलर में अमेरिकन एक्‍सचेंज ग्रुप को बेच दिया था, जिसका मतलब था कि कंपनी अपने पुराने बिजनेस से बाहर निकल रही थी. हालांकि अब उसने पूरी तरह से बिजनेस बदल चुका है।  गौरलब है कि इस कंपनी के शेयरों में ऐसे समय में तेजी आई है, जब ग्‍लोबल सेंटिमेंट बदल रहे हैं. ईरान और अमेरिका जंग को खत्‍म करने को लेकर बातचीत करने जा रहे हैं. ऐसे में शेयर बाजार का नजरिया बदला है और निवेशक अच्‍छा दाव लगा रहे हैं। 

परीक्षाओं में नकल पर सख्ती: चयन आयोग की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति, AI कैमरों से होगी लाइव निगरानी

प्रयागराज/लखनऊ. प्रतियोगी परीक्षाओं को पारदर्शी और नकलविहीन बनाए रखने की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा के अनुरूप उत्तर प्रदेश शिक्षा चयन आयोग ने सख्त कदम उठाए हैं। आयोग के अध्यक्ष डॉ प्रशांत कुमार ने बताया कि आगामी परीक्षाओं में जीरो टॉलरेंस नीति को पूरी तरह लागू किया जाएगा, जिससे शुचिता, पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।  उन्होंने बताया कि इसके लिए आयोग मुख्यालय में अत्याधुनिक एकीकृत कंट्रोल रूम स्थापित किया गया है, जहां से सभी परीक्षा केंद्रों की सघन निगरानी की जाएगी। इस कंट्रोल रूम में दो दर्जन से अधिक हाई-क्वालिटी स्क्रीन और एआई कैमरों की व्यवस्था की गई है, जिससे परीक्षा केंद्रों की गतिविधियों पर रियल-टाइम नजर रखी जा सकेगी। यह व्यवस्था परीक्षा प्रक्रिया को पूर्णतः पारदर्शी एवं नकलविहीन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। डॉ. प्रशांत कुमार ने कहा कि आयोग द्वारा परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ आधुनिक निगरानी तंत्र को अपनाया जा रहा है, जिससे किसी भी प्रकार की अनियमितता को तुरंत चिन्हित कर आवश्यक कार्रवाई की जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी या अनुचित साधनों के प्रयोग पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने अभ्यर्थियों से अपील की कि वे परीक्षा को पूर्ण ईमानदारी एवं नियमों के अनुरूप दें तथा किसी भी प्रकार की अफवाहों या भ्रामक सूचनाओं पर ध्यान न दें। आयोग द्वारा सभी आवश्यक व्यवस्थाएं पारदर्शिता एवं निष्पक्षता के साथ सुनिश्चित की जा रही हैं।

Oracle की छंटनी के बीच AI ने 12 हजार नौकरियां खत्म कीं, परप्लेक्सिटी CEO का बयान सामने आया

 नई दिल्ली ओरैकल (Oracle) ने भारत में करीब 12 हजार कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया है. यहां नौकरी से निकालने की पीछे की वजह AI को बताया गया है. इसी बीच परप्लेक्सिटी के सीईओ अरविंद श्रीनिवास का एक बयान चर्चा में है।  अरविंद श्रीनिवास ने हाल ही में जारी ऑल इन पॉडकास्ट पर कहा है कि AI की वजह से नौकरी गंवाने वालों को इसे एक मौके की तरह देखना चाहिए और अपना खुद का काम शुरू करना चाहिए।  पॉडकास्ट के दौरान कहा कि कुछ समय के लिए नौकरी का नुकसान होगा लेकिन AI टूल्स लोगों को मिनी बिजनेस शुरू करने का मौका देता है. साथ ही कमाई के नए रास्ते बनाने की सुविधा देता है।  अरविंद श्रीनिवास ने डिटेल्स में बताते हुए कहा है कि असल बात यह है कि बहुत से लोग अपनी नौकरी से खुश नहीं हैं. अब एक नई संभावना और नया मौका सामने आया है कि इन टूल्स को सीखें और अपना छोटा बिजनेस शुरू करें।  सीईओ के इस बयान पर सोशल मीडिया पर काफी आलोचना भी हुई है. कई लोगों ने कहा कि अपना बिजनेस शुरू करना आसान नहीं होता है. हालांकि कुछ लोगों ने इस सोच का समर्थन भी किया है।  एक्सपर्ट ने बताया 5 साल में इतनी नौकरी जाने की आशंका  कई एक्सपर्ट का मानना है कि आने वाले 5 साल में सिर्फ अमेरिका में ही AI करीब 90 लाख नौकरियों पर असर डालेगा. इनमें प्रोग्रामिंग, वेब डिजाइन और डेटा साइंस जैसी नौकरी पर असर पड़ेगा. वहीं, इंडस्ट्री लीडर्स ने भी यह वॉर्निंग दी है कि बेरोजगारी का स्तर 30% से भी ज्यादा तक पहुंच सकता है।  आने वाले दिनों में और लोगों को निकालेगा Oracle  ओरैकल ने अभी करीब 12,000 कर्मचारियों से निकाला है. आने वाले दिनों यह संख्या और बढ़ेगी. असल में यह कंपनी की बड़ी छंटनी का हिस्सा है और कंपनी ग्लोबली 30 हजार कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाएगी।  ओरेकल कंपनी क्या है?  ओरैकल, असल में एक अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनी है. ये कंपनी मुख्य रूप से डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम, क्लाउंड कंप्यूटर और एंटरप्राज सॉफ्टवेयर प्रोवाइड कराती है. इसकी शुरुआत साल 1977 में हुई थी, जिसको लैरी एलिसन ने अपने साथियों के साथ मिलकर शुरू किया था। 

नौकरियां जाएंगी या इंसान ही खत्म? AI के खिलाफ सड़कों पर उतरे अमेरिकी

जिन आर्टिफ‍िशियल इंटेल‍िजेंस तकनीकों (AI) को जल्‍द से जल्‍द अपनाने के लिए पूरी दुनिया बेताब है। कंपनियां नए-नए मॉडल लॉन्‍च कर रही हैं। उन्‍हीं तकनीकों के खिलाफ दुन‍िया के सबसे शक्‍त‍िशाली देश की जनता सड़कों पर है। वह ओपनएआई से लेकर एंथ्रोपिक तक के दफ्तरों के बाहर जुटकर अपनी आवाज उठा रही है। डर है कि एआई की अनैत‍िक रेस इंसानी वजूद काे खत्‍म कर सकती है। कई और भी चिंताएं हैं, जिन्‍हें लेकर अमेरिका के सैन फ्रांस‍िस्‍को में भारी विरोध-प्रदर्शन देखे गए हैं। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे हैं कि कंपनियां एआई के जोखिमों को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाएं। Stop The AI Race मुह‍िम अमेरिका का सैन फ्रांसिस्‍को टेक्‍नॉलजी का बड़ा गढ़ है। हाल ही में वहां एआई के खिलाफ कुछ ग्रुप्‍स ने बड़ा विरोध-प्रदर्शन किया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शनकारी एआई के जोखिमों को कम करने के लिए फ्रंट‍ियर एआई के विकास को रोकने की मांग कर रहे हैं। Stop the AI Race मुह‍िम के तहत 200 से ज्‍यादा प्रदर्शनकारियों ने अपना मार्च न‍िकाला जो दिग्‍गज कंपनी एंथ्रोपिक के मुख्‍यालय से शुरू होकर ओपनएआई के मुख्‍यालय पर खत्‍म हुआ। क्‍या होता है फ्रं‍ट‍ियर AI एआई के विकास में प्रमुख कंपनियां अब फ्रं‍ट‍ियर एआई को डेवलप करने में जुट गई है। यह सामान्‍य से बहुत अधिक एडवांस है और कहा जाता है कि इंसान से भी बेहतर सोच सकता है। फ्रं‍टि‍यर एआई कोडिंग से लेकर कव‍िताएं लिख सकता है। वह इंसान की भावनाओं को समझकर जवाब दे सकता है। इसे ऐसे तैयार किया जा रहा है कि जरूरत पड़ने पर उन कामों को भी कर पाए, जिसके लिए उसे ट्रेनिंग ही नहीं दी गई है। AI के विरोध में क्‍या हैं लोगों की मांगें     प्रदर्शनकार‍ियों ने फ्रं‍टि‍यर एआई के विकास काे रोकने की मांग की है।     प्रमुख एआई कंपनियों के सीईओ से इस बारे में उनकी प्रतिबद्धता मांगी है।     मांग है कि हरेक एआई लैब को इसके लिए सहमत होना होगा।     लोगों का आरोप है कि एआई लैब्‍स आने सुरक्षा वादों से मुकर रही हैं। किस बात की चिंता लोगों को चिंता है कि इस तरह विकास की गत‍ि को तेज करके इंसान के विलुप्‍त होने का खतरा बढ़ रहा है। याद रहे कि एंथ्रोपिक पिछले महीने अपने उस कमिटमेंट से पीछे हट गई थी जिसमें उसने एआई के खतरनाक होने पर इसके विकास को रोकने की बात कही थी। इस पूरे मामले पर बड़ी कंपनियों ने चुप्‍पी साधी हुई है। वह कोई भी बयान देने से बच रही हैं।

AI ने कर दिया वो काम जिससे वैज्ञानिकों के उड़ गए होश!

नई दिल्ली एआई को यह सोचकर विकसित किया गया था कि यह वह काम करेगा जो इंसान उसे कहेंगे। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस बात से पहले ही आगाह किया था कि यदि एआई में खुद से सोचने, समझने और फैसले लेने की क्षमता विकसित हो गई तो वह इंसानों की बात नहीं मानेगा। अब वैज्ञानिकों की ये बाद सच होती दिखाई दे रही है। हाल ही में एक नई रिसर्च में ऐसा मामला सामने आया है, जिसने एआई की क्षमता और नियंत्रण को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।   दरअसल, एक एआई एजेंट की ट्रेनिंग के दौरान रिसर्चर्स ने देखा कि सिस्टम ने खुद ही क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग शुरू करने की कोशिश की। हैरानी की बात यह थी कि किसी भी रिसर्चर ने उसे ऐसा करने के लिए निर्देश नहीं दिया था। अलीबाबा से जुड़ी रिसर्च टीम कर रही थी प्रयोग यह घटना उस समय सामने आई जब अलीबाबा से जुड़ी एक रिसर्च टीम ROME नाम के एक एक्सपेरिमेंटल एआई एजेंट पर काम कर रही थी। ट्रेनिंग के दौरान सुरक्षा सिस्टम अचानक सक्रिय हो गए, जिसके बाद टीम ने सिस्टम की गतिविधियों की जांच की। जांच में पता चला कि एआई एजेंट क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग से जुड़ी प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश कर रहा था। यह गतिविधि असामान्य इसलिए भी थी क्योंकि सिस्टम को एक सीमित और नियंत्रित वातावरण में चलाया जा रहा था, जिसे “सैंडबॉक्स” कहा जाता है। रिसर्च पेपर में वैज्ञानिकों ने इस व्यवहार को “अनपेक्षित” बताया और कहा कि यह गतिविधि बिना किसी स्पष्ट निर्देश के शुरू हुई। बिना निर्देश के बनाया रिवर्स SSH टनल सिर्फ क्रिप्टो माइनिंग ही नहीं, एआई एजेंट ने एक और तकनीकी कदम उठाया जिसने रिसर्चर्स की चिंता बढ़ा दी। सिस्टम ने खुद ही रिवर्स SSH टनल बना लिया। यह एक ऐसा तकनीकी तरीका है जिसके जरिए सुरक्षित या सीमित नेटवर्क के अंदर मौजूद मशीन बाहरी कंप्यूटर से कनेक्ट हो सकती है। कई बार यह कनेक्शन एक छिपे हुए रास्ते की तरह काम करता है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि न तो माइनिंग और न ही टनल बनाने के लिए एआई को कोई प्रॉम्प्ट या इंस्ट्रक्शन दिया गया था। क्यों बढ़ी चिंता? क्रिप्टोकरेंसी माइनिंग आमतौर पर कंप्यूटर की प्रोसेसिंग पावर का इस्तेमाल करके डिजिटल करेंसी बनाने की प्रक्रिया होती है। इसे आम तौर पर सिस्टम एडमिनिस्ट्रेटर जानबूझकर सेट करते हैं। लेकिन इस मामले में एआई एजेंट ने ट्रेनिंग के दौरान खुद ही यह प्रक्रिया शुरू करने की कोशिश की। इससे यह सवाल उठने लगा कि क्या एडवांस एआई सिस्टम भविष्य में ज्यादा स्वायत्त हो सकते हैं, खासकर तब जब उन्हें ज्यादा टूल्स और कंप्यूटिंग संसाधनों तक पहुंच मिलती है। पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले यह घटना ऐसे समय पर सामने आई है जब एआई एजेंट तेजी से अधिक सक्षम बनते जा रहे हैं। कई सिस्टम अब कोड लिख सकते हैं, जटिल वर्कफ्लो ऑटोमेट कर सकते हैं और अलग-अलग ऑनलाइन टूल्स के साथ काम कर सकते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जैसे-जैसे एआई की क्षमताएं बढ़ेंगी, टेस्टिंग के दौरान अनपेक्षित व्यवहार सामने आने की संभावना भी बढ़ सकती है। ऐसे कुछ उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं। Moltbook एक्सपेरिमेंट नाम के एक प्रयोग में एआई एजेंट्स को सोशल नेटवर्क जैसी डिजिटल दुनिया में रखा गया था, जहां वे आपस में बातचीत करते थे। उस दौरान भी एजेंट्स ने क्रिप्टोकरेंसी का जिक्र किया था। इसी तरह एआई इंटीग्रेशन प्लेटफॉर्म Anon के इंजीनियरिंग हेड डैन बोतेरो ने बताया था कि उनके बनाए OpenClaw एजेंट ने बिना कहे ही इंटरनेट पर नौकरी खोजने की कोशिश शुरू कर दी थी। एआई के व्यवहार को लेकर बढ़ रही बहस मई 2025 में एक और विवाद तब सामने आया जब Anthropic के Claude मॉडल पर काम कर रहे रिसर्चर्स ने दावा किया कि Claude 4 Opus सिस्टम में अपने इरादों को छिपाने और खुद को सक्रिय बनाए रखने की क्षमता दिखाई दी थी। ROME प्रयोग में सामने आया नया मामला इस बात की याद दिलाता है कि जैसे-जैसे एआई सिस्टम अधिक शक्तिशाली होते जाएंगे, उनकी निगरानी और नियंत्रण भी उतना ही जरूरी होगा।

न्यायपालिका को अदृश्य दुश्मनों से खतरा, इंटरपोल से सहयोग की अपील

रायपुर अदालतों को मिल रहे लगातार धमकी भरे ई-मेल ने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा दी है। अदालत परिसरों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है, लेकिन जांच एजेंसियों के हाथ अब तक खाली होने से उनके साइबर सुरक्षा तंत्र और तकनीकी क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसे देखते हुए अब इन अदृश्य दुश्मनों का सुराग लगाने के लिए ही इंटरपोल से मदद ली जा रही है। राज्य साइबर सेल की ओर से इस संबंध में अब पहल की गई है। जिला अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ई-मेल देश के विभिन्न राज्यों की अदालतों के साथ ही बिलासपुर हाई कोर्ट, रायपुर, दुर्ग और कोरबा जैसी जिला अदालतों को बम से उड़ाने की धमकी भरे ई-मेल भेजे गए थे। एक महीने से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी स्थिति यह है कि जांच एजेंसियों के पास ठोस सुराग के नाम पर कुछ भी नहीं है। अत्याधुनिक डिजिटल हथियारों का उपयोग किया राज्य पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले तो दर्ज किए हैं, लेकिन एनआइए से लेकर साइबर सेल तक की सक्रियता के बावजूद नतीजा सिफर (शून्य) है। जांच में यह बात सामने आई है कि ई-मेल भेजने वाले ने अपनी पहचान छिपाने के लिए वीपीएन (वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क) और टोर (ओपन-सोर्स साफ्टवेयर) ब्राउजर जैसे अत्याधुनिक डिजिटल हथियारों का उपयोग किया है। विदेशी सर्वर पर स्थित कंपनियों से डेटा प्राप्त करने में होने वाली महीनों की देरी और इंटरपोल की लंबी कागजी प्रक्रिया ने जांच की रफ्तार को पूरी तरह कुंद कर दिया है। संसाधनों का अभाव बनी चुनौती पुलिस मुख्यालय के अधिकारी यह स्वीकार करते हैं कि हमारे पास फिलहाल ऐसी कोई स्पेशल रिस्पांस टीम नहीं है, जो अंतरराष्ट्रीय सर्वर के पीछे छिपे अपराधियों को 24 घंटे के भीतर बेनकाब कर सके। अदालतों के बाहर सघन चेकिंग, बैग स्कैनिंग और अतिरिक्त सुरक्षा घेरे के कारण लोग और वकील परेशान हैं। सिर्फ शरारत मान लेना बड़ी चूक अब तक कोई अप्रिय घटना नहीं होने के कारण जांच एजेंसियां इसे सिर्फ डराने वाली शरारत के रूप में देख रही हैं। लेकिन विदेशी धरती से बैठकर देश की संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देना किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है। मामले की तह तक जाना राज्य की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। विशेषज्ञों की कमी पर हाई कोर्ट जता चुका है नाराजगी बिलासपुर हाई कोर्ट ने पिछले दिनों साइबर एक्सपर्ट्स की नियुक्तियां न होने पर नाराजगी जताई थी। गृह विभाग की ओर से जवाब दिया गया कि भर्ती प्रक्रिया जारी है, लेकिन बम की इन धमकियों ने यह साफ कर दिया है कि डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में हम कितने पीछे हैं। जब तक राज्य में उच्चस्तरीय साइबर विशेषज्ञ और त्वरित डेटा रिकवरी तंत्र नहीं होगा, तब तक अदृश्य अपराधी इसी तरह हमारी व्यवस्था को चुनौती देते रहेंगे। भविष्य में ऐसी धमकियां और गंभीर रूप ले सकती हैं विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं केवल सुरक्षा एजेंसियों की तकनीकी क्षमता ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साइबर सहयोग की आवश्यकता को भी रेखांकित करती हैं। यदि समय रहते अत्याधुनिक उपकरण, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और त्वरित डेटा एक्सेस व्यवस्था विकसित नहीं की गई, तो भविष्य में ऐसी धमकियां और गंभीर रूप ले सकती हैं।

विभागों में पारदर्शिता बढ़ाने AI का प्रयोग, सिस्टम तोड़ने वालों पर गिरेगी गाज

भोपाल  जिले में विभिन्न मामलों को लेकर चल रहे कोर्ट प्रकरण का प्रबंधन अब लीगल कोर्ट केस मैनेजमेंट सिस्टम से होगा। प्रशासन एआइ आधारित इस सॉफ्टवेयर को अपने यहां लागू करने जा रहा है। जिले के जो भी विभाग अपने यहां के कोर्ट प्रकरणों को दबाकर या लटकाकर बैठे हैं, वे सब जाहिर होंगे। अब ऐसे प्रकरणों को निपटाना होगा। ऐसा नहीं करने वाले सामने आएंगे और उन पर कार्रवाई की रूपरेखा भी बनेगी। कलेक्ट्रेट से जुड़े हुए ही 150 के करीब कोर्ट केस अभी चल रहे हैं। जिले के सभी विभागों को मिलाने पर संख्या इससे चार गुना तक बनेगी। ऐसे समझें सिस्टम यह एक इंटीग्रेटेड केस मैनेजमेंट सिस्टम के रूप में काम करेगा, ताकि विभाग के सभी संबंधित अधिकारी एक ही प्लेटफॉर्म पर जानकारी देख सकें। कानूनी मामलों की प्रगति और पेंडेंसी पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का काम करेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि कानूनी डेटा सुरक्षित रहे और केवल अधिकृत व्यक्तियों की ही उस तक पहुंच हो। ऐसे करेगा काम -केस ट्रैकिंग: यह विभिन्न न्यायालयों में चल रहे सरकारी मामलों की वर्तमान स्थिति को ट्रैक करेगा। – डाटा माइग्रेशन: पुराने कानूनी मामलों के डेटा को सिस्टम में सुरक्षित रूप से स्थानांतरित करने का काम करेगा। दस्तावेजों का प्रबंधन: यह कानूनी दस्तावेजों, आदेशों और याचिकाओं को डिजिटल रूप में सहेज कर रखने में मदद करेगा। – अलर्ट और रिमाइंडर: आगामी पेशी और महत्वपूर्ण समय-सीमाओं के लिए रिमाइंडर देगा। ये होगा लाभ इसका सबसे बड़ा लाभ मेट्रो, नए आइएसबीटी समेत ब्रिज, सड़क और सार्वजनिक हित के संस्थानों को लेकर चल रहे जमीन संबंधी विवाद में होगा।  सिस्टम में प्रकरण से जुड़ा हर अपडेट और डिटेल सबमिट होगा, जिससे केस निपटाने में तेजी आएगी। प्रकरण पर निर्णय होने से जिले के ग्रामीण से लेकर शहरी प्रोजेक्ट और आमजन से जुड़े काम भी तेजी से हो पाएंगे। पेंशन प्रकरण से जुड़े केसों में भी न्याय होगा। नई तकनीक से जल्द निपटेंगे कोर्ट केस कोर्ट केस को शीघ्रता से निपटाने में नई तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे प्रकरण निपटान प्रक्रिया बेहतर व तेज होगी। – कौशलेंद्र विक्रम सिंह, कलेक्टर 600 केस की पेंडेंसी सुनकर कलेक्टर नाराज भोपाल. जिला समिति की बैठक में  600 पेंडिंग प्रकरणों पर कलेक्टर नाराज हुए। कलेक्ट्रेट सभागार में हुई बैठक में पशुपालन, मत्स्य, स्व-सहायता समूह, किसान क्रेडिट कार्ड, प्रधानमंत्री स्वनिधि योजना सहित विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं के प्रकरण जो बैकों में भेजे गए हैं, उनके वितरण और लक्ष्य की जानकारी ली गई। कलेक्टर ने कहा, केन्द्र व प्रदेश सरकार की योजनाओं के प्रकरण कई बैकों में लक्ष्य के अनुरूप निराकरण नहीं किए गए हैं। यह खेदजनक है। जिन बैंकर्स के प्रकरण स्वीकृत हो गए, उनका वितरण एक सप्ताह देने का कहा। लंबित प्रकरणों का 15 दिन में निराकरण का लक्ष्य दिया।

स्वदेशी तकनीक का दम: पीएम मोदी ने पहने ‘Sarvam Kaze’, भारतीय कंपनी की AI में उड़ान

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 में एक शानदार चश्मा पहने हुए देखा गया। यह साधारण नहीं बल्कि AI डिवाइस है। इस वियरेबल का नाम sarvam kaze है। एआई ग्लासेस को देश के AI स्टार्टअप सर्वम AI ने बनाया है। एआई समिट 2026 में जियो ने भी अपने एआई ग्लासेस पेश किए हैं। ऐसे में पीएम मोदी द्वारा स्वदेशी एआई ग्लासेस को पहनना कोई आम बात नहीं है। ये एआई ग्लासेस कई दमदार फीचर्स के साथ लाए जाएंगे। पीएम मोदी ने टेस्ट किए एआई ग्लासेस 16 फरवरी से शुरू हुए इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में Sarvam Kaze पेश किए गए हैं। यह एक AI वियरेबल है। इसकी मदद से अन्य स्मार्ट ग्लासेस की तरह ही यूजर रियल समय में देखी जाने वाली चीजों के बारे में सुन सकते हैं। यह एआई ग्लासेस आपकी बातों का जवाब देता है और इसके जरिए आप कुछ भी कैप्चर कर सकते हैं। भारत मंडपम में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट 2026 में वॉक फेंक के दौरान पीएम मोदी ने यह चश्मा पहना था। सर्वम AI के को-फाउंडर प्रत्यूष कुमार द्वारा शेयर की गई फोटोज में प्रधानमंत्री एग्जीबिशन फ्लोर पर इसके रियल-टाइम रिस्पॉन्स को टेस्ट करते हुए दिखाई दे रहे हैं। चैट फीचर लाने की योजना में कंपनी कंपनी इस हफ्ते एक चैट फीचर भी लॉन्च करने की योजना बना रही है। इस डिवाइस को आवाज और विजुअल इंटरैक्शन के जरिए असल दुनिया में इंटेलिजेंस लाने के लिए डिजाइन किया गया है। कंपनी के मुताबिक, यूजर्स सर्वम प्लेटफॉर्म पर जाकर कस्टम एक्सपीरियंस भी पा सकते हैं। इस एआई डिवाइस को भारत में डिजाइन और बनाया गया है। कंपनी इसे पूरी तरह से देसी AI प्रोडक्ट के तौर पर पेश कर रही है। कंपनी के अनुसार इस डिवाइस को मई में भारतीय बाजार में लॉन्च किया जा सकता है। बिना इंटरनेट वाला एआई भारतीय स्टार्टअप Sarvam AI ने हाल ही में Sarvam Edge लॉन्च किया है। इसकी खासियत है कि यह बिना इंटरनेट के चल रहा है। इसकी मदद से आप अपने फोन या लैपटॉप पर बिना इंटरनेट के भी AI का इस्तेमाल कर पाएंगे। ब्लॉग पोस्ट के अनुसार, Sarvam AI ने बताया है कि यह एक ऐसा ऑन डिवाइस AI प्लेटफॉर्म होगा, जिसे चलाने के लिए ना तो क्लाउड सर्वर की जरूरत है और ना ही इंटरनेट कनेक्शन की। Sarvam Edge उन लोगों तक भी AI को पहुंचाएंगा, जो महंगे इंटरनेट प्लान का इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं और जिनके क्षेत्र में नेटवर्क नहीं आते हैं। Sarvam Edge की खासियत होगी कि यह आपके डिवाइस की प्रोसेसिंग पावर का इस्तेमाल करेगा और इंटरनेट से जुड़ा ना होने की वजह से 100% सुरक्षित भी रहेगा। इससे देखकर लग रहा है कि अब भारतीय कंपनियों ने भी एआई के क्षेत्र में देश को टॉप पर पहुंचाने के लिए अपनी कमर कस ली है।

AI के दौर में इंसानों का भविष्य क्या? 800 करोड़ आबादी के सामने रोजगार का बड़ा सवाल

मुंबई  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) लगातार एडवांस होता जा रहा है और हर फील्ड में इसकी धमक देखने को मिल रही है. आज AI दुनिया की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति बन चुका है. चैटबॉट से लेकर सेल्फ-ड्राइविंग कार, मेडिकल डायग्नोसिस से लेकर कंटेंट राइटिंग तक हर क्षेत्र में AI तेजी से अपनी जगह बना रहा है. ऐसे में एक बड़ा सवाल लोगों के मन में उठता है कि अगर सभी काम AI ही कर देगा, तो दुनिया के 800 करोड़ लोग क्या करेंगे? क्या नौकरियां खत्म हो जाएंगी? क्या इंसान बेकार हो जाएगा? आइए इस सवाल का जवाब ChatGPT से जान लेते हैं. ChatGPT के मुताबिक सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि AI का उद्देश्य इंसानों को पूरी तरह रिप्लेस करना नहीं, बल्कि उनके काम को आसान और तेज बनाना है. इतिहास गवाह है कि जब भी नई तकनीक आई जैसे औद्योगिक क्रांति, कंप्यूटर या इंटरनेट आया, तब शुरुआत में नौकरियों को लेकर डर पैदा हुआ. हालांकि समय के साथ नई तकनीक ने पुराने कामों को बदला और नई नौकरियां भी पैदा कीं. AI भी कुछ दोहराए जाने वाले और डेटा आधारित कामों को संभालेगा, लेकिन रचनात्मकता, भावनात्मक समझ और नैतिक निर्णय जैसे क्षेत्रों में इंसान की भूमिका अभी भी अहम रहेगी. दूसरा पहलू है नौकरियों का बदलाव. कई पारंपरिक नौकरियां कम हो सकती हैं, लेकिन AI से जुड़े नए क्षेत्र तेजी से उभर रहे हैं- जैसे डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी, AI ट्रेनिंग, रोबोटिक्स और डिजिटल मैनेजमेंट. इसके अलावा हेल्थकेयर, शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, कला और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों में इंसानी स्पर्श की जरूरत हमेशा बनी रहेगी. यानी भविष्य में नौकरियां खत्म नहीं होंगी, बल्कि उनका स्वरूप बदलेगा. तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है स्किल्स का. आने वाले समय में वही लोग सफल होंगे जो नई तकनीक के साथ खुद को अपडेट करेंगे. डिजिटल लिटरेसी, क्रिटिकल थिंकिंग, क्रिएटिविटी और समस्या सुलझाने की क्षमता बेहद जरूरी होगी. सरकारों और संस्थानों को भी शिक्षा प्रणाली में बदलाव लाकर लोगों को भविष्य की जरूरतों के हिसाब से प्रशिक्षित करना होगा. AI को दुश्मन नहीं, बल्कि एक टूल के रूप में देखने की जरूरत है. हालांकि यह भी सच है कि AI से असमानता बढ़ने का खतरा हो सकता है. अगर तकनीक का लाभ केवल कुछ कंपनियों या देशों तक सीमित रह गया, तो बेरोजगारी और आर्थिक अंतर बढ़ सकता है. इसलिए नीति-निर्माताओं के लिए जरूरी है कि वे AI के विकास के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा, नई नौकरियों के अवसर और रिस्किलिंग प्रोग्राम पर भी ध्यान दें. कुछ विशेषज्ञ यूनिवर्सल बेसिक इनकम जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं, ताकि तकनीकी बदलाव का असर संतुलित रहे. यह कहना गलत होगा कि AI सब कुछ कर देगा और इंसान के पास कोई काम नहीं बचेगा. AI एक शक्तिशाली असिस्टेंस है, लेकिन मानव बुद्धि, भावनाएं और नैतिकता की बराबरी अभी नहीं कर सकता. भविष्य इंसान और मशीन के सहयोग का होगा, प्रतिस्पर्धा का नहीं. अगर हम बदलाव को अपनाएं और खुद को तैयार रखें, तो AI 800 करोड़ लोगों के लिए खतरा नहीं, बल्कि नए अवसरों का दरवाजा साबित हो सकता है.