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डॉलर पर बढ़ा वैश्विक दबाव! सेंट्रल बैंक घटा सकते हैं होल्डिंग्स, बदल सकता है आर्थिक समीकरण

न्यूयॉर्क

क्‍या डॉलर के बुरे दिन शुरू होने वाले हैं, अब डॉलर दुनिया में दबदबे वाली करेंसी नहीं रहेगी या क्‍या दुनिया को डॉलर का विकल्‍प मिल गया है? एक रिपोर्ट में ऐसा खुलासा किया गया है, जिसके बाद आपके भी मन में ये सभी सवाल घूमने लगेंगे. रॉयटर्स की रिपोर्ट में एक सर्वे के हवाले से कहा गया है कि दुनिया अब डॉलर रिजर्व को कम करने की तैयारी कर रही है. दुनिया में ऐसा पहली बार होने जा रहा है। 

यह सर्वे ऑफिशियल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस फोरम (OMFIF) की ओर से की गई है. इस सर्वे में कहा गया है कि पहली बार दुनिया के केंद्रीय बैंक आने वाले 10 सालों में अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserve) में अमेरिकी डॉलर की हिस्‍सेदारी बढ़ाने के बजाय घटाने की योजना बना रहे हैं, जो यह संकेत देता है कि फॉरेक्‍स रिजर्व पोर्टफोलियो को दुनिया डाइवर्सिफाइड रखना चाहती है। 

पहले क्‍यों होती थी सिर्फ डॉलर बढ़ाने की बात? 
दरअसल, दुनिया में सबसे स्थिर करेंसी डॉलर मानी जाती रही है और पूरी दुनिया डॉलर में ही एक दूसरे देश से कारोबार कर रहे हैं. चाहे तेल का आयात हो या किसी फूड आइटम्‍स का निर्यात डॉलर में ही लेनदेन होता रहा है, लेकिन अब स्थिति‍ धीरे-धीरे बदल रही है. कई देश लोकल करेंसी में आयात-निर्यात करना शुरू कर चुके हैं और अमेरिका के दबाव वाली राजनीति से नाराज भी दिख रहे हैं. सर्वे में खुलासा हुआ है कि ऐसा पहली बार है कि ज्‍यादातर देश डॉलर होल्डिंग्‍स को अगले 10 साल में कम करने जा रहे हैं। 

क्‍यों हो रही डॉलर घटाने की बात? 
सर्वे के अनुसार, केंद्रीय बैंकों को तीन बड़े रि
स्‍क दिखाई दे रहे हैं, जो डॉलर को लेकर पैदा हुए हैं. इसमें सबसे बड़ा अमेरिकी राजनीतिक अनिश्‍चतता, जिससे डॉलर की स्थिर रहने पर सवाल खड़ा हुआ है. दुसरा कई देशों के साथ अमेरिका का जियो-पॉलिटिकल टेंशन, जिस कारण डॉलर में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. खासकर ईरान जंग के दौरान डॉलर में अस्थिरता काफी दिखाई दी है. तीसरी सबसे बड़ी वजह ग्‍लोबल फाइनेंशियल सिस्‍टम का मल्‍टीपोलर होना यानी ज्‍यादातर देश अब सिर्फ डॉलर नहीं, बल्कि अलग-अलग करेंसी में एक दूसरे के साथ ट्रेड कर रहे हैं. इसका सीधा मतलब है कि दुनियाभर के देश अब सिर्फ डॉलर पर निर्भर नहीं रहना चाहते हैं। 

डॉलर की जगह कौन-कौन सी करेंसी ज्‍यादा पसंद हैं 
अभी डॉलर का विकल्‍प स्‍पष्‍ट तौर पर दिखाई नहीं देता है, लेकिन अगर ऐसा ही रहा तो बहुत जल्‍द दुनिया डॉलर को पीछे छोड़कर किसी दूसरे करेंसी की ओर बढ़ेगी. सर्वे में कहा गया है कि डॉलर की जगह सबसे ज्‍यादा पसंद किए जाने वाली चीजों में सोना, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, चीनी युआन, नॉर्वे की क्रोन और न्‍यूजीलैंड डॉलर है. हालांकि, सर्वे का यह भी कहना है कि यूरो और युआन की अपनी लिमिटेशन हैं, यही कारण है कि वे डॉलर का पूर्ण विकल्‍प नहीं बन पाए हैं। 

सोने का बढ़ रहा रिजर्व
रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस सर्वे से पहले एक अन्‍य सर्वे में कहा गया है कि रिकॉर्ड संख्या में केंद्रीय बैंक अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ाने की योजना बना रहे हैं. कई देशों के लिए सोना अब जियो-पॉलिटिकल रिस्‍क के खिलाफ सुरक्षा और रिजर्व को डाइवर्सिफाई रखने का प्रमुख साधन बनता जा रहा है। 

डॉलर का वजूद मिट जाएगा?
रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक ऐसा नहीं दिखाई देता है कि डॉलर का प्रभुत्‍व दुनिया से खत्‍म हो जाएगा, क्‍यों डॉलर अभी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और सुरक्षित निवेश के रूप में उसकी भूमिका बहुत मजबूत बनी हुई है. बदलाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हो रहा है। 

भारत पर क्‍या असर होगा? 
अगर डॉलर से निर्भरता कम होती है तो भारत जैसे देश अपनी करेंसी को बढ़ावा दे सकते हैं और दुनिया के साथ रुपये में कारोबार बढ़ सकता है. साथ ही अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने और अन्य मुद्राओं का हिस्सा बढ़ा सकते हैं. हालांकि, ये अचानक नहीं होगा, बल्कि डॉलर का दबदबा धीरे-धीरे कम हो सकता है। 

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