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विजयपुर में 16 करोड़ रुपये से बनेगा अत्याधुनिक हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, डिजाइन में सुधार कर शीघ्र स्वीकृति भेजने के निर्देश

रायपुर वित्त मंत्री ओ.पी. चौधरी ने मंगलवार को रायगढ़ जिले में प्रस्तावित विभिन्न विकास परियोजनाओं का स्थल निरीक्षण कर अधिकारियों को सभी कार्य निर्धारित समय-सीमा और उच्च गुणवत्ता के साथ पूर्ण करने के निर्देश दिए। उन्होंने विजयपुर में प्रस्तावित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर, केलो नदी के खर्रा घाट पर विकसित किए जा रहे मैरीन ड्राइव तथा पुराने जेल परिसर में प्रस्तावित व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स की योजनाओं की विस्तार से समीक्षा की। विजयपुर में लगभग 16 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर के निरीक्षण के दौरान वित्त मंत्री ने अधिकारियों को भवन की ड्राइंग एवं डिजाइन में आवश्यक सुधार कर इसे भविष्य की जरूरतों के अनुरूप अधिक उपयोगी बनाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि संशोधित प्रस्ताव शीघ्र अंतिम स्वीकृति के लिए भेजा जाए, ताकि निर्माण कार्य जल्द प्रारंभ हो सके। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के पूरा होने से रायगढ़ जिले में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार होगा और लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध होंगी। इसके बाद वित्त मंत्री ने केलो नदी के खर्रा घाट पर लगभग 30 करोड़ रुपये की लागत से विकसित किए जा रहे मैरीन ड्राइव परियोजना का निरीक्षण किया। लगभग दो किलोमीटर लंबी इस परियोजना का कार्यादेश जारी हो चुका है। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि यह परियोजना रायगढ़ की नई पहचान बनेगी, इसलिए निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और समयबद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाए। मैरीन ड्राइव परियोजना के अंतर्गत घाट का सौंदर्यीकरण, गज़ीबो, आरसीसी पाथवे, आकर्षक प्रकाश व्यवस्था, प्रोमेनेड, फूड कोर्ट, बाह्य विद्युतीकरण सहित विभिन्न आधुनिक अधोसंरचनात्मक सुविधाएं विकसित की जाएंगी। इसके पूर्ण होने से शहरवासियों को मनोरंजन, पर्यटन और सार्वजनिक उपयोग की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध होंगी। निरीक्षण के दौरान वित्त मंत्री ने पुराने जेल परिसर का भी अवलोकन किया, जहां जर्जर भवन को हटाकर आधुनिक व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स विकसित किया जाना प्रस्तावित है। उन्होंने अधिकारियों को परियोजना से संबंधित सभी आवश्यक औपचारिकताएं शीघ्र पूर्ण कर नियमानुसार आगे की कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इस अवसर पर महापौर जीवर्धन चौहान, विजय अग्रवाल, कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी सहित संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे।

स्टूल में खून दिखे तो न करें नजरअंदाज, जानें रंग क्या बताता है और कब तुरंत डॉक्टर से मिलें

मल में खून आना (Rectal Bleeding) एक ऐसा लक्षण है जिसे अक्सर लोग बवासीर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, हर बार इसका कारण बवासीर नहीं होता। कई बार यह पाचन तंत्र की गंभीर समस्याओं जैसे इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD), डाइवर्टिकुलर डिजीज, पेट या आंतों में अल्सर, पॉलीप्स और यहां तक कि कोलोरेक्टल कैंसर का संकेत भी हो सकता है। डॉक्टर्स के मुताबिक स्टूल में खून का रंग बीमारी के कारण का महत्वपूर्ण संकेत देता है। चमकीला लाल खून आमतौर पर गुदा या निचली आंत से संबंधित समस्याओं की ओर इशारा करता है, जबकि गहरा लाल, मैरून या काला टार जैसा मल ऊपरी पाचन तंत्र में ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है। व्यक्ति को यदि पेट दर्द, कमजोरी, चक्कर आना, मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसे लक्षण महसूस होते हैं, तो उन्हें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। मल में खून आना क्या बीमारी है? क्लिवलैंड क्लीनिक के मुताबिक मल में खून आने की स्थिति को रेक्टल ब्लीडिंग के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब होता है कि गुदा (रेक्टम) या पाचन तंत्र के किसी हिस्से से खून का निकलना, जो कि मल के साथ दिखाई देता है। यह ब्लड अलग-अलग रंग जैसे कि चमकीला लाल, गहरा लाल, मैरून या काला रंग का दिखाई दे सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार खून का रंग यह बताने में मदद करता है कि ब्लीडिंग पाचन तंत्र के किस हिस्से से हो रही है। मल में खून कौन से रंग का दिखाई दे सकता है? मल में खून का रंग और बनावट डॉक्टरों को संभावित कारण पहचानने में मदद करते हैं। चमकीला लाल खून  हेल्थडायरेक्ट के अनुसार यदि टॉयलेट पेपर, कमोड या स्टूल की सतह पर चमकीला लाल खून दिखाई दे, तो यह आमतौर पर गुदा या निचले कोलन से होने वाली ब्लीडिंग का संकेत होता है। इसके सामान्य कारण में बवासीर (Hemorrhoids), एनल फिशर (गुदा में दरार), रेक्टल इंफेक्शन और निचले कोलन की सूजन को शामिल किया जाता है। मल में खून आने के कारण  एनसीबीआई के मुताबिक यदि स्टूल गहरे लाल या मैरून रंग का दिखाई दे तो यह बड़ी आंत या छोटी आंत के ऊपरी हिस्से में ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है। इसके संभावित कारण में डाइवर्टिकुलर डिजीज, इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (IBD), कोलन पॉलीप्स और कोलोरेक्टल कैंसर को शामिल किया जाता है। काला और चिपचिपा मल (Black, Tarry Stool) क्लिवलैंड क्लीनिक के मुताबिक यदि मल कोलतार (Tar) की तरह काला और चिपचिपा दिखे तो यह ऊपरी पाचन तंत्र जैसे पेट या छोटी आंत में ब्लीडिंग का संकेत हो सकता है। पेट का अल्सर, गैस्ट्राइटिस, इसोफेगल वैरीसीज, पेट या डुओडेनम में ब्लीडिंग इसके संभावित कारण हो सकते हैं। मल में खून आने के क्या कारण हो सकते हैं?     बवासीर – एनआईएच के अनुसार बवासीर Rectal Bleeding का सबसे आम कारण माना जाता है। इसमें गुदा या मलाशय की नसों में सूजन आ जाती है। इससे व्यक्ति को मल त्याग करते समय दर्द, खुजली या चमकीला लाल खून दिखाई देता है।     गुदा में दरार होना (Anal Fissure) – एनसीबीआई के अनुसार कब्ज या कठोर मल के कारण गुदा की त्वचा में छोटी-छोटी दरार बन सकती है, जिससे खून निकल सकता है।     इंफ्लामेटरी बाउल डिजीज – क्रोहन और कोलाइटिस के मुताबिक क्रोहन रोग (Crohn's Disease) और अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी स्थितियां आंतों में सूजन पैदा करती हैं। जिसकी वजह से व्यक्ति को मल में खून, पेट दर्द, दस्त और लगातार वजन कम होने की समस्या का सामना करना पड़ता है।     डाइवर्टिकुलर डिजीज (Diverticular Disease) – एनएचएस के मुताबिक बड़ी आंत की दीवार में छोटे पाउच बन जाने को डाइवर्टिकुला कहा जाता है। इनके फटने या सूजन होने पर ब्लीडिंग हो सकती है।     कोलन कैंसर (Colon Cancer) – अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार कुछ मामलों में मल में खून आना कोलन कैंसर का शुरुआती संकेत हो सकता है। विशेष रूप से यदि इसके साथ वजन घटना, कमजोरी या मल त्याग की आदतों में बदलाव भी हो। मल में खून आने के कारण किन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए? क्लिवलैंड क्लीनिक के अनुसार आगे बताए संकेतों या लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और इनके महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।     बार-बार मल में खून आना     काला या टार जैसा मल     लगातार पेट दर्द     अचानक वजन घटना     चक्कर आना या कमजोरी     एनीमिया के लक्षण     मल त्याग की आदतों में बदलाव मल में खून आना एक ऐसा लक्षण है जिसे कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। हालांकि इसके पीछे बवासीर जैसी सामान्य समस्या हो सकती है, लेकिन कई बार अन्य गंभीर कारण भी इसकी वजह बन सकते हैं। यदि स्टूल में बार-बार खून दिखाई दे, काला मल आए या वजन कम होने जैसे लक्षण हों, तो बिना देरी किए गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लेनी चाहिए। हमने इस लेख की समीक्षा कैसे की हमारी टीम हेल्थ और वेलनेस से जुड़े विषयों पर लगातार रिसर्च करती है और भरोसेमंद स्रोतों के आधार पर कंटेंट तैयार करती है। हर आर्टिकल अनुभवी मेडिकल एक्सपर्ट्स द्वारा रिव्यू किया जाता है, ताकि आपको सही, प्रमाणिक और भरोसेमंद जानकारी मिल सके।

महिलाओं को एक ही स्थान पर मिलेंगी सभी स्वास्थ्य जांच और परामर्श सुविधाएँ

सिरसा  महिलाओं के स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर हरियाणा सरकार ने एक नई पहल शुरू की है। अब प्रदेश के चयनित सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पतालों में स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार क्लीनिक स्थापित किए जाएंगे, जहां महिलाओं को जांच, परामर्श, टीकाकरण और रेफरल जैसी सेवाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई जाएंगी। स्वास्थ्य महानिदेशक पंचकूला की ओर से इस संबंध में संबंधित जिलों के सिविल सर्जनों को निर्देश जारी किए गए हैं। यह पहल मुख्यमंत्री के वित्त वर्ष 2026-27 के बजट भाषण की घोषणा के तहत लागू की जा रही है। इससे पहले जिला नागरिक अस्पतालों में मौजूदा पोस्ट-पार्टम सेंटर पीपीसी के माध्यम से एसएनएसपी क्लीनिक शुरू किए जा चुके हैं और अब इन्हें चरणबद्ध तरीके से ब्लाक स्तर के अस्पतालों तक विस्तारित किया जा रहा है। इन अस्पतालों को किया गया है चिंहिृत मुख्यालय से जारी निर्देशों के अनुसार प्रदेश के 9 जिलों के 10 सब-डिस्ट्रिक्ट अस्पतालों में यह व्यवस्था शुरू की जाएगी। इनमें अंबाला जिले के अबांला कैंट व नारायणगढ़ उपमंडल अस्पताल, फतेहाबाद के टोहाना, हिसार के नारनौंद, पानीपत के समालखा, कुरूक्षेत्र के शाहबाद, यमुनानगर के जगाधरी, सिरसा के डबवाली, झज्जर के बहादुरगढ़ तथा नारनौल के महेंद्रगढ़ उपमंडल अस्पताल को शामिल किया गया है। अस्पताल प्रशासन को चार दिनों के भीतर क्लीनिक के लिए चिन्हित स्थान की फोटो सहित तैयारी रिपोर्ट भेजने को कहा गया है। महिलाओं को एक ही छत के नीचे मिलेगी स्वास्थ्य सुविधाएं एसएनएसपी क्लीनिक का उद्देश्य महिलाओं से जुड़ी सामान्य और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित करना है। यहां 9 से 65 वर्ष तक की महिलाओं के स्वास्थ्य डेटा संकलन, टीकाकरण, गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर और स्तन कैंसर की स्क्रीनिंग, पोषण एवं मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, फॉलोअप और रेफरल सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। निर्देशों के अनुसार क्लीनिक में एचपीवी टीकाकरण कवरेज बढ़ाने पर विशेष जोर रहेगा। साथ ही महिलाओं को किशोरावस्था, रजोनिवृत्ति, आस्टियोपोरोसिस, हृदय रोग, मेटाबोलिक विकार और स्त्री रोग संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूक किया जाएगा। प्रत्येक क्लीनिक में नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा और संबंधित अस्पताल के पीएमओ, एमएस इसकी निगरानी करेंगे, जबकि जिला स्तर पर सिविल सर्जन पूरी व्यवस्था के प्रभारी होंगे। हर सोमवार दोपहर 12 बजे तक साप्ताहिक रिपोर्ट जमा करना अनिवार्य रहेगा। सिरसा के सीएमओ डॉ. पवन कुमार ने कहा किस्वस्थ नारी सशक्त परिवार क्लिनिक नागरिक अस्पताल में संचालित हो रहा है। मुख्यालय से उपमंडल नागरिक अस्पताल डबवाली में भी इसके संचालन के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं।  

हंता वायरस को लेकर नई चिंता: क्या यह ब्रेस्ट मिल्क और स्पर्म से फैल सकता है? जानिए सच्चाई

 हंता वायरस को लेकर इन दिनों एक नई चिंता सामने आ रही है. सोशल मीडिया और कई रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ये खतरनाक वायरस ब्रेस्ट मिल्क और स्पर्म के जरिए भी फैल सकता है. इसके बाद लोगों के मन में डर बढ़ गया है, खासकर उन परिवारों में जहां छोटे बच्चे या प्रेग्नेंट महिलाएं हैं. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे मामले बेहद रेयर हैं और बिना पूरी जानकारी के घबराने की जरूरत नहीं है. कब हुई थी इस तरह की चर्चा की शुरुआत इस चर्चा की शुरुआत 2023 में जर्नल वायरसेस में पब्लिश एक स्टडी के बाद हुई. इस रिसर्च में पाया गया कि चूहों से फैलने वाले एंडीज स्ट्रेन का वायरल आरएनए इंसानी स्पर्म में रिकवरी के कई साल बाद तक मौजूद रह सकता है. स्विट्जरलैंड के स्पीएज लैबोरेटरी के साइंटिस्ट्स ने अपनी रिसर्च में बताया कि एंडीज वायरस मेल रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट में लंबे समय तक टिक सकता है, ठीक वैसे ही जैसे इबोला और जीका जैसे कुछ दूसरे वायरस. रिसर्च में कहा गया कि एंडीज वायरस में सेक्शुअल ट्रांसमिशन की संभावना हो सकती है, लेकिन अब तक ऐसा कोई कन्फर्म केस सामने नहीं आया है. क्या रिकवरी के बाद भी हो सकता है इंफेक्शन? इंडियन मेडिकल एसोसिएशन रिसर्च सेल के कन्वीनर डॉ. राजीव जयदेवन ने HealthandMe से बातचीत में बताया कि रिकवरी के बाद स्पर्म में वायरस का आरएनए मिलना कोई नई बात नहीं हैय उनके मुताबिक कम से कम 27 अलग-अलग वायरस में ऐसा देखा जा चुका है. डॉ. राजीव कहते हैं, टेस्टिस बॉडी का ऐसा हिस्सा है जो इम्यून सिस्टम से काफी हद तक सुरक्षित रहता है. इसी वजह से कुछ वायरस वहां लंबे समय तक बने रह सकते हैं. हालांकि उन्होंने साफ किया कि रिसर्च में सिर्फ वायरल आरएनए मिला था, जिंदा वायरस नहीं. यानी अभी तक इस बात का सबूत नहीं है कि रिकवरी के बाद भी वायरस इंसान को इंफेक्टेड कर सकता है. क्या ब्रेस्ट मिल्क को लेकर भी होती है दिक्कत? ब्रेस्ट मिल्क को लेकर भी एक स्टडी ने चिंता बढ़ाई थी. सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के जर्नल इमर्जिंग इन्फेक्शियस डिजीज रिसर्च में चिली की एक इंफेक्टेड मां के ब्रेस्ट मिल्क में एंडीज वायरस के जीनोम और प्रोटीन मिलने की बात कही गई थी. रिसर्चर्स का मानना था कि इससे मां से बच्चे में वायरस पहुंचने की संभावना हो सकती है. आम लोगों को जरूरत से ज्यादा डरने की जरूरत नहीं लेकिन डीवाई पाटिल विद्यापीठ, पुणे के प्रोफेसर और एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. अमिताव बनर्जी ने healthandme से कहा कि ऐसे मामले बेहद कम हैं. उन्होंने बताया कि ब्रेस्ट मिल्क के जरिए हंता वायरस फैलने के केस बहुत रेयर हैं. आम लोगों को जरूरत से ज्यादा डरने की जरूरत नहीं है. डॉ. अमिताव के मुताबिक बीमारी के शुरुआती तेज बुखार वाले फेज में मां कुछ समय के लिए ब्रेस्टफीडिंग रोक सकती है, क्योंकि उस दौरान वायरल लोड ज्यादा होता है. लेकिन सिर्फ डर की वजह से हमेशा के लिए ब्रेस्टफीडिंग बंद करना सही नहीं माना जाता. हंता वायरस और एचआईवी में बड़ा फर्क एक्सपर्ट्स का कहना है कि हंता वायरस और एचआईवी में बड़ा फर्क है. एचआईवी लंबे समय तक बॉडी फ्लूइड्स में बना रहता है, जबकि हंता वायरस आमतौर पर रिकवरी के बाद शरीर से खत्म हो जाता है. डॉ. अमिताव बनर्जी ने ये भी कहा कि आरटी- पीसीआर टेस्ट बेहद सेंसिटिव होते हैं और कई बार सिर्फ वायरस के मृत कणों को भी पकड़ लेते हैं. इसलिए अगर किसी टेस्ट में वायरल मटेरियल मिल जाए, तो इसका मतलब हमेशा ये नहीं होता कि इंसान अभी भी दूसरों को इंफेक्टेड कर सकता है. फिलहाल एक्सपर्ट्स के पास ऐसा कोई मजबूत सबूत नहीं है जिससे साबित हो कि रिकवरी के लंबे समय बाद हंता वायरस सेक्शुअली फैलता है.

खाली पेट चाय पीने से किडनी पर क्या असर पड़ता है? जानें रिस्क और सच्चाई

सुबह उठते ही एक कप गरमा-गरम चाय मिल जाए तो दिन बन जाता है. भारत में 'बेड टी' का कल्चर काफी पुराना है लेकिन क्या आप जानते हैं कि खाली पेट चाय पीने की यह आदत से धीरे-धीरे किडनी पर भी असर हो सकता है? रिसर्च बताती है कि चाय में मौजूद कैफीन और ऑक्सालेट्स खाली पेट शरीर में जाने पर डिहाइड्रेशन और किडनी स्टोन जैसी समस्याओं का रिस्क बढ़ा देते हैं इसलिए हमेशा चाय खाली पेट पीने की सलाह नहीं दी जाती. इस बारे में मेडिकल रिपोर्ट्स क्या कहती हैं, ये भी जान लीजिए. किडनी पर कैसे पड़ता है असर? चाय में प्राकृतिक रूप से ऑक्सालेट्स (Oxalates) पाए जाते हैं. ऐसे में जब कोई खाली पेट चाय पीता है तो ये कंपाउंड्स सीधे किडनी तक पहुंच जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, ऑक्सालेट्स कैल्शियम के साथ मिलकर क्रिस्टल बनाते हैं जो बाद में किडनी स्टोन का रूप ले लेते हैं. इसके अलावा, चाय एक डिउरेटिक है यानी कि चाय ऐसी चीज है जो शरीर से पानी बाहर निकालती है. यदि कोई खाली पेट चाय पीता है तो उससे शरीर में पानी की कमी हो सकती है जिससे किडनी को ब्लड फिल्टर करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है. कैफीन और एसिडिटी हेल्थलाइन का कहना है, चाय में मौजूद कैफीन खाली पेट पीने पर ब्लड प्रेशर को अचानक बढ़ा सकता है जो लंबे समय में किडनी की छोटी ब्लड वेसिल्स को नुकसान पहुंचाता है. इसके साथ ही चाय एसिडिक होती है और खाली पेट इसका सेवन पेट में पित्त जूस को डिस्टर्ब हो जाता है जिससे डाइजेशन पर नेगेटिव असर होता है. चाय में मौजूद टैनिन्स खाली पेट मतली और जलन पैदा कर सकते हैं जो इनडायरेक्टली किडनी के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करते हैं. ब्लैक टी या मिल्क टी, क्या अधिक खतरनाक? रिसर्च के मुताबिक, अगर आप पहले से ही किडनी की किसी बीमारी (CKD) से जूझ रहे हैं तो चाय का समय बहुत मायने रखता है. किडनी न्यूट्रिशन इंस्टीट्यूट का कहना है, किडनी के मामले में दूध वाली चाय थोड़ी कम रिस्की हो जाती है. इसका कारण यह है कि दूध में मौजूद कैल्शियम, चाय के ऑक्सालेट्स के साथ पेट और आंतों में ही जुड़ जाता है. इससे ऑक्सालेट्स किडनी तक पहुंचने से पहले ही शरीर के टॉक्सिन्स के साथ बाहर निकल जाते हैं. भोजन या डेयरी प्रोडक्ट्स के साथ ऑक्सालेट वाली चीजें लेना किडनी स्टोन के खतरे को कम करता है.  

भीषण गर्मी में स्वास्थ्य विभाग का फैसला, अब शाम 5 से 7 बजे तक भी मिलेगा इलाज

 जयपुर राजस्थान में भीषण गर्मी और सरकारी अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए चिकित्सा विभाग ने OPD (आउटडोर पेशेंट डिपार्टमेंट) का 1 अप्रैल से बढ़ा दिया है. इस नए शेड्यूल से उन हजारों मरीजों को सीधे तौर पर राहत मिल रही है, जिन्हें तेज धूप में लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था. लेकिन शुक्रवार को सबसे बड़ी राहत जयपुर के सबसे बड़े सवाई मानसिंह अस्पताल (SMS Hospital) में आने वाले मरीजों को दी गई है, जहां अब शाम की ओपीडी भी शुरू कर दी गई है. इवनिंग OPD का समय क्या रहेगा? अस्पताल प्रशासन के अनुसार, अब मरीज शाम 5:00 बजे से 7:00 बजे तक भी डॉक्टर से परामर्श ले सकेंगे. पहले चरण में यह व्यवस्था 'जनरल मेडिसिन' विभाग में लागू की गई है. इस नई पहल का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि सुबह के समय होने वाली भारी भीड़ काफी हद तक कम हो जाएगी. साथ ही, नौकरीपेशा लोग भी अपने काम के बाद आसानी से अस्पताल जाकर इलाज करा सकेंगे. रविवार को भी मिलेगी 2 घंटे की OPD गर्मी के ध्यान में रखते हुए 1 अप्रैल से पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य केंद्रों का समय बदला गया है. राजस्थान के सभी मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, सीएचसी (CHC) और पीएचसी (PHC) में अब ओपीडी सुबह 8:00 बजे से दोपहर 2:00 बजे तक संचालित हो रही है. मरीजों की परेशानी को समझते हुए सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि रविवार और अन्य सरकारी छुट्टियों के दिन भी स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं रहेंगी. अवकाश वाले दिनों में भी मरीज सुबह 9:00 बजे से 11:00 बजे के बीच अस्पताल पहुंचकर अपना इलाज करवा सकते हैं. आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में दो शिफ्ट की व्यवस्था शहरी क्षेत्रों में बने 'आयुष्मान आरोग्य मंदिरों' (जिन्हें पहले जनता क्लिनिक कहा जाता था) में भी मरीजों की सहूलियत के लिए समय में अहम बदलाव किए गए हैं. अब इन केंद्रों पर मरीजों को दो अलग-अलग शिफ्ट में सेवाएं दी जा रही हैं. पहली शिफ्ट में मरीज सुबह 8:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक आ सकते हैं, जबकि दूसरी शिफ्ट शाम 5:00 बजे से 7:00 बजे तक संचालित की जा रही है. लंबी कतारों से बचें, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट बुक करें सरकार ने मरीजों को अस्पताल की भीड़ और लाइनों से बचाने के लिए एक बेहतरीन डिजिटल सुविधा भी दी है. अब आप अस्पताल जाने से पहले IHMS (Integrated Health Management System) पोर्टल के जरिए घर बैठे अपने मोबाइल से ऑनलाइन अपॉइंटमेंट बुक कर सकते हैं. ऑनलाइन पर्ची कटवाने से आपका समय बचेगा और आप सीधे अपने निर्धारित समय पर डॉक्टर से परामर्श ले सकेंगे.

सरकार बदली, चुनौतियाँ वही: शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर क्या होगा असर?

छपरा बिहार में नई सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल में बड़े बदलाव की उम्मीद लगाए बैठी जनता तब हैरान रह गई, जब मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और शिक्षा मंत्री जैसे अहम पद फिर से पुराने चेहरों को ही सौंप दिए गए। इसके बाद राज्य की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में वास्तविक सुधार को लेकर कई सवाल तेज हो गए हैं। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंत्रिमंडल में स्थिरता प्रशासनिक निरंतरता के लिहाज से फायदेमंद हो सकती है, लेकिन जिन विभागों की पिछले कार्यकाल में सबसे ज्यादा आलोचना हुई, जैसे सरकारी अस्पतालों की बदहाली, चिकित्सकों-कर्मियों की कमी, स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति और कमजोर आधारभूत संरचना उनमें बदलाव न होना जनता के मन में संदेह पैदा कर रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार को लेकर बढ़ा असंतोष स्थानीय लोगों का कहना है कि सदर अस्पतालों से मरीजों को बिना इलाज रेफर कर देने की पुरानी व्यवस्था अब खत्म होनी चाहिए। स्वास्थ्य विभाग की आधारभूत संरचना तो तैयार कर दी गई है, लेकिन डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मियों की भारी कमी आज भी बनी हुई है। विगत वर्षों में स्वास्थ्य विभाग पर कई गंभीर आरोप लगे हैं, अस्पतालों में दवाओं और मशीनों की कमी, पंचायत स्तर तक स्वास्थ्य सेवाओं का कमजोर होना और बेहतर इलाज के लिए बिहार से बाहर जाने वाले मरीजों की बढ़ती संख्या प्रमुख मुद्दे हैं। ऐसे में पुरानी टीम का ही पुनः जिम्मेदारी संभालना जनता के बीच यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या अबकी बार वाकई बदलाव देखने को मिलेगा। सारण प्रमंडल के सारण, सिवान और गोपालगंज जिलों सहित कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं “इलाज” से ज्यादा “रेफर” आधारित व्यवस्था पर निर्भर हैं। सड़क हादसे, गोलीबारी और अन्य आपात मामलों में प्रखंड अस्पतालों से लेकर जिला सदर अस्पताल तक केवल औपचारिकता निभाकर मरीजों को पटना पीएमसीएच या अन्य मेडिकल कॉलेज भेज दिया जाता है। शिक्षा विभाग में भी सुधारों पर सवाल शिक्षा विभाग पर भी सरकार लगातार निशाने पर रही है। शिक्षकों की भारी कमी, स्कूलों में संसाधनों की दयनीय स्थिति और सरकारी स्कूलों के गिरते परिणामों ने चिंता बढ़ाई है। विभाग से जुड़े अधिकारियों व शिक्षक संघों का कहना है कि बिना संरचनात्मक सुधार के केवल घोषणाओं से शिक्षा व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है। हालांकि राज्य सरकार ने दावा किया है कि 2025–30 के कार्यकाल में शिक्षा और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी, और बजट व इंफ्रास्ट्रक्चर दोनों स्तरों पर बड़े कदम उठाए जाएंगे। क्या बदलेगी बिहार की तस्वीर? अब जनता की नजर इस बात पर है कि क्या पुरानी टीम, नई नीतियों और नई ऊर्जा के साथ सचमुच स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों क्षेत्रों की जर्जर स्थिति को बदल पाएगी। विशेषकर शिक्षा विभाग में चल रहे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मौजूदा शिक्षा मंत्री को सौंपी गई है। जनता अब सरकारी दावों नहीं, बल्कि जमीनी बदलाव का इंतजार कर रही है।

कैंसर से जंग में असरदार साथी: गाजर का जूस

कैंसर जैसी घातक बीमारी से बचने के लिए इसका इलाज पहले चरण में ही कराना बेहतर होता है। लेकिन कैंसर के ज्यादातर मामलों में इसका खुलासा तब होता है, जब यह अपनी प्रारंभिक अवस्था से आगे बढ़ चुका होता है। ऐसे में कीमोथैरेपी के अलावा कैंसर को और कोई इलाज नहीं होता और यह अत्यधिक तकलीफदेह होता है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी, कि चैथी स्टेज पर आने के बाद भी कैंसर का इलाज संभव है, सिर्फ गाजर के सेवन से। ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध के अनुसार, गाजर में पॉलीएसिटिलीन पाया जाता है, जो कैंसर कोशिकाओं को समाप्त कर ट्यूमर का विकास रोकने में सहायता करता है। इसके अलावा गाजर में कई तरह के विटामिन और मिनरल्स के अलावा बीटा कैरोटीन, अल्फा कैरोटीन, कैल्शियम एवं अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आंतरिक अंगों को स्वस्थ रखने में सहायक होते हैं। शोध के मुताबिक गाजर में मौजूद फैलकारिनॉल, फैलकैरिन्डियॉल और एंटी कैंसर तत्व लंग कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर व कोलोन कैंसर के खतरे को कम करते हैं। इसमें पाया जाने वाला रेटिनॉइड एसिड महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर की कारक कोशिकाओं के शुरूआती बदलाव को रोकने में कारगर होता है। गाजर के सेवन से कैंसर की चैथी स्टेज पर जीत हासिल करने का भी एक उदाहरण सामने आया है। इंडिया टाइम्स डॉट कॉम में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, कैमरून नामक एक महिला ने गाजर के जूस का सेवन कर कैंसर को चैथे चरण में आने के बावजूद मात देने में कामयाबी हासिल की है। कैमरून बताती हैं, कि उन्हें सन 2013 में कोलोन कैंसर के बारे में पता चला, जो कि चैथे चरण पर पहुंच चुका था। कीमोथैरेपी के अलावा इसके लिए कोई और विकल्प भी नहीं था। कैमरून ने इंटरनेट पर रिसर्च कर, राल्प कोले नामक व्यक्ति का अनुभव पढ़ा, जिसे प्रतिदिन 2.25 किलो गाजर का जूस पीने से कैंसर में काफी लाभ हुआ था। इसके बाद कैमरून ने भी गाजर के जूस का सेवन शुरू किया। कैमरून ने लगतार आठ सप्ताह तक प्रतिदिन 2.25 किलो गाजर का जूस पीना शुरू किया। इस दौरान कैमरून ने पाया कि कैंसर ट्यूमर में होने वाली वृद्धि रूक गई है। लगभग 13 महीनों के बाद उनका कैंसर पूरी तरह से ठीक हो चुका था।  

स्वास्थ्य की नई निगरानी: AI चश्मा अब पलक झपकते ही देगा जानकारी

पेंसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने एक खास डिवाइस बनाया है, जिसे 'ब्लिंकवाइज' कहते हैं। यह डिवाइस साधारण चश्मे पर लगने से ही काम करने लगता है और एआई की मदद से हेल्थ मॉनिटर करता है। छोटे-छोटे गैजेट्स में शामिल होता एआई भविष्‍य में बहुत बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल होने की उम्‍मीद है। बदलाव की इस बयार में पीछे ना रहें। इस क्षेत्र के बारे में और जानने के लिए NBT Upskill AI से करियर ग्रोथ वर्कशॉप में रजिस्टर करें। 'ब्लिंकवाइज' पलक झपकने के तरीके को देखकर हेल्थ की जानकारी देता है। यह तकनीक ड्राइविंग, ऑफिस वर्क और रोजमर्रा की जिंदगी में थकान, मानसिक दबाव और आंखों की समस्याओं का पता लगाने में मदद कर सकती है। जैसे ही चश्‍मा पहना व्‍यक्‍त‍ि अपनी पलक झपकाएगा, यह बता देगा कि उसकी हेल्थ कैसी है। उसे कोई थकान या मेंटल प्रेशर तो नहीं। ऐसे लेता है हेल्थ अपडेट हम दिन में हजारों बार पलक झपकते हैं। हर पलक झपकना हमारे शरीर और दिमाग की स्थिति के बारे में बताता है। यह थकान, फोकस की कमी या आंखों के सूखेपन जैसी समस्याओं का संकेत देता है। इसे ब्लिंक डायनामिक्स कहते हैं। इसमें पलक झपकने की अवधि, पूरी तरह बंद होना या आधा बंद होना और पलक खुलने-बंद होने का समय की जानकारी होती है। इसे एक छोटे से उदाहरण से समझें- अगर पलकें लंबे समय तक बंद रहती हैं तो यह नींद या थकान का संकेत हो सकता है, जो सड़क दुर्घटनाओं का बड़ा कारण है। जबकि बार-बार पलक झपकना आंखों के सूखेपन की बीमारी का लक्षण हो सकता है। हाई-स्पीड कैमरे से ज्यादा तेज पहले पलक झपकने की जानकारी लेने के लिए हाई-स्पीड कैमरे की जरूरत पड़ती थी, जो केवल लैब में इस्तेमाल हो सकते थे। लेकिन ब्लिंकवाइज को चश्मे पर आसानी से लगाया जा सकता है। यह रेडियो सिग्नल्स का इस्तेमाल करके पलक की छोटी-छोटी गतिविधियों को पकड़ता है। यह तकनीक कैमरे से ज्यादा तेज है, क्योंकि कैमरे हर सेकंड 30-60 फ्रेम ही रिकॉर्ड करते हैं, जबकि ब्लिंकवाइज ऐसा हजारों बार कर सकता है। नहीं चाहिए अलग से कोई डिवाइस यह डिवाइस सारी जानकारी को चश्मे पर ही प्रोसेस करता है। इसके लिए किस फोन या क्लाउड सर्वर की जरूरत नहीं होती है। यह एक छोटे से चिप पर काम करता है, जो डाक टिकट से भी छोटा है। यह हल्का है, जिसमें बैटरी लंबे समय तक चलती है। मुमकिन है कि भविष्य में यह तकनीक स्मार्ट चश्मा में उपयोग हो। इस AI डिवाइस में ऊर्जा की खपत भी ज्यादा नहीं है। इस तकनीक को आम लोगों के ल‍िए कब तक लाया जाएगा, अभी जानकारी नहीं है।

सुबह खाली पेट पानी पीने से मिलते हैं ये चौंकाने वाले फायदे

क्या आपको पता सुबह उठ कर खाली पेट पानी पीने से कीतने फायदें होते हैं। आईए हम आपको बताते है। अगर आप भी इस आदत का पालन करते हैं तो आपको बता दें कि सुबह खाली पेट पानी पीने से कई तरह की बीमारियों पर काबू पाया जा सकता है। खाली पेट पानी पीने से शरीर की सारी गंदगी साफ हो जाती है और खून साफ होता है। वैसे तो एक शख्स को सुबह उठकर लगभग 4 से 5 गिलास पानी पीना चाहिए लेकिन आप इस आदत को डालने की सोच रहे हैं तो शुरुआत एक या दो गिलास से कर सकते हैं। -सुबह उठकर पानी पीने से शरीर में मौजूद विषैले पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे खून साफ हो जाता है। खून साफ हो जाने से त्वचा पर भी चमक आती है। -सुबह उठकर पानी पीने से नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। इसके अलावा मांसपेशियां भी मजबूत होती हैं। -सुबह उठकर पानी पीने से मेटाबॉलिज्म सक्रिय हो जाता है। अगर आप वजन घटाना चाह रहे हैं तो जितना जल्दी हो सके सुबह उठकर खाली पेट पानी पीना शुरू कर दीजिए। -जो लोग सुबह उठकर खाली पेट पानी पीते हैं उन्हें कब्ज की शिकायत नहीं होती। सुबह पेट साफ होने की वजह से ऐसे लोग जो कुछ भी खाते हैं उसका उनके शरीर को पूरा फायदा मिलता है। कब्ज की वजह से होने वाले अन्य रोग भी नहीं होते। -सुबह उठकर पानी पीने से गले, मासिक धर्म, आंखों, पेशाब और किडनी संबंधी कई समस्याएं शरीर से दूर रहती हैं।