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देश में पहली बार 12 उद्यानिकी फसलों को एक साथ मिला GI Tag, किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी

देश में पहली बार एक साथ 12 उद्यानिकी फसलों को म‍िला जी आई टैग वर्ष 2030 तक उदानिकी फसलों का क्षेत्र 30 लाख हेक्टेयर तक बढ़ेगा भोपाल मध्यप्रदेश ने इतिहास बनाते हुए एक साथ 12 उद्यानिकी फसलों के लिए जी आई टैग हासिल करने में सफलता हासिल की है। देश में यह पहली बार हुआ है जब एक साथ इतनी बड़ी संख्या में जीआई टैग मिला है। इनमें गुना का धनिया, नरसिंहपुर बरमान घाट का बेंगन, बैतूल गजरिया आम, खरगौरी की लाल मिर्च, मांडू की खुरसानी इमली, जबलपुर का मटर, सिवनी का सीताफल, मालवी आलू और गराड़ू, नरसिंहपुर गुड, जबलपुर सिंघाड़ा, आलीराजपुर का नूरजहां आम, बुरहानपुर का केला, इंदौरी जीरावन, रतलाम सैलाना बालम ककड़ी और छतरपुर का पान शामिल है इसके अलावा उज्जैन की इमली, आलीराजपुर का अचारी आम, मालवा का सफेद प्याज, झाबुआ का दाल पानिया, मंदसौर का देशी जीरा, बुरहानपुर की जलेबी, अशोक नगर की खिरनी को जी आई टैग दिलवाने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। कृषक कल्याण वर्ष में यह एक बड़ी उपलब्ध‍ि है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसानों के आय को दो गुना बढ़ाने के लिए उनसे उदयानिकी फसलों की खेती से जुड़ने का आव्हान किया है। फिलहाल 28 लाख हेक्टेयर में उदयानिकी फसलों की खेती हो रही है। वर्ष 2030 तक 30 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने की कार्ययोजना बनाई गई है। कुम्भराज धनिया कुम्भराज धनिया गुना जिले में लगभग 60 वर्षों से उगाया जा रहा है। यह किस्म 85-90 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी उपज लगभग 12-15 कुंटल प्रति हेक्टर प्राप्त होती है। इसमें लगभग 0.4 से 0.50 प्रतिशित वाष्पशील तेल है, जिसकी वजह से इसमें बहुत अच्छी खुशबू व मिठास आती है। धनिया गुना जिले से अन्य देशो को निर्यात किया जा रहा है। कुम्भराज धनिया का स्वाद दूसरे धनिया की तुलना में तेज और बेहतर है, इसका चमकीला हरा रंग, उत्तम आकृत्ति और माप तथा शानदार सुगंध है। अकेले गुना में सालाना लगभग 32,000 मीट्रिक टन धनिया का उत्पादन होता है जो पूरे देश के कुल उत्पादन का 20 से 25 प्रतिशत है। बरमान भटे नर्मदा की बालुई मिट्टी में पैदा होने वाले भटे का जायका कुछ अलग ही है। यही कारण है कि बाहर से भी लोग अक्सर अपने माध्यमों से बरमान के भटे को बुलाते है, मंडियों में बरमान के भटे की तलाश रहती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि नर्मदा किनारे कम तापमान होने की वजह से यहां के भटे का स्वाद अलग रहता है। बैतूल का गजर‍िया आम बैतूल जिले में खेड़ला किला, भवरगढ़, सांवलीगढ़, शेरगढ़ और असीरगढ़ किले जो 500 साल से ज्यादा पुराने किलो में आते हैं। जो यह बताते है की बैतूल गोंड राजाओ का केंद्र था। भारत वर्ष का सर्वसुलभ एवं लगभग हर प्रान्त में आसानी से उगाया जा सकने वाला फल आम है। ताजे फल के उपयोग के अतिरिक्त आम के फलों से अनेक परिरक्षित पदार्थ बनाये जाते हैं। कच्चे आम का अचार, अमचूर आदि बनाये जाते जबकि पके आम से स्क्वैश, जूस, शर्बत, जैम, अमावट आदि बनाये जाते हैं। अधिकतर आम के बाग अवैज्ञानिक तरीके से लगाये गये हैं, इनकी उत्पादकता अत्यन्त कम है। खरगोन मिर्च खरगोन जिले की मिर्च सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। जिले में साल दर साल मिर्च की खेती का क्षेत्रफल और उत्पादन बढ़ रहा है। सबसे बड़ी मिर्च मण्डियों में से एक यहाँ खरगोन जिले में सनावद के पास बेदिया में स्थित है। निमाड़ और मालवा क्षेत्र राज्य के सर्वाधिक मिर्च उत्पादक क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों की लाल मिर्च चीन, पाकिस्तान, मलेशिया और सऊदी अरब को निर्यात की जाती है। खुरासानी इमली मांडव की माटी का जादू ऐसा है कि जो भी यहां आया, यहीं का होकर रह गया। अलग-अलग सभ्यताओं के राजवंश हों या भेंर की वनस्पतियां, सभी यहां की मिट्टी के साथ एक हो गए। ऐसा ही एक उदाहरण अफ्रीका के शुष्क राज्य का बाओबाब है। 14 वीं शताब्दी में महमूद खिलजी के शासनकाल के दौरान मांडव लाया गया था और इसका नाम 'बाओबाब से बदलकर खुरासानी इमली कर दिया गया था। इसे एक और नाम मांडवी इमली से भी जाना जाता है। यह पेड़ ऐसा लगता है जैसे किसी ने जड़ों सहित इसको उल्टा लगा दिया हो। ऊपर और तना नीचे, पत्तियाँ केवल वर्षा ऋतु में ही बढ़ती हैं। सीताफल सिवनी जिले में 656 हेक्टेयर क्षेत्र में 6500 मीट्रिक टन से अधिक सीताफल का उत्पादन होता है। सीताफल का वजन 600 से 700 ग्राम होने के कारण इसका नाम जंब सीताफल रखा गया है। अपने विशिष्ट आकार और स्वाद के कारण इसकी प्रदेश और देश में भी अच्छी मांग है। मालवी आलू भारतीय आलू रोग प्रतिरोधकता, आकार, माप, त्वचा, रंग आदि के मामले में अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता को पूरा करता है और आलू का प्रसंस्करण इसे अधिक आर्थिक मूल्य देता है। भारत के भीतर, मध्य प्रदेश राज्य वर्तमान में आलू का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक है। राज्य की हिस्सेदारी 6.68 प्रतिशत थी और 2014-15 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के लिए उत्पादन औसत 3225.95 है। मध्य प्रदेश के कई कृषि जलवायु क्षेत्रों में से, मालवा क्षेत्र मध्य प्रदेश में आलू उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. हरी मटर जबलपुर हरी मटर जबलपुर की एक लोकप्रिय सब्जी और प्रमुख रबी फसल है। ये काफी पौष्टिक भी होते हैं और इनमें उचित मात्रा में प्रोटीन, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं। हरी मटर या "गार्डन मटर", छोटे, गोलाकार बीज हैं जो पाएसम सटाईवम पौधे द्वारा उत्पादित फली से आते हैं। वे सैकड़ों वर्षों से मानव आहार का हिस्सा रहे हैं और दुनिया भर में खाए जाते हैं। फसल अवधि 40-60 दिन है। जिले में वर्ष 2018-19 में हरी मटर की कुल बुआई 31,360 हेक्टेयर क्षेत्र में की गयी है तथा वर्ष 2018-19 का वार्षिक उत्पादन 52,500 टन है। गराडू गराडू (हायस्कोरियालाटा) मालवा क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रमुख फसलों में से एक है। यह रतालू की विभिन्न प्रजातियों में से एक है और स्वतंत्र रूप से खेती की गई है। मालवा में गराडू एकमात्र ऐसा है जिसकी नियमित रूप से खेती की जाती है और खाई जाती है, गराडू की उत्पत्ति का केंद्र लगभग मालवा प्लेटू है और भारत का अन्य भाग भी हो सकता है। गराडू को पर्यंत रतालू के नाम से … Read more

अब मिलेगी वैश्विक पहचान

भोपाल प्रदेश में कृषि कल्याण वर्ष के चलते जब किसानों की समृद्धि पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है मध्य प्रदेश को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। मध्यप्रदेश की चार कृषि उपजों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर एवं छत्रिय धान को जीआई टैग मिल गया है। महाकौशल के किसानों ने प्रसन्नता जाहिर की है। इन कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों की आर्थिक समृद्धि बढ़ाने के लिए संकल्पित है। उनकी आय दोगुनी करने के लिए विशेष कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं। जैविक, प्राकृतिक एवं परंपरागत खेती के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के मार्गदर्शन एवं मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के सहयोग तथा जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रयासों से प्रदेश की चार विशिष्ट कृषि उपजों—सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर एवं छत्रिय धान—को भोगौलिक संकेतक मिलना एक बड़ी उपलब्धि है। अब इन उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी । जीआई टैग मिलने से इन कृषि उपजों को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। उनकी ब्रांड वैल्यू एवं बाजार प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होगी तथा किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ कृषि निर्यात को भी प्रोत्साहन मिलेगा। ये चारों कृषि उपजें प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों से संबंधित हैं। इससे विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र के किसानों को व्यापक लाभ मिलेगा। इन उत्पादों की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होगी, क्षेत्र की पारंपरिक कृषि पद्धतियों एवं जैव-विविधता का संरक्षण होगा तथा कृषि आधारित प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं निर्यात को गति मिलेगी। पूर्व सीहोर शरबती गेहूं एवं रीवा सुन्दरजा आम को जीआई टैग दिलाने में किसान कल्याण विभाग एवं मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह उपलब्धि प्रदेश की कृषि विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्रीऐन्दल सिंह कंसाना ने प्रसन्नता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अन्य उपजों को भी जी आई टैग दिलवाने की पहल की जायेगी। भविष्य में भी प्रदेश की अन्य विशिष्ट कृषि उपजों के जीआई पंजीयन के लिए निरंतर कार्य करते रहेंगे। श्री निशांत वरवड़े, सचिव, किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग ने कहा कि जीआई टैग प्राप्त होने से विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र के किसानों को नए बाजार, बेहतर मूल्य एवं निर्यात के अवसर प्राप्त होंगे। मंडी बोर्ड भविष्य में भी प्रदेश की अन्य विशिष्ट कृषि उपजों के जीआई पंजीयन एवं विपणन संवर्धन के लिए सक्रिय सहयोग प्रदान करता रहेगा।“ , राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के प्रबंध संचालककुमार पुरुषोत्तम ने कहा कि मंडी बोर्ड ऐसे रचनात्मक और किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने वाले कार्यक्रम में सक्रिय सहयोग करता रहेगा। सिताही कुटकी सिताही कुटकी एक कम अवधि (60 दिन) वाली 'लिटिल मिलेट' (छोटी बाजरा) की देशी किस्म है। यह वर्षा-आधारित क्षेत्रों और देर से बुवाई की स्थितियों के लिए उपयुक्त है। यह सूखे की मार, नमी की कमी, और प्रमुख कीटों (शूट फ्लाई), 'ग्रेन स्मट' व 'ब्राउन स्पॉट' जैसी बीमारियों का सामना करने में सक्षम है। इस प्रकार, यह किसानों को एक स्थिर पैदावार दिलाने में मददगार साबित होती है। सिताही कुटकी की मध्यम ऊँचाई और मोटे तने के कारण फसल के गिरने की समस्या नहीं रहती। इसे पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ तथा कमज़ोर मिट्टी वाली स्थितियों में भी उगाया जा सकता है। डिण्डोरी के 'बैगा' तथा 'गोंड' जनजातियों के किसानों के लिए अच्छी आय दे सकती है। डिंडोरी में 'सिताही कुटकी' की खेती की 10,395 हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ोतरी और 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की स्थिर पैदावार से इस क्षेत्र में लोगों की आजीविका, भोजन और पोषण सुरक्षा में मदद मिली है। जनजातीय ज़िलों के लगभग 60,000 आदिवासी किसान—खासकर डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया, बालाघाट और जबलपुर के कुछ हिस्सों के किसान पैदावार बढ़ाकर आर्थिक ले सकते हैं। डिंडोरी के पहाड़ी और मुश्किल इलाकों के 54 गाँवों के किसानों को मुनाफ़ा हुआ है। इन इलाकों में दूसरी रबी फ़सलों की खेती नहीं होती। नागदमन कुटकी नागदमन कुटकी डिंडोरी जिले में उगाई जाने वाली कुटकी की एक विशिष्ट स्थानीय किस्म है। यह अपने औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है। बैंगनी अरहर दरअसल अरहर की विशेष किस्म है। इसमें पौधे या फलियों पर बेंगनी रंग की झलक हेती है। इसमें भरपूर प्रोटीन होता है। रोगों से लड़ने की जबरदस्त क्षमता होती है। अच्छी देखभाल होने पर 15 से 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन हो सकता है।  

अलीगढ़ की ब्रास आर्ट को अंतरराष्ट्रीय पहचान, GI टैग से बढ़ेगा निर्यात और कारीगरों की आमदनी

अलीगढ़ अलीगढ़ की विश्व प्रसिद्ध धातु मूर्तियों को आधिकारिक तौर पर जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिल गया है। इस उपलब्धि के साथ उत्तर प्रदेश ने चार नए जीआई टैग हासिल कर कुल 83 अंकों के साथ देश में पहला स्थान बरकरार रखा है। इसे अलीगढ़ की पारंपरिक शिल्पकला और स्थानीय कारीगरों के लिए बड़ी सफलता माना जा रहा है। अलीगढ़ ब्रास स्टेचू एंड आर्टवेयर सप्लायर एसोसिएशन के अध्यक्ष हनुमंत राम गांधी ने बताया कि उनकी एसोसिएशन ने जीआई मैन ऑफ इंडिया के रूप में विख्यात पद्मश्री डॉ. रजनी कांत के साथ मिलकर इस टैग के लिए आवेदन किया था। चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री की विभिन्न तकनीकी प्रक्रियाओं, परीक्षणों और प्रस्तुतियों के बाद अलीगढ़ की इस कला को यह विशेष मान्यता प्राप्त हुई है। यहां बनी पीतल और अन्य धातुओं की मूर्तियां अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया में बड़े पैमाने पर निर्यात की जाती हैं। वैश्विक बाजारों में भारतीय संस्कृति, देवी-देवताओं और पारंपरिक कलाकृतियों की भारी मांग के कारण इस उद्योग का विदेशी मुद्रा अर्जित करने में बड़ा योगदान है। जीआई टैग मिलने से अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी प्रामाणिकता बढ़ी है, जिससे जालसाजी से सुरक्षा मिलेगी और स्थानीय कारीगरों व निर्यातकों को अपने उत्पादों के बेहतर दाम मिल सकेंगे। संगठन के सचिव कपिल वार्ष्णेय और कोषाध्यक्ष मोहित राठी ने इस उपलब्धि को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत विजन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व से जोड़ते हुए इसे प्रदेश के लिए गौरवपूर्ण बताया। देशभर में बना नया कीर्तिमान इस वित्तीय वर्ष में डॉ. रजनी कांत के तकनीकी सहयोग से देश के कई राज्यों में जीआई टैग की क्रांति आई है। लद्दाख में आठ, झारखंड में आठ, मध्य प्रदेश में 22, और बिहार, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, असम को मिलाकर रिकॉर्ड 84 नए जीआई पंजीकृत हुए हैं, जबकि 215 नए आवेदन विभिन्न चरणों में लंबित हैं।  

प्रदेश के पारंपरिक उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर वैश्विक स्तर तक पहुंचाने के प्रयास जा

भोपाल  एमएसएमई मंत्री  चेतन्य कुमार कश्यप ने उद्यमियों से अपील की है कि वे जीआई टैग का अधिकतम उपयोग कर रतलामी सेव के उत्पाद को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थापित करें। सबका प्रयास हो कि रतलामी सेव के नाम के साथ काम भी विश्व स्तरीय हो।’एक जिला एक उत्पाद यानि ओ डीओ पी’ योजना का मुख्य उद्देश्य जिले के पारंपरिक उत्पादों की ब्रांडिंग और मार्केटिंग कर उन्हें वैश्विक स्तर तक पहुंचाना है।मंत्री  काश्यप रविवार को रतलाम में एक जिला एक उत्पाद समिट 2026 को संबोधित कर रहे थे।समिट में उद्यमियों के अलावा निवेशकों और अधिकारियों ने सहभागिता की। मंत्री  काश्यप ने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार के प्रयासों से रतलाम के सेव, शिवपुरी की जैकेट और मुरैना की गजक जैसे उत्पाद प्रदेश की पहचान बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी द्वारा भी रतलाम के सेव का उल्लेख किया गया है, जिससे इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में उद्योगों को विकसित करने की दिशा में तेजी से कार्य किये जा रहे हैं। वर्तमान में राज्य की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 30-40 प्रतिशत है, जबकि उद्योगों का योगदान करीब 20 प्रतिशत है,जिसे बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। प्रदेश में औद्योगिक संभावनाओं को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय उद्योग सम्मेलनों का आयोजन किया जा रहा है, जिनमें स्थानीय एवं बाहरी निवेशकों को आमंत्रित किया जा रहा है। इन सम्मेलनों के माध्यम से प्रदेश की क्षेत्रीय पहचान को मजबूत कर नए उद्योगों को आकर्षित कर प्रदेश के उद्योगों का बहुमुखी विकास किया जा रहा है। मंत्री  काश्यप ने रतलाम की सेव के व्यवसाय को पहचान दिलाने के लिए किये गये कार्यों एवं रतलामी सेव को विश्व स्तर पर पहचान दिलवाने वाले व्यक्तियों और व्यावसाईयो का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी लघु सूक्ष्म एवं मध्यम उद्यम को देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानते हैं और स्थानीय उद्यमों के विकास के लिए प्राथमिकता देते हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने उद्योगों के विकास को रफ्तार दी है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने स्थानीय उत्पादों को पहचान दिलाने के लिए प्राथमिकता से काम करते हुए उद्यमियों को प्रदेश मे निवेश के लिए अनुकूल वातावरण देने के लिए औद्योगिक नीति को सरल बनाया है। उन्होंने उद्यमियों से अनुरोध किया कि वे जिले में आकर रतलाम सेव के व्यवसाय को आगे बढ़ाने के काम मे सहयोग करें। मध्यप्रदेश सरकार हर कदम पर आपके साथ है। मंत्री  काश्यप ने समिट मे रतलाम सेव को जीआई टेग दिलवाने वाले  शैलेन्द्र गाँधी को सम्मानित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ एमएसएमई मंत्री  चैतन्य काश्यप एवं अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। स्वागत उदबोधन  मनोहर पोरवाल अध्यक्ष रतलामी सेव मंडल ने दिया। आयुक्त एमएसएमई  दिलीप कुमार द्वारा कार्यक्रम में विभागीय पहलों एवं एमएसएमई क्षेत्र के विकास के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम में रतलामी सेव की उत्पत्ति, विकास यात्रा एवं विशिष्टताओं पर डिजिटल प्रस्तुति दी गई। प्रतिभागियों को ऐतिहासिक एवं व्यावसायिक महत्व, मार्केटिंग एवं लॉजिटिक्स से अवगत कराया गया। उत्पादन,गुणवत्ता,खाद्य सुरक्षा मानक और निर्यात अवसर पर चर्चा उत्पादन, शेल्फ लाइफ, निर्यात एवं बीएसएम सत्र मे उत्पादन, गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा मानक, निर्यात अवसर एवं क्रेता-विक्रेता मीटिंग (बीएसएम) के महत्व पर चर्चा की गई। कार्यक्रम के दौरान बी2बी एवं जी2बी मीटिंग्स, वन-टू-वन इंटरैक्शन तथा क्रेता-विक्रेता मीटिंग का आयोजन किया गया, जिससे स्थानीय उद्यमियों को संभावित खरीदारों एवं संस्थागत साझेदारों से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ।  

मध्य प्रदेश में अब तक केवल बालाघाट का ‘चिन्नौर’ धान और रीवा का ‘सुंदरजा’ आम को मिला जीआइ टैग

भोपाल  मध्य प्रदेश के दो पारंपरिक कृषि उत्पादों बालाघाट के चिन्नौर धान और रीवा के सुंदरजा आम को भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग मिल गया है. इससे इन उत्पादों की विशिष्ट पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है. विधानसभा में पूछे गए प्रश्न के लिखित जवाब में कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना ने बताया कि जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के माध्यम से इन दोनों उत्पादों का पंजीयन कराया गया. चिन्नौर धान के लिए 60 किसानों और सुंदरजा आम के लिए 20 किसानों का समिति में पंजीयन किया गया है। ‘किसी भी GI टैग को निरस्त नहीं किया गया’ मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रदेश में किसी भी उत्पाद का जीआई टैग निरस्त नहीं किया गया है. लुवाई धान, टर्री भरी धान और सातिया धान को भी जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया जारी है. वहीं चार अन्य उत्पादों बैंगनी अरहर, नागफनी कुटकी, सिताही कुटकी और महाकौशल क्षेत्रीय धान को जीआई रजिस्ट्री की वेबसाइट पर विज्ञापित किया जा चुका है। बासमती को लेकर कानूनी विवाद मध्यप्रदेश के बासमती चावल को जीआई टैग दिलाने के प्रयास 2008 से जारी हैं. जीआई रजिस्ट्री चेन्नई ने पहले मध्यप्रदेश को बासमती के दायरे में शामिल नहीं किया था. बाद में प्रदेश सरकार की आपत्ति पर संशोधित आवेदन की प्रक्रिया चली. यह मामला मद्रास हाई कोर्ट तक पहुंचा, जहां 27 फरवरी 2020 को याचिका निरस्त कर दी गई थी. हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए मामले में आगे की सुनवाई का रास्ता साफ किया है. प्रदेश सरकार का कहना है कि बासमती को जीआई टैग दिलाने के लिए कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर प्रयास जारी रहेंगे, ताकि किसानों को इसका लाभ मिल सके। क्या होता है जीआइ टैग किसी भी रीजन का जो क्षेत्रीय उत्पाद होता है उससे उस क्षेत्र की पहचान होती है। उस उत्पाद की ख्याति जब देश-दुनिया में फैलती है तो उसे प्रमाणित करने के लिए एक प्रक्रिया होती है जिसे जीआइ टैग यानी जीओ ग्राफिकल इंडीकेटर कहते हैं। जिसे हिंदी में भौगोलिक संकेतक नाम से जाना जाता है। बालाघाट के 60, रीवा के 20 किसान पंजीकृत प्रदेश में उत्पादित बासमती धान के लिए चिन्नौर के लिए वर्ष 2008 से प्रयास किए जा रहे थे। जीआइ टैग प्राप्त बालाघाट चिन्नौर धान उत्पाद के लिए 60 किसानों का समिति में पंजीकरण किया गया है। रीवा सुंदरजा आम के लिए 20 किसानों का समिति में पंजीकरण कराया गया। 

मध्यप्रदेश की अनूठी धरोहर को जीआई टैग की मान्यता

मध्यप्रदेश की विरासत को मिला जीआई टैग भारत की बौद्धिक संपदा अधिकार में शुमार मध्यप्रदेश की सम्पदा खजुराहो स्टोन क्रॉफ्ट, छतरपुर फर्नीचर, बैतूल भरेवा मेटल क्रॉफ्ट, ग्वालियर पत्थर शिल्प और ग्वालियर पेपर मैशे क्रॉफ्ट को मिला जी आई टैग मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मंत्री  काश्यप ने माना आभार और अधिकारियों को दी बधाई  पद्म रजनीकांत ने बताया ऐतिहासिक पल भोपाल  भारत का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश की 5 बहुत ही प्राचीन शिल्प कला को जीआई टैग के द्वारा भारत की बौद्धिक संपदा अधिकार में शुमार होने का गौरव प्राप्त हुआ है। एमएसएमई मंत्री  चैतन्य कुमार काश्यप ने मध्यप्रदेश की विरासत को मिली इस ऐतिहासिक पहचान के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का आभार व्यक्त करते हुए विभागीय अधिकारियों को बधाई दी है। इस उपलब्धि को जीआई मैन ऑफ इंडिया के नाम से प्रख्यात पद्म डॉ. रजनी कांत ने  अत्यंत गर्व का पल बताया है। जीआई रजिस्ट्री चेन्नई के वेबसाइट पर इन उत्पादों के सामने रजिस्टर्ड का स्टेटस आते ही संबंधित शिल्पियों में खुशी की लहर दौड़ गई और मध्यप्रदेश के लिए यह पहल करने वाले सूक्ष्म,लघु,मध्यम उद्यम विभाग सहित अन्य विभागों में भी नई चेतना आ गईं है। लगभग एक वर्ष पूर्व ही इन सभी के लिए जीआई का आवेदन खजुराहो स्टोन क्रॉफ्ट, बैतूल भरेवा मेटल क्रॉफ्ट, ग्वालियर पत्थर शिल्प और ग्वालियर पेपर मैशे के लिए नाबार्ड, मध्यप्रदेश ने और छतरपुर फर्नीचर के लिए सिडबी मध्यप्रदेश ने वित्तीय सहयोग प्रदान किया था। एमएसएमई विभाग मध्यप्रदेश के प्रयास से स्थानीय शिल्पियों की संबंधित संस्थाओं द्वारा यह सभी जीआई एप्लिकेशन पद्म डॉ. रजनीकांत के तकनीकी सहयोग से भेजे गए थे। नवम्बर माह में ही पन्ना डायमंड को जीआई टैग प्राप्त हुआ है और लगभग 25 उत्पादों की जीआई मिलने की प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है।