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आरिफ मसूद ने जताई आपत्ति, कहा—हर नागरिक को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की आज़ादी

भोपाल गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रगान "जन गण मन" के पहले वंदे मातरम् के 6 छंदों का ससम्मान गायन का निर्णय का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसे मध्य प्रदेश में लागू करने के निर्देश दिए हैं। उनके मुताबिक, प्रदेश के सभी शिक्षक संस्थानों, मदरसों और सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के 6 छंदों का गायन अनिवार्य होगा। लेकिन सरकार के इस फैसले पर कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि किसी भी धार्मिक या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को बाध्यकारी बनाना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। क्या है मसूद का तर्क? मसूद ने स्पष्ट किया कि उन्हें ‘वंदे मातरम्’ से वैचारिक विरोध नहीं है, बल्कि इसे अनिवार्य करने के तौर-तरीकों पर आपत्ति है। उनका कहना है कि देशभक्ति भावनात्मक विषय है, जिसे आदेश के जरिए लागू नहीं किया जा सकता। यह सीधे तौर पर मजहबी आजादी पर अंकुश है। उन्होंने संविधान के मौलिक अधिकारों का हवाला देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आस्था के सम्मान की बात कही। विशेष रूप से उन्होंने आर्टिकल 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि यह अनुच्छेद सभी को अपने धर्म का पालन और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में किसी भी नए कानून या आदेश को संवैधानिक दायरे में परखा जाना जरूरी है। राजनीतिक प्रतिक्रिया तेज मसूद के बयान के बाद विपक्षी दलों ने इसे राष्ट्रवाद से जोड़कर निशाना साधा। वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ नेताओं ने इसे व्यक्तिगत राय बताया, तो कुछ ने संवाद के जरिए समाधान की बात कही। सत्तापक्ष के नेताओं ने मसूद के रुख को “अनावश्यक विवाद” करार दिया है। विधानसभा और सार्वजनिक कार्यक्रमों में बहस मामला तब और तूल पकड़ गया जब यह मुद्दा सार्वजनिक कार्यक्रमों और सरकारी आयोजनों से जुड़ गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल में ऐसे मुद्दे अक्सर भावनात्मक बहस को जन्म देते हैं। इससे जनभावनाओं को प्रभावित करने की कोशिश भी मानी जा रही है। सामाजिक और संवैधानिक विमर्श विशेषज्ञों का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा ऐतिहासिक गीत है, लेकिन इसके गायन को लेकर समय-समय पर कानूनी और सामाजिक बहस होती रही है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राष्ट्रभावना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। भोपाल का यह मामला अब प्रदेश की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।

आरिफ मसूद कॉलेज विवाद: जांच के लिए एसआईटी बनाई गई, संजीव शमी होंगे प्रमुख

भोपाल  भोपाल की मध्य विधानसभा से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के कॉलेज की मान्यता के मामले में डीजीपी कैलाश मकवाना ने तीन सदस्यीय जांच दल (SIT)  गठित किया है। यह जांच दल फर्जी दस्तावेजों के जरिए कॉलेज की मान्यता के मामले में जांच करेगा। हाई कोर्ट की डबल बेंच के निर्देश के बाद डीजपी कैलाश मकवाना ने SIT का गठन संजीव शमी एडीजी (टेलीकॉम) के नेतृत्व मे किया गया है जिसमें डी. कल्याण चक्रवर्ती डीआईजी छिंदवाड़ा रेंज और  निमिशा पांडे एआईजी (प्रशिक्षण) पीएचक्यू भोपाल को शामिल किया गया है। एडीजी संजीव शमी के नेतृत्व मे बनाई गई SIT जाली दस्तावेजों के माध्यम से विधायक आरिफ मसूद के इंदिरा प्रियदर्शिनी कॉलेज की मान्यता के मामले की जांच करेगी। बता दें हाईकोर्ट ने प्रियदर्शिनी कॉलेज की मान्यता से जुड़े फर्जी दस्तावेजों के मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए तीन दिन के भीतर एफआईआर दर्ज करने और  डीजीपी कैलाश मकवाना को विशेष जांच दल (SIT) गठित करने के निर्देश भी दिए थे। इसके बाद पुलिस ने विधायक के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। साथ ही अब डीजीपी ने हाईकोर्ट के आदेश पर गठित तीन सदस्यीय SIT का नेतृत्व एडीजी कम्युनिकेशन संजीव शमी करेंगे।   दो बार फर्जी सेल डीड का इस्तेमाल आरोप है कि अमन एजुकेशन सोसाइटी के सचिव रहते हुए आरिफ मसूद ने कॉलेज की मान्यता के लिए दो बार फर्जी सेल डीड जमा की थी। यह दस्तावेज़ साल 2004 और 2005 के बीच पेश किए गए थे। करीब 20 साल तक इस फर्जीवाड़े की जांच नहीं हुई और आखिरकार सब-रजिस्टार परी बाजार, भोपाल की रिपोर्ट के बाद मामला उजागर हुआ। 

उज्जैन में अचानक स्कूलों का टाइम टेबल बदलने के पीछे कलेक्टर की मंशा सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री को खुश करने की:आरिफ मसूद

उज्जैन  उज्जैन में सावन के महीने में सोमवार को स्कूलों की छुट्टी करने और रविवार को स्कूल लगाने के कलेक्टर के आदेश की कांग्रेस ने आलोचना की है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने इसे ‘मुख्यमंत्री को खुश करने’ के लिए उठाया गया कदम बताया है। उन्होंने कहा कि सावन के महीने में महाकाल की सवारी निकलने की परंपरा दशकों पुरानी है और हर समाज-धर्म के लोग इसका स्वागत करते हैं। ऐसे में अचानक स्कूलों का टाइम टेबल बदलने के पीछे कलेक्टर की मंशा सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री को खुश करने की है। बता दें कि उज्जैन में श्रावण मास के दौरान भगवान महाकाल की सवारी को देखते हुए स्कूलों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। कलेक्टर रौशन सिंह द्वारा जारी आदेश के अनुसार 14 जुलाई से 11 अगस्त तक कक्षा पहली से 12वीं तक के सभी निजी और सरकारी स्कूल रविवार को संचालित होंगे और इसकी बजाय सोमवार को अवकाश रहेगा। उन्होंने कहा कि ये निर्णय महाकाल की सवारी के दौरान होने वाली भीड़ और कई मार्गों के बंद होने के मद्देनजर लिया गया है। उज्जैन में महाकाल की सवारी के दौरान सोमवार को स्कूलों की छुट्टी उज्जैन में सावन के महीने में काफी गहमागहमी रहती है। हर सोमवार को यहां महाकाल की सवारी निकलती है। इसी के साथ देश दुनिया से श्रद्धालु यहां महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं। अब स्थानीय प्रशासन ने ये निर्णय लिया है कि इस बार सावन महीने में हर सोमवार को स्कूलों की छुट्टी रहेगी और उसकी जगह रविवार को स्कूल संचालित होंगे। 11 जुलाई से शुरू होने वाले श्रावण मास में इस बार महाकाल मंदिर से कुल छह सवारिया निकलेंगी। पहली सवारी 14 जुलाई को होगी, इसके बाद दूसरी सवारी 21 जुलाई, तीसरी सवारी 28 जुलाई, चौथी सवारी 4 अगस्त और पांचवी सवारी 11 अगस्त को भादौ मास में निकाली जाएगी। कलेक्टर द्वारा जारी आदेश के अनुसार इन पांच सोमवार को स्कूल बंद रहेंगे और रविवार को स्कूल खुलेंगे। 18 अगस्त को निकलने वाली राजसी सवारी के दिन स्थानीय अवकाश रहेगा..इसलिए उससे पहले रविवार को स्कूल नहीं लगेंगे। कलेक्टर के अनुसार यह निर्णय भगवान महाकाल की सवारी के दौरान सुचारू व्यवस्था और भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखकर लिया गया है। आरिफ मसूद ने कहा ‘मुख्यमंत्री को खुश करने की कोशिश’ कांग्रेस ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने कहा है कि महाकाल की सवारी लंबे समय से निकलती आ रही है और इससे पहले कभी भी इस तरह की ज़रूरत महसूस नहीं हुई है। उन्होंने एएनआई के साथ बात करते हुए कहा कि ‘उज्जैन में महाकाल की सवारी बरसों से निकल रही है। परंपरागत रूप से लोग उसका स्वागत करते हैं..प्रत्येक वर्ग के लोग करते हैं। हर समाज हर धर्म का व्यक्ति उसका स्वागत करता है। अफसोस की बात है कि कलेक्टर ऐसा बेतुका आदेश निकालकर सिर्फ मुख्यमंत्री को खुश करना चाहते हैं, इसके अलावा कुछ भी नहीं है। ये परंपरागत जुलूस है और निकलता रहा है तो क्या आवश्यकता है कि एक दिन छुट्टी देकर एक दिन कैंसिल करो। संडे को स्कूल लगाओ। कल को दूसरे धर्म के लोग भी आवाज़ उठाएंगे फिर क्या करेंगे। संविधान से देश चलेगा। एक देश एक संविधान की बात करने वालों को सोचना चाहिए। ये जुलूस बरसों से निकल रहा है..आज से तो शुरु नहीं हुआ। क्या कलेक्टर महोदय बहुत विद्वान हैं ? इनसे पुराने कलेक्टर, पुरानी परंपराएं और संविधान क्या कोई नहीं जानता था ? ये ही जानते हैं बस ? ये आदेश सवारी के लिए या बच्चों की पढ़ाई के लिए नहीं बल्कि मुख्यमंत्री को खुश करने का आदेश है।’