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कोर्ट में हिंसक वारदात, अधिवक्ता और पुलिसकर्मी घायल; पीलीभीत में दो आरोपी पकड़े गए

पीलीभीत पीलीभीत के कोर्ट परिसर में मंगलवार सुबह अधिवक्ता पर बांके से हमला कर दिया गया। उन्हें बचाने पहुंचे दरोगा भी घायल हो गए। घायलों को जिला अस्पताल भेजा गया है। वहीं, पुलिस ने हमला करने के दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। जानकारी के मुताबिक हत्या के मामले में नामजद अधिवक्ता ओमपाल निवासी गांव खरदाई (थाना दियोरिया) मंगलवार को मुकदमे की तारीख पर कोर्ट पहुंचे थे। इसी दौरान मुकदमे के दूसरे पक्ष के लोग वहां पहुंच गए और अचानक बांके से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। कचहरी परिसर में मचा हड़कंप हमले में अधिवक्ता ओमपाल गंभीर रूप से घायल हो गया। उसे बचाने पहुंचे कोर्ट परिसर में तैनात दरोगा अरविंद त्यागी भी बांके के प्रहार से घायल हो गए। घटना से कचहरी परिसर में अफरा-तफरी मच गई। दोनों घायलों को तत्काल जिला अस्पताल ले जाया गया। सूचना पर एसपी अभिषेक यादव भी अस्पताल पहुंचे और घटना की जानकारी ली। बताया जा रहा है कि हमला करने के आरोपी कचहरी के पीछे खुले रास्ते से अंदर दाखिल हुए थे। बांका छिपाकर लाए थे। घायल अधिवक्ता बीसलपुर में प्रैक्टिस करता है और हत्या के एक मुकदमे में आरोपी है। एसपी अभिषेक यादव ने बताया कि दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले की जांच की जा रही है।

मछली परिवार के खाते डीफ्रीज करने का आदेश, भोपाल हाईकोर्ट ने कलेक्टर और डीसीपी को किया निर्देशित

भोपाल  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने गैंगस्टर यासीन अहमद उर्फ मछली के परिजनों के बैंक खाते डिफ्रीज करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि भोपाल कलेक्टर और डीसीपी (क्राइम) ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्वीकार किया है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, इसलिए उनके बैंक खाते डिफ्रीज किए जाएं। साथ ही अदालत ने कहा कि राशि का उपयोग आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही किया जा सकेगा। गौरतलब है कि यासीन अहमद के परिजनों ने मकान तोड़ने और बैंक खाते फ्रीज करने की कार्रवाई को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि प्रशासन ने केवल उनकी संपत्ति ध्वस्त की, जबकि सरकारी भूमि पर बने अन्य मकानों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं है, फिर भी खाते फ्रीज, शस्त्र लाइसेंस निलंबित और ईमेल आईडी ब्लॉक कर दी गई, जिससे व्यावसायिक गतिविधियाँ ठप हो गईं। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने तर्क दिया कि एक याचिकाकर्ता के खाते से बड़ी राशि मुख्य अभियुक्त के खाते में ट्रांसफर हुई थी। इसलिए सीआरपीसी की धारा 102 के तहत जांच के लिए खाते फ्रीज किए गए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि संबंधित लेनदेन पर टीडीएस का भुगतान किया गया था, और वे उस फर्म के साझेदार हैं, इसलिए रकम का लेनदेन वैध था। सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि फिलहाल बैंक खाते डिफ्रीज किए जाएं, लेकिन यदि आगे जांच में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री मिलती है, तो कानून अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।

दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ व आम्रपाली दुबे के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, जानें क्या है मामला?

मुजफ्फरपुर जफ्फरपुर जिले में भोजपुरी फिल्म स्टार और बीजेपी के आजमगढ़ सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ तथा अभिनेत्री आम्रपाली दुबे के खिलाफ सिविल कोर्ट में परिवाद दायर किया गया है। दोनों पर आरोप है कि उन्होंने मुजफ्फरपुर शहर में आयोजित एक मॉल के उद्घाटन समारोह के दौरान सड़क जाम की स्थिति पैदा कर दी, जिससे आम लोगों और मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। यह मामला सिविल कोर्ट के अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा द्वारा दर्ज कराया गया है। कोर्ट ने परिवाद को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई की तिथि 18 अक्टूबर 2025 तय की है। दरअसल, 4 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर शहर के काजी मोहम्मदपुर थाना क्षेत्र स्थित कलमबाग चौक के पास एक मॉल का उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बीजेपी सांसद और भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव निरहुआ तथा अभिनेत्री आम्रपाली दुबे को बुलाया गया था। जैसे ही दोनों स्टार मॉल उद्घाटन के लिए पहुंचे, उन्हें देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ पड़ी। इस दौरान आयोजकों और दोनों कलाकारों के कारण सड़क जाम की स्थिति बन गई। इससे कई बीमार लोग और आम नागरिक घंटों फंसे रहे। यहां तक कि मरीजों को लेकर जा रही एंबुलेंसें भी ट्रैफिक जाम में फंस गईं। करीब एक घंटे तक लोगों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। बाद में दोनों कलाकारों के कार्यक्रम स्थल से जाने के बाद स्थिति सामान्य हो सकी। घटना के बाद अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा ने इस पूरे मामले में मुजफ्फरपुर सिविल कोर्ट में अपराधिक परिवाद दर्ज कराया। परिवाद में निरहुआ और आम्रपाली दुबे के साथ-साथ तीन अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223, 189(6), 191(1), 190, 61(1), 280, 272, 298, और 199(बी) के तहत दर्ज किया गया है। परिवादी सह अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा ने कहा कि मॉल उद्घाटन का आयोजन “बेहद खतरनाक और जानलेवा” तरीके से किया गया था। उन्होंने कहा कि “इस तरह की स्थिति में तमिलनाडु जैसी भगदड़ की घटना भी हो सकती थी।” उन्होंने बताया कि उन्होंने कोर्ट में बीजेपी सांसद दिनेश लाल यादव निरहुआ, अभिनेत्री आम्रपाली दुबे, एसडीओ पूर्वी, और कार्यक्रम आयोजक के खिलाफ परिवाद दाखिल किया है। कोर्ट ने मामले को स्वीकार करते हुए 18 अक्टूबर 2025 को सुनवाई की तारीख तय कर दी है।

जिला दण्डाधिकारी छतरपुर ने 8 जिला बदर के प्रकरणों में की बड़ी कार्यवाही

जिला दण्डाधिकारी छतरपुर ने 8 जिला बदर के प्रकरणों में की बड़ी कार्यवाही 1 अनावेदक को छः माह के लिए जिला बदर एवं 7 के विरूद्ध थाना हाजिरी देने की कार्यवाही हुई     छतरपुर जिला दण्डाधिकारी पार्थ जैसवाल ने पुलिस अधीक्षक से प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर 6 अक्टूबर 2025 को 8 जिला बदर के प्रकरणों में एक अनावेदक के विरूद्ध जिला बदर एवं सात के विरूद्ध थाना हाजिरी देने की कार्यवाही की है। जिला दण्डाधिकारी श्री जैसवाल ने अनावेदक मोनू खान उर्फ पायलेट पिता जफर खान उम्र 25 वर्ष नजरबाग छतरपुर थाना कोतवाली की आपराधिक गतिविधियों पर तत्काल नियंत्रण करने के उद्देश्य से म.प्र. राज्य सुरक्षा अधिनियम 1990 की धारा 3(2) एवं 5 में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए अनावेदक को छः माह के लिए जिले एवं समीपवर्ती सीमा पर लगे हुए जिलों की भौगोलिक सीमाओं से निष्काषित किया है।      इसके अलावा गौरव प्रताप सिंह उर्फ वाणीराजा दलीपुर थाना बमनौरा, दद्दू उर्फ देवेन्द्र रैकवार परा चौकी थाना मातगुवां, बल्लू उर्फ बलवंत सिंह ठाकुर बारीगढ़ थाना जुझारनगर, अवधेश प्रताप सिंह उर्फ रासू राजा चैतगिरी कॉलोनी थाना कोतवाली छतरपुर, मुकेश उर्फ मुक्के कुशवाहा हनुमान टौरिया के पीछे थाना कोतवाली छतरपुर, सुकसाब उर्फ भज्जू यादव भर्षखेरा थाना बमनौरा एवं हल्के यादव भर्षखेरा थाना बमनौरा को आगामी 1 वर्ष तक सप्ताह में 2 दिन थाना हाजरी देने के निर्देश दिए हैं।

सरकार की हरी झंडी के बाद निलंबित सीबीआई जज पर केस, एसीबी कर सकती है अगला कदम

 चंडीगढ़  हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित पूर्व सीबीआई जज सुधीर परमार के खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी है। अब एसीबी अदालत में पूर्व न्यायिक अधिकारी के खिलाफ चार्जशीट दायर कर सकेगी। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम व दंड प्रक्रिया संहिता के मुताबिक किसी भी लोक सेवक के खिलाफ मुकदमा चलाने से पहले राज्य सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य है। राज्य चौकसी एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने 18 महीने जांच करने के बाद परमार के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी थी। पूर्व जज पर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े रियल एस्टेट कंपनी एम3एम के प्रमोटर्स बसंत बंसल, पंकज बंसल और आईआरईओ के मालिक व प्रबंध निदेशक ललित गोयल व भतीजे अजय परमार के मामले में नरमी बरतने और रिश्वत लेने के आरोप थे। एसीबी से पहले ईडी ने रियल एस्टेट कंपनी के मालिकों व प्रबंध निदेशकों को घर खरीदारों और अन्य लोगों के साथ कथित धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया था। ईडी में अपनी जांच कर रही थी, उसी दौरान एसीबी परमार और एक अन्य व्यक्ति के बीच व्हाट्सएप चैट के कुछ स्क्रीनशॉट मिले, जिसमें वह एम3एम मालिकों को ईडी के मामलों में मदद करने के लिए 5 से 7 करोड़ रुपये की मांग कर रहे थे।  इसी चैट में दूसरा व्यक्ति कहता है कि आईआरईओ मामले में सुधीर परमार को पहले ही 5 करोड़ रुपये दे चुका है। उसके बाद एसीबी ने सुधीर परमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। उन पर यह भी आरोप है कि रिश्वत के पैसे से उन्होंने गुरुग्राम में प्रॉपर्टी भी खरीदी थी। बाद में इस मामले की जांच ईडी ने अपने हाथ में ले ली और सुधीर परमार के घर में छापे मारकर उन्हें गिरफ्तार किया। उसके बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था।  

अदालत का सख्त फरमान: दरगाहों में CCTV कैमरे का विरोध पड़ेगा भारी

अजमेर अजमेर की विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा गरीब नवाज दरगाह परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगाने का विरोध करने वालों पर अब कानूनी शिकंजा कसेगा। सिविल न्यायाधीश कनिष्ठ खंड एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग (अजमेर पश्चिम) मनमोहन चंदेल ने दरगाह नाजिम को आदेश जारी करते हुए कहा कि परिसर में हर संभावित जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति या समूह इसका विरोध करता है तो उनके खिलाफ कलेक्टर और एसपी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें। दरअसल, दरगाह के आस्ताना में खिदमत की बारी को लेकर खादिमों के बीच हुए विवाद के मामले में अदालत ने नाजिम से संबंधित जगह की सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करने को कहा था, लेकिन नाजिम ने अदालत को बताया कि उस क्षेत्र में कैमरे नहीं लगे हैं, इसलिए फुटेज उपलब्ध नहीं है। अदालत ने इस तथ्य को गंभीरता से लेते हुए दरगाह में तत्काल कैमरे लगाने के निर्देश जारी किए। अदालत ने नाजिम को यह भी विकल्प दिया कि यदि वे दरगाह कमेटी के खर्चे पर कैमरे लगाना चाहते हैं तो पांच दिन के भीतर कलेक्टर और एसपी को लिखित याचिका देकर उनसे सहयोग मांग सकते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि कैमरों का संचालन दरगाह कमेटी को नियमानुसार करना होगा। फैसले में अदालत ने कहा कि दरगाह परिसर में कैमरे लगाने का विरोध स्वार्थवश किया जाता है, जबकि भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों पर सुविधा और सुरक्षा की दृष्टि से कैमरे जरूरी हैं। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में सीसीटीवी फुटेज विवादों के समाधान में बेहद मददगार साबित होते हैं। इसलिए कलेक्टर और एसपी से अपेक्षा की जाती है कि वे दरगाह कमेटी की मदद करें और विरोध करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करें। गौरतलब है कि अजमेर दरगाह में 2007 से सीसीटीवी कैमरे लगाए जा रहे हैं। फिलहाल परिसर के करीब 75 प्रतिशत हिस्से को 57 कैमरों से कवर किया गया है। लेकिन आस्ताना सहित 25 प्रतिशत एरिया अब भी कैमरों की पहुंच से बाहर हैं। केंद्र सरकार ने सुरक्षा कारणों से आस्ताना में भी कैमरे लगाने की कवायद शुरू की थी, मगर दरगाह के एक बड़े पक्ष द्वारा इसका विरोध किया गया। अब अदालत के सख्त रुख के बाद दरगाह परिसर में शेष हिस्सों, विशेषकर आस्ताना में, सीसीटीवी लगाने का रास्ता साफ हो गया है। केंद्र सरकार भी आगामी 814वें उर्स से पहले दरगाह में सुरक्षा इंतजामों को पुख्ता करने की दिशा में कदम उठा रही है। अदालत के इस आदेश से स्पष्ट है कि दरगाह परिसर में सीसीटीवी कैमरों की स्थापना अब टाली नहीं जा सकेगी और विरोध करने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

प्रदेश के सबसे लंबे ब्रिज से झांकना अब नहीं चलेगा! हाईकोर्ट ने दिए निगरानी के आदेश, अधिवक्ता अलका सिंह ने उठाया मुद्दा

जबलपुर  प्रदेश के सबसे लंबे फ्लाईओवर की लैंडिंग व व्यवस्थाओं के संबंध में दायर जनहित याचिका पर सोमवार को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मदन महल से दमोह नाका के बीच बने फ्लाईओवर पर चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच को सरकार की ओर से आश्वासन दिया। कहा-फ्लाईओवर के ऊपर, एंट्री-एक्जिट पॉइंट्स पर संकेतक लगाए जाएंगे। व्यवस्था बनाने पर्याप्त बल भी तैनात किया जाएगा। व्यू कटर लगाने पर विचार होगा अतिरिक्त महाधिवक्ता एचएस रूपराह ने कहा, फ्लाईओवर पर शोर का प्रभाव आसपास के लोगों पर न हो, इसलिए व्यू कटर लगाने की संभावनाओं पर विचार होगा। कोर्ट ने आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया। त्योहार में भीड़ को देखते हुए जल्द कार्रवाई के निर्देश के साथ कोर्ट ने याचिका निराकृत कर दी। एमपीके वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने  खबरों की कटिंग्स कोर्ट (MP High Court) को दिखाई। फ्लाईओवर पर बस के गलत साइड से चलने व कार दुर्घटना की खबर थी। तर्क दिया-फ्लाईओवर के दोनों किनारों पर ग्रेटर नोएडा जैसे व्यू कटर लगाए जाएं, ताकि लोग ध्वनि प्रदूषण से बच सकें। लैंडिंग्स के आगे यू टर्न बनाए जाएं। बता दें कि अधिवक्ता अलका सिंह ने याचिका लगाई थी। अनैतिक गतिविधियों की भी की थी शिकायत। जिसमें कहा गया था यहां लोग वाहन रोकते हैं और ब्रिज के नीचे की ओर आसपास बने घरों में ताक-झांक करते हैं। कहा-लैंडिंग खतरनाक है, व्यू कटर का न होने से ब्रिज के आसपास रहने वालों की निजता का उल्लंघन हो रहा है। 

हाईकोर्ट का फैसला: पति के लिए आपत्तिजनक भाषा और अलगाव की जिद को माना मानसिक अत्याचार

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पत्नी द्वारा पति को ‘पालतू चूहा’ कहने और ससुराल के माता-पिता से अलग रहने की जिद को मानसिक क्रूरता करार दिया है. अदालत ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखते हुए पति को तलाक की मंजूरी दे दी. साथ ही, पत्नी को 5 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता और बेटे के लिए मासिक भत्ता देने का आदेश दिया है. मामला एक दंपती का है, जहां पत्नी ने पति पर मानसिक प्रताड़ना के आरोप लगाए थे, लेकिन हाईकोर्ट ने पत्नी के व्यवहार को ही क्रूरता माना. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा, भारतीय संयुक्त परिवार व्यवस्था में पति को माता-पिता से अलग करने की जिद रखना स्पष्ट रूप से मानसिक क्रूरता है. न्यायमूर्ति ने जोर देकर कहा, पारंपरिक परिवार संरचना में ऐसी मांगें वैवाहिक संबंधों को तोड़ने का आधार बन सकती हैं. फैमिली कोर्ट का फैसला सही फैमिली कोर्ट ने पहले ही पति की याचिका पर तलाक मंजूर किया था, लेकिन पत्नी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी. सुनवाई के दौरान पति ने दावा किया कि पत्नी का अपमानजनक व्यवहार और अलग रहने की जिद ने उनके जीवन को नर्क बना दिया. अदालत ने सबूतों की जांच के बाद फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया. यह फैसला वैवाहिक विवादों में मानसिक क्रूरता की परिभाषा को विस्तार देता है. पीड़ित पतियों को राहत मिलेगी! कानूनी विशेषज्ञों का मानना है हाईकोर्ट के इस फैसले से पतियों को राहत मिलेगी, जो पत्नियों के ऐसे व्यवहार से परेशान हैं. वहीं, इस मामले में पत्नी को गुजारा भत्ता देने का आदेश देकर अदालत ने आर्थिक न्याय भी सुनिश्चित किया. मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद पति ने राहत की सांस ली.

शादी का वादा और सहमति से संबंध पर FIR नहीं टिकेगी, हाई कोर्ट ने युवक पर केस किया रद्द

 चडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि दो वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध को केवल इस कारण दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता कि अंततः विवाह नहीं हो पाया। अदालत ने हरियाणा के एक युवक के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म के मामले में एफआईआर रद्द कर दी। जस्टिस कीर्ति सिंह की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी महिला की सहमति विवाह के झूठे वादे पर ली गई थी यह साबित करना है तो यह दिखाना आवश्यक है कि आरोपी की शुरू से ही शादी करने की कोई मंशा नहीं थी और उसने केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए झूठा वादा किया। मामले में शिकायतकर्ता महिला और युवक की सगाई हो चुकी थी। दोनों लंबे समय तक रिश्ते में रहे और रोका समारोह भी संपन्न हुआ था। यहां तक कि नवंबर 2024 की शादी की तारीख भी तय कर दी गई थी। लेकिन बाद में दोनों परिवारों में मतभेद उभर आए और विवाह नहीं हो सका। इसके बाद युवती ने युवक पर दुष्कर्म का मामला दर्ज करा दिया।  हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों ही शिक्षित और परिपक्व वयस्क थे और शुरू से ही संबंध सहमति से बने थे। यह भी सामने आया कि विवाह न होने का कारण केवल दोनों परिवारों के बीच उत्पन्न मतभेद थे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि केवल विवाह का वादा पूरा न होने से दुष्कर्म का मामला नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखाधड़ी करने की थी।  कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह मामला इस बात का उदाहरण है जब एक सहमति आधारित संबंध, अपेक्षा अनुसार विवाह में परिणत न होने पर आपसी रंजिश का शिकार बन गया और उसे आपराधिक रंग दे दिया गया। ऐसा दुरुपयोग न्यायालयों द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस आधार पर अदालत ने आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी। 

हाईकोर्ट का फैसला: दोबारा विवाह करने पर तलाक आदेश पर नहीं कर सकते आपत्ति

जबलपुर   हाईकोर्ट ने अपने अहम आदेश में कहा है कि पुनर्विवाह हो जाने के बाद विवाह विच्छेद आदेश को चुनौती देने वाली अपील प्रचलन योग्य नहीं है। अपील निर्धारित समय सीमा में दायर की जाती तो सुनवाई योग्य थी। हाईकोर्ट जस्टिस विशाल धगट तथा जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने अपील को खारिज करते हुए अपने आदेश में कहा है कि सुनवाई करने से तीसरे पक्ष के वैवाहिक नागरिक अधिकार खतरे में पड़ सकता है। नरसिंहपुर निवासी रजनी पटेल की तरफ से दायर अपील में कुटुम्ब न्यायालय जबलपुर के द्वारा 24 जून 2022 को पारित विवाह विच्छेद आदेश को चुनौती दी गयी थी। युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अपीलकर्ता ने तलाक के आदेश को चुनौती देते हुए 6 दिसम्बर 2022 को अपील दायर की थी। अपीलकर्ता ने निर्धारित अवधि के 130 दिन बाद आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की है। प्रतिवादी ने अपील की निर्धारित अवधि पूर्ण होने के बाद 28 अक्तूबर 2022 को पुनर्विवाह कर लिया है। अपीलकर्ता निर्धारित समय अवधि में अपील दायर करती तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत पुनर्विवाह पर प्रतिबंध का प्रावधान था। प्रतिवाद ने अपील दायर करने की निर्धारित समय सीमा पूर्ण होने के बाद वैध रूप से पुनर्विवाह किया है। समय अवधि के लिए क्षमादान प्रदान करने के बावजूद भी अपील में गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने के प्रतिकूल प्रभाव होंगे। इससे तीसरे पक्ष के वैवाहिक नागरिक अधिकार खतरे में पड़ेंगे। युगलपीठ ने अपील को खारित करते हुए निचली अदालत के समक्ष भरण-पोषण के लिए आवेदन प्रस्तुत करने अपीलकर्ता को स्वतंत्रता प्रदान की है।