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ऑनलाइन ठगी पर सरकार का अलर्ट, अनधिकृत लोन ऐप्स और फर्जी पार्ट-टाइम जॉब ऑफर्स से बचने की सलाह

 जयपुर राज्य सरकार द्वारा साइबर स्वच्छता को बढ़ावा देने तथा डिजिटल माध्यमों से होने वाली धोखाधड़ी के प्रति आमजन को जागरूक करने के उद्देश्य से दो साइबर सुरक्षा एडवाइजरी जारी की गई है। एडवाइजरी में अवैध एवं अनधिकृत इंस्टेंट लोन ऐप्स के माध्यम से होने वाली जबरन वसूली ओर डिजिटल उत्पीड़न से बचाव पर विशेष बल दिया गया है। साथही टास्क स्कैम से बचाव के लिए आमजन को सावधान रहने की अपील की गई है।  इंस्टेंट लोन ऐप आधारित जबरन वसूली के मामलों से सावधान रहें। अनधिकृत इंस्टेंट लोन ऐप्स द्वारा तत्काल वित्तीय आवश्यकता वाले व्यक्तियों को निशाना बनाने के लिए बिना गारंटी केतुरंत नकद देने का वादा किया जाता है। एक बार एप इंस्टॉल करने पर स्कैमर्स उपयोगकर्ताओं के मोबाइल डेटा, संपर्क सूची एवं निजी जानकारी तक पहुंच प्राप्त कर लेते हैं। इसके बाद अत्यधिक ब्याज, धमकी, ब्लैकमेल और मॉर्फ्ड तस्वीरों के माध्यम से दबाव बनाकर अवैध वसूली करते हैं। नागरिकों को केवल अधिकृत प्लेटफॉर्म एवं आधिकारिक ऐप स्टोर से ही वित्तीय एप्लीकेशन डाउनलोड करने तथा किसी भी ऐप को अनावश्यक अनुमति प्रदान करने सेबचने की सलाह दी गई है। ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी से बचाव हेतु विशेष एडवाइजरी जारी, टास्क स्कैम के प्रति सतर्क रहने की आवश्यकता गृह विभाग द्वारा जारी दूसरी एडवाइजरी में "टास्क स्कैम" अथवा ऑनलाइन पार्ट-टाइम जॉब धोखाधड़ी के संबंध में नागरिकों को सचेत किया गया है। साइबर अपराधी प्रतिष्ठित कंपनियों के प्रतिनिधि बनकर लोगों को आसान कार्यों के बदले आकर्षक आय का प्रलोभन देते हैं तथा प्रारंभिक भुगतान कर विश्वास अर्जित करने के बाद उनसे बड़ी धनराशि निवेश करवाने का प्रयास करते हैं। आमजन से अपील की गई है कि बिना सत्यापन के किसी भी ऑनलाइन कार्य या निवेश प्रस्ताव पर विश्वास न करें तथा किसी अज्ञात व्यक्ति या संस्था को धन राशि हस्तांतरित न करें। संदिग्ध गतिविधियों की तत्काल रिपोर्टिंग का आह्वान प्रदेश सरकार ने आमजन से अपील की है कि किसी भी प्रकार की साइबर धोखाधड़ी,ऑनलाइन ठगी, जबरन वसूली अथवा संदिग्ध डिजिटल गतिविधि की स्थिति में तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें तथा शिकायत को https://www.cybercrime.gov.inपर दर्ज कराएं। साथ ही, संबंधित बैंक अथवा वित्तीय संस्था को तत्काल सूचित कर आवश्यक सुरक्षा उपाय अपनाने की भी सलाह दी गईहै। 

Cyber Fraud का बढ़ता जाल: पंजाब में करोड़ों की ठगी, निवेश और वीजा के नाम पर लोगों को बनाया शिकार

चंडीगढ़   पंजाब में साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहा है। पिछले चार महीनों के दौरान मोहाली और राज्य के विभिन्न जिलों में साइबर ठगों ने 30.14 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी को अंजाम दिया है। इस अवधि में ऑनलाइन धोखाधड़ी के 13 बड़े मामले सामने आए हैं, जिनमें निवेश, वीजा, नौकरी, प्रॉपर्टी और हनी ट्रैप जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर लोगों को निशाना बनाया गया। मामलों की शिकायत मिलने के बाद मोहाली साइबर क्राइम थाना, स्टेट क्राइम और स्टेट साइबर क्राइम पुलिस थानों में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। साइबर अपराधियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए विशेषज्ञ टीमों को लगाया गया है। क्रिप्टो निवेश के नाम पर 19.84 करोड़ की ठगी सबसे बड़ा मामला लुधियाना के व्यवसायी जगदीप सिंघाल से जुड़ा है। साइबर ठगों ने उन्हें क्रिप्टोकरेंसी में निवेश पर भारी मुनाफे का लालच देकर 19.84 करोड़ रुपये की ठगी का शिकार बनाया। आरोपियों ने सोशल मीडिया के जरिए संपर्क कर उनका विश्वास जीता और एक फर्जी ट्रेडिंग वेबसाइट के माध्यम से निवेश करवाया। जांच में पता चला है कि ठगी की रकम 15 अलग-अलग बैंकों के 75 फर्जी खातों के जरिए निकाली गई। फर्जी निवेश कंपनी बनाकर 3.62 करोड़ की धोखाधड़ी होशियारपुर निवासी तरनजीत सिंह भल्ला से भी निवेश के नाम पर 3.62 करोड़ रुपये ठग लिए गए। आरोपियों ने ‘अटालिया’ नामक कंपनी में निवेश कराने के लिए सेबी और आरबीआई के कथित दस्तावेज दिखाए तथा हर महीने 3 प्रतिशत और सालाना 36 प्रतिशत रिटर्न का झांसा दिया। जब पीड़ित ने अपनी रकम वापस मांगी तो उसे जान से मारने की धमकियां भी दी गईं। नौकरी, वीजा और हनी ट्रैप के जरिए भी ठगी साइबर ठगों ने रेलवे में टिकट कलेक्टर की नौकरी दिलाने, बैंक ऋण से राहत दिलाने और पैसे दोगुने करने के नाम पर भी लोगों से लाखों रुपये ऐंठे। हनी ट्रैप के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एक युवक को इंस्टाग्राम पर फर्जी महिला प्रोफाइल के जरिए जाल में फंसाया गया और अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उससे 4.50 लाख रुपये वसूल लिए गए। वहीं, एक महिला को इंस्टाग्राम लिंक भेजकर निवेश का झांसा दिया गया और उससे 70 हजार रुपये की ठगी कर ली गई। प्रॉपर्टी और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म फ्रॉड भी सामने आए खरड़ में एक दंपती ने सोशल मीडिया पर कोठी बेचने का विज्ञापन देकर छह लोगों से करीब 1.5 करोड़ रुपये का बयाना लिया। बाद में संपत्ति किसी अन्य व्यक्ति के नाम रजिस्ट्री करवा दी गई। इसी तरह एचएसबीएस कैपिटल नामक फर्जी ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के जरिए चार लोगों से 27.88 लाख रुपये की ठगी की गई। शुरुआत में कुछ लाभ दिखाकर विश्वास जीता गया और बाद में निवेशकों की रकम ब्लॉक कर दी गई। विदेश भेजने के नाम पर भी ठगी जॉर्जिया, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के वर्क वीजा दिलाने के नाम पर भी कई लोगों को निशाना बनाया गया। आरोपियों ने दर्जनों युवाओं से लाखों रुपये वसूल लिए, लेकिन न तो वीजा मिला और न ही रकम वापस की गई। पुलिस ने जारी की एडवाइजरी पुलिस अधिकारियों ने लोगों से ऑनलाइन निवेश, सोशल मीडिया ऑफर और डिजिटल लेन-देन के दौरान विशेष सावधानी बरतने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी निवेश योजना में पैसा लगाने से पहले संबंधित कंपनी की वैधता की जांच अवश्य करें और असामान्य रूप से अधिक रिटर्न के दावों पर भरोसा न करें। पुलिस ने यह भी सलाह दी है कि साइबर ठगी का शिकार होने पर तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल या नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराएं, ताकि समय रहते कार्रवाई की जा सके।

बिना OTP और लिंक के बैंक अकाउंट साफ, मोबाइल चार्जिंग के दौरान हुई ठगी

भोपाल ऐशबाग में रहने वाले एक ऑटो इलेक्ट्रिक वर्कशाप संचालक साइबर ठगी का शिकार हो गए। अज्ञात साइबर जालसाजों ने उनका मोबाइल हैक कर बैंक खाते से एक लाख रुपए दूसरे खाते में ट्रांसफर कर लिए। ठगी का पता चलते ही पीड़ित ने साइबर हेल्पलाइन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं हो सकी। इसके बाद उन्होंने थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। चार्जिंग पर लगे मोबाइल का लॉक हुआ था हैंग ऐशबाग थाना प्रभारी संदीप पवार के अनुसार अफाक कालोनी, बाग फरहत अफजा निवासी मोहम्मद शरीफ (39) गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र में ऑटो इलेक्ट्रिक वर्कशाप संचालित करते हैं। उन्होंने पुलिस को बताया कि 24 मई को उनका मोबाइल घर पर चार्जिंग पर लगा था। घर से निकलते समय जब उन्होंने मोबाइल उठाया तो स्क्रीन लॉक नहीं खुल रहा था। कई बार प्रयास करने के बाद मोबाइल चालू हुआ और उन्होंने सामान्य रूप से फोन का उपयोग भी किया। बिना ओटीपी और बिना संदिग्ध लिंक के हुई ठगी इसी दौरान सुबह करीब 11 बजे उनके मोबाइल पर सेंट्रल बैंक खाते से एक लाख रुपए डेबिट होने का संदेश मिला। रकम किसी अज्ञात खाते में ट्रांसफर की गई थी। पीड़ित के अनुसार उन्होंने न तो कोई संदिग्ध लिंक या एपीके फाइल डाउनलोड की थी और न ही किसी को ओटीपी या बैंक संबंधी जानकारी साझा की थी। उन्हें शंका है कि मोबाइल हैक कर साइबर ठगी की गई है। पुलिस अब बैंक ट्रांजेक्शन के तकनीकी पहलुओं की जांच कर रही है।  

करोड़ों की साइबर फ्रॉड चेन का भंडाफोड़, लुधियाना से 4 किंगपिन गिरफ्तार

लुधियाना. फिरोजपुर रोड पर दो साइबर ठगी सेंटरों पर रेड करने के बाद गिरफ्तार किए गए 132 आरोपितों से पूछताछ में कई अहम राजफाश हुए हैं। विदेश से होने वाली करोड़ों की ट्रांजेक्शन जिन बैंक खातों में की जाती थी, वे म्यूल अकाउंट्स हैं। पुलिस ने अभी तक 450 खातों को खंगाला है, जिनमें करोड़ों रुपये की ट्रांजेक्शन हुई है। अब पुलिस इन खातों की डिटेल्स को निकालने में जुटी है। वहीं, इस मामले में लुधियाना से दिल्ली और गुजरात गई पुलिस की टीमों ने चार किंगपिन गिरफ्तार किए हैं, जोकि इस ठगी के नेटवर्क को ऑपरेट कर रहे थे। पुलिस उन्हें लुधियाना लाकर पूछताछ करेगी। गौरतलब है कि 13 मई को साइबर सेल और दो थानों की टीम ने दो साइबर ठगी सेंटरों पर रेड की थी। यहां से पुलिस ने 132 आरोपितों को गिरफ्तार किया था और उनसे 1.07 करोड़ रुपये, 229 मोबाइल, 98 लैपटाप और 19 गाड़ियां बरामद की थीं। आरोपित नार्थ अमेरिका और यूरोप के लोगों को स्पैम और हैकिंग का डर दिखाकर उनके खाते खाली कर देते थे। किराये पर लिए खातों में ट्रांसफर हुए करोड़ों मामले की शुरुआती जांच में पुलिस को 300 खाते मिले थे, लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती रही, वैसे-वैसे खातों की संख्या भी बढ़ती गई। अब इन खातों की संख्या 450 हो गई है। ये सभी खाते लोगों के आईडी प्रूफ का प्रयोग करके खुलवाए गए हैं। इसके बदले में खाता देने वाले लोगों को पांच से 10 हजार रुपये किराये के तौर पर हर माह दिए जाते हैं। इन खातों का प्रयोग हवाला का पैसा घुमाने और ठगी के पैसे को ट्रांसफर करने के लिए किया जाता था। ये खाते पंजाब, दिल्ली, गुजरात, बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के नाम से खुले हुए हैं। अब पुलिस इन खातों की डिटेल को खंगालने में जुटी है, क्योंकि इन खातों में ही चार से पांच करोड़ रुपये की ट्रांजेक्शन हो चुकी है। पुलिस अब इन खाता धारकों की भी पड़ताल कर रही है। आईटी कंपनी का हवाला देकर लेते थे ऑफिस स्पेस आरोपित जहां भी ऑफिस लेते थे, वहां ये कहा जाता था कि उन्होंने आईटी कंपनी का ऑफिस खोलना है, जोकि रात में ज्यादा काम करते हैं, क्योंकि उनकी डीलिंग विदेशी लोगों से होती है। इसलिए उनका ऑफिस 24 घंटे खुला रहता था। यहां दो से तीन शिफ्ट में काम होता था। किराया जितना उन्हें बिल्डिंग का मालिक कहता था, उससे ज्यादा ही देते थे। म्यूल अकाउंट कैसे इस्तेमाल होते हैं? किसी व्यक्ति से आनलाइन फ्राड किया जाता है। जैसे फर्जी काल, यूपीआइ फ्राड, निवेश स्कैम, लोन एप, ओटीपी स्कैम आदि। ठगी का पैसा सीधे अपराधी के खाते में नहीं जाता बल्कि कई अलग-अलग बैंक खातों में भेजा जाता है। पैसा तेजी से आगे ट्रांसफर किया जाता है, ताकि पुलिस या बैंक ट्रैक न कर सकें। अंत में पैसा नकद निकाला जाता है, क्रिप्टो/सट्टेबाजी/हवाला आदि में भेज दिया जाता है। क्या है म्यूल अकाउंट? म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी चोरी या ठगी के पैसों को इधर-उधर ट्रांसफर करने, छिपाने या सफेद दिखाने के लिए करते हैं। खाते का मालिक कई बार जानबूझकर शामिल होता है, और कई बार उसे पता भी नहीं होता कि अकाउंट अपराध में इस्तेमाल हो रहा है।

रांची: ऑनलाइन ठगी मामलों की सुनवाई अब होगी तेज, आईटी विभाग को अधिकार

 रांची राज्य में इलेक्ट्रानिक लेनदेन तथा साइबर फ्राड की शिकायतों का शीघ्र निपटारा होगा। राज्य सरकार ने शिकायतों के निपटारे के लिए एडजुडिकेटिंग ऑफिसर के रूप में सूचना तकनीक एवं ई-गवर्नेंस विभाग के सचिव को प्राधिकृत किया है। झारखंड हाई कोर्ट के आदेश पर सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 के सेक्शन 46 के प्रविधान के तहत एडजुडिकेटिंग आफिसर के कर्त्तव्यों के साथ-साथ शिकायत दर्ज कराने व सुनवाई को लेकर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू कर दी गई है। इस एसओपी पर विभागीय मंत्री के रूप में मुख्यमंत्री की स्वीकृति ली गई है। इससे पहले इसपर विधि विभाग से वेटिंग कराकर कानूनी तौर पर सत्यापित भी कराया गया है। यह एसओपी सूचना तकनीक अधिनियम, 2000 के तहत शिकायतों के निपटारे के लिए एक पारदर्शी, यूनिफार्म और कानूनी रूप से सक्षम बनाता है। इसके माध्यम से नागरिकों, बिज़नेस मैन और सरकारी संस्थाओं के लिए शिकायतों की प्रक्रियाओं को आसान बनाना गया है। इसका उद्देश्य शिकायतों का समय पर और अच्छे से निपटारा सुनिश्चित करना तथा डिजिटल गवर्नेंस सिस्टम में भरोसा मजबूत करना है। इस एसओपी के माध्यम से आइटी एक्ट के तहत फाइल की गई वैसी सभी शिकायतों का निपटारा एडजुडिकेटिंग आफिसर द्वारा किया जाएगा, जहां नुकसान या मुआवजे का दावा पांच करोड़ रुपये से ज़्यादा नहीं है। बताते चलें कि राज्य में एडजुडिकेटिंग आफिसर के रूप में विभाग के सचिव की नियुक्ति तो हुई थी, लेकिन एसओपी नहीं होने से एक्ट का अनुपालन नहीं हो रहा था। यह होगा केस प्रोसेसिंग फ्रेमवर्क किसी शिकायत के निपटारा के लिए फोरा (एफओआरए : फाइलिंग, आब्जेक्शन, रजिस्ट्रेशन, और एलोकेशन प्रोसीजर) सिस्टम को अपनाया जाएगा। शिकायतें एडजुडिकेटिंग आफिसर के कार्यालय में मैनुअल या आनलाइन सिस्टम के ज़रिए दर्ज कराई जाएंगी। शिकायतें निर्धारित फारमेट में ही जमा होंगी। साथ ही निर्धारित शुल्क तथा आवश्यक दस्तावेज की स्वअभिप्रमाणित प्रति जमा करना होगी। शिकायतकर्ता को एक सही तरह से हस्ताक्षर किया हुआ शपथपत्र और पता और संपर्क की पूरी जानकारी देनी होगी। शुल्क डिमांड ड्राफ्ट या चालान से या आनलाइन जमा होगा। शिकायतकर्ता और प्रतिवादी को दिया जाएगा यूनिक केस नंबर सूचना तकनीक एवं ई-गवर्नेंस विभाग का अधिकृत प्रशाखा पदाधिकारी प्राप्त शिकायत और दस्तावेज की शुरुआती जांच करेगा। अगर शिकायत पूरी है,तो उसे रजिस्टर किया जाएगा तथा शिकायतकर्ता को एक यूनिक डायरी नंबर या केस नंबर दिया जाएगा। केस नंबर सभी संबंधित पार्टियों को भी बताया जाएगा। अधूरे आवेदन को लागू नियमों के अनुसार सुधार के लिए वापस किया जा सकता है या रद किया जा सकता है। शिकायत दर्ज होने के बाद आरोपी को जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया जाएगा। प्रतिवादी तय तारीख पर आवश्यक दस्तावेज के साथ एक लिखित जवाब जमा करेगा। उसपर शिकायतकर्ता भी जवाब दे सकता है तथा एडजुडिकेटिंग आफिसर की अनुमति से अन्य दस्तावेज भी फाइल कर सकता है। सुनवाई ऑफलाइन या ऑनलाइन दोनों हो सकती है सुनवाई ऑफलाइन एवं ऑनलाइन दोनों हो सकती है। सुनवाई के दौरान पार्टियां डाक्यूमेंट्री सबूत, टेक्निकल रिकार्ड, गवाह आदि प्रस्तुत कर सकती हैं। सुनवाई की कार्यवाही को डिजिटल रिकार्ड के रूप में मेंटेन किया जाएगा। सुनवाई के बाद एडजुडिकेटिंग आफिसर केस के तकनीकी, वित्तीय और विधिक पहलुओं का मूल्यांकन करेगा। इसमें विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया जा सकेगा। जांच के बाद एडजुडिकेटिंग आफिसर रूल-5 के तहत लिखित आर्डर पास करेगा। इसे आफिशियल डिपार्टमेंट पोर्टल पर अपलोड भी किया जाएगा।

सावधान! बिहार में साइबर अपराधियों ने अपनाया नया तरीका, बड़े अधिकारियों के नाम पर ठगी

पूर्णिया. सावधान, साइबर बदमाश आपको एसपी, डीएम ही नहीं सीएम व पीएम बनकर भी झांसा दे सकते हैं। हाल में साइबर बदमाशों द्वारा इस तरकीब का खूब उपयोग किया जा रहा है और लोगों को आराम से चूना लगा रहे हैं। साइबर थानों तक इस तरह की शिकायतें पहुंच भी रही है और साइबर थाना पुलिस ऐसे मामलों को सुलझाने में जुटी भी रहती है। साइबर अपराध अब पुलिस के लिए नयी चुनौती बनती जा रही है। यद्यपि इसकी रफ्तार भी चौकाने वाली है। पूर्णिया साइबर थाने में औसतन हर दिन साइबर ठगी की तीन दर्जन से अधिक शिकायतें पहुंच रही है। इसमें अलग-अलग तरकीब का उपयोग कर लोगों का खाता खाली करने की बात सामने आ रही है। इसमें पीएम व सीएम वाला भी एक नया ट्रेंड है। प्रधानमंत्री की आवाज से ठगी चंद दिन पूर्व ही प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज में जन धन योजना अंतर्गत खाते में 2000 रूपये आने का प्रलोभन देकर साइबर अपराधी ने एक बुजुर्ग के बैंक खाते से 1496 रूपये उड़ा लिये थे। पीड़ित जलालगढ़ थाना क्षेत्र के एकांबा निवासी सुधीर प्रसाद मजूमदार ने साइबर थाना में आवेदन दिया था। बुजुर्ग ने बताया था कि उनके मोबाइल पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज में एक संदेश आया। इस संदेश में कहा गया कि जिन लोगों का जन धन योजना अंतर्गत एसबीआई में खाता है, उनके खाते में दो हजार रूपये का लाभ दिया जा रहा है। इसके लिए भेजे गए मैसेज को स्क्रैच करें। उन्होंने बताया कि भेजे गए संदेश को जैसे ही स्क्रैच किया, उनके खाते से 1496 रूपये की निकासी का मैसेज आया। उन्होंने बताया कि प्रधान मंत्री के आवाज के झांसे में आकर वे ठगी के शिकार हो गए। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज AI से तैयार की जाती है। साइबर ठग डिजिटल अरेस्ट और केवाईसी के नाम पर भी लोगों को चूना लगा रहे हैं। यही नहीं पुलिस, सीबीआई या आरबीआई अधिकारी बनकर भी साइबर बदमाशों द्वारा चूना लगाया जा रहा है। दारोगा बताकर लूट इसी तरह खुद को थाना का दारोगा बताकर एक व्यक्ति से दर्ज केस के आरोपितों की गिरफ़्तारी के नाम पर बारी-बारी से कुल 9010 रूपये की आनलाइन ठगी कर ली। रघुवंशनगर थाना क्षेत्र के औरलाहा निवासी पीड़ित सुदीप कुमार ने साइबर थाना में आवेदन दिया है। आवेदन में कहा गया है कि गत 25 अप्रैल को उन्हें मोबाइल नंबर 8962070351 से कॉल आया, जिसमें कहा कि वह रघुवंशनगर थाना से दरोगा बात कर रहा है। उनके द्वारा जो केस दर्ज किया गया है, उसके आरोपितों की गिरफ्तारी हो जाएगी लेकिन उन्हें पैसा भेजना पड़ेगा। उनके द्वारा हामी भर दी गई। उसने इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक के खाता संख्या 009310356120 से 25 अप्रैल को 1000, 1000 एवं 800 कुल 3800 रूपये दरोगा के बताए स्कैनर पर भेज दिया। इसके बाद दरोगा ने कहा कि एसपी से बात कीजिए, आपको फोन कर रहे है। तब उन्हें 8962604672 नंबर से कॉल आया और कहा कि एसपी साहब बोल रहे है, अभियुक्त को जल्दी से पकड़ना है, तो उन्हें भी पैसा भेजना होगा। इस तरह से कुल मिला कर उनके खाता से 9010 रुपये उड़ा लिए गए।

सीबीआई जांच के नाम पर बड़ा फ्रॉड, साइबर ठगों ने रिटायर्ड अफसर को बनाया शिकार

 मुजफ्फरपुर बिहार के मुजफ्फरपुर में एक रिटायर अधिकारी को साइबर ठगों ने सीबीआई जांच के नाम पर डराकर 17 लाख रुपए ठग लिए। वीडियो कॉल से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर घर में नजरबंद रखा और धमकाते रहे। पैसे ट्रांसफर कर देने के बाद भी जब फ्रॉड आगे की मांग करने लगे तब जाकर पीड़ित को साइबर ठगी का अहसास हुआ। साइबर थाने में शिकायत के बाद ऐक्शन में आई पुलिस न तीन शातिरों को गिरफ्तार किया है। उनके ठिकाने से कई राज्यों के बैंक पासबुक, एटीएम और फर्जरी से जुड़े अन्य सामान बरामद किए गए हैं। ठगी गिरोह में मुजफ्फरपुर के अलावे वैशाली जिसे के शातिर भी शामिल हैं। साइबर फ्रॉड के शिकार मुजफ्फरपुर के सदर थाना क्षेत्र के खबड़ा गांव निवासी भोला प्रसाद बिजली विभाग से अवकाश प्राप्त अधिकारी हैं। पुलिस को दिए आवेदन में उन्होंने बताया कि करीब तीन हफ्ते पहले उनके व्हाट्सएप पर एक अनजान अंतरराष्ट्रीय नंबर से वीडियो कॉल आया। उन्होंने रिसीव किया तो फोन करने वाले ने बड़े रौब से बात की और खुद को सीबीआई का बड़ा अधिकारी बताया। उसने भोला प्रसाद को डरा दिया और कहा कि उनके खिलाफ जांच और बड़ी कार्रवाी चल रही है। आरोप लगाया कि बिजली विभाग की नौकरी में रहते हुए उन्होंने काफी गबन किया है। गुप्त तरीके से सीबीआई जांच में आरोप सत्य पाय जाने के कारण गिरफ्तारी वारंट निकल चुका है। कभी भी गिरफ्तारी हो सकती है। कॉलर ने धमकाया कि आपको वीडियो कॉल से डिजिटल अरेस्ट किया जा चुका है। कैमरे के सामने से हटे तो तुरंत पुलिस घर तक पहुंच जाएगी और गिरफ्तार कर लिया जाएगा। ऐसे हुआ शक बदमाशों ने कहा कि उनके खिलाफ 17 लाख गबन का प्रमाण मिला है। अंगर दिए गए अकाउंट में यह राशि जमा करा दें तो गिरफ्तारी से बच सकते हैं। विभागीय कार्रवाई चलती रहेगी। राशि जमा करा देने से कार्रवाई में राहत मिलेगी। डर के मारे उन्होंने मांगी गई राशि अपने खाते से ट्रांसफर कर दिया। जब आगे भी उन्हें धमकाया गया और पैसों की डिमांड की तो उन्हें शक हो गया। जब उन्होंने सवाल पूछना शुरू किया तो फ्रॉड ने कॉल डिस्कनेक्ट कर नंबर को बंद कर दिया। उसके बाद उन्हें सच्चाई का पता चला। वैज्ञानिक जांच से चिन्हित हुए शातिर पीड़ित ने साइबर थाने में केस दर्ज कराया। साइबर डीएसपी हिमांशु के नेतृत्व में गठित टीम ने बैंक खातों की जांच करके स्थानीय शातिरों को चिन्हित किया और उनकी गिरफ्तारी की गई। सिटी एसपी मोहिबुल्लाह अंसारी ने बताया कि साइबर टीम ने ट्रांजेक्शन पाथ, मोबाइल नंबर और अन्य तरीकों से वैशाली में छापेमारी की। पुलिस ठिकाने पर पहुंची तो दंग रह गई। ठिकाने पर इंटरनेशन कॉलिंग डिवाइस, कई राज्यों के बैंक खातों के सबूत और अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मिले। मुजफ्फरपुर के मनियारी में भी छापेमारी करके विक्रम कुमार नाम के शातिर को पकड़ा। उसकी निशानदेही पर बृजेश कुमार और कृष्ण कुमार की गिरफ्तारी की गई। सभी गिरोह से जुड़े हैं। पुलिस पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है।

ऑनलाइन शॉपिंग में नया साइबर खतरा, हजारों फर्जी अकाउंट से हो रही ठगी

भारत में ऑनलाइन शॉपिंग अब जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है. लेकिन इसी के साथ ठगी का तरीका भी तेजी से बदल रहा है. अब फोन कॉल या OTP वाला पुराना स्कैम पीछे छूट रहा है. एक नया ज्यादा खतरनाक और बड़े स्तर पर होने वाला फ्रॉड OTP स्कैम से भी आगे निकल रहा है. इसे ही अब जामताड़ा स्टाइल ई-कॉमर्स फ्रॉड कहा जा रहा है, लेकिन फर्क ये है कि इस बार सब कुछ मशीनों से चल रहा है. जामताड़ा के बारे में नहीं पता तो बता दें कि ये जगह झारखंड में है. जामताड़ा नाम की वेब सीरीज भी बन चुकी है. दरअसल जामताड़ा से देश दुनिया भर में साइबर स्कैम होते आए हैं. वहां कई ऐसे ग्रुप्स हैं जो सालों से साइबर फ्रॉड कर रहे हैं. हाल ही में आई एक रिपोर्ट में सामने आया है कि ठग अब डिवाइस फार्मिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. आसान भाषा में समझें तो ये लोग एक साथ सैकड़ों-हजारों मोबाइल या वर्चुअल डिवाइस चलाते हैं. डिवाइस फार्मिंग और ई-कॉमर्स वेबसाइट को चूना इन डिवाइस से नकली अकाउंट बनाए जाते हैं और ई-कॉमर्स वेबसाइट्स को चूना लगाया जाता है. यह पूरा काम इंसान से ज्यादा सिस्टम और ऑटोमेशन के जरिए होता है. पहले जामताड़ा में बैठकर ठग लोगों को फोन करते थे, लिंक भेजते थे और OTP लेकर पैसे निकाल लेते थे. अब वही ठग या उसी तरह के नेटवर्क टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं. फर्क बस इतना है कि अब आपको कॉल नहीं आएगा, बल्कि ठगी पर्दे के पीछे चुपचाप हो रही होगी. मान लीजिए किसी शॉपिंग ऐप पर पहले ऑर्डर पर 500 रुपये की छूट मिल रही है. एक आम यूजर इसे एक बार इस्तेमाल करेगा. लेकिन ये गैंग क्या करता है? ये हजारों फर्जी अकाउंट बनाता है. हर अकाउंट को नया यूजर दिखाया जाता है और हर बार वही 500 रुपये की छूट ली जाती है. यानी जहां एक यूजर एक बार फायदा उठाता है, वहीं ये गैंग हजारों बार वही ऑफर ले लेता है. इससे कंपनी को बड़ा नुकसान होता है और पूरा सिस्टम गड़बड़ा जाता है. क्या होती है डिवाइस फार्मिंग? डिवाइस फार्मिंग दरअसल हजारों स्मार्टफोन्स का ग्रुप होता है. हजारों फोन यानी हजारों सिम और हजारों अकाउंट्स. इन अकाउंट्स के जरिए कई तरह के फर्जी काम किए जाते हैं. बॉट पंपिंग से लेकर फेक रिव्यू तक कराने के लिए स्कैमर्स इसी तरह के अकाउंट का सहारा लेते हैं. इनके जरिए फेक रिव्यू दे कर किसी प्रोडक्ट की रेटिंग को ऊपर किया जाता है. ऐसे ही किसी प्रोडक्ट की रेटिंग गिराने के लिए भी ये बल्क में कॉमेंट और डाउनवोट करते हैं. हाल ही में राघव चढ्ढा ने आम आदमी पार्टी छोड़ कर बीजेपी ज्वाइन किया है. उनके 1 मिलियन इंस्टाग्राम फॉलोअर्स कम हो गए. लेकिन इसके बावजूद इनके फॉलोअर्स तेजी से बढ़ने लगे. थोड़ा चेक करने के बाद पता चला कि ये काफी बॉट अकाउंट उन्हें फॉलो कर रहे हैं जो इसी महीने बनाए गए हैं.   प्रॉपर प्रोसेस होता है यूज इस फ्रॉड का स्केल इतना बड़ा है कि यह किसी छोटे ग्रुप का काम नहीं लगता. रिपोर्ट्स में कहा गया है कि इसके पीछे पूरा नेटवर्क काम करता है. कुछ लोग फर्जी सिम कार्ड जुटाते हैं, कुछ अकाउंट बनाते हैं, और कुछ लोग ऑर्डर प्लेस करके सामान को आगे बेच देते हैं. यानी यह अब ठगी नहीं, बल्कि एक पूरा बिजनेस मॉडल बन चुका है. इस पूरे खेल को जामताड़ा 2.0 इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि सोच वही पुरानी है, लेकिन तरीका पूरी तरह नया है. पहले लोगों को बेवकूफ बनाकर पैसा निकाला जाता था, अब सिस्टम को ही बेवकूफ बनाया जा रहा है. इसका असर सिर्फ कंपनियों तक सीमित नहीं है. जब इस तरह के फ्रॉड बढ़ते हैं, तो कंपनियां अपने ऑफर्स कम कर देती हैं. डिस्काउंट घट जाते हैं और असली यूजर्स को नुकसान होता है. यानी आखिर में कीमत आम लोगों को ही चुकानी पड़ती है. फ्रॉड डिटेक्शन है मुश्किल सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस तरह के फ्रॉड को पकड़ना आसान नहीं है. हर अकाउंट अलग दिखता है, हर डिवाइस नया लगता है और सब कुछ ऑटोमेटेड तरीके से चलता है. यही वजह है कि अब कंपनियां AI और एडवांस सिक्योरिटी सिस्टम का सहारा ले रही हैं. लेकिन यह एक तरह की दौड़ बन चुकी है. एक तरफ कंपनियां सिस्टम मजबूत कर रही हैं, तो दूसरी तरफ ठग नए तरीके निकाल रहे हैं. इस पूरे मामले से एक ये तो क्लियर है कि, जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे ठगी के तरीके भी स्मार्ट होते जा रहे हैं. अब खतरा सिर्फ फोन कॉल या लिंक से नहीं है, बल्कि बैकएंड में चल रहे उन सिस्टम्स से है जो दिखते नहीं, लेकिन बड़ा नुकसान कर देते हैं.

साइबर ठगी रैकेट का खुलासा, बैंक कर्मचारी फर्जी खाते के आरोप में गिरफ्तार

नई दिल्ली दिल्ली में साइबर ठगी रैकेट से जुड़े मामले में एक निजी बैंक कर्मचारी की गिरफ्तारी ने जांच एजेंसियों को बड़ा सुराग दिया है. दिल्ली पुलिस के अनुसार, 35 वर्षीय बैंक कर्मचारी इरशाद मलिक को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बैंक खाता खोलकर ठगी की रकम ट्रांसफर कराने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. आरोपी मूल रूप से गाजियाबाद का रहने वाला है. पुलिस ने बताया कि यह मामला अक्टूबर 2023 में द्वारका में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा है. शिकायत एक पुलिस अधिकारी ने दर्ज कराई थी, जिसमें उनके बैंक खाते से बिना अनुमति और बिना ओटीपी प्रमाणीकरण के 88 हजार रुपये की अनधिकृत निकासी की बात सामने आई थी. जांच के दौरान सामने आया कि रकम एक निजी बैंक खाते में ट्रांसफर की गई थी. आगे की जांच में पता चला कि यह खाता एक निजी फर्म के नाम पर खोला गया था, लेकिन इसके लिए इस्तेमाल किए गए दस्तावेज फर्जी थे. दस्तावेजों में जिस व्यक्ति का नाम इस्तेमाल किया गया, उसने बाद में ऐसे किसी खाते की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया. फर्जी दस्तावेजों से खोला गया खाता पुलिस के मुताबिक, फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की जांच में खाता खोलने वाले फॉर्म पर किए गए हस्ताक्षर फर्जी पाए गए. साथ ही यह भी सामने आया कि खाता बिना उचित केवाईसी प्रक्रिया पूरी किए ही खोल दिया गया था. यह गंभीर लापरवाही और जानबूझकर नियमों की अनदेखी का मामला माना जा रहा है. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि इरशाद मलिक की मुलाकात सह-आरोपी हरजिंदर उर्फ हरजी से हुई थी. हरजी ने उसे कमीशन का लालच देकर ऐसे फर्जी खातों को खोलने और ठगी की रकम ट्रांसफर कराने के लिए तैयार किया. पुलिस ने 10 अप्रैल को आरोपी को न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि उसने जानबूझकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर खाता खोला और ठगी की रकम को आगे भेजने के बदले कमीशन लिया. पुलिस के अनुसार यह खाता एक बड़े साइबर ठगी नेटवर्क में इस्तेमाल हो रहा था, जहां लोगों को सोशल मीडिया समूहों के जरिए नकली निवेश और पार्ट-टाइम नौकरी के झांसे देकर फंसाया जाता था. पहले भी गिरफ्तार हो चुके हैं चार आरोपी पुलिस ने बताया कि इस मामले में चार सह-आरोपी पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं और फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. मामले की जांच जारी है और साइबर ठगी के इस बड़े नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश की जा रही है.

3.03 करोड़ की ठगी केस में आरोपी को राहत, जांच पूरी होने पर कोर्ट का फैसला

 चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक 'डिजिटल अरेस्ट' साइबर ठगी मामले में अहम टिप्पणी करते हुए आरोपित को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपों की गंभीरता के बावजूद आरोपित की भूमिका सीमित होने और जांच पूरी हो जाने के मद्देनजर उसे निरंतर हिरासत में रखना उचित नहीं है। जस्टिस मनीषा बत्रा की एकल पीठ आरोपित विक्रम सिंह की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला उस साइबर ठगी से जुड़ा है, जिसमें एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल को वीडियो काल और फोन के जरिए 'डिजिटल अरेस्ट' में रखकर करीब 3.03 करोड़ रुपये ठग लिए गए थे। मामले के अनुसार, 3 जनवरी 2025 को पीड़िता को कुछ लोगों ने खुद को कानून प्रवर्तन एजेंसियों का अधिकारी बताकर फोन किया। उसे गंभीर आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी गई और लगातार वीडियो काल के जरिए निगरानी में रखा गया। उसे घर से बाहर न निकलने, किसी से संपर्क न करने और निर्देशों का पालन करने को मजबूर किया गया। इस तरह उसे मानसिक रूप से ‘वर्चुअल कैद’ में रखकर भारी रकम अलग-अलग खातों में ट्रांसफर करवाई गई। जांच में सामने आया कि ठगी की रकम को कई खातों के जरिए घुमाया गया। आरोपित विक्रम सिंह पर आरोप है कि उसने ठगी की रकम में से 4.26 लाख रुपये प्राप्त कर उसे क्रिप्टो करेंसी में बदलने में मदद की और इसके बदले कमीशन भी लिया अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपित 18 फरवरी 2025 से हिरासत में है, जांच पूरी हो चुकी है और मुकदमे के लंबा चलने की संभावना है। ऐसे में उसकी निरंतर कैद उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी का पीड़िता से सीधे संपर्क या धमकी देने में कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं पाई गई। हालांकि, राज्य पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए इसे एक संगठित साइबर अपराध करार दिया और कहा कि पैसे के लेन-देन में शामिल हर कड़ी इस अपराध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।