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मध्य प्रदेश के जंगलों में आग का तांडव, 60 स्थानों पर जल रही आग, अमरकंटक के बाद इन शहरों पर खतरा

भोपाल  भीषण गर्मी की दस्तक के साथ ही मध्य प्रदेश के जंगलों से डराने वाली खबरें आने लगी हैं। पिछले तीन सालों से मध्य प्रदेश देश के उन राज्यों में शीर्ष पर बना हुआ है जहां जंगल की आग ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2025-26 में मध्य प्रदेश 14,506 आग की घटनाओं के साथ देश में दूसरे स्थान पर रहा, जबकि पिछले साल राज्य इस मामले में नंबर-1 पर था। हर दिन 60 जगह धधक रही है आग मध्य प्रदेश में औसतन हर दिन 60 जगहों पर आग की लपटें दिखाई दे रही हैं। पिछले हफ्ते अमरकंटक के जंगलों में लगी भीषण आग ने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी थी। वन विभाग ने देवास, सीहोर, रायसेन, बैतूल, सिवनी, छिंदवाड़ा, सागर, दमोह और कटनी के पास के जंगलों को अति संवेदनशील घोषित किया है। फॉरेस्ट विभाग का पराली वाला तर्क हैरानी की बात यह है कि एमपी फॉरेस्ट विभाग इन आंकड़ों के पीछे एक तकनीकी थ्योरी दे रहा है। अधिकारियों का दावा है कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI), देहरादून के सैटेलाइट खेतों में जलने वाली पराली और जंगल की आग में अंतर नहीं कर पाते। चूंकि मध्य प्रदेश पराली जलाने के मामले में भी देश में टॉप पर है, इसलिए खेत की आग को अक्सर जंगल की आग मान लिया जाता है, जिससे राज्य की रैंकिंग खराब हो रही है। बचाव के लिए क्या हो रहा है काम? विभाग का कहना है कि वे सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल रियल-टाइम मॉनिटरिंग के लिए कर रहे हैं। ग्राउंड स्टाफ को तुरंत सूचना भेजी जाती है ताकि वे मौके पर पहुंच सकें। इसके अलावा:करीब 1 लाख किलोमीटर लंबी फायर लाइन (साफ की गई जमीन की पट्टियां) बनाई गई हैं।संवेदनशील इलाकों में विशेष वॉच टावर स्थापित किए गए हैं।सैटेलाइट अलर्ट सीधे फॉरेस्ट गार्ड के मोबाइल तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई है।

रायपुर: बंजर डंप क्षेत्र से हरा-भरा जंगल बनाने की दिशा में गेवरा की अनूठी पहल

रायपुर : बंजर डंप क्षेत्र से हरा-भरा जंगल बनने की ओर गेवरा की अनूठी पहल मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण कर बंजर भूमि को हरियाली में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया रायपुर छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। कोरबा जिले के गेवरा परिक्षेत्र में स्थित 12.45 हेक्टेयर के डंप क्षेत्र में 33 हजार 935 मिश्रित प्रजातियों के पौधों का सफल रोपण कर बंजर भूमि को हरियाली में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। वन मंत्री केदार कश्यप ने छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम की इस पहल की सराहना की है। जहां हरियाली संभव नहीं थी, वहां उगा जंगल           कोयला खनन के बाद डंप क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी नीचे दब जाती है, जबकि ऊपर पत्थर, कोयला अवशेष और अनुपजाऊ मिट्टी रह जाती है। ऐसे क्षेत्र आमतौर पर बंजर हो जाते हैं और वहां पौधों का उगना बेहद कठिन होता है। लेकिन वन विकास निगम के प्रयासों से यही बंजर भूमि अब धीरे-धीरे हरियाली से ढकती जा रही है। वैज्ञानिक पद्धति से किया गया वृक्षारोपण           डंप क्षेत्र में जल स्तर कम होने और पोषक तत्वों की कमी को ध्यान में रखते हुए विशेष उपाय किए गए। वर्मी कम्पोस्ट, नीमखली और डीएपी का उपयोग कर मिट्टी को उर्वर बनाया गया, जीपीएस सर्वे और सीमांकन के बाद व्यवस्थित गड्ढे तैयार किए गए, 3–4 फीट ऊंचाई के स्वस्थ पौधों का चयन कर रोपण किया गया। मिश्रित प्रजातियों से बढ़ेगी जैव विविधता            इस क्षेत्र में नीम, शीशम, सिरस, कचनार, करंज, आंवला, बांस, महोगनी, सहतूत, महुआ और बेल जैसी विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए हैं। इनसे आने वाले समय में यह क्षेत्र पक्षियों, गिलहरी और अन्य वन्य जीवों के लिए अनुकूल आवास बन सकेगा। निरंतर देखभाल से मिल रही सफलता           रोपण के बाद पौधों की नियमित देखभाल की जा रही है, जिसमें सिंचाई, निंदाई- गुड़ाई,खाद डालना, सुरक्षा और घास कटाई मृत पौधों का समय पर प्रतिस्थापन जैसे कार्य शामिल हैं। वर्ष 2025 से 2029 तक 5 वर्षों तक रखरखाव के बाद इस विकसित हरित क्षेत्र को एसईसीएल गेवरा को सौंपा जाएगा। प्रेरणादायक परिणाम          यह पहल दर्शाती है कि सही योजना, तकनीक और सतत प्रयासों से पत्थरीली व अनुपजाऊ भूमि को भी घने जंगल में बदला जा सकता हैl गेवरा का यह डंप क्षेत्र आने वाले वर्षों में एक सघन, हरित और जैव विविधता से भरपूर मानव-निर्मित जंगल के रूप में विकसित होगा, जो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक प्रेरक पहल बन चुकी है।

एमसीबी : जंगल की जमीन को निजी बताकर बेचने का मामला, प्रशासन सख्त

एमसीबी : जंगल की जमीन को निजी बताकर बेचने का मामला, प्रशासन सख्त बेलबहरा की विवादित भूमि पर खरीदी-बिक्री सहित सभी गतिविधियों पर रोक एमसीबी कलेक्टर जनदर्शन में आई शिकायत के बाद प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ग्राम बेलबहरा की एक विवादित भूमि पर सभी प्रकार के लेन-देन और निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी है। जानकारी के अनुसार ग्राम बेलबहरा तहसील मनेन्द्रगढ़ स्थित खसरा नंबर 62 जिसका पुराना खसरा नंबर 32 जो वर्ष 1944-45 के राजस्व रिकॉर्ड में “छोटे झाड़ का जंगल” के रूप में दर्ज थी। आरोप है कि वर्ष 1980-81 में बिना किसी वैधानिक आदेश के इसे रामसुभग के नाम दर्ज कर दिया गया। इसके बाद संबंधित व्यक्ति द्वारा स्वयं को भूमि आबंटित होना बताकर शासकीय अनुमति प्राप्त की गई और भूमि का विक्रय भी कर दिया गया। इस पूरे मामले को शिकायत के माध्यम से कलेक्टर जनदर्शन में उठाया गया। इस भूमि की जांच के लिए अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) मनेन्द्रगढ़ को जिम्मेदारी सौंपी गई। वहीं जांच में सामने आया कि भूमि विक्रय की अनुमति लेते समय महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया और भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई। जांच प्रतिवेदन में भूमि को पुनः शासकीय मद में दर्ज करने की अनुशंसा की गई है। प्रकरण दर्ज, अंतिम निर्णय तक सख्ती अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के 20 मार्च 2026 के प्रतिवेदन के आधार पर प्रकरण दर्ज कर लिया गया है। जब तक मामले का अंतिम निराकरण नहीं हो जाता, तब तक संबंधित भूमि पर सख्त प्रतिबंध लागू रहेंगे। इन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक – खरीदी-बिक्री, नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, व्यपवर्तन अन्य किसी भी प्रकार की राजस्व कार्रवाई। निर्माण कार्य भी प्रतिबंधित – प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य भी नहीं किया जा सकेगा। उल्लंघन पर होगी कड़ी कार्रवाई – प्रशासन ने चेतावनी दी है कि आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ विधिसम्मत सख्त कार्रवाई की जाएगी।

रायपुर: वन विभाग का विधिक साक्षरता प्रशिक्षण, अपराधियों पर सख्त कार्रवाई की तैयारी

रायपुर : वन विभाग का विधिक साक्षरता प्रशिक्षण कार्यक्रम, अपराधियों पर सख्त कार्रवाई की तैयारी रायपुर राज्य के वन क्षेत्रों में अवैध शिकार की घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग लगातार कार्रवाई कर रहा है। कई मामलों में अपराधी पकड़े भी जाते हैं, लेकिन कभी-कभी वनकर्मियों को कानूनी प्रावधानों की पूरी जानकारी न होने के कारण अपराधियों के विरुद्ध मजबूत प्रकरण तैयार नहीं हो पाता, जिससे वे आसानी से छूट जाते हैं।  विधिक साक्षरता कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम ऐसी स्थिति से बचने और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वन मंत्री केदार कश्यप के नेतृत्व में तथा प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण कुमार पाण्डेय के निर्देशानुसार वन विभाग के कर्मचारियों के लिए विधिक साक्षरता प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में दिसंबर माह में वनमण्डल कार्यालय दुर्ग के सभागार में “प्रोटेक्ट टुडे एंड सिक्योर टुमारो” परियोजना के अंतर्गत एक दिवसीय विधिक साक्षरता कार्यशाला एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के सहयोग से आयोजित किया गया, जिसमें जिला न्यायालय दुर्ग के काउंसलर चंद्राकर ने मुख्य वक्ता के रूप में वन एवं वन्यजीव संरक्षण से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी जानकारी दी। वन एवं वन्यजीव अपराधियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके इस प्रशिक्षण का उद्देश्य वनकर्मियों को वन कानूनों, नियमों और धाराओं की स्पष्ट जानकारी देना है, ताकि प्रकरणों को मजबूत बनाया जा सके और अपराधियों के विरुद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके। इसके लिए समय-समय पर संशोधित नियमों और कानूनी प्रावधानों की जानकारी कार्यशालाओं के माध्यम से दी जा रही है। आरक्षित और संरक्षित वनों से संबंधित कानूनी प्रक्रियाओं की दी गई जानकारी कार्यक्रम के दौरान भारतीय वन अधिनियम, 1927 तथा वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रमुख प्रावधानों पर विशेष रूप से चर्चा की गई। विशेषज्ञों द्वारा आरक्षित और संरक्षित वनों से संबंधित कानूनी धाराओं तथा विभागीय कार्रवाई की प्रक्रियाओं को सरल भाषा में समझाया गया। साथ ही राजस्व क्षेत्रों में होने वाले वन अपराधों की रोकथाम और नियंत्रण के उपायों पर भी जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के एक विशेष सत्र में नालसा के विशेषज्ञों ने अदालती मामलों के प्रबंधन से संबंधित “क्या करें और क्या न करें” पर व्यावहारिक सुझाव दिए, जिससे वनकर्मी विधिक प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन कर सकें। इस अवसर पर वन परिक्षेत्र अधिकारी दुर्ग एवं धमधा सहित वनमण्डल के समस्त कार्यपालिक और क्षेत्रीय अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे, जिन्हें वन्यजीव और वन संपदा की सुरक्षा हेतु विधिक रूप से सजग रहने के लिए प्रशिक्षित किया गया।