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राज्योत्सव में खास पहल, अब मुफ्त में करा सकेंगे बोरवेल और कुओं के पानी की जांच

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2026 लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की अनूठी पहल, मेले में ही मिलेगा निजी बोरवेल और कुओं के पानी की जांच का निःशुल्क अवसर रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य के स्थापना दिवस के पावन अवसर पर आयोजित राज्योत्सव 2026 (01 से 03 नवंबर 2026) में इस बार आम नागरिकों के स्वास्थ्य और शुद्ध पेयजल को लेकर एक विशेष सुविधा शुरू की गई है। मेले में आने वाले नागरिकों को अपनी निजी जल स्रोतों की शुद्धता परखने का सीधा मौका मिल रहा है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा राज्योत्सव के इस तीन दिवसीय भव्य आयोजन के दौरान विभागीय प्रदर्शनी स्थल पर पेयजल का प्रत्यक्ष रासायनिक जल परीक्षण किया जा रहा है। नागरिक अपने पीने और सिंचाई के पानी की गुणवत्ता (जैसे फ्लोराइड, आर्सेनिक, भारी धातुएं और बैक्टीरिया) की जांच बिना किसी शुल्क के सरकारी प्रयोगशालाओं में करवा सकते हैं। निःशुल्क जल परीक्षण का लाभ उठाएं         लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा दी जा रही इस सुविधा के तहत यदि कोई भी हितग्राही अपने घर के निजी ट्यूबवेल (बोरवेल) या कुएं के पानी की गुणवत्ता की जांच कराना चाहता है, तो वह बेहद आसानी से इसका लाभ उठा सकता है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के मुख्य प्रदर्शनी स्थल, राज्योत्सव परिसर में संपर्क किया जा सकता है। यह पूरी तरह से निःशुल्क है। जल नमूनों की जांच के तुरंत बाद विभागीय काउंटर से ही परीक्षण रिपोर्ट भी प्रदान की जा रही है, जिससे नागरिकों को पानी में मौजूद तत्वों और उसकी पीने योग्य स्थिति की सटीक जानकारी मिल सके। शुद्ध पेयजल के प्रति जागरूकता पर जोर         लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के इस स्टॉल पर विशेषज्ञों द्वारा आगंतुकों को पानी की गुणवत्ता, भू-जल संरक्षण और सुरक्षित पेयजल के उपायों के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है। राज्योत्सव में शामिल होने वाले आमजन इस विशेष सेवा का लाभ उठाकर अपने परिवार के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में कदम उठा सकते हैं। प्रशासन ने अपील की है कि अधिक से अधिक नागरिक इस सुविधा का लाभ उठाएं और अपने जल स्रोतों की गुणवत्ता की जांच करवाएं।

Indore Water Crisis: कम बारिश और अल नीनो का असर, इंदौर में बोरिंग पर सख्ती; कलेक्टर ने जारी किए आदेश

इंदौर   मध्य प्रदेश में कम बारिश का असर अब तेजी से दिखने लगा है. वर्षों से ग्राउंड वॉटर लेवल की समस्या से जूझ रहे इंदौर के हालात बिगड़ने लगे हैं. इंदौर में सामान्य से बहुत कम बारिश के कारण पूरे जिले में अभी से सूखे जैसे हालात बनते नजर आ रहे हैं. स्थिति को भांपते हुए इंदौर जिला प्रशासन ने शहरी और ग्रामीण क्षेत्र समेत पूरे जिले को जल संकटग्रस्त घोषित कर दिया है, जहां अब नई बोरिंग खोदना भी प्रतिबंधित कर दिया गया है।  इंदौर जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित दरअसल, इंदौर जिले में औसत से काफी कम वर्षा होने और भू-जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन के कारण पेयजल स्रोतों एवं नलकूपों का जल स्तर तेजी से गिर रहा है. आगामी समय में संभावित पेयजल संकट को देखते हुए कलेक्टर व जिला दण्डाधिकारी शिवम वर्मा ने इंदौर जिले के संपूर्ण शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों को जल अभावग्रस्त क्षेत्र घोषित किया है. साथ ही, मध्यप्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम, 1986 व संशोधन अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत जिले में अशासकीय और निजी नलकूप खनन पर आज से आगामी आदेश तक प्रतिबंध लगाया है।  कार्यपालन यंत्री, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (जल प्रदाय), नगर पालिक निगम इंदौर एवं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (ग्रामीण), जिला इंदौर द्वारा गिरते भू-जल स्तर और संभावित पेयजल संकट को देखते हुए निजी नलकूप खनन पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की गई थी।  बोरिंग करने पर जब्त होगी मशीन इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा के मुताबिक, '' जिले में प्रतिबंधित स्थानों पर अवैध रूप से प्रवेश करने वाली अथवा नलकूप खनन और बोरिंग का प्रयास करने वाली मशीनों को भी जब्त किया जाएगा. संबंधित राजस्व, पुलिस व नगर निगम अधिकारियों को मशीनें जब्त करने और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई कराने का अधिकार दिया गया है।  उल्लंघन करने पर जुर्माने के साथ दो साल की जेल आदेश के मुताबिक, '' मध्यप्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम की धारा 3 या धारा 4 के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 2,000 रु तक के जुर्माने, दो वर्ष तक का कारावास या दोनों से दंडित किए जाने का प्रावधान है. शासकीय योजनाओं के अंतर्गत किए जाने वाले नलकूप उत्खनन पर यह आदेश लागू नहीं होगा. वहीं, आवश्यकता पड़ने पर निजी जलकूपों और निजी जल स्रोतों का सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था के लिए मध्यप्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम की धारा 4 के अंतर्गत अधिग्रहण किया जा सकता है. यह आदेश तत्काल प्रभावशील रहेगा। 

इंदौर में पानी की किल्लत के आसार, सूखे तालाबों के बीच बोरिंग भी हांफने लगे

इंदौर. इंदौर से इस वर्ष मानसून रूठा हुआ रहा। इस साल इंदौर जिले की औसतन बारिश का आंकड़ा भी बहुत दूर रहा। इसके चलते अक्टूबर बीतने के साथ ही अभी से जलसंकट की चिंता बढ़ने लगी है। शहर के कई तालाबों का जलस्तर काफी नीचे है। छोटी बिलावली और लिंबोदी तालाब सूख चुके हैं, जबकि पिपल्यापाला और बड़ी बिलावली में भी पानी कम बचा है। झमाझम बारिश के अभाव में शहर के तालाब रीते पड़े हैं। दूसरी ओर कई इलाकों में बोरिंग से पानी मिलना कम हो गया है। लोगों को निजी बोरिंग से पानी खरीदना पड़ रहा है या टैंकर मंगवाने पड़ रहे हैं। कुछ परिवार पानी खरीदने पर हर महीने ₹1500 खर्च कर रहे हैं। टैंकर के लिए ₹2000 तक देने पड़ रहे हैं। कई लोग रिक्शे में बर्तन रखकर 3 से 4 किलोमीटर दूर अरंडिया गांव से पानी ला रहे हैं। इधर, हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने शहर के सूख रहे तालाबों तक नर्मदा का पानी पहुंचाने के प्रस्ताव पर राज्य सरकार से दो सप्ताह में निर्देश लेने को कहा है। नगर निगम भी पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए मालवा-गंभीर लाइन, नए टैंकर और बोरिंग की मरम्मत जैसे इंतजाम करने की तैयारी कर रहा है। कहीं 4 साल से पानी की समस्या, कहीं टैंकर भी नहीं पहुंचते वार्ड 35 के तलावली चांदा गांव, बजरंग नगर, रविदास नगर और निरंजनपुर झाडू बस्ती में रहवासी लंबे समय से पानी की परेशानी झेल रहे हैं। उनका कहना है कि मंत्री तुलसी सिलावट और पार्षद राकेश सोलंकी से शिकायत के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ। टंकी में 35 लाख लीटर पानी, फिर भी घरों तक सप्लाई नहीं होने का दावा कांग्रेस नेता सुभाष सोलंकी के मुताबिक, क्षेत्र में 2015 से 2018 के बीच पानी की टंकी बनाई गई थी। वर्ष 2020 से इसमें पानी आने लगा। उनका दावा है कि टंकी में करीब 35 लाख लीटर पानी आ रहा है, लेकिन रहवासियों को इसकी सप्लाई नहीं मिल रही। उन्होंने पानी के वितरण की जांच कराने की मांग की है। वार्ड 35 और 36 के अलावा तलावली चांदा, लसूड़िया मोरी और बजरंग नगर के कुछ हिस्सों में भी जलसंकट की शिकायतें हैं। वार्ड 16, 20, 28, 30, 37, 45, 51, 63 और 79 के रहवासियों ने भी नियमित जलापूर्ति की मांग की है। इन वार्डों में भी जलसंकट की शिकायतें वार्ड 35 और 36 के अलावा तलावली चांदा, लसूड़िया मोरी और बजरंग नगर के कुछ हिस्सों में भी पानी की समस्या बताई जा रही है। यहां कुछ परिवार हर दूसरे दिन 3 से 4 किलोमीटर दूर अरंडिया गांव जाकर पानी भरते हैं। वार्ड 16, 20, 28, 30, 37, 45, 51, 63 और 79 में भी जलसंकट की शिकायतें सामने आई हैं। रहवासियों ने नगर निगम से नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है। तालाबों की स्थिति: कहीं जलस्तर घटा, कहीं पानी खत्म इंदौर और आसपास के प्रमुख तालाबों में जलस्तर कम होने से चिंता बढ़ गई है। यशवंत सागर, बड़ी बिलावली, छोटी बिलावली, बड़ा सिरपुर, छोटा सिरपुर, पिपल्यापाला और लिंबोदी तालाब की स्थिति अलग-अलग है। कुछ तालाब सूख चुके हैं, जबकि बाकी में पानी कम हो गया है। ये तालाब भूजल स्तर को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। यशवंत सागर: 16.4 फीट पानी, यहीं से होती है शहर की सप्लाई यशवंत सागर की अधिकतम क्षमता 19 फीट है और फिलहाल इसमें 16.4 फीट पानी है। नगर निगम के जलकार्य प्रभारी अभिषेक शर्मा बबलू के मुताबिक, यहां से छह पानी की टंकियों के जरिए शहर में जलापूर्ति होती है। उन्होंने बताया कि मालवा-गंभीर लाइन से पानी लाने की तैयारी की जा रही है। दिसंबर तक यहां पानी पहुंचाने की योजना है, जिससे जलस्तर बढ़ाने में मदद मिल सकेगी। यशवंत सागर से 30 एमएलडी पानी की सप्लाई जलकार्य प्रभारी अभिषेक शर्मा बबलू ने बताया कि यशवंत सागर से करीब 30 एमएलडी पानी की सप्लाई होती है। उनके अनुसार, इससे 20 हजार से ज्यादा लोगों तक पानी पहुंचता है। उन्होंने कहा कि यशवंत सागर के अलावा बिलावली, लिंबोदी, पिपल्यापाला और सिरपुर तालाब भी महत्वपूर्ण हैं। ये तालाब भूजल स्तर को रिचार्ज करने में मदद करते हैं, लेकिन इस बार इनमें भी अपेक्षाकृत कम पानी है। 60 साल में दूसरी बार आया जलसंकट सालों से इंदौर के पानी को लेकर आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी ने बताया कि बीते 60 सालों में दूसरी बार ऐसा जलसंकट है। 1965 में 15.8 इंच पानी कम गिरा था। इस साल 14 इंच पानी कम गिरा है। नगर निगम ने ये किए इंतजाम – 85 वार्डों में हाइड्रेंट: हर वार्ड में कम से कम एक हाइड्रेंट लगाने और बड़े वार्डों में इनकी संख्या बढ़ाने की योजना। 100 नए टैंकर: पानी की सप्लाई सुचारू रखने के लिए 100 टैंकर खरीदने की तैयारी। इससे पहले 650 पानी के टैंकर लगाए गए थे। 6 हजार सरकारी बोरिंग की सर्विसिंग: गर्मी शुरू होने से पहले सभी सरकारी बोरिंग की सर्विसिंग कराई जाएगी। चार नई टंकियां: चार नई पानी की टंकियां तैयार की जा रही हैं। जनवरी से इनके जरिए जलापूर्ति शुरू करने की योजना है। आने वाले महीनों के लिए चेतावनी है शहर में तालाबों का घटता जलस्तर और कई इलाकों में पानी के लिए लोगों की परेशानी आने वाले महीनों के लिए चेतावनी है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नर्मदा और गंभीर लाइन से पानी पहुंचाने सहित नगर निगम की योजनाएं कितनी जल्दी जमीन पर उतरती हैं। -किशोर कोडवानी, सामाजिक कार्यकर्ता महापौर और मुख्यमंत्री से चर्चा हुई है मालवा-गंभीर लाइन से पानी लाने को लेकर महापौर और मुख्यमंत्री से चर्चा हुई है। इस लाइन से पानी मिलने पर यशवंत सागर से होने वाली सप्लाई की जरूरत पूरी करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा राऊ से गंभीर की ओर जाने वाली लाइन के जरिए बिलावली, लिंबोदी और पिपल्यापाला तालाबों तक पानी पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। -बबलू शर्मा, जलकार्य प्रभारी

बस्तर के घरों तक पहुंचेगा अधिक पानी, ₹57.71 करोड़ से मजबूत होगी पेयजल व्यवस्था

जगदलपुर. बस्तर नगर पंचायत में पेयजल की समस्या दूर करने और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए 57 करोड़ 71 लाख रुपये की नई जलप्रदाय योजना को मंजूरी दी गई है. अमृत मिशन 2.0 के तहत तैयार इस योजना में मारकंडी नदी से पानी लाकर उसका शुद्धीकरण करने के बाद घरों तक पहुंचाया जाएगा. योजना पूरी होने पर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पेयजल उपलब्धता 65 लीटर से बढ़ाकर 135 लीटर करने का लक्ष्य रखा गया है. इसके लिए नगर में करीब 73 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी और 2700 से अधिक घरेलू नल कनेक्शन दिए जाएंगे. मारकंडी नदी के चपका एनीकट में इंटेकवेल बनाया जाएगा, जहां से कच्चा पानी पाइपलाइन के जरिए जल शोधन संयंत्र तक पहुंचेगा. यहां तीन एमएलडी क्षमता वाले संयंत्र में पानी को शुद्ध कर नगर में आपूर्ति की जाएगी. जल भंडारण और वितरण व्यवस्था मजबूत करने के लिए 500 किलोलीटर क्षमता का उच्च स्तरीय जलागार भी बनाया जाएगा. राज्य शहरी विकास अभिकरण से प्रशासकीय स्वीकृति मिलने के बाद योजना को जून 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. स्वीकृत राशि में पांच वर्षों तक संचालन और संधारण का खर्च भी शामिल है. उप मुख्यमंत्री एवं नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने इसे नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है. वहीं, विभागीय प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने निर्माण कार्यों में गुणवत्ता, नियमित निगरानी और तय समयसीमा का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं. अब योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्माण निर्धारित समय पर पूरा हो और पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी हर घर तक पहुंचे.

MP News: अर्धसैनिक बलों को मिलेगा नया वाटर बाउजर, जबलपुर व्हीकल फैक्ट्री तैयार करेगी वाहन

जबलपुर  व्हीकल फैक्ट्री देश के अर्धसैनिक बलों के लिए वाटर बाउजर की नई खेप तैयार करने जा रही है। वित्तीय वर्ष 2026-27 में सीआरपीएफ, बीएसएफ और आइटीबीपी के लिए बनने वाले इन वाहनों की पहली खेप में 52 वाटर बाउजर शामिल होंगे। रक्षा मंत्रालय से इनका उत्पादन आदेश मिल चुका है। शक्तिमान चेसिस पर आधारित ये वाहन केवल पानी की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि दुर्गम क्षेत्रों में जवानों की जरूरतों के अनुरूप कई भूमिकाएं निभा सकेंगे। इनमें 12 हजार लीटर तक पानी ले जाने की क्षमता, स्टेनलेस स्टील के टैंक, पानी शुद्ध करने की इकाई और 60 मीटर तक तेज धार फेंकने वाला हाई-प्रेशर वाटर मॉनिटर होगा। वाहन को 4गुणा4 और 6गुणा6 दोनों श्रेणी में तैयार किया जा रहा है। बख्तरबंद केबिन, विशेष टायर प्रणाली और 380 मिलीमीटर ग्राउंड क्लीयरेंस इसे नक्सल प्रभावित जंगलों से लेकर रेतीले इलाकों तक उपयोगी बनाएंगे। फैक्ट्री के अनुसार, प्रोटोटाइप परीक्षण के दौरान माइनस 45 से 55 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में दो हजार किलोमीटर चला और कोई खराबी दर्ज नहीं हुई। श्रमिक सूत्रों के अनुसार यह परियोजना रक्षा उत्पादन में स्वदेशी निर्माण की दिशा में व्हीकल फैक्ट्री की एक और पहल है। क्या है खास इस नए वाटर बाउजर में यह नया वाटर बाउजर 4गुणा4 और 6गुणा6 दोनों कान्फिगरेशन में तैयार किया जा रहा है। इसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं। क्षमता और तकनीक: इसमें 12,000 लीटर तक पानी ले जाने की क्षमता होगी। टैंक स्टेनलेस स्टील 304 ग्रेड का बनाया जा रहा है ताकि पानी लंबे समय तक स्वच्छ रहे और जंग न लगे। टैंक के अंदर फूड-ग्रेड इपाक्सी कोटिंग की गई है, जिससे जवानों को पीने का शुद्ध पानी मिल सके। दंगा नियंत्रण और फायर फाइटिंग में सक्षम: वाहन में हाई-प्रेशर वाटर मानिटर सिस्टम लगाया गया है, जो 60 मीटर तक पानी की तेज धार फेंक सकता है। इसका इस्तेमाल दंगा नियंत्रण और जंगल में लगी आग बुझाने में किया जा सकेगा। इसके लिए तीन अलग-अलग नोजल मोड रखे गए हैं – जेट, स्प्रे और फाग। ऑल-टेरेन कैपेबिलिटी: छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाकों और राजस्थान के रेगिस्तान में पानी की सबसे ज्यादा किल्लत होती है। इसलिए इस वाहन को व्हीकल फैक्ट्री के ट्रेडमार्क "शक्तिमान" चेसिस पर बनाया जा रहा है। इसमें सेंट्रल टायर इंफ्लेशन सिस्टम होगा, जिससे रेत या कीचड़ में फंसे टायर का प्रेशर ड्राइवर केबिन से ही कम-ज्यादा किया जा सकेगा। ग्राउंड क्लीयरेंस 380 मिमी रखा गया है। सेल्फ-प्रोटेक्शन: जवानों की सुरक्षा के लिए केबिन को आर्मर्ड बनाया गया है। यह छोटे हथियारों की फायरिंग और आइईडी के छोटे धमाकों को झेल सकता है। केबिन में वाटर प्यूरिफिकेशन यूनिट भी लगाई गई है। नई खेप आत्मनिर्भर भारत की एक झलक: व्हीकल फैक्ट्री प्रोटोटाइप का ट्रायल सफल रहा है। 45 डिग्री से लेकर 55 डिग्री तापमान में इस वाहन ने बिना किसी ब्रेकडाउन के 2000 किमी का ट्रायल पूरा किया है। गौरतलब है कि व्हीकल फैक्ट्री पहले भी सेना के लिए पांच टन, 2.5 टन शक्तिमान, एलपीटीए 715 और बुलेट प्रूफ वाहन बनाकर देश को आत्मनिर्भर बना चुकी है। वाटर बाउजर की यह नई खेप 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' की दिशा में एक और बड़ा कदम है, जिससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

MP News: पानी की बर्बादी पर सख्ती, छिंदवाड़ा में निर्माण कार्य के लिए नहीं मिलेगा निगम का टैंकर

छिंदवाड़ा  नलों की टोटी खुली छोड़ी या पानी की बर्बादी की तो अब खैर नहीं होगी. नगर निगम भारी जुर्माना लगाने के साथ ही नल कनेक्शन भी काटेगा. नगर निगम के जनप्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया है, क्योंकि छिंदवाड़ा में पानी की किल्लत के चलते एक दिन के अंतराल में पानी की सप्लाई की जा रही है।  जिससे होती थी वाटर सफ्लाई सिर्फ 5 प्रतिशत भरा नगर निगम कमिश्नर सीपी राय ने बताया कि "चिंताजनक बात सामने आई है कि पिछले साल की तुलना में इस वर्ष कम बारिश होने के कारण शहर का मुख्य जल स्रोत कन्हारगांव डेम मात्र 5 प्रतिशत ही भर पाया है, वहीं माचागोरा डेम भी अपनी कुल क्षमता से आधा ही भर सका है. जल स्तर की इस गंभीर स्थिति को देखते हुए आगामी गर्मी में हर नागरिक तक पानी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए निगम प्रशासन एवं जनप्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से कई कड़े निर्णय लिए हैं।  कंस्ट्रक्शन के लिए निगम से नहीं मिलेगा टैंकर, पानी बर्बाद किया तो लगेगा फाइन शहर में पानी की एक-एक बूंद को सहेजने के लिए बैठक में निर्णय लिया गया कि अब कन्स्ट्रक्शन वर्क के लिए नगर निगम का पानी टैंकर किसी भी स्थिति में उपलब्ध नहीं कराया जाएगा. इसके साथ ही पीने के पानी की बर्बादी रोकने के लिए पूरे शहर में रोको-टोको अभियान की शुरुआत की जा रही है. अभियान के तहत पानी की बर्बादी करने वालों पर सख्त दंडात्मक कार्यवाही होगी।  पानी की बर्बादी पर लगेगा 1 हजार से 10 हजार रुपये तक का जुर्माना इसके अंतर्गत पहली बार पानी व्यर्थ बहाते पाए जाने पर 1,000 रुपये का जुर्माना और दूसरी बार उल्लंघन करने पर 2,000 रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा. इसके बावजूद यदि कोई नागरिक जल की बर्बादी बंद नहीं करता है, तो संबंधित उपभोक्ता का नल कनेक्शन तत्काल काट दिया जाएगा और फिर से कनेक्शन जोड़ने के लिए 10,000 रुपये का शुल्क जमा कराना अनिवार्य होगा।  टंकियों में लगेंगे अलार्म पानी, भरने पर करेगी अलर्ट जलापूर्ति व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने के लिए मेन सप्लाई लाइन से जुड़े सीधे कनेक्शनों को तुरंत हटाकर उन्हें डिस्ट्रीब्यूशन लाइन में शिफ्ट किया जाएगा, ताकि सभी क्षेत्रों में समान दबाव से पानी पहुंच सके. शहर की सभी ओवरहेड पानी टंकियों पर 'लेवल इंडिकेटर' लगाए जाएंगे, जिससे जलभराव और ओवरफ्लो की डिजिटल निगरानी की जा सकेगी. इसके साथ ही गंदे पानी की शिकायतों पर त्वरित नियंत्रण पाने, सार्वजनिक नलों से होने वाले जल बहाव को रोकने के लिए उन्हें बंद करने तथा भविष्य के लिए माचागोरा डेम से स्थायी रूप से अतिरिक्त पानी लाने की योजना तैयार करने पर भी विस्तार से सहमति बनी है।   

इंदौर जैसे जलसंकट की आहट! धार में ट्यूबवेल बंद, 11 जिलों में बढ़ी चिंता

इंदौर/ धार /उज्जैन  इंदौर जैसे जलसंकट की आहट मध्य प्रदेश के 11 जिलों में सुनाई देने लगी है। इन जिलों में सामान्य से 80% या उससे कम बारिश हुई है। नदियों में पानी कम है और डैम भी पूरी तरह नहीं भर सके हैं। ऐसे में गर्मी से पहले ही जलसंकट का खतरा बढ़ने लगा है। इंदौर की 40 लाख आबादी को पानी देने वाले जलस्रोत भी खाली होने लगे हैं। भीषण जलसंकट की आशंका को देखते हुए नगर निगम ने सरकार से 50 करोड़ रुपए का पैकेज मांगा है। धार में हालात ज्यादा चिंताजनक हैं। यहां अक्टूबर में ही ट्यूबवेलों से कम पानी आ रहा है। उज्जैन में सिर्फ 70 दिन का पानी बचा है। पानी की कमी से पेयजल व्यवस्था के साथ सिंहस्थ की तैयारियां भी प्रभावित हो सकती हैं। शहर में भूजल स्तर गिरकर 200 फीट तक पहुंच गया है। वहीं, प्रभावित जिलों को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग उठ रही है, लेकिन अब तक जलसंकट से निपटने के लिए कोई ठोस योजना तैयार नहीं हुई है। उज्जैन में नर्मदा से पानी लेने की कवायद उज्जैन में इस बार औसतन 682 मिमी यानी करीब 27 इंच बारिश हुई, जबकि यहां सामान्य बारिश 35 इंच है। कम बारिश के कारण शहर को पानी सप्लाई करने वाला गंभीर डैम पूरी तरह नहीं भर पाया। डैम की क्षमता 2,250 एमसीएफटी है, लेकिन इस बार इसमें पानी का स्तर केवल 636 एमसीएफटी तक पहुंचा। इसमें से 100 एमसीएफटी डेड स्टोरेज घटाने के बाद जलापूर्ति के लिए उपलब्ध पानी से सिर्फ 70 दिन, यानी 22 दिसंबर तक ही पानी सप्लाई किया जा सकेगा। उज्जैन निगम के अपर आयुक्त पवन कुमार सिंह ने बताया कि इससे पहले, इस साल जून में भी गंभीर डैम में पानी की कमी के चलते रोजाना जलप्रदाय के लिए नर्मदा की पाइपलाइन से पानी लिया गया था। इंदौर के 22 जोन में पानी की किल्लत इंदौर में गर्मी शुरू होने से पहले ही जलसंकट चुनौती बनने लगा है। नगर निगम की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक शहर में कुल 6,040 ट्यूबवेल हैं, जिनमें से 361 बंद हो चुके हैं। वहीं, शहर की जरूरत पूरी करने के लिए 200 नए ट्यूबवेल खोदने की आवश्यकता बताई गई है। इनमें से 100 के लिए टेंडर आमंत्रित किए गए हैं। शहर के 22 जोन में पानी की समस्या बनी हुई है। कई इलाकों में लोग अभी से टैंकर बुलवाकर पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। चिंता इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि इस बार शहर में सामान्य से करीब 14 इंच कम बारिश हुई है। ऐसे में नए ट्यूबवेल की खुदाई के साथ भूजल की उपलब्धता भी चुनौती रहेगी। नगर निगम को बंद ट्यूबवेल चालू करने, नए जलस्रोत विकसित करने और मौजूदा संसाधनों से जलप्रदाय बनाए रखने की व्यवस्था करनी होगी। 361 ट्यूबवेल बंद, 200 नए खोदने की जरूरत नगर निगम की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, शहर के 6,040 ट्यूबवेल में से 361 फिलहाल बंद हैं। इनमें ऐसे स्थान भी शामिल हैं, जहां नर्मदा जल का कनेक्शन नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय जलस्रोत बंद होने से पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। निगम ने बंद ट्यूबवेल की मरम्मत, पंप सुधारने और तकनीकी समस्याओं के निराकरण के लिए 10 समर्पित टीमें लगाने की योजना बनाई है। दूसरी ओर, शहर की जरूरतों को देखते हुए 200 नए ट्यूबवेल खोदने की आवश्यकता बताई गई है। फिलहाल 100 के लिए टेंडर आमंत्रित किए गए हैं। भूजल स्तर कम, खुदाई से पहले सर्वे जरूरी नए ट्यूबवेल खोदने की योजना के सामने भूजल की उपलब्धता बड़ी चुनौती है। कई इलाकों में भूजल स्तर नीचे होने के कारण बोरिंग से पर्याप्त पानी मिलना आसान नहीं है। ऐसे में खुदाई के लिए स्थान तय करते समय तकनीकी सर्वे और भूजल की स्थिति का आकलन जरूरी होगा। इसके साथ वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण और मौजूदा जलस्रोतों के बेहतर इस्तेमाल पर भी ध्यान देना होगा। 105 में से 95 टंकियों से रोजाना जलप्रदाय नगर निगम की रिपोर्ट के अनुसार, शहर में कुल 105 जलप्रदाय टंकियां हैं। इनमें से 95 से रोजाना पानी की सप्लाई की जा रही है। शेष 10 टंकियों से नियमित जलप्रदाय नहीं होने के कारणों का स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं आया है। इन टंकियों से जुड़े क्षेत्रों में जलापूर्ति की स्थिति और वैकल्पिक व्यवस्था भी अहम होगी। सामान्य से 14 इंच कम बारिश शहर में सामान्य तौर पर करीब 37 इंच बारिश होती है, जबकि इस बार लगभग 23 इंच बारिश दर्ज की गई। यानी सामान्य बारिश के मुकाबले करीब 14 इंच कम पानी बरसा। कम बारिश का असर आने वाले महीनों में भूजल की उपलब्धता पर पड़ सकता है। ऐसे में गर्मी के दौरान बढ़ने वाली पानी की मांग को पूरा करना नगर निगम के लिए चुनौती होगा। गेहूं का रकबा 75% तक घटेगा भारतीय किसान संघ से जुड़े किसानों ने बताया कि इस बार गेहूं का रकबा 75% तक घटेगा। जिसके चलते खाद्यान की कमी तो होगी ही, साथ में महंगाई भी बढ़ेगी। इधर, मालवा में होने वाला लहसुन प्याज का रकबा भी 70 प्रतिशत तक कम होगा। धार में 49.45% कम बारिश, खेती पर संकट धार में इस बार सिर्फ 25.84 इंच बारिश हुई है, जो सामान्य से करीब 10 इंच कम है। 2025 में यहां औसतन 51.13 इंच बारिश हुई थी। कम बारिश का असर अब खेतों से लेकर बाजार तक दिखने की आशंका है। किसान लगातार जिले को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग कर रहे हैं। पर्याप्त बारिश होने पर किसान गेहूं, लहसुन, प्याज और मटर समेत कई फसलें उगाते हैं, लेकिन इस बार पानी की कमी को देखते हुए कई किसान चना, तिवड़ा, तुकमरी (तुकमारिया), रायड़ा और कम पानी में होने वाली दूसरी फसलों की बुवाई कर रहे हैं। पानी की कमी के कारण कई बोरिंग अभी से बंद हो गए हैं, जबकि कुछ में रुक-रुककर पानी आ रहा है। इससे सिंचाई करने में परेशानी हो रही है और फसलों का उत्पादन घटने की आशंका है। धार शहर की करीब डेढ़ लाख आबादी की पेयजल जरूरतें पूरी करने वाले दिलावरा, नटनागरा, नयापुरा और सीतापाट तालाबों में अब करीब 25 से 30% पानी ही बचा है। वहीं, मुंज तालाब भी लगभग 40% भरा हुआ है। बोरिंग में पानी कम होने और तालाबों … Read more

इंदौर में 14 इंच कम बारिश से बढ़ी चिंता, भूजल स्तर आधा; जलसंकट से निपटने के लिए मांगे ₹50 करोड़

इंदौर  इंदौर में इस बार कमजोर मानसून ने अगले साल गर्मी में जल संकट की आशंका बढ़ा दी है। शहर में सामान्य तौर पर होने वाली करीब 37 इंच बारिश के मुकाबले इस मानसून में लगभग 23 इंच पानी ही बरसा। यानी करीब 14 इंच बारिश कम हुई। इसका असर जलस्रोतों के साथ भूजल रिचार्ज पर भी दिखाई दे रहा है। यशवंत सागर सहित शहर के प्रमुख तालाबों में भी पिछले वर्षों की तुलना में कम पानी जमा हुआ है। वहीं, 2026 में भूजल रिचार्ज का आंकड़ा पिछले चार वर्षों के मुकाबले काफी नीचे आ गया है। 2008 में भी बनी थी जलसंकट की स्थिति इंदौर में वर्ष 2008 में भी करीब 20 इंच बारिश हुई थी और उस समय भी जल संकट की स्थिति बनी थी। अब 18 साल बाद कम बारिश के कारण एक बार फिर गर्मी में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ रही है। शहर की बड़ी आबादी नर्मदा जलापूर्ति पर निर्भर है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक नर्मदा से मिलने वाले पानी की मात्रा बढ़ाने की गुंजाइश सीमित है। ऐसे में तालाबों में कम जलभराव, भूजल का लगातार दोहन और सप्लाई नेटवर्क में होने वाला नुकसान चुनौती बढ़ा सकते हैं। शहर की आबादी करीब 35 से 40 लाख मानी जाती है। घरेलू जरूरतों के लिए प्रतिदिन करीब 620 एमएलडी पानी की आवश्यकता का अनुमान है। औद्योगिक, व्यावसायिक, संस्थागत और अन्य उपयोग जोड़ने पर कुल मांग 750 से 800 एमएलडी तक बताई जाती है। नर्मदा से 440 एमएलडी पानी मिलने का आंकड़ा इसके मुकाबले नर्मदा से करीब 440 एमएलडी पानी मिलने का आंकड़ा दिया गया है। वितरण के दौरान लीकेज और अन्य कारणों से 20 से 22 प्रतिशत तक पानी का नुकसान होने की बात भी सामने आती है। ऐसे में उपलब्ध पानी का बेहतर प्रबंधन और वैकल्पिक स्रोतों को सुरक्षित रखना जरूरी है। पिछली गर्मियों में बोरवेल पर निर्भर आबादी के करीब 40 प्रतिशत हिस्से को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ा था। हालात संभालने के लिए करीब 700 टैंकरों से पानी पहुंचाना पड़ा। शहर में एक लाख से अधिक निजी बोरवेल और नगर निगम के करीब 6,500 बोरवेल व हाइड्रेंट बताए जाते हैं। लेकिन भूजल का लगातार दोहन भविष्य के लिए चिंता का विषय है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2025 की रिपोर्ट में शहर और ग्रामीण क्षेत्रों को क्रिटिकल जोन में रखे जाने का उल्लेख है। भूजल दोहन का स्तर करीब 90 प्रतिशत बताया गया है, जो बढ़ने पर स्थिति और गंभीर हो सकती है। इंदौर शहर में 27 तालाब शहर में तालाबों की भूमिका भी अहम है। इंदौर में 27 तालाब हैं, जिनमें से सात प्रमुख तालाबों की निगरानी नगर निगम करता है। इनकी संयुक्त क्षमता करीब 2,880 करोड़ लीटर बताई गई है, जबकि उपलब्ध पानी का एक अन्य आकलन करीब 2,260 करोड़ लीटर है। 2022 से 2025 तक भूजल रिचार्ज का आंकड़ा लगभग 40 से 42 हजार हेक्टेयर मीटर के बीच रहा। 2026 में यह घटकर 21,039 हेक्टेयर मीटर रह गया। तालाबों में नहीं हुआ जलभराव इस बार कम बारिश के कारण तालाबों में अपेक्षित जलभराव नहीं हुआ। कुछ तालाबों में जलस्तर क्षमता के मुकाबले काफी नीचे है, जबकि कुछ के आंकड़ों का दोबारा मिलान जरूरी है। शहर के कई वार्डों में अपनी ओवरहेड टंकियां नहीं हैं। ऐसे क्षेत्रों में दूसरे वार्डों की टंकियों से पानी पहुंचाया जाता है। कुछ जगहों पर एक ही टंकी से तीन वार्डों तक आपूर्ति होती है। इससे सप्लाई के समय और वितरण पर दबाव बढ़ता है। पिछले साल मालवा मिल स्थित हाइड्रेंट को भी पहली बार बंद करना पड़ा था। इस बार संकट से बचने के लिए जलस्रोतों की स्थिति, टैंकरों की जरूरत, पाइपलाइन लीकेज और भूजल रिचार्ज पर समय रहते काम करने की जरूरत है। सीएम से 50 करोड़ का का पैकेज मांगा इस बीच महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जल प्रबंधन के लिए 50 करोड़ रुपए के पैकेज की मांग की है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की 15 अक्टूबर को नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव, मंत्री तुलसी सिलावट और जलप्रदाय व नगर निगम के अधिकारियों के साथ बैठक प्रस्तावित है। इसमें नर्मदा-गंभीर लिंक के जरिए यशवंत सागर और बिलावली तालाबों तक पानी पहुंचाने की संभावना सहित जल संकट से निपटने के उपायों पर चर्चा हो सकती है। वार्डवार संकट का आकलन, टैंकरों की व्यवस्था, लीकेज सुधार, रिचार्ज पिट और वर्षा जल संचयन जैसे उपाय भी अहम होंगे। भूजल पर बढ़ती निर्भरता     शहर में एक लाख से अधिक निजी बोरवेल बताए जाते हैं।     नगर निगम के करीब 6,500 बोरवेल और हाइड्रेंट हैं।     पिछली गर्मियों में बोरवेल पर निर्भर आबादी के करीब 40 प्रतिशत हिस्से को गंभीर संकट का सामना करना पड़ा।     पानी की आपूर्ति के लिए करीब 700 टैंकर लगाने पड़े थे।     केंद्रीय भूजल बोर्ड की 2025 की रिपोर्ट में इंदौर शहर और ग्रामीण क्षेत्रों को क्रिटिकल जोन में रखने का उल्लेख है।     भूजल दोहन का स्तर करीब 90 प्रतिशत बताया गया है। पानी की गुणवत्ता भी चिंता 2019 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 70 स्थानों पर बोरवेल के पानी के नमूनों की जांच किए जाने का उल्लेख है। इनमें से 69 नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे थे। इस आंकड़े का उपयोग करते समय जांच के मानक, प्रदूषण के प्रकार और रिपोर्ट का संदर्भ स्पष्ट करना जरूरी है। भूजल की उपलब्धता के साथ उसकी गुणवत्ता की नियमित जांच भी जरूरी है।

छत्तीसगढ़ के दुर्गम गांवों में बदली तस्वीर, दंतेवाड़ा-सुकमा सीमा पर 228 घरों तक पहुंचा नल का पानी

सेवा संकल्प की कहानी घने जंगलों के बीच दंतेवाड़ा-सुकमा सीमा पर बसे 228 घरों तक पहुंचा नल से जल एडपाल और डोडपाल बने ‘हर घर जल ग्राम’, परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी हुई आसान रायपुर,  दंतेवाड़ा और सुकमा जिले की सीमा पर घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसे एडपाल और डोडपाल गांवों के 228 परिवारों को अब घर पर ही नल से पेयजल मिल रहा है। जल जीवन मिशन से इन दूरस्थ गांवों में वर्षों से चली आ रही पानी की समस्या दूर हुई है। पहले ग्रामीणों को पेयजल के लिए हैंडपंप पर निर्भर रहना पड़ता था। अब घर-घर नल कनेक्शन मिलने से विशेष रूप से महिलाओं की दिनचर्या आसान हुई है। सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत बुनियादी सुविधाओं के विस्तार और ग्रामीण जीवन में आए बदलाव की यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।  एडपाल के 137 और आश्रित ग्राम डोडपाल के 91 घरों में नल से  शुद्ध पेयजल उपलब्ध          दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 65 किलोमीटर दूर कटेकल्याण विकासखंड की ग्राम पंचायत एडपाल के 137 और उसके आश्रित ग्राम डोडपाल के 91 घरों में जल जीवन मिशन के तहत नल से पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है। दोनों गांवों को ‘हर घर जल ग्राम’ का दर्जा भी मिल चुका है। पानी लाने की मशक्कत से मिली मुक्ति        घर तक पानी पहुंचने का सबसे अधिक लाभ महिलाओं को मिला है। पहले गर्मी और बरसात के दिनों में भी उन्हें पानी के लिए घर से दूर जाना पड़ता था। इसमें सुबह का काफी समय बीत जाता था। अब पानी लाने की मशक्कत से राहत मिलने के साथ घरेलू कामकाज, बच्चों की देखभाल और आजीविका संबंधी गतिविधियों के लिए अधिक समय मिल रहा है। पानी की चिंता हुई दूर          एडपाल की वार्ड पंच बुदरी मंडावी और ग्रामीण महिला जोगी मरकाम बताती हैं कि घर में नल लगने से पानी की चिंता दूर हुई है। महिलाएं अब सब्जी बाड़ी, वनोपज संग्रहण और खेती-किसानी के कामों में अधिक समय दे पा रही हैं। बच्चों को भी पानी लाने में समय लगाने के बजाय पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय मिल रहा है। पानी की शुद्धता भी जांच रही गांव की महिलाएं        इन गांवों में पेयजल की गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी भी महिलाओं ने संभाली है। इसके लिए गठित ‘जल वाहिनी’ समूह की प्रशिक्षित महिलाएं फील्ड टेस्ट किट से पानी की नियमित जांच कर रही हैं। इससे ग्रामीणों में स्वच्छ पेयजल के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ जलजनित बीमारियों से बचाव के प्रयासों को भी बल मिल रहा है। पूरे परिवार की रोजमर्रा जिंदगी हुई आसान         डोडपाल में आयोजित ‘ग्राम जल उत्सव’ में ग्रामीणों ने घर-घर पेयजल सुविधा मिलने पर खुशी जताई। जल जीवन मिशन से दूरस्थ वनांचल के गांवों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचने से महिलाओं और बच्चों सहित पूरे परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी आसान हो रही है।

Indore Water Crisis: 37% कम बारिश से गिरा भूजल स्तर, नर्मदा पर निर्भरता घटाने के लिए नया जल नेटवर्क तैयार

इंदौर   इंदौर शहर में इस बार औसत से करीब 37 प्रतिशत कम बारिश होने से न सिर्फ भूजल स्तर में गिरावट आई है, बल्कि कई जलस्रोतों में बहुत कम पानी स्टोर हुआ है। अब वैकल्पिक जलस्रोत विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि नर्मदा जल पर निर्भरता कम हो और भूजल के दोहन में भी कमी आए। जिला प्रशासन ने चोरल, तिंछा, और शीतला माता फॉल को जलस्रोत के तौर पर विकसित करने की योजना बनाई है। अभी प्रोजेक्ट का परीक्षण कराया जा रहा है। इंदौर को मिलने लगेगा पानी प्रोजेक्ट से जुड़े एक्सपर्ट का दावा है कि तिछा फाल में 120 से 150 मिलियन घन मीटर पानी स्टोरेज की क्षमता विकसित हो सकती है। महू के आसपास अन्य जलस्रोत तैयार करने की भी प्लानिंग है। ऐसा हुआ तो नर्मदा का महू में जाने वाला 50 एमएलडी पानी इंदौर को मिलने लगेगा। इस प्रोजेक्ट के साथ आसपास के कई तालाबों और जलस्रोतों को विकसित कर वहां आने वाला पानी असरावद या लिम्बोदी लाने की योजना है। यदि सब कुछ ठीक रहा तो प्रोजेक्ट की रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी और उसके आधार पर निर्णय होगा। भूजल स्तर में होगा सुधार मालूम हो, नर्मदा का पानी शहर में पीने के अलावा रास्ते में सिंचाई के लिए भी दिया जाता है। फसल के बाद भी इस पानी की सप्लाई जारी रहती है। कई जगह मोटर लगाकर पानी खींचा जाता है। यह पानी असरावद या लिम्बोदी के आसपास के तालाबों से लिफ्ट कर लाया जा सकता है। ओवरफ्लो होने वाला पानी कनाड़ नदी में 12 महीने बहता है और यह तिछा में आता है। इस पानी को स्टॉप डैम बनाकर रोका जा सकता है। यह पानी शहर के लिम्बोदी तालाब तक लाया जाए तो बायपास से लगी कई कॉलोनियों के भूजल स्तर में सुधार होगा। जल संचयन और संरक्षण जरूरी शहर के आसपास 40 से 50 किमी में कई वैकल्पिक स्रोत हैं, जिन पर काम करने से जल संचयन और संरक्षण होने से पानी की क्षमता बढ़ सकती है। कुछ वर्ष पहले तत्कालीन महापौर कृष्णमुरारी मोघे ने चोरल नदी में बारिश के दौरान आने वाले पानी को शहर में लाने की योजना बनाई थी। एक दशक में जलस्रोत बढ़ाने पर पर्याप्त काम नहीं हुआ। अब जरूरत है कि नर्मदा और यशवंत सागर के अलावा पानी के अन्य स्रोतों की भी नगर निगम तलाश करे। अलग-अलग स्रोतों से आने वाले पानी को स्टॉप डैम बनाकर रोकें और उसे शहर में नए तालाबों में लाया जाए। इससे एक्वेफर के जरिए वाटर रिचार्जिंग भी हो सकेगी। यह किया जा सकता है काम -तिंछा फाल में कानड़ नदी (दतोदा कैचमेंट) से बारिश के समय खूब पानी आता है, लेकिन यह बह जाता है। इस पानी को बांध बनाकर रोकना होगा। और आगे बड़े तालाब विकसित करने होंगे, ताकि वर्ष भर उपयोग किया जा सके। यह जलूद से पहले है, इसलिए इस पानी को इंदौर तक लाने की लागत भी कम रहेगी। -महू में ग्राम भाटखेड़ी के पास बड़े तालाब में जानापाव कैचमेंट एरिया से खूब पानी आता है। तालाब में कई महीनों तक पानी स्टोर रहता है। इस पानी के उपयोग की योजना बनाई जा सकती है। -तिंछाफाल में बड़ा जलाशय बनाया जाए तो उसका संभावित स्टोरेज 120 से 150 मिलियन क्यूबिक मीटर हो सकता है। इंदौर की पानी की मांग 700 से 900 एमएलडी है। तिंछाफाल से शहर की 35 से 50% पेयजल जरूरत पूरी हो सकती है। नर्मदा नदी के अलावा अन्य जलस्रोत विकसित करने की योजना पर काम किए जा रहे हैं। वैकल्पिक जलात में नया जलस्रोत बनाना नहीं है, बल्कि नेटवर्क स्थापित करना है। इसके लिए सभी बिंदुओं पर परीक्षण किया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी। प्रारंभिक स्थिति के आंकलन से स्पष्ट हुआ है कि शहर में पानी का समानांतर नया नेटवर्क स्थापित किया जा सकता है। इस नेटवर्क से पानी तो मिलेगा, भूजल स्तर में भी वृद्धि होगी। – सुरेश एमजी, जल प्रबंधन विशेषज्ञ समझें पानी का सिस्टम -कनाड़ नदी में पाताल पानी से पानी आता है। यह और आसपास से आया पानी तिंछा में जाता है। तिंछा के आगे इंटेक संरचना विकसित कर पम्पिंग स्टेशन से पानी असरावद -पाइप लाइन से यह पानी लिम्बोदी तालाब तक लाया जा सकता है। इस पूरे नेटवर्क में लगभग 15 किमी का पाइप लाइन का क्षेत्रफल विकसित करना होगा। ये हैं परियोजना के मुख्य बिंद प्रस्तावित क्षमता : 50 MLD (5 करोड़ लीटर प्रति दिन) कुल लंबाई:- 14-15 km टिया कनाड़ असत: 9.8 km असरावद लिम्बोदी: 4.4 km) संभावित पाइप व्यास: 800-900 mm पंपिंग हेड : स्थल सर्वे के बाद निधीरित (अनुमानित 20-80 मीटर) मध्यवर्ती जलाशय : 1-2 MCM