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हिमालय के ग्लेशियरों पर बढ़ी गर्मी का असर, 50 करोड़ लोगों के लिए बढ़ा संकट

 नई दिल्ली

दुनिया भर में इस समय ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण जलवायु परिवर्तन का असर जमीन पर साफ-साफ दिख रहा है.  पर्वतीय क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है. दो अरब लोगों को भोजन और पानी देने वाले हिंदूकुश हिमालय से लेकर समुद्र की गहराई तक पृथ्वी गर्म हो रही है. विश्व के सभी पहाड़ पृथ्वी की सतह के लगभग 20% के क्षेत्रफल पर फैले हुए हैं। 

ये पहाड़ दुनिया की कुल जनसंख्या के 10% लोगों को घर और 50% लोगों को खेती की जमीन को सिंचाई हेतु जल, औद्योगिक उपयोग और घरेलू उपभोग के लिए मीठा पानी प्रदान करते हैं. पर्वतीय क्षेत्र आनुवांशिक एवं जैव विविधता के भंडार रहे हैं. पर्वतीय क्षेत्र अन्य आवश्यक संसाधन जैसे लकड़ी, खनिज, जल-विद्युत और मनोरंजक पर्यटन स्थल आदि उपलब्ध कराते है, किन्तु पिछले कुछ दशकों में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती हुई जनसंख्या, जंगलों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल और अवैज्ञानिक कृषि पद्धति  के कारण पर्वतीय क्षेत्रों के मौसम को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है। 

ग्लोबलाइजेशन के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन से जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कॉर्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है. एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था. इसलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह सतत बना रहा. किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था। 

गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है
हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि हिमालय में ग्लेशियरों के पीछे घटने की औसत दर 30-60 मीटर प्रति दशक है जो एक चिंता का विषय है. ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में प्रसिद्ध गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत भी है, तेजी से प्रति वर्ष 28-30 मीटर की दर से पीछे को घट रहा है. 1935 से 2022 के बीच यह लगभग 1700 मीटर पीछे हट चुका है. पिछले दो दशकों में पिघलने की दर भी दोगुनी हो गई है। 

यह हिमालय के ईकोसिस्टम और उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए एक गंभीर संकट है. देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. पीछे हट रहे हैं. सिक्किम और लद्दाख (जांस्कर) के ग्लेशियरों पर की गई स्टडी में पाया गया है कि गर्मी के मौसम तापमान में वृद्धि और कम हिमपात इसके मुख्य कारण हैं। 

हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में बसे देश भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान जहां दुनिया की खासी आबादी रहती है, यहां इन प्रभावों का अधिक जोखिम बना हुआ है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिंदूकुश हिमालय  क्षेत्र के ग्लेशियरों  के तेजी से पिघलने के कारण सदी के अंत तक 75% बर्फ के खत्म होने का खतरा है. भारतीय हिमालय में कुल 9,975 ग्लेशियर हैं. इनमें 900 उत्तराखंड में आते हैं। 

ग्लेशियर पिघलेंगे तो नदियों का क्या होगा?
इन ग्लेशियरों से ही ज्यादातर नदियां निकली हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पीने, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं. किंतु ग्लेशियरों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो देश के पास ऐसा कोई उपाय नहीं है कि वह इन नदियों से जीवन-यापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके?  

पड़ोसी देश नेपाल, जो जलवायु परिवर्तन के जोखिम के मामले में दुनिया में चौथा सबसे संवेदनशील देश माना जाता है. नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं, जिसमें तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अनियमित मानसून और बाढ़/भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी शामिल है.

हिमालयी ईकोसिस्टम में बदलाव के कारण कृषि उत्पादन कम हो रहा है. पानी के स्रोत सूख रहे हैं. जैव विविधता को नुकसान हो रहा है, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा जोखिम में है. नेपाल  जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पिछले दो दशकों से अनुकूलन और कम करने के प्रयास भी कर रहा है। 

बढ़ता तापमान ही है मुसीबत की जड़
आईसीआईएमओडी (ICIMOD), एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र आठ सदस्य देशों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, चीन, भारत, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान) के सहयोग से पर्वतीय आजीविका और पर्यावरण के संरक्षण के लिए काम करता है। 

ICIMOD की चेतावनी के अनुसार, यदि वैश्विक तापमान में वृद्धि को  1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं रोका गया, तो इस सदी के अंत तक हिमालय के 80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं, जिसका सीधा असर पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन पर पड़ेगा. क्योंकि हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र महत्वपूर्ण पर्वत श्रृंखला है जो एशिया के 8 देशों में फैली हुई है. इसे तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है. आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाहर यहां बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है। 

ग्लोबल चेंज बायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक स्टडी के अनुसार, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन अगर बिना रोक टोक इसी रफ्तार से बढ़ता गया तो बढ़ते तापमान की वजह से पिघल रहे अंटार्कटिक बर्फ के चलते एंपरर पेंग्विन की 98 आबादी इक्कीसवीं सदी तक गायब हो सकती है। 

जैसे-जैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है, वैसे-वैसे जलवायु  परिवर्तन गति पकड़ रहा है. दुनिया भर की आबादी चरम मौसम और जलवायु घटनाओं से गंभीर रूप से प्रभावित हो रही है. अल-नीनो या ला-नीना जो समझ में आता हो या ना आता हो, लेकिन इस बार जिस तरह से प्रचंड गर्मी ने हालात पैदा किए हैं. उसने कुछ जरूर सिखा दिया होगा. बढ़ते तापमान को रोकना आसान काम नहीं है। 

स्नो हार्वेस्टिंग का समय आ रहा है
बावजूद इसके हम अपने हिमखंडों को टूटने और पिघलने से बचाने के उपाय औद्योगिक गतिविधियों को विराम देकर एक हद तक रोक सकते हैं. पर्यटन के रूप में मानव समुदायों की जो आवाजाही हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ रही है. उस पर भी अंकुश लगाने की जरूरत है. इसके अलावा वाकई हम अपनी बर्फीली शिलाओं को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो हमारी ज्ञान परंपरा में हिमखंडों के सुरक्षा के जो उपाय उपलब्ध हैं, उन्हें भी महत्व देना होगा। 

हिमालय के शिखरों पर रहने वाले लोग आजादी के दो दशक बाद तक बरसात के समय छोटी-छोटी क्यारियां बनाकर पानी रोक देते थे. तापमान शून्य से नीचे जाने पर यह पानी जमकर बर्फ बन जाता था. इसके बाद इस पानी के ऊपर नमक डालकर जैविक कचरे से इसे ढक देते थे. इस प्रयोग से  लंबे समय तक यह बर्फ जमी रहती थी।

गर्मियों में इसी बर्फ से पेयजल की आपूर्ति होती थी. इस तकनीक को हम स्नो हार्वेस्टिंग भी कह सकते हैं. हालांकि पृथ्वी के ध्रुवों में समुद्र के खारे पानी को बर्फ में बदलने की क्षमता प्राकृतिक रूप से होती है. पर्वतीय क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहर के भंडार हैं, जो क्लाइमेट चेंज के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। 

ये क्षेत्र ग्लेशियरों के माध्यम से मीठे पानी के प्रमुख स्रोत हैं. पिछले कुछ दशकों में पहाड़ी क्षेत्रों के वैश्विक महत्व के बारे में जागरूकता, कठिन जीवन शैली और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशीलता के बारे में काफी वृद्धि हुई है.  दुनिया की प्रमुख नदियों में से कई की जीवन रेखा पर्वतीय क्षेत्रों से ही आरंभ होती है। 

पर्वतीय क्षेत्रों पर स्थित ग्लेशियर पृथ्वी के कूलर और कुल ताजा पानी के 75% भागीदारी है. पहाड़ों को 'दुनिया का वाटर टॉवर' कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि वे न केवल पानी का भंडारण करते हैं बल्कि वैश्विक जलवायु को बांटने में भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने, उनके सटीक पूर्वानुमान और भविष्यवाणी के लिए एकीकृत, समन्वित और संघटित अनुसंधान महत्वपूर्ण है। 

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