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इलाहाबाद है भाई… बयान से छाए CJI सूर्यकांत, जानें किस संदर्भ में कही यह बात

नई दिल्ली CJI सूर्यकांत ने कहा कि इसे होली ब्रेक के बाद लिस्ट करो। नहीं नहीं, इसे उसके भी एक हफ्ते बाद करो। इलाहाबाद है भाई, एक हफ्ता तो लग जाएगा भांग का नशा उतरने में। सीजेआई की यह हल्के-फुल्के अंदाज में की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। सुप्रीम कोर्ट में रोजाना कई मामलों की सुनवाई होती है। इसमें कुछ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के कोर्ट में होती है। शुक्रवार को हुई एक सुनवाई चर्चा का विषय बन गई। इसमें सीजेआई सूर्यकांत ने हल्के-फुल्के अंदाज में एक केस को लिस्ट करने के मामले में कहा कि इसे होली के हफ्तेभर बाद लिस्ट करो, क्योंकि इलाहाबाद है भाई, भांग का नशा उतरने में हफ्ताभर तो लग जाएगा। बार एंड बेंच के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में सुरेश देवी वर्सेज हाई कोर्ट ऑफ इलाहाबाद से जुड़ी एक सुनवाई को लेकर सीजेआई सूर्यकांत ने यह टिप्पणी की। उन्होंने कहा, ''इसे होली ब्रेक के बाद लिस्ट करो। नहीं नहीं, इसे उसके भी एक हफ्ते बाद करो। इलाहाबाद है भाई, एक हफ्ता तो लग जाएगा भांग का नशा उतरने में।'' सीजेआई की यह हल्के-फुल्के अंदाज में की गई टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है। बता दें पूरे देशभर में होली धूमधाम से मनाई जाती है। प्रयागराज में भी होली के त्योहार को लेकर काफी उत्सुकता है। इस बार चार मार्च को रंग खेलने वाली होली पड़ रही है। कई जगह होली के दिन भांग का भी सेवन किया जाता है। माना जा रहा है कि इसी संदर्भ में सीजेआई सूर्यकांत ने यह मजाकिया अंदाज में टिप्पणी की और मामले को सुनवाई के लिए होली के थोड़े और दिन बाद रखा। वहीं, एक अन्य मामले में सीजेआई सूर्यकांत ने एक वकील को जमकर फटकार लगाई। पूरन चंद्र सेन बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सीजेआई सूर्यकांत ने वकील से कहा कि इन पर जुर्माना नहीं लगाया हाईकोर्ट ने? बंद वंद पहने नहीं हैं, लग रहा कोई दंगल में उतरने आया है। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि हाई कोर्ट ने जुर्माना लगाया है। फिर सीजेआई ने पूछा कि आपको वकालत करते हुए कितने साल हो गए है, जिसपर वकील ने कहा कि 1995 से कर रहा हूं। सीजेआई सूर्यकांत इतना सुनते ही भड़क गए और पूछा कि आपको लाइसेंस देने की गलती किसने की। प्लीज ऐसी पिटीशन फाइल न करें। लोग आप पर विश्वास करते हैं। अगर आप यह सब फाइल करेंगे तो लोग आप पर विश्वास कैसे करेंगे। इस पर वकील ने कहा कि आरएसएस के आदर्श संविधान के खिलाफ है, जिस पर जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि अगर आप और दबाव डालेंगे तो हमें कॉस्ट बढ़ानी पड़ेगी। आपकी आइडियोलॉजी या पॉलिटिक्स वगैरह से राय अलग हो सकती है, लेकिन इससे कोई ऑफेंस नहीं होता या आप किसी अथॉरिटी के खिलाफ एफआईआर करने को नहीं कहते। कृपया पीछे हटें, खुद को शर्मिंदा न करें।

रियल एस्टेट रेगुलेशन पर CJI सूर्यकांत का विवादित टिप्पणी, दागी बिल्डरों को मिल रहा लाभ

नई दिल्ली उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि सभी राज्यों के लिए रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) के गठन पर पुनर्विचार करने का यह सही समय है क्योंकि यह संस्था दागी बिल्डरों को सुविधा प्रदान करने के अलावा कुछ नहीं कर रही है। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि जिन लोगों के लिए RERA बनाया गया था, वे 'पूरी तरह से निराश और हताश' हैं। पीठ ने जोर देकर कहा कि अगर इस संस्था को समाप्त कर दिया जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। पीठ ने हिमाचल प्रदेश सरकार को RERA के कार्यालय को अपनी पसंद के स्थान पर स्थानांतरित करने की अनुमति देते हुए ये टिप्पणियां कीं। हिमाचल प्रदेश सरकार और अन्य द्वारा दायर याचिका पर पीठ ने नोटिस जारी किया, जिसमें हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जो राज्य के RERA कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने से संबंधित था। उच्च न्यायालय ने इससे पहले RERA कार्यालय के स्थानांतरण से संबंधित जून 2025 की अधिसूचना पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। बाद में, 30 दिसंबर 2025 को अपने आदेश में, उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश को जारी रखने का निर्देश दिया। उच्चतम न्यायालय ने 30 दिसंबर के उच्च न्यायालय के निर्देश पर रोक लगा दी है। CJI भड़के प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'दागी बिल्डरों को सुविधा देने के अलावा यह संस्था (RERA) कुछ नहीं कर रही है। बेहतर होगा कि इस संस्था को समाप्त कर दिया जाए, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है …अब समय आ गया है कि सभी राज्य इस प्राधिकरण के गठन पर ही पुनर्विचार करें।' राज्य सरकार ने अधिवक्ता सुगंधा आनंद के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में दायर अपनी याचिका में कहा कि हिमाचल प्रदेश RERA कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने का निर्णय शिमला शहर में भीड़भाड़ कम करने के लिए लिया गया था। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से प्रशासनिक कारणों पर आधारित था। प्रतिवादी की ओर से पेश एक वकील ने कहा कि प्राधिकरण जिन परियोजनाओं से संबंधित मामलों को देखता है, उनमें से 90 प्रतिशत शिमला, सोलन, परवानू और सिरमौर में हैं, जो अधिकतम 40 किलोमीटर के दायरे में आते हैं। उन्होंने कहा कि RERA के समक्ष लंबित शिकायतों में से लगभग 92 प्रतिशत इन्हीं जिलों से हैं, और धर्मशाला में केवल 20 परियोजनाएं हैं।

54 हजार करोड़ रुपये का गबन: CJI सूर्यकांत ने जताई हैरानी, बैंक अब बोझ बनते जा रहे हैं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये 54 हजार करोड़ रुपये के गबन को पूरी तरह से लूट और डकैती करार दिया। सोमवार को केंद्र सरकार को ऐसे मामलों से निपटने के लिए आरबीआई, बैंकों और दूरसंचार विभाग जैसे हितधारकों के साथ चर्चा करके मानक संचालन प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया। न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट मामलों से जुड़े 'खतरे' पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि साइबर धोखाधड़ी को रोकने में बैंकों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि बैंकों की जिम्मेदारी है कि वे उन खातों में असामान्य और बड़े पैमाने का लेनदेन होने पर ग्राहकों को सतर्क करें, जिनका आम तौर पर छोटे लेनदेन के लिए उपयोग किया जाता है। पीठ ने कहा कि यदि 10,000 या 20,000 रुपये की राशि निकालने वाला कोई सेवानिवृत्त व्यक्ति अचानक बहुत बड़ी रकम निकालता है, तो बैंक को तुरंत अलर्ट जारी करना चाहिए। कई राज्यों के बजट से ज्यादा धोखाधड़ी की धनराशि पीठ ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी के जरिये गबन की गई धनराशि कई छोटे राज्यों के बजट से अधिक है। अदालत ने कहा कि इस तरह के अपराध बैंक अधिकारियों की मिलीभगत या उनकी लापरवाही के कारण हो सकते हैं। शीर्ष अदालत ने आरबीआई और बैंकों की ओर से समय पर कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। CBI को किया शामिल अदालत ने सीबीआई को 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों की पहचान करने का निर्देश दिया और गुजरात तथा दिल्ली की सरकार से कहा कि वे इन मामलों में जांच के लिए सीबीआई को आवश्यक स्वीकृति प्रदान करें। शीर्ष अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट के शिकार लोगों को मुआवजा देने के मामलों में एक व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है। अदालत ने याचिका को चार सप्ताह बाद अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया। SOP तैयार सुनवाई की शुरुआत में, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि ने पीठ को बताया कि आरबीआई ने ऐसे मामलों से निपटने के लिए बैंकों के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) का मसौदा तैयार किया है, जिसमें साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए खातों पर अस्थायी डेबिट होल्ड लगाए जाने जैसी कार्रवाई समेत कई प्रावधान हैं। अदालत ने कई नए निर्देश जारी करते हुए गृह मंत्रालय से कहा कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर विचार करे और देशभर में लागू करने के लिए निर्देश जारी करे। AI के इस्तेमाल की सिफारिश न्यायमित्र के तौर पर पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता एनएस नप्पिनई ने कहा कि बैंकों को संदिग्ध लेनदेन के बारे में ग्राहकों के लिए अलर्ट जारी करने के निर्देश दिए जाने चाहिए और इसके लिए AI उपकरणों का उपयोग किया जा सकता है। क्या बोला सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा, 'यदि करोड़ों रुपये का लेनदेन करने वाली कोई कारोबारी संस्था है, तो उस पर संदेह नहीं हो सकता। लेकिन यदि आमतौर पर 15,000 से 20,000 रुपये निकालने वाले पेंशनभोगी के खाते से अचानक 50 लाख, 70 लाख या एक करोड़ रुपये निकाले जा रहे हैं, तो बैंक के एआई से चलने वाले उपकरणों ने इसे संदिग्ध मानकर उसे अलर्ट क्यों नहीं किया?' अटॉर्नी जनरल ने कहा कि RBI इस मुद्दे पर विचार करेगा। बैंकों पर भड़की अदालत इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, 'समस्या यह है कि बैंक ज्यादातर व्यवसायिक मोड में काम कर रहे हैं, और यह स्वाभाविक भी है। लेकिन ऐसा करते हुए वे या तो अनजाने में या मिलीभगत से ऐसे मंच बनते जा रहे हैं, जिनके जरिये अपराध से अर्जित धन का तेज और निर्बाध लेनदेन हो रहा है।' न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में ही यह दर्शाया गया है कि अप्रैल 2021 से नवंबर 2025 के बीच साइबर धोखाधड़ी के जरिये 52,000 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की गई है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, 'ये बैंक अब एक बोझ बनते जा रहे हैं। बैंकों को यह समझना चाहिए कि वे धन के रखवाले हैं और उन्हें इसके प्रति अति-उत्साहित नहीं होना चाहिए। उस भरोसे को नहीं तोड़ा जाना चाहिए। समस्या यह है कि ये बैंक ऐसे धोखेबाज़ों को ऋण भी देते हैं और फिर एनसीएलटी, एनसीएलएटी जैसी संस्थाएं सामने आती हैं, जब धोखाधड़ी करने वाली कंपनियां दिवालिया कार्यवाहियों में उलझ जाती हैं।' यह टिप्पणी उस समय की गई जब अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि आरबीआई द्वारा लागू किए गए उपायों के दौरान 'म्यूल' बैंक खातों का पता चला है। डिजिटल अरेस्ट पर पहले से अलर्ट सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 16 दिसंबर को केंद्र सरकार से कहा था कि वह डिजिटल अरेस्ट पीड़ितों के लिए मुआवजा सुनिश्चित करने के संबंध में न्यायमित्र के सुझावों पर विचार करे। साथ ही उसने साइबर अपराधियों द्वारा देश से बाहर ले जाई जा रही भारी धनराशि पर चिंता भी जताई थी। 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर अपराध का एक बढ़ता हुआ स्वरूप है, जिसमें ठग कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अदालतों या सरकारी विभागों के अधिकारियों के रूप में खुद को प्रस्तुत करके ऑडियो और वीडियो कॉल के माध्यम से पीड़ितों को डराते-धमकाते हैं। वे पीड़ितों को उलझाकर रखते हैं और उन पर पैसे देने का दबाव डालते हैं। एक दिसंबर को शीर्ष अदालत ने सीबीआई को डिजिटल अरेस्ट मामलों की एकीकृत, देशव्यापी जांच करने का निर्देश दिया था और आरबीआई से यह भी पूछा था कि वह साइबर अपराधियों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे बैंक खातों का पता लगाने और उन्हें 'फ्रीज़' करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है।

बंगाल SIR पर सुप्रीम टिप्पणी: CJI सूर्यकांत बोले– जनता के मानसिक दबाव को समझे चुनाव आयोग

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने आज (सोमवार,19 जनवरी को) भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को साफ निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) के दौरान जिन करीब 1.25 करोड़ लोगों के खिलाफ "तार्किक विसंगतियों" (logical discrepancy) की आपत्ति उठाई गई है, उन सभी के नाम पब्लिश किए जाएं। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये आदेश दिया है। पीठ में CJI के अलावा, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि दस्तावेजों के वेरिफिकेशन के लिए करीब दो करोड़ लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं।   सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को यह समझना चाहिए कि पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की वजह से लोग कितने "तनाव" में हैं। बार एंड बेंच की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये नोटिस मोटे तौर पर तीन कैटेगरी में बांटे गए हैं- मैप्ड, अनमैप्ड और लॉजिकल गड़बड़ी। कोर्ट ने आगे कहा कि 'लॉजिकल गड़बड़ी' कैटेगरी के तहत, अधिकारियों ने पिता के नाम में गड़बड़ी, माता-पिता की उम्र में गड़बड़ी और दादा-दादी की उम्र में अंतर देखा है। इसी दौरान अदालत ने गौर किया कि राज्य में 1.25 करोड़ मतदाता “तार्किक विसंगतियों” की सूची में शामिल हैं। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल के ग्राम पंचायत भवनों, तालुका प्रखंड कार्यालयों और वार्ड कार्यालयों में “तार्किक विसंगतियों” की सूची में शामिल लोगों के नाम प्रदर्शित करने का निर्देश दिया। बता दें कि SIR के दौरान मतदाताओं के विवरण में कई किस्म की विसंगतियां पाई गई हैं। राज्य में 2002 की मतदाता सूची से संतानों के संबंध में तार्किक विसंगतियों में माता-पिता के नाम का बेमेल होना और मतदाता और उनके माता-पिता के बीच आयु का अंतर 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक होना भी शामिल है। पीठ ने कहा कि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के जारी विशेष गहन पुनरीक्षण से प्रभावित होने की संभावना वाले लोगों को अपने दस्तावेज या आपत्तियां प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाए। उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया कि दस्तावेज और आपत्तियां प्रस्तुत करने के लिए कार्यालय पंचायत भवनों या ब्लॉक कार्यालयों के भीतर स्थापित किए जाएंगे। पीठ ने कहा, “राज्य सरकार पंचायत भवनों और प्रखंड कार्यालयों में तैनाती के लिए राज्य निर्वाचन आयोग को पर्याप्त श्रमशक्ति उपलब्ध कराएगी।” न्यायालय ने कहा, “इस संबंध में, हम निर्देश देते हैं कि सुचारू कामकाज के लिए प्रत्येक जिला, ईसीआई या राज्य सरकार द्वारा कर्मचारियों के लिए जारी किए गए निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करे।” उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया कि पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य होंगे कि कानून-व्यवस्था की कोई समस्या न हो और सभी गतिविधियां सुचारू रूप से पूरी हों। सर्वोच्च न्यायालय पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया में मनमानेपन और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के आरोपों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था।  

CJI सूर्यकांत की दिल्ली की जहरीली हवा पर टिप्पणी: ‘अमीर प्रदूषण फैलाते हैं, गरीब झेलते हैं

 नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह दिल्ली-एनसीआर में बिगड़ते वायु प्रदूषण के स्तर से संबंधित याचिका पर 17 दिसंबर को सुनवाई करेगा. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पामचोली की पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता अपराजिता सिंह की दलीलों पर ध्यान दिया, जो एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) के रूप में उनकी सहायता कर रही हैं. सुनवाई के दौरान कोर्ट के अपराजिता सिंह ने कहा कि जब तक अदालतें स्पष्ट निर्देश नहीं देतीं, तब तक राज्य सरकारें प्रदूषण से निपटने के लिए प्रभावी कार्रवाई नहीं करतीं.  उन्होंने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े प्रोटोकॉल मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा है. दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण के संकट पर अदालत का ध्यान दिलाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर–जनवरी के दौरान खेल गतिविधियों पर रोक लगाने का निर्देश दिया था, इसके बावजूद विभिन्न जगहों पर खेल आयोजन कराए जा रहे हैं. अदालत के आदेशों को दरकिनार करने के लिए राज्य सरकारों की तरफ से 'तरीके और साधन' अपनाए जा रहे हैं. कुछ निर्देशों को जबरन लागू करना पड़ता है: CJI उन्होंने यह भी कहा कि वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दे रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में सुधार नहीं दिख रहा है. इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत इस समस्या से पूरी तरह अवगत है और केवल ऐसे आदेश पारित किए जाएंगे, जो प्रभावी हों और जिनका अनुपालन कराया जा सके. CJI ने कहा कि कुछ निर्देश ऐसे होते हैं, जिन्हें जबरन लागू करना पड़ता है, लेकिन महानगरों में लोगों की अपनी जीवनशैली होती है, जिसे बदलना आसान नहीं है. दिल्ली पॉल्यूशन  पर 17 दिसंबर को SC में सुनवाई मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि प्रदूषण की मार सबसे ज्यादा गरीबों पर पड़ती है, जबकि प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों में अक्सर संपन्न वर्ग की भूमिका होती है. एमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने इससे सहमति जताते हुए कहा कि गरीब मजदूर इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे पर एक अलग आवेदन दायर किया गया है. इस पर CJI ने दो टूक कहा, 'हम समस्या को जानते हैं. दिल्ली-एनसीआर वायु प्रदूषण से जुड़ा यह मामला 17 दिसंबर को पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा, जहां इस पर विस्तार से विचार किया जाएगा.'

SC में सुधारों का पहला चरण 1 दिसंबर से शुरू, केस मेंशनिंग प्रक्रिया में भी बदलाव की तैयारी

नई दिल्ली  देश के नए मुख्य न्यायाधीश (New CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि एक दिसंबर से कुछ नया होने वाला है। उन्होंने केस मेंशन करने आए एक वकील की दलील सुनने के बाद कहा कि एक दिसंबर तक रुकिए। उन्होंने कहा, "1 दिसंबर तक इंतजार करें, हम कुछ प्लान कर रहे हैं, हम आपके मुद्दे जानते हैं, आपको ज़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है।" इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सुधारों का पहला सेट 1 दिसंबर से लागू होगा। जस्टिस कांत की यह टिप्पणी केस मेंशनिंग सिसटम में बड़े बदलाव का संकेत है। उन्होंने इसी संकेत को डिकोड करते हुए कहा, "मैं 1 दिसंबर से कुछ कर रहा हूँ। सुधार के पहले फेज़ में हम मेंशनिंग के लिए कुछ करेंगे। हम बार की चिंता समझते हैं और हम उस पर ध्यान देंगे। हम यह पक्का करेंगे कि आप यहाँ तक न आएँ और मेंशनिंग के लिए अपना कीमती समय बर्बाद न करें। पद संभालते ही जताई थी नाराजगी बता दें कि CJI का पदभार ग्रहण करने के दिन ही उन्होंने केस मेंशनिंग के तौर-तरीकों पर घोर ऐतराज जताया था और सख्त टिप्पणी की थी कि ये तरीका बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने वकील के केस मेंशन करने के तरीके पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि कुछ लोग मामलों को उसी दिन मेंशन करते हैं और उसे लिस्ट करने का अनुरोध करते हैं, जिसकी इजाजत नहीं दी जा सकती है। उन्होंने तब कहा था, “किसी केस को मेंशन करने और उसी दिन उसे लिस्ट करने का यह तरीका हमेशा के लिए स्वीकार नहीं किया जा सकता। मैंने पहले ही कहा है कि मौत की सजा या अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े जरूरी मामलों को छोड़कर.. आपको मेंशनिंग के लिए सर्कुलेट करना होगा और प्रोसेस को फॉलो करना होगा।” बहुत खास हालात में ही अर्जेंट मेंशनिंग माना जा रहा है कि जस्टिस कांत की आज की टिप्पणी कि एक दिसंबर तक इंतजार करें, इसी समस्या को हल करने की दिशा में उठाया गया कदम है। जस्टिस कांत पहले ही साफ कर चुके हैं कि 'बहुत खास' हालात को छोड़कर, अर्जेंट लिस्टिंग के लिए रिक्वेस्ट मेंशनिंग स्लिप के ज़रिए लिखकर की जानी चाहिए, न कि बोलकर। उन्होंने कहा है कि रजिस्ट्री पहले स्लिप और अर्जेंट होने के कारणों का पता लगाएगी, और उसके बाद ही मामला लिस्ट किया जाएगा। संभवत: इसे वह अमली जामा पहना सकते हैं। बता दें कि जस्टिस सूर्यकांत ने 24 नवंबर को देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली है।

CJI सूर्यकांत ने दिया सुझाव: 18+ कंटेंट देखने से पहले आधार वेरिफिकेशन अनिवार्य हो

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेटफ्लिक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर मौजूद ‘अश्लील’ कंटेंट को लेकर सख्ती दिखाई. जजों ने सुझाव दिया है कि अश्लील सामग्री देखने के लिए आधार कार्ड जरूरी होना चाहिए. कोर्ट का मानना है कि इससे बच्चों को गलत कंटेंट से बचाया जा सकेगा. यह सुझाव चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की बेंच ने दिया है. सुनवाई के दौरान जजों ने कहा कि सिर्फ चेतावनी देना काफी नहीं है. जब तक दर्शक चेतावनी पढ़ते हैं तब तक शो शुरू हो जाता है. इसलिए उम्र की पुष्टि के लिए आधार का इस्तेमाल एक बेहतर विकल्प हो सकता है. यह सुनवाई कॉमेडियन और पॉडकास्टर के खिलाफ दायर याचिकाओं पर हो रही थी. इसमें समय रैना और रणवीर अल्लाहबादिया जैसे नाम शामिल हैं. कोर्ट ने दिव्यांगों के अपमान पर भी गहरी नाराजगी जताई है. जजों ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब मनमानी नहीं है. इसके लिए एक स्वायत्त रेगुलेटरी बॉडी की जरूरत है. अश्लीलता रोकने के लिए आधार वेरिफिकेशन का सुझाव सुप्रीम कोर्ट ने ऑनलाइन अश्लीलता पर चिंता जताई है. जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने इस मुद्दे पर अहम बात कही. उन्होंने कहा कि किताबों या पेंटिंग में अश्लीलता अलग बात है. वहां नीलामी होती है और प्रतिबंध भी लग सकते हैं. लेकिन फोन पर स्थिति अलग है. जैसे ही आप फोन ऑन करते हैं तो कंटेंट सामने आ जाता है. कई बार न चाहते हुए भी गलत चीजें दिख जाती हैं. ऐसे में क्या किया जाए. इसी पर सीजेआई सूर्यकांत ने अपनी राय रखी. उन्होंने कहा कि चेतावनी देने के बावजूद शो शुरू हो जाता है. चेतावनी सिर्फ कुछ सेकंड के लिए आती है. इसके बाद शो चल पड़ता है. इसलिए आधार कार्ड मांगना सही हो सकता है. इससे दर्शक की उम्र का पता चल जाएगा. यह सब एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू किया जा सकता है. बार एंड बेंच की लाइव रिपोर्ट्स के अनुसार, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह सिर्फ सुझाव है.     कंटेंट को कंट्रोल करने के लिए स्वायत्त संस्था की जरूरत कोर्ट ने रेगुलेशन के लिए एक स्वतंत्र संस्था की वकालत की है. सीजेआई ने कहा कि सेल्फ स्टाइल संस्थाएं काफी नहीं हैं. स्थिति को संभालने के लिए बाहरी प्रभाव से मुक्त संस्था चाहिए. कोर्ट ने सवाल किया कि अगर सब कुछ की अनुमति दे दी जाए तो क्या होगा. समाज में संतुलन बनाना बहुत जरूरी है. हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह किसी का मुंह बंद नहीं करना चाहता. मौलिक अधिकारों का संतुलन बना रहना चाहिए. जजों ने कहा कि हम रेगुलेशन का सुझाव देने वाले आखिरी लोग होंगे. लेकिन जब इंडस्ट्री खुद कुछ नहीं कर रही तो दिक्कतें आ रही हैं. कोर्ट ने पूछा कि आखिर ऐसी घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं.   दिव्यांगों का मजाक उड़ाने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी     सुनवाई के दौरान समय रैना और रणवीर अल्लाहबादिया का मामला भी उठा. रणवीर ने एक शो में कथित तौर पर अश्लील टिप्पणी की थी. वहीं समय रैना पर दिव्यांगों का मजाक उड़ाने का आरोप है. क्योंर एसएमए इंडिया फाउंडेशन ने रैना के खिलाफ याचिका दी है. आरोप है कि उन्होंने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के इलाज पर असंवेदनशील बात कही. कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जाहिर की.     सीजेआई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सवाल किया. उन्होंने पूछा कि दिव्यांगों के अपमान पर सख्त कानून क्यों नहीं है. यह कानून एससी-एसटी एक्ट की तर्ज पर होना चाहिए. मेहता ने भी माना कि मजाक गरिमा की कीमत पर नहीं हो सकता.     जस्टिस बागची ने देश विरोधी कंटेंट का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने पूछा कि क्या सेल्फ रेगुलेशन ऐसे कंटेंट को रोक पाएगा. कई बार कंटेंट समाज के ढांचे को बिगाड़ने वाला होता है. जब तक सरकार जवाब देती है तब तक देर हो जाती है. वीडियो वायरल हो जाते हैं और करोड़ों लोग देख लेते हैं. वकील प्रशांत भूषण ने इस पर तर्क दिया. उन्होंने कहा कि ‘एंटी नेशनल’ शब्द बहुत अस्पष्ट है. क्या सीमा विवाद के इतिहास पर लिखना भी देश विरोधी होगा.     इस पर जस्टिस बागची ने सफाई दी. उन्होंने कहा कि हम रेगुलेटेड अधिकार की बात कर रहे हैं. कोई सरकारी अधिकारी यह तय नहीं कर सकता. लेकिन अगर कंटेंट देश की एकता और अखंडता को चोट पहुंचाता है तो सोचना होगा. यूजर जेनरेटेड कंटेंट पर सरकार की चिंता सॉलिसिटर जनरल मेहता ने यूजर जेनरेटेड कंटेंट का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि फ्री स्पीच की आड़ में कोई कुछ भी नहीं कर सकता. सीजेआई ने इस बात पर सहमति जताई. उन्होंने कहा कि यह अजीब है कि कोई अपना चैनल बना ले. और फिर बिना किसी जवाबदेही के कुछ भी करता रहे. फ्री स्पीच की सुरक्षा जरूरी है लेकिन सीमाएं भी हैं. अगर किसी शो में एडल्ट कंटेंट है तो एडवांस चेतावनी होनी चाहिए. साथ ही पेरेंटल कंट्रोल भी जरूरी है. अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने बताया कि मंत्रालय इस पर मीटिंग करने वाला है. अगर किसी कानून में बदलाव की जरूरत होगी तो किया जाएगा.     सरकार और स्टेकहोल्डर्स के बीच होगी चर्चा कोर्ट ने सुझाव दिया कि जल्दबाजी में कुछ नहीं होना चाहिए. एक विचार-विमर्श की प्रक्रिया होनी चाहिए. प्रस्ताव को पब्लिक डोमेन में रखा जाना चाहिए. वेंकटरमणी ने कहा कि हम सबसे बात करेंगे. किसी को भी ऐसे ही चर्चा में नहीं आने दिया जाएगा. मेहता ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है. वे एक हफ्ते बाद जानकारी देंगे. कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रभाव कभी-कभी फायदों से ज्यादा हो जाते हैं. इसलिए एक जिम्मेदार समाज का निर्माण जरूरी है. जब समाज जिम्मेदार होगा तो समस्याएं खुद सुलझ जाएंगी.     कॉमेडियन को दी फंड जुटाने की सलाह दिव्यांगों के मामले में कोर्ट ने कॉमेडियन को एक सलाह दी है. कोर्ट ने कहा कि वे दिव्यांगों के इलाज के लिए फंड जुटाएं. इसके लिए उन्हें कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए. समय रैना के वकील ने कहा कि उन्होंने पैसे दान किए हैं. इस पर कोर्ट ने कहा कि उन्हें पैसे नहीं चाहिए. हमें उनके आत्मसम्मान का आदर करना चाहिए. कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक डेडिकेटेड फंड बनाया जाए. कॉमेडियन … Read more