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गोपाल भार्गव का बयान: दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस में आने का दिया था ऑफर, 20 साल मन बांधा

भोपाल/सागर  मध्य प्रदेश की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और संगठनात्मक सम्मान को लेकर चल रही बहस एक बार फिर तेज हो गई है. इसकी वजह बने हैं भाजपा के कद्दावर नेता और रहली विधायक गोपाल भार्गव, जिनका सार्वजनिक मंच से दिया गया बयान सियासी हलकों में दूर तक गूंज रहा है. सागर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान गोपाल भार्गव ने न सिर्फ अपने लंबे राजनीतिक संघर्ष का जिक्र किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि राजनीति में उपेक्षा किसी भी नेता को भीतर से तोड़ सकती है. उनके शब्दों में दर्द भी था और अनुभव की गंभीरता भी. जिस तरह उन्होंने अपने जीवन के तीन दशक से अधिक समय को पार्टी और संगठन को समर्पित करने की बात कही, उसने यह संकेत दिया कि मामला सिर्फ व्यक्तिगत असंतोष का नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर वरिष्ठ नेताओं की भूमिका और सम्मान से जुड़ा बड़ा सवाल है. गोपाल भार्गव बोले-मैं टिकाऊं, बिकाऊं नहीं  गोपाल भार्गव ने कहा 'राजनीति में उपेक्षा किसी भी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देती है, कई बार सरकार में बात नहीं सुनी जाती तो भी मन टूट जाता है. उन्होंने कांग्रेस के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने तो 20 साल संघर्ष किया है, अपनी मांगे रखता रहा, जूझता रहा. लेकिन जब सरकार नहीं मानती तो मन टूट जाता है. मैंने 20 साल मन को बांधे रखा, उस दौरान कई मंत्री यहां तक पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कहते थे कि गोपालजी बीजेपी में क्या रखा है, कुछ नहीं है, आप तो हमारे पास आ जाओ, मैं आपको किसी अच्छे विभाग का मंत्री बना दूंगा, लेकिन तब मैंने भी कहा दिया था कि  राजा साहब एक बात कहता हूं, ये माल टिकाऊ है बिकाऊ नहीं है. मैं 20 साल विपक्ष में रहा, लेकिन यहां तो लोग 20 महीने में पलटी मार जाते हैं.  9 बार के अपराजेय विधायक गोपाल भार्गव का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मोहन यादव सरकार की कैबिनेट को लेकर पहले से ही राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं. वरिष्ठ होने के बावजूद मंत्री पद न मिलना और संगठनात्मक फैसलों में कथित अनदेखी, इन सभी बातों ने उनके शब्दों को और अधिक अर्थपूर्ण बना दिया है. जब उन्होंने कहा कि उन्होंने 20 साल तक कठिन परिस्थितियों में खुद को टिकाए रखा, जबकि आज के दौर में लोग 20 महीने भी नहीं टिक पाते, तो यह सिर्फ आत्मकथा नहीं थी, बल्कि वर्तमान राजनीतिक संस्कृति पर सीधा कटाक्ष था. यही वजह है कि उनका “मैं टिकाऊ हूं, बिकाऊ नहीं” वाला बयान अब सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति में वैचारिक निष्ठा बनाम अवसरवाद की बहस का प्रतीक बन गया है. राजनीति में उपेक्षा का दर्द, अनुभव और योगदान की अनदेखी से गहरी हुई पीड़ा  कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गोपाल भार्गव ने साफ शब्दों में कहा कि जब किसी जनप्रतिनिधि की बात सरकार या संगठन नहीं सुनता, तो उसका मनोबल टूटता है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि उपेक्षा किसी को भी भीतर से कमजोर कर सकती है. यह बयान उस मानसिक स्थिति को दर्शाता है, जिससे अक्सर लंबे समय तक सेवा देने वाले वरिष्ठ नेता गुजरते हैं. राजनीति में पद और प्रभाव भले बदलते रहते हों, लेकिन अनुभव और योगदान की अनदेखी गहरी पीड़ा पैदा करती है. भार्गव के शब्दों में यही पीड़ा झलकती है. “मैं टिकाऊ हूं, बिकाऊ नहीं” का सियासी संदेश गोपाल भार्गव के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा तब सामने आया, जब उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के कांग्रेस में शामिल होने के प्रस्ताव का जिक्र किया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि वे बिकाऊ नहीं हैं. यह टिप्पणी सिर्फ एक घटना का जिक्र नहीं थी, बल्कि उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक ईमानदारी का सार्वजनिक ऐलान भी थी. भाजपा के भीतर इसे निष्ठा का प्रतीक माना जा रहा है, वहीं विपक्ष इसे संगठन के अंदर असंतोष की स्वीकारोक्ति के रूप में देख रहा है. पूरा जीवन पार्टी को समर्पित कर दिया, अपेक्षित सम्मान नहीं  गोपाल भार्गव ने यह भी कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन पार्टी को समर्पित कर दिया है. उन्होंने कई बार चुनाव जीते, संगठन को मजबूत किया और सरकार में रहते हुए अहम विभागों की जिम्मेदारी निभाई. इसके बावजूद जब अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता, तो पीड़ा स्वाभाविक है. उनका यह बयान भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं की आवाज बनता दिख रहा है, जो खुद को हाशिए पर महसूस कर रहे हैं. भाजपा में वरिष्ठता और अनुभव का सवाल गोपाल भार्गव का राजनीतिक सफर लंबा और प्रभावशाली रहा है. वे रहली विधानसभा से लगातार विधायक चुने गए हैं और कई महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रह चुके हैं. संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर उनका अनुभव उन्हें भाजपा के मजबूत स्तंभों में शामिल करता है. जनता ने मेरा साथ दिया  गोपाल भार्गव ने कहा 'हमने उस दौरान बहुत कोशिश की है, जब हमारी सरकार आएंगी तो हमने अपने क्षेत्र का विकास करवाएंगे, इस दौरान जनता ने भी मेरा पूरा साथ दिया है, आज जनता के साथ होने से ही क्षेत्र में विकास कार्य किए जा रहे हैं.' गोपाल भार्गव का यह बयान अहम माना जा रहा है, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि एक तरह से उन्होंने न केवल अपनी पीड़ा जाहिर की है, साथ ही यह भी बताया है कि वह पार्टी के प्रति हमेशा वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक ईमानदारी से काम करते रहे हैं.  गोपाल भार्गव रिकॉर्ड 9वीं बार विधायक  गोपाल भार्गव वर्तमान में मध्य प्रदेश विधानसभा में सबसे सीनियर विधायक हैं, वह सागर जिले की रहली विधानसभा सीट से लगातार 9वीं बार 2023 में विधायक चुने गए थे. वह 2003 से 2013 तक लगातार अलग-अलग विभागों के मंत्री रहे, जबकि 15 महीने की कमलनाथ सरकार के दौरान वह विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे हैं, इसके अलावा 2023 तक वह फिर से मंत्री रहे हैं, लेकिन नई सरकार में उन्हें जिम्मेदारी नहीं मिली है. बीजेपी में गोपाल भार्गव के प्रशासनिक अनुभव और संगठनात्मक पकड़ को अहम माना जाता है. ऐसे में उनका यह बयान फिलहाल चर्चा में बना हुआ है.   मोहन कैबिनेट से बाहर रहने की पीड़ा मुख्यमंत्री मोहन यादव की वर्तमान कैबिनेट में गोपाल भार्गव को मंत्री पद नहीं मिला. इसके बाद से ही उनके … Read more

गोपाल भर्गव का अनोखा कदम: भोपाल में मरीजों के लिए बनाया सरकारी बंगला, परिवार के लिए नहीं

 भोपाल मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री और रहली सीट से बीजेपी विधायक गोपाल भार्गव ने अपने भोपाल स्थित सरकारी बंगले को पूरी तरह से मरीजों और उनके परिजनों के लिए समर्पित कर दिया है. पिछले 23 साल से जारी यह मिशन अब और आधुनिक और सुविधायुक्त हो गया है. भार्गव की पुत्रवधु शिल्पी भार्गव ने इस आवास में एक अनोखा बदलाव किया है. उन्होंने दिल की बीमारियों से जूझ रहे बच्चों के लिए एक खास किड्स गेस्ट रूम डिजाइन करवाया है, जो प्ले स्कूल की तरह दिखता है. यही नहीं, दीवारों पर कार्टून पेंटिंग्स, खिलौने और झूले लगाए गए हैं ताकि गंभीर बीमारी के बीच भी बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रहे.  गोपाल जी की रसोई' और रुकने का इंतजाम फ्री  बंगले में मरीजों के लिए सिर्फ छत ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक भोजन की भी व्यवस्था है. बंगले के बड़े हिस्से में 70 नए बेड, फ्रेश चादर, तकिया और कंबलों का इंतजाम भी है. इसके अलावा, यहां रुकने वाले मरीज और उनके परिजनों के लिए 'गोपाल जी की रसोई' भी बनाई गई है. इसमें मटर पनीर, मलाई कोफ्ता से लेकर दलिया और खिचड़ी तक, घर जैसा पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन दिया जाता है. ठहरने से लेकर नाश्ता और दोनों समय का भोजन पूरी तरह मुफ्त है.  बच्चों के लिए प्ले स्कूल की तरह बनाया गेस्ट रूम गोपाल भार्गव की पुत्रवधु शिल्पी भार्गव ने बीमार बच्चों विशेषकर जिन्हें दिल से जुड़ी बीमारियां हैं उनके ठहरने के लिए एक खास गेस्ट रूम प्ले स्कूल की तर्ज पर तैयार कराया है। इस किड्स गेस्ट रूम में बच्चों के लिए झूला, खिलौने से लेकर बच्चों के लिए स्पेशल बेड की व्यवस्था की है। बीमार बच्चों का मूड ठीक रखने के लिए दीवारों पर कार्टून और आकर्षक पेंटिंग्स बनवाई हैं। मरीजों के लिए 50 बिस्तर गोपाल भार्गव के बंगले में बीमार मरीजों के लिए 50 बिस्तरों के तीन हॉल रेनोवेट कराए गए हैं। इस बंगले में मरीजों के रुकने से लेकर आने-जाने के लिए एम्बुलेंस, भोजन और राजधानी के अस्पतालों में इलाज कराने के लिए कर्मचारी मौजूद रहते हैं। मरीजों के लिए खास मेन्यू भार्गव के बंगले में इलाज के पहले और बाद में रुकने वाले मरीजों के लिए सुबह नाश्ते, चाय के साथ दो टाइम फ्री भोजन की व्यवस्था है। इसे गोपाल जी की रसोई नाम दिया है। इस किचन में अलग-अलग दिनों में मरीजों के लिए मलाई कोफ्ता, मटर पनीर, पालक पनीर, शाही पनीर, बैगन भर्ता, बैगन मसाला, सेव टमाटर, आलू टमाटर, आलू पालक, भिंडी, आलू मैथी की भाजी, कढ़ी-पकौड़ा, बूंदी रायता, दाल तड़का, दाल फ्राइ, दाल मखनी, मूंग दाल, दलिया, जीरा राइस, हलवा, खिचड़ी, गरम रोटियों के साथ अचार, पापड़, चटनी और सलाद परोसा जाता है। हर रविवार को तीन एम्बुलेंस से भोपाल पहुंचते हैं मरीज गोपाल भार्गव के गृह नगर गढ़ाकोटा स्थित निज निवास गणनायक से तीन एम्बुलेंस हर रविवार को भोपाल के लिए मरीजों को लेकर रवाना होती हैं। जिन मरीजों को भोपाल में इलाज के लिए आना होता है वे गढ़ाकोटा आवास पर रजिस्ट्रेशन कराते हैं। रविवार सुबह 10 बजे तक गढ़ाकोटा पहुंचने के बाद मरीजों को एम्बुलेंस से भोपाल रवाना कर दिया जाता है। भोपाल में भार्गव के बंगले पर पहुंचते ही कर्मचारी मरीजों का पंजीयन करते हैं। इसमें मरीज का आधार कार्ड, बीमारी की जानकारी लेकर मरीज से इलाज के लिए अस्पताल का नाम पूछते हैं। फिर जांचें कराकर इलाज के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों में भर्ती करा दिया जाता है। आने-जाने, रुकने-खाने और इलाज सब फ्री गोपाल भार्गव के क्षेत्र के मरीजों को गढ़ाकोटा, रहली से भोपाल तक आने-जाने की व्यवस्था फ्री है। भोपाल में रुकने और भोजन भी निशुल्क है। इलाज की व्यवस्था आयुष्मान कार्ड या मुख्यमंत्री सहायता से कराई जाती है यदि इन माध्यमों से भी इलाज में मदद नहीं मिल पाई तो गोपाल भार्गव अपने निजी फंड से इलाज की व्यवस्था करते हैं। 'फ्री एंबुलेंस' की सुविधा   हर रविवार सुबह 11 बजे गढ़ाकोटा (सागर जिला) स्थित 'गणनायक' निवास से एंबुलेंस मरीजों को लेकर करीब 250 किमी का सफर कर भोपाल आती है. भोपाल में मरीजों को अस्पताल ले जाने और वापस लाने के लिए निजी वाहन और एंबुलेंस 24 घंटे तैनात रहते हैं. बंगले पर प्राथमिक इलाज, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर और इमरजेंसी के लिए सेवक मौजूद रहते हैं.  निजी खर्च और आयुष्मान का साथ गोपाल भार्गव के अनुसार, सरकारी बंगले का ढांचा भले ही सरकारी हो, लेकिन अंदर की तमाम व्यवस्थाएं, बिस्तर, एंबुलेंस का ईंधन और भोजन का खर्च वह खुद के निजी फंड से वहन करते हैं. पहले आयुष्मान कार्ड या मुख्यमंत्री सहायता निधि से मदद ली जाती है, अगर वहां से संभव न हो तो भार्गव स्वयं इलाज का खर्च उठाते हैं. भार्गव ने बताया कि दुर्भाग्यवश यदि किसी मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक उनके गृह ग्राम तक पहुंचाने के लिए विशेष वाहन की व्यवस्था भी निशुल्क है.  विधायक गोपाल भार्गव ने बताया कि यह मिशन 2004 से निरंतर जारी है. अब तक तकरीबन 30 हजार गरीब मरीज इस व्यवस्था का लाभ उठा चुके हैं. उनका मानना है कि यह सब इंतजाम इसलिए किए जा रहे हैं ताकि कोई भी व्यक्ति धन के अभाव में इलाज से वंचित न रहे और न ही इलाज के बोझ तले कर्जदार बने.