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सिंचाई योजनाओं को रफ्तार, दुर्ग जिले में 40.85 करोड़ रुपये की मंजूरी

दुर्ग जिले के विभिन्न सिंचाई योजना के कार्यों के लिए 40.85 करोड़ रुपये स्वीकृत रायपुर  छत्तीसगढ़-शासन जल संसाधन विभाग द्वारा दुर्ग जिले विभिन्न सिंचाई योजनाओं के कार्यों के लिए 40 करोड़ 85 लाख 2 हजार रुपये स्वीकृत किये गये हैं।     जल संसाधन विभाग द्वारा स्वीकृत सिंचाई योजनाओं में दुर्ग जिले के सुरपा व्यपवर्तन योजना का जीर्णोद्धार एवं नहर प्रणाली का रिमाडलिंग एवं लाईनिंग कार्य के लिए दो करोड़ 23 लाख 56 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने से 121 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाइ्र सुविधा मिलेगी। इसी तरह से मोहंदी जलाशय का जीर्णोद्धार एवं नहरों का लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 96 लाख 55 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने से 100 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। तिरगा जलाशय का जीर्णोद्धार एवं लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 71 लाख 26 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने से 107 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। गनियारी जलाशय का जीर्णोद्धार एवं नहर लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 71 लाख 26 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने से 254 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। रिसाली उमरपोटी जलाशय का जीर्णोद्धार एवं नहर लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 97 लाख 94 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने से 162 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी।  दुर्ग जिले के निगम क्षेत्र के तालाबों में निस्तारी जल भरने हेतु चैनल निर्माण कार्य के लिए 4 करोड़ 93 लाख 56 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। शिवनाथ मण्डल कार्यालय दुर्ग का जीर्णोद्धार एवं नव निर्माण कार्य के लिए 4 करोड़ 96 लाख 24 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। कपसदा जलाशय का जीर्णोद्धार एवं नहर लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 57 लाख 8 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने पर 90 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। नंदौरी जलाशय का जीर्णोद्धार एवं नहरों के लाईनिंग कार्य के लिए 4 करोड़ 77 लाख 57 हजार रूपए स्वीकृत किए गए है। योजना के कार्य पूर्ण होने पर 49 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी।

पानी-सीवर लाइनों की जांच अब रोबोट से, MP में 40 रुपए प्रति मीटर खर्च

इंदौर  भागीरथपुरा में दूषित पानी की त्रासदी के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने शहरी क्षेत्रों में पेयजल और सीवर नेटवर्क की स्थिति जांचने के लिए रोबोटिक तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला लिया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने प्रदेश के नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को 70 से 900 मिलीमीटर व्यास वाली पानी और सीवर पाइपलाइनों की जांच कराने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए चेन्नई की विशेषज्ञ एजेंसी पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड को सबसे कम बोली यानी L1 के आधार पर एम्पैनल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पाइपलाइन निरीक्षण की दर 40 रुपए प्रति मीटर तय हुई है और इसके लिए एक साल का एग्रीमेंट किया गया है। भागीरथपुरा के बाद क्यों पड़ी रोबोटिक जांच की जरूरत? दिसंबर 2025 के आखिर में इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी की वजह से बड़े स्तर पर बीमारी फैली थी। शुरुआती सरकारी और NHRC रिकॉर्ड में दूषित पानी से मौतों और बड़ी संख्या में लोगों के बीमार होने की पुष्टि हुई थी। NHRC ने जनवरी 2026 में मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव से रिपोर्ट मांगी थी। बाद में न्यायिक जांच में 36 मौतों की जांच की गई। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक इनमें 24 मौतों को सीवर से दूषित पानी पीने से सीधे जोड़ा गया, जबकि 12 मामलों में दूषित पानी और मौत के बीच निर्णायक संबंध स्थापित नहीं हो सका। न्यायिक जांच में पाइपलाइन बदलने में देरी और शहरी जल नेटवर्क से जुड़े प्रशासनिक पहलुओं पर भी सवाल उठे हैं। इसी घटना के बाद सरकार का फोकस इस बात पर है कि प्रदेश में ऐसी पाइपलाइन क्रॉसिंग और लीकेज की पहले ही पहचान कर ली जाए, जहां सीवर का पानी पेयजल नेटवर्क को प्रभावित कर सकता है। पहले समझिए, सरकार को यह फैसला क्यों लेना पड़ा? दिसंबर 2025 के आखिरी सप्ताह में इंदौर के भगीरथपुरा में दूषित पेयजल से 36 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में पीने के पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया मिले। सीवर लाइन लीक होने से उसका पानी पेयजल लाइन में मिल गया था। अकेले भगीरथपुरा में ऐसे 260 पॉइंट्स मिले, जहां सीवर का पानी पेयजल में मिल रहा था। हादसे के बाद सरकार ने जीआईएस (GIS) प्लेटफॉर्म 'गरुड़' से पूरे प्रदेश की मैपिंग कराई। इसमें मध्य प्रदेश में 2.30 लाख से अधिक ऐसे पॉइंट्स मिले, जहां सीवर और पेयजल पाइपलाइनें एक-दूसरे को क्रॉस कर रही हैं। इनमें इंदौर में 30 हजार और भोपाल में 20 हजार से अधिक डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स हैं, जहां सीवर का पानी पेयजल में मिलने का खतरा है। दूषित पेयजल पीने से यहां 36 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया मिले थे। पता चला कि सीवर लाइन लीक होकर पेयजल लाइन में मिल रही थी। अकेले भागीरथपुरा में ऐसे 260 पॉइंट्स मिले थे। इस हादसे ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। इसी के बाद सरकार ने बड़ा फैसला लेने की तैयारी शुरू की। हादसे के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने जीआईएस (Geographic Information System) प्लेटफॉर्म गरुड़ से पूरे प्रदेश की मैपिंग कराई। इस मैपिंग में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। प्रदेश में 2.30 लाख से ज्यादा ऐसे पॉइंट्स मिले, जहां सीवर और पेयजल लाइनें एक दूसरे को क्रॉस कर रही हैं। इनमें से इंदौर में 30 हजार से ज्यादा डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स हैं। भोपाल में भी 20 हजार से ज्यादा ऐसे खतरनाक पॉइंट्स मिले हैं। इन जगहों पर सीवर का पानी पेयजल में मिलने का खतरा बना रहता है। अब रोबोट करेंगे जांच सरकार ने अब इन डेंजर पॉइंट्स की जांच के लिए रोबोट तकनीक अपनाने का फैसला किया है। यह जांच ट्रेंचलेस टेक्नोलॉजी से होगी। इसका मतलब है कि सड़क खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रोबोट को सीसीटीवी क्रॉलर सिस्टम से पाइपलाइन में उतारा जाएगा। इसे मौजूदा मैनहोल या एयर रिलीज वाल्व के जरिए भेजा जाएगा। रोबोट में हाई रिजॉल्यूशन कैमरा और सेंसर लगे होंगे। यह रोबोट करीब 300 मीटर लंबे केबल से जुड़ा रहेगा। पाइपलाइन के अंदर रोबोट लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग करेगा। साथ ही जरूरी डेटा भी दर्ज करता रहेगा। यह रोबोट 70 से 900 मिमी व्यास वाली पाइपलाइनों में काम करेगा। इसकी मदद से लीकेज, टूट फूट और अवैध कनेक्शन का पता चलेगा। इससे साफ हो जाएगा कि कहां कहां खतरा ज्यादा है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने सभी नगर निगमों को इसके निर्देश दिए हैं। नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को भी यह आदेश दिया गया है। सभी जगह इस तकनीक से जांच अनिवार्य कर दी गई है। एजेंसी को कैसे मिला काम इस काम के लिए विभाग ने टेंडर जारी किया था। इसकी अनुमानित लागत 1.50 करोड़ रुपए रखी गई थी। यह काम 365 दिन में पूरा करना तय हुआ है। टेंडर में तीन कंपनियों ने बोली लगाई। इनकी दरों में जमीन आसमान का फर्क देखने को मिला। डिजिटल सर्विलॉन्स ने 440 रुपए प्रति मीटर की दर रखी थी। फॉर्म डील ने 400 रुपए प्रति मीटर का रेट दिया था। लेकिन चेन्नई की पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज ने सिर्फ 40 रुपए प्रति मीटर की बोली लगाई। सबसे कम बोली होने के कारण इसी कंपनी को काम मिला है। कंपनी अप्रैल 2022 में रजिस्टर्ड हुई थी। इसके डायरेक्टर गणेशन और रेवती हैं। अब सभी नगरीय निकाय अपनी जरूरत के हिसाब से एस्टीमेट तैयार करेंगे। इसके बाद कंपनी को वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा। देश के कई राज्यों में पहले से इस्तेमाल मध्य प्रदेश में यह तकनीक पहली बार इस्तेमाल हो रही है। लेकिन देश के कई राज्यों में यह पहले से काम कर रही है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 15 से ज्यादा राज्यों में रोबोटिक पाइपलाइन जांच हो रही है। इनमें तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी यह तकनीक इस्तेमाल हो रही है। इन राज्यों में चेन्नई की एक कंपनी के खास रोबोट काम कर रहे हैं। ये रोबोट हाई रिजॉल्यूशन कैमरों की मदद से जीआईएस मैपिंग करते हैं। साथ ही लीकेज की सटीक जानकारी भी देते हैं। पुराने तरीके से होती थी दिक्कत अब तक सीवर लाइनों की जांच पुराने तरीकों से होती थी। इसमें बड़े … Read more

गंगा-यमुना दोआब में भूजल बढ़ाने की तैयारी, 1.65 करोड़ की परियोजना से होगा जलभृतों का पुनर्भरण

लखनऊ  योगी सरकार ने प्रदेश में भूजल संरक्षण और लंबे समय की जल सुरक्षा के लिए वैज्ञानिक तरीके से काम तेज कर दिया है। इसी कड़ी में गंगा-यमुना दोआब में 1.65 करोड़ रुपये की ‘प्रबंधित जलभृत पुनर्भरण (एमएआर) परियोजना’ शुरू की गई है। तीन साल की इस परियोजना के तहत बारिश के पानी को जमीन के अंदर मौजूद जलभृतों (भूमिगत जल भंडार) तक पहुंचाकर भूजल का पुनर्भरण किया जाएगा। परियोजना की सबसे अहम कड़ी कानपुर से प्रयागराज के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी भूमिगत प्राचीन नदी/पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान हुई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये पुराने नदी मार्ग आज भी जमीन के अंदर पानी के आने-जाने में मददगार हो सकते हैं। 200 किमी लंबी प्राचीन नदी का मिला रास्ता नमामि गंगे और ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव एवं निदेशक, भूगर्भ जल विभाग डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर), राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनसीआरआई) हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक के जरिए गंगा-यमुना दोआब के नीचे मौजूद जलभृतों और प्राचीन नदी प्रणालियों का अध्ययन किया है। इसके लिए हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण और बोरहोल लॉगिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया। इस अध्ययन में प्रयागराज से कानपुर के बीच करीब 200 किलोमीटर लंबी भूमिगत प्राचीन नदी यानि पैलियोचैनल प्रणाली की पहचान हुई है। आसान भाषा में कहें तो जमीन के नीचे पुराने नदी मार्गों के निशान मिले हैं, जो आज भी भूजल के प्रवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जलभृतों तक पहुंचेगा बारिश का पानी परियोजना का सीधा उद्देश्य बारिश के पानी को बेकार बहने से रोककर उसे जमीन के अंदर मौजूद जलभृतों तक पहुंचाना है। जलभृत जमीन के नीचे पानी जमा रखने वाली प्राकृतिक परतें होती हैं। इन्हीं से कुओं और नलकूपों के जरिए भूजल मिलता है। वैज्ञानिक अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि बारिश का पानी जमीन के अंदर कहां और किस रास्ते आसानी से पहुंच सकता है। इसी आधार पर पुनर्भरण के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया जाएगा। छह स्थानों से शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के वित्तीय सहयोग से भूगर्भ जल विभाग, उत्तर प्रदेश द्वारा इस परियोजना को लागू किया जा रहा है। इसकी कुल लागत 1.65 करोड़ रुपये और अवधि तीन वर्ष है। पहले चरण में छह स्थानों का चयन किया गया है। यहां पायलट अध्ययन के साथ भूजल पुनर्भरण की संरचनाएं बनाई जाएंगी। इन संरचनाओं के जरिए पानी को जमीन के अंदर पहुंचाया जाएगा और इसके परिणामों की लगातार निगरानी की जाएगी। पहले परिणाम देखे जाएंगे, फिर बढ़ेगा दायरा छह पायलट स्थानों पर यह देखा जाएगा कि पुनर्भरण संरचनाओं से भूजल स्तर पर कितना असर पड़ता है और स्थानीय जलभृत बारिश के पानी को किस तरह ग्रहण करता है। इससे यह भी पता चलेगा कि अलग-अलग स्थानों पर कौन-सी पुनर्भरण व्यवस्था ज्यादा प्रभावी रहती है। पायलट चरण से मिलने वाले परिणामों के आधार पर परियोजना को गंगा-यमुना दोआब के दूसरे उपयुक्त स्थानों तक बढ़ाया जाएगा। इससे भविष्य में बड़े क्षेत्र में भूजल पुनर्भरण की योजनाएं तैयार करने में मदद मिलेगी। नदी और भूजल के संबंध की भी होगी निगरानी एनजीआरआई के अध्ययन में गंगा और यमुना नदियों तथा जमीन के अंदर मौजूद प्रमुख जलभृतों के बीच हाइड्रोजियोलॉजिकल संबंध के संकेत मिले हैं। प्राचीन नदी मार्ग भी जलभृतों के भीतर भूजल के प्रवाह के महत्वपूर्ण रास्ते हो सकते हैं। इस परियोजना से नदी, बारिश के पानी, भूजल और प्राचीन नदी मार्गों के बीच संबंध को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिलेगी। यही जानकारी आगे भूजल संरक्षण की योजनाओं के लिए उपयोगी होगी। वैज्ञानिक निगरानी से मजबूत होगी जल सुरक्षा नमामि गंगे, अतिरिक्त परियोजना निदेशक प्रभाष कुमार ने कहा कि परियोजना में एनजीआरआई के तकनीकी सहयोग से भूजल की निगरानी, शोध एवं विकास और पुनर्भरण संरचनाओं के प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा। इसके साथ लोगों को भूजल संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियां भी संचालित की जाएंगी।

जल संसाधन विभाग की बड़ी सौगात- धमतरी और बालोद जिलों में 5 सिंचाई योजनाओं के लिए 21.50 करोड़ रुपये स्वीकृत

जल संसाधन विभाग की बड़ी सौगात-   धमतरी और बालोद जिलों में 5 सिंचाई योजनाओं के लिए 21.50 करोड़ रुपये स्वीकृत रायपुर  छत्तीसगढ़ शासन के जल संसाधन विभाग द्वारा किसानों को बड़ी राहत देते हुए धमतरी और बालोद जिलों की पांच प्रमुख सिंचाई योजनाओं के सुदृढ़ीकरण एवं विकास कार्यों के लिए कुल 21 करोड़ 50 लाख 23 हजार रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति प्रदान की गई है। इन योजनाओं के पूर्ण होने से क्षेत्रीय किसानों को बेहतर सिंचाई सुविधा का लाभ मिलेगा। प्रमुख स्वीकृतियाँ              धमतरी जिला के राजाडेरा लघु जलाशय जलद्वार के नवीनीकरण एवं जीर्णाेद्धार कार्य के लिए 1 करोड़ 65 लाख 7 हजार रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इससे लगभग 285 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा उपलब्ध होगी। इसी प्रकार खट्टी एनीकट (महानदी) महानदी पर निर्मित खट्टी एनीकट के संरक्षण और जलद्वारों के उन्नयन कार्य हेतु 4 करोड़ 89 लाख 30 हजार रुपये मंजूर किए गए हैं, जिससे करीब 30 हेक्टेयर क्षेत्र सिंचित होगा।           बालोद जिला (कुल 3 योजनाएं) के जलाशयों में विद्युतीकरण तांदुला, गोंदली और खरखरा जलाशय में विद्युतीकरण व प्रकाश व्यवस्था के कार्यों के लिए 4 करोड़ 95 लाख 99 हजार रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इससे 285 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई सुविधा मिलेगी। खरखरा नदी के बांयी तट पर शीतला मंदिर के पास घाट एवं ग्राम मारीदेवरी तटबंध निर्माण कार्य के लिए 4 करोड़ 99 लाख 98 हजार रुपये की स्वीकृति दी गई है, जिससे 183 हेक्टेयर कृषि क्षेत्र लाभांवित होगा।          तांदुला परियोजना के अंतर्गत सकरैद वितरक नहर (नाहंदा माईनर, डौकीडीह माईनर, सुखरी माईनर और भदेरा माईनर) के रिमॉडलिंग, लाइनिंग एवं पक्के कार्यों के उन्नयन के लिए 4 करोड़ 99 लाख 89 हजार रुपये मंजूर किए गए हैं। इससे भी 183 हेक्टेयर क्षेत्र के किसानों को सिंचाई का सीधा लाभ मिलेगा। इस प्रकार कुल 21.50 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं से प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रबंधन मजबूत होगा और कृषि उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।

तिघरा डैम का बढ़ा जलस्तर, शुक्रवार शाम खोले गए तीन गेट; सांक नदी में छोड़ा पानी

ग्वालियर तिघरा डैम का जलस्तर लगातार बढ़ने के बाद शुक्रवार शाम साढ़े छह बजे इसके तीन गेट खोल दिए गए। तीनों गेट नौ-नौ इंच खोले गए और इनके जरिए 1040 क्यूसिक पानी सांक नदी में छोड़ा गया। खास बात यह है कि इस सीजन में मानसून के आखिरी दिनों में पहली बार तिघरा डैम के गेट खोले गए हैं। गेट खोले जाने के दौरान निगम महापौर शोभा सिकरवार, एमआइसी सदस्य, जल संसाधन विभाग और नगर निगम के इंजीनियरों सहित अन्य अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। सुबह 739.40 फीट था जलस्तर, दिनभर बढ़ता रहा शुक्रवार सुबह आठ बजे तिघरा बांध का जलस्तर 739.40 फीट दर्ज किया गया था। दिन में तिघरा के कैचमेंट क्षेत्र में हुई वर्षा के कारण जलस्तर तेजी से बढ़ने लगा। जलस्तर में हो रही लगातार बढ़ोतरी और आगे संभावित वर्षा को देखते हुए जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने दोपहर करीब 1:30 बजे गेट खोले जाने की सूचना जारी की। शाम पांच बजे तक बांध का जलस्तर 739.50 फीट से अधिक पहुंच गया। इसके बाद भी जलस्तर बढ़ता रहा। भारी वर्षा की संभावना को देखते हुए अधिकारियों ने आखिरकार तीन गेट खोलने का निर्णय लिया। शाम साढ़े छह बजे गेट नौ-नौ इंच खोलकर सांक नदी में 1040 क्यूसिक पानी छोड़ा गया। इस सीजन में पहली बार खुले डैम के गेट इस बार मानसून के दौरान तिघरा डैम के गेट लंबे समय तक बंद रहे। पिछले वर्षों में जुलाई से अक्टूबर के बीच तिघरा डैम के गेट 17 बार खोले गए थे। इस बार मानसून के आखिरी दिनों में पहली बार गेट खोलने की स्थिति बनी है। अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितंबर की शुरुआत में हुई बारिश से डैम का जलस्तर तेजी से बढ़ा। इसके बाद रात में और शुक्रवार दिन में हुई बारिश ने जलस्तर को और ऊपर पहुंचा दिया। इसी के चलते डैम से पानी छोड़ना पड़ा। गेट खुलने की खबर से शहरवासियों में खुशी ग्वालियर शहर की जलापूर्ति मुख्य रूप से तिघरा डैम पर निर्भर है। इस मानसून के आधे सीजन तक पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण तिघरा डैम आधा भी नहीं भर पाया था। इसका असर शहर की जलापूर्ति पर भी पड़ा और लोगों को एक दिन छोड़कर पानी मिल रहा था। डैम के पर्याप्त नहीं भरने से आगे जलसंकट की चिंता भी बढ़ गई थी। हालांकि अगस्त के आखिरी सप्ताह और सितंबर की शुरुआत में हुई अच्छी बारिश से तस्वीर बदल गई। तिघरा डैम के फुल होने के बाद अब गेट खोले जाने से शहरवासियों में खुशी है। लोगों को उम्मीद है कि अब ग्वालियर में रोजाना पानी की सप्लाई हो सकेगी। एम. विश्वेश्वरैया की देखरेख में मजबूत हुई इंजीनियरिंग तिघरा डैम का निर्माण सांक नदी पर वर्ष 1916 में कराया गया था। महाराजा माधवराव सिंधिया प्रथम ने बांध की योजना और उसकी तकनीकी बारीकियों को समझने के लिए भारत के महान इंजीनियर और भारत रत्न सर एम. विश्वेश्वरैया को आमंत्रित किया था। 1917 में बांध के शुरुआती क्षतिग्रस्त होने के बाद इसके पुनर्निर्माण और आटोमैटिक फ्लड गेट्स की तकनीक को मजबूत बनाने में उनके सुझावों और इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण योगदान रहा। निर्माण के ठीक एक साल बाद 19 अगस्त 1917 को भारी बारिश और नींव में बलुआ पत्थर के रिसाव के कारण बांध का एक हिस्सा टूट गया था। इसके बाद इसे अधिक मजबूत संरचना के साथ दोबारा तैयार किया गया। 1927 में जीर्णोद्धार, 1970 में फिर आईं दरारें वर्ष 1927 के आसपास तिघरा डैम का जीर्णोद्धार पूरा हुआ। इसके बाद 1970 में अत्यधिक जलभराव और तकनीकी वजहों से इसके कुछ हिस्सों में फिर दरारें आईं। इसके बाद सरकार ने आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग तकनीक का इस्तेमाल करते हुए इसे मजबूत कंक्रीट और चुनाई संरचना में बदला। तिघरा डैम से ग्वालियर शहर को जलापूर्ति की शुरुआत वर्ष 1916 से ही हुई थी। 1916 से अब तक यह शहर की लगभग 14 लाख आबादी के लिए पेयजल का प्राथमिक स्रोत बना हुआ है। मोतीझील वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में तिघरा का पानी साफ करने के बाद शहर की विभिन्न टंकियों तक पहुंचाया जाता है। 24 मीटर ऊंचा और 1,341 मीटर लंबा है डैम तिघरा डैम की ऊंचाई लगभग 24 मीटर और लंबाई 1,341 मीटर है। इसका निर्माण ग्वालियर शहर की जलापूर्ति के साथ आसपास के 11 गांवों की सिंचाई के उद्देश्य से कराया गया था।

बरेली में टंकी गिरने की वजह आया सामने, नदी के तेज कटान से हुआ हादसा; निर्माण में नहीं थी लापरवाही

बरेली में टंकी गिरने का प्रमुख कारण नदी का तेज कटान, निर्माण में नहीं हुई कोई लापरवाही ओवरहेड टैंक गिरने पर सामने आई जल निगम ग्रामीण की रिपोर्ट निर्माण के वक्त 150 मीटर दूर थी किच्छा नदी, बाद में बदली धारा से पहुंचा नुकसान तीन मीटर गहरी नींव के आस-पास बह गई थी मिट्टी, तेज कटान से गिरी निर्माणाधीन टंकी जल निगम की रिपोर्ट में खुलासा, गुणवत्ता नहीं प्राकृतिक परिस्थितियां बनीं टंकी गिरने की वजह लखनऊ/बरेली शेरगढ़ विकासखंड के ग्राम बैरमनगर में जल जीवन मिशन के अंतर्गत निर्माणाधीन ओवरहेड टैंक गिरने की घटना के पीछे जल निगम (ग्रामीण) की रिपोर्ट में निर्माण गुणवत्ता की कमी नहीं, बल्कि अत्यधिक जलप्रवाह और किच्छा नदी के तेज कटान को प्रमुख कारण बताया गया है। विभाग की गहन रिपोर्ट के मुताबिक निर्माण के समय टैंक स्थल नदी से करीब 150 मीटर दूर था। साथ ही यह फ्लड जोन में भी शामिल नहीं था। मिट्टी का परीक्षण कराकर स्वीकृत ड्राइंग-डिजाइन एवं निर्धारित मानकों के अनुरूप निर्माण कराया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले सप्ताह अत्यधिक बारिश और संभवतः गौला बैराज से अधिक पानी छोड़े जाने के बाद नदी का जलप्रवाह अचानक बढ़ा। इसके चलते नदी की धारा बदली और महज 3-4 दिनों में तेजी से कटान करते हुए पानी टैंक परिसर के किनारे तक पहुंच गया। जल निगम ने सुरक्षा के लिए सैंड बैग और पिचिंग की व्यवस्था की, लेकिन पानी का बहाव अधिक और गहरा होने के कारण कटान रोकने की स्थायी व्यवस्था तत्काल संभव नहीं हो सकी। नींव के आस-पास की मिट्टी बही तेज कटान से टैंक की करीब तीन मीटर गहरी नींव के आस-पास की मिट्टी बह गई, जिससे नींव का धरातलीय सहारा कमजोर हुआ और एक तरफ झुक गया। इसी वजह से 8 सितंबर को आंशिक रूप से निर्मित टैंक अस्थिर होकर नदी में गिर गया। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि निर्माण सामग्री व गुणवत्ता में कोई कमी नहीं थी। निर्माण के बाद नदी की धारा और तटरेखा में आया असामान्य बदलाव व प्राकृतिक परिस्थितियों से उत्पन्न तेज कटान इस घटना की प्रमुख वजह रही।

19.1 करोड़ की इंडिया-इजराइल परियोजना में तेजी, गंगावली में सोलर पंप, इंटेक पाइप व नेचुरल एसटीपी का काम पूरा

इंडिया-इजराइल परियोजना: बुंदेलखंड में जल संकट का समाधान निकाल रहा योगी सरकार का आधुनिक जल प्रबंधन मॉडल 19.1 करोड़ की इंडिया-इजराइल परियोजना में तेजी, गंगावली में सोलर पंप, इंटेक पाइप व नेचुरल एसटीपी का काम पूरा जलाशय से खेत तक पहुंचेगा पानी, बूंद-बूंद के बेहतर इस्तेमाल का मॉडल तैयार, 31 दिसंबर तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य 8.5 हेक्टेयर में दिखेगी कम पानी में बेहतर खेती की तकनीक, गंगावली मॉडल का 24 गांवों तक विस्तार करने की तैयारी 72 प्रशिक्षण सत्रों से किसानों को मिलेंगे आधुनिक सिंचाई और खेती के गुर, हर सत्र में हिस्सा लेंगे 100 किसान लखनऊ  बुंदेलखंड में जल संकट और सीमित जल संसाधनों के बीच योगी सरकार जल संरक्षण, सिंचाई दक्षता और आधुनिक कृषि तकनीक को बढ़ावा देने के लिए इंडिया-इजराइल बुंदेलखंड वाटर प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है। झांसी के विकासखंड बड़ागांव स्थित ग्राम गंगावली में करीब 19.1 करोड़ रुपये की लागत से चल रहे मिनी पायलट प्रोजेक्ट में कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे हो चुके हैं। जलाशय का अर्थवर्क और जियोमेम्ब्रेन लाइनिंग, सोलर पंप की स्थापना, नहर से जलाशय तक इंटेक पाइप और इंटेक वेल, पीयूएफ पैनल आधारित भवनों समेत कई प्रमुख काम पूरे किए जा चुके हैं। अब अगले चरण में माइक्रो इरिगेशन, ग्रीनहाउस, सिंचाई ऑटोमेशन और किसान प्रशिक्षण जैसे कार्यों को आगे बढ़ाया जाएगा। जल संरक्षण से आधुनिक खेती तक एक ही मॉडल नमामि गंगे और ग्रामीण जलापूर्ति विभाग के विशेष सचिव एवं निदेशक, भूगर्भ जल विभाग डॉ राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि योगी सरकार की इस पहल का उद्देश्य बुंदेलखंड की स्थानीय जल उपलब्धता और कृषि परिस्थितियों के अनुसार ऐसा मॉडल तैयार करना है, जिसमें उपलब्ध पानी का अधिकतम और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जा सके। परियोजना में जल संरक्षण, जल भंडारण, सौर ऊर्जा, माइक्रो इरिगेशन, आधुनिक कृषि तकनीक और किसान प्रशिक्षण को एक साथ जोड़ा गया है। इसके तहत जलाशय, नहर से पानी लाने की व्यवस्था, पाइपलाइन, सोलर पंप, ड्रिप-स्प्रिंकलर, प्राकृतिक एसटीपी, कृषि मशीनरी और आधुनिक खेती की सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। इसका मकसद किसानों को सीमित पानी में बेहतर सिंचाई और खेती का व्यावहारिक मॉडल उपलब्ध कराना है। नेचुरल एसटीपी का भी निर्माण गंगावली में परियोजना की प्रगति अब जमीन पर दिखाई देने लगी है। जलाशय क्षेत्र की डिमार्केशन और फेंसिंग का कार्य पूरा हो चुका है। जलाशय का अर्थवर्क और जियोमेम्ब्रेन लाइनिंग भी पूरी हो गई है। पीयूएफ पैनल आधारित भवनों का निर्माण पूरा होने के साथ वहां सीसीटीवी की व्यवस्था भी की जा चुकी है। इसके अलावा सोलर पंप स्थापित किया गया है। नहर से जलाशय तक इंटेक पाइप और जलाशय में इंटेक वेल का निर्माण भी पूरा हो चुका है। गांव से आने वाले अपशिष्ट जल को जलाशय में पहुंचने से रोकने और उसके उपचार के लिए नेचुरल एसटीपी का निर्माण किया गया है। जलाशय के आसपास सड़क का काम अभी प्रगति पर है। 8.5 हेक्टेयर में होगा आधुनिक खेती का प्रदर्शन मिनी पायलट प्रोजेक्ट के तहत करीब 8.5 हेक्टेयर क्षेत्र में आधुनिक कृषि गतिविधियों का प्रदर्शन प्रस्तावित है। अगले चरण में ड्रिप और स्प्रिंकलर आधारित माइक्रो इरिगेशन सिस्टम को स्थापित और क्रियाशील किया जाएगा। इसके साथ ही ग्रीनहाउस, टनल, पाइपलाइन और सिंचाई ऑटोमेशन-एससीएडीए व्यवस्था को भी क्रियाशील किया जाएगा। इससे किसानों को यह समझने का अवसर मिलेगा कि फसल की जरूरत के अनुसार कितनी मात्रा में पानी दिया जाए और कम पानी में बेहतर उत्पादन कैसे हासिल किया जा सकता है। परियोजना में पानी की खपत, सिंचाई दक्षता, फसल उत्पादन, लागत और जल उत्पादकता जैसे मानकों पर तकनीकों के परिणामों का मूल्यांकन भी किया जाएगा। किसानों को खेत पर मिलेगा व्यावहारिक प्रशिक्षण परियोजना में केवल आधारभूत ढांचा तैयार करने के बजाय किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। प्रस्तावित प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 72 प्रैक्टिकल ट्रेनिंग सेशन आयोजित किए जाएंगे। प्रत्येक सत्र में करीब 100 किसानों की भागीदारी का प्रावधान है। प्रशिक्षण में किसानों को वाटर बजटिंग, फर्टिगेशन, क्रॉप प्लानिंग, सिंचाई संचालन और कृषि मशीनरी के इस्तेमाल की जानकारी दी जाएगी। इससे किसान उपलब्ध पानी के आधार पर फसल क्षेत्र तय करने और सिंचाई का बेहतर प्रबंधन करने में सक्षम होंगे। 24 गांवों तक पहुंचेगा गंगावली का मॉडल डॉ. राजेश कुमार प्रजापति ने कहा कि गंगावली में तैयार हो रहे मिनी पायलट प्रोजेक्ट के अनुभवों को आगे बड़े क्षेत्र में लागू करने की भी तैयारी है। अगले चरण में बड़ागांव विकासखंड में पाहुज नहर के डाउनस्ट्रीम स्थित 24 अन्य गांवों में विस्तृत प्रदर्शनात्मक प्रोजेक्ट प्रस्तावित है। इससे गंगावली में सफल रहने वाली उपयोगी तकनीकों को दूसरे गांवों तक पहुंचाने का रास्ता तैयार होगा। 31 दिसंबर तक निर्माण पूरा करने का लक्ष्य भूगर्भ जल विभाग के अधिशासी अभियांता व वैयक्तिक सहायक निदेशक अनुपम ने कहा कि परियोजना के वर्तमान निर्माण एवं क्रियान्वयन चरण को 31 दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके बाद ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस के साथ परियोजना को जून 2029 तक संचालित करने का प्रस्ताव है। वहीं विस्तारित डेमोंस्ट्रेशन और किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम अक्टूबर 2026 से मई 2029 तक प्रस्तावित है।

क्या पानी में समा जाएगी मुंबई? बढ़ते समुद्री स्तर पर UN की चेतावनी, 1.4 करोड़ लोग खतरे में

मुंबई क्या एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब मुंबई के कुछ हिस्सों का पता तो वही रहे, लेकिन जमीन समुद्र के नीचे चली जाए? यह सवाल किसी साइंस फिक्शन फिल्म का नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई रिपोर्ट का है.  UN महासचिव की रिपोर्ट में  मुंबई, कोलकाता और ढाका जैसे शहरों का जिक्र करते हुए चेतावनी दी गई है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर आने वाले दशकों में इन शहरों के निचले इलाकों को हमेशा के लिए पानी में डूबो (Permanent Inundation) सकता है. हालात अगर इसी दिशा में बढ़ते रहे तो लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण एशिया में 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग इस खतरे की जद में हैं।  आखिर यह रिपोर्ट है क्या और किसने जारी की? यह चेतावनी UN महासचिव की रिपोर्ट"Challenges related to sea level rise and ways and approaches to address it" में दी गई है. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासभा के दस्तावेज़ A/81/74 के रूप में दर्ज है. रिपोर्ट में दुनिया भर में बढ़ते समुद्री जलस्तर और उससे पैदा होने वाले खतरों का आकलन किया गया है.रिपोर्ट का सबसे चर्चित हिस्सा वह है जिसमें मुंबई, कोलकाता और ढाका जैसे शहरों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि यहां सबसे बड़ा खतरा आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि लोगों के घरों और बस्तियों पर पड़ सकता है।  क्या सचमुच डूब सकते हैं मुंबई और कोलकाता? यहां एक बात समझना जरूरी है. रिपोर्ट यह नहीं कहती कि पूरा मुंबई, पूरा कोलकाता या पूरा ढाका समुद्र में समा जाएगा. लेकिन रिपोर्ट साफ तौर पर चेतावनी देती है कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर इन शहरों के निचले इलाकों में Permanent Inundation यानी ऐसा जलभराव पैदा कर सकता है जो अस्थायी नहीं, बल्कि लंबे समय तक बना रहे. इसी वजह से लाखों लोगों के घर प्रभावित होने की बात कही गई है.यानी कहानी केवल बाढ़ की नहीं है. चिंता इस बात की है कि अगर समुद्र लगातार आगे बढ़ता रहा तो कुछ इलाकों में लोगों के लिए रहना मुश्किल हो सकता है।  मुंबई के लिए खतरा दूसरों से ज्यादा क्यों माना जा रहा? रिपोर्ट के मुताबिक समुद्र किनारे बसे लगभग सभी बड़े शहर खतरे में हैं, लेकिन UN रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के सामने कुछ अतिरिक्त चुनौतियां भी हैं.रिपोर्ट में जमीन धंसने (Land Subsidence), भूजल में खारे पानी के प्रवेश और समुद्री तूफानों से आने वाली ऊंची लहरों का जिक्र किया गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि जब ये सभी कारक समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी के साथ जुड़ते हैं, तब खतरा और बढ़ जाता है।  आसान भाषा में समझें तो अगर समुद्र का पानी लगातार आगे बढ़ता है, तो उसका असर सिर्फ समुद्र किनारे की जमीन तक सीमित नहीं रहेगा. खारा पानी पीने के पानी के स्रोतों तक पहुंच सकता है, कई इलाकों में जलभराव की समस्या और गंभीर हो सकती है और समुद्री तूफानों के दौरान होने वाला नुकसान भी पहले से ज्यादा बढ़ सकता है।  UN रिपोर्ट यह भी कहती है कि मुंबई जैसे शहरों में बढ़ता समुद्री जलस्तर ट्रांसपोर्ट, हाउसिंग और सैनिटेशन जैसे बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है. यही वजह है कि रिपोर्ट में मुंबई को सिर्फ एक तटीय शहर नहीं, बल्कि उन बड़े महानगरों में गिना गया है जिन्हें आने वाले दशकों में सबसे ज्यादा तैयारी करने की जरूरत पड़ सकती है.मुंबई को लेकर इससे पहले भी कई रिपोर्टें चिंता जता चुकी हैं. बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की क्लाइमेट एक्शन प्लान रिपोर्ट में भी समुद्र के बढ़ते खतरे और जलवायु परिवर्तन के असर का जिक्र किया गया था।  UN को अचानक इतनी चिंता क्यों हुई? दरअसल समुद्र अब पहले से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक 2014 से 2023 के बीच वैश्विक समुद्री जलस्तर औसतन 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष बढ़ रहा था. लेकिन 2024 में यह बढ़ोतरी 5.9 मिलीमीटर रही, जो रिकॉर्ड स्तर है.रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा परिस्थितियों में 2100 तक कम से कम 0.5 मीटर समुद्री जलस्तर वृद्धि लगभग तय मानी जा रही है. वहीं कुछ रिसर्च में यह बढ़ोतरी 2 मीटर तक पहुंचने की आशंका भी जताई गई है।  सिर्फ मुंबई नहीं, दुनिया के सैकड़ों शहरों पर खतरा UN रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की करीब 77 करोड़ आबादी ऐसे तटीय इलाकों में रहती है जो ऊंचे ज्वार के स्तर से 5 मीटर से भी कम ऊंचाई पर हैं. रिपोर्ट में भारत के मुंबई और कोलकाता के साथ बांग्लादेश की राजधानी ढाका का विशेष रूप से जिक्र किया गया है.इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी का असर सिर्फ दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रहने वाला. दुनिया के कई बड़े तटीय शहरों और निचले इलाकों को भी आने वाले सालों में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है. रिपोर्ट में न्यूयॉर्क, मियामी और चीन के ग्वांगझोउ जैसे शहरों का जिक्र करते हुए कहा गया है कि वहां सबसे बड़ा खतरा अरबों डॉलर की संपत्तियों और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान का है, जबकि दक्षिण एशिया में सबसे बड़ी चिंता लोगों के घर और आबादी का पलायन है। 

Indus Water Treaty: पाकिस्तान दिखा रहा हेग कोर्ट का कागज, भारत ने ठुकराया फैसला; जानें पूरा विवाद

नई दिल्ली  पाकिस्तान के आतंकवादी कृत्यों की सजा देने के लिए भारत ने जब सिंधु जल समझौता रद्द किया, तो शहबाज शरीफ को भी नहीं उम्मीद रही होगी कि इस बार उसे वाकई अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आंसू बहाने पड़ जाएंगे. हैरानी की बात ये है कि उसने इसके खिलाफ सबसे बड़ा हथकंडा नीदरलैंड में मौजूद मध्यस्थता न्यायालय यानि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन में भारत की शिकायत करके अपनाया. इस पर सुनवाई हुई और कोर्ट ने कह दिया कि 1960 के सिंधु जल समझौते को लागू रखना चाहिए. अब पाकिस्तान इसी जजमेंट को लेकर जगह-जगह अपना रोना रो रहा है, हालांकि भारत साफ कर चुका है कि वो इस कोर्ट को मान्यता नहीं देता, ऐसे में इसका फैसला उसके लिए कागज के टुकड़े से ज्यादा कुछ नहीं।  अब पाकिस्तान ने भारत के उस फैसले का औपचारिक विरोध किया है, जिसमें उसने स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration-PCA) के हालिया आदेशों को मानने से इनकार कर दिया है. ये आदेश 1960 की सिंधु जल संधि से जुड़े विवाद को लेकर दिए गए हैं. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत को संधि का पूरी तरह पालन करना चाहिए. इस्लामाबाद का कहना है 60 साल पुरानी जल-बंटवारे की संधि अब भी कानूनी रूप से बाध्यकारी है और कोई भी देश एकतरफा तरीके से इसके प्रावधानों में बदलाव नहीं कर सकता. वो शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन में भी इस मुद्दे को उठा चुका है, लेकिन भारत का रुख साफ है कि वो इस फैसले को नहीं मानता।  भारत ने सिंधु जल संधि को किया रद्द भारत का रुख पाकिस्तान से बिल्कुल अलग है. नई दिल्ली ने सिंधु जल संधि को पूरी तरह स्थगित रखा है. भारत का कहना है कि इस पर दोबारा विचार तभी किया जाएगा, जब पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को स्थायी और सत्यापन योग्य तरीके से रोकने के लिए ठोस कदम उठाए. भारत ने PCA की कार्यवाही को भी मूल रूप से गलत और कानूनी रूप से अमान्य बताया है. भारत इस मामले में हेग स्थित इस न्यायिक मंच की कार्यवाही में शामिल नहीं हुआ. भारत का तर्क है कि इस आर्बिट्रल का गठन संधि में तय विवाद निपटाने की मूल व्यवस्था के खिलाफ हुआ है, इसलिए भारत PCA के आदेश या अंतरिम फैसले उसकी संप्रभु नीतियों पर लागू नहीं होते।  पाकिस्तान जगह-जगह पीट रहा छाती  पाकिस्तान लगातार बातचीत की मांग कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के फैसलों का हवाला दे रहा है. इसके पीछे मुख्य चिंता यह है कि भारत के फैसलों से पाकिस्तान को मिलने वाले पानी पर असर पड़ सकता है. इस्लामाबाद थर्ड पार्टी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के जरिए भारत को फिर से बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि भारत का स्टैंड साफ है कि वो द्विपक्षीय मुद्दों पर किसी का दखल नहीं चाहता. सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की कोशिशों के बीच उसकी व्यापक कूटनीतिक स्थिति भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. पाकिस्तान ने कहा है कि चीन के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी पर भारत और चीन के बदलते संबंधों का कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन बिश्केक में पाकिस्तान के सिंधु के पानी का रोना रोने पर शी जिनपिंग ने कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी थी।  क्यों भारत ने रोका सिंधु का पानी? अप्रैल, 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगन में डाल दिया था. इस हमले में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने 26 निर्दोष नागरिकों, जिनमें अधिकतर पर्यटक थे, की हत्या कर दी थी. इसके बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया कि जब तक सीमा पार आतंकवाद जारी रहेगा, तब तक संधि से जुड़े दायित्वों पर पुनर्विचार किया जाएगा. क्या है सिंधु जल संधि? सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी. इसके तहत भारत को पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलुज का पूरा अधिकार दिया गया, जबकि पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान को मिलता है. भारत को इन नदियों पर सीमित गैर उपभोगीय उपयोग, जैसे जलविद्युत उत्पादन, की अनुमति है. भारत का रुख अब बिल्कुल स्पष्ट है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते. जब तक हालात नहीं सुधरते, तब तक सिंधु जल संधि से जुड़े किसी भी अंतरराष्ट्रीय आदेश को वह स्वीकार नहीं करेगा।  भारत अपनी सुरक्षा चिंताओं, खासकर सीमा पार आतंकवाद, को इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण आधार मान रहा है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मध्यस्थता के जरिए दबाव बनाने की पाकिस्तान की कोशिशों का भारत पर अब तक सीमित असर दिखाई दे रहा है. दोनों देशों के बीच जल विवाद फिलहाल कूटनीतिक और रणनीतिक तनाव का एक अहम मुद्दा बना हुआ है। 

18% आबादी, लेकिन सिर्फ 4% जल संसाधन! क्या बड़े जल संकट की ओर बढ़ रहा है भारत?

 नई दिल्ली भारत इस समय दुनिया के सबसे बड़े जल संकट की ओर बढ़ रहा है. आबादी और पानी के संसाधनों के बीच का असंतुलन देश के भविष्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है. दुनिया की लगभग 18% आबादी भारत में रहती है, लेकिन हमारे पास दुनिया के कुल पीने वाले पानी का सिर्फ 4% हिस्सा ही मौजूद है।  तेजी से हो रहे शहरीकरण, औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन के दबाव के कारण मौजूदा संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है. विशेषज्ञों का कहना है कि पानी की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ रहा है, जिसके लिए आने वाले दशक में भारी निवेश की ज़रूरत होगी।  PL Capital की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है. इससे अगले 10 सालों में वॉटर ट्रीटमेंट, वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग, सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और स्टोरेज सिस्टम में लगभग ₹20 लाख करोड़ के निवेश का मौका बन सकता है।  आर्थिक उतार-चढ़ाव के साथ बदलने वाले कई इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के उलट, पानी की सुरक्षा में निवेश मुख्य रूप से स्ट्रक्चरल कारणों से बढ़ रहा है. बढ़ती आबादी, शहरों का विस्तार, औद्योगिक विकास, भूजल में कमी और पर्यावरण से जुड़े कड़े नियम ये सभी भारत के सीमित मीठे पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं।  PL Capital में एडवाइजरी के चीफ बिजनेस ऑफिसर विक्रम कसात ने कहा, "भारत में पानी एक अहम रणनीतिक संसाधन बनता जा रहा है. इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े दूसरे ट्रेंड्स, जो आर्थिक चक्रों से जुड़े हो सकते हैं, उनके उलट पानी की सुरक्षा में निवेश स्ट्रक्चरल और पॉलिसी पर आधारित होता है और टिकाऊ विकास के लिए ज़रूरी है।  सीवेज को ट्रीट करने की क्षमता कम  भारत में अभी हर दिन 72,000 मिलियन लीटर से ज़्यादा सीवेज पैदा होता है, लेकिन इसे ट्रीट करने की क्षमता काफी नहीं है. इस वजह से बड़ी मात्रा में बिना ट्रीट किया हुआ वेस्टवॉटर नदियों और दूसरे जल स्रोतों में बहा दिया जाता है. आने वाले सालों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग सुविधाओं का विस्तार इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च का एक बड़ा हिस्सा बनने की उम्मीद है।  रिपोर्ट में पानी की ज्यादा खपत वाले कई उद्योगों के उभरने की ओर भी इशारा किया गया है, जिनसे अच्छी क्वालिटी वाले इंडस्ट्रियल पानी की मांग बढ़ने की उम्मीद है. डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्शन, ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट और स्पेशलिटी केमिकल्स इन सभी में बहुत ज़्यादा शुद्ध पानी की ज़रूरत होती है. इससे पानी को शुद्ध करने और रीसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी से जुड़ी कंपनियों के लिए नए मौके बन रहे हैं।  PL Capital की एक नई थीम-बेस्ड रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध सप्लाई से दोगुनी हो सकती है. इससे अगले 10 सालों में वॉटर ट्रीटमेंट, वेस्टवॉटर रीसाइक्लिंग, सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर, डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और स्टोरेज सिस्टम में ₹20 लाख करोड़ के निवेश का मौका बन सकता है।  इकोनॉमिक साइकल के साथ बदलने वाले कई इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर के उलट, वॉटर सिक्योरिटी में निवेश अब स्ट्रक्चरल वजहों से बढ़ रहा है. आबादी का बढ़ना, शहरों का विस्तार, इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट, ग्राउंडवॉटर का कम होना और पर्यावरण से जुड़े कड़े नियम ये सभी भारत के सीमित मीठे पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ा रहे हैं।