भव्य और दिव्य कुंभ की तैयारी तेज, संतों के शिविरों के लिए भूमि आवंटन प्रक्रिया शुरू
देहरादून/हरिद्वार। हरिद्वार की धरती पर जब कुंभ का आयोजन होता है, तो यह केवल एक धार्मिक मेला नहीं रहता, बल्कि आस्था, अध्यात्म, संस्कृति और परंपराओं का विराट संगम बन जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों से करोड़ों श्रद्धालु गंगा स्नान और संतों के दर्शन के लिए हरिद्वार पहुंचते हैं। वहीं साधु-संतों, अखाड़ों, आश्रमों और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के शिविरों से मेला क्षेत्र एक अलग ही आध्यात्मिक दुनिया का रूप ले लेता है। इसी भव्य आयोजन को लेकर हरिद्वार कुंभ मेला प्रशासन ने तैयारियों को गति देना शुरू कर दिया है। इस बार भी मेला क्षेत्र में अलग से ‘कुंभ नगरी’ बसाई जाएगी, जहां साधु-संतों के साथ विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के शिविर आकार लेंगे। उत्तराखंड सरकार और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की प्राथमिकता कुंभ को भव्य, दिव्य, सुव्यवस्थित और श्रद्धालु-केंद्रित बनाने की है। इसी दिशा में मेला प्रशासन ने धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं से शिविर लगाने के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदन प्रक्रिया 30 अक्टूबर तक चलेगी और इसके बाद जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर भूमि आवंटन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। अब तक 100 से अधिक आवेदन मेला प्रशासन को प्राप्त हो चुके हैं। प्रशासन का लक्ष्य दिसंबर तक भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी करने का है, ताकि संत-महात्मा और धार्मिक संस्थाएं समय रहते अपने शिविरों के निर्माण और अन्य तैयारियों को शुरू कर सकें। जब हरिद्वार में बसती है एक और दुनिया कुंभ के दौरान हरिद्वार का मेला क्षेत्र अपने सामान्य स्वरूप से बिल्कुल अलग दिखाई देता है। विशाल पंडाल, साधु-संतों के शिविर, अखाड़ों की पेशवाई, भजन-कीर्तन, प्रवचन, यज्ञ और भंडारे—इन सबके बीच एक ऐसी नगरी आकार लेती है, जिसे श्रद्धालु और संत समाज ‘कुंभ नगरी’ के नाम से जानते हैं। यह नगरी किसी अस्थायी शहर से कम नहीं होती। यहां बिजली, पानी, सड़क, शौचालय और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के साथ श्रद्धालुओं के ठहरने और धार्मिक गतिविधियों के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की जाती हैं। कुंभ नगरी में अलग-अलग परंपराओं और संस्थाओं के अनुसार शिविरों की व्यवस्था होती है। महामंडलेश्वर नगर, शंकराचार्य नगर और विभिन्न आश्रमों से जुड़े संतों के शिविर इस धार्मिक नगरी की पहचान बनते हैं। इन शिविरों में दिनभर धार्मिक गतिविधियां चलती रहती हैं। कहीं सत्संग होता है, कहीं प्रवचन, कहीं भजन-कीर्तन की गूंज सुनाई देती है तो कहीं यज्ञ और हवन के आयोजन होते हैं। बड़े-बड़े भंडारों में श्रद्धालुओं को प्रसाद और भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इस तरह कुंभ नगरी केवल संतों के रहने का स्थान नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए आध्यात्मिक अनुभव का एक बड़ा केंद्र बन जाती है। संतों के शिविरों से बढ़ती है कुंभ की भव्यता कुंभ की पहचान केवल गंगा स्नान या धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं होती। अखाड़ों और संतों की उपस्थिति इसे अपना विशिष्ट स्वरूप देती है। साधु-संतों के विशाल शिविर कुंभ की भव्यता को नई पहचान देते हैं। देशभर से आने वाले संत यहां अपने अनुयायियों और श्रद्धालुओं के साथ समय बिताते हैं। अनेक शिविरों में धार्मिक अनुष्ठान, आध्यात्मिक चर्चाएं, प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। बड़ा अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी रूपेंद्र प्रकाश महाराज के अनुसार, कुंभ मेले में साधु-संतों की एक अलग नगरी बसती है। इसमें शंकराचार्य, माधवाचार्य जैसे महापुरुषों के नाम पर भी विभिन्न नगर और शिविर बनाए जाते हैं। उनके मुताबिक, मेला क्षेत्र को सेक्टर और जोन में बांटकर अधिकारियों की तैनाती की जाती है तथा प्रशासन की ओर से बिजली, पानी, सड़क और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। देशभर से आने वाले श्रद्धालु इन शिविरों में रहकर धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं। यही संत परंपरा और श्रद्धालुओं की भागीदारी कुंभ को केवल एक आयोजन नहीं रहने देती, बल्कि इसे जीवंत आध्यात्मिक परंपरा में बदल देती है। 30 अक्टूबर तक आवेदन, दिसंबर तक जमीन देने का लक्ष्य कुंभ मेला प्रशासन ने धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के लिए शिविर लगाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप देने के लिए आवेदन मांगे हैं। आवेदन 30 अक्टूबर तक लिए जाएंगे। मेला प्रशासन के अनुसार, आवेदन प्राप्त होने के बाद उनकी जांच और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। इसके बाद निर्धारित स्थानों पर संबंधित संस्थाओं को भूमि आवंटित की जाएगी। प्रशासन की कोशिश है कि दिसंबर तक भूमि आवंटन की प्रक्रिया पूरी हो जाए। इसका सीधा लाभ संतों और धार्मिक संस्थाओं को मिलेगा, क्योंकि उन्हें अपने शिविर तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। समय रहते भूमि मिलने से शिविरों की संरचना, बिजली-पानी की व्यवस्था, श्रद्धालुओं के ठहरने की तैयारी और अन्य व्यवस्थाएं चरणबद्ध तरीके से पूरी की जा सकेंगी। अब तक 100 से अधिक आवेदन प्राप्त होना इस बात का संकेत है कि धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं में कुंभ को लेकर उत्साह और तैयारी शुरू हो चुकी है। महामंडलेश्वर नगर की व्यवस्था अलग अखाड़ों और महामंडलेश्वरों के शिविरों के लिए भूमि आवंटन की व्यवस्था सामान्य धार्मिक संस्थाओं से अलग रखी गई है। कई अखाड़े अपनी निर्धारित भूमि पर ही अपने शिविर लगाते हैं। उदाहरण के तौर पर बैरागी कैंप में बैरागी अखाड़ों के लिए भूमि की व्यवस्था की जाती है। वहीं अखाड़ों से जुड़े महामंडलेश्वरों को भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी अलग तरीके से संचालित होती है। अखाड़े अपने स्तर से महामंडलेश्वरों को भूमि उपलब्ध कराते हैं। इससे संत परंपरा और अखाड़ों की आंतरिक व्यवस्था के अनुरूप शिविरों का स्वरूप तय होता है। कुंभ के दौरान अखाड़ों की उपस्थिति विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। साधु-संतों की पेशवाई और धार्मिक आयोजनों के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु इनके दर्शन के लिए पहुंचते हैं। साधु-संत और प्रशासन साथ-साथ कुंभ जैसे विशाल आयोजन को सफल बनाने के लिए प्रशासन और संत समाज के बीच बेहतर समन्वय बेहद जरूरी होता है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं की आवाजाही, संतों के शिविर, अखाड़ों की व्यवस्थाएं, धार्मिक आयोजन और सुरक्षा व्यवस्था—इन सभी को एक साथ संचालित करना बड़ी चुनौती होती है। नया अखाड़ा के महामंडलेश्वर करौली शंकर महाराज का कहना है कि कुंभ में साधु-संत और प्रशासन एक-दूसरे का सहयोग करते हैं। उनके अनुसार, इस बार हरिद्वार कुंभ की भव्य और दिव्य तैयारियां की जा रही हैं। संत समाज की भी यही इच्छा है कि देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु हरिद्वार से एक सुखद और आध्यात्मिक अनुभव लेकर लौटें। इसके लिए संत और धार्मिक संस्थाएं भी प्रशासन के साथ मिलकर व्यवस्थाओं में सहयोग करने के लिए तैयार हैं। … Read more