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मध्य प्रदेश में नई संक्रामक बीमारी का खतरा, AIIMS भोपाल की रिपोर्ट में सामने आए टीबी जैसे लक्षण

भोपाल  एम्स के डॉक्टर्स ने एक ऐसी बीमारी को लेकर बड़ा खुलासा किया है, जिसकी वजह से कई डॉक्टर्स खुद भ्रमित हो जाते हैं। साथ ही गलत बीमारी समझकर उसका इलाज करते हैं, लिहाजा 40 प्रतिशत मरीजों की जान चली जाती है। यह खुलासा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में हुआ है। एम्स भोपाल ने मेलियोइडोसिस नामक संक्रामक रोग को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है। एमपी में मिले हैं अब तक 130 केस ववहीं, रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में अब तक 130 से ज्यादा मेलियोइडोसिस संक्रमण से ग्रसित मरीज पाए गए हैं। बैक्टीरिया जनित रोग बेहद खतरनाक है, समय पर सही इलाज न मिलने पर मरीज की मौत हो जाती है। इस रोग के हर 10 मरीजों में 4 काल के गाल में समा जाते हैं। टीबी जैसे होते हैं लक्षण रिपोर्ट में सबसे बड़ी चुनौती यह बताई गई है कि इस बीमारी के लक्षण टीबी जैसे होते हैं। इसक कारण अधिकतर मामलों में मरीज का गलत इलाज कर दिया जाता है। इसके बाद जब समस्या ज्यादा बढ़ जाती है तो सही इलाज शुरू होता है तब तक संक्रमण पूरे शरीर में फैल चुका होता है । मरीज मौत तक पहुंच जाता है। रिपोर्ट के अनुसार बीते 6 वर्षों में मध्यप्रदेश के 20 से अधिक जिलों से मेलियोइडोसिस के 130 से ज्यादा मरीज सामने आए हैं। बीमारी के लक्षण डॉक्टर्स के अनुसार किसी को 2–3 हफ्तों से अधिक बुखार रहता है, एंटी-टीबी दवा से कोई फायदा नहीं हो रहा या बार-बार फोड़े बन रहे हैं, तो तुरंत विशेषज्ञ से मेलियोइडोसिस की जांच करवाएं। सावधान, सतर्क रहने की जरूरत डॉक्टर्स ने कहा कि यह बीमारी अब प्रदेश में स्थानिक (एंडेमिक) रूप ले चुकी है। संस्थान ने डॉक्टरों और आम जनता दोनों से अपील की है कि लंबे समय तक ठीक न होने वाले बुखार और टीबी जैसे लक्षणों को हल्के में न लें। एम्स की पहल से सटीक अनुमान एम्स भोपाल इस बीमारी से संबंधित प्रशिक्षण आयोजित कर रहा है, जिनमें पूरे राज्य के 25 स्वास्थ्य संस्थाओं के 50 से अधिक माइक्रोबायोलॉजिस्ट और चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया है। इस कारण 14 नए केस जीएमसी भोपाल, बीएमएचआरसी, जेके हॉस्पिटल, सागर और इंदौर में जांच में सामने आए।  

भिनभिनाती सफलता! AIIMS भोपाल में पैर की हड्डी से नया जबड़ा और 13 दांत लगाए गए

 भोपाल डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं। यही भगवान जब आपको किसी बीमारी से उभारते हैं, तो आपको जीवन भर की हंसी-खुशी आपकी झोली में डाल देते हैं। ऐसा ही एक मामला मध्य प्रदेश के भोपाल से सामने आया है। यहां के एम्स के डेंटल विभाग के डॉक्टरों ने अनोखी सर्जरी के जरिए एक युवती के चेहरे को नई खुशी दी है। दरअसल डॉक्टरों ने युवती का जबड़ा दोबारा बनाकर उसमें 13 दांत लगाए हैं। अनोखी बात यह है कि डॉक्टरों ने ये जबड़ा युवती के पैर की हड्डी से बनाया है। अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि युवती को नया जबड़ा क्यों लगाना पड़ा? दरअसल युवती के मुंह की सूजन और लगातार पस आने की समस्या थी। इसके चलते युवती भोपाल एम्स में दिखाने आई थी। जांच हुई तो पता चला कि युवती को बिनाइन ओडोन्टोजेनिक ट्यूमर है। आसान भाषा में समझाएं तो युवती को दांतों से संबंधित ट्यूमर निकला। ये जबड़े की हड्डी या दांतों के पास होता है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल एम्स के डॉक्टरों ने सर्जरी करने की बात कही। युवती तैयार हो गई। सर्जरी को कई चरणों में पूरा किया गया। पहले जबड़े से ट्यूमर को काटकर हटाया गया। इसके चलते 13 दांत निकालने पड़ गए। इस कारण दांत कमजोर हो गया। युवती का चेहरा भी खराब लगने लगा। इसके बाद डॉक्टरों ने पैर की हड्डी (इलिएक क्रेस्ट) से नया जबड़ा बनाया। बनाए गए नए जबड़े के हिस्से को युवती के मुंह में फिट किया गया। इसके बाद करीब छह महीना का इंतजार किया गया, ताकि जबड़ा फिट हो जाए। इसके बाद युवती के मुंह में दांत लगाए गए। सर्जरी के बाद लड़की का चेहरा लगभग पहले जैसा हो गया है। उसके चेहरे की वही प्यारी मुस्कान वापस आ गई है, जो पहले थी। इस सर्जरी को सफल बनाने वाले डॉक्टर अंशुल राय के मुताबिक उन्होंने इस अनोखे केस को इंटरनेशनल इम्प्लांट्स जर्नल में प्रकाशित होने के लिए भेजा है।

जैन दंपति का अनोखा कदम: AIIMS में भ्रूण दान, मेडिकल रिसर्च को मिलेगा बड़ा फायदा

नई दिल्ली दिल्ली में एक ऐतिहासिक पहल हुई है. एम्स (AIIMS) को पहली बार भ्रूण दान मिला है. ये कदम एक परिवार के दर्द को समाज और विज्ञान की ताकत में बदलने का उदाहरण है. 32 वर्षीय वंदना जैन का पांचवें महीने में गर्भपात हो गया था. इस मुश्किल घड़ी में परिवार ने भ्रूण को शोध और शिक्षा के लिए एम्स को दान करने का निर्णय लिया. सुबह से शाम तक संघर्ष और फिर रचा इतिहास वंदना जैन के परिवार का सुबह 8 बजे दधीचि देहदान समिति से संपर्क हुआ. समिति के उपाध्यक्ष सुधीर गुप्ता और समन्वयक जी.पी. तायल ने त्वरित पहल करते हुए एम्स के एनाटॉमी विभाग के प्रमुख डॉ. एस.बी. राय और उनकी टीम से बातचीत की. टीम के सहयोग से दिनभर दस्तावेज आद‍ि औपचारिकताएं पूरी करने के बाद शाम 7 बजे एम्स ने अपना पहला भ्रूण दान प्राप्त किया. क्या होगा भ्रूण दान का फायदा भ्रूण दान सिर्फ एक मेडिकल प्रोसेस नहीं, बल्कि आने वाले समय की रिसर्च और शिक्षा का बड़ा आधार है. AIIMS में एनाटॉमी विभााग के प्रोफेसर डॉ. सुब्रत बासु ने aajtak.in को बताया कि कि मानव शरीर के विकास को समझने के लिए भ्रूण अध्ययन बेहद अहम है. रिसर्च और टीचिंग में हमें यह देखने का मौका मिलता है कि किस तरह शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग समय पर विकसित होते हैं. जैसे बच्चा जब जन्म लेता है तो उसका नर्वस सिस्टम पूरी तरह डेवेलप नहीं होता. वह धीरे-धीरे दो साल बाद विकसित होता है. ऐसे मामलों का अध्ययन मेडिकल छात्रों और वैज्ञानिकों को गहराई से समझने का मौका देता है. डॉ. बासु आगे कहते हैं कि यह शोध एजिंग की प्रक्रिया को समझने में भी मदद करेगा. भ्रूण में टिश्यू लगातार ग्रो करते हैं, वहीं बुढ़ापे में टिश्यू डैमेज होने लगते हैं. अगर हम यह समझ पाएं कि कौन से फैक्टर टिश्यू को ग्रो कराते हैं और कौन से उन्हें डैमेज करते हैं, तो भविष्य में उम्र से जुड़ी कई बीमारियों का हल निकालने में मदद मिलेगी. वह एक और अहम पहलू बताते हैं कि बच्चों में एनेस्थीसिया का इस्तेमाल एक बड़ी चुनौती है. छोटे बच्चे बोल नहीं पाते, उन्हें कितना डोज देना है, यह सटीक पता होना ज़रूरी है. भ्रूण अध्ययन से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि किस स्टेज पर बच्चे का कौन-सा ऑर्गन कितना विकसित है और उसे किस तरह सुरक्षित तरीके से उसे ट्रीट किया जा सकता है. जैन परिवार की मिसाल इस पहल ने जैन परिवार को समाज में एक अनूठी मिसाल बना दिया. उन्होंने अपने व्यक्तिगत दुख को मानवता और विज्ञान के लिए अमूल्य योगदान में बदल दिया. दधीचि देहदान समिति पहले से ही अंगदान, नेत्रदान और देहदान के क्षेत्र में देशभर में जागरूकता फैलाती रही है. भ्रूण दान का यह पहला मामला समिति की मुहिम को और ऐतिहासिक बना गया है. ये कहानी सिर्फ भ्रूण दान की नहीं है, बल्कि संवेदना, साहस और समर्पण की है. वंदना जैन और उनका परिवार आने वाले समय में लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन गए हैं. एम्स और दधीचि देहदान समिति की ये पहल भविष्य की पीढ़ियों को चिकित्सा की नई राह दिखाएगाा. 

एम्स, हमीदिया और जेपी अस्पताल में बदलते मौसम के चलते मरीजों की संख्या बढ़ी

भोपाल भोपाल में मौसम अचानक करवट बदल रहा है। कभी तेज बारिश, कभी कड़ी धूप और फिर उमस। इस वजह से लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। एम्स, हमीदिया और जेपी अस्पताल की ओपीडी में बीते दो दिन में ही 20 हजार से ज्यादा मरीज पहुंचे। यह संख्या पिछले हफ्ते की तुलना में करीब चार हजार ज्यादा है। सबसे ज्यादा असर बच्चों पर दिख रहा है। जेपी अस्पताल की बाल रोग ओपीडी में मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। सामान्य दिनों में जहां 60 बच्चे आते थे, अब यह संख्या 170 तक पहुंच गई है। इनमें ज्यादातर बच्चे वायरल और बैक्टीरियल संक्रमण से पीड़ित हैं। करीब सात से आठ प्रतिशत बच्चों को गंभीर हालत में भर्ती करना पड़ रहा है। इनमें सांस लेने में तकलीफ और फेफड़ों का इंफेक्शन देखने को मिल रहा है। आरएसवी वायरस बना चिंता की वजह डॉक्टरों के मुताबिक, इस समय रेस्पीरेट्री सिंसेशियल वायरस (आरएसवी) बच्चों में ज्यादा एक्टिव है। यह वायरस सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे लक्षण देता है, लेकिन छोटे बच्चों में यह न्यूमोनिया और ब्रोंक्योलाइटिस का कारण बन सकता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, हर साल दुनियाभर में करीब 30 लाख बच्चे आरएसवी से प्रभावित होते हैं। हालांकि, यह वायरस बच्चों को ज्यादा प्रभावित करता है, लेकिन कमजोर इम्यूनिटी वाले बुजुर्ग और दिल या अस्थमा के मरीज भी इसके शिकार हो सकते हैं। दूषित पानी और अस्वच्छ भोजन के कारण टाइफाइड और उल्टी-दस्त के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों ने बचाव के तरीके बताए जेपी अस्पताल के डॉ. पियूष पंचरत्न का कहना है कि कई परिजन मेडिकल स्टोर से मनमर्जी की दवाएं देकर बच्चों का इलाज करने की कोशिश करते हैं, जिससे स्थिति बिगड़ जाती है। बच्चों को केवल पैरासिटामाल दी जा सकती है, लेकिन लक्षण बने रहें तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। डॉ. योगेंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि इस बार ह्यूमन राइनोवायरस और ई-कोलाई बैक्टीरिया भी सक्रिय हैं, जो वयस्क मरीजों को प्रभावित कर रहे हैं। ज्यादातर मरीज एक से दो हफ्ते में सामान्य दवाओं से ठीक हो जाते हैं। लेकिन मरीजों को सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। यह लक्षण दिखने पर सतर्क रहें गले में खराश, तेज सर्दी, लगातार खांसी, बुखार, पेट दर्द या थकान जैसे लक्षण दिखें तो लापरवाही न करें और तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं। ये उपाय करना जरूरी     हमेशा उबला या शुद्ध पानी पिएं।     ठंडी और बासी चीजों से बचें।     बच्चों को अन्य बीमार बच्चों से दूर रखें और बीमारी की स्थिति में स्कूल न भेजें।     गले में खराश हो तो गुनगुने पानी से गरारे करें।     मास्क का इस्तेमाल करें और स्वच्छता का ध्यान रखें। क्यों बढ़ रहीं बीमारियां     लगातार बदलता मौसम     धूल और गंदगी से फैलता संक्रमण     लोगों द्वारा लापरवाही और सावधानी न बरतना इसका प्रमुख कारण है। बदलते मौसम का दिख रहा असर     मौसम बदलते ही मरीजों की संख्या बढ़ रही है। डॉक्टरों को निर्देश दिए हैं कि हर मरीज को पर्याप्त समय दें और उन्हें विस्तार से समझाएं कि बीमारी से कैसे बचा जा सकता है। – डॉ. राकेश श्रीवास्तव, सिविल सर्जन, जेपी अस्पताल  

फिशर का नया समाधान: AIIMS भोपाल में होम्योपैथी दवा से मरीजों को मिली जबरदस्त राहत

 भोपाल  गुदा विदर (एनल फिशर) जैसी गंभीर और दर्दनाक बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल से एक बड़ी खुशखबरी आई है। एम्स के डाक्टरों ने एक अध्ययन में यह साबित किया है कि होम्योपैथी की एक दवा से इस बीमारी का इलाज बिना किसी ऑपरेशन के संभव है। इस सफलता के बाद अब मरीजों को असहनीय दर्द और सर्जरी की पीड़ा से मुक्ति मिलने की एक नई उम्मीद जगी है। यह महत्वपूर्ण अध्ययन एम्स के आयुष (होम्योपैथी) विभाग के डॉ. आशीष कुमार दीक्षित और सर्जरी विभाग के डा. मूरत सिंह यादव की टीम ने मिलकर किया है। इस शोध में एनल फिशर से पीड़ित 34 मरीजों को शामिल किया गया। इन सभी को तीन महीने तक होम्योपैथी दवा ''पियोनिया ऑफिसिनेलिस'' दी गई और साथ ही खान-पान में जरूरी परहेज और सुधार की सलाह दी गई। तीन महीने के इलाज में आए चौकाने वाले नतीजे तीन महीने के इलाज के बाद जो नतीजे सामने आए, वे चौंकाने वाले थे। अध्ययन में शामिल मरीजों के दर्द में 99 प्रतिशत तक की आश्चर्यजनक कमी दर्ज की गई। इलाज से पहले जहां दर्द का स्तर 10 में से नौ अंक पर था, वह इलाज के बाद घटकर लगभग शून्य पर आ गया। इसके अलावा मल त्याग के दौरान होने वाला असहनीय दबाव भी पूरी तरह समाप्त हो गया। सबसे बड़ी सफलता यह रही कि 34 में से 30 मरीजों, यानी लगभग 88 प्रतिशत लोगों के घाव पूरी तरह भर गए। इस पूरे इलाज के दौरान किसी भी मरीज पर कोई गंभीर दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। सरल और सुरक्षित इलाज का विकल्प इस सफल अध्ययन पर डॉ. आशीष कुमार दीक्षित ने बताया कि हमारे नतीजे यह प्रमाणित करते हैं कि पियोनिया ऑफिसिनैलिस दवा एनल फिशर के दर्द को जड़ से कम करने, घाव को भरने और मल त्याग को सुगम बनाने में अत्यंत प्रभावी है। यह मरीजों को एक सरल और सुरक्षित इलाज का विकल्प देती है। वहीं, सर्जरी विभाग के डॉ. मूरत सिंह यादव ने कहा कि एनल फिशर के कई मरीजों को अंततः सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है, जो कष्टदायक हो सकती है। यह शोध एक सुरक्षित और बिना ऑपरेशन वाले इलाज का रास्ता खोलता है।

रायपुर: एम्स और बिलासपुर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ने किया एमओयू, मरीजों को मिलेगा बेहतर स्वास्थ्य लाभ

रायपुर : एम्स रायपुर और बिलासपुर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल के बीच एमओयू, मरीजों को मिलेगा उच्चस्तरीय स्वास्थ्य लाभ रायपुर: एम्स और बिलासपुर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल ने किया एमओयू, मरीजों को मिलेगा बेहतर स्वास्थ्य लाभ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की प्राथमिकता है हर जिले में उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं रायपुर बिलासपुर के शासकीय सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायपुर के बीच आज एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए।  इस अवसर पर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. भानु प्रताप सिंह ने कहा कि इस ऐतिहासिक समझौते के जरिए बिलासपुर के डॉक्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ को एम्स जैसे विश्वस्तरीय संस्थान से प्रशिक्षण और नवीनतम चिकित्सा तकनीकों का अनुभव मिलेगा। इससे न केवल अस्पताल की रिसर्च और उपचार क्षमता बढ़ेगी बल्कि आम नागरिकों को भी अपने ही शहर में उच्चतम स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के निर्देशन पर उन्होंने  एम्स रायपुर की कार्यप्रणाली को करीब से देखा और बिलासपुर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में वैसी ही सुविधाओं का विकास किया जाए को लेकर योजना तैयार की। डॉ. सिंह ने कहा कि  प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल की  स्पष्ट प्राथमिकता है कि प्रदेशवासियों को बड़े शहरों पर निर्भर हुए बिना ही अपने जिले में उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। उन्होंने इस एमओयू को प्रदेश के स्वास्थ्य क्षेत्र में एक मील का पत्थर बताते हुए कहा कि सरकार लगातार जन-स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रही है। एम्स रायपुर के कार्यकारी निदेशक डॉ. अशोक जिंदल ने भरोसा दिलाया कि एम्स, बिलासपुर अस्पताल के चिकित्सकों, नर्सों और स्टाफ को क्लीनिकल ट्रेनिंग, संकाय आदान-प्रदान, सहयोगी शोध, टेलीमेडिसिन सेवाओं और बहु-केंद्रीय अध्ययनों में हर संभव मदद देगा। इस अवसर पर एम्स रायपुर के अधिष्ठाता रिसर्च डॉ. अभिरुचि गल्होत्रा, सह-अधिष्ठाता रिसर्च डॉ. एकता खंडेलवाल, अतिरिक्त प्राध्यापक डॉ. राकेश गुप्ता तथा सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बिलासपुर से प्रो. डॉ. अर्चना सिंह और एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक कुमार उपस्थित रहे।

AIIMS भोपाल में नेतृत्व परिवर्तन: संदेश कुमार जैन होंगे नए डिप्टी डायरेक्टर, 4 अगस्त से संभालेंगे पद

 भोपाल  नक्सल ऑपरेशन, एटीएस और पुलिस रेडियो विंग जैसे संवेदनशील महकमों में सेवाएं दे चुके वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संदेश कुमार जैन अब AIIMS भोपाल के नए डिप्टी डायरेक्टर (प्रशासन) होंगे। यह पहली बार है, जब किसी पुलिस अधिकारी को एम्स भोपाल में प्रशासनिक कमान सौंपी।  भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की अधीनस्थ संस्था पीएमएसएसवाई द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जैन को तीन साल की प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त किया गया है। वर्तमान में वे भोपाल में पुलिस अधीक्षक (रेडियो) के रूप में पदस्थ हैं। इंजीनियरिंग बैकग्राउंड, आईटी में विशेषज्ञता संदेश कुमार जैन तकनीकी रूप से भी दक्ष हैं। उन्होंने मैनिट भोपाल से बीटेक और इसके बाद इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है। तकनीकी और प्रशासनिक अनुभव का यह संयोजन उन्हें इस पद के लिए उपयुक्त बनाता है। वे राज्य पुलिस सेवा के एक अनुभवी अधिकारी हैं, जिन्हें अनुशासन और संकट प्रबंधन का लंबा अनुभव है। पीछे छूटे 100 से ज्यादा दावेदार एम्स भोपाल के डिप्टी डायरेक्टर पद के लिए 100 से अधिक आवेदन आए थे। इनमें से ज्यादातर आवेदन रिटायर्ड आर्मी अफसरों सहित विभिन्न प्रशासकीय पृष्ठ भूमियों से थे। सभी आवेदकों का इंटरव्यू नई दिल्ली में हुआ, जिसमें संदेश कुमार जैन ने सबसे उपयुक्त उम्मीदवार के रूप में चयन हासिल किया। क्यों खास है ये नियुक्ति AIIMS जैसे संस्थानों में डिप्टी डायरेक्टर (प्रशासन) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह पद क्लीनिकल सेवाओं, संसाधन प्रबंधन, मानव संसाधन विकास और अनुसंधान परियोजनाओं के सुचारु संचालन से जुड़ा होता है। संदेश कुमार जैन जैसे अनुभवी पुलिस अधिकारी की नियुक्ति से संस्थान के प्रशासन में अनुशासन, पारदर्शिता और दक्षता के नए मानक स्थापित हो सकते हैं। पदभार अभी तक किसके पास था वर्तमान में यह जिम्मेदारी कर्नल (डॉ.) अजीत कुमार के पास थी। इससे पहले श्रमदीप सिन्हा, जो राजकोट एम्स में डिप्टी डायरेक्टर हैं, को भोपाल एम्स का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। यह नियुक्ति न सिर्फ प्रशासनिक रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह बताती है कि अब तकनीकी दक्षता, नेतृत्व क्षमता और व्यावहारिक अनुभव को मिलाकर संस्थानों में नई सोच के साथ बदलाव लाए जा रहे हैं। AIIMS भोपाल की कार्यकारी निदेशक डॉ. अजय सिंह का कार्यकाल भी 4 अगस्त को समाप्त हो रहा है। हालांकि, उनके स्थान पर कौन आएगा यह अभी तय नहीं हैं। केंद्र स्तर पर इसके लिए आवेदन मंगाए गए हैं। वहीं, नए डायरेक्टर आने तक एम्स भोपाल का प्रभार एम्स रायपुर के निदेशक को दिया जा सकता है।  

इलाज और रिसर्च को मिलेगा नया आयाम: AIIMS भोपाल में शुरू हुई 3D गैलरी की तैयारी

 भोपाल  भारत के मेडिकल इनोवेशन में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए एम्स भोपाल देश की पहली रोगी-विशिष्ट थ्रीडी मॉडल गैलरी बनाने की तैयारी कर रहा है। यह कदम न केवल मरीजों के इलाज को बेहतर बनाएगा, बल्कि मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों के लिए पढ़ाई और सर्जरी प्लानिंग को भी अत्याधुनिक बना देगा। एम्स भोपाल ने चिकित्सा क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। संस्थान ने साल 2024 में एक हाईटेक 'कम्प्यूटेशनल थ्रीडी मॉडलिंग एंड प्रिंटिंग लैब' की स्थापना की थी, जो अब देशभर में चर्चित हो चुकी है। इस लैब की सबसे बड़ी खासियत है – पालीजेट डिजिटल एनाटॉमी प्रिंटर, हाई-पावर कंप्यूटर और विशेष सॉफ्टवेयर, जिनकी मदद से डॉक्टर मरीज के शरीर का हूबहू थ्रीडी मॉडल तैयार कर सकते हैं। इस थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल सर्जरी से पहले केस की गहराई से समझ, ऑपरेशन की प्लानिंग, मेडिकल स्टूडेंट्स को रियल-लाइफ प्रैक्टिस और मरीजों को उनकी बीमारी को विजुअली समझाने के लिए किया जा रहा है। अब एम्स भोपाल भारत की पहली रोगी-विशिष्ट थ्रीडी मॉडल गैलरी बना रहा है, जिसमें विभिन्न जटिल बीमारियों के मॉडल रखे जाएंगे। यह गैलरी डॉक्टरों, छात्रों और आम नागरिकों को शरीर की संरचना और बीमारियों की समझ विकसित करने में मदद करेगी। लैब से अब तक देश-विदेश के विशेषज्ञों का एक अंतरराष्ट्रीय सिम्पोजियम भी हो चुका है, जिसमें मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साझा काम करने पर सहमति बनी थी। अब एम्स इस लैब के जरिए दो नए सर्टिफिकेट कोर्स शुरू कर रहा है, जिनमें से एक मैनिट भोपाल के साथ संयुक्त रूप से डिजाइन और मेडिकल मॉडलिंग पर आधारित होगा। भविष्य में पीएचडी की सुविधा भी मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। लैब की प्रमुख खूबियां     डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज के अंगों का थ्रीडी मॉडल देखकर सर्जरी की योजना बना सकते हैं।     मेडिकल स्टूडेंट्स को रियलिस्टिक अनुभव के साथ पढ़ाई करने का मौका।     मरीजों को अपनी बीमारी विजुअल मॉडल की मदद से आसानी से समझाई जा सकती है।     डॉक्टरों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच इंटरेक्टिव सहयोग की शुरुआत। भविष्य की योजनाएं     बायोमैकेनिक्स: शरीर की हलचलों का डिजिटल विश्लेषण।     वर्चुअल एनाटॉमी और सर्जरी सिमुलेशन को आसान बनाना।     फिनाइट एलिमेंट एनालिसिस जैसे रिसर्च टूल्स पर गहराई से काम। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. डॉ. अजय सिंह का कहना है कि यह लैब इलाज, शिक्षा और शोध तीनों में नई दिशा दे रही है। भारत की पहली थ्रीडी मॉडल गैलरी बनना एक ऐतिहासिक कदम है जो भविष्य की मेडिकल ट्रेनिंग को पूरी तरह बदल देगा।  

इलाज और रिसर्च को मिलेगा नया आयाम: AIIMS भोपाल में शुरू हुई 3D गैलरी की तैयारी

 भोपाल  भारत के मेडिकल इनोवेशन में एक ऐतिहासिक पहल करते हुए एम्स भोपाल देश की पहली रोगी-विशिष्ट थ्रीडी मॉडल गैलरी बनाने की तैयारी कर रहा है। यह कदम न केवल मरीजों के इलाज को बेहतर बनाएगा, बल्कि मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों के लिए पढ़ाई और सर्जरी प्लानिंग को भी अत्याधुनिक बना देगा। एम्स भोपाल ने चिकित्सा क्षेत्र में एक नई क्रांति की शुरुआत की है। संस्थान ने साल 2024 में एक हाईटेक 'कम्प्यूटेशनल थ्रीडी मॉडलिंग एंड प्रिंटिंग लैब' की स्थापना की थी, जो अब देशभर में चर्चित हो चुकी है। इस लैब की सबसे बड़ी खासियत है – पालीजेट डिजिटल एनाटॉमी प्रिंटर, हाई-पावर कंप्यूटर और विशेष सॉफ्टवेयर, जिनकी मदद से डॉक्टर मरीज के शरीर का हूबहू थ्रीडी मॉडल तैयार कर सकते हैं। इस थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक का इस्तेमाल सर्जरी से पहले केस की गहराई से समझ, ऑपरेशन की प्लानिंग, मेडिकल स्टूडेंट्स को रियल-लाइफ प्रैक्टिस और मरीजों को उनकी बीमारी को विजुअली समझाने के लिए किया जा रहा है। अब एम्स भोपाल भारत की पहली रोगी-विशिष्ट थ्रीडी मॉडल गैलरी बना रहा है, जिसमें विभिन्न जटिल बीमारियों के मॉडल रखे जाएंगे। यह गैलरी डॉक्टरों, छात्रों और आम नागरिकों को शरीर की संरचना और बीमारियों की समझ विकसित करने में मदद करेगी। लैब से अब तक देश-विदेश के विशेषज्ञों का एक अंतरराष्ट्रीय सिम्पोजियम भी हो चुका है, जिसमें मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में साझा काम करने पर सहमति बनी थी। अब एम्स इस लैब के जरिए दो नए सर्टिफिकेट कोर्स शुरू कर रहा है, जिनमें से एक मैनिट भोपाल के साथ संयुक्त रूप से डिजाइन और मेडिकल मॉडलिंग पर आधारित होगा। भविष्य में पीएचडी की सुविधा भी मेडिकल और इंजीनियरिंग छात्रों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। लैब की प्रमुख खूबियां     डॉक्टर ऑपरेशन से पहले मरीज के अंगों का थ्रीडी मॉडल देखकर सर्जरी की योजना बना सकते हैं।     मेडिकल स्टूडेंट्स को रियलिस्टिक अनुभव के साथ पढ़ाई करने का मौका।     मरीजों को अपनी बीमारी विजुअल मॉडल की मदद से आसानी से समझाई जा सकती है।     डॉक्टरों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच इंटरेक्टिव सहयोग की शुरुआत। भविष्य की योजनाएं     बायोमैकेनिक्स: शरीर की हलचलों का डिजिटल विश्लेषण।     वर्चुअल एनाटॉमी और सर्जरी सिमुलेशन को आसान बनाना।     फिनाइट एलिमेंट एनालिसिस जैसे रिसर्च टूल्स पर गहराई से काम। एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. डॉ. अजय सिंह का कहना है कि यह लैब इलाज, शिक्षा और शोध तीनों में नई दिशा दे रही है। भारत की पहली थ्रीडी मॉडल गैलरी बनना एक ऐतिहासिक कदम है जो भविष्य की मेडिकल ट्रेनिंग को पूरी तरह बदल देगा।