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चेहरे, बाल और नाखूनों में दिखें ये बदलाव तो रहें सतर्क, AIIMS भोपाल के विशेषज्ञों ने बताई वजह

भोपाल  त्वचा पर दाग, रंग में बदलाव, नाखून की असामान्यता या बालों का झड़ना सामान्य लग सकता है, लेकिन कुछ मामलों में ऐसे बदलाव के पीछे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी छिपी हो सकती है। ऐसे सूक्ष्म बदलावों की पहचान में आधुनिक तकनीक मददगार बन रही है। एम्स भोपाल में आयोजित सीएमई कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने डर्मोस्कोपी के जरिए त्वचा रोगों की बेहतर पहचान और उपचार की योजना बनाने के बारे में बताया। विशेषज्ञों ने त्वचा पर अधिक या कम रंगत, सूजन वाले और ग्रैनुलोमेटस रोग, नाखूनों की समस्याओं तथा बाल झड़ने की अलग-अलग स्थितियों में डर्मोस्कोपी के उपयोग के बारे में चर्चा की। डर्मोस्कोपी निभाएगी अहम भूमिका- विशेषज्ञ डॉ. पायल चौहान, डॉ. सौमिल खरे और डॉ. कृति दीवान ने बताया कि कैंसर से जुड़ी त्वचा संबंधी असामान्यताओं और कैंसरकारी त्वचा रोगों की पहचान में डर्मोस्कोपी भूमिका निभाएगी। संदिग्ध बदलावों की बारीकी से जांच कर आगे की चिकित्सकीय रणनीति तय करने में यह उपयोगी होगी। दैनिक क्लिनिकल प्रैक्टिस में डर्मोस्कोपी का समावेशन के बारे में भी बताया। कार्यर म में प्रोफेसर डॉ. रजनीश जोशी, डॉ. नितिन पंड्या डॉ. प्रशंसा जायसवाल और डॉ. मनीष खंडारे ने भी हिस्सा लिया। आंखों से न दिखने वाले बदलाव भी पकड़ में डर्मोस्कोपी विशेष उपकरण से त्वचा को करीब से देखने की तकनीक है। इससे त्वचा के ऐसे सूक्ष्म पैटर्न और बदलाव स्पष्ट होते हैं, जिन्हें खुली आंखों से पहचानना मुश्किल होता है। इससे डॉक्टर को बीमारी के आकलन और आगे के उपचार का निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। एमपी का पहला अस्पताल जिसमें होगी रोबोटिकी सर्जरी प्रोस्टेट, किडनी, गर्भाशय और कोलन कैंसर जैसी सर्जरी में रोबोटिक तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है। इसमें परंपरागत ऑपरेशन की तुलना में छोटा चीरा लगाया जाता है। इससे रक्तस्राव और दर्द कम होने के साथ मरीज के जल्दी रिकवर होने की संभावना रहती है। दा विंची रोबोट स्थापित होने के बाद एम्स मध्य प्रदेश का पहला सरकारी अस्पताल बन जाएगा, जहां रोबोटिक सर्जरी की सुविधा उपलब्ध होगी। त्वचा कैंसर क्या है? त्वचा कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें त्वचा के ऊतकों में असामान्य कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं। सामान्य तौर पर, त्वचा की कोशिकाएं बूढ़ी होकर मरने लगती हैं और उनकी जगह नई कोशिकाएं बन जाती हैं। लेकिन जब यह प्रक्रिया ठीक से काम नहीं करती तो कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगती हैं।

एम्स का कमाल: 7 माह से पैरालिसिस झेल रही महिला फिर हुई सक्रिय, स्पाइनल ट्रीटमेंट से मिला राहत

भोपाल भोपाल एम्स में एक महिला को मानो नया जीवन दिया गया है। ललितपुर (उत्तर प्रदेश) की 65 वर्षीय यह महिला पिछले सात महीनों से न चैन से बैठ पा रही थी और न ही सो पा रही थी। रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण वह 'स्पास्टिक पैराप्लेजिया' जैसी गंभीर स्थिति का शिकार थीं, जिसमें मांसपेशियां अनियंत्रित रूप से जकड़ जाती हैं। वह लकवे जैसी लाचारी और असहनीय पीड़ा जूझ रही थी। ल्बे समय से चल रहे उपचार व दवाओं के हैवी डोज के बावजूद कोई राहत नहीं मिल रही थी, जिससे पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट चुका था। ऐसे में एम्स भोपाल दर्द चिकित्सा यूनिट (एनेस्थेसियोलॉजी) और न्यूरोसर्जरी विभाग की टीमें आगे आईं। डॉक्टर्स ने आइटीबी तकनीक अपनाकर महिला की दिक्कत दूर कर दी। इतना ही नहीं, प्राइवेट अस्पतालों में लगनेवाला लाखों का खर्च भी बचा दिया। वरदान बनी आइटीबी तकनीक महिला कई माह से परेशान थीं। आखिरकार एम्स भोपाल के दर्द चिकित्सा यूनिट (एनेस्थेसियोलॉजी) और न्यूरोसर्जरी विभाग की संयुक्त टीम ने इस जटिल चुनौती को स्वीकार किया। डॉ. अनुज जैन और डॉ. सुमित राज के नेतृत्व में डॉक्टरों ने 'इंट्राथीकल बैक्लोफेन थेरेपी' (आइटीबी) अपनाने का निर्णय लिया। यह तकनीक उन मरीजों के लिए वरदान है जिन पर सामान्य दवाएं बेअसर हो जाती हैं। इसमें दवा को सीधे रीढ़ की हड्डी के तरल (सेरेब्रोस्पाइनल क्लुइड) में पहुंचाया जाता है, जिससे कम खुराक में ही अधिकतम लाभ मिलता है और दुष्प्रभाव कम होते हैं। उपचार की प्रक्रिया में सबसे पहले मरीज को ट्रायल इंजेक्शन दिया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम मिलते ही डॉक्टरों ने त्वचा के नीचे एक छोटा 'प्रोग्रामेबल ड्रग डिलीवरी पंप' प्रत्यारोपित कर दिया। यह डिवाइस निरंतर दवा की नियंत्रित मात्रा शरीर को पहुंचाता रहता है। प्रत्यारोपण के बाद मरीज अब पूरी तरह दर्दमुक्त है और सामान्य नींद ले पा रही है। एम्स में महज 7 लाख रुपए में उपचार: कम से कम 3 लाख रुपए बचाए निजी अस्पतालों में 10 लाख रुपए से अधिक में होने वाला यह उपचार एम्स में मात्र 7 लाख रुपए में संभव हुआ। डॉ. जैन ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा के दौर में किसी भी मरीज को लंबे समय तक दर्द सहने की जरूरत नहीं है। डॉ. सुमित राज ने इसे टीम वर्क की जीत बताया।

एम्स भोपाल, शासकीय होम्योपैथी कॉलेज और केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद के बीच त्रिपक्षीय एमओयू

एम्स भोपाल, शासकीय होम्योपैथी कॉलेज भोपाल और केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद के बीच हुआ त्रिपक्षीय एमओयू मधुमेह के जटिल उपचार पर होगा संयुक्त शोध भोपाल  विश्व होम्योपैथी दिवस के उपलक्ष्य में विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रताप राव जाधव और सचिव आयुष वैद्य राजेश कोटेचा की उपस्थिति में होम्योपैथी के बढ़ते वैश्विक प्रभाव पर चर्चा की गई। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण, प्रदेश के आयुष विभाग के लिए एक बड़ी उपलब्धि रहा, जिसके अंतर्गत शासकीय होम्योपैथिक चिकित्सा महाविद्यालय भोपाल, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल और केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के बीच एक त्रिपक्षीय एमओयू पर हस्ताक्षर किए गए। आयुष विभाग के लिए यह गौरवपूर्ण क्षण है, जो प्रदेश में उच्च स्तरीय वैज्ञानिक अनुसंधान के नए द्वार खोलेगा। एमओयू में अब भोपाल के इन प्रतिष्ठित संस्थानों में 'मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट डायबिटीज मेलिटस' के कारण होने वाले 'फुट अल्सर' के मामलों में होम्योपैथी दवाओं के प्रभाव पर विस्तृत शोध किया जाएगा। यह अनुसंधान, भविष्य में एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति कीटाणुओं की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता (रेजिस्टेंस) के वैश्विक संकट को हल करने में एक मील का पत्थर साबित होगा। भारत में इस विधा के स्वरूप, अनुसंधान और शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे नवाचारों को रेखांकित करते हुए विशेषज्ञों को सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर एम्स भोपाल के माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. देवाशीष विश्वास, मुख्य शोधकर्ता डॉ. शाश्वती नेमा, शासकीय होम्योपैथी कॉलेज भोपाल की शोध प्रमुख डॉ. जूही गुप्ता, सीसीआरएच के महानिदेशक डॉ. सुभाष कौशिक, राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग के सचिव डॉ. संजय गुप्ता एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रेनु मित्तल विशेष रूप से उपस्थित थे।  

एम्स भोपाल से मातृ मृत्यु के वैज्ञानिक कारणों की पहचान, बिना किसी झंझट के फ्री पैथोलॉजिकल ऑटोप्सी

भोपाल  प्रदेश में मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) की स्थिति को सुधारने और प्रसव के दौरान होने वाली मौतों के वास्तविक कारणों की पहचान के लिए एम्स भोपाल में अब मातृ मृत्यु के मामलों में मुफ्त पैथोलॉजिकल (क्लिनिकल) ऑटोप्सी की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। यह सेवा उन परिवारों के लिए मददगार साबित होगी जो अपनी प्रियजन की असामयिक मृत्यु के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझना चाहते हैं। खास बात यह है कि यह पूरी प्रक्रिया पुलिस हस्तक्षेप से मुक्त है और पूरी तरह गरिमापूर्ण तरीके से संपन्न की जाती है। आमतौर पर ऑटोप्सी या पोस्टमार्टम का नाम आते ही पुलिस और कानूनी कार्यवाही का विचार आता है, लेकिन एम्स की यह सुविधा इससे पूरी तरह अलग है। यह एक क्लिनिकल ऑटोप्सी है, जो केवल परिवार के लिखित अनुरोध और सहमति पर की जाती है। इसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं होती। इसका मुख्य उद्देश्य चिकित्सा विज्ञान की मदद से मृत्यु के उन कारणों को खोजना है, जो सामान्य जांच में स्पष्ट नहीं हो पाते। एम्स प्रबंधन के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया लगभग डेढ़ घंटे में पूरी हो जाती है। विशेषज्ञों द्वारा केवल जांच के लिए आवश्यक सूक्ष्म ऊतक ही लिए जाते हैं और सभी अंगों को पुनः शरीर में सुरक्षित स्थापित कर दिया जाता है। चेहरे को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाई जाती और शरीर को टांकों से सुरक्षित कर ससम्मान परिवार को सौंपा जाता है। इसलिए जरूरी है जांच     हिस्टोपैथोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी रिपोर्ट के जरिए परिवार को पता चलता है कि मृत्यु के वास्तविक कारण क्या थे।     इससे सरकार को यह समझने में मदद मिलती है कि कौन सी मौतें रोकी जा सकती थीं।     प्रमाणिक डेटा के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं में आवश्यक सुधार किए जा सकेंगे। इनका कहना है     मातृ मृत्यु के मामलों को कम करना हमारी प्राथमिकता है। पैथोलाजिकल आटोप्सी के माध्यम से हम मृत्यु के उन सूक्ष्म कारणों तक पहुंच सकते हैं, जो भविष्य में अन्य महिलाओं की जान बचाने के लिए प्रभावी रणनीति बनाने में मदद करेंगे- प्रो. डा. माधवानन्द कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल।  

एम्स भोपाल और ग्वालियर आयुर्वेद संस्थान मिलकर खोजेंगे घुटनों के दर्द का परमानेंट इलाज

ग्वालियर  घुटनों के दर्द (आस्टियोआर्थराइटिस) से जूझ रहे मरीजों के लिए अच्छी खबर है। एम्स भोपाल और क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ग्वालियर मिलकर इस बीमारी का समाधान खोज रहे हैं। जल्द ही दोनों संस्थानों के बीच आधिकारिक समझौता होने वाला है, जो जोड़ों के दर्द के इलाज की दिशा बदल सकता है। केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) आयुष मंत्रालय से इस रिसर्च प्रोजेक्ट की अनुमति मिल गई है। शोध का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि घुटने के आस्टियोआर्थराइटिस के इलाज में पारंपरिक आयुर्वेदिक औषधियां, आधुनिक एलोपैथी की तुलना में कितनी सुरक्षित और असरदार हैं। शोध का मुख्य कार्यक्षेत्र एम्स भोपाल रहेगा, जहां की आधुनिक लैब और डाक्टरों की देखरेख में मरीजों पर आयुर्वेदिक उपचार के प्रभावों का बारीकी से अध्ययन किया जाएगा। यह रिसर्च आधुनिक मानकों पर आधारित होगी, ताकि इसके परिणामों पर भरोसा किया जा सके। एम्स भोपाल के अस्थिरोग विभाग के प्रोफेसर डा. रेहान उल हक प्रोजेक्ट का नेतृत्व करेंगे। वहीं क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ग्वालियर के विशेषज्ञ डा. अनिल मंगल इसके सह-अन्वेषक और कोआर्डिनेटर होंगे। मरीजों को क्या होगा फायदा?     इस शोध से मरीजों को पता चलेगा कि आयुर्वेद की कौन-सी दवाएं विज्ञानी रूप से सुरक्षित हैं।     अगर आयुर्वेदिक औषधियां प्रभावी साबित होती हैं, तो मरीजों को पेन-किलर (दर्द निवारक दवाओं) के दुष्प्रभावों से मुक्ति मिल सकती है।     यह रिसर्च गठिया और जोड़ों के दर्द के उपचार का तरीका बदल सकती है।

AIIMS Bhopal में OPD पर्चा बनाने की प्रक्रिया में बदलाव, लाइन में खड़ा होने की जरूरत नहीं

भोपाल  एम्स में इलाज कराने वाले मरीजों को बड़ी राहत मिलने वाली है। उपचार और जांच के लिए एम्स की ओपीडी से लेकर इमरजेंसी तक मरीजों की कतार और भटकाव से मुक्ति मिलने वाली है। संस्थान ने अपनी सेवाओं को डिजिटलाइजेशन करने के लिए नई तकनीक अपनाने जा रहा है। इसके तहत व्हाट्सएप से ही डॉक्टर का अपॉइंटमेंट और जांच का भुगतान किया जा सकेगा। उसी व्हाट्सएप पर जांच रिपोर्ट भी प्राप्त होगी। इसका पायलट प्रोजेक्ट इस सप्ताह के अंत या अप्रेल के प्रारंभ में शुरू होने वाला है। यह सेवा जून तक लागू होगी। ओपीडी की लाइन में लगने वाले लोगों को राहत मिलेगी। ऑनलाइन भुगतान और तुरंत रिफंड आइआइटी इंदौर इस तकनीक को तैयार कर रहा है। इस प्रणाली में जांच और अन्य सेवाओं का भुगतान ऑनलाइन होगा। भूल से यदि मरीज अधिक राशि जमा कर देगा, तो अतिरिक्त धनराशि उसे उसी प्लेटफॉर्म के जरिए मिल जाएगा। इससे काउंटर पर भीड़ कम होगी और प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी। मरीजों को मिलेंगी ये स्मार्ट सुविधाएं     व्हाट्सएप पर अपॉइंटमेंट स्लॉट चुनने की सुविधा     डिस्प्ले बोर्ड पर विभागवार प्रतीक्षा समय दिखेगा     नेविगेशन फीचर से विभाग तक पहुंचना आसान     जांच रिपोर्ट की पीडीएफ व्हाट्सएप पर प्राप्त होगी     ओपीडी में क्यू मैनेजमेंट ऐप से टोकन नंबर मिलेगा     डिजिटल ट्रैकिंग से हर प्रक्रिया पर नजर रखी जाएगी सिस्टम बताएगा कहां है कौन विभाग इस तकनीक के नेविगेशन फीचर से यह पता चलेगा कि परिसर में कौन विभाग कहां हैं और कहां कौन सी जांच होती है। ए्स के एक हिस्से में इसका पायलट प्रोजेक्ट चलाया जाएगा। सफल होने पर इसे पूरे परिसर में लागू किया जाएगा। हम इसका पायलट प्रोजेक्ट मार्च के अंत तक शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू करने में तीन महीना लगेगा। इससे कामकाज अधिक व्यवस्थित होगा, मरीजों और उनके परिजन परेशानी से बचेंगे। – डॉ. केतन मेहरा, एसोसिएट प्रोफेसर, यूरोलॉजी विभाग और प्रवक्ता, एम्स भोपाल बच्चों के किडनी ट्रांसप्लांट की तैयारी एम्स में पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट शुरू करने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। संस्थान के अनुसार तीन बच्चों को चिन्हित किया गया है और उनके डोनर की जांच व प्री-वर्कअप जारी है। सब कुछ अनुकूल रहा तो अगले माह प्रदेश का पहला बाल किडनी प्रत्यारोपण संभव हो सकेगा।

नसों के बीच फंसा ट्यूमर, निजी अस्पतालों ने किया मना, एम्स में माइक्रोसर्जरी से सफल निकासी

भोपाल  नसों के बीच विकसित हुए खतरनाक ट्यूमर ने एक 40 वर्षीय महिला की जिंदगी पूरी तरह बदल दी थी। हालत यह हो गई थी कि उनका उठना-बैठना तक मुश्किल हो गया और धीरे-धीरे वे बिस्तर पर निर्भर हो गईं। कई निजी अस्पतालों ने इस जटिल सर्जरी को जोखिम भरा बताकर हाथ खड़े कर दिए थे।  बिस्तर तक सीमित हो गई थी जिंदगी भोपाल निवासी 40 वर्षीय महिला पिछले कई महीनों से इस न्यूरोलॉजिकल समस्या से जूझ रही थीं। स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वे खुद से उठ-बैठ भी नहीं पा रही थीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपने शरीर पर नियंत्रण खोना शुरू कर दिया, जिसमें सबसे बड़ी समस्या मल और मूत्र पर नियंत्रण खत्म होना था। डॉक्टरों ने बताया कि महिला को इंट्रामेडुलरी स्पाइनल ट्यूमर की समस्या थी। यह वह गांठ होती है जो रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) के अंदर विकसित होती है। यह बेहद दुर्लभ स्थिति है और कुल स्पाइनल ट्यूमर मामलों में इसका प्रतिशत बहुत कम होता है। इस तरह के ट्यूमर में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि यह सीधे नसों के बीच विकसित होता है, जिससे सर्जरी के दौरान जरा सी चूक स्थायी लकवे का कारण बन सकती है। इसके लक्षणों में शरीर के हिस्सों में कमजोरी, सुन्नपन, चलने में दिक्कत, और मल-मूत्र नियंत्रण में समस्या शामिल हैं। समय पर पहचान और विशेषज्ञ इलाज ही इससे बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। एक प्रतिशत मामलों में होती है यह बीमारी यह ट्यूमर स्पाइनल श्वाननोमा के बेहद कम, लगभग 1.1 प्रतिशत मामलों में ही देखने को मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति रीढ़ की सर्जरी में सबसे जटिल मानी जाती है, क्योंकि इसमें स्पाइनल कॉर्ड के भीतर से ट्यूमर निकालना होता है। जरा सी चूक भी स्थायी लकवा जैसी गंभीर समस्या पैदा कर सकती है। कई अस्पतालों ने ठुकराया, एम्स में मिली उम्मीद मरीज और उनके परिजनों ने इलाज के लिए कई अस्पतालों का रुख किया, लेकिन कहीं सर्जरी को टाल दिया गया तो कहीं इसे अत्यधिक जोखिम भरा और महंगा बताया गया। लगातार निराशा और आर्थिक संकट के बीच परिवार ने लगभग उम्मीद छोड़ दी थी। ऐसे कठिन समय में उन्होंने एम्स का रुख किया, जहां उन्हें नई उम्मीद मिली। ऑर्थोपेडिक्स विभाग के डॉ. पंकज मिश्रा के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण केस को स्वीकार किया। सर्जरी से पहले विस्तृत जांच और सटीक योजना बनाई गई। ऑपरेशन के दौरान माइक्रोसर्जिकल तकनीक का इस्तेमाल किया गया, जिससे स्पाइनल कॉर्ड के भीतर मौजूद ट्यूमर को सावधानीपूर्वक हटाया गया। इस प्रक्रिया में नसों को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे टीम ने सफलतापूर्वक पूरा किया। ये सावधानियां जरूरी     किसी व्यक्ति को लंबे समय तक पीठ दर्द, पैरों में कमजोरी, चलने में असंतुलन या शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन महसूस हो रहा है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह स्पाइनल ट्यूमर का शुरुआती संकेत हो सकता है। ऐसे में तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट या ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।     नियमित स्वास्थ्य जांच, एमआरआई जैसी जांचों से समय रहते बीमारी की पहचान संभव है।     सर्जरी के बाद फिजियोथेरेपी और पुनर्वास बेहद जरूरी होता है, जिससे मरीज तेजी से सामान्य जीवन में लौट सके। अलग-अलग विभागों के डॉक्टरों ने मिलकर की सर्जरी इस जटिल सर्जरी को सफल बनाने में कई विभागों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। एनेस्थीसिया विभाग के डॉ. एसआरएएन भूषण ने ऑपरेशन के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर बनाए रखा। वहीं, शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास विभाग के डॉ. विट्ठल पुरी ने सर्जरी के बाद मरीज की रिकवरी में अहम भूमिका निभाई। उनकी देखरेख में मरीज ने धीरे-धीरे अपनी शारीरिक क्षमता वापस पाना शुरू किया। आयुष्मान योजना से मिला फ्री इलाज इस पूरे इलाज की एक और खास बात यह रही कि सर्जरी और उपचार पूरी तरह आयुष्मान भारत योजना के तहत फ्री किया गया। इससे मरीज और उसके परिवार पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ नहीं पड़ा। यह योजना गंभीर बीमारियों से जूझ रहे गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए बड़ी राहत साबित हो रही है। तेजी से हो रहा सुधार, लौट रही सामान्य जिंदगी सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति में तेजी से सुधार देखने को मिला। उन्होंने धीरे-धीरे अपनी ताकत वापस पाना शुरू कर दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने फिर से मल-मूत्र पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है, जो उनके लिए बड़ी राहत की बात है। अब वह धीरे-धीरे सामान्य और आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रही हैं।

महिला डॉक्टर की मौत पर एनएचआरसी ने एम्स से 15 दिन में रिपोर्ट मांगी, सख्त कार्रवाई का आदेश

भोपाल  राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एम्स भोपाल में कार्यरत एक महिला सहायक प्राध्यापक की मौत के मामले में गंभीर संज्ञान लिया है। आयोग ने मामले की जांच के निर्देश देते हुए 15 दिन के भीतर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।शिकायत में आरोप लगाया गया है कि 5 जनवरी 2026 को महिला डॉक्टर की मौत लंबे समय से हो रहे मानसिक उत्पीड़न और खराब कार्य वातावरण के कारण हुई। शिकायत के अनुसार ट्रॉमा एवं आपातकालीन चिकित्सा विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मोहम्मद यूनुस पर मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए गए हैं।  महिला डॉक्टरों की शिकायतों को दबाया शिकायत में बताया गया है कि पीड़ित डॉक्टर ने अपनी परेशानी को लेकर तीन बार ई-मेल के माध्यम से संस्थान के अधिकारियों को जानकारी दी थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। शिकायत में यह भी कहा गया है कि संस्थान में पहले भी महिला डॉक्टरों की शिकायतों को दबाया गया और इस मामले में अभी तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई।  पुलिस आयुक्त और एम्स भोपाल के निदेशक को दिए निर्देश मामले को गंभीर मानते हुए आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने भोपाल के पुलिस आयुक्त और एम्स भोपाल के निदेशक को निर्देश दिए हैं कि मामले की जांच कर प्राथमिकी, शव परीक्षण रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेज आयोग को उपलब्ध कराएं। 3 वर्षों की शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का विवरण मांगा इसके साथ ही एम्स प्रशासन से संस्थान की यौन उत्पीड़न निवारण समिति की जानकारी, पिछले तीन वर्षों में मिली शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा विवरण भी मांगा गया है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना जाएगा। आयोग ने सभी संबंधित अधिकारियों को 15 दिन के भीतर पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। 

AIIMS भोपाल में ‘मैजिक नाइफ’ की मदद से डेंटल सर्जरी में क्रांतिकारी बदलाव

भोपाल एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने दांतों की सर्जरी में इस्तेमाल होने वाला एक मल्टीपल टूल विकसित किया है, जिसे भारत सरकार से पेटेंट मिला है. यह उपकरण डेंटल इम्प्लांट और ओरल सर्जरी को आसान और कम समय में पूरा करने में मदद करेगा.  दरअसल, दांतों के ऑपरेशन के दौरान डॉक्टरों को एक ही उपकरण से  कट लगाना, पकड़ना और इम्प्लांट करना  जैसे अलग अलग काम करने होते हैं.  इससे निजात पाने के लिए एम्स के डॉक्टरों ने डेंटल इम्प्लांट और माइनर ओरल सर्जरी के लिए एक मल्टीपर्पज सर्जिकल टूल बनाया है. यह एक 'स्विस नाइफ' की तरह काम करता है, जिसमें सर्जरी के तमाम स्टेपस् के लिएजरूरी  कई टूल्स एक ही डिवाइस में मिलते हैं.  इस 'स्विस नाइफ' की 5 बड़ी विशेषताएं     ऑल-इन-वन डिज़ाइन यानी सर्जरी के दौरान अलग-अलग दर्जनों औजारों की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे प्रक्रिया आसान होगी.     कम उपकरणों के उपयोग से संक्रमण का खतरा कम होगा और शल्य चिकित्सा की सटीकता बढ़ेगी.     प्रक्रिया कम समय में पूरी होने से मरीजों को कम असुविधा होगी और उनकी रिकवरी तेज होगी.     इसका डिजाइन काफी छोटा और हल्का है, जो इसे मोबाइल क्लीनिकों और ग्रामीण स्वास्थ्य शिविरों के लिए आदर्श बनाता है.     वहीं, महंगे विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम होने से दंत चिकित्सा की लागत में कमी आएगी.  विशेषज्ञों का मानना है कि यह पेटेंट न केवल एम्स भोपाल के लिए गौरव की बात है, बल्कि यह 'मेक इन इंडिया' पहल को भी मजबूती प्रदान करता है. आने वाले समय में यह उपकरण सरकारी अस्पतालों, प्राइवेट क्लीनिकों और ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है. इस स्वदेशी उपकरण के मुख्य आविष्कारक डॉ. अंशुल राय हैं. उनके साथ डॉ. बाबूलाल, डॉ. जितेंद्र कुमार, डॉ. ज़ेनिश भट्टी और डॉ. मोनिका राय ने सह-आविष्कारकों के रूप में इस पर काम किया. टीम का उद्देश्य सर्जरी के दौरान बार-बार उपकरण बदलने की जटिलता और उससे होने वाली मानवीय त्रुटियों को कम करना था. 

एम्स भोपाल में मप्र में पहली बार हुई ‘मसल ट्रांसफर’ सर्जरी, जांघ की मांसपेशी से लौटाई गई हाथ की गति

भोपाल  एम्स भोपाल के बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने मध्य प्रदेश में पहली बार एक ऐसी जटिल सर्जरी को अंजाम दिया है, जिसमें शरीर के एक हिस्से की सक्रिय मांसपेशी को दूसरे हिस्से में लगाकर अंग की गति वापस लाई गई। 'फ्री फंक्शनिंग मसल ट्रांसफर' (एफएफएमटी) नामक इस तकनीक के जरिए 55 वर्षीय एक ऐसे मरीज का हाथ सक्रिय किया गया है, जो 'पैन ब्रैकियल प्लेक्सस इंजरी' के कारण पूरी तरह लकवाग्रस्त (पैरालाइज्ड) हो चुका था। मरीज एक ऐसी गंभीर स्थिति से जूझ रहा था जिसमें कंधे से हाथ तक जाने वाली नसों का जाल पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसके परिणामस्वरूप उसका ऊपरी अंग पूरी तरह निष्क्रिय था और वह हाथ हिलाने तक में असमर्थ था। इस स्थिति में जीवन की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित होती है क्योंकि मरीज दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है। कैसे हुई जटिल माइक्रोसर्जरी? इस सर्जरी में मरीज की जांघ से 'ग्रैसिलिस' नामक मांसपेशी को उसकी नसों और रक्त वाहिकाओं के साथ निकाला गया। इस जीवित मांसपेशी को प्रभावित हाथ में प्रत्यारोपित किया गया। इसके बाद माइक्रोस्कोप की मदद से नसों और खून की नलियों को जोड़ा गया। इस सफल प्रक्रिया के बाद अब मरीज की कोहनी में सक्रिय लचीलापन बहाल हो सकेगा, जिससे वह हाथ मोड़ना और उठाना जैसे बुनियादी कार्य कर पाएगा। इन विशेषज्ञों की टीम ने रचा इतिहास इस ऐतिहासिक सर्जरी में बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के डॉ. दीपक कृष्णा (अतिरिक्त प्रोफेसर), डॉ. राहुल दुबेपुरिया (एसोसिएट प्रोफेसर) की मुख्य भूमिका रही। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. अनुज जैन (अतिरिक्त प्रोफेसर) ने किया। जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध     प्रदेश में यह अपनी तरह की पहली और बेहद जटिल प्रक्रिया है। इस उपलब्धि ने साबित किया है कि एम्स भोपाल अब दुनिया की सबसे उन्नत माइक्रोसर्जिकल तकनीकों को अपनाने में सक्षम है। हमारा लक्ष्य गरीब और जरूरतमंद मरीजों को ऐसी महंगी और जटिल सर्जरी किफायती दरों पर उपलब्ध कराना है। – प्रो. डॉ. माधवानंद कर, कार्यपालक निदेशक, एम्स भोपाल।