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हाई कोर्ट ने कहा मौलिक अधिकारों का हनन, पीजी मेडिकल में डोमिसाइल आरक्षण खत्म

बिलासपुर पीजी मेडिकल में प्रवेश के संबंध में छत्तीसगढ़ में स्थायी निवास आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका पर चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। बेंच ने स्थायी निवास आधारित आरक्षण को असंवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया है। याचिकाकर्ता डॉ. समृद्धि दुबे ने सीनियर एडवोकेट राजीव श्रीवास्तव, अधिवक्ता संदीप दुबे, मानस वाजपेयी और कैफ अली रिजवी के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें छत्तीसगढ़ मेडिकल पोस्ट ग्रेजुएट प्रवेश नियम 2025 के नियम 11(बी) को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करने के कारण असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी। डॉ. समृद्धि दुबे ने अपनी याचिका में बताया कि वह छत्तीसगढ़ राज्य की स्थायी निवासी है। उनके माता-पिता छत्तीसगढ़ राज्य के स्थायी निवासी हैं। वर्ष 2018 में एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा के आधार पर वीएमकेवी मेडिकल कॉलेज सेलम आवंटित किया गया। एमबीबीएस कोर्स पूरा कर अनिवार्य रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप भी पूरी की। इसके बाद स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए उसने नीट (पीजी) परीक्षा 2025 में शामिल होने आवेदन किया और प्रवेश कार्ड प्राप्त किया। परीक्षा तीन अगस्त को हुई। परीक्षा उत्तीर्ण की और अखिल भारतीय रैंक 75068 प्राप्त की। परिणाम को देख याचिकाकर्ता प्रवेश पाने के लिए पात्र है। नियम पांच की वैधानिकता को दी गई थी चुनौती राज्य सरकार ने अधिसूचना 2021 द्वारा स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश के उद्देश्य से चिकित्सा महाविद्यालयों के स्नात्कोत्तर पथ्यक्रमों में प्रवेश अधिनियम, 2002 के तहत प्रवेश नियम 2021 नामक नियम बनाए हैं। उस समय पीजी प्रवेश नियम 2021 लागू था, जो चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश का प्रविधान करता है। पुराने नियम में एनआरआइ छात्रों के प्रवेश के लिए पात्रता की अतिरिक्त शर्तें" प्रदान करता है। नियम 5 अपात्रता प्रदान करता है, नियम 6 से 8 "सीटों का आरक्षण" प्रदान करता है। नियम 11(ए) में प्रविधान है कि राज्य कोटे में सीटों पर प्रवेश पहले उन उम्मीदवारों को दिया जाएगा, जिन्होंने राज्य में स्थित मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की है या जो सेवारत उम्मीदवार हैं। नियम 11(बी) में प्रविधान है कि यदि नियम 11 के उपनियम (बी) में उल्लिखित सभी पात्र उम्मीदवारों को प्रवेश देने के बाद सीटें खाली रहती हैं, तो उन रिक्त सीटों पर ऐसे उम्मीदवारों को प्रवेश दिया जाएगा, जिन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के बाहर स्थित मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री की है। राज्य सरकार की ओर से पेश की गईं ये दलीलें राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए उप-महाधिवक्ता शशांक ठाकुर ने कहा कि इससे पहले प्रवेश नियम, 2021 लागू थे और प्रवेश नियम, 2021 के नियम 11 (ए) और 11 (बी) छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित मेडिकल कॉलेज में राज्य कोटे की सीटों पर पीजी पाठ्यक्रमों में प्रवेश के संबंध में वरीयता से संबंधित थे। यह प्रस्तुत किया गया है कि नियम 2021 के नियम 11 (बी) में अधिवास के आधार पर उम्मीदवारों को वरीयता प्रदान करने के संबंध में प्रविधान था। हालांकि प्रवेश नियम 2025 में अधिवास के आधार पर उक्त वरीयता को हटा दिया गया है क्योंकि प्रवेश नियम 2025 के नियम 11 (बी) में ऐसी शर्तें या प्रविधान नहीं थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय मेमोरियल हेल्थ सेंटर और आयुष विश्वविद्यालय, छत्तीसगढ़ के तहत कुल 10 सरकारी मेडिकल कॉलेज और चार निजी मेडिकल कॉलेज मान्यता प्राप्त हैं। आयुष विश्वविद्यालय के जरिए मेडिकल कॉलेजों में उम्मीदवारों को प्रवेश दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया गया हवाला अधिवक्ता राजीव श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा ऐसी आरक्षण की अनुमति दी जाती है तो यह मौलिक अधिकारों का हनन होगा, जिनके साथ केवल इस आधार पर असमान व्यवहार किया जा रहा है कि वे संघ के एक अलग राज्य से हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 14 में समानता का उल्लंघन होगा और कानून के समक्ष समानता से इन्कार के समान है।

सुप्रीम कोर्ट की सिफारिश: लग्ज़री पेट्रोल-डीजल वाहनों पर पाबंदी, EV नीति होगी सख्ती से लागू

नई दिल्ली Ban on Luxury Petrol-Diesel Cars: दिल्ली की हवा जब नवंबर आते-आते धुएँ की चादर ओढ़ लेती है, तब सिर्फ इंसान नहीं, नीतियों की भी सांस फूलने लगती है. ऐसे वक्त में सुप्रीम कोर्ट का एक सुझाव ने देश के लग्जरी कार के मालिकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. अदालत का कहना है अब समय आ गया है कि लग्ज़री पेट्रोल-डीजल लग्जरी कारें धीरे-धीरे सड़क से हटाई जाएं. सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव देते हुए कहा है कि, पेट्रोल और डीजल से चलने वाली लग्जरी कारों पर चरणबद्ध तरीके से प्रतिबंध लगाने पर विचार होना चाहिए. यह सुझाव उस समय आया है जब देश इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की दिशा में तेज़ी से बढ़ तो रहा है, लेकिन लग्ज़री सेगमेंट में अब भी ज़्यादातर लोग पारंपरिक इंजन वाली (पेट्रोल-डीजल) कारों को ही प्राथमिकता देते हैं. यह सुझाव सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन की याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसका प्रतिनिधित्व वकील प्रशांत भूषण कर रहे थे. याचिका में मांग की गई है कि सरकार की मौजूदा ईवी नीतियों को ज़मीन पर सख्ती से लागू किया जाए, ताकि इलेक्ट्रिक वाहनों को वास्तव में बढ़ावा मिल सके. क्या है कोर्ट का सुझाव? 13 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की बेंच ने कहा कि, शुरुआत लग्ज़री इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) यानी पेट्रोल-डीजल से चलने वाले वाहनों पर पाबंदी से हो सकती है. अदालत के मुताबिक, बड़ी इलेक्ट्रिक कारें अब आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हीं सुविधाओं के साथ आती हैं जिन्हें VIP और बड़े कॉरपोरेट घराने अपने वाहन चुनते समय देखते हैं. ऐसे में इन लग्जरी मॉडलों को चरणबद्ध तरीके से हटाने से आम जनता प्रभावित नहीं होगी. बेंच ने यह भी सुझाव दिया कि बड़े महानगरों में पायलट प्रोजेक्ट चलाकर लोगों को पेट्रोल-डीजल वाहनों के बजाय EV की ओर प्रोत्साहित किया जा सकता है. बेंच का कहना है कि जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ेगी वैसे ही चार्जिंग स्टेशनों की मांग भी बढ़ेगी. साथ ही चार्जिंग इंफ्रा को बेहतर होनी शुरू हो जाएगी. क्या समीक्षा लायक हो चुकी है EV पॉलिसी सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहन नीतियों पर केंद्र सरकार के 13 मंत्रालय काम कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को सभी नीतियों, नोटिफिकेशन और डेवलपमेंट की एक विस्तृत रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया है. अदालत ने यह भी पूछा कि क्या मौजूदा EV पॉलिसी, जो 5 साल से अधिक पुरानी हैं, अब समीक्षा लायक हो चुकी हैं. अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी, जिसमें विस्तृत रिपोर्ट पेश की जानी है. लग्जरी इलेक्ट्रिक कारों की मांग भारत में लग्जरी सेगमेंट में इलेक्ट्रिक (EV) की हिस्सेदारी लगभग 12 प्रतिशत तक पहुँच चुकी है, जबकि आम बाजार में यह सिर्फ 2–3 प्रतिशत है. यही वजह है कि इस वित्त वर्ष की पहली छमाही में BMW और Mercedes-Benz जैसी कंपनियों ने जबरदस्त इलेक्ट्रिक कार बिक्री दर्ज की है. दिलचस्प बात यह है कि 1 करोड़ रुपये से ऊपर की इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ भी अब पहले से कहीं तेज़ी से बिक रही हैं. यानी ऐसे लोग जो वाहन पर ज्यादा पैसा खर्च करने में सक्षम है वो इलेक्ट्रिक कारों को एक बेहतर विकल्प के तौर पर देख रहे हैं.  टॉप 5 लग्ज़री कार ब्रांड्स की सालाना बिक्री (यूनिट में) क्रम         ब्रांड            वित्त वर्ष 24                 वित्त वर्ष 25 1.     मर्सिडीज-बेंज        18,123                    18,928 2.       बीएमडब्ल्यू           15,420                15,995 3.     जगुआर लैंडरोवर      4,436                   6,183 4.      ऑडी                    7,049                  5,993 5.     वोल्वो                    2,150                   1,750 इन आंकड़ों से साफ दिखता है कि वित्त वर्ष 25 में मर्सिडीज-बेंज और बीएमडब्ल्यू की बिक्री में बढ़ोतरी हुई है, जबकि ऑडी और वोल्वो की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है. जगुआर लैंडरोवर ने सबसे अधिक तेजी दिखाई है और FY24 के मुकाबले FY25 में अच्छी ग्रोथ हासिल की है. कुल मिलाकर, मार्केट में जर्मन ब्रांड्स का दबदबा कायम है और Mercedes-Benz अभी भी लग्ज़री सेगमेंट की सबसे अधिक बिकने वाली कार ब्रांड बनी हुई है. कितनी कारों पर पड़ेगा असर भारत में पैसेंजर व्हीकल सेग्मेंट में लग्ज़री कारों का मार्केट शेयर बहुत ही कम है. ये देश में बेची वाली कुल कारों का तकरीबन 1% है. जो साल 2030 तक बढ़कर 4-5% पहुंचने की उम्मीद है. लग्ज़री कारों की मार्केट प्रेजेंस का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि, बीते अक्टूबर में टाटा नेक्सन बेस्ट सेलिंग कार बनी और इसके कुल 22,083 यूनिट बेचे गए थे. जो मर्सिडीज-बेंज की सालान बिक्री (18,928) से भी ज्यादा है. खैर, 37-38.8%. मार्केट शेयर के साथ मर्सिडीज-बेंज लग्ज़री कार सेग्मेंट की लीडर बनी हुई है. दूसरी ओर तकरीबन 32% बाजार पर बीएमडब्ल्यू का कब्ज़ा है. जगुआर और ऑडी के बीच थर्ड पोजिशन को लेकर खींचतान जारी है, जिसमें FY25 में जगुआर आगे है. वाहनों के इस बिक्री के आंकड़ों में इन ब्रांड्स के इलेक्ट्रिक वाहन भी शामिल हैं.  ये कार ब्रांड्स होंगे प्रभावित अगर यह प्रतिबंध लागू होता है तो इसका सीधा असर उन लग्ज़री कार ब्रांड्स के खरीदारों पर पड़ेगा जो इलेक्ट्रिक विकल्प होने के बावजूद पेट्रोल या डीजल वाली लग्जरी कारें चुनते हैं. भारत में कई लग्जरी ब्रांड अपने इलेक्ट्रिक मॉडल बेच रहे हैं, लेकिन ग्राहकों का बड़ा हिस्सा अब भी पुराने पावरट्रेन को ही तरजीह देता है. ऐसे में यह बदलाव पूरी तरह इलेक्ट्रिक विकल्पों की ओर धकेल सकता है और कंपनियों को अपने पोर्टफोलियो में बदलाव करने पड़ सकते हैं. इस सुझाव पर अमल किया जाता है तो, इससे मर्सिडीज-बेंज, बीएमडब्ल्यू, जगुआर लैंडरोवर और ऑडी जैसे ब्रांड्स सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. हालांकि इन ब्रांड्स ने भी इंडियन मार्केट में इलेक्ट्रिक कारों का पोर्टफोलियो बढ़ाना शुरू कर दिया है. लेकिन अभी भी महंगी और लग्ज़री कार खरीदारों के बीच पेट्रोल-डीजल … Read more

हाथियों की मौत पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से शपथ पत्र में मांगा जवाब

 बिलासपुर  पानी भरे गड्‌ढे में गिरने के बाद कीचड़ में फंसकर हाथियों की मौत के मामले में मंगलवार को हाईकोर्ट सुनवाई हुई। शासन ने अपने प्रस्तुत जवाब में बताया कि प्रदेश के वन क्षेत्र में 20 हजार खुले गड्‌ढे और कुएं हैं। कोर्ट ने इनसे वन्य प्राणियों को बचाने के लिए किए जा रहे उपायों की जानकारी शपथपत्र में देने के निर्देश दिए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट कमिश्नर ने डिवीजन बेंच को बताया कि हाल ही में बलौदाबाजार जिले के बार नवापारा अभयारण्य के ग्राम हरदी में भी तीन हाथी और उनका शावक सूखे कुएं में गिर गए थे, जिन्हें जेसीबी के मदद से निकाला गया था। हाईकोर्ट ने पूछा कि ऐसे सूखे कुओं और गड्ढों की कवरिंग के लिए क्या कर रहे हैं? 15 दिसम्बर की सुनवाई में शासन को नए शपथपत्र में जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं। रायगढ़ वन क्षेत्र के पानी भरे गड्‌ढे में हाथी शावक की डूबकर मौत हो गई थी। हाईकोर्ट ने पिछले माह संज्ञान लेकर कहा कि सरकार को इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम उठाने चाहिए। इसके लिए निरीक्षण, निगरानी और त्वरित उपचारात्मक कदम उठाने होंगे। कोर्ट के नोटिस के बाद राज्य सरकार की ओर से पिछली सुनवाई में कहा गया था कि भविष्य में ऐसी किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कदम उठाए जाएंगे। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि वन विभाग के पास ऐसे जल निकायों की व्यवस्थित निगरानी और जोखिम-मानचित्रण तंत्र का अभाव है। क्षेत्रीय कर्मचारी, विशेष रूप से बीट और रेंज स्तर पर, अक्सर अपर्याप्त संसाधनों के साथ ऐसी आपात स्थितियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देने में असमर्थ होते हैं। हाथियों के बच्चों की बार-बार होने वाली मौतें वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में एक दुखद कमी को उजागर करती है।

भ्रष्टाचार मामले में बड़ी कार्रवाई: मेहुल चोकसी की संपत्तियां होंगी नीलाम

अहमदाबाद 23 हजार करोड़ के पीएनबी घोटाले के आरोपी मेहुल चौकसी की 13 संपत्तियों की नीलामी की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होने वाली है। पीएमएलए अदालत ने 46 करोड़ रुपये की कंपनियों की नीलामी की इजाजत दे दी है। इनमें बोरीवली का एक फ्लैट (कीमत 2.6 करोड़ रुपये), बीकेसी में भारत डायमंड बोर्स और कार पार्किंग का स्पेस (कीमत 19.7 करोड़), गोरेगांव की 6 फैक्ट्रियां (18.7 करोड़), चांदी की ईंटें, कीमती रत्न और कंपनी की कई मशीनें शामिल हैं। विशेष जज एवी गुजराती ने कहा, अगर इन संपत्तियों के ऐसा ही पड़ा रहने दिया जाता है तो इनकी कीमत घटती ही चली जाएगी। इसलिए उन्हें तुरंत नीलाम करना जरूरी है। जज ने कहा कि लिक्विडेटर को फिर से प्रॉपर्टी का वैल्युएशन करवाने का अधिकार है। इसके बाद संपत्तियों की नीलामी की जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि लिक्विडेटर इससे प्राप्त राशि को जमा करने के लिए आईसीआईसीआई बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट कर सकता है। बता दें कि एनसीएलटी ने 7 फरवरी 2024 को लिक्विडेटर की नियुक्ति की थी। इसके बाद कोर्ट ने नीरव मोदी और चोकसी की संपत्तियों की कीमत निर्धारित करने को अनुमति दे दी थी। बता दें कि इस समय नीरव मोदी यूके की जेल में है और चोकसी बेल्जियम की जेल में है। बेल्जियम के सुप्रीम कोर्ट पहूंचा मेहुल चोकसी मेहुल चोकसी ने बेल्जियम के सुप्रीम कोर्ट में 17 अक्टूबर को एंटवर्प की अपीलीय अदालत के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें भारत के प्रत्यर्पण अनुरोध को ‘लागू करने योग्य’ करार दिया गया था। अधिकारियों ने सोमवार को यह जानकारी दी। एंटवर्प स्थित अपीलीय अदालत के सरकारी अभियोजक ने कहा कि चोकसी ने 30 अक्टूबर को ‘कोर्ट ऑफ कैसेशन’ (उच्चतम न्यायालय) में अपील दायर की थी। महाधिवक्ता केन विटपास ने जवाब में कहा, “यह अपील पूरी तरह से कानूनी तथ्यों तक सीमित है और इसका निर्णय शीर्ष अदालत द्वारा किया जाएगा। इस प्रक्रिया के दौरान, प्रत्यर्पण की प्रक्रिया निलंबित रहेगी।” 17 अक्टूबर को एंटवर्प की अपीलीय अदालत के चार सदस्यीय अभियोग कक्ष ने जिला अदालत के प्री-ट्रायल कक्ष द्वारा 29 नवंबर 2024 को जारी आदेशों में कोई खामी नहीं पाई। अदालत ने मुंबई की विशेष अदालत द्वारा मई 2018 और जून 2021 में जारी गिरफ्तारी वारंटों को ‘लागू करने योग्य’ करार दिया, जिससे मेहुल चोकसी के प्रत्यर्पण का मार्ग प्रशस्त हो गया। अपीलीय अदालत ने फैसला सुनाया कि 13,000 करोड़ रुपये के पीएनबी घोटाले के मुख्य आरोपी भगोड़े चोकसी को भारत प्रत्यर्पित किए जाने पर निष्पक्ष सुनवाई से वंचित किए जाने या दुर्व्यवहार का सामना किए जाने का “कोई खतरा” नहीं है। सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में आरोप लगाया है कि 13,000 करोड़ रुपये के घोटाले में अकेले चोकसी ने 6,400 करोड़ रुपये की हेराफेरी की है। घोटाले का पता चलने से कुछ दिन पहले जनवरी 2018 में एंटीगुआ और बारबुडा भाग गए चोकसी को बेल्जियम में देखा गया, जहां वह कथित तौर पर इलाज कराने के लिए पहुंचा था। भारत ने मुंबई की विशेष अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट के आधार पर 27 अगस्त, 2024 को बेल्जियम को प्रत्यर्पण अनुरोध भेजा। भारत ने चोकसी की सुरक्षा, भारत में मुकदमे के दौरान उसके सामने आने वाले आरोपों, जेल व्यवस्था, मानवाधिकारों और चिकित्सा आवश्यकताओं के संबंध में बेल्जियम को कई आश्वासन दिए हैं।

अमित शाह पर टिप्पणी मामले में राहुल गांधी की सुनवाई टली, अगली तारीख 17 नवंबर तय

सुल्तानपुर एमपी-एमएलए कोर्ट में रायबरेली सांसद राहुल गांधी के मानहानि मामले की सुनवाई गुरुवार को स्थगित हो गई। राहुल गांधी के अधिवक्ता काशी प्रसाद शुक्ला ने बताया कि एक अधिवक्ता के निधन के कारण आज कोर्ट में कंडोलेंस था। अब इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। यह मामला वर्ष 2018 का है। कोतवाली देहात के हनुमानगंज निवासी भाजपा नेता विजय मिश्रा ने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया था। विजय मिश्रा का आरोप है कि 2018 में कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर अभद्र टिप्पणी की थी। पांच साल तक चली अदालती कार्यवाही के दौरान राहुल गांधी के पेश न होने पर दिसंबर 2023 में तत्कालीन जज ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया था। इसके बाद, फरवरी 2024 में राहुल गांधी ने कोर्ट में आत्मसमर्पण किया। विशेष मजिस्ट्रेट ने उन्हें 25-25 हजार रुपये के दो मुचलकों पर जमानत दी। 26 जुलाई 2024 को राहुल गांधी ने कोर्ट में अपना बयान दर्ज कराया, जिसमें उन्होंने खुद को निर्दोष बताया और इसे राजनीतिक साजिश करार दिया। इसके बाद कोर्ट ने वादी को साक्ष्य प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था तब से लगातार गवाह पेश किए जा रहे हैं। अब तक केवल एक गवाह से जिरह पूरी हो पाई है जबकि दूसरे गवाह से जिरह शुरू हुई है। अक्सर हड़ताल और गवाहों के अनुपस्थित रहने के कारण कार्यवाही में देरी हो रही है।

बुजुर्ग विधवा मामले में HC का फैसला, बेटे की गवाही न मानकर आरोपी को किया बरी

तिरुवनंतपुरम बुजुर्ग महिला के बलात्कार और हत्या के मामले में मौत की सजा काट रहे शख्स को केरल हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि पीड़िता के मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे की तरफ से सबूत दिया गया था, जिसपर अभियोजन पक्ष काफी निर्भर था। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता का बेटा गवाही देने में सक्षम नहीं था और ऐसे में इस सबूत को शामिल नहीं किया जा सकता। साल 2018 में परिमल साहू को ट्रायल कोर्ट ने 60 साल की विधवा के बलात्कार और हत्याकांड में दोषी पाया था। अभियोजन पक्ष का कहना है कि परिमल ने बुजुर्ग महिला को बेरहमी से पीटा, रेप किया और फिर हत्या कर दी थी। वारदात के समय पीड़िता अपने बेटे के साथ रह रही थी। जबकि, परिमल पीड़िता के घर के पास उसी परिसर में रहता था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िता के रिश्तेदार के बयान के आधार पर FIR दर्ज की गई थी। रिश्तेदार का कहना था कि जब वह घर पहुंचा, तो पीड़िता के बेटे ने बताया कि मुन्ना (परिमल) ने उसकी मां के सिर पर पत्थर मारा, कमरे में घसीट कर ले गया और वहां उसपर हमला किया। रिपोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष का मामला मुख्य रूप से बेटे की गवाही पर आधारित था। कोर्ट ने पाया कि डॉक्टर ने कहा है कि बेटे की मानसिक उम्र साढ़े सात साल है। जबकि, उसकी उम्र 35 साल है। इसके बाद भी ट्रायल कोर्ट ने voir dire टेस्ट नहीं कराया। कोर्ट ने कहा, 'voir dire टेस्ट का नहीं कराया जाना PW4 (बेटे) के गवाही के देने की क्षमता और विश्वसनीयता के बारे में गंभीर संदेह पैदा करता है। खासतौर से तब जब PW4 जैसे गवाहों को सिखाया पढ़ाया जा सकता है।' हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया है कि voir dire टेस्ट का नहीं होना गवाही को खारिज करने के लिए हमेशा पर्याप्त कारण नहीं होता, लेकिन ट्रायल कोर्ट और अपील कोर्ट की जिम्मेदारी है कि गवाही की सावधानी से जांच करें। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि पीड़िता का बेटा मुख्य परीक्षा में गवाही देने में सक्षम था, लेकिन क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान वह साधारण सवालों के भी ठीक जवाब नहीं दे सका। कोर्ट ने कहा कि इससे संकेत मिलते हैं कि बेटे को सिखाया गया है। अभियोजन पक्ष का दावा है कि परिमल के हाथों पर बचाव के जख्मों के निशान थे, जो संकेत देते हैं कि पीड़िता ने संघर्ष किया होगा। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता पर परिमल के कोई स्किन सेल नहीं मिले और जुटाए गए अन्य सबूत भी डीएनए टेस्टिंग के लिए पर्याप्त नहीं है। मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस एके जयशंकरन नाम्बियार और जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने परिमल को बरी कर दिया।

पति रास्ते में बना रोड़ा, पत्नी ने प्रेमी संग की हत्या — अदालत ने सुनाई आजीवन कारावास

सूरजपुर छत्तीसगढ़ में सूरजपुर तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश न्यायालय ने पति की हत्या मामले में पत्नी और उसके प्रेमी को कठोर सजा सुनाई है. अवैध संबंध के शक गहराने पर आए दिन विवाद होने के कारण वारदात को अंजाम दिया गया था. कोर्ट ने दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. साथ ही सश्रम कारावास और 10-10 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया है.   दरअसल, सूरजपुर थाना के ग्राम नमदगिरी में साल 2024 के 3 जनवरी को सुनील देवांगन के गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. जिसमें बताया गया था कि वह 2 जनवरी (2024) को शाम 7 बजे घुमने निकला लेकिन वापन नहीं लौटा. अगली सुबह खेत में लाश मिली. शार्ट पीएम रिपोर्ट में मृत्यु की प्रकृति हत्या की बात सामने आने के बाद पुलिस ने अपराध क्रमांक 04/2024 धारा 302 भादवि. का पंजीबद्ध कर जांच शुरू की. पुलिस की जांच में डॉग स्क्वाड की सहायता ली गई, जिसमें डॉग मास्टर ने मृतक सुनील देवांगन के कमरे और उसकी पत्नी लक्ष्मी देवांगन की ओर संकेत किया. मुखबिरों से भी मिली जानकारी मृतक की पत्नी लक्ष्मी देवांगन और रामकुमार के बीच संबंध होने की बात सामने आई. इस लीड पर पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई. लक्ष्मी देवांगन से पूछताछ की गई, जिसमें उसने अपना जुर्म स्वीकार किया. उसने पुलिस को बताया कि उसका रामकुमार से संबंध था और जब उसके पति सुनील को इस बात का शक हुआ. उसके और पति के बीच झगड़ा होने लगा. इसके बाद लक्ष्मी और रामकुमार ने मिलकर सुनील की हत्या की साजिश रची और गमछे से उसका गला दबाकर उसकी जान ले ली. हत्या के बाद दोनों ने शव को कुछ दूरी पर स्थित खेत में ले जाकर लिटा दिया. पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश न्यायालय, सूरजपुर में प्रस्तुत किया गया. जहां से दोनों आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी है.

नवजात के सीने पर लिखी शर्मनाक जानकारी, हाई कोर्ट ने स्वास्थ्य अधिकारियों को लगाई फटकार, परिजनों को मुआवजा

बिलासपुर   छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राजधानी रायपुर के डा. भीमराव आंबेडकर अस्पताल में नवजात शिशु के सीने पर 'इसकी मां एचआइवी पाजिटिव है' लिखी तख्ती लगाने की घटना को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इसे अमानवीय और असंवेदनशील कृत्य बताते हुए राज्य सरकार को नवजात के माता-पिता को दो लाख का मुआवजा चार सप्ताह के भीतर देने का आदेश दिया है। यह आदेश मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने मंगलवार को दिया। अदालत ने इस मामले को स्वतः संज्ञान में लेकर सुनवाई की थी। क्या है मामला? एक खबर प्रकाशित हुई थी कि रायपुर के अंबेडकर अस्पताल में एक नवजात के सीने के पास तख्ती लगाई गई थी, जिस पर लिखा था 'इसकी मां एचआइवी पाजिटिव है।' यह दृश्य देखकर पिता व स्वजन रो पड़े थे। खबर सामने आने के बाद हाई कोर्ट ने तत्काल मामले का संज्ञान लिया और मुख्य सचिव को जांच कर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। मुख्य सचिव ने पेश की रिपोर्ट मुख्य सचिव ने कोर्ट में व्यक्तिगत हलफनामा पेश किया। इसमें बताया गया कि चिकित्सा शिक्षा निदेशक की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की गई थी, जिसने घटना की जांच कर रिपोर्ट सौंपी है। राज्य सरकार ने यह भी बताया कि, एचआइवी/एड्स (प्रीवेंशन एंड कंट्रोल) Act, 2017 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जा रहा है। सभी सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कालेजों को गोपनीयता बनाए रखने और भेदभाव रोकने के लिए निर्देश जारी किए गए हैं। स्वास्थ्यकर्मियों को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित प्रशिक्षण व जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कोर्ट ने कही सख्त बातें हाई कोर्ट ने कहा कि, किसी भी सरकारी अस्पताल द्वारा मरीज की पहचान और बीमारी सार्वजनिक करना निजता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है। अदालत ने कहा कि, इस तरह की हरकत न केवल असंवेदनशील है बल्कि असंवैधानिक भी। यह मरीज और उसके परिवार के जीवन को सामाजिक कलंक में धकेल सकती है। अगली सुनवाई 30 अक्टूबर को कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि, माता-पिता को दो लाख का मुआवजा चार सप्ताह में अदा किया जाए। भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए कड़े दिशा-निर्देश और संवेदनशीलता प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए। इस मामले की अगली सुनवाई 30 अक्टूबर 2025 को होगी, जिसमें अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी।  

विजय बघेल की याचिका पर बहस पूरी, भूपेश बघेल का आचार संहिता विवाद अदालत में सुरक्षित

बिलासपुर बिलासपुर हाईकोर्ट से बड़ी खबर सामने आई है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ दायर चुनाव याचिका पर हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब इस मामले में कभी भी बड़ा फैसला आ सकता है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल के खिलाफ यह याचिका दुर्ग सांसद विजय बघेल ने दाखिल की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विधानसभा चुनाव 2023 के दौरान भूपेश बघेल ने आचार संहिता का खुला उल्लंघन किया था। याचिका में यह मांग की गई है कि भूपेश बघेल का निर्वाचन शून्य किया जाए। इस मामले में भूपेश बघेल की ओर से कोर्ट में 16 बिंदुओं पर जवाब पेश करते हुए कहा गया कि यह याचिका चलने योग्य नहीं है। विधानसभा चुनाव 2023 के भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल ने पूर्व सीएम भूपेश बघेल के खिलाफ चुनावी याचिका दायर करते हुए पूर्व सीएम के निर्वाचन को निरस्त करने की मांग की है। याचिका में विजय बघेल ने आरोप लगाया है कि पाटन क्षेत्र में आचार संहिता का उल्लंघन किया गया है। भाजपा का आरोप है कि चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद पाटन विधानसभा सीट में कांग्रेस उम्मीदवार के लिए रैली का आयोजन किया गया था। इसकी शिकायत चुनाव आयोग से भी की गई है। इस संबंध में रोड शो कार्यक्रम की एक सीडी भी दी गई है। विधानसभा चुनाव 2023 में पाटन विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी विजय बघेल ने कांग्रेस प्रत्याशी और तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ चुनाव याचिका दाखिल की थी। याचिका में विजय बघेल ने कहा है कि 16 नवंबर 2023 को पाटन विधानसभा सीट में चुनाव प्रचार किया गया, जबकि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दूसरे फेज के लिए 15 नवंबर की शाम को प्रचार अभियान खत्म हो गया था। पाटन विधानसभा सीट में भी दूसरे फेज में मतदान हुआ था। याचिका में कहा गया है कि प्रावधान का उल्लंघन करते हुए 16 नवंबर को रैली और रोड शो आयोजित किया गया था। इस रैली की फोटो और वीडियो भी उपलब्ध कराए गए हैं। आरोप है कि फोटो और वीडियो में स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि भूपेश बघेल रैली का आयोजन कर रहे थे, जिसमें सरकारी कर्मचारी और पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भूपेश बघेल के पक्ष में नारे लगाए। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भूपेश बघेल ने आचार संहिता का उल्लंघन किया, इसलिए उनकी उम्मीदवारी रद्द की जाए और उन्हें दंडित किया जाए।

ट्रेन में बिना टिकट पकड़े गए यात्री को कोर्ट ने भेजा जेल, सफर बना सबक

खंडवा  मध्य प्रदेश के खंडवा में पहली बार दो से ज्यादा बार बिना टिकट ट्रेन में सफर करते हुए पकड़ाए तीन आरोपियों को कोर्ट ने 52 दिन की जेल की सजा सुनाई है। दरअसल कोर्ट ने माना कि दो या तीन से ज्यादा अपराध करने वालों का सिर्फ जुर्माना देकर छोड़ना उचित नहीं जेल भेजना उचित होगा। अधिवक्ता वीरेंद्र वर्मा ने बताया कि विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने फैसला सुनाया है जिसमें बुरहानपुर के शेख जाकिर नासिर व मीनाक्षी को रेलवे अधिनियम की धारा 147, 145, 146 में दोष सिद्ध पाया है। तीनों को कोर्ट ने अर्थ दंड के अलावा 52 दिन तक जेल में रहने की सजा भी सुनाई है। आरोपी पूर्व में भी बार-बार बिना टिकट प्लेटफार्म और ट्रेन में घूमते हुए पकड़ाए थे। वह हर बार अर्थ दंड चुका कर अपराध कर रहे थे। कोर्ट ने माना कि हर बार की तरह इस बार भी आरोपी अर्थदंड चुका कर छूट न जाए। इसलिए उन्होंने जेल में कठोर कारावास की सजा भी देना उचित होगा। ऐसी स्थिति में मात्र अर्थ दंड लगाकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।