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El Niño Impact: 2032 तक भारत को ₹94 लाख करोड़ का आर्थिक झटका, रिपोर्ट में बड़ा दावा

नई दिल्ली अल-नीनो को लेकर वैज्ञानिकों ने गंभीर चेतावनी दी है. अनुमान है कि नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के बीच इसका असर सबसे ज्यादा रहेगा. एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारत को 2032 तक करीब 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 94,55,960 करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान हो सकता है।  वहीं, पूरी दुनिया को 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा की आर्थिक नुकसान  का अनुमान है. यह नुकसान केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खेती, रोजगार, एनर्जी और अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकता है. अल-नीनो एक ऐसी मौसमी घटना है, जो भारत में मानसून को कमजोर कर सकती है और गर्मी बढ़ा सकती है. आने वाले अल-नीनो के दौरान भी ऐसे ही हालात बनने की आशंका जताई गई है।  भारत पर क्या असर पड़ सकता है? एक इंग्लिश अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार अल-नीनो की वजह से भारत में भीषण गर्मी बढ़ सकती है और मानसून कमजोर हो सकता है. इसका सीधा असर खेती पर पड़ेगा. बारिश कम होने से फसलों का उत्पादन घट सकता है, सिंचाई की जरूरत बढ़ेगी और बिजली की मांग भी बढ़ सकती है. इससे खाद्य कीमतों और महंगाई पर भी असर पड़ने की आशंका है।  2032 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान क्यों? रिसर्चर्स का कहना है कि अल-नीनो का असर केवल उसी साल तक सीमित नहीं रहता. इससे आर्थिक विकास की रफ्तार कई वर्षों तक धीमी रह सकती है. अनुमान है कि 2032 तक भारत की अर्थव्यवस्था को 1 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो सकता है. वहीं, वैश्विक स्तर पर यह नुकसान 10 ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक हो सकता है. वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि कुछ आर्थिक असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं।  कृषि मंत्रालय ने शुरू की तैयारियां उधर कमजोर मॉनसून के असर से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय ने बड़े स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रविवार को कहा, "हमने उन 111 जिलों की पहचान कर ली है जहां अल नीनो का ज्यादा असर पड़ने की आशंका है. लेकिन असर 300 जिलों से ज्यादा पर पड़ने की आशंका है. हमने राज्यों को पूरी जानकारी दे दी है कि उनके यहां कौन-कौन से जिले या इलाके संवेदनशील हैं. इन सभी प्रभावित होने वाले जिलों में उन्हें खेती या रोजगार में जहां भी कमी आएगी 'जी राम जी' कानून के तहत सभी प्रभावित लोगों को रोजगार देने के लिए तैयार रहना होगा।  कृषि मंत्रालय और इंडियन कॉउन्सिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) ने मिलकर वैज्ञानिक डेटा के आधार पर 315 जिलों का आकलन किया, जहां कम वर्षा और सिंचाई की कमी का खतरा ज्यादा है क्योंकि इन 315 जिलों में मॉनसून कमजोर रहने की संभावना का अनुमान है।  केंद्रीय कृषि मंत्री ने प्रभावित होने वाले राज्यों को निर्देश दिया है कि जो पुरानी वॉटर बॉडीज है उनको समय पर ठीक कर लिया जाए. साथ ही, जितनी नई वॉटर बॉडीज बन सकती हैं बनायीं जाएं, और छोटी-छोटी वाटर बॉडीज जैसी संरचनाएं तैयार की जाएं. जल के संरक्षण से जुड़े कार्यों को 01 जुलाई से लांच होने वाले नए 'जी राम जी' कानून के तहत सर्वोच्च वरीयता दी जाए जिससे अगर बारिश कम हो तो बारिश के पानी को अच्छे से संग्रहित किया जा सके और इसका उपयोग खेती और पीने के पानी के लिए सही तरीके से हो सके।  दिल्ली में कब दस्तक देगा? यानी अगले 5 दिनों तक मॉनसून के दिल्ली या आसपास के इलाकों में पहुंचने का पूर्वानुमान नहीं है. मॉनसून के दिल्ली पहुंचने की सामान्य तारीख 27 जून है, लेकिन मॉनसून के दिल्ली पहुंचने में इस साल करीब एक हफ्ते की देरी होने की संभावना है. मौसम विभाग के एक सीनियर वैज्ञानिक के मुताबिक, एक नया सर्कुलेशन पैटर्न डेवेलोप हो रहा है जिसकी वजह से 5 दिन के बाद दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की रफ़्तार फिर तेज़ होने की संभावना है।  जाहिर है, अगर मॉनसून ने 04 जुलाई से रफ्तार पकड़ी तो दिल्ली समेत उत्तर-पश्चिम भारत के इलाकों में मॉनसून पहुंच सकता है।  क्या करना होगा?  एकस्पर्ट्स का कहना है कि सरकारों को अभी से तैयारी शुरू करनी चाहिए. इसके लिए बेहतर वेदर फोरकास्ट, समय पर चेतावनी देने वाले सिस्टम, गर्मी सहने वाली फसलों का विकास, सिंचाई व्यवस्था को मजबूत करना और रिन्यूएबल एनर्जी में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा. इससे अल-नीनो और क्लाइमेट चेंज दोनों के असर को कम करने में मदद मिल सकती है।  एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाला अल-नीनो केवल मौसम की घटना नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था, खेती और लोगों के जीवन पर बड़ा असर डाल सकता है. ऐसे में समय रहते तैयारी और क्लाइमेट के हिसाब से प्लानिंग बनाना फ्यूचर के नुकसान को कम करने के लिए जरूरी होगा। 

मौसम वैज्ञानिकों की चेतावनी, अल-नीनो का खतरा बरकरार; आने वाले 5 महीने रहेंगे चुनौतीपूर्ण

नई दिल्ली भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 जून की शुरुआत में केरल पहुंचा, लेकिन सामान्य से थोड़ा देरी से. शुरुआती बारिश कई जगहों पर कमजोर रही है. मौसम वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अभी तो अल-नीनो का पूरा असर नहीं दिखा है, लेकिन आने वाले जुलाई से नवंबर तक के महीने देश के लिए काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं।  भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने इस साल पूरे मॉनसून सीजन के लिए औसत से कम बारिश का अनुमान लगाया है – लगभग 90-92 प्रतिशत लॉन्ग पीरियड एवरेज (LPA). इसका मतलब है कि देश के कई हिस्सों में सूखा जैसी स्थिति बन सकती है, खासकर जून के बाद।  अल-नीनो क्या है और यह भारत को कैसे प्रभावित करता है? अल-नीनो एक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत ठंडा रहता है. ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं. लेकिन अल-नीनो में ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उल्टी दिशा में चलने लगती हैं. इससे भारत की ओर आने वाली नमी वाली हवाएं प्रभावित होती हैं।  दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर पड़ जाता है. भारत में मॉनसून देश की कुल वार्षिक बारिश का करीब 70 प्रतिशत लाता है. अगर यह कम हुआ तो कृषि, जल संसाधन, बिजली उत्पादन और समग्र अर्थव्यवस्था पर असर पड़ता है. 2026 में वैज्ञानिकों का कहना है कि अल-नीनो जून में कमजोर रहेगा, लेकिन जुलाई-अगस्त में मध्यम और सितंबर तक मजबूत हो सकता है. NOAA और IMD जैसे संगठनों के अनुसार, जुलाई-अगस्त में अल-नीनो विकसित होने की संभावना 80-90 प्रतिशत से ज्यादा है।  पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड बताते हैं कि ज्यादातर अल-नीनो वर्षों में भारत को औसत से कम बारिश मिली है. 2009 में कमजोर अल-नीनो के बावजूद बारिश मात्र 78 प्रतिशत रह गई थी, जो 37 साल का सबसे कम स्तर था. 2015-16 के मजबूत अल-नीनो में भी सूखे की स्थिति बनी।  हालांकि कुछ सालों में सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव (Positive IOD) ने अल-नीनो के निगेटिव असर को कुछ हद तक कम किया, लेकिन 2026 में IOD अभी न्यूट्रल है. बाद में पॉजिटिव होने की उम्मीद है, जो थोड़ी राहत दे सकता है लेकिन पूरी सुरक्षा नहीं।  मॉनसून की शुरुआत कमजोर जून 2026 के पहले दो हफ्तों में कई राज्यों में बारिश सामान्य से काफी कम रही. महाराष्ट्र जैसे राज्यों में 70-80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. मध्य भारत और कुछ उत्तरी हिस्सों में भी कमी है. IMD के अनुसार, जून महीने में भी नीचे औसत बारिश रहने की संभावना है. मॉनसून की देरी और कमजोर शुरुआत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है।  अभी अल-नीनो का पूरा कहर नहीं दिखा क्योंकि यह अभी विकसित हो रहा है. असली असर जुलाई से सितंबर के बीच दिखेगा, जब मॉनसून अपने चरम पर होता है. अगर अल-नीनो मजबूत हुआ तो अगस्त-सितंबर में बारिश और भी कम हो सकती है. इससे जलाशयों में पानी की कमी, नदियों का सूखना और भूजल स्तर गिरना जैसी समस्याएं बढ़ेंगी।  कृषि और किसानों पर संभावित प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी काफी हद तक कृषि पर निर्भर है. करीब 50-60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़ी हुई है. खरीफ सीजन (जून-सितंबर) में धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें आदि फसलें बोई जाती हैं. कम बारिश से इन फसलों की पैदावार घट सकती है।  पिछले अल-नीनो वर्षों में सूखे से किसानों की आय घटी, कर्ज बढ़ा और आत्महत्या की घटनाएं भी बढ़ीं. 2026 में अगर बारिश 90 प्रतिशत या उससे कम रही तो खाद्यान्न उत्पादन में 10-15 प्रतिशत की कमी आ सकती है. इससे खाद्य सुरक्षा चुनौती बनेगी. सरकार को आयात बढ़ाना पड़ सकता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ेगा।  मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं. इन इलाकों में वर्षा आधारित खेती ज्यादा है. छोटे किसान जिनके पास सिंचाई की सुविधा नहीं है, वे सबसे ज्यादा परेशान होंगे. पशुपालन भी प्रभावित होगा क्योंकि चारे की कमी हो सकती है।  जल संकट और अन्य क्षेत्रों पर असर कम बारिश का मतलब जल संकट गहराना है. कई शहरों और गांवों में पहले से पानी की समस्या है. मॉनसून कमजोर रहा तो पीने के पानी, सिंचाई और उद्योगों के लिए पानी की कमी बढ़ेगी. बिजली उत्पादन भी प्रभावित होगा क्योंकि हाइड्रो पावर प्लांट पानी पर निर्भर हैं।  गर्मी पहले से ही रिकॉर्ड तोड़ रही है. अल-नीनो से तापमान और बढ़ सकता है. लू की लहरें लंबी और तीव्र हो सकती हैं, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ेंगी. बुजुर्गों, बच्चों और मजदूरों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा।  महंगाई और विकास दर कृषि उत्पादन घटने से सब्जी, अनाज और दालों की कीमतें बढ़ सकती हैं. खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ने से RBI की मौद्रिक नीति प्रभावित होगी. विकास दर पर भी दबाव पड़ेगा. अगर GDP ग्रोथ 7 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे गई तो नौकरियां कम होंगी. ग्रामीण अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हो सकती है।  सरकार पहले से तैयारी कर रही है. कॉन्टीजेंसी प्लांस बनाए जा रहे हैं. 200 से ज्यादा जिलों में सूखा राहत कार्यों की योजना है. फसल बीमा योजना (PMFBY) को मजबूत किया जा रहा है. लेकिन चुनौती बड़ी है।  ऐतिहासिक उदाहरण और सीख 1950 के बाद कई अल-नीनो वर्ष आए हैं. 1997-98 का सुपर अल-नीनो सबसे मजबूत था, लेकिन कुछ मामलों में भारत को अप्रत्याशित रूप से अच्छी बारिश मिली. 2015 में भारी सूखा पड़ा. इन अनुभवों से पता चलता है कि अल-नीनो तय करता है लेकिन IOD, हिमालयी बर्फ, स्थानीय मौसम व्यवस्था आदि भी भूमिका निभाते हैं।  2026 में सुपर अल-नीनो की आशंका है, जो अक्टूबर-फरवरी तक मजबूत रह सकता है. इसका असर 2026 के मॉनसून के अलावा 2027 की शुरुआत तक भी रह सकता है।  सभी उम्मीदें निराशाजनक नहीं हैं. अगर पॉजिटिव IOD विकसित हुआ तो यह अल-नीनो का कुछ असर कम कर सकता है. बेहतर मौसम पूर्वानुमान, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और किसानों को समय पर सलाह देने से नुकसान कम किया जा सकता है. वैज्ञानिक कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसे उतार-चढ़ाव बढ़ रहे हैं. लंबे समय में हमें जल संरक्षण, सूखा प्रतिरोधी फसलें और माइक्रो इरिगेशन पर … Read more

Super El Niño:भट्टी बनेगा भारत, भीषण गर्मी से मच सकता है हाहाकार

नई दिल्ली एक बात ये कि इस साल गर्मी ज्यादा पड़ेगी क्योंकि ‘एल नीन्यो’ असर डालेगा. ये शायद आपने सुना हो, लेकिन अब तो कह रहे हैं कि इस साल का ‘एल नीन्यो’, ‘सुपर एल नीन्यो’ होने वाला है यानी गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं. तो ये सुपर एल नीन्यो क्या बला है? ज्यादातर पब्लिक तो ये भी नहीं समझती कि एल नीन्यो क्या होता है? पहले तो वही समझ लेना चाहिए, उसके बाद समझेंगे कि सुपर एल नीन्यो क्या होता है. तो एल नीन्यो स्पेनिश भाषा में छोटे बच्चे को कहते हैं. छोटे लड़के को या बालक. जी हां, ये बालक कुछ सालों में लौट कर आता रहता है और भारत में गर्मी बढ़ा जाता है. तो स्पैनिश में नाम क्यों है? स्पेन का हमारी गर्मी से क्या लेना-देना? तो वैसे तो स्पेन का एल नीन्यो से भी कोई लेना-देना नहीं है।  ये नाम एल नीन्यो इसलिए स्पेन की भाषा में है क्योंकि दक्षिण अमेरिका के ज्यादातर देशों पर स्पेन का राज हुआ करता था. जैसे भारत में अंग्रेजों का राज हुआ करता था, तो यहां अंग्रेजी भाषा उनके साथ आई, लेकिन भारत में पहले से लोग रहते थे और हमारी अपनी भाषाएं भी थीं. लेकिन दक्षिण अमेरिका के बड़े से महाद्वीप पर बहुत ज्यादा आबादी नहीं थी. सारा जंगल था. कुछ मूल निवासी वहां के रहा करते थे. तो स्पेन और पुर्तगाल जैसे यूरोप के देशों के लोग वहां गए और बस गए और राज किया तो उनकी भाषाएं दक्षिण अमेरिका की भी भाषाएं हो गईं।  अभी से दिखने लगा है एल नीन्यो का असर. नामकरण जान लेते हैं जैसे ब्राजील में पुर्तगाल की भाषा बोली जाती है. लेकिन बाकी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के ज़्यादातर देशों में स्पेन की भाषा स्पैनिश बोली जाती है और स्पैनिश में छोटे लड़के को कहते हैं एल नीन्यो. ये नाम दिया गया है मौसम के एक बदलाव को. जो हर कुछ साल में वहां दक्षिण अमेरिका के पूर्व के हिस्से में होता है. अब समझने वाली बात ये है कि ये छोटा बालक अगर दक्षिण अमेरिका के पानी में उथल-पुथल मचाता है, तो भारत में गर्मी क्यों बढ़ जाती है? नक्शे से समझिए एल नीन्यो की ज्योग्राफी तो जरा नक्शा देख लेते हैं. एक तो नक्शा हमें ऐसे देखने की आदत है, जिसमें उत्तर और दक्षिण अमेरिका बाईं तरफ होते हैं यानी पश्चिम में और ऑस्ट्रेलिया और जापान दाईं तरफ होते हैं यानी पूर्व में. स्कूल से ऐसे ही देखते आ रहे हैं और इस नक्शे में दक्षिण अमेरिका भारत के पश्चिम में होता है. लेकिन, दुनिया तो गोल है. तो नक्शे को अगर ऐसे खींचे पूर्व की तरफ से तो ऑस्ट्रेलिया के और आगे जाने पर क्या आएगा? दक्षिण अमेरिका ही आ जाएगा. और दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच में है साउथ पैसिफिक ओशियन या दक्षिण प्रशांत महासागर. यानी दाहिनी तरफ पूर्व में दक्षिण अमेरिका का किनारा है – पेरू और एक्वाडोर जैसे देश. बाईं तरफ यानी पश्चिम में एशिया और ऑस्ट्रेलिया है. अब भारत इस नक्शे पर बाईं तरफ है यानी पश्चिम में, प्रशांत से काफी दूर, हिंद महासागर के पास।  एल नीन्यो क्यों बनता है? सामान्य दिनों में क्या होता है कि प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से यानी दक्षिण अमेरिका के पास का पानी ठंडा रहता है. वहां ठंडा पानी ऊपर आता रहता है. जबकि पश्चिमी हिस्से यानी इंडोनेशिया और फिलीपींस के पास का पानी बहुत गर्म रहता है. हवाएं चलती है पूर्व से पश्चिम की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया की चरफ. इन हवाओं को कहते हैं ट्रेड विंड्स. ये हवाएं गर्म पानी को पश्चिम की तरफ धकेलती रहती हैं. यानी दक्षिण अमेरिका से एशिया वाली साइड पर गर्म पानी धकेलती रहती हैं. इस वजह से पूर्व में ठंडा पानी ऊपर आता रहता है, यानी प्रशांत महासागर में दक्षिण अमेरिका की तरफ ठंडा पानी ऊपर आता रहता है और गर्म पानी एशिया की तरफ जाता रहता है. लेकिन हर 2 से 7 साल में कभी-कभी ट्रेड विंड्स यानी ये वाली हलाएं कमजोर पड़ जाती हैं. इसको कहते हैं एल नीन्यो।  …फिर भारत में नहीं होती है बारिश जैसे किसी ने हवा का स्विच ऑफ कर दिया हो. तो वो गर्म पानी जो पश्चिम में जमा था, एशिया की तरफ जमा था वो अब पूर्व की तरफ यानी दक्षिण अमेरिका की ओर बहने लगता है. यानी पूरे प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. 0.5 डिग्री या उससे भी ज्यादा गर्म हो जाता है. इससे क्या होता है कि समुद्र के ऊपर की हवा गर्म हो जाती है. गर्म हवा ऊपर उठती है, बादल बनते हैं, बारिश होती है. लेकिन ये सब वहीं दक्षिण अमेरिका के पास हो जाता है, क्योंकि हवाएं इस तरफ़ चल ही नहीं रही होतीं तो बादल एशिया की तरफ आते ही नहीं वो वहीं पर बरस जाते हैं. दक्षिण अमेरिका में बारिश ही बारिश हो जाती है।  कैसे प्रभावित होता है भारत का मौसम? अब भारत पर आइए. हमारा मॉनसून पश्चिम की तरफ से आता है. मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं से आता है. मतलब अरब सागर और हिंद महासागर के ऊपर से हवाएं आती हैं समुद्र के पाली की नमी लेकर. और जून से सितंबर तक भारी बारिश लाती हैं. एल नीन्यो होने प्रशांत महासागर में गर्म पानी की वजह से ये हवा का पूरा पैटर्न बदल जाता है. वो हवाएं जो भारत की तरफ नम हवा लाती हैं, वे कमजोर पड़ जाती हैं या रास्ता बदल लेती हैं. तो भारत के ऊपर भी बादल कम बनते हैं. आसमान ज़्यादातर साफ रहता है. अप्रैल, मई, जून के महीनों में सूरज की किरणें सीधे जमीन पर पड़ती हैं. कोई बादल छांव नहीं देता. जमीन तेजी से गर्म होती है. खासकर उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान, दिल्ली, यूपी, मध्य प्रदेश आदि इलाकों में।  2 साल पहले भी हुई थी घटना 2023 में भी जब एल नीन्यो मजबूत था, तो भारत के कई शहरों में तापमान 45-48 डिग्री तक पहुंच गया था. मानसून कमजोर रहा, बारिश कम हुई, और गर्मी लंबी खिंच गई थी. यानी दूर प्रशांत महासागर में पानी गर्म होने से हवा की एक लंबी चेन चलती है जो हजारों किलोमीटर दूर भारत तक असर … Read more

सुपर अल नीनो’ के कारण 140 साल का गर्मी का रिकॉर्ड टूटेगा! क्या होगा इस बार अलग?

नई दिल्ली गर्मियों का मौसम आते ही हम सभी चिलचिलाती धूप और पसीने से परेशान होने लगते हैं। लेकिन, इस बार की गर्मी कोई आम गर्मी नहीं होने वाली है। मौसम वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इस बार 'सुपर अल नीनो' के कारण गर्मी अपने पिछले 140 सालों के सभी रिकॉर्ड तोड़ सकती है। वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है और दुनिया के कई हिस्सों में चरम मौसम की घटनाएं देखने को मिल सकती हैं। आखिर यह 'सुपर अल नीनो' कैसे असर करता है? यह इतना खतरनाक क्यों माना जा रहा है? और भारत सहित पूरी दुनिया पर इसका क्या असर पड़ने वाला है? आइए समझते हैं। अल नीनो (El Niño) क्या है?     स्पेनिश भाषा में 'अल नीनो' का मतलब 'छोटा लड़का' होता है, लेकिन मौसम विज्ञान में इसका असर बहुत विशाल है।     यह प्रशांत महासागर से जुड़ी एक मौसमी घटना है।     सामान्य परिस्थितियों में, समुद्र की सतह का गर्म पानी एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ बहता है।     लेकिन, अल नीनो के दौरान यह चक्र उलटा या कमजोर पड़ जाता है। भूमध्य रेखा के पास प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से बहुत ज्यादा गर्म हो जाता है और यह गर्म पानी दक्षिण अमेरिका की तरफ बहने लगता है।     समुद्र के इस बढ़ते तापमान का असर पूरी दुनिया के मौसम चक्र (हवाओं, बारिश और तापमान) पर पड़ता है। फिर यह 'सुपर अल नीनो' क्या है? जब प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से थोड़ा बढ़ता है, तो उसे 'अल नीनो' कहते हैं। लेकिन जब यह तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ज्यादा बढ़ जाता है, तो यह घटना बेहद उग्र हो जाती है। इसे ही वैज्ञानिकों ने 'सुपर अल नीनो' का नाम दिया है। मुख्य कारण: जब ग्लोबल वार्मिंग (ग्रीनहाउस गैसों के कारण लगातार बढ़ती पृथ्वी की गर्मी) और अल नीनो दोनों आपस में मिल जाते हैं, तो यह एक 'डबल अटैक' बन जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक 140 साल से भी ज्यादा समय के बाद ऐसी भयंकर गर्मी की भविष्यवाणी कर रहे हैं। यह स्थिति बेहद दुर्लभ होती है- 1950 के बाद केवल कुछ बार ही ऐसा हुआ है। जैसे 1982-83, 1997-98 और 2015-16 में भी कुछ असर देखने को मिला था। इस बार वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नीनो 3.4 क्षेत्र में तापमान वृद्धि 2°C से ज्यादा पहुंच सकती है। न्यूयॉर्क के एट अल्बानी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पॉल राउंडी का कहना है कि 'पिछले 140 साल में सबसे मजबूत एल नीनो बनने की वास्तविक संभावना है।' 140 साल पुराना खतरा? तापमान जितना ज्यादा बढ़ता है, अल नीनो के असर के और भी ज्यादा तेज होने की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। अल्बानी में स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क में वायुमंडलीय और पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. पॉल राउंडी ने लिखा कि '140 सालों में सबसे मजबूत अल नीनो घटना होने की वास्तविक संभावना है।' मियामी विश्वविद्यालय के एसोसिएट वैज्ञानिक डॉ. एंडी हेजल्टन ने लिखा कि सभी मॉडल और अवलोकन एक ही दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं: इस साल एक बहुत मजबूत अल नीनो आएगा, जिसका वैश्विक जलवायु पर काफी असर पड़ेगा। इस बार ऐसा क्या होने वाला है? सुपर अल नीनो का असर सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं है; यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है। इसके मुख्य प्रभाव इस प्रकार होंगे- रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और भीषण लू ग्लोबल वार्मिंग पहले से ही धरती को गर्म कर रही है। 'सुपर अल नीनो' इस आग में घी का काम करेगा। भारत के कई हिस्सों, खासकर उत्तर और मध्य भारत में, दिन का तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर जा सकता है। भीषण लू (हीटवेव) का दौर लंबा और ज्यादा जानलेवा हो सकता है। मॉनसून पर ब्रेक- सूखे का खतरा भारत की पूरी कृषि व्यवस्था मॉनसून पर निर्भर है। अल नीनो का भारतीय मानसून से सीधा और उल्टा रिश्ता है।     जब भी अल नीनो मजबूत होता है, भारत में मॉनसून कमजोर पड़ जाता है।     इस साल बारिश कम होने और कई राज्यों में सूखे जैसे हालात पैदा होने की गहरी आशंका है। खेती और महंगाई पर सीधा असर बारिश कम होने और भयंकर गर्मी पड़ने से:     धान और गन्ने जैसी फसलों की पैदावार गिर सकती है।     खाद्य पदार्थों की कमी के कारण महंगाई आसमान छू सकती है।     पीने के पानी का संकट गहरा सकता है क्योंकि नदियां और डैम सूखने लगेंगे। दुनिया भर में चरम मौसम अल नीनो सिर्फ भारत को नहीं रुलाएगा। इसके कारण:     दक्षिण अमेरिका में भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।     ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में भयंकर सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ने की आशंका है। क्यों इस बार ‘सुपर’ एल नीनो की बात हो रही है? अप्रैल 2026 तक स्थिति ENSO-neutral यानी न तो एल नीनो, न ला नीना वाली है, लेकिन प्रशांत महासागर के नीचे के पानी में गर्मी तेजी से बढ़ रही है। यूरोपीय मॉडल NOAA, ECMWF और अन्य संस्थानों के पूर्वानुमान बताते हैं कि मई-जुलाई 2026 से एल नीनो उभर सकता है और सर्दियों (2026-27) तक मजबूत रहेगा। कुछ मॉडल बहुत मजबूत या सुपर स्तर का संकेत दे रहे हैं। 2024 पहले ही रिकॉर्ड गर्म साल था। मजबूत एल नीनो के साथ 2026 या 2027 नए रिकॉर्ड बना सकते हैं। कुछ अनुमान कहते हैं कि तापमान अस्थायी रूप से 1.5°C या उससे भी ज्यादा (कुछ मामलों में 2°C तक) पूर्व-औद्योगिक स्तर से ऊपर जा सकता है।

गर्मी ने बढ़ाया ‘मेगा अल नीनो’ का डर, 149 साल पहले 4% आबादी का सफाया हुआ था

 नई दिल्ली 1877 के बाद अब तक का सबसे ताकतवर अल-नीनो बन रहा है. उस वक्त इसने पूरी दुनिया में गर्मी की लहरें, सूखा और महामारी फैलाकर पृथ्वी की 4 प्रतिशत आबादी को मार डाला था. अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि 2026-27 में यह दोहरा सकता है।  अल-नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय यानी ट्रॉपिकल हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है. सामान्य अल-नीनो हर 2-7 साल में आता है, लेकिन इस बार यह सुपर या मेगा स्तर का बन रहा है. कारण – समुद्री गर्मी की लहर, पॉजिटिव पैसिफिक मेरिडियनल मोड और गर्म दक्षिणी हवाएं।  बेन नॉल जैसे मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यह लहर अल-नीनो को और मजबूत बना रही है. गर्मी और नमी बढ़ने से पश्चिमी देशों में गर्मी की लहरें और तेज हो सकती हैं. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह पैटर्न 140 साल में सबसे ताकतवर हो सकता है।  अभी प्रशांत महासागर में 8046 KM लंबी गर्मी की लहर फैली हुई है. यह माइक्रोनेशिया से शुरू होकर कैलिफोर्निया तक पहुंच चुकी है. कैलिफोर्निया के पास इसे 'द ब्लॉब' कहा जा रहा है. यहां समुद्री सतह का तापमान रिकॉर्ड स्तर पर है. NOAA की रिपोर्ट के मुताबिक यह जिस लेवल का है वो बेहद विशालकाय है।   यह लहर अल-नीनो को तेजी से मजबूत कर रही है. इससे समुद्री जीव-जंतुओं पर असर पड़ रहा है. मौसम के पैटर्न पूरी तरह बदल रहे हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह गर्मी की लहर अल-नीनो को और बढ़ावा देगी, जिससे पूरे साल मौसम अनियमित रहेगा।  1877 के बाद सबसे बड़ा अल-नीनो? 1877-78 का अल-नीनो इतिहास का सबसे विनाशकारी था. उसने गर्मी की लहरें, सूखा और फसल नष्ट करके लाखों लोगों की जान ली. अब वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 2026 का अल-नीनो उससे भी ताकतवर हो सकता है. अप्रैल 2026 के मौसम मॉडल्स में वैज्ञानिक हार्ट पल्पिटेशंस महसूस कर रहे हैं. अगर यह सुपर अल-नीनो बना तो 2027 में वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड तोड़ सकता है. जलवायु परिवर्तन के साथ यह और खतरनाक बन रहा है।  दुनिया भर में कहां-कहां क्या असर होगा? अल-नीनो का असर पूरे विश्व पर पड़ेगा. ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी और मध्य अफ्रीका, भारत और अमेजन के जंगलों में सूखा और भयंकर गर्मी बढ़ेगी. आग लगने का खतरा ज्यादा होगा. अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है. उत्तरी अमेरिका में गर्मी बढ़ेगी।  दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ेगा. एशिया और अफ्रीका के कई देशों में फसलें प्रभावित होंगी. समुद्री गर्मी की लहर से तूफान और भारी बारिश की संभावना बढ़ेगी. कुल मिलाकर मौसम के पैटर्न पूरी तरह उलट जाएंगे।  भारत पर क्या होगा असर? गर्मी में तापमान बढ़ेगा? भारत इस मेगा अल-नीनो से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है. वैज्ञानिकों के अनुसार 2026 की गर्मी में तापमान सामान्य से काफी ज्यादा रहेगा. दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान और उत्तर भारत में पहले ही अप्रैल में 40 डिग्री सेल्सियस पार हो चुका है. अल-नीनो की वजह से प्री-मानसून गर्मी और तेज होगी।  जून-सितंबर का मानसून कमजोर हो सकता है, जिससे सूखा पड़ने का खतरा बढ़ेगा. उत्तर-पश्चिम भारत में सूखे की स्थिति बन सकती है. कृषि प्रभावित होगी, फसलें कम हो सकती हैं. गर्मी की लंबी और तेज होगी. नमी ज्यादा होने से गर्मी और ह्यूमिड महसूस होगी. कुल मिलाकर इस गर्मी में तापमान जरूर बढ़ेगा और लोगों को भारी गर्मी का सामना करना पड़ेगा।  सरकार और लोग दोनों को तैयार रहना होगा. पानी की बचत, सूखा प्रबंधन और फसल बीमा पर जोर देना जरूरी है. किसानों को सूखा सहन करने वाली फसलें लगाने की सलाह दी जा रही है. स्वास्थ्य विभाग को हीट वेव अलर्ट जारी करने चाहिए. शहरों में कूलिंग सेंटर्स बनाए जाएं. वैज्ञानिक लगातार मॉनिटरिंग कर रहे हैं. अगर अल-नीनो सुपर लेवल का बना तो 2027 तक असर रहेगा। 

‘सुपर एल नीनो’ का कहर: सूखा, बाढ़ और हीटवेव से दुनिया परेशान, भारत के मानसून पर होगा असर

 नई दिल्ली  प्रशांत महासागर में बन रहा एल नीनो इस साल दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह एल नीनो बेहद ताकतवर हो सकता है, जो मौसम के पैटर्न को बदलकर कई देशों में सूखा, बाढ़ और गर्मी बढ़ा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इस समय प्रशांत महासागर में तेजी से गर्मी बढ़ रही है, जिससे एल नीनो बनने के संकेत मिल रहे हैं। यूरोपीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र के ताजा अनुमान के मुताबिक, इस साल सुपर एल नीनो बनने की संभावना काफी ज्यादा है। अगर ऐसा होता है, तो यह सिर्फ एक सामान्य जलवायु बदलाव नहीं होगा, बल्कि इसका असर कई सालों तक रह सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका प्रभाव 2027 तक वैश्विक तापमान को बढ़ा सकता है। एल नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। यह बदलाव छोटा लगता है, लेकिन इससे हवा की दिशा, बारिश और मौसम के पूरे सिस्टम में बड़ा बदलाव आ जाता है। कब बनता है 'सुपर एल नीनो' जब समुद्र का तापमान सामान्य से करीब 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाता है, तब इसे 'सुपर एल नीनो' कहा जाता है। ऐसे मजबूत एल नीनो हर 10 से 15 साल में एक बार आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनका असर ज्यादा बड़ा और लंबा होता है। अभी के मॉडल्स बता रहे हैं कि तापमान 1997-98 और 2015-16 जैसे बड़े एल नीनो के स्तर तक पहुंच सकता है। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिछले 100 सालों में सबसे ताकतवर एल नीनो में से एक हो सकता है। हालांकि, हर एल नीनो एक जैसा नहीं होता और इसके असर अलग-अलग जगहों पर अलग तरह से दिखते हैं। भारत और दुनिया पर असर भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता मानसून को लेकर है। मजबूत एल नीनो के दौरान अक्सर बारिश कमजोर या असमान होती है, खासकर उत्तर और मध्य भारत में। इससे खेती, पानी की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। दक्षिण-पूर्व एशिया और कैरेबियन के कुछ हिस्सों में सूखा और ज्यादा गर्मी पड़ सकती है। वहीं, दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट जैसे पेरू और इक्वाडोर में भारी बारिश और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, प्रशांत महासागर में चक्रवात और तूफान बढ़ सकते हैं, जबकि अटलांटिक महासागर में तूफानों की संख्या कम हो सकती है। एजेंसी ने यह भी कहा है कि इस साल देश में सूखे की आशंका करीब 30 फीसदी तक है, जबकि 40 फीसदी संभावना ऐसी है कि बारिश सामान्य से कम ही रहे। अब सबकी नजर सरकारी मौसम विभाग India Meteorological Department (IMD) पर टिकी हुई हैं। कहा जा रहा है कि सरकारी मौसम विभाग इस महीने के आखिर तक मानसून को लेकर अपना पहला आधिकारिक अनुमान जारी कर सकता है।  किस महीने कितनी होगी बारिश? निजी मौसम एजेंसी स्काइमेट के ताजा पूर्वानुमान के मुताबिक 2026 के मानसून सीजन में बारिश का पैटर्न संतुलित नहीं रहेगा। चार महीनों के इस सीजन में सिर्फ जून में सामान्य बारिश की उम्मीद जताई गई है, जबकि बाकी महीनों में बारिश औसत से कम रहने का अनुमान जताया गया है। स्काइमेट के अनुसार जून में बारिश लॉन्ग पीरियड एवरेज यानी एलपीए का करीब 101 फीसदी रह सकती है। इस महीने के सामान्य रहने की संभावना 40 फीसदी है, जबकि 40 फीसदी संभावना इसे सामान्य से कम रहने की भी है। जून का एलपीए 165.3 मिमी है। जुलाई महीने में बारिश एलपीए के 95 फीसदी तक रहने का अनुमान है, यानी यह सामान्य से कम रह सकती है। जुलाई के लिए सामान्य और कम बारिश, दोनों की संभावना 40-40 फीसदी बताई गई है। इस महीने का एलपीए 280.5 मिमी है। अगस्त-सितंबर में बारिश का हाल अगस्त में भी बारिश की स्थिति कमजोर हो सकती है। स्काइमेट का अनुमान है कि इस महीने बारिश एलपीए के 92 फीसदी तक ही रह सकती है। अगस्त में कम बारिश होने की संभावना करीब 60 फीसदी बताई गई है। इस महीने का एलपीए 254.9 मिमी है। वहीं सितंबर में भी राहत के संकेत नहीं हैं। देशभर में औसत बारिश एलपीए के 89 फीसदी रहने का अनुमान है, जो सामान्य से कम श्रेणी में आता है। सितंबर में कम बारिश होने की संभावना सबसे ज्यादा 79 फीसदी बताई गई है। इस महीने का एलपीए 167.9 मिमी है। कुल मिलाकर स्काइमेट के शुरुआती अनुमान से साफ है कि 2026 के मानसून में जून को छोड़कर बाकी तीनों महीनों में बारिश सामान्य से कम रह सकती है। इससे खेती और जल संसाधनों पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। अल नीनो की वापसी कमजोर मानसून का संकेत स्काईमेट के मैनेजिंग डायरेक्टर जतिन सिंह के मुताबिक, पिछले डेढ़ साल से सक्रिय 'ला नीना' की स्थिति अब समाप्त हो रही है। प्रशांत महासागर अब 'ईएनएसओ-न्यूट्रल' (ENSO-neutral) की ओर बढ़ रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मानसून के शुरुआती चरण में 'अल नीनो' (El Niño) के विकसित होने की संभावना है, जो सीजन के दूसरे भाग में और मजबूत हो सकता है। अल नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ सकता है और बारिश के वितरण में अनियमितता देखने को मिल सकती है। तापमान और मौसम का बढ़ता खतरा एल नीनो के कारण दुनिया के कई हिस्सों में तापमान बढ़ने की संभावना है। यूरोप, अफ्रीका, मिडिल ईस्ट, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका के कुछ हिस्सों में ज्यादा और तेज हीटवेव देखने को मिल सकती हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि मजबूत एल नीनो वैश्विक तापमान को नए रिकॉर्ड तक पहुंचा सकता है। ऐसे में 2027 का साल बेहद गर्म हो सकता है। साथ ही, गर्म हवा ज्यादा नमी को रोककर रखती है, जिससे जब बारिश होती है तो वह ज्यादा तेज और भारी होती है। इससे कुछ जगहों पर अचानक बाढ़ का खतरा भी बढ़ जाता है, जबकि दूसरी जगहों पर सूखा बना रहता है। अभी भी बनी हुई है अनिश्चितता हालांकि संकेत मजबूत हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी पूरी तरह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि एल नीनो कितना ताकतवर होगा। आने वाले महीनों में इसके असर का सही अंदाजा लगेगा। अगर समुद्र का तापमान इसी … Read more