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2027 मिशन के लिए BJP-RSS की सियासी कवायद तेज, भागवत का दौरा क्यों अहम?

लखनऊ  उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत रविवार की शाम तीन दिवसीय दौरे पर लखनऊ पहुंचे. संघ प्रमुख आरएसएस भले ही पूर्वी क्षेत्र के प्रशिक्षण वर्ग में शामिल होने के लिए आए हों, लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले उनके इस दौरे के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं।  मोहन भागवत के तीन के लखनऊ प्रवास को विशुद्ध रूप से आरएसएस के कार्यक्रम से जुड़ा बताया जा रहा है. प्रशिक्षण वर्ग में बौद्धिक निर्देशन के साथ ही संघ के शताब्दी वर्ष और विभिन्न अभियानों की समीक्षा करेंगे, लेकिन संघ प्रमुख की इस यात्रा ने प्रदेश की सियासी सरगर्मी को बढ़ा दी है।  उत्तर प्रदेश को देश की 'सत्ता का प्रवेश द्वार' कहा जाता है. यूपी की सियासत में आरएसएस की भूमिका हमेशा से एक 'साइलेंट किंगमेकर' और 'ग्राउंड इंजीनियर' की रही है. भले ही संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन बीजेपी के लिए जनसंघ के दौर से ही सियासी रण में वो मददगार बनता रहा है. 2017 और 2022 में बीजेपी को मिली जीत में संघ का रोल काफी अहम रहा है. ऐसे में 2027 से पहले मोहन भागवत एक बार फिर से यूपी पहुंचे हैं।  लखनऊ के दौरे पर मोहन भागवत संघ प्रमुख मोहन भागवत तीन दिन के लखनऊ दौरे पर हैं और निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में ठहरे हैं. वो मंगलवार तक लखनऊ में रहेंगे. लखनऊ में संघ का अवध, गोरक्ष, काशी और कानपुर प्रांत के स्वयंसेवकों का प्रशिक्षण वर्ग चल रहा है. इस दौरान मोहन भागवत  प्रशिक्षण वर्ग में बौद्धिक निर्देशन के साथ ही संघ के शताब्दी वर्ष और विभिन्न अभियानों की समीक्षा करेंगे।  मोहन भागवत पूर्वी क्षेत्र के पदाधिकारियों के साथ बैठकों में वह शताब्दी वर्ष के तहत चल रहे गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलनों सहित विभिन्न अभियानों के अलावा शाखा विस्तार पर चर्चा करेंगे और आगे के अभियानों और कार्यक्रमों को लेकर निर्देश देंगे. हालांकि संघ प्रमुख अपने प्रवास के दौरान किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे, लेकिन आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बीजेपी के प्रमुख पदाधिकारियों, सरकार के प्रतिनिधियों और संघ के प्रशिक्षण वर्ग में शामिल हो सकते हैं।  सीएम से डिप्टीसीएम से होगी मुलाकात? संघ प्रमुख मोहन भागवत से  लखनऊ प्रवास के दौरान सरकार और बीजेपी नेता मुलाकात करने से भी पहुंच सकते हैं. सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर डिप्टीसीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक सहित यूपी सरकार के कई बड़े मंत्री मुलाकात कर सकते हैं. इसके अलावा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष पकंज चौधरी भी दिल्ली से लखनऊ पहुंच गए हैं. सरकार और बीजेपी संगठन के तमाम अहम लोग  संघ प्रमुख से मिलने के लिए निराला नगर जा सकते हैं।  उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है. ऐसे में सरकार के कामकाज और 2027 विधानसभा चुनाव तैयारियों को लेकर भी चर्चा हो सकती है. ऐसे में वह प्रदेश के राजनीतिक हालात की भी जानकारी ले सकते हैं और जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करेंगे. इससे पहले भी देखा गया है कि संघ प्रमुख लखनऊ पहुंचे हैं तो सरकार से लेकर संगठन तक के लोग उनसे मिलने पहुंचते रहे हैं।  ट्रिपल एस मॉडल' से सत्ता की हैट्रिक यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिहाज से संघ प्रमुख मोहन भागवत प्रचारकों और प्रमुख पदाधिकारियों से प्रदेश की समाजिक और राजनीतिक स्थितियों के संबंध में भी फीडबैक लेंगे. बीजेपी संगठन और सरकार के प्रमुख पदाधिकारियों से मुलाकात में संगठन और सरकार के बीच समन्वय के मुद्दों पर भी बात हो सकती है. इसे ट्रिपल एस मॉडल के रूप में देखा जाता है. यह मॉडल पूरी तरह सरकार, संगठन और संघ के तीन स्तंभों पर आधारित माना जाता है।  संघ विचारधारा और अनुशासित कैडर नेटवर्क देता है. बीजेपी का संगठन चुनावी लामबंदी और राजनीतिक रणनीति संभालता है. जबकि सरकार अपने कामकाज और योजनाओं के आधार पर जनता के बीच संदेश पहुंचाती है. ये तीनों जब एक ही दिशा में काम करते हैं तो बीजेपी की चुनावी मशीनरी काफी प्रभावी मानी जाती है.  2014 के बाद बीजेपी की चुनावी जीत में इस मॉडल की भूमिका को लेकर चर्चा होती रही है।  2027 की चुनावी जंग जीतने का प्लान 2027 चुनाव से पहले फिर के एक बार ट्रिपल एस के बीच तालमेल बैठकर सत्ता की हैट्रिक लगाने का प्लान है. इसीलिए होली के बाद से यूपी के अलग-अलग क्षेत्रों में संघ और बीजेपी के बीच समन्वय बैठकों की एक पूरी श्रृंखला चली. इन बैठकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और पार्टी के प्रदेश महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह हिस्सा लिए थे, जबकि संघ के क्षेत्रीय और प्रांत स्तर के प्रचारक भी बैठक में शिरकत करते थे।  राजनीतिक विश्लेषक इन बैठकों को सिर्फ नियमित संगठनात्मक संवाद नहीं मानते, बल्कि 2027 के चुनावों से पहले बीजेपी की चुनावी रणनीति का शुरुआती खाका खींचने की कवायद बताते हैं. हालांकि, यह है कि बीजेपी और संघ के बीच इस तरह की समन्वय बैठकें नई नहीं हैं.  2019 के लोकसभा चुनाव से एक साल पहले भी इसी तरह का संवाद अभियान चलाया गया था. इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले जमीन पर सियासी माहौल बनाने के लिए यह रणनीति अपनाई गई थी. संघ और बीजेपी के सियासी तालेमल से ही चुनावी जंग जीतने में सफल रही है।  यूपी संघ-BJP की सियासी प्रयोगशाला उत्तर प्रदेश संघ की सियासी प्रयोगशाला रही है. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी पूरे देश में महज 2 सीटों पर सिमट गई थी. इसके बाद संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस की रणनीति के तहत संघ परिवार (विशेषकर विश्व हिंदू परिषद) ने राम मंदिर आंदोलन की कमान संभाली. संघ ने इस आंदोलन के जरिए उत्तर प्रदेश के बिखरे हुए हिंदू समाज को एक वैचारिक सूत्र में पिरोया।  संघ के कार्यकर्ता 'शिला पूजन' और गांवों में 'राम ज्योति' यात्राओं के जरिए घर-घर दस्तक दी. इस वैचारिक जमीन का राजनीतिक फायदा बीजेपी को मिला, लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और कल्याण सिंह के उभार के साथ 1991 में पहली बार हबयूपी में सरकार बनी. 2002 से 2012 के बीच यूपी में भाजपा लगातार कमजोर हो रही थी और तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी बन चुकी थी। इसके बाद 2014 के … Read more

कैसे मोदी के तीसरे कार्यकाल में और मजबूत हुए बीजेपी-संघ के रिश्ते

नई दिल्ली आम तौर पर भारतीय जनमानस में यह मान लिया गया है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बीजेपी एक ही है. इसके पीछे विपक्ष का दुष्प्रचार भी रहा है. पर इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि बीजेपी और संघ आपस में इस तरह घुल मिले हैं कि ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ये दो जिस्म एक जान हैं. पर ऐसा भी नहीं है कि दोनों में मतभेद नहीं होते रहे हैं. संघ और बीजेपी के रिश्ते साल दर साल बनते बिगड़ते रहे हैं. बहुत ऊंचे दर्जे के मतभेद दोनों ही संगठनों के बीच पैदा होते रहे हैं . पर खासियत यह रही है कि बहुत जल्दी दोनों ही संगठनों के नेता आपस में मेल मिलाप भी करते रहे हैं. 2024 में भी दोनों के बीच रिश्ते बहुत हद तक बिगड़ गए. लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद  बीजीपी और संघ के रिश्तों की तल्खी खुल कर जनता के सामने आ गई थी. पर नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल, जो जून 2024 में शुरू हुआ, अप्रत्याशित रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के रिश्तों का स्वर्णकाल बन गया. 30 मार्च 2025 को मोदी का नागपुर दौरा इस पुनर्मिलन का प्रतीक बना, जहां उन्होंने RSS संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि दी और मोहन भागवत के साथ भविष्य की रणनीति तैयार की. उसके बाद से लगातार यह देखा गया कि बीजेपी और आरएसएस का रिश्ता और मजबूत होता जा रहा है. लाल किले की प्राचीर से संघ की उपलब्धियों की बखान हो या उपराष्ट्रपति पद के लिए संघ बैकग्राउंड वाले सीपी राधाकृष्णन का चयन हो, ऐसा लगता है कि आरएसएस-बीजेपी के रिश्तों का स्वर्ण काल चल रहा हो.   1-मोदी और संघ का संदेश, ताली दोनों हाथ से बजती  जनता में ऐसा समझा जाता है कि संघ बीजेपी का अभिभावक है. इसलिए स्वाभाविक तौर पर यह सवाल बनता है कि पिछले क़रीब ग्यारह साल से केंद्र में काम कर रही बीजेपी सरकार के प्रदर्शन को संघ कैसे आंकता है? इसी साल मार्च में बेंगलुरु में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बैठक की तीसरी और आख़िरी पत्रकार वार्ता में संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि बीजेपी का आंकलन देश के लोगों ने किया है. संघ देश से अलग नहीं है. और अभिभावक की बात है तो हम किसी भी सरकार के अभिभावक बनने को तैयार हैं, सिर्फ़ भाजपा के नहीं. होसबाले ने स्पष्ट कहा कि कोई भी पार्टी आए और हमारे विचार मिलें तो हम अभिभावक बन सकते हैं. कोई आता नहीं है वो अलग बात है. होसबाले की बातों से हम समझ सकते हैं कि बीजेपी और संघ के बारे में हम जितना समझते हैं, वास्तविकता उससे कहीं अलग है. कहा जाता है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी कई मौकों पर आरएसएस से सलाह लिया करतीं थीं. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने अपनी एक किताब में इंदिरा गांधी के करीबी सहयोगी अनिल बाली के हवाले से लिखा है कि, आरएसएस ने 1980 में इंदिरा गांधी को सत्ता में आने में मदद की थी. नीरजा चौधरी ने पुस्तक में लिखा है कि कांग्रेस के प्रति मुसलमानों की नाराजगी को देखते हुए वह अपनी राजनीति का हिंदूकरण करना चाहती थीं, क्योंकि उन्हें पता था कि आरएसएस की ओर से एक मौन संकेत या यहां तक कि उनके प्रति मुसलमानों का एक तटस्थ रुख भी इसमें मददगार हो सकता है. उपरोक्त बातें लिखने का मतलब सिर्फ इतना है कि संघ और बीजेपी किसी कानून से बंधे हुए नहीं हैं. दोनों अपने रास्ते कभी भी अलग करने के लिए स्वतंत्र हैं. पर नरेंद्र मोदी दूरदर्शी राजनीतिज्ञ हैं. वो बीजेपी को आगे ले जाने के लिए दूसरी विचारधारा वालों से समझौते करते रहे हैं. आरएसएस की विचारधारा तो उनके रगों में दौड़ रहा है. जाहिर है कि मोदी ने यही सोचकर संघ के साथ बीजेपी के रिश्तों को उस ऊंचाई पर ले जाने की कोशिश की है, जहां तक दोनों आज तक नहीं पहुंचे थे.  2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, और उसे एनडीए सहयोगियों पर निर्भर रहना पड़ा. इससे पार्टी को अपनी संगठनात्मक ताकत को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई है. हरियाणा और महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनावों में संघ ने बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए छोटी-छोटी बैठकों का आयोजन किया, जिससे दोनों के बीच सहयोग बढ़ा.  शायद यही कारण है कि बीजेपी के संगठनात्मक चुनावों में संघ की पृष्ठभूमि वाले नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है. कई राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) या संघ से जुड़े नेताओं को चुना गया. यह कदम दोनों संगठनों के बीच समन्वय को दर्शाता है.  उपराष्ट्रुपति पद के लिए कैंडिडेट के चयन में भी संघ बैकग्राउंड वाले सीपी राधाकृष्‍णन को प्राथमिकता और लालकिले के प्राचीर से तारीफ ने इस संबंध को और मजबूती प्रदान की है. उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में बीजेपी का अध्यक्ष भी कोई संघ बैकग्राउंड वाला व्यक्ति ही आएगा. 2-पिछले 2 सालों में संघ और बीजेपी के रिश्ते 30 मार्च 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का RSS मुख्यालय, नागपुर में मोदी ने RSS संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि दी और मोहन भागवत से मुलाकात की. इसी तरह, 15 अगस्त 2024 को लाल किले से स्वतंत्रता दिवस भाषण में मोदी ने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक संगठनों की तारीफ की, जिसे अप्रत्यक्ष रूप से RSS के प्रति संकेत माना गया. 15 अगस्त 2025 के अपने भाषण में पीएम मोदी ने आरएसएस की भूरि-भूरि तारीफ की.  हालांकि, इस अवधि में कई मौकों पर RSS और बीजेपी के बीच दूरी बढ़ती नजर आई. नवंबर 2024 में मोहन भागवत का 75 साल की उम्र में रिटायरमेंट बयान को मोदी और शाह पर निशाना माना गया. फरवरी 2025 में बीजेपी अध्यक्ष के चयन में देरी और RSS के पसंदीदा उम्मीदवारों को नजरअंदाज करना भी तनाव को बढ़ाने वाला समझा गया. RSS बीजेपी को अपनी वैचारिक संतान मानता है, लेकिन वह अपनी स्वतंत्र पहचान और प्रभाव बनाए रखना चाहता है. बीजेपी, विशेषकर मोदी-शाह युग में, केंद्रीकृत शक्ति और चुनावी रणनीति पर जोर देती है, जो कभी-कभी RSS की सांस्कृतिक और संगठनात्मक प्राथमिकताओं से टकराती है.  3-नड्डा के एक बयान के चलते … Read more