samacharsecretary.com

भोजशाला फैसले के बाद फिर चर्चा में धार्मिक विवाद, जानिए देश के बड़े मंदिर-मस्जिद केस

धार मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला के संबंध में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने हिंदू पक्ष को बड़ी राहत दी है. कोर्ट का यह मानना है कि भोजशाला मूल रूप से एक मंदिर है. भोजशाला कमाल मौला मस्जिद विवाद की सुनवाई हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के सामने हुई. इसने पूरे भारत में चल रहे कई मंदिर मस्जिद के  विवादों पर राष्ट्रीय बहस को एक बार फिर से तेज कर दिया है. बीते कुछ सालों में देशभर की अदालतों में ऐसी याचिकाओं में भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है जिनमें हिंदू संगठन और याचिकाकर्ताओं ने यह दावा किया है कि प्राचीन मंदिरों को तोड़कर कथित तौर पर मस्जिद या फिर दरगाह बनाई गई थीं. आइए जानते हैं उन सभी विवादों के बारे में।  ज्ञानवापी मस्जिद मामला     धार भोजशाला को कोर्ट ने मंदिर माना, हिंदू पक्ष को मिली राहत।     ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में ASI सर्वे, पूजा की अनुमति मिली।     मथुरा कृष्ण जन्मभूमि, संभल-लखनऊ मस्जिद पर भी चल रहे विवाद।     पूजा स्थल अधिनियम 1991 इन मामलों में बड़ी कानूनी बाधा।     अजमेर दरगाह, कुतुब मीनार पर भी हिंदू मंदिरों पर निर्माण के दावे। इस समय चल रहे सबसे चर्चित विवादों में से एक वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद से जुड़ा है. हिंदू पक्ष का यह कहना है कि मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ दिया गया था और उसके बाद उसी जगह पर मस्जिद बनाई गई थी।  यह मामला तब और तेज हो गया जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के एक सर्वे में कथित तौर पर मस्जिद परिसर के नीचे एक बड़े हिंदू मंदिर से जुड़े अवशेष, खंभे, नक्काशी और ढांचागत सबूत मिले. अदालत ने परिसर के अंदर व्यास जी का तहखाना क्षेत्र में हिंदू पूजा पाठ की भी अनुमति दे दी है. इससे यह विवाद इस समय न्यायपालिका के सामने मौजूद सबसे संवेदनशील धार्मिक मामलों में से एक बन गया है।  मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि  एक और बड़ी कानूनी लड़ाई श्री कृष्ण जन्मभूमि परिसर से सटे शाही ईदगाह मस्जिद के आसपास चल रही है. याचिकाकर्ताओं का यह दावा है कि ईदगाह का निर्माण प्राचीन केशवदेव मंदिर को तोड़ने के बाद किया गया था. इसे भगवान कृष्ण का जन्म स्थान माना जाता है. मस्जिद के ढांचे को हटाने और उस जगह का वैज्ञानिक सर्वे करने की मांग वाली कई याचिका इस समय इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित हैं. अयोध्या और ज्ञानवापी के बाद यह मामला सबसे बड़े धार्मिक संपत्ति विवादों में से एक बनकर उभरा है।  संभल और लखनऊ मस्जिद विवाद  शाही जामा मस्जिद विवाद भी तब विवादों में आ गया जब यह दावा सामने आया की मस्जिद का निर्माण श्री हरिहर मंदिर के ऊपर किया गया था. यह मंदिर कल्कि पूजा परंपराओं से जुड़ा है. एक स्थानीय अदालत के आदेश के बाद एक एडवोकेट कमिश्नर ने मस्जिद परिसर का सर्वे किया. इस पर मुस्लिम पक्ष ने कड़ा विरोध जताया।  इसी तरह टीला वाली मस्जिद के मामले में भी कानूनी कार्रवाई चल रही है. हिंदू याचिकाकर्ताओं का यह तर्क है कि यह ढांचा लक्ष्मण टीला पर स्थित प्राचीन शेषनागेश्वर तिलेश्वर महादेव मंदिर के ऊपर बना है. वैज्ञानिक सर्वे और मंदिर की बहाली की मांग वाली याचिकाएं अभी विचाराधीन हैं।  अजमेर दरगाह और कुतुब मीनार का मामला  राजस्थान में अजमेर शरीफ दरगाह और उसके पास स्थित अढ़ाई दिन का झोपड़ा को लेकर याचिकाएं दायर की गई हैं. हिंदू संगठनों का यह दावा है कि इन ढांचों का निर्माण प्राचीन हिंदू धार्मिक और शैक्षणिक परिसरों को तोड़कर किया गया था और वह भगवान शिव की पूजा और संस्कृत शिक्षा से जुड़े थे।  इसी के साथ दिल्ली में कुतुब मीनार परिसर के अंदर स्थित कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद से जुड़ी याचिकाएं लगातार कानूनी ध्यान आकर्षित कर रही हैं. याचिकाकर्ता अक्सर उन शिलालेखों का हवाला देते हैं जिनमें कथित तौर पर यह जिक्र है कि मस्जिद के निर्माण में 27 हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल किया गया था।  क्या है सबसे बड़ी कानूनी बाधा?  इन सब मामलों में पूजा स्थल अधिनियम 1991 सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है. यह कानून किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को बदलने पर रोक लगाता है, जैसा कि वह 15 अगस्त 1947 को मौजूद था. हालांकि अदालतें इस बात की जांच कर रही हैं कि क्या विवादित धार्मिक ढांचे के ऐतिहासिक स्वरूप का सर्वे और जांच करना इस अधिनियम के तहत कानूनी रूप से लीगल है या फिर नहीं। 

हाईकोर्ट में भोजशाला मामला गरमाया, मुस्लिम पक्ष ने मंदिर तोड़ने के आरोपों को बताया निराधार

इंदौर धार स्थित भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय करने के लिए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में चल रही याचिकाओं में बुधवार को भी सुनवाई जारी रही। मस्जिद पक्ष के वकीलों ने तर्क रखते हुए कहा कि ऐसा कोई साक्ष्य रिकार्ड पर उपलब्ध नहीं है जिससे साबित हो कि मस्जिद बनाने के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। सौ वर्ष से अधिक समय तक धार पर मुस्लिम शासकों का शासन रहा। इस दौरान उन्होंने कई इमारतों का निर्माण कराया, जिसमें पुरानी इमारतों के मलबा का उपयोग हुआ। निर्माण स्थानीय कारीगरों द्वारा किया गया था और यह बात मस्जिद में नजर आ भी रही है। राजस्व रिकॉर्ड और 700 साल की परंपरा का हवाला मस्जिद में 700 वर्ष से अधिक समय से नमाज पढ़ी जा रही है। राजस्व रिकार्ड में भी धार के सर्वे नंबर 313 पर मस्जिद ही है। मस्जिद पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया। कहा कि भोजशाला को लेकर चल रही याचिकाओं में एएसआइ अलग-अलग जवाब दे रहा है। मस्जिद में अगर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं तो अरबी में लिखी बातें भी मिली हैं। कोर्ट का समय समाप्त होने से मस्जिद पक्ष के तर्क अधूरे रहे। सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी। कोर्ट ने एएसआइ के वकील से कहा है कि मस्जिद पक्ष के तर्क सुनने के बाद वे अपने तर्क रखें।  

धार भोजशाला विवाद में 2189 पेज की रिपोर्ट MP हाईकोर्ट में दाखिल

धार. धार की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 98 दिनों तक चले वैज्ञानिक सर्वे के बाद 2189 पेज की विस्तृत रिपोर्ट मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में प्रस्तुत कर दी है। रिपोर्ट सामने आने के बाद दोनों पक्षों में हलचल तेज हो गई है और अब 16 मार्च को होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। भोजशाला परिसर में एएसआई की ओर से लगभग तीन महीने तक वैज्ञानिक पद्धति से सर्वेक्षण किया गया। इस दौरान परिसर के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद संरचनात्मक अवशेषों, पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियों, स्तंभों और स्थापत्य शैली का विस्तृत अध्ययन किया गया। सर्वे के दौरान मिले अवशेषों का वैज्ञानिक परीक्षण कर उन्हें दस्तावेजी रूप से रिपोर्ट में शामिल किया गया। अदालत ने अध्ययन के लिए दिया समय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने दोनों पक्षों को रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था। अब निर्धारित तिथि 16 मार्च को होने वाली सुनवाई में दोनों पक्ष अदालत के सामने अपने-अपने तर्क और आपत्तियां पेश करेंगे। इस कारण भोजशाला विवाद से जुड़े इस मामले की अगली सुनवाई को लेकर धार सहित पूरे प्रदेश में विशेष रुचि बनी हुई है। रिपोर्ट में स्थापत्य अवशेषों का उल्लेख सूत्रों के अनुसार एएसआई की रिपोर्ट में परिसर के भीतर मंदिर से जुड़े स्थापत्य अवशेषों और संरचनात्मक साक्ष्यों का उल्लेख किया गया है। सर्वे के दौरान पत्थरों पर उत्कीर्ण आकृतियां, प्राचीन स्तंभ, नक्काशीदार हिस्से और अन्य अवशेषों का वैज्ञानिक परीक्षण किया गया। इन सभी तथ्यों को एएसआई ने विस्तृत रूप से दस्तावेजी रूप में अदालत के सामने प्रस्तुत किया है। दोनों पक्षों की प्रतिक्रिया रिपोर्ट सामने आने के बाद मंदिर पक्ष में उत्साह का माहौल देखा जा रहा है। मंदिर पक्ष के याचिकाकर्ता आशीष गोयल का कहना है कि सर्वे रिपोर्ट में मिले साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि भोजशाला परिसर में पहले मंदिर था और बाद में उसे तोड़कर मस्जिद का निर्माण किया गया। उनके अनुसार एएसआई की रिपोर्ट से मंदिर पक्ष के दावों को मजबूती मिली है। वहीं दूसरी ओर कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी के सदर अब्दुल समद ने कहा कि वे एएसआई की रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 16 मार्च को होने वाली सुनवाई में रिपोर्ट के विभिन्न पहलुओं पर अपनी आपत्तियां और तर्क अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।

धार भोजशाला परिसर में दरगाह निर्माण पर बहस, मंदिर के हिस्सों के उपयोग की चर्चा तेज

धार  भोजशाला को लेकर एएसआई ने कोर्ट में दो हजार पेज की रिपोर्ट पेश की है। इस रिपोर्ट में खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों, सिक्कों और अन्य अवशेषों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार परमारकालीन भवन की नींव के पत्थरों पर बाद में निर्माण किया गया। सर्वे में पाए गए स्तंभों और उनकी वास्तुकला के आधार पर कहा गया है कि ये स्तंभ मूल रूप से मंदिर का हिस्सा थे, जिन्हें बाद में मस्जिद निर्माण के दौरान फिर से उपयोग में लिया गया। रिपोर्ट के अनुसार चारों दिशाओं में खड़े 106 तथा आड़े 82, इस प्रकार कुल 188 स्तंभ मिले हैं। इन सभी की वास्तुकला से यह संकेत मिलता है कि वे मूल रूप से मंदिरों का हिस्सा थे। स्तंभों पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को औजारों से खंडित किया गया है। याचिकाकर्ता आशीष गोयल का कहना है कि रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य हैं जो दर्शाते हैं कि मंदिर के हिस्सों का उपयोग दरगाह निर्माण में किया गया।  भोजशाला की दीवारों पर देवताओं की आकृतियां भी मिली हैं। सर्वे में पूर्व में परिसर से निकालकर मांडू के संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई मूर्तियों को भी शामिल किया गया है। इन्हें संरक्षण की दृष्टि से वहां रखा गया था। खुदाई में प्राप्त कलाकृतियां संगमरमर, नरम पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से निर्मित हैं।   इन कलाकृतियों में गणेश, नृसिंह, भैरव, अन्य देवी-देवताओं तथा पशु आकृतियों के चिह्न पाए गए हैं। सर्वे में दो ऐसे स्तंभ भी मिले हैं जिन पर ‘ऊँ सरस्वतै नमः’ अंकित है। रिपोर्ट के पृष्ठ संख्या 148 पर उल्लेख है कि भोजशाला में मौजूद स्तंभों की वास्तुकला यह दर्शाती है कि वे पहले मंदिर का हिस्सा थे और मस्जिद निर्माण के दौरान उन्हें बेसाल्ट के ऊंचे चबूतरों पर फिर से स्थापित किया गया। इस हिस्से में एक स्तंभ पर देवी-देवता की छवि भी है।   सर्वे रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी भाग में स्तंभों की कतार में लगे एक बड़े शिलालेख में प्राकृत भाषा में दो कविताएं अंकित हैं, जिनमें प्रत्येक में 109 छंद हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पश्चिम दिशा में स्थित मेहराब की दीवारें बेसाल्ट से बने चबूतरे से सटी हुई हैं, जिसके नीचे नक्काशी मौजूद है। चबूतरे और मेहराब की दीवारों की निर्माण शैली अलग-अलग बताई गई है। यह पहली बार नहीं है जब भोजशाला का सर्वे हुआ है। अंग्रेज शासन काल में भी इसका सर्वे किया गया था। इसके अतिरिक्त वर्ष 1987 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा किए गए उत्खनन में भोजशाला से हिंदू धर्म से संबंधित 32 मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि कमाल मौलाना दरगाह के निर्माण में पहले से मौजूद मंदिर के हिस्सों का उपयोग किया गया था। 

भोजशाला से कमाल मौला मस्जिद तक: धार में हिंदू-मुस्लिम टकराव की जड़ क्या है?

धार मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर से जुड़ी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद एक बार फिर यह विवाद चर्चा में आ गया है। सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान इस पर अपना-अपना दावा पेश करते रहे हैं। इस बीच हाई कोर्ट में एएसआई ने जो रिपोर्ट पेश की है उसमें कहा गया है कि कमाल मौला मस्जिद को मंदिर के पुराने अवशेषों से बनाया गया है। आइए नजर डालते हैं भाजशाला परिसर के एक साल के पुराने इतिहास पर। 1034 ईस्वी में भोजशाला की स्थापना 1010 से 1055 तक मालवा क्षेत्र में राजा भोज का शासन था। इस दौरान उन्होंने 1034 में सरस्वती सदन की स्थापना की, जिसे भोजशाला भी कहा जाता है। यहां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। मुस्लिम शासकों का आगमन और कमाल मौला 1305-1531- इस कालखंड में अलाउद्दीन खिलजी और दिलावर खान गोरी ने महालकदेव और गोलादेव को हराकर धार पर कब्जा कर लिया। उन्होंने राजा भोज के समय बने कई मंदिरों और स्मारकों को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद यहां स्वतंत्र मालवा सत्नत की स्थापना की गई और भोजशाला के अधिकांश हिस्से को भी ध्वस्त कर दिया गया। यहीं 1459 में मौलना कमालुद्दीन का मकबरा भी बनाया गया जिन्हें कमाल मौला के नाम से भी जाना जाता है। कमाल मौला का वास्तविक नाम शेख कमल अल-दीन था। वह मालवा में 14वीं शताब्दी के प्रमुख सूफी संत थे। निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य रहे कमाल मौला का देहांत 1331 में हुआ था। कहा जाता है कि औलिया ने उन्हें मालवा क्षेत्र में धार और आसपास के इलाकों में इस्लाम के प्रचार के लिए भेजा गया था। कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के चेयरमैन अब्दुल समद कहते हैं कि कमाल मौला मकबरा मस्जिद और विवादित भोजशाला के करीब है। कैसे वाग्देवी की प्रतिमा पहुंच गई लंदन 1732- में धार पर मराठा शासकों का कब्जा हो गया। 1875 में भोजशाला के पास खुदाई के दौरान वाग्देवी की प्रतिमा मिली, जिसे 1880 में एक अंग्रेज अधिकारी लेकर लंदन चला गया। तब से वाग्देवी की प्रतिमा लंदन के एक म्यूजियम में है। फिर कैसे आई मौजूदा व्यवस्था 1909 में धार शासकों ने प्राचीन स्मारक कानून 1904 लागू किया और धार दरबार गैजेट जारी करते हुए इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया। 1934 में धार के शासकों ने यहां से अवैध अतिक्रमण हटाते हुए भोजशाला का साईनबोर्ड लगाया। 1934 में तब के धार के दीवान के नादकर ने भोजशाला को कमाल मौलाना मस्जिद घोषित किया और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी। हिंदू मुस्लिम टकराव और ASI के हवाले भोजशाला 1944 में मौलाना कमलुद्दीन का पहला उर्स हुआ और हिंदू-मुसलमानों के बीच इस स्थल को लेकर टकराव बढ़ गया। 1952 में हिंदुओं ने बसंत पंचमी पर भोज उत्सव का आयोजन किया। 1952 में एएसआई ने भोजशाला को संरक्षित घोषित किया। 1988 में भी मरम्मत के दौरान यहां एक मूर्ति मिली थी। 1997 में धार के कलेक्टर ने शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज और बसंत पंचमी पर हिंदुओं को पूजा की अनुमति दी। अप्रैल 2003 में एएसआई ने हिंदुओं को फूल और अक्षत से हर मंगलवार को पूजा की अनुमति दी, जबकि मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा कर सकते हैं। जब शुक्रवार के दिन आई बसंत पंचमी 2006 में शुक्रवार के दिन बसंत पंचमी होने की वजह से कर्फ्यू लागू करना पड़ा। कड़ी सुरक्षा के बीच दोनों समुदायों ने अपने आयोजन किए। इसके बाद 2013 में भी जब ऐसा मौका आया तो कड़ी सुरक्षा और तनाव के बीच पूजा और नमाज हुई। हालांकि,तब लोगों ने आरोप लगाया कि आम लोगों को वहां नहीं जाने दिया गया और पुलिसकर्मियों ने ही परंपरा निभाई। 2016 में भी जब ऐसा मौका आया तो वहां दोनों समुदाय के लोग आपस में भिड़ गए थे। मार्च 2024 में सर्वेक्षण का आदेश मध्य प्रदेश की इंदौर बेंच ने मार्च 2024 में भोजशाला परिसर में सर्वे का आदेश दिया। इसे छह महीने सप्ताह में पूरा करना था। मार्च 2024 में एएसआई ने सर्वे की शुरुआत की जो 98 दिनों तक चला। 15 जुलाई 2024 को एएसआई ने 2189 पन्नों की सर्वे रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में पेश की। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को एएसआई रिपोर्ट को खोलने और सभी पक्षों को देने को कहा। इके बाद हाई कोर्ट ने रिपोर्ट की समीक्षा शुरू की और सभी पक्षों को दो सप्ताह में अपनी आपत्तियां, विचार, सलाह, सिफारिश आदि दोनों को कहा है।

भोजशाला सर्वे रिपोर्ट पर बड़ा खुलासा: दो साल पहले ही पक्षकारों तक पहुंच चुकी थी रिपोर्ट

इंदौर धार भोजशाला मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की जिस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट सीलबंद मान रहा था, वह दो साल से पक्षकारों के पास है। यह खुलासा सोमवार को उस वक्त हुआ जब हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए सर्वेक्षण रिपोर्ट के बारे में जानकारी मांगी। महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि सर्वेक्षण रिपोर्ट पूर्व में ही पक्षकारों को सौंपी जा चुकी है, लेकिन यह जानकारी न शासन ने सुप्रीम कोर्ट को दी न पक्षकारों ने, हालांकि इसके पीछे किसी की कोई दुर्भावना नहीं थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट पक्षकारों के पास है, वे चाहें तो इसे लेकर अपने सुझाव, आपत्ति 16 मार्च से पहले लिखित में कोर्ट में दे सकते हैं। आपत्ति, सुझाव पर सुनवाई के बाद कोर्ट इस मामले को अंतिम सुनवाई के लिए नियत कर देगी। बता दें कि भोजशाला मामले को लेकर हाई कोर्ट में चार याचिकाएं और एक अपील चल रही है। सोमवार को इन सभी की सुनवाई एक साथ हुई। हाई कोर्ट की युगलपीठ ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को आदेश दिया था कि वह ज्ञानवापी की तरह भोजशाला का भी विज्ञानी सर्वे कर रिपोर्ट प्रस्तुत करे। यह सर्वे 98 दिन चला जिसके बाद एएसआई ने 2189 पेज की सर्वे रिपोर्ट तैयार की थी। 4 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट के आदेश पर इस रिपोर्ट की प्रतिलिपि सभी पक्षकारों को उपलब्ध करवाई गई थी। इस बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया जिसके बाद कोर्ट ने रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में रखने के आदेश दिए थे।   जिन पक्षकारों के पास एएसआई सर्वे रिपोर्ट की प्रति है उन्होंने बताया कि-     एएसआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सर्वे में पाए गए स्तंभों और स्तंभों की कला और वास्तुकला से यह कहा जा सकता है ये स्तंभ पहले मंदिर का हिस्सा थे, बाद में मस्जिद के स्तंभ बनाते समय उनका पुन: उपयोग किया गया था।     मौजूदा संरचना में चारों दिशाओं खड़े 106 और आड़े 82 इस तरह से कुल 188 स्तंभ मिले हैं। इन सभी की वास्तुकला से इस बात की पुष्टि होती है कि ये स्तंभ मूल रूप से मंदिरों का ही हिस्सा थे।     उन्हें वर्तमान संरचना के लिए पुनर्उपयोग में लाने के लिए उन पर उकेरी गई देवताओं और मनुष्यों की आकृतियों को विकृत कर दिया गया।     मानव और जानवरों की कई आकृतियां, जिन्हें मस्जिदों में रखने की अनुमति नहीं है, उन्हें छैनी जैसे किसी वस्तु का इस्तेमाल कर विकृत किया गया था।     एएसआई ने रिपोर्ट में यह दावा भी किया है कि मौजूदा संरचना में संस्कृत और प्राकृत भाषा में लिखे कई शिलालेख मिले हैं, जो भोजशाला के ऐतिहासिक, साहित्यिक और शैक्षिक महत्व को उजागर करते हैं।     एएसआई टीम को सर्वे में एक ऐसा शिलालेख मिला जिस पर परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख है। नरवर्मन ने 1094-1133 इस्वी के बीच शासन किया था। सर्वे में यह बात भी सामने आई है कि पश्चिम क्षेत्र में लगाए गए कई स्तंभों पर उकेरे गए ''कीर्तिमुख'', मानव, पशु और मिश्रित चेहरों वाले सजावटी सामग्री को नष्ट नहीं किया गया था।

भोजशाला में पूजा का मामला सर्वोच्च अदालत में, 22 जनवरी को SC करेगा सुनवाई

धार मध्यप्रदेश के धार की भोजशाला में पूजा का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। बसंत-पंचमी पर दिनभर पूजा की मांग करते हुए कोर्ट में याचिका लगाई गई है। हिंदू पक्ष ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका लगाई। इस पर 22 जनवरी को सुनवाई होगी। भोजशाला में बसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन उत्सव आयोजित किया गया जाता है। इस दिन शुक्रवार होने से यहां नमाज भी होगी जिसके चलते दोनों पक्षों में टकराव की स्थिति बन चुकी है। इस माहौल को देखते हुए धार और भोजशाला परिसर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं। भोजशाला में वसंत पंचमी के अवसर पर हिंदू सरस्वती पूजा करते हैं जबकि शुक्रवार को यहां मुस्लिमों को नमाज की भी इजाजत है। इस बार वसंत पंचमी 23 जनवरी को शुक्रवार के दिन पड़ रही है जिससे दोनों पक्षों में विवाद पैदा हो गया है। हिंदू पक्ष वसंत पंचमी को पूरे दिन अखंड सरस्वती पूजा की अनुमति मांग रहा है। अब इसके लिए देश की शीर्ष अदालत में याचिका दायर की गई है। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से मंगलवार को याचिका दाखिल की गई। सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया है। हरिशंकर जैन के सहयोग से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने याचिका दायर की है।   भोजशाला में जुमे की नमाज पर रोक लगाने की मांग की याचिका में कहा गया है कि 23 जनवरी को वसंत पंचमी है। इस दिन भोजशाला में परंपरागत रूप से सरस्वती पूजा की जाती है। यहां वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजन के लिए केवल हिंदू समाज को ही अनुमति दी जाए। दिनभर पूजा ही चले। याचिका में शुक्रवार के दिन भोजशाला में जुमे की नमाज पर रोक लगाने की भी मांग की गई है। याचिका पर कार्यक्रम के एक दिन पहले यानि 22 जनवारी को सुनवाई की जाएगी।