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भोजशाला मामले में सुनवाई का चौथा दिन, हिंदू पक्ष ने ASI रिपोर्ट से अपने तर्कों को किया मजबूत

धार  इंदौर हाई कोर्ट में धार भोजशाला विवाद मामले की सुनवाई चौथे दिन भी जारी रही. सुनवाई के दौरान हिंदू पक्षकार की ओर से अधिवक्ता विष्णु जैन ने भोजशाला को मंदिर साबित करने के लिए कई अहम तर्क कोर्ट के समक्ष रखे।  हिंदू पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर भोजशाला परिसर से जुड़े कई तथ्यों का हवाला दिया. अधिवक्ता विष्णु जैन ने कोर्ट को बताया कि सर्वे रिपोर्ट में ऐसे कई संकेत मिले हैं, जो इस स्थल के मंदिर स्वरूप की ओर इशारा करते हैं।  सुनवाई के दौरान रिपोर्ट के अलग-अलग बिंदुओं को विस्तार से कोर्ट के सामने पेश किया गया. इनमें परिसर में मिली मूर्तियों, स्तंभों (पिलर), संस्कृत श्लोकों और अन्य स्थापत्य अवशेषों का उल्लेख किया गया।  हिंदू पक्ष ने यह भी दलील दी कि किसी मंदिर परिसर में दो अलग-अलग शैली और बनावट वाली दीवारों का होना कई ऐतिहासिक बदलावों की ओर संकेत करता है. वहीं, हिंदू पक्ष की इन दलीलों पर ASI ने आपत्ति दर्ज कराई।  हिंदू पक्ष ने दी दलील सुनवाई के दौरान रिपोर्ट के विभिन्न बिंदुओं को विस्तार से पेश किया गया. हिंदू पक्ष ने यह भी दलील दी कि किसी परिसर में अलग-अलग शैली और बनावट वाली दीवारों का होना ऐतिहासिक परिवर्तनों और संरचनात्मक बदलावों का संकेत देता है, जो मंदिर से जुड़े इतिहास की पुष्टि कर सकता है।  ASI ने जताई आपत्ति हालांकि, हिंदू पक्ष के इन तर्कों पर ASI ने आपत्ति जताई। ASI की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उसकी सर्वे रिपोर्ट पर फिलहाल किसी अन्य पक्ष द्वारा तर्क प्रस्तुत नहीं किए जाने चाहिए। संस्था ने स्पष्ट किया कि जब रिपोर्ट पर औपचारिक सुनवाई होगी, तभी सभी पक्ष अपने-अपने तर्क विस्तार से रख सकेंगे। आज की सुनवाई में हिंदू पक्ष द्वारा दाखिल एक याचिका पर बहस पूरी हो गई है. कोर्ट अब अगली सुनवाई में हिंदू पक्ष की दूसरी याचिका पर विचार करेगा, जिसमें मामले से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर दलीलें दी जाएंगी. धार की Bhojshala को लेकर यह विवाद लंबे समय से संवेदनशील और ऐतिहासिक महत्व का विषय बना हुआ है. ऐसे में हाई कोर्ट की कार्यवाही पर सभी पक्षों और आम लोगों की नजरें टिकी हुई हैं।  ASI की ओर से कोर्ट से कहा गया कि फिलहाल उसकी सर्वे रिपोर्ट पर किसी अन्य पक्ष की ओर से तर्क पेश न किए जाएं. ASI ने स्पष्ट किया कि जब उसकी रिपोर्ट पर औपचारिक सुनवाई होगी, तब सभी पक्ष अपने-अपने तर्क विस्तार से रख सकेंगे।  आज की सुनवाई में हिंदू पक्षकार की ओर से दाखिल एक याचिका पर बहस पूरी हो गई. अब शुक्रवार से हिंदू पक्ष की दूसरी पिटीशन पर सुनवाई शुरू होगी, जिसमें मामले से जुड़े अन्य बिंदुओं पर दलीलें रखी जाएंगी।  धार भोजशाला विवाद लंबे समय से संवेदनशील और ऐतिहासिक महत्व का मामला बना हुआ है, ऐसे में हाई कोर्ट की सुनवाई पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हुई हैं। 

धार भोजशाला पर बड़ा खुलासा, मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में बताया मंदिर या मस्जिद होने का सच

धार   इंदौर में चल रहे भोजशाला मामले में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस (HFJ) ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में कहा कि उन्हें भोजशाला कमाल मौला परिसर में पूजा करने का खास अधिकार मिलना चाहिए. उनका कहना है कि वहां पहले एक हिंदू मंदिर था और मंदिर का पवित्र महत्व समय के साथ खत्म नहीं होता है. भगवान की पहचान नहीं मिटती, हाई कोर्ट में भोजशाला पर टकराव HFJ के वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी दलील में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद और श्री कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह से जुड़े मामलों के फैसलों का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि भगवान को कानून में एक “कानूनी व्यक्ति” माना जाता है और अगर मंदिर या मूर्ति को नुकसान भी पहुंच जाए, तब भी उसकी पहचान खत्म नहीं होती है. उन्होंने यह भी कहा कि उनका तर्क सिर्फ इस पर नहीं है कि वहां पूजा होती रही है, बल्कि इस पर है कि वहां पहले से मंदिर मौजूद था. इसलिए उन्हें पूजा का अधिकार मिलना चाहिए. उन्होंने अपनी बात को एक बार मंदिर, हमेशा मंदिर कहकर समझाया. इस मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी. भोजशाला के प्राचीन इतिहास पर विस्तार इससे पहले भी हिंदू पक्ष ने भोजशाला के प्राचीन इतिहास पर विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने बताया कि 10वीं और 11वीं शताब्दी में परमार वंश के शासनकाल के दौरान भोजशाला एक प्रमुख विद्या और संस्कृति केंद्र के रूप में स्थापित थी. राजा भोज द्वारा निर्मित यह जगह मूल रूप से सरस्वती मंदिर के रूप में जाना जाता था, जहां छात्रों को शिक्षा दी जाती थी. सुनवाई के दौरानभोजशाला परिसर में लगाए गए बोर्ड का भी जिक्र किया गया, जिसमें स्थल की ऐतिहासिक और पुरातात्विक को दिखाता था. हिंदू पक्ष ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) द्वारा किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षण का समर्थन किया और रिपोर्ट में आए तथ्यों को अपनी दलीलों के पक्ष में बताया. शपथ पत्र में क्या लिखा था? उन्होंने बताया कि इसी शपथ-पत्र में माना गया है कि इसके निर्माण(Dhar Bhojshala) में जिन पत्थरों का उपयोग हुआ, वो यहां मौजूद मंदिर भोजशाला के थे। इसी कारण इसमें संस्कृत के श्लोक भी हैं। इस्लाम में किसी मंदिर को तोड़कर या उसी जगह पर मस्जिद बनाने को गलत माना गया है। हमने जो फोटो और बातें रखी हैं, उनका कहीं भी सोसायटी ने विरोध नहीं किया, न ही इन्हें नकारा है।  आजाद भारत में खिलजी के कानून नहीं चल सकते अभिभाषक जैन ने आगे कहा कि गुलाम वंश, खिलजी वंश, मुगलों का समय, ये ऐसे दौर रहे हैं जब हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को उनसे छीना गया था। धार्मिक स्थानों पर पूजा-अर्चना पर पाबंदी लगाई गई थी। जबकि वर्ष 1950 में भारत में संविधान लागू होने के बाद सभी को अनुच्छेद-25 और 30 के तहत अधिकार मिले, तो यह अधिकार भी मिला कि सभी अपने धार्मिक रिवाजों का पालन करने और अपने शैक्षणिक संस्थानों के संरक्षण के अधिकार के पात्र हैं। गुलाम वंश या खिलजी वंश के शासकों ने आदेश दिए थे, वो आदेश भारत में संविधान आने के बाद लागू नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने उन्हें टोकते हुए इसका आशय उनसे पूछा तो जैन ने कहा, इन शासकों ने ही धर्मस्थलों को तोड़कर बदला था। समर्थन में राम जन्मभूमि के फैसले का जिक्र सुनवाई (Dhar Bhojshala) के दौरान अभिभाषक जैन ने अपनी दलीलों को पुख्ता करने के लिए पूर्व में सुप्रीम कोर्ट, इलाहबाद हाईकोर्ट सहित अन्य हाईकोर्ट द्वारा अलग-अलग मामलों में दिए आदेशों का हवाला भी दिया। उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए फैसले को कई दलीलों के समर्थन में रखा।

धार भोजशाला केस: हिंदू पक्ष ने पेश किए मंदिर होने के सबूत, हवन कुंड और मूर्तियों का किया जिक्र

 धार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में धार की विवादित भोजशाला को लेकर नियमित सुनवाई शुरू हुई. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच के सामने हिंदू पक्ष ने कड़ा तर्क दिया कि यह स्मारक कभी मस्जिद था ही नहीं, बल्कि यह राजा भोज द्वारा निर्मित वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है।  'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी, ''ASI की वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट साफ बताती है कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों और स्तंभों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया है।  परिसर में आज भी संस्कृत श्लोकों वाले शिलालेख, हवन कुंड, मंडप और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियां मौजूद हैं. यह ढांचा 1034 ईस्वी में परमार राजा भोज ने बनाया था. आक्रमणकारियों ने प्रतीकों को मिटाने के बावजूद मूल चरित्र आज भी जीवंत है।  ASI के नियमों के अनुसार, किसी भी संरक्षित स्मारक का मूल धार्मिक स्वरूप बदला नहीं जा सकता, इसलिए यहां सिर्फ हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां तकरीबन 2 घंटे तक चली सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे एक वकील ने अनुरोध किया कि हिंदू समुदाय की याचिका के समर्थन में पेश किए गए सभी दस्तावेजों की प्रतियां उन्हें भी उपलब्ध कराई जाएं। हाई कोर्ट ने इस अनुरोध को मंजूर करते हुए मौखिक रूप से कहा कि दलीलें पूरी होने के बाद, इस मामले से जुड़े सभी पक्ष अपनी आपत्तियां पेश कर सकते हैं, जिन पर कोर्ट विचार करेगा. डिवीजन बेंच ने कहा कि वह मंगलवार को भी इस मामले की सुनवाई जारी रखेगी।  क्या कहती है ASI की रिपोर्ट? बता दें कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद ASI ने दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया था और एक रिपोर्ट पेश की थी. 2000 से ज्यादा पन्नों की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि मस्जिद से पहले, धार के परमार राजाओं के शासनकाल का एक विशाल ढांचा वहां मौजूद था और मौजूदा विवादित ढांचा मंदिर के ही हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था।  यह ध्यान देने लायक बात है कि परमार राजाओं ने 9वीं सदी से लेकर 400 सालों तक मध्य-पश्चिमी भारत के मालवा के आस-पास के एक बड़े इलाके पर राज किया था।  मुस्लिम पक्ष का विरोध और आपत्तियां मुस्लिम पक्ष ने ASI के सर्वेक्षण पर सवाल उठाए हैं और हिंदू पक्ष के इस दावे को खारिज कर दिया है कि भोजशाला परिसर असल में एक मंदिर था।  इसके अलावा, मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि ASI ने उनकी पिछली आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वेक्षण में विवादित परिसर के अंदर 'चोर दरवाजजे से रखी गई चीजों' को भी शामिल कर लिया।  ASI के 7 अप्रैल 2003 के आदेश के मुताबिक, हिंदुओं को हर मंगलवार को इस परिसर में पूजा करने की इजाजत है, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति है। 

धार भोजशाला केस: हाईकोर्ट में 6 अप्रैल से शुरू होगी लगातार सुनवाई, मुस्लिम पक्ष ने पेश किए मस्जिद होने के प्रमाण

धार  मध्य प्रदेश की इंदौर हाईकोर्ट डिवीजन बेंच में आज (गुरुवार) धार स्थित भोजशाला मामले में सुनवाई हुई. इस मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को होगी. 6 अप्रैल दिन सोमवार को दोपहर ढाई बजे से इंदौर हाईकोर्ट में रोज सुनवाई होगी. मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में मस्जिद होने के दस्तावेज पेश किए, जिसपर अगली सुनवाई 10 अप्रैल को होगी. मुस्लिम पक्ष ने कहा कि यह सिविल सूट का मामला है. हाईकोर्ट ने इसपर कहा कि सिविल सूट की सुनवाई 10 अप्रैल को धार स्थित जिला कोर्ट में होगी. कोर्ट ने सभी पार्टी को 10 तारीख को धार कोर्ट में मौजूद होने के आदेश दिए. कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट किया कि 10 अप्रैल को धार जिले की कोर्ट में सिर्फ सिविल सूट पर सुनवाई होगी, बाकी पांच याचिका जो धार भोजशाला विवाद को लेकर लगी हुई हैं, उनपर इंदौर हाईकोर्ट में 6 अप्रैल से लगातार सुनवाई होगी. हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से वरिष्ठ वकील सलमान खुर्शीद भी जुड़े थे।  हिंदू पक्ष के वकील श्रीश दुबे ने कहा कि मुस्लिम पक्ष वीडियो-फोटो के लिए सुप्रीम कोर्ट गया था. उस याचिका में जो आदेश हुआ था, उससे माननीय न्यायालय को अवगत कराया है. हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले की अगली सुनवाई की तारीख 6 अप्रैल तय की है. अदालत सभी एप्लिकेशन को क्रमवार सुनेगी।  आपको बता दें कि एएसआई ने 98 दिनों तक भोजशाला का सर्वे किया और दो हजार से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष पेश की थी। इसके बाद दो जजों ने भी धार जाकर भोजशाला व मस्जिद परिसर का निरीक्षण किया। पिछली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष ने एएसआई द्वारा किए गए सर्वे पर सवाल उठाए थे और उसके तथ्यों को खारिज किया। उनका कहना था कि सर्वे ठीक तरीके से नहीं किया गया। इसके साथ ही कोर्ट से सर्वे के दौरान की गई वीडियोग्राफी के डेटा की मांग भी की गई थी। कोर्ट में सौंपे सभी दस्तावेज मुस्लिम पक्ष के वकील अरशद वारसी ने कहा कि हमारे द्वारा कोर्ट को पहले ही बताया जा चुका था कि यह जो मामला है, चूंकि मल्टीपल डिस्प्यूटेड पार्ट्स इसमें शामिल हैं, तो इसलिए इसको सभी सूट में सुना जाना आवश्यक है. हमने कोर्ट से अपील की थी कि इसमें सभी पार्टी को सिविल सूट में भेजा जाए. हमने कोर्ट में सभी दस्तावेज दिए हैं. उसमें सुनवाई की अगली तारीख 10 अप्रैल है. कोर्ट ने सभी पार्टी को अपने-अपने जवाबों के साथ हाजिर होने के लिए कहा है. वहीं इस मामले में इंदौर हाईकोर्ट में 6 अप्रैल से लगातार सुनवाई की जाएगी।  क्या है भोजशाला विवाद? मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला विवाद दशकों पुराना है. यह जिले के एक ऐतिहासिक परिसर को लेकर है. हिंदुओं का मानना है कि यह वाग्देवी (सरस्वती माता) का मंदिर है, जिसे 11वीं सदी में राजा भोज ने बनवाया था. हिंदू इसे मंदिर और प्राचीन संस्कृत अध्ययन केंद्र मानते हैं. वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है. उनका दावा है कि यह एक इस्लामिक स्थल है और यहां सदियों से नमाज अदा की जाती रही है. हालांकि भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के कब्जे में है। 

भोजशाला विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में, मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट की प्रक्रिया पर सवाल उठाए

धार धार के ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में चल रहे विवाद ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाली कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच की कार्यवाही से असंतुष्टि जताते हुए देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है।  सुनवाई की तारीख को लेकर आपत्ति मुस्लिम पक्ष की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष आवेदन प्रस्तुत किया गया है। इस आवेदन में मांग की गई है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में 2 अप्रैल को होने वाली प्रस्तावित सुनवाई से पहले, उनकी आपत्तियों पर 1 अप्रैल को ही विचार किया जाए। सोसायटी का मानना है कि उनकी दलीलों को सुने बिना प्रक्रिया को आगे बढ़ाना उचित नहीं है। सर्वे की वीडियोग्राफी पर अड़ा पेंच मुस्लिम पक्ष का मुख्य तर्क यह है कि 11 मार्च को हाईकोर्ट में प्रस्तुत उनके आवेदन पर 16 मार्च को उचित सुनवाई नहीं हुई। उनकी प्रमुख मांग है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भोजशाला परिसर में किए जा रहे वैज्ञानिक सर्वे की पूरी वीडियोग्राफी के फुटेज उन्हें उपलब्ध कराए जाएं। आवेदन में यह भी कहा गया है कि हाईकोर्ट ने पूर्व में उनकी याचिका को सुनवाई योग्य नहीं माना था, जिसके कारण उन्हें शीर्ष अदालत की शरण लेनी पड़ी। सोसायटी के अध्यक्ष अब्दुल समद ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने बीते 11 मार्च को एएसआई द्वारा किए जा रहे सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने की आधिकारिक मांग की थी। मुस्लिम पक्ष का आरोप है कि 16 मार्च को हुई पिछली सुनवाई के दौरान इस महत्वपूर्ण विषय पर न तो कोई चर्चा की गई और न ही अदालत की ओर से कोई ठोस आदेश पारित किया गया।     जजों के निरीक्षण के बाद बढ़ी सरगर्मी हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने भारी सुरक्षा के बीच धार पहुंचकर भोजशाला का बारीकी से निरीक्षण किया था। जजों ने एएसआई के अधिकारियों से सर्वे की प्रगति और परिसर के भीतर मंगलवार को हनुमान चालीसा/पूजा और शुक्रवार को नमाज के आयोजनों की व्यवस्थाओं पर विस्तृत जानकारी ली थी। इस निरीक्षण के तुरंत बाद मुस्लिम पक्ष का सुप्रीम कोर्ट जाना मामले की गंभीरता को दर्शाता है। 2 अप्रैल की सुनवाई क्यों है अहम? हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर 2 अप्रैल को होने वाली सुनवाई ऐतिहासिक साक्ष्यों और एएसआई की प्रारंभिक रिपोर्ट पर केंद्रित हो सकती है। मुस्लिम पक्ष चाहता है कि इस सुनवाई से पहले 1 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट उनकी दलीलें सुन ले, ताकि हाईकोर्ट की प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। यह मामला न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि एएसआई की कार्यप्रणाली और डिजिटल साक्ष्यों की स्वीकार्यता पर भी बड़ा कानूनी सवाल खड़ा करता है। याचिका की वैधता पर उठाए सवाल कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस द्वारा दायर की गई मूल याचिका की वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि यह याचिका सुनवाई के योग्य ही नहीं है, इसके बावजूद मामले की कार्यवाही को निरंतर आगे बढ़ाया जा रहा है। इन्हीं तकनीकी और कानूनी आधारों को मुख्य बिंदु बनाते हुए अब सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की गुहार लगाई गई है। वर्तमान में सभी की निगाहें सर्वोच्च न्यायालय के आगामी निर्णय पर टिकी हैं कि वह इस संवेदनशील मामले में क्या रुख अपनाता है।

हाईकोर्ट के जस्टिस आज भोजशाला का करेंगे निरीक्षण, सुरक्षा इंतजामों की व्यवस्था चाक-चौबंद

धार  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एवं कमाल मौला मस्जिद परिसर एक बार फिर चर्चा के केंद्र बन चुकी है। इसके धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रही न्यायिक प्रक्रिया के बीच आज इंदौर हाईकोर्ट से न्यायधीश स्थल का निरीक्षण करने आ रहे हैं। प्रतिनिधि मंडल के प्रस्तावित दौरे को देखते हुए जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। इसी के मद्देनजर पूरे परिसर में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है। प्रतिनिधि मंडल का काफिला आज सर्किट हाउस से सीधे भोजशाला के लिए रवाना होगा, जहां दोपहर में  निरीक्षण प्रस्तावित किया गया है। इस दौरान पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकारी भी साथ में मौजूद रहेंगे। एएसआई की ओर से पेश की गई सर्वे रिपोर्ट के आधार पर स्थल का अवलोकन किया जाएगा। संभावना है कि, हाईकोर्ट के प्रतिनिधि नौगांव स्थित पुरातत्व संग्रहालय का भी दौरा कर सकते हैं। सर्वे रिपोर्ट के आधार पर चल रही सुनवाई भोजशाला के इतिहास और स्वरूप को लेकर दोनों पक्षों के दावे लंबे समय से विवाद का विषय बने हुए हैं। साल 2024 में एएसआई ने 98 दिनों तक खुदाई कर 2098 पृष्ठों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण अवशेष और शिलालेखों का जिक्र किया गया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर मौजूदा समय में कोर्ट में सुनवाई की जा रही है। अगली सुनवाई 2 अप्रेल को प्रस्तावित है। ठीक उसी से पहले न्यायधीश का ये निरीक्षण बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साल 2022 से बना हुआ है प्रमुख मुद्दा भोजशाला को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। वर्ष 2022 में दायर याचिका के बाद न्यायालय के निर्देश पर एएसआइ सर्वे कराया गया था। तब से यह मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है। नवरात्र में धार्मिक आयोजन भी जारी चैत्र नवरात्र के अवसर पर मंगलवार को सकल हिंदू समाज द्वारा नियमित सत्याग्रह और हनुमान चालीसा पाठ किया जाएगा। सुबह 8:55 से 9:25 बजे के बीच मां वाग्देवी को चुनरी अर्पित की जाएगी। इस दौरान विभिन्न समाजों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।

हाई कोर्ट का आदेश: भोजशाला विवादित स्थल का मुआयना करेंगे जज, 2 अप्रैल से पहले होगा दौरा

इंदौर/धार. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने धार जिले के अति-संवेदनशील भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर मामले में एक अहम टिप्पणी की है. जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा कि मामले से जुड़े कई विवादों को देखते हुए वे 2 अप्रैल की अगली सुनवाई से पहले स्वयं परिसर का मुआयना करेंगे। एक न्यूज एजेंसी ने बताया कि जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने इस विवादित परिसर से जुड़ी याचिकाओं की नियमित सुनवाई के लिए 2 अप्रैल की तारीख तय की. बेंच ने अपनी मौखिक टिप्पणियों में कहा, "कई विवादों को देखते हुए हम इस परिसर का दौरा करना और उसका मुआयना करना चाहेंगे. हम अगली तारीख (2 अप्रैल) से पहले इस परिसर का दौरा करेंगे." कोर्ट के दौरे की सख्त शर्तें हालांकि, बेंच ने यह भी साफ किया कि इस दौरे के दौरान मामले से जुड़ा कोई भी पक्ष विवादित जगह पर मौजूद नहीं रह पाएगा। लंबी दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने इस मामले में दायर अलग-अलग अंतरिम अर्जियों को स्वीकार कर लिया और कहा कि पक्ष इन अर्जियों से जुड़े दस्तावेज़ और हलफनामे कोर्ट में पेश कर सकते हैं। हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा, "हम इस मामले से जुड़े सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा मौका देंगे। धार में स्थित यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है, जिसने हाई कोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए इसका वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया और एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की। ASI सर्वे रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु ASI की 2000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल इमारत मस्जिद से पहले से ही वहां मौजूद थी और मौजूदा विवादित इमारत को प्राचीन मंदिरों के हिस्सों का दोबारा इस्तेमाल करके बनाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि वहां से मिले वास्तुशिल्प के अवशेष, मूर्तियों के टुकड़े, साहित्यिक लेखों वाली शिलालेखों की बड़ी-बड़ी पट्टियां, खंभों पर बने नागकर्णिका शिलालेख आदि इस बात का संकेत देते हैं कि इस जगह पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़ी एक विशाल इमारत मौजूद थी। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि वैज्ञानिक जांच-पड़ताल और इस दौरान मिले पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर, इस पहले से मौजूद इमारत को परमार काल का माना जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है, "वैज्ञानिक जांच, सर्वेक्षण और की गई पुरातात्विक खुदाई, मिली चीजों के अध्ययन और विश्लेषण, वास्तुशिल्प अवशेषों, मूर्तियों और शिलालेखों, कला और मूर्तियों के अध्ययन के आधार पर, यह कहा जा सकता है कि मौजूदा ढांचा पहले के मंदिरों के हिस्सों से बनाया गया था। ASI ने रिपोर्ट में कहा कि सजाए गए खंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से यह कहा जा सकता है कि वे पहले के मंदिरों का हिस्सा थे और बेसाल्ट के एक ऊंचे चबूतरे पर मस्जिद के स्तंभों की कतार बनाते समय उनका दोबारा इस्तेमाल किया गया था। दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हिंदू समुदाय, जिसने पूरे विवादित परिसर की धार्मिक प्रकृति को तय करने की मुख्य मांग के साथ अदालत का रुख किया था, का दावा है कि ASI को अपने वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख यह साबित करते हैं कि यह ढांचा मूल रूप से एक प्राचीन मंदिर था। हालांकि, मुस्लिम पक्ष ने इस दावे पर विवाद किया है और सर्वेक्षण पर सवाल उठाया है, यह आरोप लगाते हुए कि ASI ने उनकी पिछली आपत्तियों को नजरअंदाज किया और सर्वेक्षण में विवादित परिसर में रखी गई चीजों को शामिल कर लिया। न्यूज एजेंसी से बात करते हुए, मुस्लिम पक्ष के याचिकाकर्ताओं में से एक मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के नेता अब्दुल समद ने कहा, "हमने हाई कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की है, जिसमें अनुरोध किया गया है कि पूरे ASI सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी और रंगीन तस्वीरें उपलब्ध कराई जाएं, ताकि हम यह साबित कर सकें कि सर्वेक्षण में शामिल कुछ चीजों को किस तरह पहले से तय योजना के तहत शामिल किया गया था। समद ने दावा किया कि विवादित परिसर के सर्वेक्षण के दौरान जैन और बौद्ध समुदायों से संबंधित मूर्तियां भी मिली थीं. उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड और एक 'मुतवल्ली'  ने भी परिसर से संबंधित अदालत में चल रहे मामले में अर्जी दाखिल की है। बता दें कि हिंदू समुदाय भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष का दावा है कि 11वीं सदी की यह इमारत कमल मौला मस्जिद है. ASI के 7 अप्रैल 2003 के एक आदेश के अनुसार, हिंदुओं को हर मंगलवार को इस परिसर में पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुसलमानों को हर शुक्रवार को नमाज पढ़ने की इजाजत है।

भोजशाला के पत्थरों ने उजागर किया सदियों पुराना रहस्य, 16 मार्च की सुनवाई पर सबकी नजरें

धार ऐतिहासिक भोजशाला की धरती से आखिरकार वह साक्ष्य सामने आया है, जिसका वर्षों से इंतजार था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के उत्खनन में पत्थर का दुर्लभ शिल्पखंड मिला है, जिस पर देव आकृतियां उकेरी हुई हैं। यह संभवतः पहली बार है जब भोजशाला के मंदिर स्वरूप का इतना सुस्पष्ट प्रमाण तस्वीर के साथ सामने आया है।यह साक्ष्य ऐसे समय सार्वजनिक हो रहा है जब 16 मार्च (सोमवार) को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर सुनवाई होनी है। अलग-अलग संरचनात्मक परतें सामने आईं वर्ष 2024 में एएसआइ द्वारा किए गए उत्खनन में कई अन्य महत्वपूर्ण संकेत भी सामने आए हैं। खोदाई के दौरान एक स्थान पर मिट्टी की एक मीटर मोटी परत के नीचे प्राचीन संरचना दिखी, जबकि एक अन्य स्थान पर पांच मीटर गहराई तक अलग-अलग संरचनात्मक परतें सामने आईं। इससे स्पष्ट होता है कि इस परिसर में प्राचीन काल से निर्माण गतिविधियां होती रही हैं। पत्थरों से बनी दीवार जैसी संरचना भी मिली परिसर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में पत्थरों से बनी दीवार जैसी संरचना भी मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन अवशेषों से भोजशाला के ऐतिहासिक स्वरूप को समझने में बड़ी मदद मिलेगी। नींव में पत्थर-ईंट की परतें, सिक्के व स्थापत्य अवशेष मिले हैं। खोदाई में पत्थर व ईंटों की दीवारें, मंच, फर्श की परतें और कई स्थापत्य अवशेष सामने आए हैं। इनसे परिसर में अलग-अलग कालखंडों में निर्माण व पुनर्निर्माण के प्रमाण मिलते हैं। कुछ अवशेष राजा भोज के काल के कुछ अवशेष राजा भोज के काल यानी 11वीं शताब्दी से जुड़े होने के संकेत देते हैं। साल 2024 में सर्वे के दौरान सात ट्रेंच और कुछ परीक्षण गड्ढों में खोदाई की गई थी। मलबा हटाने पर मूर्तियों के टुकड़े और घरेलू वस्तुएं मिलीं मलबा हटाने के दौरान मूर्तिकला के खंड, स्थापत्य अवयव, सिक्के और अंगूठियां मिलीं। साथ ही अनाज पीसने के पाट, ओखली-मूसल जैसी घरेलू वस्तुएं भी सामने आईं। परमार काल की धरोहर के बारे में भी जानकारी दी गई उत्तर दिशा में चूने से पलस्तर किया हुआ बड़ा फर्श और तीन सीढ़ियों वाली संरचना भी मिली है। इंदौर के एडवोकेट और विशेषज्ञ विनय जोशी ने बताया कि रिपोर्ट में एक स्थान पर परमार काल की धरोहर के बारे में भी जानकारी दी गई है। उत्खनन के लिए जो ट्रेंच खोदी गई थीं, उनसे प्राप्त धरोहर अपने आप में यह प्रमाण देती हैं कि यह धरोहर भोजकालीन है। मस्जिद पक्ष करेगा विरोध मस्जिद पक्ष पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि वह सर्वे रिपोर्ट की बातों का विरोध करेगा। ऐसे में यह सुनवाई निर्णायक साबित हो सकती है। कोर्ट के आदेश पर सभी पक्षों को एएसआइ की सर्वे रिपोर्ट सौंप दी गई है।

भोजशाला परिसर में कब्रों पर उठे नए विवाद, एएसआई सर्वे रिपोर्ट के बाद मुस्लिम पक्ष का कोर्ट जाने का ऐलान

धार  धार के भोजशाला परिसर में लंबे समय से शवों को दफनाने का विवाद चला आ रहा है। यहाँ कुछ परिवारों के सदस्यों की मौत होने पर उन्हें परिसर के भीतर ही दफनाया जाता था। हालांकि, हिंदू समाज द्वारा इसका लगातार विरोध किया गया। विवाद बढ़ता देख साल 1997 में तत्कालीन कलेक्टर ने एक आदेश जारी कर भोजशाला में शव दफनाने पर रोक लगा दी थी। इस आदेश के बाद वहां अंतिम संस्कार बंद हुआ, लेकिन मस्जिद के सामने वाले हिस्से में आज भी कई पुरानी कब्रें मौजूद हैं।  जांच में यह बात भी सामने आई है कि इन कब्रों को बनाने में उन पत्थरों का इस्तेमाल किया गया जो भोजशाला के हिस्सों को तोड़ने के बाद मलबे के रूप में वहां पड़े थे। एएसआई ने सर्वे के दौरान इन कब्रों के पास के इलाके की भी जांच की है। हालांकि इनके बारे में अभी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है, लेकिन यह साफ है कि शहर में अलग कब्रिस्तान होने के बावजूद कुछ लोग शवों को दफनाने के लिए भोजशाला परिसर का ही इस्तेमाल करते थे। भोजशाला के उस हिस्से में जहाँ मस्जिद बनी है, वहां के पत्थरों और गुंबदों पर ऐसी आकृतियां मिली हैं जो आमतौर पर मस्जिद निर्माण में नहीं होतीं। कुछ शिलालेखों पर पशुओं की आकृतियां बनी हुई हैं। वहीं, परिसर के 50 से ज्यादा शिलालेखों पर अरबी और फारसी में आयतें भी लिखी मिली हैं। दूसरी तरफ, मुस्लिम समाज ने एएसआई की इस सर्वे रिपोर्ट को गलत बताते हुए इसे कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। इसके लिए धार के मुस्लिम प्रतिनिधियों ने वकीलों से मशविरा शुरू कर दिया है। कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर दावे और आपत्तियां दर्ज करने के लिए 16 मार्च तक का समय दिया है। परिसर के उस हिस्से में, जहां मस्जिद निर्मित है, पत्थरों और गुंबदों पर ऐसी आकृतियां मिली हैं जो सामान्यतः मस्जिद निर्माण में नहीं देखी जातीं। कुछ शिलालेखों पर पशु आकृतियां उकेरी गई हैं, जबकि 50 से अधिक शिलालेखों पर अरबी और फारसी में आयतें लिखी पाई गई हैं। नींव में मिला परमारकालीन ‘शारदा सदन’ रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान ढांचे के नीचे बेसाल्ट पत्थरों की 10वीं–11वीं शताब्दी की नींव पाई गई। इन पत्थरों पर ‘शारदा सदन’ शब्द अंकित है, जो देवी सरस्वती या वाग्देवी के निवास का संकेत देता है। साथ ही सुप्रसिद्ध साहित्यिक कृति ‘पारिजात मंजरी’ के उल्लेख वाले शिलालेख भी मिले हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि यह स्थान पूजा का केंद्र होने के साथ ही शिक्षा और नाट्य गतिविधियों का प्रमुख स्थल भी था। तीन चरणों में निर्माण, अंतिम चरण में मस्जिद स्वरूप वैज्ञानिक परीक्षणों से एएसआई ने निष्कर्ष निकाला है कि परिसर का निर्माण तीन चरणों में हुआ। सबसे प्राचीन परत मंदिर की है। इसके ऊपर क्षतिग्रस्त संरचना के अवशेष और फिर अंतिम चरण में मस्जिदनुमा ढांचा निर्मित किया गया। रिपोर्ट कहती है कि मस्जिद निर्माण के दौरान मंदिर के स्तंभों, शिलाखंडों और सजावटी पत्थरों का पुनः उपयोग किया गया। जिसमें कि निर्माण में समरूपता का अभाव स्पष्ट दिखता है। कई पत्थर उल्टे या आड़े-तिरछे लगाए गए, जिन पर संस्कृत शिलालेख खुदे थे। कुछ अक्षरों को घिसकर मिटाने के प्रयास भी मिले हैं। इससे यह संदेह प्रबल होता है कि मूल पहचान को छिपाने की कोशिश की गई। 106 स्तंभ, 82 अर्धस्तंभ और कीर्तिमुख सर्वे में पाया गया कि पूरी संरचना 106 मुख्य स्तंभों और 82 अर्धस्तंभों पर आधारित है। अधिकांश स्तंभ चूना पत्थर के हैं, जिनका रंग हल्का लाल और धूसर है। इन पर कीर्तिमुख, नागबंध, चैत्य गवाक्ष और उल्टे पत्तों की नक्काशी उकेरी गई है। कीर्तिमुख भारतीय मंदिर वास्तुकला की विशिष्ट आकृति है, जिसे सिंहमुख रूप में दर्शाया जाता है और जिसे दुष्ट शक्तियों से रक्षा का प्रतीक माना जाता है। स्तंभों के शीर्ष पर गोलाकार अभाकस, अष्टकोणीय पट्ट और त्रिकोणीय आधार स्पष्ट रूप से मध्यकालीन मंदिर शैली को दर्शाते हैं। 150 से अधिक संस्कृत शिलालेख, 56 अरबी-फारसी अभिलेख रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख दर्ज किए गए हैं। इसके विपरीत 56 शिलालेख अरबी और फारसी में पाए गए। यह अनुपात भी मूल संरचना के मंदिर और शैक्षणिक केंद्र होने की ओर संकेत करता है। फर्श और दीवारों में लगे कई पत्थरों पर खुदे अक्षरों को जानबूझकर घिसा गया या उल्टा लगा दिया गया ताकि उन्हें पढ़ा न जा सके। एएसआई के अनुसार यह ‘आइकॉनोग्राफिक इरेजर’ का स्पष्ट उदाहरण है। मूर्तियों के साक्ष्य: गणेश से अर्धनारीश्वर तक सर्वे रिपोर्ट में 94 मूर्तियों और उनके अवशेषों का उल्लेख है। इनमें गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और चार भुजाओं वाले अन्य देवताओं की आकृतियां शामिल हैं। परिसर से पूर्व में प्राप्त अर्धनारीश्वर, कुबेर और नायिका की मूर्तियों को भी साक्ष्य के रूप में जोड़ा गया है। ये प्रतिमाएं वर्तमान में संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। खिड़की फ्रेम पर देवी-देवताओं की अपेक्षाकृत सुरक्षित मूर्तियां और एक स्तंभ पर कटी-फटी आकृतियां इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मूल प्रतिमाओं को क्षति पहुंचाई गई। 1455 ईस्वी का शिलालेख और ऐतिहासिक संदर्भ परिसर में स्थित मकबरे के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख का उल्लेख रिपोर्ट के खंड चार, पृष्ठ 260 पर किया गया है। यह शिलालेख मालवा सल्तनत के शासक महमूद खिलजी के काल (हिजरी 859/1455 ईस्वी) का है। एएसआई द्वारा किए गए अनुवाद के अनुसार उसमें उल्लेख है कि एक पुराने आश्रम को ध्वस्त कर मूर्तियों को नष्ट किया गया और उसे नमाज की जगह में परिवर्तित किया गया। इस संदर्भ में उल्‍लेखित है कि रिपोर्ट इस अभिलेख को ऐतिहासिक परिवर्तन का प्रत्यक्ष साक्ष्य मानती है। कारीगरों के 139 निशान और युद्ध दृश्य स्तंभों पर 139 से अधिक प्रकार के चिह्न जैसे त्रिशूल, स्वास्तिक और अन्य प्रतीक मिले हैं। इन्हें कारीगरों के सिग्नेचर या कोड के रूप में देखा गया है। दीवारों पर हाथी और सैनिकों के युद्ध दृश्य भी उकेरे गए हैं। एक स्थान पर बच्चे के हाथ का निशान भी मिला है, जो निर्माणकालीन गतिविधियों का मानवीय संकेत देता है। 98 दिन का सर्वे और 2189 पृष्ठों की रिपोर्ट उल्‍लेखनीय है कि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के निर्देश पर 22 मार्च से 27 जून 2024 तक 98 दिनों तक परिसर का वैज्ञानिक सर्वे किया गया। 4 जुलाई 2024 को एएसआई ने 10 … Read more

धार मुस्लिम समाज ने भोजशाला सर्वे को हाईकोर्ट में चुनौती देने की ठानी, याचिका दायर करने की योजना

धार  भोजशाला को लेकर एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर धार के मुस्लिम समाज ने एतराज जताया है। उन्होंने इस रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए अलग से एक याचिका दायर करने की तैयारी की है। उनका कहना है कि सर्वे के यह निष्कर्ष गलत हैं, जिनमें यह कहा गया है कि कमल मौला मस्जिद का निर्माण एक प्राचीन हिंदू मंदिर के अवशेषों का उपयोग करके किया गया था।  मुस्लिम पक्ष ने 1903 के ब्रिटिश काल के एक एएसआई सर्वेक्षण का हवाला भी दिया है, जिसमें इस स्थल को कमल मौला मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया था और इसे एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया था। उन्होंने कहा कि यह एक मस्जिद थी, यह एक मस्जिद है और वहां नमाज जारी रहेगी। उनके अनुसार, मस्जिद का निर्माण निजामुद्दीन औलिया के खलीफा कमाल मौलाना द्वारा किया गया था, जो इस्लाम के प्रचार के लिए 1295 में धार आए थे और उन्हें मालवा शासक महमूद खिलजी द्वारा भूमि प्रदान की गई थी। उस भूमि पर मदरसे और मस्जिदें स्थापित की गई थीं। इसके लिए राजा भोज के महल के अवशेषों का इस्तेमाल किया गया, क्योंकि भारी सामग्री का परिवहन कठिन था, इसलिए निर्माताओं ने पास के राजा भोज के महल के पत्थरों का उपयोग किया। उनका दावा है कि राजा भोज का महल चालुक्य-सोलंकी राजवंश के शासकों ने तोड़ा था और उन्हीं पत्थरों का इस्तेमाल यहां हुआ है। पिछली सुनवाई पर हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर दावे, आपत्तियां व सुझाव देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। इस मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च को होगी। हिंदू संगठनों का दावा- सर्वे में मिले मंदिर होने के प्रमाण हिंदू संगठनों ने बताया कि एएसआई द्वारा कोर्ट में पेश की गई सर्वे रिपोर्ट की प्रति दोनों पक्षों को दे दी गई है। रिपोर्ट के आधार पर दावा किया गया है कि परिसर में सर्वे के दौरान मिले स्तंभ, शिलालेख, मूर्तियां और अन्य अवशेष स्पष्ट रूप से हिंदू संस्कृति के प्रतीक हैं। संगठनों का कहना है कि जमीन के भीतर खुदाई में जो मूर्तियां और संरचनात्मक अवशेष मिले हैं, वे इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि यहां प्राचीन काल में मंदिर स्थापित था। मुस्लिम पक्ष बोला- 1904 के सर्वे में तय हुआ था कि यह मस्जिद है दूसरी ओर, मुस्लिम समाज के सदर अब्दुल समद ने सर्वे रिपोर्ट पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि हम शुरू से ही इस सर्वे को लेकर ऑब्जेक्शन लेते आ रहे हैं। 1903 और 1904 में एएसआई के ही सर्वे में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया था कि यह स्थान मस्जिद है और उसकी संरचना भी मस्जिद जैसी ही है। उन्होंने कहा कि अब नए सर्वे रिपोर्ट में कई तथ्य बदले हुए नजर आ रहे हैं। इन्हीं बदलावों को लेकर वे कोर्ट में 15 दिन के भीतर विधिवत अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे। '2003 के बाद चीजें बदली गईं, रिपोर्ट में मस्जिद का भी जिक्र' सदर अब्दुल समद ने दावा किया कि 2003 के बाद से परिसर में कई चीजें बदली गई हैं, जिन्हें अब सर्वे के नाम पर पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वे शुरू से इसका विरोध करते आ रहे हैं और आगे भी करेंगे। समद ने यह भी दावा किया कि नई सर्वे रिपोर्ट में भी इस बात का स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि यह स्थान मस्जिद है। 16 मार्च को होगी मामले की अगली सुनवाई हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को निर्धारित समय सीमा में अपने दावे, आपत्तियां और सुझाव पेश करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अब इस बहुचर्चित मामले की अगली सुनवाई 16 मार्च 2026 को होगी। इस सुनवाई में सर्वे रिपोर्ट के प्रत्येक बिंदु पर विस्तृत बहस होने की संभावना है। भोजशाला मामले को लेकर धार सहित पूरे प्रदेश में चर्चाओं का दौर जारी है।