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पंजाब में हरियाली की रक्षा का आदेश, हाई कोर्ट ने बिना इजाज़त पेड़ कटाई पर लगाया प्रतिबंध

चंडीगढ़  पंजाब में अब पेड़ काटना आसान नहीं होगा। पूरे पंजाब में कहीं भी पेड़ काटने से पहले अब कोर्ट की विशेष परमिशन लेनी होगी। पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केस में अगली सुनवाई या विशेष अनुमति के बिना पूरे राज्य में कोई पेड़ नहीं काटा जाएगा। दरअसल, मोहाली की एयरपोर्ट रोड पर सरकार ने 250 पेड़ों को काटने का फैसला लिया था। मामले में मोहाली निवासी शुभम सेखों ने पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया कि विकास योजनाओं के नाम पर पेड़ काटने का फैसला बिना मानकों को ध्यान में रखकर लिया गया है।   मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने पंजाब सरकार को नोटिस जारी कर तलब किया। कोर्ट ने सरकार ने पूछा कि विकास के लिए इन पेड़ों के कटाई के लिए क्या रिसर्च या वैधानिक परमिशन ली गई थी। मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने प्रदेशभर में पेड़ न काटने का फैसला सुनाया। मामले की अगली सुनवाई पर पंजाब सरकार विस्तार से अपना पक्ष रखेगी। हाई कोर्ट का फैसला इसलिए ज्यादा अहम है क्योंकि अरावली पर्वत श्रंखला पर पूरे देश में विवाद चल रहा है। सोशल मीडिया से लेकर जमीनी तक लोग भारी संख्या में विरोध में उतर आए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और केंद्र सरकार की सिफारिश पर काफी विरोध चल रहा है। इससे लोगों में पर्यावरण को लेकर काफी जागरुकता देखी जा रही है। ऐसे में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का इस फैसले ने लोगों की ध्यान आकर्षित किया है।  

कानूनी शिकंजा: हाजिर न होने पर मंत्री नितेश राणे पर कोर्ट सख्त, जारी हुआ NBW

सिंधुदुर्ग महाराष्ट्र में कुडाल कोर्ट ने राज्य के कैबिनेट मंत्री और सिंधुदुर्ग जिले के गार्डियन मिनिस्टर नितेश राणे को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है। यह कार्रवाई लंबे समय से कोर्ट में पेश न होने और बार-बार गैरहाजिर रहने के चलते की गई है। संविधान बचाने के लिए हुए प्रोटेस्ट से जुड़े प्रकरण में विधायक प्रवीण दरेकर और विधायक प्रसाद लाड के खिलाफ भी गैर जमानती वारंट जारी किया गया है। यह मामला 26 जून 2021 का है, जब सिंधुदुर्ग जिले में ओबीसी आंदोलन के दौरान कुडाल पुलिस स्टेशन में केस दर्ज किया गया था। प्रोटेस्ट के सिलसिले में राजन तेली, विधायक नीलेश राणे, मंत्री नितेश राणे और 42 अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान विधायक नीलेश राणे, राजन तेली और अन्य आरोपी कोर्ट में उपस्थित थे, जबकि नितेश राणे सहित कुल छह आरोपी गैरहाजिर रहे। कोर्ट ने नितेश राणे के वकीलों द्वारा दी गई गैरहाजिरी की याचिका को खारिज कर दिया। लगातार तारीखों पर पेश न होने को गंभीरता से लेते हुए कोर्ट ने उनके खिलाफ नॉन बेलेबल अरेस्ट वारंट जारी किया। इससे पहले नासिक हाउसिंग घोटाले से जुड़े मामले में कोर्ट ने महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री और एनसीपी (अजित पवार गुट) नेता माणिकराव कोकाटे को दो साल की सजा सुनाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन गिरफ्तारी से संरक्षण देते हुए दो साल की जेल की सजा को अंतिम सुनवाई तक निलंबित कर दिया। हाईकोर्ट का यह आदेश नासिक सेशन कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर आया है, जिसमें कोकाटे को सरकारी फ्लैटों के अवैध अधिग्रहण से जुड़े हाउसिंग फ्रॉड मामले में दो साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। सेशन कोर्ट के फैसले के बाद कोकाटे ने हाईकोर्ट का रुख किया था।

निजी स्कूलों के लिए राहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मनमानी फीस वसूली के खिलाफ फीस वापसी आदेश निरस्त किया

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधकों को मनमानी फीस वसूली के मामले में हाईकोर्ट से राहत मिली है। हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रूसिया तथा जस्टिस प्रदीप मित्तल ने अपने आदेश में कहा है कि राज्य के अधिकारियों ने बहुत ही खराब माहौल में काम किया और अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया। दो दर्जन से अधिक प्राइवेट स्कूल संचालकों ने मनमानी फीस वसूली के खिलाफ प्रकरण दर्ज किये जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील दायर करने वाले अधिकांश स्कूल मिशनरी संस्थाओं के द्वारा संचालित किये जा रहे थे। अपील में मध्य प्रदेश निजी विद्यालय (फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम, 2017 (जिसे आगे एक्ट कहा जाएगा) के सेक्शन 11 और मध्य प्रदेश निजी विद्यालय (फीस तथा संबंधित विषयों का विनियमन) नियम के तहत फीस वापस लौटाने के आदेश जारी किये जाने को चुनौती दी गई थी। अपील में कहा गया था कि राज्य की गाइडलाइन का कथित तौर पर उल्लंघन करने का आरोप में जिला प्रशासन की शिकायत पर पुलिस ने स्कूल प्रबंधन से जुडे व्यक्तियों तथा प्राचार्य पर प्रकरण दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार भी किया था। अपीलकर्ताओं की तरफ से तर्क दिया गया कि एक्ट के सेक्शन 11 के तहत अंतरिम सुरक्षा देने का कोई अधिकार नहीं है। एक्ट में प्रावधान नहीं होने के बावजूद भी साल 2017-18 के बाद से जमा की गई फीस वापस करने आदेश जारी किये गये हैं। युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अधिकारियों ने बहुत खराब माहौल में और अपनी पावर का इस्तेमाल करते हुए अपने अधिकार से बाहर काम किया। राज्य के अधिकारियों का कार्य स्कूलों के मैनेजमेंट में दखलंदाज़ी के बराबर है। स्टूडेंट्स की फीस वापस करने का राज्य सरकार का निर्देश टिकने लायक नहीं है। अधिकारी आरोपों को साबित करने में नाकाम रहे। अधिकारियों के पास फीस तय करने और अलग-अलग निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं है, जो स्कूल चलाने वाले मैनेजमेंट या सोसाइटी के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। जिस तरह से लोकल एडमिनिस्ट्रेशन ने पूरे मामले को हैंडल किया, उससे स्कूल मैनेजमेंट और पैरेंट्स के बीच अनबन और मतभेद पैदा हो गए, जो स्टूडेंट्स की पढ़ाई और करियर के लिए अच्छा नहीं है। इस मामले को 2017 के एक्ट और 2020 के रूल्स के तहत सही तरीके से हैंडल किया जा सकता था। युगलपीठ ने फीस वापस करने के आदेश को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता स्कूलों को राहत प्रदान की। 

हाईकोर्ट का सख्त रुख: सजा पूरी होने के बाद 17 दिन तक जेल में रखने पर सागर जेल अधीक्षक पर जुर्माना

जबलपुर  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने सजा पूरी होने के बावजूद एक युवक को जेल में अवैध रूप से रखे जाने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सागर जेल अधीक्षक पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया है।  जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रामकुमार चौबे की डिवीजन बेंच ने यह आदेश टीकमगढ़ जिले के युवक अरविंद कुशवाहा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता भी दी है कि वह 17 दिनों की अवैध हिरासत के लिए उचित मुआवजा पाने के लिए दावा कर सकता है। चोरी के मामले में हुई थी जेल टीकमगढ़ जिले के डीगोड़ा थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मड़वारा निवासी अरविंद कुशवाहा को डीजे वाहन से एम्प्लीफायर चोरी के आरोप में 5 नवंबर 2024 को गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल के बाद कोर्ट ने उसे एक साल की सजा सुनाई थी। सजा की अवधि 4 नवंबर 2025 को पूरी हो गई थी, लेकिन इसके बावजूद अरविंद को 20 नवंबर 2025 तक जेल में रखा गया। सजा के बाद हिरासत में रखने को दी थी चुनौती इस अवैध हिरासत को चुनौती देते हुए अरविंद कुशवाहा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजना यादव ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल को अब रिहा कर दिया गया है, लेकिन उसे 17 दिनों तक गैरकानूनी रूप से जेल में रखा गया, जो गंभीर लापरवाही का मामला है।

सिद्धीक सैत द्वारा दान की गई भूमि पर 600 परिवारों को बेदखली का खतरा, SC में वक्फ बोर्ड ने की अपील

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने  केरल के एर्नाकुलम जिले की मुनंबम भूमि को वक्फ संपत्ति न मानने संबंधी केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने इस मामले में अगली सुनवाई तक भूमि की यथास्थिति बनाए रखने का भी आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी, 2026 को होगी। हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह स्पष्ट किया कि केरल सरकार द्वारा गठित जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर जांच आयोग के कामकाज पर कोई रोक नहीं लगाई गई है और आयोग अपनी जांच जारी रख सकता है। पीठ ने अपने आदेश में कहा- नोटिस जारी किया जाए, छह हफ्ते में जवाब दाखिल हो। मामले को 27 जनवरी 2026 को सूचीबद्ध किया जाए। तब तक हाईकोर्ट के उस आदेश की घोषणा कि विवादित संपत्ति वक्फ नहीं है, स्थगित रहेगी और यथास्थिति बनाए रखी जाए। यह स्पष्ट किया जाता है कि हमने जांच आयोग के काम पर कोई रोक नहीं लगाई है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश केरल वक्फ संरक्षण वेदी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर पारित किया। याचिका में केरल हाईकोर्ट की उस डिवीजन बेंच के फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसने राज्य सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को वैध ठहराया था और साथ ही यह टिप्पणी की थी कि मुनंबम की जमीन वक्फ संपत्ति नहीं है। क्या है पूरा विवाद? यह मामला मुनंबम की करीब 135 एकड़ भूमि से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1950 में सिद्दीक सैत नामक व्यक्ति ने फारूक कॉलेज को दान में दिया था। उस समय इस भूमि पर स्थानीय परिवार पहले से ही रह रहे थे। बाद में कॉलेज ने भूमि के कुछ हिस्से इन्हीं निवासियों को बेच दिए। विवाद तब गहराया जब 2019 में केरल वक्फ बोर्ड ने इस जमीन को वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत कर दिया, जिससे पहले की गई बिक्री को अवैध माना गया। इसके चलते 600 से अधिक परिवारों को बेदखली का डर सताने लगा और बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को कोझिकोड वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई, जहां मामला अभी लंबित है। हाईकोर्ट में क्या हुआ? भूमि विवाद और बढ़ते तनाव के बीच, नवंबर 2024 में केरल सरकार ने इस मुद्दे का समाधान तलाशने के लिए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सी.एन. रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया। इसके खिलाफ केरल वक्फ संरक्षण वेदी ने हाईकोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि वक्फ अधिनियम के तहत आने वाले मामलों में राज्य सरकार को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने इस दलील से सहमति जताते हुए आयोग को रद्द कर दिया। हालांकि, अक्टूबर 2025 में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एकल न्यायाधीश के फैसले को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने न केवल राज्य सरकार के आयोग को वैध ठहराया, बल्कि यह भी कहा कि 2019 में वक्फ बोर्ड द्वारा जमीन का पंजीकरण कानून के विपरीत था। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि जमीन को वक्फ घोषित करना एक तरह की जमीन पर कब्जा करने की रणनीति जैसा प्रतीत होता है और 1950 का दस्तावेज वक्फनामा नहीं, बल्कि एक गिफ्ट डीड था। सुप्रीम कोर्ट में याचिका डिवीजन बेंच के इन निष्कर्षों को चुनौती देते हुए वक्फ संरक्षण वेदी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने यह तय करके कि जमीन वक्फ है या नहीं, अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर फैसला दिया, जबकि यह मुद्दा पहले से ही वक्फ ट्रिब्यूनल में विचाराधीन है। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट का फैसला कार्यपालिका को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप की अनुमति देता है, जहां कानूनन एक अलग वैधानिक प्रक्रिया निर्धारित है। संक्षिप्त सुनवाई के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए भूमि की स्थिति को यथावत रखने का आदेश दिया, लेकिन जांच आयोग को अपना काम जारी रखने की अनुमति दे दी। अब सभी की निगाहें 27 जनवरी, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां इस संवेदनशील भूमि विवाद की आगे की दिशा तय होगी।  

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का गुस्सा: पुलिस के रवैये से नाराज होकर 6 पुलिसवालों को सस्पेंड किया, गृह सचिव को तलब

इंदौर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पुलिस के काम करने के तरीके पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने अफीम तस्करी के मामले में बीएनएसएस के प्रावधानों का पुलिस द्वारा पालन नहीं किए जाने पर गृह विभाग के प्रमुख सचिव को तलब किया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि लगता है कि राज्य के अधिकारियों ने इन प्रावधानों को भुला दिया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने तलाशी और जब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर बीएनएसएस के प्रावधानों का राज्य पुलिस द्वारा पालन नहीं किए जाने पर नाराजगी जताते हुए गृह विभाग के प्रमुख सचिव को तलब किया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने यह टिप्पणी सूबे के मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ थाना क्षेत्र में 18 साल के युवक को 2.71 किलोग्राम अफीम की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के मामले में की। युवक ने हाई कोर्ट की शरण लेते हुए दावा किया है कि उसे इस मामले में फंसाया गया है। अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने के बाद एक थाना प्रभारी समेत छह पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। इन पुलिस कर्मियों पर आरोप है कि उन्होंने मामले की जांच के दौरान तय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया। हाई कोर्ट की एकल पीठ ने बीएनएसएस की धारा 105 और धारा 185 का हवाला देते हुए कहा कि इन प्रावधानों से विधायिका ने ऑडियो-वीडियो माध्यम से तलाशी और जब्ती को रिकॉर्ड करने की जरूरत को ध्यान में रखा है। ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य के अधिकारियों द्वारा इन प्रावधानों को आसानी से भुला दिया गया है। हाई कोर्ट ने मामले में नौ दिसंबर को हुई सुनवाई के आधार पर पारित आदेश में कहा कि ऐसी परिस्थितियों में गृह विभाग के प्रमुख सचिव/ प्रतिवादी राज्य को उपरोक्त प्रावधानों को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में इस अदालत को अवगत कराने का निर्देश दिया जाता है। कोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 12 जनवरी 2026 की तारीख तय की है। हाई कोर्ट ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव को इस तारीख को अदालत के सामने हाजिर होने को कहा है। एकल पीठ ने राज्य सरकार को यह बताने का निर्देश भी दिया है कि क्या उसने पुलिस कर्मियों को शरीर पर पहने जाने वाले कैमरे उपलब्ध कराने पर कोई विचार किया है? हाई कोर्ट ने अफीम तस्करी के आरोप में एनडीपीएस अधिनियम के तहत गिरफ्तार युवक को पांच दिसंबर को अंतरिम जमानत पर रिहा किए जाने का आदेश दिया था। राजस्थान के निवासी युवक की ओर से अदालत में अपने बचाव में दावा किया गया है कि उसे पुलिस कर्मियों ने एक अंतरराज्यीय यात्री बस में 29 अगस्त की सुबह 11:15 बजे के आस-पास अवैध तौर पर पकड़ा। जबकि दस्तावेजों में उसकी इस तारीख को शाम 5:15 बजे गिरफ्तारी दिखाई गई। आरोपी के वकील हिमांशु ठाकुर ने पीटीआई-भाषा से कहा कि मेरा मुवक्किल इस बस से मध्य प्रदेश के मंदसौर से राजस्थान के प्रतापगढ़ जा रहा था। वह एक मेधावी छात्र है और उसने 12वीं की परीक्षा फर्स्ट डिविजन से पास की है। ठाकुर ने बताया कि हाई कोर्ट में उनके मुवक्किल की ओर से यात्री बस के भीतर लगे सीसीटीवी कैमरे का फुटेज भी पेश किया गया है, जिसका अदालत पहले ही संज्ञान ले चुकी है। इस फुटेज में सादे कपड़े पहने तीन लोग युवक को बस से बाहर ले जाते दिखाई दे रहे हैं। राजस्थान से सटा मंदसौर जिला अफीम की खेती के लिए मशहूर है। जिले में मादक पदार्थों के अवैध उत्पादन, भण्डारण, कारोबार और तस्करी के मामले लगातार सामने आते हैं।  

अब्दुल्ला आजम को बड़ा झटका: अदालत ने जुर्माने के साथ सुनाई सजा

रामपुर दो पैन कार्ड मामले में सात साल की सजा काट रहे पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम को दो पासपोर्ट केस में भी कोर्ट ने सात साल की सजा सुनाई है। इसके अलावा उन पर 50 हजार रुपये जुर्माना भी लगाया है। सुनवाई के दौरान अब्दुल्ला आजम वीडियो कांफ्रेंसिंग से कोर्ट में पेश हुए। सपा नेता आजम खां के बेटे अब्दुल्ला आजम के खिलाफ दो पासपोर्ट का मामला शहर विधायक आकाश सक्सेना ने सिविल लाइंस थाने में 2019 में दर्ज कराया था। उनका आरोप था कि अब्दुल्ला आजम के पास दो पासपोर्ट हैं।  इसमें से एक पासपोर्ट का इस्तेमाल वह विदेश यात्रा में भी कर चुके हैं। यह मामला एमपी-एमएलए मजिस्ट्रेट कोर्ट में विचाराधीन था। इस मामले में दर्ज मुकदमे को निरस्त करने को लेकर अब्दुल्ला आजम ने सुप्रीम कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया था लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले की सुनवाई फिर से शुरू हुई। शुक्रवार को रामपुर कोर्ट ने फैसला सुनाया। सुनवाई के लिए पूर्व विधायक अब्दुल्ला आजम को वीसी के माध्यम से कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने अब्दुल्ला आजम को दोषी करार देते हुए सात साल की सजा सुनाते हुए  50 हजार रुपये जुर्माना लगाया। क्या है मामला शहर विधायक आकाश सक्सेना की ओर से सिविल लाइंस थाने में वर्ष 2019 में प्राथमिकी दर्ज करवाई गई थी। इसमें विधायक ने कहा था कि अब्दुल्ला आजम खां द्वारा असत्य व कूट रचित दस्तावेज तथा विवरण के आधार पर पासपोर्ट बनवाया है। वह इसका उपयोग कर रहे हैं। पासपोर्ट संख्या जेड4307442 दस जनवरी 2018 है। अब्दुल्ला आजम खां की जन्मतिथि शैक्षिक प्रमाण पत्रों हाईस्कूल बीटेक व एमटेक में  एक जनवरी1993 अंकित है। पासपोर्ट संख्या जेड 4307442 में जन्मतिथि  30 सितंबर 1990 अंकित है। पासपोर्ट का प्रयोग आर्थिक लाभ हेतु व्यापार व व्यवसाय संबंधी विदेश यात्राओं तथा विभिन्न संस्थाओं में पहचान पत्र  के रूप में तथा विभिन्न पदों के आवेदन में किया गया है। दूसरी ओर शैक्षिक प्रमाण पत्रों का प्रयोग भी आर्थिक लाभ हेतु शैक्षिक संस्थाओं की मान्यताओं व आईडी के लिए किया गया है। अब्दुल्ला आजम के शैक्षिक प्रमाण पत्र तथा पासपोर्ट का विवरण जन्मतिथि व जन्म स्थान विरोधाभासी है फिर भी अब्दुल्ला आजम सभी दस्तावेजों का प्रयोग जरूरत के अनुसार जानबूझकर अनुचित लाभ लेने के लिए कर रहे है। केस में आरोप लगाया था कि अब्दुल्ला आजम ने असत्य विवरण अंकित पासपोर्ट संख्या जेड 4307442 बनवाया है जो जिसका दुरुपयोग किया जाना भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 467, 468, 471 तथा पासपोर्ट अधिनियम की धारा -12(1) एके अन्तर्गत दंडनीय अपराध है ।  

एक ही मामले में बार-बार याचिका लगाने पर कोर्ट ने जयस को एक लाख रुपये का जुर्माना किया”

खरगोन खरगोन में एक आरक्षक और इंस्पेक्टर के बीच हुए विवाद को लेकर बार-बार लगाई गई याचिका जयस को लगाना भारी पड़ी। कोर्ट ने इस केस में न केवल नाराजगी जताई, बल्कि जय आदिवासी संगठन (जयस) पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने कहा कि एक ही मामले में बार-बार याचिका लगाई जा रही है। कोर्ट को क्या तमाशा समझ रखा है। दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जयस ने जनहित याचिका लगाई थी, लेकिन कोर्ट ने उसे निजी उद्देश्य से प्रेरित माना। खरगोन के जयस के जिला अध्यक्ष सचिन सिसोदिया की तरफ लगाई गई याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया। शासन की तरफ से इस याचिका पर एडिशनल एडवोकेट जनरल अरनंद सोनी ने तर्क प्रस्तुत किए थे। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले भी याचिकाएं लगी थी, लेकिन बाद में उसे वापस ले लिया गया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जनहित याचिका तभी स्वीकार की जा सकती है,जब उसमें वास्तविक सार्वजनिक हित व जनप्रभाव हो। जनहित याचिका का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह था मामला खरगोन में रिजर्व इंस्पेक्टर सौरभ सिंह कुशवाह व आरक्षक राहुल चौहान के बीच 23 अगस्त को विवाद हो गया था। इस मामले को जयस ने उठाया और धरना प्रदर्शन भी किए। इंस्पेक्टर व उनकी पत्नी पर एससी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज करने की मांग भी की गई। बाद में कोर्ट में जनहित याचिका लगाई गई। कोर्ट ने कहा कि पीडि़त भी सरकारी कर्मचारी है और शिक्षित भी। वह खुद अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए सक्षम है। इसके बाद याचिका वापस ले ली गई। बाद में सचिन चौहान ने याचिका लगाई, लेकिन बाद में कोर्ट में मौजूद होकर कहा कि वह याचिका वापस लेना चाहता है। बाद में जयस के जिलाध्यक्ष ने याचिका लगाई थी।  

अवैध संबंध के सबूतों की जांच में हाईकोर्ट ने पति का दावा किया सही

 तिरुअनंतपुरम केरल हाई कोर्ट ने मेंटनेंस के एक केस की सुनवाई के दौरान अहम फैसला दिया। अदालत ने कहा कि वैवाहिक संबंधों में व्यभिचार की बात परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से ही साबित की जा सकती है। जस्टिस कौसर ईदप्पागथ ने कहा कि सीआरपीसी के सेक्शन 125 के तहत मेंटनेंस का केस सिविल नेचर का है। यदि पति यह कह रहा है कि उसकी पत्नी के विवाहेतर संबंध हैं और वह व्यभिचार में शामिल हैं तो उसकी ओर से दिए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर ही कुछ तय करना होगा। ऐसे मामलों में पक्के सबूत कहां मिलते हैं। ऐसा होना तो दुर्लभ ही होता है। अदालत ने कहा, 'पति जब यह आरोप लगाता है कि उसकी पत्नी व्यभिचार में शामिल है और इसलिए वह मेंटनेंस की हकदार नहीं हैं तो ऐसी स्थिति में यदि वह परिस्थितिजन्य सबूत देता है तो वही पर्याप्त होगा। आमतौर पर ऐसी चीजें तो पूरी गोपनीयता और सीक्रेसी के साथ होती हैं। ऐसे मामलों में पक्के सबूत मिल पाना तो दुर्लभ ही होता है। ऐसी स्थिति में व्यभिचार को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के माध्यम से ही साबित किया जा सकता है। इसलिए यदि ऐसे कोई सबूत मुहैया कराए जाएं तो उसके आधार पर ही किसी निर्णय तक पहुंचना होता है।' अदालत ने यह फैसला एक शख्स की याचिका पर दिया, जिसने फैमिली कोर्ट के आदेश को चैलेंज किया था। फैमिली कोर्ट ने आदेश दिया था कि वह अपनी तलाकशुदा पत्नी को मासिक गुजारा भत्ता दे। इसी को चैलेंज देते हुए शख्स ने हाई कोर्ट का रुख किया। पति का कहना था कि यदि मेरी मेरी पत्नी किसी और के साथ है और व्यभिचार में शामिल है तो फिर वह गुजारा भत्ता की हकदार नहीं है। क्या था फैमिली कोर्ट का आदेश, जिसे HC में मिली चुनौती हालांकि फैमिली कोर्ट ने शख्स की अपील को खारिज कर दिया था और उसे आदेश दिया था कि वह पत्नी को हर महीने 7,500 रुपये का गुजारा भत्ता दे। इस फैसले को हाई कोर्ट में पति ने चुनौती दी। उसके वकील ने कहा कि यदि महिला किसी और के साथ है तो वह गुजारा भत्ता की हकदार नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि मेरे मुवक्किल ने इस बात के पर्याप्त सबूत मुहैया कराए हैं कि वह किसी और के साथ है और व्यभिचार में शामिल है।

UP से गिरफ्तार JSSC पेपर लीक मास्टरमाइंड, रांची में हुई पेशी और भेजा गया जेल

रांची झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) पेपर लीक मामले में सीआईडी को बड़ी सफलता मिली है। केंद्रीय जांच एजेंसी (सीआईडी) ने इस प्रकरण के मुख्य आरोपी और मास्टरमाइंड विनय शाह को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार कर रांची लाया है। आरोपी को सीआईडी की विशेष अदालत (स्पेशल कोर्ट) में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। जानकारी के अनुसार, विनय शाह रेलवे में सेक्शन इंजीनियर के पद पर कार्यरत है और मूल रूप से झारखंड की राजधानी रांची का निवासी है। गिरफ्तारी से बचने के लिए वह यूपी के शाहपुर स्थित हनुमंत नगर कॉलोनी में अपनी पहचान छिपाकर रह रहा था। जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपी सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने के लिए नेपाली सिम कार्ड का इस्तेमाल कर रहा था। जांच में यह भी सामने आया है कि उसने रांची के जेड स्क्वायर होटल में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर पेपर लीक की पूरी योजना तैयार की थी। सीआईडी ने बताया कि विनय शाह ने मनोज कुमार, शशिभूषण दीक्षित और संदीप त्रिपाठी के साथ मिलकर साजिश रची थी। इस मामले में इससे पहले आईआरबी के करीब एक दर्जन जवानों को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।