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भारत की इकोनॉमी को मूडीज का बूस्टर, GDP ग्रोथ का अनुमान बढ़ाकर 7% किया

नईदिल्ली  मूडीज रेटिंग्स ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अपना अनुमान बड़े पैमाने पर बढ़ा दिया है। पहले जहां 2026-27 में 6% वृद्धि का अनुमान था, अब उसे बढ़ाकर 7% कर दिया गया है। इसकी वजह यह है कि मिडिल ईस्ट के संघर्ष के झटके को भारत ने जितनी अच्छी तरह झेला है, उतना मूडीज को उम्मीद नहीं थी। आज 18 सितंबर यानी शुक्रवार को मूडीज की नियमित समीक्षा में यह अपग्रेड सामने आया। इसके पीछे मजबूत निजी खपत, अच्छा ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन, लगातार सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, निजी निवेश में सुधार के संकेत और सेवाओं की मजबूती जैसे कारण बताए गए हैं। पहले छह महीनों में 8.2% की वृद्धि मूडीज के मुताबिक, 2026 के पहले 6 महीनों में भारत की रियल GDP वृद्धि 8.2% रही, जबकि 2025 में पूरे साल की वृद्धि 7.3% थी। मूडीज ने कहा, "मिडिल ईस्ट के संघर्ष से पैदा हुए वैश्विक झटके को अर्थव्यवस्था ने जिस तरह झेला है, उसी वजह से हमने वित्त वर्ष 2026-27 (मार्च 2027 में खत्म) के लिए अपना अनुमान 6% से बढ़ाकर 7% किया है।" आधिकारिक आंकड़े भी मजबूत मूडीज का संशोधित अनुमान ऐसे समय आया है जब आधिकारिक वृद्धि आंकड़े भी मजबूत हैं। FY26 में भारत की अर्थव्यवस्था 7.7% बढ़ी, जबकि एक साल पहले 7.1% थी। चौथी तिमाही की वृद्धि 7.8% रही। IMF, S&P और RBI से आगे निकला मूडीज मूडीज का यह संशोधित अनुमान इस साल की शुरुआत में दूसरी बड़ी संस्थाओं के अनुमानों से काफी ऊपर है।     अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने जुलाई की अपनी वर्ल्ड इकनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट में वित्तवर्ष 2027 के लिए 6.4% वृद्धि का अनुमान लगाया था। IMF ने कहा था, "भारत सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है, निजी खपत और सेवाओं की मजबूत रफ्तार के सहारे 6.4% वृद्धि का अनुमान है।"     S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने जून में 6.6% वृद्धि का अनुमान दिया था। S&P ने जून में ऊर्जा कीमतों, मिडिल ईस्ट संघर्ष, कमजोर मानसून और धीमी वैश्विक वृद्धि के जोखिमों के चलते FY27 का अनुमान 7.1% से घटाकर 6.6% किया था। उसे FY28 में 7.2% की वापसी की उम्मीद थी।     भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी जून में FY27 का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया था। RBI ने भी पश्चिम एशिया संघर्ष, ऊंची ऊर्जा कीमतों, सप्लाई में बाधा और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताओं के चलते FY27 का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% किया था। मूडीज का 7% अनुमान IMF से 0.6 प्रतिशत अंक और S&P तथा RBI दोनों से 0.4 प्रतिशत अंक ज्यादा है। घरेलू मांग है रियल ताकत मूडीज का मानना है कि इस उम्मीद भरे अनुमान की मुख्य वजह घरेलू मांग है। निजी खपत मजबूत हुई है और सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च के सहारे ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन भी अच्छा बना हुआ है। एजेंसी को उम्मीद है कि निजी क्षेत्र का निवेश भी फिर से शुरू होगा, जो वृद्धि की एक और वजह बनेगा। सेवाओं का कामकाज भी मजबूत बना हुआ है। इन सबने मिलकर भारत को मिडिल ईस्ट संघर्ष का असर सहने में मदद की, जिससे साल की शुरुआत में ऊर्जा कीमतों, व्यापार और विदेशी संतुलन को लेकर चिंताएं थीं।

भारत की 7.8% GDP ग्रोथ पर IMF का बड़ा बयान, कहा- बेहतर डेटा से आर्थिक अनुमान होंगे और मजबूत

 वॉशिंगटन/नई दिल्ली भारत की GDP ग्रोथ और उसके आंकड़ों को लेकर चल रही बहस के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने नए आर्थिक आंकड़ों और उन्हें तैयार करने के तरीके को लेकर सकारात्मक टिप्पणी की है. IMF के मुताबिक भारत अब भी दुनिया की ग्रोथ के लिए प्रमुख इंजन बना हुआ है. इस प्रमुख वैश्विक संगठन का कहना है कि अपडेट किए गए इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) और प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) सीरीज आगे भारत की GDP ग्रोथ के अनुमान को और बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।  नए IIP और PPI से क्या बदलेगा? वहीं, IMF ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की रियल GDP ग्रोथ को उम्मीदों से बेहतर बताया है. वॉशिंगटन में हुई प्रेस ब्रीफिंग के दौरान IMF की कम्युनिकेशंस डिपार्टमेंट डायरेक्टर जूली कोजैक ने भारत के ताजा GDP आंकड़ों पर बात की. उन्होंने कहा कि नवीनतम GDP रिलीज में इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन (IIP) का नया इंडेक्स और प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) की नई सीरीज शामिल की गई है. उनके मुताबिक, ये दोनों नई सीरीज भारत के GDP अनुमानों को बेहतर बनाने में मदद करेंगी. यानी आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियों को मापने और GDP का अनुमान लगाने के लिए ज्यादा अपडेटेड डेटा उपलब्ध होगा।  IMF ने डेटा क्वालिटी पर क्या कहा? जूली कोजैक ने भारत के मैक्रोइकोनॉमिक डेटा सिस्टम को आधुनिक बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की. उन्होंने कहा कि भारतीय अधिकारियों को स्टैटिस्टिकल फ्रेमवर्क और डेटा क्वालिटी को और मजबूत करने की दिशा में इसी तरह आगे बढ़ना चाहिए. IMF की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत के आर्थिक आंकड़ों की गुणवत्ता और GDP की गणना को लेकर कांग्रेस पार्टी और उसके कुछ नेताओं ने सवाल खड़े किए हैं. वहीं, सरकार का कहना है कि नए डेटा सेट और बदले हुए डेटा सिस्टम से आर्थिक गतिविधियों से जुड़े अनुमानों को ज्यादा मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है।  7.8% GDP ग्रोथ पर IMF क्या बोला IMF ने भारत की आर्थिक ग्रोथ के ताजा आंकड़ों को उम्मीद से बेहतर बताया. कोजैक के मुताबिक, भारत की रियल GDP पहली तिमाही में 7.8% बढ़ी, जो IMF स्टाफ की उम्मीद और दूसरी रेटिंग एजेंसियों के अनुमान से ज्यादा रही. उन्होंने कहा कि इस ग्रोथ को सर्विसेज और एक्सपोर्ट से मजबूती मिली. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एनर्जी प्राइस में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत की घरेलू इकोनॉमी की मजबूती इस आंकड़े में दिखाई देती है।  MOSPI के आंकड़ों में क्या आया है सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI) ने 31 अगस्त को FY 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही के GDP आंकड़े जारी किए थे. इसके मुताबिक पहली तिमाही में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.8% रही, जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 6.9% थी. इस दौरान मजबूत कैपिटल एक्सपेंडिचर, कंस्ट्रक्शन और सर्विस सेक्टर ने आर्थिक गतिविधियों को सहारा दिया. स्थिर कीमतों यानी 2022-23 के बेस ईयर पर रियल GDP ₹81.36 लाख करोड़ रही. FY 2025-26 की पहली तिमाही में यह ₹75.46 लाख करोड़ थी. वहीं मौजूदा कीमतों पर नॉमिनल GDP 10.3% बढ़कर ₹88.27 लाख करोड़ हो गई. एक साल पहले यह करीब ₹80 लाख करोड़ थी।  ग्रॉस वैल्यू एडेड में भी मजबूत ग्रोथ GDP के साथ ग्रॉस वैल्यू एडेड यानी GVA के आंकड़ों में भी अच्छी तेजी देखने को मिली. पहली तिमाही में रियल GVA 8.2% बढ़कर ₹73.82 लाख करोड़ रही. वहीं नॉमिनल GVA 11.5% बढ़कर ₹80.53 लाख करोड़ पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि सर्विसेज, कंस्ट्रक्शन और दूसरे प्रमुख सेक्टरों में आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई थीं. GDP किसी देश की इकोनॉमी की सबसे अहम तस्वीरों में से एक होती है. इसलिए इसे तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले आंकड़ों की क्वालिटी भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। 

7.8% GDP ग्रोथ से उत्साह के बीच बड़ी चुनौती, 2047 के विकसित भारत मिशन पर अर्थशास्त्रियों ने चेताया

 नई दिल्ली भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की शानदार GDP ग्रोथ दर्ज की है. पश्चिम एशिया संकट और अन्य वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच यह आंकड़ा उम्मीद से बेहतर रहा और भारत की मजबूत आर्थिक रफ्तार को दिखाता है. हालांकि, इस GDP आंकड़े को लेकर विवाद भी सामने आया।  पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के आंकड़ों और पिछली अवधि के संशोधन पर सवाल उठाए, जबकि कांग्रेस ने भी सरकार पर आंकड़ों के साथ हेरफेर करने का आरोप लगाया. सुभाष गर्ग ने तो यहां तक दावा कर दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि दर 7.8% की जगह सिर्फ 2.6% है. हालांकि, उन्होंने खुद ही एक इंटरव्यू में अपने 2.6% जीडीपी ग्रोथ के दावे से पलटते हुए इसे 5% तक संसोधित कर दिया।  दूसरी ओर, दो प्रमुख अर्थशास्त्रियों- सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने GDP ग्रोथ के आंकड़ों में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है. साथ ही दोनों ने बताया कि 7.8% की ग्रोथ के बावजूद 2047 तक विकसित देश बनने के लिए भारत को और तेज आर्थिक विकास की जरूरत होगी।  खास बात यह है कि मोंटेक सिंह अहलूवालिया कांग्रेस के नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौरान योजना आयोग के डिप्टी चेयरमैन रह चुके हैं. वह 2004 से 2014 के बीच देश की आर्थिक नीति और सुधारों से जुड़े अहम फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका में थे. इसलिए मौजूदा जीडीपी ग्रोथ पर उनकी राय इस बहस को एक अलग वजन देती है।  सुभाष गर्ग ने क्या सवाल उठाया? GDP के नए आंकड़े जारी होने के बाद पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने पिछले साल की पहली तिमाही के आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन को लेकर सवाल खड़े किए. उनका कहना था कि पिछले साल की पहली तिमाही का मौजूदा कीमतों पर GDP आंकड़ा पहले करीब ₹86 लाख करोड़ बताया गया था, जिसे नई GDP सीरीज में घटाकर करीब ₹80 लाख करोड़ कर दिया गया. उन्होंने करीब ₹6 लाख करोड़ के अंतर को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा और इसी आधार पर मौजूदा 7.8% ग्रोथ की गणना पर सवाल उठाया।  सुभाष गर्ग का तर्क था कि अगर पुराने और नए आंकड़ों को अलग-अलग आधार पर देखा जाए तो मौजूदा कीमतों पर GDP ग्रोथ 2.5% से भी कम नजर आती है. हालांकि, सरकार और अर्थशास्त्रियों ने उनकी इस गणना को सिरे से खारिज करते हुए अतार्किक बताया. सरकार और अर्थशास्त्रियों ने कहा कि दो अलग-अलग स्टैटिस्टिकल सीरीज के आंकड़ों की तुलना करने जीडीपी की गणना नहीं की जा सकती।  कांग्रेस ने भी उठाए थे सवाल सुभाष गर्ग की आपत्ति के बाद GDP के आंकड़े राजनीतिक बहस का मुद्दा भी बन गए. कांग्रेस ने नई GDP सीरीज, GDP डिफ्लेटर और पिछले आंकड़ों में हुए संशोधन को लेकर सरकार पर सवाल उठाए. पार्टी ने दावा किया कि नई सीरीज में चार वर्षों के दौरान भारत की GDP में करीब ₹43 लाख करोड़ की कमी दिखाई गई है. सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नई GDP सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है और आंकड़ों की गणना के लिए बेहतर डेटा सोर्स, नई मेथोडोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है. सांख्यिकी मंत्रालय (MoSPI) ने भी कहा है कि अलग-अलग GDP सीरीज के आंकड़ों की तुलना करके ग्रोथ रेट निकालना सही तरीका नहीं है।  दो बड़े अर्थशास्त्रियों ने क्या कहा? GDP के आंकड़ों को लेकर चल रही इस बहस के बीच सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी अपनी राय रखी. दोनों ने इस बात से सहमति जताई कि 7.8% के आंकड़े को राजनीतिक तरीके से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का कोई ठोस सबूत नहीं है. विश्व बैंक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले अर्थशास्त्री नीलकंठ मिश्रा ने भी अलग-अलग GDP सीरीज को मिलाकर 2.6% या 2.8% की ग्रोथ निकालने को सही नहीं माना।  सुरजीत भल्ला ने कहा कि अगर सरकार GDP को बढ़ाकर दिखाना चाहती, तो खपत के आंकड़ों को भी बढ़ा हुआ दिखाया जा सकता था. लेकिन नई सीरीज में खपत को उलटे नीचे संशोधित किया गया है. उनके मुताबिक, अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि GDP के आंकड़ों के साथ छेड़छाड़ हुई है।  7.8% ग्रोथ ठीक, पर 2047 का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण GDP विवाद से अलग दोनों अर्थशास्त्रियों की सबसे अहम बात 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य को लेकर है. भारत ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की मजबूत ग्रोथ जरूर दर्ज की है, लेकिन सुरजीत भल्ला और मोंटेक सिंह अहलूवालिया के मुताबिक सिर्फ एक-दो तिमाहियों की तेज ग्रोथ से यह तय नहीं किया जा सकता कि भारत 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बन जाएगा।  सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लंबे समय तक दोहरे अंकों में ग्रोथ बनाए रखनी होगी. उन्होंने इन्वेस्टमेंट-GDP रेशियो में करीब 34% तक की मजबूती को सकारात्मक बदलाव माना, लेकिन कहा कि डॉलर के लिहाज से प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लिए अभी काफी तेज ग्रोथ की जरूरत है।  मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के निराशावादी अनुमानों के मुकाबले ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है. लेकिन 'विकसित भारत 2047' के लक्ष्य के लिए मौजूदा रफ्तार पर्याप्त नहीं है. उनका मानना है कि भारत को ज्यादा ऊंची और लगातार बनी रहने वाली ग्रोथ चाहिए।  सिर्फ GDP बढ़ना काफी नहीं अर्थशास्त्रियों के मुताबिक किसी देश के विकसित होने का मतलब सिर्फ कुल GDP का बढ़ना नहीं है. प्रति व्यक्ति आय, रोजगार, प्रोडक्शन और डेवलपमेंट का फायदा समाज के व्यापक हिस्से तक पहुंचना भी उतना ही जरूरी है. अर्थशास्त्री रोहित लांबा ने भारत के डेवलपमेंट मॉडल को चीन और दक्षिण कोरिया से अलग बताया है।  उनके मुताबिक भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से सीधे हाई-स्किल सर्विस सेक्टर की ओर तेजी से बढ़ा, जबकि बड़े पैमाने पर रोजगार देने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को जितना चाहिए, उतना मजबूत नहीं बना सका. विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में भारत की प्रति व्यक्ति GDP करीब 2,695 डॉलर थी. इसके मुकाबले चीन की प्रति व्यक्ति GDP करीब 13,303 डॉलर, ब्रिटेन की करीब 53,246 डॉलर और अमेरिका की करीब 84,534 डॉलर थी।  रोजगार और K-Shaped ग्रोथ की चुनौती भारत के लिए अगली बड़ी चुनौती ऐसी ग्रोथ … Read more

GDP पर उठे सवाल तो World Bank ने दिया जवाब, बोले- कम FDI से भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ता बड़ा असर

 नई दिल्ली भारत की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ को लेकर बहस तेज हो गई है. वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की GDP ग्रोथ 7.8% रही है. सरकार जहां इसे अर्थव्यवस्था की मजबूत स्थिति का संकेत बता रही है, वहीं पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने GDP के आंकड़ों और इसकी गणना के तरीके पर सवाल उठाए हैं. इस बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने GDP पर उठ रहे सवालों को खारिज करते हुए तीखी टिप्पणी की है।  विवाद की बड़ी वजह GDP की नई सीरीज है. फरवरी 2026 में सरकार ने GDP की नई सीरीज जारी की थी, जिसमें बेस ईयर 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया. इसके साथ आंकड़े जुटाने और उनकी गणना के तरीके में भी बदलाव किया गया. पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का कहना है कि नई सीरीज में पिछली तिमाहियों के आंकड़ों में बड़ा बदलाव आया है।  उन्होंने खास तौर पर जून 2025 की तिमाही के मौजूदा कीमतों वाले GDP आंकड़े में करीब 6 लाख करोड़ रुपये की कमी का मुद्दा उठाया है. सुभाष चंद्र गर्ग का तर्क है कि अगर पुराने आंकड़ों को आधार बनाया जाए तो जून 2026 की ग्रोथ का आंकड़ा काफी अलग दिखाई देगा और यह 2.6% के आसपास ठहरेगा. उनका यह दावा सरकार के 7.8% ग्रोथ के दावे के एकदम विपरीत है।  कांग्रेस भी सरकार पर उठा रही सवाल कांग्रेस भी GDP के आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना साध रही है. पार्टी का आरोप है कि नई GDP सीरीज और आंकड़ों में बदलाव के जरिए अर्थव्यवस्था की तस्वीर को जरूरत से ज्यादा मजबूत दिखाया जा रहा है. कांग्रेस का कहना है कि सिर्फ GDP ग्रोथ बढ़ने से आम लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं हो जाती. रोजगार, कमाई, खपत और लोगों की जेब में बचने वाली रकम जैसे मुद्दों को भी देखना जरूरी है।  नीलकंठ मिश्रा ने दावों को बताया 'अल्पज्ञान' इस पूरे विवाद के बीच वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर GDP के आंकड़ों का बचाव किया. उन्होंने GDP की नई सीरीज पर सवाल उठाने वालों पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें 'अल्पज्ञानी और बेहद गलत दावों' को देखकर हैरानी होती है. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और कांग्रेस पार्टी की ओर माना जा रहा है।  नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि GDP के आंकड़ों में हुए बदलाव को समझे बिना पुराने और नए आंकड़ों की तुलना करना सही नहीं है. उनके मुताबिक, नई सीरीज में आंकड़े जुटाने और अर्थव्यवस्था की वास्तविक गतिविधियों को मापने का तरीका बेहतर किया गया है. उन्होंने यह भी कहा कि गलत जानकारी कई बार सही जानकारी से ज्यादा तेजी से फैलती है. इसलिए सही तथ्यों को बार-बार सामने रखना जरूरी है।  सिर्फ GDP नहीं, ये आंकड़े भी सकारात्मक नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति समझने के लिए सिर्फ GDP का आंकड़ा देखना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने अगस्त के कई आंकड़ों का हवाला दिया. उनके मुताबिक, कार और SUV की बिक्री में करीब 35% की बढ़ोतरी हुई है. दोपहिया वाहनों की बिक्री भी 20% से ज्यादा बढ़ी है. निर्यात में करीब 9% की बढ़ोतरी हुई है. कमर्शियल वाहनों की बिक्री में तो करीब 40% की तेजी देखने को मिली है. वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक, यह कारोबार और निर्माण गतिविधियों में मजबूती का संकेत है।  कर्ज और निवेश में भी दिख रहा सुधार नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि बैंक लेंडिंग की ग्रोथ भी उम्मीद से बेहतर रही है. उनके मुताबिक, पहले कर्ज की धीमी रफ्तार की एक बड़ी वजह बैंकों की तरफ से कर्ज देने में कमजोरी थी, लेकिन अब इसमें सुधार दिखाई दे रहा है. टैक्स कलेक्शन में सुधार और निर्माण क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश में निवेश की गतिविधियां भी जारी हैं. निर्माण क्षेत्र के सभी संकेतक बेहद मजबूत हैं. उनका मानना है कि अब उन लोगों की संख्या बेहद कम हो जानी चाहिए जो लगातार निजी क्षेत्र के निवेश के कमजोर होने का रोना रोते हैं, क्योंकि देश में निवेश के स्पष्ट और पुख्ता प्रमाण मौजूद हैं।  आम आदमी की कमाई अब भी चुनौती हालांकि, नीलकंठ मिश्रा ने यह भी माना कि अर्थव्यवस्था में अभी कुछ 'स्लैक' यानी कमियां मौजूद हैं. इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था अभी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही है. उन्होंने वास्तविक वेतन यानी महंगाई को हटाने के बाद बचने वाली कमाई में धीमी बढ़ोतरी को इसका एक संकेत बताया. उनके मुताबिक, इस स्थिति को पूरी तरह बदलने में कुछ तिमाहियां लग सकती हैं. उन्होंने कहा कि इन कमियों को पूरी तरह से दूर करने और लेबर मार्केट को मजबूत करने के लिए देश को लगातार कई तिमाहियों तक औसत से अधिक की आर्थिक विकास दर बनाए रखनी होगी, ताकि मार्केट पूरी तरह से चुस्त हो सके और भविष्य में महंगाई के दबावों को नियंत्रित रखा जा सके।  7.5% तक पहुंच सकती है भारत की ग्रोथ भविष्य की अर्थव्यवस्था को लेकर वर्ल्ड बैंक के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर नीलकंठ मिश्रा ने काफी सकारात्मक रुख दिखाया है. उनका कहना है कि देश पर बजट का दबाव अब कम हो रहा है और मौद्रिक नीतियां भी अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल बन रही हैं. इसका असर GDP ग्रोथ पर भी दिख रहा है. उनके मुताबिक, आने वाले समय में भारत की औसत GDP ग्रोथ 7% से ऊपर रह सकती है. यहां तक कि अगर सरकार की बजट और मौद्रिक नीतियां सामान्य यानी तटस्थ भी रहती हैं, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 7.5% की ग्रोथ हासिल कर सकती है. हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले समय में महंगाई का दबाव फिर बढ़ सकता है। 

7.8% GDP Growth के बावजूद टेंशन! PM मोदी के सलाहकार ने बताईं अर्थव्यवस्था के सामने 3 बड़ी चुनौतियां

नई दिल्ली भारत की GDP ग्रोथ पहली तिमाही में 7.8% रही है, जो उम्मीद से बेहतर है. लेकिन इस रफ्तार को आगे भी बनाए रखना आसान नहीं होगा. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल वैश्विक अनिश्चितता, कच्चे तेल की कीमतों और अल नीनो को आगामी दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने तीन सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में देख रहे हैं।   एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में संजीव सान्याल ने कहा कि 7.8% की ग्रोथ किसी एक सेक्टर के दम पर नहीं आई है. मैन्युफैक्चरिंग, फाइनेंशियल सर्विसेज और कंस्ट्रक्शन समेत अर्थव्यवस्था के कई आयामों ने इसमें योगदान दिया है. उनके मुताबिक, पब्लिक और गवर्नमेंट इंवेस्टमेंट मजबूत बना हुआ है, जबकि प्राइवेट कंपनियां भी निवेश कर रही हैं।  7% की ग्रोथ भी संतोषजनक सान्याल ने 7.8% की ग्रोथ को उम्मीद से ज्यादा मजबूत बताया. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में इतनी तेज ग्रोथ को लगातार बनाए रखना मुश्किल हो सकता है. उन्होंने कहा कि अगर आने वाली तिमाहियों में भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ 7% के आसपास भी बनी रहती है, तो वह इससे काफी संतुष्ट होंगे. उनके मुताबिक, मौजूदा ग्रोथ का आधार व्यापक है और यह सिर्फ किसी एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है।  वैश्विक अनिश्चितता बनी बड़ी चुनौती संजीव सान्याल ने ईरान में युद्ध, ग्लोबल ट्रेड में आई बाधाओं और टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता को भारत के लिए अहम जोखिम बताया. उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया भारत के लिए महत्वपूर्ण एक्सपोर्ट मार्केट है. इसके अलावा इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं, जिनकी ओर से भेजी जाने वाली रेमिटेंस भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है. लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध के कारण यह पूरा क्षेत्र संवेदनशील बना हुआ है।  तेल की कीमतें भी निभाएंगी भूमिका कच्चे तेल की कीमतें भी भारत के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है. संजीव सान्याल के मुताबिक, भारत ने रूस, अमेरिका और वेनेजुएला समेत अलग-अलग देशों से आयात कर अपने सप्लाई सोर्स को डायवर्सिफाई किया है. उन्होंने माना कि विश्व में बनी विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत को कुछ बाहरी दबावों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, उनका कहना है कि इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल अच्छी स्थिति में है।  अल नीनो और मॉनसून का भी असर सान्याल ने अल नीनो को भी जोखिम के तौर पर गिनाया. उनके मुताबिक, इसका कुछ असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है. हालांकि, उन्होंने कहा कि फिलहाल इसके प्रभाव की तुलना यूरोप के कुछ हिस्सों में देखे गए गंभीर सूखे से नहीं की जा सकती।  मॉनसून अभी जारी है, इसलिए इसका अर्थव्यवस्था और ग्रोथ पर कुल कितना असर पड़ेगा, इस पर अभी निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।  बेरोजगारी और महंगाई पर क्या बोले? पीएम मोदी और केंद्र सरकार ने पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों को वैश्विक अनिश्चितता के बीच देश की बड़ी उपलब्धि बताया. वहीं विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस ने बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश की. इन चिंताओं पर संजीव सान्याल ने कहा कि उपलब्ध हार्ड डेटा घर-परिवारों पर व्यापक दबाव की तस्वीर नहीं दिखाता. उनके मुताबिक, सरकारी लेबर सर्वे के आंकड़े गांव और शहर दोनों में बेरोजगारी दर में धीरे-धीरे कमी की ओर इशारा करते हैं. हालांकि, उन्होंने पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी को एक चिंता माना।  महंगाई को लेकर उन्होंने कहा कि मौजूदा 4-5% के स्तर को भारत के पुराने आंकड़ों के संदर्भ में देखना चाहिए. करीब एक दशक पहले देश में महंगाई अक्सर 8-12% के दायरे में रहती थी. संजीव सान्याल ने मजबूत उपभोक्ता मांग के संकेत के तौर पर गाड़ियों की रिकॉर्ड बिक्री और एयर कंडीशनर जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की खरीद का भी जिक्र किया. उनके मुताबिक, ये आंकड़े बताते हैं कि घरेलू खपत में अभी मजबूती बनी हुई है।  नई GDP मेथडोलॉजी का किया बचाव सान्याल ने GDP की नई मेथडोलॉजी और बेस ईयर में बदलाव का भी बचाव किया. उनका कहना था कि कोविड का दौर सामान्य आर्थिक गतिविधियों को प्रतिबिंबित नहीं करता था, इसलिए उस समय बेस ईयर को अपडेट करना मुश्किल था. उनके मुताबिक, 2024 में अर्थव्यवस्था ज्यादा सामान्य स्थिति में लौटने के बाद बेस ईयर को अपडेट किया गया. उन्होंने कहा कि मजबूत GDP आंकड़ों की झलक कॉरपोरेट मुनाफे और कार बिक्री जैसे दूसरे आर्थिक आंकड़ों में भी दिखाई देती है।  संजीव सान्याल ने माना कि आने वाली तिमाहियों में GDP ग्रोथ की रफ्तार कुछ कम हो सकती है. ऐसे में ग्लोबल ट्रेड, तेल की कीमतों और मॉनसून से जुड़े जोखिमों पर नजर रखना जरूरी होगा. हालांकि, मौजूदा तस्वीर में भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी मजबूती यह है कि ग्रोथ कई सेक्टर से आ रही है. यही व्यापक आधार आने वाले समय में अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों के बीच सहारा दे सकता है। 

घर संभालना भी ‘काम’ है! सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से गृहिणियों के श्रम के मूल्यांकन पर चर्चा तेज

भोपाल सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवज़ा तय करते समय गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक घरेलू श्रम को एक स्वतंत्र आर्थिक मूल्य दिया जाना चाहिए। इसके लिए न्यायालय ने प्रति माह ₹30,000 की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की। गृहिणियों को "राष्ट्र निर्माता" मानते हुए, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मोटर दुर्घटना दावों में "घरेलू देखभाल की हानि" नामक मुआवज़े का एक अलग मद बनाया और इस राशि में हर तीन साल में 10% की वृद्धि अनिवार्य की। टीसर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवज़ा तय करते समय गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक घरेलू श्रम को एक स्वतंत्र आर्थिक मूल्य दिया जाना चाहिए। इसके लिए न्यायालय ने प्रति माह ₹30,000 की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की। गृहिणियों को "राष्ट्र निर्माता" मानते हुए, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मोटर दुर्घटना दावों में "घरेलू देखभाल की हानि" नामक मुआवज़े का एक अलग मद बनाया और इस राशि में हर तीन साल में 10% की वृद्धि अनिवार्य की। विवाद क्या था? यह फैसला पंजाब में एक मोटर दुर्घटना के दावे से संबंधित अपील पर आया है। नवंबर 2001 में एक सड़क दुर्घटना में रेशमा नाम की महिला की मृत्यु के बाद, उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) से संपर्क किया। दिसंबर 2003 में, न्यायाधिकरण ने ₹2.42 लाख का मुआवजा दिया। इससे असंतुष्ट होकर परिवार ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अपील की। ​​दिसंबर 2024 में, उच्च न्यायालय ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर ₹8.43 लाख कर दी, साथ ही दावा याचिका दायर करने की तारीख से 7.5% की दर से ब्याज भी लगाया। न्यायालय ने कहा कि यदि राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर नहीं किया जाता है, तो ब्याज दर बढ़कर 9% प्रति वर्ष हो जाएगी, और यदि भुगतान में छह महीने से अधिक की देरी होती है, तो यह 12% प्रति वर्ष हो जाएगी। मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होकर परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।  सुबह की पहली चाय से लेकर रात के अंतिम काम तक, करोड़ों भारतीय गृहिणियां बिना वेतन, बिना छुट्टी और बिना किसी औपचारिक मान्यता के लगातार काम करती हैं। खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल, घर का बजट संभालना, परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भावनात्मक सहारा बनना—ये ऐसे कार्य हैं जिन पर पूरे परिवार की नींव टिकी होती है। इसके बावजूद देश की आर्थिक व्यवस्था में इन कार्यों को लगभग अदृश्य माना जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने गृहिणियों को राष्ट्रनिर्माता बताते हुए उनके श्रम को आर्थिक मूल्य देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को देश की जीडीपी और आर्थिक गणनाओं में शामिल किया जाना चाहिए। जीडीपी में क्यों नहीं दिखता गृहिणियों का योगदान?     सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन करता है, लेकिन इसमें केवल वही कार्य शामिल होते हैं जिनमें पैसों का लेन-देन होता है। यही कारण है कि यदि कोई महिला अपने परिवार के लिए भोजन तैयार करती है तो उसका आर्थिक मूल्य नहीं गिना जाता, लेकिन वही भोजन किसी होटल या रेस्टोरेंट में तैयार हो तो वह जीडीपी का हिस्सा बन जाता है।     इसी तरह यदि कोई बेटी अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करती है तो उसका योगदान आर्थिक आंकड़ों में दर्ज नहीं होता, जबकि किसी अस्पताल या केयर सेंटर द्वारा दी गई वही सेवा जीडीपी में शामिल हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वह बड़ी खामी है जिसके कारण महिलाओं के घरेलू श्रम का वास्तविक मूल्य सामने नहीं आ पाता। भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी अनदेखी सब्सिडी     विकास विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह के अनुसार भारत का विकास मॉडल करोड़ों महिलाओं द्वारा दिए जा रहे मुफ्त श्रम पर आधारित है। उनका कहना है कि देश की लाखों गृहिणियां ऐसी सेवाएं दे रही हैं जिनके लिए यदि पेशेवर कर्मचारी रखे जाएं तो भारी आर्थिक खर्च आएगा।     एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में गृहिणियों के अवैतनिक श्रम का आर्थिक मूल्य देश की जीडीपी का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक हो सकता है। यह योगदान कई बड़े आर्थिक क्षेत्रों के बराबर या उनसे अधिक माना जाता है। इसके बावजूद गृहिणियों को आधिकारिक रूप से "आर्थिक रूप से निष्क्रिय" श्रेणी में रखा जाता है। समय का सबसे बड़ा निवेश महिलाएं कर रही हैं     भारत सरकार के टाइम-यूज सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन सात घंटे घरेलू कार्यों में लगाती हैं। इसके विपरीत पुरुष औसतन केवल एक घंटा घरेलू कार्यों के लिए देते हैं।     यह अंतर केवल श्रम का नहीं बल्कि अवसरों का भी है। घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं नौकरी, व्यवसाय, उच्च शिक्षा और व्यक्तिगत विकास के अवसरों से दूर रह जाती हैं। यही कारण है कि भारत में महिला श्रम भागीदारी दर अभी भी अपेक्षाकृत कम है। घरेलू श्रम के तीन बड़े स्तंभ     गृहिणियों का योगदान केवल खाना बनाने तक सीमित नहीं है।     भोजन और पोषण     परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की व्यवस्था करना।     बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल     शिक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक समर्थन और सुरक्षा सुनिश्चित करना।     घर का प्रबंधन     सफाई, बजट, खरीदारी, समय प्रबंधन और दैनिक आवश्यकताओं का संचालन करना। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सभी सेवाओं के लिए अलग-अलग पेशेवर कर्मचारी नियुक्त किए जाएं तो प्रति परिवार कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह या उससे अधिक का खर्च आ सकता है। दुनिया के कई देशों ने दी है मान्यता     घरेलू श्रम को औपचारिक मान्यता देने के प्रयास दुनिया के कई देशों में किए गए हैं।     स्वीडन में बच्चों और परिवार की देखभाल में बिताए गए वर्षों के आधार पर महिलाओं को पेंशन क्रेडिट दिया जाता है। इससे उनकी सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है।     कनाडा नियमित सर्वेक्षणों के माध्यम से घरेलू … Read more

GDP में शानदार उछाल: चौथी तिमाही के दम पर FY26 में 7.7% की वृद्धि, FY27 में 6.6% ग्रोथ का अनुमान

नई दिल्‍ली  भारत की वित्त वर्ष 2025-26 में ग्रोथ बढ़कर 7.7% हुई। मार्च तिमाही के आंकड़े पिछली तिमाही के मुकाबले कम रहे। शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत की आर्थिक विकास दर 2025-26 में बढ़कर 7.7% हो गई, जो एक साल पहले 7.1% थी। हालांकि, अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते वैश्विक और घरेलू जोखिमों के कारण इस रफ्तार को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। वित्त वर्ष 2026 की जनवरी-मार्च तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8% बढ़ी, जबकि पिछली तिमाही में यह 8% थी। भारत अब नई जीडीपी (GDP) सीरीज के तहत आंकड़े जारी कर रहा है। इसमें महंगाई मापने वाले बास्केट में हालिया बदलाव, 2022-23 को नया आधार वर्ष (बेस ईयर) बनाना और अपडेटेड बैक-सीरीज डेटा शामिल है। यह सब महामारी के बाद खपत के बदलते पैटर्न और डिजिटल अर्थव्यवस्था के तेज़ी से विस्तार को बेहतर ढंग से समझने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, साल की आखिरी तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2026 के बीच भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही. हालांकि, यह इससे पिछली तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) के 8% के मुकाबले थोड़ी कम है. इसका मुख्य वजह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की रफ्तार में आई कमी रही. मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ जो तीसरी तिमाही में 12.8% पर थी, वह आखिरी तिमाही में गिरकर 7.3% पर आ गई।  फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में 7.9% रही GVA ग्रोथ ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (GVA) की बात करें तो फाइनेंशियल ईयर 2025-26 में इसकी ग्रोथ रेट 7.9% दर्ज की गई. चौथी तिमाही में भी जीवीए ग्रोथ 7.9% रही, जो आर्थिक गतिविधियों में मजबूती का संकेत देती है. बता दें कि जीवीए से पता चलता है कि देश के अलग-अलग क्षेत्रों (जैसे खेती, उद्योग) में कुल कितनी असली कमाई या वैल्यू जुड़ी।  पूरे साल की यह ग्रोथ सरकार के फरवरी के दूसरे अनुमान 7.6% से भी ज्यादा है। वहीं पिछले साल यानी वित्त वर्ष 2024-25 में देश की रियल जीडीपी ग्रोथ 7.1% रही थी। नॉमिनल जीडीपी में 8.9 प्रतिशत की वृद्धि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, नॉमिनल जीडीपी (वर्तमान कीमतों पर) के मोर्चे पर भी अर्थव्यवस्था ने अपनी रफ्तार कायम रखी है। वित्त वर्ष 2025-26 में नॉमिनल जीडीपी के 346.36 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जबकि इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 318.07 लाख करोड़ रुपये पर दर्ज किया गया था। यह स्पष्ट रूप से 8.9 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर को रेखांकित करता है। जीडीपी के ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था सही दिशा में मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। 7.8 प्रतिशत की मजबूत तिमाही वृद्धि और 7.7 प्रतिशत की वार्षिक विकास दर न सिर्फ भारतीय बाजारों के लिए एक सकारात्मक संकेत है, बल्कि यह देश के लगातार बढ़ते आर्थिक परिदृश्य को भी मजबूती प्रदान करता है।  मैन्युफैक्चरिंग में दिखी सुस्ती     वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही में देश की जीडीपी ग्रोथ 7.8% रही। यह तीसरी तिमाही की 8% की ग्रोथ के मुकाबले थोड़ी कम है।     तिमाही-दर-तिमाही आधार पर विकास दर में आई इस गिरावट की मुख्य वजह मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दर्ज की गई सुस्ती है।     मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ जहां तीसरी तिमाही में 12.8% के उच्च स्तर पर थी, वह चौथी तिमाही में घटकर 7.3% पर आ गई है। GVA ग्रोथ 7.9% रही, नॉमिनल जीडीपी की रफ्तार भी धीमी     आर्थिक विकास को करीब से दर्शाने वाली ग्रॉस वैल्यू ऐडेड (GVA) ग्रोथ पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 7.9% दर्ज की गई है। चौथी तिमाही में भी GVA की विकास दर ठीक इतनी ही यानी 7.9% रही।     दूसरी ओर, अगर मौजूदा बाजार भाव पर आधारित नॉमिनल जीडीपी की बात करें तो वित्त वर्ष 2025-26 में इसमें 8.9% की बढ़ोतरी हुई है। यह पिछले वित्त वर्ष-25 के 9.7% की नॉमिनल जीडीपी ग्रोथ से कम है। भविष्य का अनुमान: वित्त वर्ष-27 में 6.6% रह सकती है ग्रोथ भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के जारी अनुमानों के मुताबिक, अगले वित्त वर्ष यानी 2026-27 में आर्थिक विकास की यह रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ सकती है। रिजर्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि अगले साल देश की ग्रोथ रेट 110 बेसिस पॉइंट्स यानी 1.10% घटकर 6.6% पर आ सकती है। RBI ने GDP ग्रोथ का अनुमान घटाया भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश की जीडीपी दर में कमी का अनुमान जताया है. आरबीआई के मुताबिक, मौजूदा फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के दौरान भारत की रियल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.6 फीसदी रहने का अनुमान है. पहले आरबीआई ने रियल जीडीपी ग्रोथ रेट 6.9 फीसदी का अनुमान जारी किया था।  नए बेस ईयर 2022-23 के साथ जारी हुआ डेटा सांख्यिकी मंत्रालय ने वित्त वर्ष 2025-26 के पूरे साल के जीडीपी आंकड़ों को एक नए बदलाव के साथ पेश किया है। इस बार पूरे साल के डेटा को नए बेस ईयर 2022-23 के पैमाने पर कैलकुलेट करके जारी किया गया है। नौकरों, ड्राइवर और ई-वाहन डेटा भी शामिल किया GDP की नई सीरीज में 2022-23 को बेस ईयर बनाया गया है। आर्थिक अनुमानों को ज्यादा सटीक बनाने के लिए इसमें अब जीएसटी नेटवर्क, ई-वाहन डेटाबेस और घरों में काम करने वाले कुक, ड्राइवर और घरेलू नौकरों की सेवाओं से जुड़ा डेटा भी शामिल किया गया है। आमतौर पर हर 5 साल में बदला जाता है बेस-ईयर समय के साथ अर्थव्यवस्था में आने वाले बड़े बदलावों को दर्ज करने के लिए समय-समय पर बेस ईयर बदला जाता है। आमतौर पर मंत्रालय हर पांच साल में डेटा सीरीज को अपडेट करता है, लेकिन कोविड महामारी और जीएसटी लागू होने की वजह से इस काम में देरी हुई। 1950 तक के नए आंकड़े दिसंबर 2026 तक आएंगे सरकार सिर्फ नए आंकड़े ही नहीं जारी करेगी, बल्कि पुराने आंकड़ों को भी नए बेस ईयर के हिसाब से दोबारा कैलकुलेट करेगी। मंत्रालय ने संकेत दिया है कि इस नए फ्रेमवर्क के तहत 'बैक-सीरीज' डेटा (1950-51 तक के आंकड़े) दिसंबर 2026 तक आने की उम्मीद है। नए माप से सटीकता बढ़ेगी; हर 5 से 10 साल में मानक बदलना चाहिए आखिर जीडीपी मापने का तरीका क्यों बदला गया? 2011-12 वाला पैमाना 14 साल पुराना हो गया था। तब यूपीआई, जोमैटो, ओटीटी, गिग … Read more

वैश्विक संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत: Morgan Stanley ने जताया भरोसा

नई दिल्ली मिडिल ईस्ट टेंशन के बावजूद मॉर्गन स्टैनली ने भारत की FY27 (वित्त वर्ष 2026-27) के लिए जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 6.7 प्रतिशत कर दिया है. यह आंकड़ा अप्रैल में दिए गए 6.2 प्रतिशत के पूर्वानुमान से ऊपर है. जियो पॉलिटिकल टेंशन के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी रहने की उम्मीद है।  पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, एनालिस्ट ने जानकारी दी है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में जहाजों की आवाजाही थमने के कारण तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है. लेकिन मॉर्गन स्टैनली का मानना है कि FY27 में भारत 6.7 प्रतिशत की दर से बढ़ेगा. FY28 में यह ग्रोथ 7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।  अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा तेल की कीमतें जून 2026 तिमाही में सबसे हाई लेवल पर पहुंचने के बाद कम होने की उम्मीद है. शुरुआती तिमाही में विकास थोड़ा धीमा पड़ सकता है, लेकिन बाद में सुधार होगा. घरेलू मांग, निवेश और नीतिगत सहायता से अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा. मॉर्गन स्टैनली ने चेतावनी भी दी है कि अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो विकास पर और ज्यादा दबाव पड़ सकता है।  ब्याज दरों बदलाव होने की संभावना कम मॉर्गन स्टैनली का अनुमान है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) इस वित्त वर्ष में ब्याज दरों को स्थिर रखेगा. RBI नीतिगत दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रख सकता है और जरूरत पड़ने पर कुछ अन्य फैसले भी ले सकता है।  रिपोर्ट के मुताबिक, महंगाई पर कंट्रोल रखने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए RBI सतर्क रहेगा. मिडिल ईस्ट संकट से ऊर्जा कीमतों में उछाल आने का खतरा है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है. फिर भी, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू फैक्टर्स से भारत इस चुनौती का सामना कर सकता है।  भारत को मिलेंगी नई संभावनाएं इस संकट के बावजूद भारत की स्थिति अन्य देशों की तुलना में बेहतर है. मॉर्गन स्टैनली के अनुसार, निवेश बढ़कर जीडीपी का 37.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जिससे अगले पांच साल में अतिरिक्त 800 अरब डॉलर का पूंजी निवेश आ सकता है।  यह वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत को नई संभावनाएं देगा. मध्यम अवधि में 6.5 से 7 प्रतिशत की विकास दर बनाए रखना संभव है. सरकार की सुधार नीतियां, इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर और घरेलू खपत इस विकास को और मजबूत बनाएंगी।  आरबीआई ने दी चेतावनी हालांकि, Reserve Bank of India (RBI) के गवर्नर संजय मल्होत्रा किसी भी संभावित आर्थिक झटके से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है और वैश्विक हालात पर लगातार नजर रखे हुए है.  उन्होंने कहा कि आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति के जरिए आर्थिक विकास को बनाए रखने और महंगाई को नियंत्रण में रखने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करेगा।  आरबीआई गवर्नर ने चेतावनी दी कि अगर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और युद्ध लंबे समय तक चलता है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आ सकता है. इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ेगा, जिससे महंगाई और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। 

भारत की अर्थव्यवस्था 2026 तक 6.4% बढ़ेगी, अमेरिकी टैरिफ और टैक्स के बावजूद UN रिपोर्ट में आ रहा है सकारात्मक आकलन

नई दिल्ली  संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक आयोग (ESCAP) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट 'इकोनॉमिक एंड सोशल सर्वे ऑफ एशिया एंड द पैसिफिक 2026' के अनुसार, भारत वैश्विक चुनौतियों के बावजूद दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा. रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था साल 2026 में 6.4 प्रतिशत और साल 2027 में 6.6 प्रतिशत की दर से विकास करेगी।  विकास के मुख्य कारक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत की विकास दर 7.4 प्रतिशत रही थी. इस वृद्धि के पीछे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार, मजबूत घरेलू खपत और वस्तु एवं सेवा कर की दरों में कटौती जैसे प्रमुख कारण रहे. साथ ही, अमेरिकी टैरिफ लागू होने से पहले निर्यात में आई तेजी ने भी इसे समर्थन दिया. रिपोर्ट में सेवा क्षेत्र को भारतीय विकास का मुख्य इंजन बताया गया है।  वैश्विक व्यापार तनाव और चुनौतियां भविष्य के लिए सकारात्मक अनुमानों के बीच रिपोर्ट ने कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी इशारा किया है. अगस्त 2025 में अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बाद, 2025 की दूसरी छमाही में अमेरिका को होने वाले भारतीय निर्यात में 25 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गई।  एक और बड़ी चिंता प्रेषण को लेकर है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रेषण प्राप्तकर्ता देश है, जिसे 2024 में 137 अरब डॉलर मिले थे. हालांकि, जनवरी 2026 से अमेरिका द्वारा सभी प्रेषणों पर लगाए गए 1 प्रतिशत टैक्स के कारण भारत को बड़ा आर्थिक नुकसान होने की आशंका है. भारत में प्रेषण का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा चिकित्सा और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए उपयोग किया जाता है, जिससे मध्यम वर्ग और ग्रामीण परिवारों पर सीधा असर पड़ सकता है।  निवेश और हरित अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश (FDI) के मामले में भारत का प्रदर्शन सराहनीय रहा है. रिपोर्ट के अनुसार, 2025 की पहली तीन तिमाहियों में भारत ने 50 अरब डॉलर का ग्रीनफील्ड एफडीआई आकर्षित किया, जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है।  रिपोर्ट में भारत की 'उत्पादन आधारित प्रोत्साहन' (PLI) योजना की भी प्रशंसा की गई है. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सोलर मॉड्यूल, बैटरी और ग्रीन हाइड्रोजन के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली यह योजना आयात पर निर्भरता कम करने और हरित औद्योगिक विकास के लिए एक बेहतरीन मॉडल है. वर्तमान में वैश्विक स्तर पर 1.66 करोड़ हरित नौकरियों में से भारत की हिस्सेदारी 13 लाख है, जिसे और बढ़ाने की संभावनाएं मौजूद हैं।  कुल मिलाकर, रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि भारत की आर्थिक नींव मजबूत है. हालांकि, मुद्रास्फीति के 2026 में 4.4% और 2027 में 4.3% रहने का अनुमान है. यदि भारत बाहरी व्यापारिक बाधाओं और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं का कुशलतापूर्वक प्रबंधन करता है, तो वह अपनी विकास यात्रा को स्थिर रख सकता है। 

भारत की अर्थव्यवस्था पर विश्वास: FY27 के लिए GDP ग्रोथ अनुमान बढ़कर 6.6%, मॉर्गन स्टेनली से विश्व बैंक तक

नई दिल्ली विश्व बैंक ने भारत की आर्थिक ताकत पर भरोसा जताया है। उसने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत का विकास अनुमान 6.3 फीसदी से बढ़ाकर 6.6 फीसदी कर दिया है। यह संशोधन ऐसे समय हुआ, जब वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भारत सबसे मजबूत स्थान पर है। जहां पूरे क्षेत्र की विकास दर धीमी पड़ रही है, वहीं भारत इस क्षेत्र के लिए स्थिरता और वृद्धि का प्रमुख इंजन बना हुआ है।  रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया की कुल विकास दर 2025 में 7 फीसदी से घटकर 2026 में 6.3 फीसदी रहने का अनुमान है। इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण पश्चिम एशिया संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता है, जिसने आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव डाला है। यदि वैश्विक तनाव बढ़ता है, तो इससे महंगाई में वृद्धि हो सकती है और केंद्रीय बैंकों को सख्त नीतियां अपनानी पड़ सकती हैं। हालांकि, वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितता चिंता का विषय बनी हुई है। खासकर मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव और ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। इससे आम लोगों की खर्च करने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, कच्चे माल की लागत बढ़ने और वैश्विक मांग कमजोर रहने के कारण निवेश की गति भी धीमी पड़ सकती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाजारों में धीमी आर्थिक वृद्धि का असर भारत के निर्यात पर पड़ सकता है। हालांकि, इन बाजारों तक बेहतर पहुंच के बावजूद कुल निर्यात प्रदर्शन पर दबाव रह सकता है। अन्य संस्थानों के अनुमानों से तुलना करें तो भारतीय रिजर्व बैंक ने FY27 के लिए 6.9 प्रतिशत, OECD ने 6.1 प्रतिशत और मूडीज ने 6 प्रतिशत ग्रोथ का अनुमान लगाया है। इस लिहाज से विश्व बैंक का अनुमान संतुलित माना जा रहा है। घरेलू मांग है भारत की ताकत विश्व बैंक के मुताबिक, भारत वैश्विक चुनौतियों के बावजूद मजबूत स्थिति में है। 2025-26 में देश की विकास दर 7.6 फीसदी रहने का अनुमान है, जो इस वित्त वर्ष में घटकर 6.6 फीसदी हो सकती है। मजबूत घरेलू मांग भारत की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने में अहम भूमिका निभा रही है।  मॉर्गन स्टेनली का अनुमान वैश्विक संगठन मॉर्गन स्टेनली ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी में वृद्धि के अनुमान को प्रतिशत 0.30 अंक घटाकर 6.2 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले संगठन ने 6.5 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान लगाया था। मॉर्गन स्टेनली का अनुमान है कि 2026-27 में कच्चे तेल की औसत कीमत 95 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहेगी तथा गैस की उपलब्धता एक अतिरिक्त बाधा होगी। मॉर्गन स्टेनली की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि ईंधन की बढ़ती कीमत और औद्योगिक आपूर्ति में कमी से उत्पादन के संसाधनों की लागत बढ़ रही हैं और चुनिंदा वस्तुओं के उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है। रुपये की कमजोरी के बीच आयातित महंगाई बढ़ रही है। इसके अलावा, रेटिंग एजेंसी इक्रा ने अनुमान लगाया है कि ऊर्जा की ऊंची कीमतों के प्रतिकूल प्रभाव के कारण वित्त वर्ष 2026- 27 में भारत की वृद्धि धीमी होकर 6.5 प्रतिशत रह सकती है। मूडीज रेटिंग्स ने क्या कहा? बीते दिनों मूडीज रेटिंग्स ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर के अनुमान को 6.8 प्रतिशत से घटाकर छह प्रतिशत कर दिया है। रेटिंग एजेंसी ने कहा है कि पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण भारत की वृद्धि की रफ्तार घटेगी और इससे महंगाई का जोखिम भी बढ़ेगा।