बेंगलुरु
सौ बात की एक बात ये कि भारत रक्षा क्षेत्र में बहुत कुछ बना रहा है ये तो कई लोग अब जानने लग गए हैं लेकिन जो लेटेस्ट चीज भारत ने बनाई है वो जानना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बहुत कम देश हैं जो ये बना पाए हैं. भारत ने एक एयरशिप बनाई है. एयरशिप. एयरशिप मतलब क्या? कोई हवाई जहाज है? कोई शिप है जो हवा में उड़ती है? नहीं, असल में एयरशिप मतलब एक बड़ा गुब्बारा. भारत ने जो अभी टेस्ट किया है उसका साइज तो नहीं बताया गया लेकिन एयरशिप वाले गुब्बारे 50 से 100 मीटर या उससे भी लंबे होते हैं. यानी कई मंजिलों वाली इमारत जितने लंबे और बहुत मोटे होते हैं. जैसे हवा में कोई बड़ी-सी बस तैर रही हो जैसे. गैस भरी जाती हैं इसमें, ऐसी गैस जो हवा से हल्की होती है, इसलिए ये आसमान में तैरता रहता है।
जैसे बच्चों के गैस वाले गुब्बारे होते हैं उसी सिद्धांत पर एयरशिप हवा में तैरती है. लेकिन एयरशिप में इंजन भी लगे होते हैं. एयरशिप को ऊपर भेजने का मुख्य काम गैस करती है. उसके बड़े गुब्बारे वाले हिस्से में हीलीयम जैसी हवा से हल्की गैस भरी जाती है. गैस हल्की होने से पूरा प्लैटफॉर्म ख़ुद ही ऊपर उठ जाता है, जैसे गुब्बारा उड़ता है. फिर एक बार ऊंचाई पर पहुंच जाने के बाद उसे वहीं टिकाए रखने और जरूरत पड़ने पर आगे-पीछे या इधर-उधर करने के लिए इंजन और प्रोपेलर का इस्तेमाल होता है. ये इंजन आमतौर पर बिजली से चलते हैं. ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाकर दिन में बिजली बनाई जाती है और बैटरी में स्टोर कर के रखी जाती है गुब्बारे के अंदर, ताकि रात में भी काम चल सके. सब कुछ नीचे जमीन से कंट्रोल होता है।
आसमान में क्या करेंगे ये एयरशिप
तो इसको क्यों भेजते हैं ऊपर आसमान में? मुख्य तौर पर निगरानी करने के लिए. अभी जो भारत ने उड़ा कर टेस्ट किया है, उसमें कई तरह के जांच करने वाले उपकरण लगे थे. जैसे दिशा और गति नापने वाला सेंसर, GPS सिस्टम लगा है ग़ुब्बारे के अंदर ही जिससे पता चलता है कि ये कहां पर है, और इसमें लगे होते हैं कई तरह के कैमरे. जो नीचे की तस्वीरें और वीडियो बनाते रहते हैं. ये सब उपकरण इसलिए लगे होते हैं ताकि देखा जा सके कि ये सही तरीक़े से ऊपर जा रहा है, ऊपर टिक रहा है और सारी जानकारियां जमीन तक वापस पहुंचा पा रहा है या नहीं. तो एक तरह से इस तरह की एयरशिप को लॉन्च करने का मक़सद होता है कि ये बहुत ऊंचाई पर लंबे समय तक टिकी रहे, तैरती रहे और नीचे एक बड़े इलाक़े को देखती रहे, निगरानी करती रहे।
ड्रोन भी ये काम करते हैं लेकिन वो ज्यादा देर तक नहीं उड़ते. सैटेलाइट से भी यही काम किया जाता है लेकिन वो बहुत महंगी पड़ती हैं एयरशिप के मुक़ाबले में. ये एयरशिप यूं समझ लो कि ड्रोन और सैटेलाइट, दोनों के बीच का काम करती है. सीमाओं पर नजर रखने के लिए, दुश्मन की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए, या आपदा के समय जब जमीन के किसी हिस्से का बाक़ी नेटवर्क से अगर संपर्क टूट जाए तब ये बहुत काम आ सकती है. यानी आसमान में एक चौकीदार बैठा है ये समझ लो. भारत में हथियारों पर रिसर्च करने वाले संस्थान DRDO ने ये नई एयरशिप बनाई है. इसको कहते हैं HAPS, हाई ऑल्टीट्यूड प्लैटफ़ॉर्म सिस्टम. इसकी उड़ान का परीक्षण किया गया और ये आसमान में इतनी ऊंचाई पर पहुंच गई कि आम विमान वहां तक नहीं जा सकते. समुद्र तल से 21 km की ऊंचाई तक ये गई, और फिर 20 km की ऊंचाई पर ये तीस मिनट से ज्यादा समय तक टिकी रही. उसके बाद जमीन से कंट्रोल सेंटर से आदेश दिया गया और ये एयरशिप सुरक्षित नीचे आ गई।
आसमान से चौकीदारी
पूरी उड़ान के दौरान इसकी तस्वीरें और सारी जानकारियां रीयल टाइम में जमीन पर कंट्रोल स्टेशन तक पहुंचती रहीं. यानी लाइव तस्वीरें आती रहीं. आगरा में DRDO की लैब है ADRDE, एरियल डिलिवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट, उसने इसको बनाया है. इसी लैब में पैराशूट और हल्के हवाई सिस्टम वगैरह बनते हैं. अब एयरशिप भी बना ली है. पिछले साल मई में मध्य प्रदेश के श्योपुर से इसकी पहली टेस्ट उड़ान हुई थी. तब ये 17 km की ऊंचाई तक गई थी और लगभग 62 मिनट हवा में रही थी. उस बार इसके दबाव और एमरजेंसी सिस्टम की जांच हुई थी. अबकी बार ये 4km और ऊपर गयी है और ऊंचाई पर टिकने की क्षमता भी दिखाई है. ड्रोन जो होते हैं वो क़रीब 12 km की ऊंचाई तक उड़ते हैं और ज्यादा देर तक एक जगह नहीं टिक पाते।
सैटेलाइट जो होती हैं वो तो अंतरिक्ष में होती हैं यानी बहुत ही ऊपर होती हैं, सैकड़ों किलोमीटर दूर जमीन से, और उन्हें वहां भेजना महंगा पड़ता है. ये एयरशिप इन दोनों के बीच का रास्ता है. 20 km की ऊंचाई का मतलब है कि ये बादलों और ज्यादातर विमानों से ऊपर रहती है. और लगभग एक ही जगह टिक सकती है. और इस वजह से वहां से ये एक बड़े इलाक़े को लंबे समय तक देख सकती है. ऐसे समझ लीजिए कि जैसे कोई वॉच टावर आसमान में तैर रहा हो।
ड्रोन-सैटेलाइट भी तो यही करते हैं
सैटेलाइट की तुलना में ये काफ़ी सस्ता पड़ता है और कुछ दिक़्क़त आ जाए तो इसको नीचे उतारकर ठीक भी किया जा सकता है. भारत की लंबी सीमाओं को देखते हुए ऐसी चीज बहुत उपयोगी है. पाकिस्तान बॉर्डर है, चीन का बॉर्डर है, पहाड़ी इलाकों में लगातार नजर रखना मुश्किल होता है. समुद्री सीमा पर भी ये काम आ सकती है. कई दिनों या हफ्तों तक एयरशिप आसमान में एक जगह टिकी रह सकती है।
अभी तो बस छोटा-सा टेस्ट किया गया है आधे घंटे का. असली चुनौती है लंबे समय तक ऊपर टिकना, ज्यादा वजन ढोना और तरह-तरह के मौसम से लड़ना. लेकिन भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जो एयरशिप बनाने पर काम कर रहे हैं. लंबे समय तक टिकने वाला सिस्टम अभी दुनिया में बहुत कम देशों के पास है. ज्यादातर देश अभी टेस्ट ही कर रहे हैं. हाल में अमेरिका की एक कंपनी की एयरशिप वहां के न्यू मेक्सिको राज्य से जापान तक उड़कर वापस आयी और उसपर मोबाइल नेटवर्क का परीक्षण किया गया. लेकिन अभी कोई सेना इसको बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की स्टेज तक नहीं पहुंच पाई है।
यूरोप में एयरबस कंपनी की जेफ़िर नाम की सोलर पावर से चलने वाली एयरशिप है. उसमें तो पंखे भी लगे हैं और वो कई हफ्तों तक ऊपर टिक सकती है. चीन भी इस पर काम कर रहा है. उसके ऊंचे ग़ुब्बारे कई जगह देखे जा चुके हैं और माना जाता है कि वो काफ़ी एडवांस्ड सिस्टम वाली एयरशिप बना रहा है. जापान भी संचार के लिए ऐसे प्लैटफॉर्म में निवेश कर रहा है. भारत अभी शुरुआती चरण में है. DRDO ने पहले 17 km और अब 21 km की ऊंचाई तक पहुंचाया है, लेकिन टिकने का समय अभी आधे घंटे के आसपास ही टेस्ट हुआ है. सरकार ने क़रीब 15,000 करोड़ रुपये का बड़ा कार्यक्रम इसके लिए मंजूर किया है जिसमें निजी कंपनियां भी शामिल होंगी. कुछ भारतीय स्टार्टअप भी अपने छोटे परीक्षण कर रहे हैं. भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो खुद ये तकनीक बना रहे हैं. जब ये पूरी तरह बन जाएगा तो ये उड़ान अपने दम पर होगी.





