samacharsecretary.com

भोजशाला मामले में नई चर्चा, फैसले को एक महीना पूरा; SOP लागू करने पर बना असमंजस

धार  इंदौर हाईकोर्ट द्वारा भोजशाला को मंदिर घोषित किए जाने के फैसले को एक माह पूरा हो चुका है, लेकिन भोजशाला को लेकर पुरातत्व विभाग की तरफ से दिशा-निर्देशों को लेकर एसओपी जारी नहीं की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि हमने विभाग को मेल किए तो अफसर सुप्रीम कोर्ट में केस होने का हवाला देकर मामला टाल रहे हैं, जबकि अभी तक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई भी नहीं हुई है। हमने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर कहा है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें। पुरातत्व विभाग की तरफसे हाईकोर्ट के फैसले के बाद कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। हमारी मांग है कि पूर्व में खुदाई के दौरान भोजशाला से निकली प्रतिमाओं को फिर से भोजशाला में स्थापित किया जाए। आपको बता दें कि पिछले माह 15 मई को इंदौर हाईकोर्ट ने भोजशाला को मंदिर मानते हुए हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया था। फैसले के बाद भोजशाला में नमाज बंद हो गई और अब हर दिन भोजशाला में पूजा होती है। कोर्ट के फैसले के बाद आए मंगलवार और शुक्रवार को भोजशाला में विशेष आरती की गई और हजारों हिंदू परिवारों ने वहां जाकर पूजा की थी। याचिकाकर्ता आशीष गोयल का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव धार में सरस्वती लोक बनाने की घोषणा कर चुके हैं। इसकी कैबिनेट बैठक में मंजूरी भी मिल चुकी है। अब इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उधर लंदन के संग्रहालय में रखी मां वाग देवी की प्रतिमा को लाने की कवायद भी चल रही है। इसे लेकर मंत्री सावित्री ठाकुर प्रयास कर रही है। 

ऐतिहासिक भोजशाला में भक्तों की भारी भीड़, HC फैसले के बाद दर्शन को उमड़े लोग

धार  धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट इंदौर खंडपीठ द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण फैसले के बाद यहां आस्था, श्रद्धा और उत्साह का अभूतपूर्व वातावरण देखने को मिल रहा है। फैसले के बाद से भोजशाला में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार तेजी से बढ़ रही है। स्थिति यह है कि पिछले मात्र 11 दिनों में यहां दो लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंच चुके हैं। विशेष बात यह है कि भोजशाला में अब केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि दिल्ली सहित प्रदेश और देश के विभिन्न हिस्सों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भोज उत्सव समिति के संरक्षक विश्वास पांडेय ने बताया कि भीषण गर्मी के बावजूद सुबह से शाम तक दर्शनार्थियों की लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। श्रद्धालु पूरे श्रद्धाभाव के साथ मां वाग्देवी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव कर रहे हैं। अब तक यह स्थिति मुख्य रूप से मंगलवार तक सीमित रहती थी, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले के बाद सप्ताह के हर दिन भोजशाला में श्रद्धालुओं का आगमन हो रहा है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक नियमित पूजा-अर्चना और आरती का क्रम जारी है, जिससे पूरे परिसर में धार्मिक और सांस्कृतिक वातावरण और अधिक सशक्त हुआ है। मुख्यमंत्री के प्रवास के बाद से लोगों की उम्मीदें भी और बढ़ गई हैं मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव के हालिया भोजशाला प्रवास के बाद लोगों की उम्मीदें भी और बढ़ गई हैं। श्रद्धालुओं और क्षेत्रवासियों को अब इस बात का इंतजार है कि यहां प्रस्तावित शोध संस्थान को किस स्वरूप में विकसित किया जाएगा तथा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा भविष्य में कौन-कौन सी व्यवस्थाएं लागू की जाएंगी। लगातार बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं के विस्तार की मांग भी तेज हो गई है। श्रद्धालुओं का मानना है कि भोजशाला केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, इतिहास और ज्ञान परंपरा का गौरवशाली प्रतीक है। राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री भोजशाला आएंगी हिंदू फ्रंट फार जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष रंजना अग्निहोत्री का इंदौर-धार प्रवास 27 से 30 मई तक प्रस्तावित है। भोजशाला प्रकरण की कानूनी लड़ाई की सूत्रधार, हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष, सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता एवं याचिकाकर्ता रंजना अग्निहोत्री इंदौर-धार प्रवास के दौरान भोजशाला में दर्शन-पूजन के साथ विभिन्न कार्यक्रमों में सहभागिता करेंगी। रंजना अपने साथ लखनऊ के प्रसिद्ध महादेव मंदिर के तालाब से 108 कमल पुष्प मां वाग्देवी के चरणों में अर्पित करने के लिए ला रही हैं। हिंदू फ्रंट फार जस्टिस के प्रदेश उपाध्यक्ष आशीष गोयल ने बताया कि अग्निहोत्री ने श्रीराम जन्म भूमि अयोध्या, श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर मथुरा के लिए भी कानूनी लड़ाई लड़ी है।

भोजशाला को मिलेगा नया स्वरूप, CM ने सरस्वती लोक निर्माण की घोषणा की

धार  स्‍थानीय मोतीबाग चौक में आयोजित विशाल आमसभा में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि भोजशाला केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मालवा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान है. उन्होंने ऐलान किया कि आने वाले समय में भोजशाला परिसर को विकसित कर यहां ‘सरस्वती लोक’ बनाया जाएगा. सीएम ने कहा कि राजा भोज की परंपरा, विद्या और संस्कृति को दुनिया में नई पहचान दिलाने का समय आ गया है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिनंदन करते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में वर्षों पुराना मुद्दा समाधान की दिशा में पहुंचा है और हाईकोर्ट का फैसला भी उसी परिवर्तन का परिणाम है. मुख्यमंत्री ने मंच से यह भी कहा कि धार का गौरव अब नई ऊंचाइयों तक जाएगा।  मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने संबोधन में कांग्रेस पर भी तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि पहले भोजशाला के नाम पर तनाव और दंगे का माहौल बनाया जाता था, लेकिन अब विकास और विरासत संरक्षण की राजनीति हो रही है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को सम्मान मिला है. सीएम ने धार में चल रहे विकास कार्यों, पीएम मित्रा पार्क, जल संरक्षण योजनाओं और रोजगार के नए अवसरों का जिक्र करते हुए कहा कि धार अब तेजी से विकसित होने वाला जिला बनेगा. उन्होंने यह भी कहा कि राजा भोज और विक्रमादित्य की भूमि होने के कारण मालवा की सांस्कृतिक पहचान पूरे देश के लिए गौरव का विषय है. मुख्यमंत्री के भाषण के दौरान सभा में मौजूद लोगों ने कई बार जयकारे लगाए और भोजशाला को लेकर किए गए ऐलान का स्वागत किया।  भोजशाला को बताया मालवा की धरोहर मुख्यमंत्री ने कहा कि भोजशाला का नाम आते ही राजा भोज की विद्वता और मालवा की समृद्ध संस्कृति याद आती है. उन्होंने कहा कि यह केवल इतिहास नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों की पहचान है. सीएम ने कहा कि धार की धरती ने दुनिया को ज्ञान और संस्कृति दी है. ऐसे में भोजशाला का संरक्षण सरकार की प्राथमिकता है।  ‘सरस्वती लोक’ बनाने का ऐलान मोहन यादव ने मंच से घोषणा की कि भोजशाला क्षेत्र को विकसित कर ‘सरस्वती लोक’ बनाया जाएगा. उन्होंने कहा कि यह परियोजना मालवा की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देगी. सरकार इस दिशा में योजनाबद्ध तरीके से काम करेगी. इससे पर्यटन और रोजगार दोनों को बढ़ावा मिलेगा।  कांग्रेस पर साधा निशाना, कहा- पहले समाज को बांटने की कोशिश होती थी मुख्यमंत्री ने बिना नाम लिए कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि पहले ऐसे मुद्दों पर समाज को बांटने की कोशिश होती थी. उन्होंने कहा कि आज विकास और विरासत संरक्षण साथ-साथ चल रहा है. हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि यह लंबे संघर्ष का परिणाम है।  पीएम मोदी का किया अभिनंदन सीएम ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सांस्कृतिक धरोहरों को सम्मान दिलाने का काम किया है. उन्होंने पीएम मित्रा पार्क का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने अपना जन्मदिन भी धार में मनाया था. इससे धार और मालवा को राष्ट्रीय पहचान मिली है।  जल संरक्षण पर भी बड़ा बयान मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश जल संरक्षण के मामले में देश में अग्रणी राज्यों में शामिल है. उन्होंने बताया कि राज्य में ढाई हजार करोड़ रुपये से जल संरक्षण के काम किए जा रहे हैं. 105 अमृत सरोवरों का निर्माण भी कराया गया है. इससे गांवों और किसानों को लाभ मिलेगा।  करोड़ों के विकास कार्यों का लोकार्पण धार दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ने कई विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और भूमिपूजन भी किया. उन्होंने कहा कि आने वाले समय में धार में सड़क, उद्योग, सिंचाई और रोजगार के क्षेत्र में बड़े बदलाव दिखाई देंगे. पीएम मित्रा पार्क के जरिए युवाओं को रोजगार मिलेगा और निवेश बढ़ेगा. सीएम ने अपने भाषण में राजा भोज और सम्राट विक्रमादित्य की वीरता और शासन का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि मालवा की यह ऐतिहासिक विरासत पूरे देश के लिए प्रेरणा है. राजा भोज का नाम आज भी सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। 

धार भोजशाला विवाद पर बड़ा निर्णय, हाई कोर्ट ने परिसर को सरस्वती मंदिर घोषित किया

धार  अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद धार्मिक स्थलों से जुड़े सबसे अहम फैसलों में से एक में फैसले में 15 मई को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह कहा कि धार में स्थित विवादित भोजशाला-कमल मौला परिसर मूल रूप से एक हिंदू धार्मिक और शैक्षिक ढांचा है – यह देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर और संस्कृत सीखने का एक केंद्र है, जिसकी स्थापना परमार वंश के राजा भोज के शासनकाल में 1034 ईस्वी में हुई थी। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीज़न बेंच द्वारा दिया गया 242 पन्नों का यह फैसला, आपस में टकराने वाले धार्मिक दावों के पारंपरिक निर्धारण से कहीं आगे जाता है। कोर्ट ने कथित तौर पर पुरातात्विक सर्वेक्षणों, शिलालेखों, वास्तुशिल्प अवशेषों, ऐतिहासिक साहित्य, औपनिवेशिक गजेटियरों, विधायी इतिहास, संवैधानिक सिद्धांतों, हिंदू बंदोबस्ती कानून, इस्लामी वक्फ़ सिद्धांत और अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित न्यायिक ढांचे की गहन जांच-पड़ताल की। इस फैसले का मूल यह है कि कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि भोजशाला में मौजूद मौजूदा ढांचा, पहले से मौजूद एक मंदिर परिसर को नष्ट करने और उसमें बदलाव करने के बाद बनाया गया था, और यह कि इस जगह पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता "कभी खत्म नहीं हुई"। बेंच ने आखिरकार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा 2003 में बनाई गई उस व्यवस्था को रद्द कर दिया, जिसके तहत परिसर के अंदर हिंदू पूजा-अर्चना पर रोक लगाते हुए शुक्रवार की नमाज की इजाजत दी गई थी। साथ ही, कोर्ट ने आपस में टकराने वाले धार्मिक दावों में संतुलन बनाने की कोशिश की – हालांकि यह बहुत ज्यादा भरोसेमंद नहीं लगी – और यह टिप्पणी की कि मुस्लिम समुदाय धार जिले में एक मस्जिद बनाने के लिए किसी दूसरी जगह के आवंटन के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकता है। इस फैसले के गहरे कानूनी और राजनीतिक प्रभाव होने की संभावना है, ऐसा न केवल भोजशाला के बारे में इसके निष्कर्षों की वजह से है, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि कोर्ट ने जिस संवैधानिक और साक्ष्य-आधारित कार्यप्रणाली को अपनाया है – वह स्पष्ट रूप से अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के विवादास्पद सिद्धांतों से प्रेरित है और उनका विस्तार करती है। 1991 के 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम' को रद्द करना नागरिकों और कानूनी जानकारों के लिए जिस बात को समझना और आत्मसात करना सबसे ज्यादा ज़ररी है, वह यह है कि कोर्ट खुद एक मौजूदा कानून – 1991 के 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम' – के साथ क्या कर रहे हैं। 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद पारित यह कानून- जिसे नरसिम्हा राव सरकार द्वारा पेश किए जाने के बाद विधायिका का जबरदस्त समर्थन मिला था (संयोग से, जिस समय यह गैर-कानूनी काम हुआ था, उस समय भी यही सरकार सत्ता में थी)- फिलहाल भारत के सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक चुनौती का सामना कर रहा है। विडंबना यह है कि आखिरी बार इस "कानून को दी गई चुनौती" पर शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2024 में सुनवाई की थी, जब यह तय हुआ था कि इस मामले पर चार हफ्तों बाद सुनवाई होगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, लेकिन भोजशाला जैसे फैसले एक बार फिर इस कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट का 12 दिसंबर, 2024 का आदेश- भले ही यह निचली अदालतों के लिए था- उनसे यह कहता है कि वे पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को दी गई चुनौती पर फैसला आने तक, पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को चुनौती देने वाले मामलों में कोई भी नया मुकदमा दर्ज न करें और न ही कोई प्रभावी आदेश (सर्वेक्षण के आदेशों सहित) पारित करें। यह आदेश भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने पारित किया था, जिसमें न्यायमूर्ति पी.वी. संजय कुमार और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, उस समय न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया था कि इस तरह की कार्यवाही पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का उल्लंघन करती है। यह कानून पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है, जैसा कि वे 15 अगस्त, 1947 को थे। दिसंबर 2024 में अदालत का यह हस्तक्षेप- सालों की पेंडेंसी और देरी के बाद (इन याचिकाओं पर 2021 में नोटिस जारी किया गया था)- ऐसे समय में आया, जब धार्मिक स्थलों की स्थिति को चुनौती देने वाली याचिकाओं और मुकदमों की बाढ़ सी आ गई थी, इनमें से कई स्थल मध्यकालीन मस्जिदें और दरगाहें हैं। उस समय, उत्तर प्रदेश में 16वीं सदी की संभल जामा मस्जिद के संबंध में एक निचली अदालत द्वारा नवंबर 2024 में दिए गए सर्वेक्षण के आदेश ने सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा दिया था, जिसका नतीजा नवंबर में हुई हिंसक झड़पों के रूप में सामने आया, जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी। हालांकि अदालत ने उस समय कहा था कि वह इस कानून – पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991- को दी गई चुनौतियों पर सुनवाई शुरू करेगी, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। इन घटनाक्रमों के बारे में विस्तार से यहां पढ़ें। PWA 1991 का संदर्भ और व्यापक निहितार्थ 1991 का अधिनियम पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप में बदलाव को रोकने के लिए लाया गया था, जिसमें केवल बाबरी मस्जिद स्थल को अपवाद के तौर पर रखा गया था, जो अयोध्या विवाद का विषय था। यह अधिनियम, जिसे अब लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, यह सुनिश्चित करना चाहता है कि धार्मिक स्थलों- विशेषकर ऐतिहासिक महत्व वाले स्थलों- की स्थिति को लेकर 15 अगस्त, 1947 के बाद कोई नया कानूनी विवाद शुरू न हो। इस महत्वपूर्ण संदर्भ को यहां पढ़ें: ‘राम विलास पासवान ने कब और कैसे पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के पक्ष में जोरदार वकालत की थी।’ बिहार के एक कद्दावर नेता- जिन्हें भारतीय राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी’ भी कहा जाता था- राम विलास पासवान (जो उस समय नेशनल फ्रंट के सदस्य थे) ने विपक्ष की बेंच से प्रस्तावित कानून के समर्थन में जोरदार भाषण दिया। उन्होंने पूजा स्थलों को ढहाने की BJP की विनाशकारी राजनीति (बाबरी मस्जिद, 6 दिसंबर, 1991) की तीखी आलोचना की और इस मामले में कांग्रेस को भी नहीं बख्शा। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बारे में, और … Read more

भोजशाला में अखंड पूजा और महाआरती, 721 साल बाद दिखा ऐतिहासिक नजारा

धार  भोजशाला को लेकर आए हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद शुक्रवार को पहली बार मां वाग्देवी की महाआरती और विशेष पूजन का आयोजन किया जाएगा। 721 सालों के लंबे संघर्ष के बाद यह पहला अवसर होगा, जब शुक्रवार के दिन भोजशाला परिसर मां वाग्देवी के जयकारों से गूंज उठेगा। पूरे धार अंचल में इसे लेकर उत्सव जैसा माहौल बना हुआ है। हिंदू पक्ष को हाई कोर्ट से 721 सालों के बाद निर्बाध पूजा-अर्चना का अधिकार मिलने पर यह पहला शुक्रवार बेहद ऐतिहासिक माना जा रहा है। शहर में लोग एक-दूसरे को महाआरती में शामिल होने के निमंत्रण दे रहे हैं और धार्मिक उत्साह चरम पर है। सुबह महाआरती, दोपहर में निकलेगा श्रद्धालुओं का जत्था निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हिंदू पक्ष सुबह 9 बजे भोजशाला में महाआरती करेगा। इसके बाद दोपहर 12 बजे बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्योति मंदिर से भोजशाला दर्शन के लिए रवाना होंगे भोजशाला मुक्ति यज्ञ आंदोलन के संयोजक गोपाल शर्मा ने कहा कि वर्षों के लंबे इंतजार के बाद यह पहला मौका है, जब शुक्रवार को महाआरती आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि परिसर में मां वाग्देवी का प्रतीकात्मक स्वरूप और अखंड ज्योति विराजित है तथा नियमित पूजा-अर्चना पूर्व की तरह जारी रहेगी। सुबह होगी महाआरती निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, हिंदू पक्ष सुबह नौ बजे भोजशाला में महाआरती करेगा, जबकि दोपहर 12 बजे बड़ी संख्या में श्रद्धालु ज्योति मंदिर से भोजशाला दर्शन के लिए रवाना होंगे। बता दें कि 721 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद यह पहला अवसर होगा, जब शुक्रवार को भोजशाला परिसर मां वाग्देवी के जयकारों से गूंजेगा। अब तक प्रत्येक शुक्रवार को यहां मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति थी। मुस्लिम पक्ष पहुंचा सुप्रीम कोर्ट इधर, हाई कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए मस्जिद पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी के सदर अब्दुल समद ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि मामले में शुक्रवार दोपहर से पहले सुनवाई होने की संभावना है। प्रशासन अलर्ट, 1500 से ज्यादा जवान तैनात वहीं, धार में जिला व पुलिस प्रशासन ने शहर में सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था कर ली है। आसपास के शहरों से भी अतिरिक्त बल बुलाया गया है। धार के एसपी सचिन शर्मा का कहना है कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन करवाया जाएगा। शहर में 1500 से ज्यादा जवान तैनात किए गए हैं। कमाल मौलाना का उर्स, लंगर की भी रहेगी व्यवस्था भोजशाला परिसर से सटे कमाल मौलाना दरगाह क्षेत्र में शुक्रवार को उर्स का आयोजन होगा। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी के पदाधिकारियों के अनुसार, उर्स को लेकर प्रशासन को पूर्व में सूचना दे दी गई है। सोसायटी की ओर से दरगाह परिसर में जियारत के साथ लंगर की व्यवस्था भी की जाएगी। मस्जिद पक्ष पहुंचा सुप्रीम कोर्ट इधर, हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मस्जिद पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी के सदर अब्दुल समद ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि मामले में शुक्रवार दोपहर से पहले सुनवाई की संभावना है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कोर्ट के फैसले का पालन किया जाएगा और शुक्रवार को समाजजन अपने-अपने मोहल्लों की मस्जिदों तथा घरों में नमाज अदा करेंगे। विरोध स्वरूप कुछ स्थानों पर दुकानें बंद रखने और काली पट्टी बांधने की बात भी कही गई है। उर्स और लंगर की भी तैयारी भोजशाला परिसर से सटे कमाल मौलाना दरगाह क्षेत्र में शुक्रवार को उर्स का आयोजन भी होगा। सोसायटी पदाधिकारियों के अनुसार दरगाह परिसर में जियारत और लंगर की व्यवस्था की गई है। प्रशासन को पहले ही इसकी सूचना दे दी गई थी। धार बना छावनी, 1500 जवान तैनात स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए धार पुलिस और जिला प्रशासन ने शहर में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। आसपास के जिलों से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाया गया है। सचिन शर्मा ने बताया कि हाई कोर्ट के आदेश का पूरी तरह पालन कराया जाएगा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए 1500 से अधिक जवान तैनात किए गए हैं। महासत्याग्रह के बाद मना महाविजय महोत्सव हाई कोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला समर्थकों ने परिसर के बाहर महासत्याग्रह और “महाविजय महोत्सव” भी मनाया। देर रात तक आतिशबाजी और धार्मिक आयोजन चलते रहे।

भोजशाला परिसर को लेकर बड़ा फैसला, हिंदुओं को मिला पूर्ण पूजा अधिकार

धार  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने धार स्थित भोजशाला परिसर में हिंदुओं को मां सरस्वती की पूजा के लिए पूरी अनुमति दे दी है। एएसआई ने 16 मई को जारी आदेश में कहा कि हाई कोर्ट ने अपने 15 मई के फैसले में भोजशाला को संरक्षित स्मारक और देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर माना है। एएसआई के आदेश में कहा गया है कि अदालत ने यह भी माना कि ऐतिहासिक साहित्य भोजशाला को परमार वंश के राजा भोज से जुड़े संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करता है। आदेश के मुताबिक, राजा भोज से जुड़े साहित्य और स्थापत्य संदर्भ इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहां सरस्वती मंदिर मौजूद था। एएसआई के शोध में भी इस बात का समर्थन मिला है। 2003 का पुराना आदेश रद एएसआई ने अपने आदेश में कहा कि हाई कोर्ट ने अप्रैल 2003 में जारी उस पुराने निर्देश को रद कर दिया है, जिसमें हिंदुओं के पूजा अधिकारों पर रोक और परिसर में मुस्लिम नमाज की अनुमति दी गई थी। नए आदेश के अनुसार, भोजशाला को संस्कृत शिक्षा का केंद्र और देवी वाग्देवी का मंदिर मानते हुए हिंदू समुदाय को पूजा-अर्चना के लिए 'बिना किसी रोक-टोक के प्रवेश' का अधिकार दिया गया है। धार जिले में स्थित भोजशाला लंबे समय से विवाद का विषय रही है और इस मामले को लेकर कई कानूनी लड़ाइयां भी चली हैं।

भोजशाला में आज जश्न का माहौल, ऐतिहासिक निर्णय के बाद श्रद्धालु दीपक और आतिशबाजी से मनाएंगे उत्सव

धार  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर MP हाईकोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद भगवामय हो गया है. 15 मई 2026 को आए फैसले में हाई कोर्ट ने आधिकारिक तौर पर भोजशाला को एक हिंदू मंदिर घोषित किया है, जिसके बाद से रोजाना नियमित रूप से श्रद्धालु भोजशाला पहुंच रहे हैं. चूंकि आज फैसले के बाद पहला मंगलवार है तो भोजशाला परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंच रहे हैं, जिसके लिए प्रशासन ने सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत की है।  ऐतिहासकि फैसले में हाई कोर्ट ने भोजशाला परिसर को एक हिंदू मंदिर करार दिया गौरतलब है मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने 15 मई, 2026 को सुनाए अपने ऐतिहासकि फैसले में भोजशाला परिसर को एक हिंदू मंदिर करार दिया था. हाई कोर्ट ने अपने 242 पन्नों के फैसले में साल 2003 के उस प्रशासनिक आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसके तहत शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज और मंगलवार को हिंदुओं को पूजा की सीमित अनुमति थी।  हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में ASI की सर्वे रिपोर्ट को मुख्य आधार बनाया हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में सुनाए अपने ऐतिहासिक फैसले में ASI की सर्वे रिपोर्ट को मुख्य आधार बनाया. हाई कोर्ट का फैसला ASI की 98 दिनों के वैज्ञानिक और पुरातात्विक सर्वे पर आधारित है, जिसमें आधार पर कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर करार दिया. कोर्ट ने माना कि ऐतिहासिक साक्ष्यों और एएसआई की वैज्ञानिक रिपोर्ट से यह सिद्ध होता है कि इस स्थान का धार्मिक चरित्र मां सरस्वती का मंदिर ही है।  11वीं शताब्दी में परमार राजवंश के प्रतापी राजा भोज ने की जशाला परिसर स्थापना उल्लेखनीय है ऐतिसाहसिक तथ्यों के मुताबिक 11वीं शताब्दी में परमार राजवंश के प्रतापी राजा भोज ने भोजशाला परिसर स्थापना की थी. मूल रूप से संस्कृत अध्ययन का एक प्रतिष्ठित केंद्र और विद्या की देवी मां सरस्वती (वाग्देवी) को समर्पित एक भव्य भोजशाला मंदिर है. साल 1875 में खुदाई के दौरान यहां से मां वाग्देवी की एक अत्यंत सुंदर ऐतिहासिक प्रतिमा मिली थी, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारी अपने साथ इंग्लैंड ले गए थे। 

भोजशाला पर फैसला: वाग्देवी प्रतिमा लौटाने को ब्रिटिश म्यूजियम पहले ही हुआ था तैयार-सावित्री ठाकुर

 धार  ऐतिहासिक भोजशाला पर हाई कोर्ट के निर्णय के बाद धार सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने दावा किया है कि ब्रिटिश संग्रहालय वर्ष 2017-18 में ही प्रतिमा लौटाने पर सहमत हो गया था, लेकिन एक शर्त के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी थी। सावित्री ठाकुर ने बताया कि वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाने के लिए तत्कालीन राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी केंद्र सरकार की ओर से ब्रिटिश म्यूजियम प्रबंधन से चर्चा कर रहे थे। वर्ष 2014 से 2017 के बीच सुब्रमण्यम स्वामी ने चार बार भोजशाला का दौरा भी किया था। सावित्री ठाकुर का कहना है कि वर्ष 2017-18 में ब्रिटिश म्यूजियम ने शर्त रखी थी कि वाग्देवी की प्रतिमा को उसी स्थान पर पुनर्स्थापित किया जाए, जहां पर वह पहले स्थापित थी। उस समय मामला हाई कोर्ट में लंबित होने के कारण यह शर्त पूरी नहीं हो सकी। हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद प्रतिमा को भोजशाला में पुनर्स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वह स्वयं इस संबंध में केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा करेंगी। बहुचर्चित भोजशाला परिसर में अलग ही भावनात्मक, धार्मिक और ऐतिहासिक वातावरण है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानते हुए शुक्रवार को दिए महत्वपूर्ण फैसले के बाद श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना जारी है। श्रद्धालु निर्धारित शुल्क (एक रुपया प्रति व्यक्ति) देकर परिसर में प्रवेश कर मां वाग्देवी की प्रतिमा के स्थान पर पहुंचकर श्रद्धा, आस्था और भावुकता के साथ नमन कर रहे हैं। लगता है जैसे जीवन का सबसे बड़ा संकल्प पूरा हो गया हो मंदिर पक्ष में आए फैसले के बाद भोजशाला मुक्ति आंदोलन से जुड़े बुजुर्ग कार्यकर्ताओं और हिंदू समाज के वरिष्ठ लोगों की आंखों में संतोष, भावुकता और वर्षों के संघर्ष के बाद विजय की खुशी एक साथ दिखाई दी। 90 वर्षीय हिंदू नेता विमल गोधा ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन के कई दशक भोजशाला मुक्ति आंदोलन को समर्पित किए हैं। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब भोजशाला की बात उठाना ही संघर्ष माना जाता था। अब लगता है जैसेजीवन का सबसे बड़ा संकल्प पूरा हो गया हो। आंदोलन से जुड़े रहे 75 वर्षीय सुरेशचंद्र भंडारी ने कहा कि यह आंदोलन सांस्कृतिक अस्मिता और इतिहास को बचाने की लड़ाई भी था। शुरुआती दौर में बहुत कम लोग खुलकर आंदोलन के साथ खड़े होते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह जन आस्था का आंदोलन बन गया। अब ऐसा लग रहा है जैसे संघर्ष की हर पीड़ा सार्थक हो गई।  

धार की भोजशाला से लंदन तक पहुंची मां सरस्वती की मूर्ति, जानिए क्यों अलग है यह विवाद

धार सौ बात की एक बात ये कि भोजशाला पर कोर्ट के फ़ैसले की ख़बर तो पब्लिक ने सुन ली कि हाई कोर्ट ने उसको मां सरस्वती का मंदिर माना है, लेकिन ज़्यादातर लोग मां सरस्वती की उस मूर्ती का रहस्य नहीं जानते जो माना जाता है कि वहां हुआ करती थी. कहां और क्या है वो मूर्ति जो मिली भोजशाला में? धार के लोग भले ही कहानी जानते हों लेकिन बाक़ी जगहों के लोगों को ज़्यादा नहीं पता है. और ये भी ज़्यादा जानकारी नहीं है कि ये केस अयोध्या, काशी या मथुरा वाले मामले से अलग था. अब भी वैसे ये हाई कोर्ट का फ़ैसला है और मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट तो शायद जाएगा ही. तो अभी हाई कोर्ट ने इसे मां सरस्वती का मंदिर बता दिया है, मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट गया तो वहां से भी फ़ैसला आ जाएगा, लेकिन क्या राजा भोज की स्थापित मां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति अब भी है? है तो कहां है? वो कहानी भी जाननी ज़रूरी है।  धार से लंदन तक की कहानी मध्य प्रदेश का धार परमार राजवंश की राजधानी हुआ करती थी आज से कोई 1000 साल पहले. वहां पर है ये भोजशाला जिसको लेकर सारा विवाद था. भोजशाला भी कहते हैं, मां वाग्देवी का मंदिर भी कहते हैं और मुसलमान इसको कमाल मौला की मस्जिद कहते आ रहे थे. लेकिन ये इमारत बाक़ी मंदिरों-मस्जिदों की तरह नहीं है क्योंकि ये प्राचीन धरोहरों का संरक्षण करने वाली एजेंजी ASI के अधीन है. आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के संरक्षण में है. यानी पुरातत्व विभाग. वो इसकी देखरेख करता है. और आज से नहीं. 1909 से. यानी 100 साल से भी ज़्यादा पहले से, अंग्रेज़ों के ज़माने से।  राजभोज और भोजशाला की कहानी इसमें मंगलवार को हिंदुओं को पूजा करने की इजाज़त थी और शुक्रवार को मुसलमानों को. लेकिन विवाद बना हुआ था और फिर एक सायंटिफ़िक सर्वे करवाया गया था जिसकी रिपोर्ट दो साल पहले कोर्ट को दी गई थी और उसी के आधार पर फ़ैसला आया है. इमारत जो है वो 11वीं सदी की मानी जाती है. हिंदू पक्ष का मानना है कि ये सरस्वती मंदिर था जो परमार राजवंश के राजा भोज ने बनवाया था. राजा भोज का शासन था साल 1000 से 1055 तक. और राजा भोज के राज में संस्कृत का बहुत अध्ययन होता है. तो हिंदू पक्ष मानता है कि यहां मां वागदेवी यानी सरस्वती का मंदिर स्थापित किया गया था और ये जो पूरा कॉम्प्लेक्स जो था जिसको भोजशाला कहते हैं, ये संस्कृत अध्ययन का बड़ा केंद्र हुआ करता था. जिसको बाद में 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी से लेकर 15वीं सदी में महमूद शाह खिलजी तक ने तोड़ा और बर्बाद किया और मंदिर की जगह पर कमाल मौला मस्जिद बना दी गई थी।  भोजशाला पर मुसलमानों की क्या दलील मुसलमानों का पक्ष ये था कि ये सूफ़ी संत कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह थी, जिनकी मृत्यु 13वीं सदी में धार में ही हुई थी और उनकी मज़ार के पास ही ये मस्जिद बन गई थी. ब्रिटिश राज के टाइम धार एक रियासत हुआ करती थी और महाराजा सर उदाजी राव पुआर द्वितीय के शासनकाल में 1909 में इस कॉम्प्लेक्स को अंग्रेज़ों की ASI के संरक्षण में दे दिया गया था. आज़ादी के बाद 1951 में इसको मॉन्युमेंट ऑफ़ नैशनल इंपॉर्टेंस, राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया गया था. और फिर इस घटनाक्रम में सबसे अहम फ़ैसला जो हुआ था वो हुआ था 2003 में जब ASI ने ये व्यवस्था की कि मंगलवार को हिंदू पूजा कर सकेंगे और शुक्रवार को मुसलमान. इस व्यवस्था से दोनों पक्ष ख़ुश नहीं थे और मामला अदालत में चल रहा था जिसपर हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि ये मंदिर ही था और मुसलमानों को नमाज़ पढ़ने का अधिकार नहीं होगा. लेकिन जो समझने वाली बात है वो ये कि ये केस बाक़ी मामलों से अलग कैसे था।  मां सरस्वती के सबूत एक तो इस मामले में कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं था. दूसरा ये अग्रेज़ों के ज़माने से ही पुरातत्व विभाग के पास था. और तीसरा ये कि इस विवाद ने भले ही 1992 में अयोध्या में ढांचा गिराये जाने के बाद तूल पकड़ा हो लेकिन ये विवाद 1902 से चला आ रहा था. 2024 में जो ASI का सर्वे हुआ उसकी रिपोर्ट कहती है कि ये जो खंभों पर खड़ा हुआ बड़ा हॉल है ये एक पुराने मंदिर के अवशेषों से बना हुआ दिखता है. खंभों पर हिंदू देवी-देवताओं की आकृतियां नज़र आती हैं, मां सरस्वती की स्तुति में संस्कृत में शिलालेख दिखते हैं, परमार राजवंश के समय के पत्थर मिलने की बात है और हवन कुंड दिखता है. साथ ही कमाल मौला की दरगाह भी दिखती है और फ़ारसी में लिखी हुई भी पंक्तियां नज़र आती हैं. 1902 में धार रियासत जो थी उसमें शिक्षा के अधीक्षक होते थे के. के. लेले. कहते हैं उस टाइम वहां अग्रेज़ वायसरॉय लॉर्ड कर्ज़न को धार आना था तो उनकी यात्रा के लिए इस जगह पर एक दस्तावेज़ तैयार किया था के. के. लेले साहब ने. और भोजशाला नाम इस दस्तावेज़ में पहली बार मिलता है।  भोजशाला, धार और अंग्रेजों की एंट्री उससे पहले जो अंग्रेज़ आए 1822 में, जॉन मैल्कम 1888 में विलियम किनकेड, उन्होंने इस जगह के बारे में लिखते हुए भोजशाला नाम का इस्तेमाल नहीं किया था. लेकिन पास ही में राजा भोज के महल से कई चीज़ें विलियम किनकेड को मिल चुकी थीं. राजा भोज परमार वंश के बहुत बड़े और विद्वान राजा माने जाते थे. वो ज्ञान, कला, विज्ञान और साहित्य के बहुत बड़े प्रेमी थे. और सबसी बड़ी बात तो ये कि उन्होंने खुद 84 किताबें लिखी थीं और 100 से ज्यादा मंदिर बनवाए. राजा भोज मां सरस्वती, जिन्हें मां वाग्देवी भी कहते हैं, उनके के बहुत बड़े भक्त माने जाते थे. ये तो आप जानते ही हैं कि सरस्वती ज्ञान, विद्या, वाणी और कला की देवी हैं. इसलिए उन्होंने अपनी राजधानी धार में एक बड़ा शिक्षा केंद्र बनवाया. इसी को के. के. लेले ने अपने दस्तावेज़ में भोजशाला नाम दिया था. कहते हैं कि ये 1035 में वसंत पंचमी के दिन बनकर तैयार हुआ. भोजशाला सिर्फ एक शाला नहीं … Read more

हाई कोर्ट फैसले के बाद Mohan Yadav बोले- अयोध्या की तर्ज पर संवारा जाएगा भोजशाला परिसर

भोपाल  लंबे समय से चल रहे धार की भोजशाला विवाद पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है वहीं कोर्ट ने इसे वाग्देवी मंदिर माना है. जहां सनातन समुदाय में इस फैसले से खुशी का माहौल है वहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस खुशी को दोगुना कर दिया है. हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद राज्य के मुख्यमंत्री ने एक कहा है कि इस जगह पर अयोध्या की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. राज्य सरकार ने संकेत दे दिया है कि वह पूरे धार क्षेत्र को अयोध्या मॉडल पर विकसित करने की तैयारी में है।  बता दें कि भोजशाला पर शुक्रवार को दिए गए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा- हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है. ASI एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार मानकर फैसला सुनाया है और भोजशाला को मूल चरित्र से मां सरस्वती का मंदिर माना है. इस फैसला का राज्य सरकार ने खुलकर स्वागत किया है।  मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इंटरव्यू में कहा है कि राजधानी भोपाल स्थित भोजशाला को अयोध्या की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट से सरकार को बड़ा सहयोग मिला है और अब सरकार भोजशाला को भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से काम करेगी।  उन्होंने कहा कि भोजशाला मामले में कोर्ट का फैसला आने के बाद सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ गई है. उन्होंने कहा कि जैसे अयोध्या में भगवान राम मंदिर के निर्माण के बाद वहां का विकास हुआ, उसी तरह भोजशाला क्षेत्र का भी समग्र विकास किया जाएगा. सीएम मोहन यादव ने साफ कहा कि दोनों पक्ष से बातचीत कर रास्ता निकाला जाएगा और धर्म की आड़ में माहौल बिगाड़ने वालों पर सख्ती की जाएगी।  क्या मुस्लिम पक्ष को दी जाएगी जमीन उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के हर आदेश का पालन होगा. दोनों पक्षों के धर्म गुरुओं से बात करके रास्ता निकालेंगे. अगर मुस्लिम पक्ष मस्जिद बनाने के लिए जमीन चाहेगा तो हम उस पर भी जरूर विचार करेंगे।  माता वाग्देवी की प्रतिमा को वापस कब कर लाएंगे? पीएम मोदी अब तक देश की 1200 धरोहर वापल ला चुके हैं. उनसे मिलकर आग्रह करेंगे कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूर्ति के लिए केंद्र स्तर से प्रयास हो. प्रयास करेंगे कि मूर्ति जल्दी मंदिर में स्थापित हो…