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AIIMS दिल्ली की बड़ी पहल: स्ट्रोक से जूझ रहे मरीज अब घर पर ही कर सकेंगे रिकवरी

नई दिल्ली भारत में आज स्ट्रोक एक गंभीर और तेजी से बढ़ती हुई स्वास्थ्य समस्या बन चुका है. बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता स्ट्रेस, गलत खान-पान और फिजिकल एक्टिविटी की कमी के कारण स्ट्रोक के मामले हर साल लगातार बढ़ रहे हैं. हालात इतने गंभीर हैं कि हर साल लाखों भारतीय स्ट्रोक का शिकार होते हैं, जिनमें से कई लोगों की जान चली जाती है. जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ और एक्टर मिथुन चक्रवर्ती, हाल के कुछ सालों में कई जानी-मानी हस्तियां स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी का सामना कर चुकी हैं. इससे साफ है कि यह बीमारी अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं. स्ट्रोक के बाद कई मरीजों में शरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवा, बोलने-समझने में परेशानी, चलने-फिरने में दिक्कत और रोजमर्रा के कामों में दूसरों पर निर्भरता बढ़ जाती है.  AIIMS की नई स्टडी से नई उम्मीद ऐसे में AIIMS दिल्ली की एक नई स्टडी स्ट्रोक के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है. इस स्टडी के अनुसार, रोजाना सिर्फ 30 मिनट धूप में समय बिताना स्ट्रोक से उबर रहे मरीजों की रिकवरी, नींद और मूड में सुधार कर सकता है. वो भी बिना किसी अधिक खर्च के… एम्स की यह स्टडी नवंबर 2023 से अप्रैल 2025 के बीच की गई और इसे संस्थान के पांचवें रिसर्च डे पर पेश किया गया. इसमें पाया गया कि जिन स्ट्रोक मरीजों को नियमित इलाज और फिजियोथेरेपी के साथ सनलाइट थेरेपी दी गई, उनकी जिंदगी की गुणवत्ता उन मरीजों की तुलना में काफी बेहतर रही जिन्हें केवल सामान्य इलाज दिया गया.  कैसे की गई स्टडी? इस स्टडी में 18 से 80 वर्ष के उन मरीजों को शामिल किया गया, जिन्हें पिछले एक महीने के अंदर मिडियम लेवल का स्ट्रोक हुआ था.     200 से ज्यादा मरीजों की स्क्रीनिंग के बाद 40 मरीजों को चुना गया और फिर उन्हें दो ग्रुप में बांटा गया.      पहला ग्रुप सिर्फ स्टैंडर्ड मेडिकल ट्रीटमेंट और रिहैबिलिटेशन और दूसरा ग्रुप स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट और करीब दो हफ्तों तक हर दूसरे दिन 30 मिनट धूप में बैठना.      धूप की तीव्रता 10,000 से 25,000 लक्स के बीच रखी गई, जो हल्की आउटडोर डे-लाइट के बराबर होती है. सुरक्षा के लिए लक्स मीटर से लगातार निगरानी की गई.     तीन महीने तक मरीजों की शारीरिक क्षमता, मूड, नींद, रोजाना के काम करने की शक्ति और ओवरऑल वेल-बीइंग को देखा गया. स्टडी का नतीजा क्या हुआ? डॉक्टरों के मुताबिक, सनलाइट थेरेपी लेने वाले मरीजों में नींद की क्वालिटी  बेहतर हुई. नींद के साथ मूड और मानसिक स्थिति में सुधार देखा गया और खुद रोजाना के काम में आत्मनिर्भरता बढ़ी. एक्सपर्ट्स का मानना है कि धूप शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक को ठीक करती है, विटामिन D बढ़ाने में मदद करती है और सूजन को कम कर सकती है, जो स्ट्रोक रिकवरी में अहम रोल निभाते हैं.  भारतीयों के लिए क्यों है खास? भारत में स्ट्रोक रिकवरी एक लंबा और महंगा प्रोसेस माना जाता है, जिसकी वजह से कई बार लोग इसको अफोर्ड नहीं कर पाते हैं. कई मरीजों को लंबे समय तक फिजियोथेरेपी और देखभाल की जरूरत होती है, जो हर किसी के लिए पॉसिबल नहीं. ऐसे में 30 मिनट की धूप जैसी फ्री, सुरक्षित और आसानी से मौजूद थेरेपी खासतौर पर गांव के इलाकों और घर पर रिकवरी कर रहे मरीजों के लिए बेहद  उपयोगी हो सकती है. हालांकि स्टडी का सैंपल साइज छोटा था और यह एक ही सेंटर पर की गई, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर आगे बड़े लेवल पर इस पर रिसर्च होती है, तो सनलाइट थेरेपी पोस्ट-स्ट्रोक केयर का अहम हिस्सा बन सकती है. स्ट्रोक पर क्या कहते हैं ICMR के आंकड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में भारत में करीब 12 लाख नए स्ट्रोक के मामले सामने आए. इतना ही नहीं, लगभग 94 लाख लोग ऐसे थे जो स्ट्रोक के बाद इसके लंबे समय तक रहने वाले असर जैसे कमजोरी, बोलने में दिक्कत या याददाश्त की समस्या से जूझ रहे थे. ICMR के 2021 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्ट्रोक आज मौत का तीसरा सबसे बड़ा कारण बन चुका है. यह डिसेबिलिटी की छठी सबसे बड़ी वजह भी है, यानी बड़ी संख्या में लोग स्ट्रोक के बाद नॉर्मल जिंदगी नहीं जी पाते हैं. 2023 में लैंसेट जर्नल में पब्लिश एक स्टडी, जो भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के साथ की गई थी. उस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर हालात नहीं सुधरे तो साल 2050 तक कम और मिडियम इनकम वाले देशों में करीब 1 करोड़ लोगों की मौत स्ट्रोक की वजह से हो सकती है, और इस खतरे से भारत भी बाहर नहीं है.

एम्स का नया कदम: CAPE सेंटर शुरू, कैंसर मरीजों को मिलेगा मानसिक और वैज्ञानिक सहयोग

भोपाल  एम्स भोपाल ने कैंसर मरीजों और उनके परिजनों के लिए एक बड़ी और संवेदनशील पहल की है। संस्थान में कैंसर जागरूकता एवं रोगी सशक्तिकरण (CAPE) सुविधा केंद्र की शुरुआत की गई है, जिसका मकसद कैंसर से जुड़े डर, भ्रम और गलतफहमियों को तोड़कर मरीजों को सही जानकारी से सशक्त बनाना है।यह CAPE सेंटर कैंसर के तकनीकी इलाज और मरीज की सामान्य समझ के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में काम करेगा। यहां मरीजों को उनकी बीमारी, इलाज के विकल्प, दवाओं के दुष्प्रभाव और जीवनशैली में जरूरी बदलावों की जानकारी सरल और संवेदनशील भाषा में दी जाएगी। डर और तनाव कम करेगा CAPE सेंटर कैंसर का नाम सुनते ही मरीज और उनके परिजन मानसिक दबाव में आ जाते हैं। CAPE सेंटर का मुख्य लक्ष्य इसी डर को खत्म करना है। यहां इलाज की पूरी प्रक्रिया विस्तार से समझाई जाएगी, ताकि मरीज बिना घबराए सही और समय पर निर्णय ले सकें। यह पहल राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के उस सिद्धांत को भी मजबूत करती है, जिसमें मरीज को इलाज की प्रक्रिया का केंद्र माना गया है। समय पर जांच से बचेंगी जानें केंद्र का एक अहम उद्देश्य लोगों को समय पर जांच और इलाज के लिए प्रेरित करना है। जानकारी के अभाव में होने वाली देरी कैंसर में जानलेवा साबित होती है। CAPE सेंटर इस देरी को कम कर अनावश्यक मौतों को रोकने में मदद करेगा और देश में बढ़ते कैंसर बोझ को घटाने में सहायक बनेगा। सरल भाषा, वीडियो और दो-तरफा संवाद इस केंद्र की खासियत इसकी कार्यप्रणाली है। यहां जटिल मेडिकल शब्दों के बजाय आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल होगा। वीडियो, दृश्य-श्रव्य सामग्री और दो-तरफा बातचीत के जरिए मरीज और उनके परिजन खुलकर सवाल पूछ सकेंगे। इलाज के दौरान ही नहीं, बल्कि इलाज के बाद भी यह केंद्र मरीजों के साथ जुड़ा रहेगा। एम्स भोपाल का CAPE सेंटर यह संदेश देता है कि कैंसर केवल बीमारी नहीं, सही जानकारी और भरोसे से लड़ी जाने वाली चुनौती है। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानंद कर के निर्देशन में और सेट (सिमुलेशन, ई-लर्निंग एवं टेलीमेडिसिन) समिति के मार्गदर्शन में इस केंद्र को विकसित किया गया है। इसके निर्माण और योजना में वरिष्ठ संचार विशेषज्ञ श्री बीरेंद्र दास की अहम भूमिका रही। वहीं, सेट समिति के प्रो. (डॉ.) रजनीश जोशी (डीन-अकादमिक), डॉ. संजीव कुमार (चेयरमैन, सेट), डॉ. सैकत दास (सदस्य, सेट एवं सदस्य सचिव, ट्यूमर बोर्ड) और डॉ. गुंजन चौकसे (सदस्य सचिव, सेट) ने इस पहल को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

AIIMS रिसर्च: योग अपनाने से घटता है मानसिक तनाव, स्टडी में हुआ खुलासा

भोपाल  ब्रेस्ट कैंसर के ऑपरेशन के बाद महिला मरीजों में मानसिक तनाव, चिंता और दर्द सामान्य रूप से देखने को मिलता है। एम्स भोपाल के हालिया अध्ययन में सामने आया है कि नियमित योग अभ्यास से मरीजों का मानसिक संतुलन बेहतर होता है और दर्द के प्रति सहनशीलता बढ़ती है। इससे मरीजों की रिकवरी में तेजी आती है और उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है। बढ़ता है आत्मविश्वास भोपाल और इसके आसपास के जिलों कई महिलाएं अपने पहले वाली जीवन में लौट गई है। अध्ययन में शामिल मरीजों ने ऑपरेशन के बाद तनाव और भय में स्पष्ट कमी देखी। विशेषज्ञों का कहना है कि योग मानसिक स्थिरता बढ़ाकर मरीजों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाता है। तनाव और चिंता में कमी से रोगियों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।  एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि दर्द निवारक दवा बुप्रेनॉर्फिन के साथ योग करने से मरीज लगभग दो गुना तेजी से ओपिओइड वापसी से उबरते हैं। योग तनाव को कम करता है, नींद सुधारता है और दर्द को घटाता है। योग करने से औसत रिकवरी समय पांच दिन था, जबकि सिर्फ दवा लेने वाले का नौ दिन था। भविष्य में संभावनाएं अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों में योग को नियमित अभ्यास के रूप में शामिल किया जा सकता है। इससे मानसिक तनाव घटेगा, दर्द में कमी आएगी और दवाओं पर निर्भरता कम होगी। सुरक्षित और प्रभावी उपाय एम्स भोपाल की योग विशेषज्ञ डॉ. मुद्दा सोफिया बताते हैं कि योग एक सुरक्षित और किफायती उपाय है। यह मन और शरीर, दोनों को मजबूत बनाता है। एक हजार से अधिक महिलाओं पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि ब्रेस्ट सर्जरी के बाद जो महिलाएं मानसिक तनाव में थी वे नियमित योग करने बाद मानसिक तनाव से मुक्त हो गई।

भोपाल एम्स की प्रोफेसर रश्मि वर्मा की आत्महत्या के प्रयास के बाद मौत, टॉक्सिक वर्क कल्चर पर उठे सवाल

भोपाल  मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में इमरजेंसी एवं ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ रश्मि वर्मा की सोमवार को मौत हो गई। वह पिछले 24 दिनों से एम्स के एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट में भर्ती थीं। जानकारी के अनुसार, डॉ रश्मि वर्मा ने सोमवार की सुबह 10 करीब अंतिम सांस ली। परिजनों को शव सौंप दिया गया है। बीते दिनों पहले उन्होंने एनेस्थीसिया का हाई डोज ले लिया था। जिसके बाद उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में लेकर एम्स पहुंचे थे। 11 दिसंबर को एम्स भोपाल में कराया था भर्ती दरअसल, डॉ. रश्मि वर्मा को 11 दिसंबर को गंभीर हालत में एम्स भोपाल में भर्ती कराया गया था। एनेस्थीसिया का ओवरडोज लेकर खुदकुशी की कोशिश की थी। परिजनों के मुताबिक, उन्हें घर पर अचेत अवस्था में पाया गया, जिसके बाद उनके पति उन्हें तत्काल अस्पताल लेकर पहुंचे। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर ने उन्हें सीपीआर देकर रिवाइव किया। बताया गया कि उस समय करीब 7 मिनट तक उनकी दिल की धड़कन बंद रही थी। इसके बाद से डॉ. रश्मि का इलाज एम्स के आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर चल रहा था। एम्स के अनुसार, 5 जनवरी की सुबह करीब 11 बजे डॉ. रश्मि वर्मा ने अंतिम सांस ली। उनका शव परिजनों को सौंप दिया गया। डॉ. रश्मि वर्मा ने बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) का हाई डोज लिया था। उनके पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. मनमोहन शाक्य उन्हें बेहोशी की हालत में एम्स लेकर पहुंचे थे। 7 मिनट तक रुकी थी दिल की धड़कन एम्स पहुंचने से पहले करीब 25 मिनट का वक्त निकल चुका था। डॉक्टरों के मुताबिक, इस दौरान डॉ. रश्मि का दिल लगभग 7 मिनट तक धड़कना बंद कर चुका था। इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत सीपीआर शुरू किया और तीन बार रेससिटेशन के बाद उनकी हार्टबीट वापस लाई जा सकी थी। हालांकि, इतने लंबे समय तक ब्रेन को ऑक्सीजन नहीं मिलने से मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंच चुकी थी। एमआरआई रिपोर्ट में सामने आया गंभीर ब्रेन डैमेज घटना के 72 घंटे बाद कराई गई एमआरआई रिपोर्ट में ‘ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन’ की पुष्टि हुई थी। इसका मतलब था कि उनके पूरे मस्तिष्क को लंबे समय तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिली। डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति अकसर कार्डियक अरेस्ट के बाद होती है। इसमें रिकवरी की संभावना बेहद कम रहती है। डॉ. रश्मि वर्मा 24 दिनों से एम्स के मेन आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर थीं। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए थी। हर दिन उम्मीद की किरण तलाशने की कोशिश की गई, लेकिन ब्रेन डैमेज इतना गंभीर था कि सुधार नहीं हो सका। कई बार इलाज का खर्च खुद उठाती थीं डॉ. रश्मि डॉ. रश्मि वर्मा ने प्रयागराज के एमएलएन मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर से एमडी (जनरल मेडिसिन) किया था। वे एम्स भोपाल के अलावा एलएन मेडिकल कॉलेज और पीएमएस भोपाल में भी सेवाएं दे चुकी थीं। पांच साल का टीचिंग अनुभव रखने वाली डॉ. रश्मि गरीब मरीजों की मदद के लिए जानी जाती थीं और कई बार इलाज का खर्च भी खुद उठाती थीं। वर्तमान में सीपीआर ट्रेनिंग प्रोग्राम की नोडल अधिकारी भी थी। घटना के बाद हुई थी आपात बैठक, कई फैसले लिए गए थे डॉ. रश्मि की मौत के बाद एम्स के भीतर के कथित टॉक्सिक वर्क कल्चर, प्रशासनिक दबाव और नोटिस सिस्टम को लेकर सवाल और तेज हो गए हैं। घटना के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और एम्स प्रबंधन की आपात बैठक हुई थी, जिसमें ट्रॉमा एंड इमरजेंसी विभाग के एचओडी को हटाने और विभाग को दो हिस्सों में बांटने जैसे बड़े फैसले लिए गए थे। इस पूरे मामले की गोपनीय जांच के लिए हाई लेवल कमेटी गठित भी की गई थी, जिसकी अब तक रिपोर्ट सामने नहीं आई है। तमाम कोशिशों के बावजूद नहीं बची जान बीते 23 दिनों तक डॉक्टरों की टीम ने लगातार प्रयास किए, लेकिन लंबा इलाज और तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। एम्स प्रशासन ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। सहकर्मियों और स्टाफ के बीच शोक की लहर है। डॉ. रश्मि वर्मा एक समर्पित चिकित्सक के रूप में जानी जाती थीं और इमरजेंसी व ट्रॉमा विभाग में उनकी सेवाओं को सराहा जाता रहा है। डॉक्टरों के अनुसार, इमरजेंसी एंड ट्रॉमा विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रश्मि वर्मा 11 दिसंबर 2025 को ड्यूटी पूरी करने बाद शाम को घर लौट आईं थी। रश्मि के पति ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. रतन वर्मा रात करीब साढ़े 10 बजे उनको बेहोशी की हालत में एम्स लेकर आए। डॉ. रतन ने बताया कि घर पर सब नॉर्मल था। सब अपना-अपना काम कर रहे थे। डॉ. रश्मि के पास पहुंचे तो वो बेहोश मिलीं थीं। जिसके बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। 7 मिनट तक बंद रहा था दिल डॉ रश्मि का दिल करीब 7 मिनट तक बंद रहा, जिससे उनके दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचा । एमआरआई रिपोर्ट में ग्लोबल हाइपोक्सिया ब्रेन डैमेज की पुष्टि हुई थी। डॉ. रश्मि वर्मा बीते कई दिनों से वेंटिलेटर सपोर्ट पर थी। इलाज में जुटे चिकित्सकों की मानें तो उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी।

AIIMS हरियाणा में 1700 कर्मचारियों की भर्ती का ऐलान, मार्च से मरीजों के लिए खुलेगी OPD

रेवाड़ी  रेवाड़ी जिले के गांव माजरा भालखी में निर्माणाधीन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) जल्द ही आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएं शुरू करने जा रहा है। देश के 22वें एम्स के रूप में विकसित हो रहे इस संस्थान का शनिवार को केंद्रीय राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने निरीक्षण किया। इस दौरान उन्होंने बताया कि आगामी मार्च महीने से एम्स में ओपीडी सेवाएं शुरू किए जाने की योजना है, जबकि जुलाई और अगस्त के बीच MBBS के पहले बैच की कक्षाएं शुरू होने की पूरी संभावना है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जनवरी 2026 से फैकल्टी और अन्य पदों पर भर्ती प्रक्रिया भी आरंभ कर दी जाएगी। लगभग 1650 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस एम्स को दक्षिणी हरियाणा के लिए एक अत्याधुनिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। AIIMS के पहले निदेशक प्रो. डीएन शर्मा ने बताया कि मई-जून तक परिसर में बनने वाली सभी 40 इमारतों और हेलीपैड का निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने जानकारी दी कि संस्थान में करीब 1700 पदों पर स्टाफ की भर्ती प्रस्तावित है। इस संबंध में आवश्यक प्रक्रिया पूरी कर प्रस्ताव को मंजूरी के लिए आगे भेज दिया गया है। पीएम मोदी ने किया था शिलान्यास  गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 16 फरवरी 2024 को इस AIIMS का शिलान्यास किया था। एम्स के शुरू होने से रेवाड़ी सहित आसपास के जिलों के लोगों को बेहतर और सुलभ इलाज की सुविधा मिलेगी। साथ ही, क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। निरीक्षण के दौरान मंत्री ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर संतोष जताते हुए अधिकारियों को तय समयसीमा में कार्य पूरा करने के निर्देश दिए।

दिवाली से पहले भोपाल में पटाखा गन हादसा: आंख डैमेज, एम्स ने दी सावधानी बरतने की सलाह

भोपाल भोपाल में पटाखा गन से 11 साल के बच्चे की आंख की पलक जल गई। पुतली पर सफेदी (ल्यूकोकोरिया) छा गई। इस साल दिवाली का यह पहला केस गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) के नेत्र विभाग में पहुंचा है। अब बच्चे की आंख बचाने के लिए शनिवार को सर्जरी की जाएगी। बच्चा पटाखा गन लोड करने के बाद चेक कर रहा था। ऊस वक्त गन चल गई, जिससे पटाखा उसकी आंख में लग गया। GMC के नेत्र विभाग के मुताबिक बच्चे को प्राथमिक उपचार दे दिया गया है। सभी जांचें पूरी कर ली गई हैं। रिपोर्ट आने के बाद नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एसएस कुबरे सर्जरी करेंगे।दूसरी ओर, भोपाल एम्स ने दिवाली को लेकर एडवाइजरी जारी की है। जिसमें बताया है कि इस त्योहार पटाखे फोड़ते वक्त क्या करना चाहिए और किससे बचना है। बता दें, पिछली दिवाली पर ऐसे ही हादसों में 52 लोग झुलसे थे। पिछली दिवाली पर 91 वर्षीय बुजुर्ग की साड़ी में दीये से आग लग गई थी। 70% झुलसने के बाद उन्हें एम्स भोपाल लाए थे। जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। वहीं, जलने के 15 मरीज एम्स, 13 जेपी और 24 हमीदिया पहुंचे थे। 6 मरीजों को सर्जरी की जरूरत पड़ी थी। आंखों के सबसे ज्यादा मरीज दिवाली पर सबसे ज्यादा मरीज आंखों की चोटों के साथ अस्पताल पहुंचते हैं। बीते साल एम्स में 14 साल के बच्चे और 29 वर्षीय युवक की आंखों की रोशनी चली गई थी। वहीं, हमीदिया में दो मरीज 50% से ज्यादा झुलसे थे। उनका इलाज बर्न एंड प्लास्टिक विभाग में हुआ था और करीब 20 दिन बाद डिस्चार्ज किया गया। एम्स ने जारी की एडवाइजरी एम्स भोपाल ने कहा कि दीपावली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सामूहिक कल्याण का अवसर है। इस अवसर पर एम्स के बर्न्स और प्लास्टिक सर्जरी विभाग ने जरूरी सावधानियां साझा की हैं। केमिकल और थर्मल इंजरी के साथ आते हैं मरीज गांधी मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग की विशेषज्ञ डॉ. अदिति दुबे ने बताया कि दिवाली पर बर्न से संबंधित कई इंजरी आती हैं। मुख्य रूप से ये केमिकल और थर्मल दो प्रकार की होती हैं। केमिकल इंजरी में आंखों में चूना या सफाई और रंगरोगन में उपयोग होने वाली सामग्री चली जाती है। वहीं, थर्मल इंजरी के अधिकतर केस पटाखों से जलने के होते हैं। डॉ. दुबे ने कहा कि पटाखों से लगने वाली चोटें लंबे समय तक दिक्कत देती हैं, क्योंकि विस्फोट से पहले थर्मल बर्न होता है और उसके बाद उसमें मौजूद केमिकल से हुआ नुकसान देर तक असर दिखाता है। हर साल की तरह इस बार भी नेत्र विभाग पूरी तरह अलर्ट है। उन्होंने अपील की कि यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह से जले तो सीधे अस्पताल पहुँचे। आंखों में समय रहते इलाज मिलने से रोशनी बचने की संभावना अधिक रहती है।

भोपाल डॉक्टर समेत तीन गिरफ्तार, AIIMS में करोड़ों की हेराफेरी का खुलासा

भोपाल  केंद्रीय जांच यूरो (सीबीआइ) ने एम्स ऋषिकेश(AIIMS Rishikesh) में 16 बेड वाले कोरोनरी केयर यूनिट (सीसीयू) के निर्माण में करोड़ों की गड़बड़ी का मामला दर्ज किया है। इसमें एम्स भोपाल के रेडिएशन ऑन्कोलॉजी विभाग के सह प्रोफेसर डॉ. राजेश पसरीचा को भी आरोपी बनाया हैं। हालांकि डॉ. पसरीजा ने आरोप को खारिज कर दिया है। ये है मामला जानकारी के अनुसार वर्ष 2017 में एम्स ऋषिकेश के सीसीयू निर्माण के लिए 8.08 करोड़ रुपए दिल्ली की कंपनी मेडिक डिवाइसेस को भुगतान किए गए। आरोप है कि संस्थान के तत्कालीन निदेशक और प्रो€योरमेंट ऑफिसर डॉ. पसरीचा ने उपकरणों की आपूर्ति व स्थापना का झूठा प्रमाणपत्र जारी किया था। सीबीआइ जांच में सामने आया कि 1.76 करोड़ रुपए से ऑटोमैटिक स्लाइडिंग डोर, गैस पाइपलाइन सिस्टम, डिफिब्रिलेटर, एयर प्यूरीफायर और अन्य उपकरण लगाए ही नहीं गए। वहीं 97 लाख के सिविल वर्क में भी हेराफेरी हुई। 2.73 करोड़ रुपए के गबन की पुष्टि हुई।   डॉ. राजेश पसरीचा ने आरोपों को किया खारिज सीबीआइ ने मामले में एम्स ऋषिकेश के पूर्व निदेशक डॉ. रविकांत, डॉ. राजेश पसरीचा और स्टोर कीपर रूप सिंह पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया है। मामले को लेकर डॉ. राजेश पसरीचा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि मुझ पर सीबीआइ ने झूठा आरोप लगाया है। यह आठ वर्ष पुराना मामला है, जिसे अब उठाया जा रहा है।

भोपाल की छात्राओं की आंखों पर खतरा! AIIMS जांच में 22% में पाई गई बीमारी

भोपाल एम्स भोपाल द्वारा आयोजित एक स्वास्थ्य शिविर में भोपाल की स्कूली बालिकाओं में आंखों की बीमारी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। कक्षा 8वीं से 12वीं तक की 22% बालिकाओं में आंखों की विभिन्न बीमारियां पाई गई हैं। दरअसल एम्स ने 'स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान' के अंतर्गत शासकीय आदर्श आवासीय कन्या संस्कृत विद्यालय, गार्गी, भोपाल में नेत्र स्वास्थ्य एवं जागरूकता शिविर आयोजित किया। इस शिविर में 12 से 18 वर्ष आयु वर्ग की 100 छात्राओं की जांच की गई, जिसमें 18% छात्राओं में आंखों की समस्याएं पाई गईं। आंखों की समस्याएं रिफ्रेक्टिव एरर: 17 छात्राओं में रिफ्रेक्टिव एरर पाया गया, जिसमें मायोपिया (निकट दृष्टि दोष), हाइपरमेट्रोपिया (दूर दृष्टि दोष) और एस्टिग्मेटिज्म (अनियमित दृष्टि) शामिल हैं। एलर्जिक कंजक्टिवाइटिस: 2 छात्राओं में एलर्जिक कंजक्टिवाइटिस पाया गया, जो आंखों की एलर्जी के कारण होता है। एब्लियोपिया: 2 छात्राओं में एब्लियोपिया पाया गया, जो एक आंख की दृष्टि कमजोर होने के कारण होता है। नाइट ब्लाइंडनेस: 1 छात्रा में नाइट ब्लाइंडनेस पाया गया, जो विटामिन ए की कमी के कारण होता है। आंखों की समस्याओं के मुख्य कारण 1- स्क्रीन टाइम: बढ़ता स्क्रीन टाइम और डिजिटल डिवाइसों का उपयोग आंखों की समस्याओं का एक मुख्य कारण है। 2- अपर्याप्त प्रकाश: अपर्याप्त प्रकाश में पढ़ाई या काम करने से आंखों पर दबाव पड़ता है। 3- पोषण की कमी: विटामिन ए और अन्य पोषक तत्वों की कमी से आंखों की समस्याएं हो सकती हैं। 4- आनुवंशिक कारक: कुछ आंखों की समस्याएं आनुवंशिक हो सकती हैं। 34 छात्राओं ने नेत्रदान की ली शपथ इस कैंप के दौरान केवल स्क्रीनिंग ही नहीं हुई, बल्कि जागरूकता भी फैलाई गई। 34 छात्राओं ने नेत्र दान फॉर्म भी भरा। नेत्र स्वास्थ्य पर जूनियर रेजिडेंट डॉ. सौरभि ने मौजूद स्टूडेंट्स को जानकारी दी। उनके साथ सीनियर नर्सिंग ऑफिसर महेश मीणा ने आंख दान पर व्याख्यान दिया। ऑप्टोमेट्रिस्ट टीम ने व्यक्तिगत और मासिक धर्म स्वच्छता पर भी छात्राओं को जागरूक किया। जिससे ना केवल नेत्र बल्कि संपूर्ण स्वास्थ के प्रति छात्राओं को जागरूक किया जा सके। आंखों के लिए सावधानी  – हर 20 मिनट पर स्क्रीन से ब्रेक लें। – 20-20-20 रूल: हर 20 मिनट बाद 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकेंड देखें। – रोज कम से कम 1 घंटे आउटडोर खेलकूद जरूरी। – संतुलित आहार में हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, दूध और फल शामिल करें। – आंखों में जलन या धुंधलापन हो तो तुरंत जांच कराएं। 

सावधान! पेन किलर और इनहेलर के सही इस्तेमाल का AIIMS ने दिया खास निर्देश

भोपाल   पेनकिलर या स्टेरॉयड का गलत उपयोग किडनी को प्रभावित कर सकता है। मेडिकल डिवाइस का सही ज्ञान न होने से भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, जो व्यक्ति को विचलित या गंभीर स्थिति में ला सकती है। यही नहीं, एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल एंटी माइक्रोबियल रेजिस्टेंस बढ़ा सकता है, जिससे गंभीर बीमारी होने पर एंटीबायोटिक्स असर करना बंद कर देंगी और यह मौत का प्रमुख कारण बन सकता है। एम्स के विशेषज्ञों ने 21 सितंबर को 5वें राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के कार्यक्रम के दौरान ये जानकारी दी। इस्तेमाल करने का सही तरीका सीखें विशेषज्ञों ने कहा कि ब्लड प्रेशर मशीन, ग्लूकोमीटर और इनहेलर जैसे उपकरणों को सही तरीके से उपयोग करना सीखें। गलत तकनीक परिणामों को प्रभावित कर सकती है। गलत परिणाम देखकर कई बार स्वस्थ व्यक्ति भी विचलित हो जाता है। इस स्थिति से बचना चाहिए, क्योंकि भ्रम में कई बार व्यक्ति जल्दबाजी में बड़ी गलती कर बैठता है। इसके अलावा थर्मामीटर, पल्स ऑक्सीमीटर आदि का नियमित केलिब्रेशन और सफाई जरूरी है, ताकि इन्फेक्शन का खतरा न रहे। बिना सलाह न लें पेनकिलर, स्टेरॉयड AIIMS Bhopal के विशेषज्ञों ने कहा कि बिना विशेषज्ञ की सलाह के एंटीबायोटिक्स, पेनकिलर और स्टेरॉयड का सेवन नहीं करना चाहिए। इनके गलत उपयोग से किडनी पर असर पड़ सकता है। इसके साथ-साथ एंटीबायोटिक्स के खिलाफ शरीर में रेजिस्टेंस बनता है, जिससे जब दवा की जरूरत पड़ती है तो शरीर पर उसका असर नहीं होता। टोल-फ्री नंबर पर करें कॉल किसी भी तरह के दुष्प्रभाव दिखने पर रिपोर्टिंग के लिए टोल-फ्री नंबर 1800-180- 3024 और मोबाइल ऐप का उपयोग करने की सलाह दी गई। कार्यक्रम का संचालन रिसर्च एसोसिएट दीपिका चौधरी और फैजान ने किया। वहीं, डॉ. फ्लोरेंस जॉय, डॉ. केविन जैन, डॉ. चिराग अग्रवाल और डॉ. सिद्धांत ने प्रतिभागियों को मार्गदर्शन दिया और उपभोक्ताओं एवं स्वास्थ्यकर्मियों की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

नई तकनीक से एम्स में ब्रेस्ट कैंसर का इलाज, महिलाओं को बच रहा स्तन; जागरूकता अब भी बड़ी चुनौती

भोपाल  राजधानी भोपाल के एम्स हॉस्पिटल में ब्रेस्ट कैंसर का नई तकनीकी से इलाज किया जा रहा है। इस तकनीकी में ब्रेस्ट कैंसर होने पर महिलाओं का स्तन हटाने की जरूरत नहीं पड़ रही है, बल्कि जिस हिस्से में बीमारी डिटेक्ट होती है उसी का इलाज किया जाता है। एम्स के चिकित्सकों का कहना है कि बीमारी की आधुनिक इलाज में बारे में जागरूकता की कमी है। अक्सर महिलाएं स्तन में गांठ महसूस होने पर भय और गलतफहमी के कारण समय पर चिकित्सकीय मदद लेने से हिचकिचाती हैं। इन तकनीकों का किया जा रहा है उपयोग  एम्स के डॉक्टरों ने बताया कि एक समय था जब स्तन कैंसर का मतलब पूरे स्तन को हटाना होता था। लेकिन अब समय बदल गया है। आज इसका इलाज बहु-आयामी पद्धति से किया जाता है। जिसमें कीमोथेरेपी, हार्मोनल थेरेपी, सर्जरी, इम्यूनोथेरेपी और रेडियोथेरेपी का संयोजन होता है। कई मामलों में केवल ट्यूमर को हटाकर और उन्नत ऑन्कोप्लास्टिक सर्जरी से पुनर्निर्माण करके स्तन को सुरक्षित रखा जा सकता है। एम्स के कैंसर सर्जरी विभाग के एचओडी डॉ. विनय कुमार ने बताया कि यह अत्याधुनिक तकनीक एम्स भोपाल में की जा रही है और इसके उक्तृष्ट परिणाम मिल रहे हैं। ये हैं उन्नत तकनीकें  – ऑन्कोप्लास्टिक सर्जरी: इस तकनीक के माध्यम से स्तन कैंसर के ट्यूमर को हटाकर स्तन को पुनर्निर्माण किया जा सकता है, जिससे स्तन को सुरक्षित रखा जा सकता है। – इंडोसाइनिन ग्रीन (ICG) डाई तकनीक: इस तकनीक के माध्यम से लसीका ग्रंथियों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है और लिम्फेडेमा के खतरे को कम किया जा सकता है। – रेडियोथेरेपी: इस तकनीक के माध्यम से कैंसर कोशिकाओं को खत्म किया जा सकता है और ऑपरेशन की जरूरत को कम किया जा सकता है। – लीनियर एक्सेलेरेटर: यह एक आधुनिक मशीन है जो कैंसर कोशिकाओं को खत्म करने के लिए उच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे का उपयोग करती है ¹। सर्जरी के बाद होने वाली लिम्फेडेमा बड़ी परेशानी डॉ. विनय कुमार ने बताया कि स्तन कैंसर की सर्जरी के बाद होने वाली चुनौतियों में से एक लिम्फेडेमा है हाथ में एक दर्दनाक सूजन जो महीनों या साल बाद भी दिखाई दे सकती है। इस जोखिम को कम करने के लिए एम्स भोपाल में अब इंडोसाइनिन ग्रीन (ICG) डाई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। इस डाई को ट्यूमर में इंजेक्ट किया जाता है और इन्फ्रारेड कैमरे से देखने पर यह उन लसीका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) को स्पष्ट करता है, जो स्तन से बगल तक फैलते हैं। इन ग्रंथियों को निकालकर तुरंत फ्रोजन सेक्शन तकनीक से जांचा जाता है। यदि इनमें कैंसर कोशिकाएं नहीं पाई जातीं, तो हाथ की सामान्य लसीका नलिकाओं को सुरक्षित रखा जाता है जिससे लिम्फेडेमा का खतरा बहुत कम हो जाता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।  एम्स भोपाल की पहल – एम्स भोपाल ने स्तन कैंसर के इलाज के लिए एक विशेष टीम का गठन किया है, जिसमें अनुभवी डॉक्टर और विशेषज्ञ शामिल हैं। – अस्पताल में स्तन कैंसर के इलाज के लिए उन्नत तकनीकों और उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके।