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ईरान-इजरायल से लेकर पाक-अफगान तक युद्ध, करोड़ों बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा गहरा असर, सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट

  नई दिल्ली आज दुनिया के नक्शे पर एक बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां स्कूलों की घंटी नहीं बल्कि धमाकों का शोर सुनाई दे रहा है. ईरान-इजरायल, रूस-यूक्रेन, पाक-अफगान से लेकर दुन‍िया के कई देश इस आग में झुलस रहे हैं. लेकिन इस सनक का सबसे ज्यादा खामियाजा अगर कोई भुगत रहा है या भुगतने वाला है तो वो आज के बच्चे यानी कल के युवा…  दुनिया की सबसे बड़ी बाल अधिकार संस्था 'सेव द चिल्ड्रन' की ताजा और डराने वाली रिपोर्ट ने इस खतरे को सामने रखा है. रिपोर्ट कहती है कि मिडिल ईस्ट और उसके आसपास के देशों में जारी हिंसा ने करीब 5.2 करोड़ बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप कर दी है। यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसे एक 'एजुकेशन इमरजेंसी' कहा जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र के डेटा पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि 5 से 17 साल के करोड़ों बच्चे अब स्कूल जाने के बजाय अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। ईरान में 65 स्कूल मलबे में तब्दील ईरानियन रेड क्रिसेंट सोसाइटी के हवाले से खबर है कि अकेले ईरान में हवाई हमलों ने 65 स्कूलों को पूरी तरह तबाह कर दिया है. जिन कमरों में बच्चे पहाड़े और कविताएं याद करते थे, वहां अब सिर्फ ईंट-पत्थर और धुआं बचा है। स्कूल नहीं, अब 'शेल्टर होम' कहिए रिपोर्ट में उन 12 देशों का जिक्र है जहां शिक्षा व्यवस्था आईसीयू (ICU) पर है. इनमें ईरान, इजरायल, जॉर्डन, सऊदी अरब, फिलिस्तीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश शामिल हैं. इन देशों में दो बड़ी चुनौतियां सामने आई हैं। स्कूलों पर हमला: कई स्कूल बमबारी में क्षतिग्रस्त हो गए हैं. मजबूरी में शरण: जो स्कूल बच गए हैं, उन्हें बंद कर दिया गया है क्योंकि वहां बेघर हुए हजारों परिवार शरण लिए हुए हैं. यानी क्लासरूम अब रहने के ठिकानों में बदल गए हैं। ऑनलाइन पढ़ाई भी फेल! हालांकि कुछ देशों ने बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई से जोड़ने की कोशिश की, लेकिन संसाधनों की कमी और बार-बार कटते इंटरनेट ने इस उम्मीद को भी तोड़ दिया है. कई इलाकों में बिजली और सुरक्षित इंटरनेट न होने के कारण बच्चे महीनों से अपनी किताबों से दूर हैं. बता दें कि इस क्षेत्रीय अस्थिरता का असर सिर्फ युद्ध लड़ रहे देशों तक सीमित नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में भी इस हिंसा का 'रिपल इफेक्ट' (लहर जैसा असर) दिख रहा है. वहां भी अस्थिरता की वजह से बच्चों की नियमित पढ़ाई में बाधा आ रही है।

मध्य प्रदेश कॉलेजों में हलचल, 800 प्रोफेसरों का पद घटाने का फैसला

भोपाल  उच्च शिक्षा विभाग की ओर से सहायक प्राध्यापकों (असिस्टेंट प्रोफेसर) की अंतरिम वरिष्ठता सूची जारी करते ही प्रदेश के कॉलेज प्रोफेसरों में हड़कंप मच गया है। विभाग ने यह सूची 1 अप्रैल 2012 की स्थिति के आधार पर विषयवार प्रकाशित की है। सूची जारी होने के बाद सामने आया कि इसमें करीब 800 ऐसे प्रोफेसरों के नाम असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में दर्ज कर दिए गए क है, जिन्हें वर्ष 2006, 2007 और 2009 में ही प्रोफेसर का पदनाम दिया जा चुका था। सूची में सामने आई गड़बड़ियां वरिष्ठता सूची के अनुसार ये सभी नाम सहायक प्राध्यापक की श्रेणी में दिखाए गए हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि इनमें से कई शिक्षकों को वर्षों पहले प्रोफेसर का पदनाम मिल चुका है। इतना ही नहीं, इन प्रोफेसरों में से कई वर्तमान में उच्च पदों पर भी कार्यरत है। कुछ लोग अतिरिक्त संचालक (एडी), विश्वविद्यालयों में रजिस्ट्रार और यहां तक कि कुलपति जैसे पदों पर भी जिम्मेदारी संभाल चुके है। 15 दिनों के भीतर दर्ज करा सकते है आपत्ति विभाग ने सूची जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि यह लोक सेवकों की अंतरिम वरिष्ठता सूची है। यदि किसी को इसमें त्रुटि या आपत्ति है तो वह प्रकाशन की तारीख से 15 दिनों के भीतर अपने दावे-आपत्तियों के साथ अभ्यावेदन उचित माध्यम से आयुक्त, उच्च शिक्षा, मध्यप्रदेश को भेज सकता है। निर्धारित समय सीमा के बाद प्राप्त होने वाले अभ्यावेदनों पर विचार नहीं किया जाएगा। तालमेल की कमी- प्रांताध्यक्ष विभाग और राज्य शासन के बीच तालमेल की कमी है। इस तरह की स्थिति कई मामलों में बनती है। यह स्थिति ठीक नहीं है। यह कोर्ट केस की स्थिति बनती है तो इससे न्यायलय में शासन का पक्ष कमजोर होगा।- डॉ. आनंद शर्मा, प्रांताध्यक्ष, प्रांतीय शासकीय महाविद्यालयीन प्राध्यापक 

शिक्षा विभाग ने जारी किया अलर्ट, 7 दिन अनुपस्थिति वाले कर्मचारियों को लगेगा कड़ा कदम

भोपाल  मध्यप्रदेश में अब स्कूलों से गायब रहने वाले शिक्षकों पर बड़ी कार्रवाई तय मानी जा रही है। लोक शिक्षण संस्थान विभाग के नए निर्देश के मुताबिक यदि कोई शिक्षक लगातार 7 दिन तक बिना सूचना के अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सेवा सीधे समाप्त की जा सकती है। इस फैसले ने शिक्षा महकमे में हलचल मचा दी है। स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप ने दो टूक कहा कि विभाग में अनुशासन सर्वोपरि है। “हर सिस्टम की अपनी मर्यादा होती है। अगर शिक्षक ही जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे तो बच्चों का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा?” मंत्री ने साफ कर दिया कि शिक्षा व्यवस्था में ढिलाई या मनमानी अब किसी भी हाल में स्वीकार नहीं की जाएगी।  क्या है नया आदेश? लगातार 7 दिन बिना सूचना गैरहाजिरी पर सेवा समाप्ति की कार्रवाई संबंधित अधिकारी को अनुपस्थिति की रिपोर्ट अनिवार्य विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित होने पर जवाबदेही तय क्यों लिया गया फैसला? सूत्रों के अनुसार, कई जिलों से शिक्षकों की लगातार गैरहाजिरी की शिकायतें मिल रही थीं। इससे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही थी और अभिभावकों में नाराजगी बढ़ रही थी। विभाग ने इसे गंभीरता से लेते हुए सख्त रुख अपनाया है।सख्ती या सख्त संदेश?मंत्री राव उदय प्रताप ने कहा कि यह कदम किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए है। “बच्चों के भविष्य से कोई समझौता नहीं होगा। जो जिम्मेदारी निभाएगा, उसे पूरा सम्मान मिलेगा; लेकिन लापरवाही पर सीधी कार्रवाई होगी। अब देखना होगा कि इस सख्त आदेश के बाद शिक्षा व्यवस्था में कितना सुधार आता है और गैरहाजिर रहने वाले शिक्षकों पर क्या असर पड़ता है। फिलहाल, शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है ड्यूटी से गायब रहना अब महंगा पड़ेगा। 

सरकार बदली, चुनौतियाँ वही: शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर क्या होगा असर?

छपरा बिहार में नई सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी जनता तब हैरान रह गई, जब मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री जैसे अहम पद फिर से पुराने चेहरों को ही सौंप दिए गए। इसके बाद राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार को लेकर कई सवाल तेज हो गए हैं। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंत्रिमंडल में स्थिरता प्रशासनिक निरंतरता के लिहाज से फायदेमंद हो सकती है, लेकिन जिन विभागों की पिछले कार्यकाल में सबसे ज्यादा आलोचना हुई, जैसे सरकारी अस्पतालों की बदहाली, चिकित्सकों-कर्मियों की कमी, स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति और कमजोर आधारभूत संरचना उनमें बदलाव न होना जनता के मन में संदेह पैदा कर रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार को लेकर बढ़ा असंतोष स्थानीय लोगों का कहना है कि सदर अस्पतालों से मरीजों को बिना इलाज रेफर कर देने की पुरानी व्यवस्था अब खत्म होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग की आधारभूत संरचना तो तैयार कर दी गई है, लेकिन डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मियों की भारी कमी आज भी बनी हुई है। विगत वर्षों में स्वास्थ्य विभाग पर कई गंभीर आरोप लगे हैं, अस्पतालों में दवाओं और मशीनों की कमी, पंचायत स्तर तक स्वास्थ्य सेवाओं का कमजोर होना और बेहतर इलाज के लिए बिहार से बाहर जाने वाले मरीजों की बढ़ती संख्या प्रमुख मुद्दे हैं। ऐसे में पुरानी टीम का ही पुनः जिम्मेदारी संभालना जनता के बीच यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या अबकी बार वाकई बदलाव देखने को मिलेगा। सारण प्रमंडल के सारण, सिवान और गोपालगंज जिलों सहित कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं “इलाज” से ज्यादा “रेफर” आधारित व्यवस्था पर निर्भर हैं। सड़क हादसे, गोलीबारी और अन्य आपात मामलों में प्रखंड अस्पतालों से लेकर जिला सदर अस्पताल तक केवल औपचारिकता निभाकर मरीजों को पटना पीएमसीएच या अन्य मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। शिक्षा विभाग में भी सुधारों पर सवाल शिक्षा विभाग पर भी सरकार लगातार निशाने पर रही है। शिक्षकों की भारी कमी, स्कूलों में संसाधनों की दयनीय स्थिति और सरकारी स्कूलों के गिरते परिणामों ने चिंता बढ़ाई है। विभाग से जुड़े अधिकारियों व शिक्षक संघों का कहना है कि बिना संरचनात्मक सुधार के केवल घोषणाओं से शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने दावा किया है कि 2025–30 के कार्यकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, और बजट व इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों स्तरों पर बड़े कदम उठाए जाएंगे। क्या बदलेगी बिहार की तस्वीर? अब जनता की नजर इस बात पर है कि क्या पुरानी टीम, नई नीतियों और नई ऊर्जा के साथ सचमुच स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों की जर्जर स्थिति को बदल पाएगी। विशेषकर शिक्षा विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मौजूदा शिक्षा मंत्री को सौंपी गई है। जनता अब सरकारी दावों नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव का इंतजार कर रही है।

डॉक्टर बेटी और सीए बेटे के भविष्य के लिए माता-पिता ने छोड़ी संपत्ति, संन्यास के लिए तैयार

नरसिंहपुर  नरसिंहपुर शहर के ओसवाल (बच्छावत) परिवार की बेटी अनामिका ओसवाल, अपने पति दिनेश कांकरिया, डॉक्टर बेटी हर्षिता और चार्टर्ड अकाउंटेंट में अध्ययनरत बेटे विधान के साथ सांसारिक मोहमाया त्यागकर सन्यास के मार्ग पर अग्रसर हो रही हैं। यह पूरा परिवार आगामी 9 नवंबर को आचार्य जिन पीयूष सागर के पावन सान्निध्य में जैन दीक्षा ग्रहण करेगा। ​स्वर्गीय टीकमचंद ओसवाल और श्रीमती कमलाबाई ओसवाल की बेटी अनामिका, जिनका विवाह महाराष्ट्र के धूलिया निवासी दिनेश कांकरिया से हुआ था, उनके परिवार के इस त्याग को समाज एक प्रेरणादायी कदम मान रहा है। परिवार के पास करीब 5 करोड़ से अधिक की चल-अचल संपत्ति है, जिसे छोड़कर वे आत्मसाधना में लीन होंगे। गौरतलब है कि इस परिवार की एक और बेटी वर्ष 2022 में ही दीक्षा लेकर साध्वी शाश्वत निधि के रूप में साधना कर रही हैं। ​सकल जैन श्वेतांबर संघ द्वारा इस दीक्षार्थी परिवार के अभिनंदन में 9 नवंबर को भव्य समारोह का आयोजन किया जा रहा है। अभिनंदन समारोह श्री मुनिसुब्रत स्वामी जैन श्वेतांबर मंदिर, गुदरी बाजार में सुबह 10.30 बजे से होगा। इससे पूर्व, दीक्षार्थी परिवार का बरघोड़ा (शोभा यात्रा) समारोहपूर्वक मेन रोड से होते हुए बाहरी रोड तक जाएगा। इस अवसर पर विनम्र सागर, पुण्यवर्धन, गुणवर्धन महाराज के पावन सान्निध्य में कार्यक्रम संपन्न होगा। परिवार के एडवोकेट अखिलेश ओसवाल ने इस ऐतिहासिक दीक्षा के संबंध में जानकारी दी।