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सेवानिवृत्ति पर न्यायाधीश की दो टूक— ‘कर्तव्य के समय मौन भी गुनाह है’

मुंबई बॉम्बे हाईकोर्ट में बुधवार को जस्टिस महेश एस सोनक के लिए आयोजित विदाई समारोह में भावुक माहौल बन गया। जस्टिस सोनक ने इस दौरान वकीलों को संबोधित करते हुए न्यायपालिका पर कई अहम बातें कहीं हैं। फेयरवेल के दौरान जस्टिस सोनक ने कहा कि जब बोलने की जिम्मेदारी हो और तब भी चुप रहा जाए, तो यह अपराध के समान है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी चुप्पी को संस्थान के लिए भूलना और माफ करना बेहद कठिन होता है।   गौरतलब है कि जस्टिस सोनक इस सप्ताह के अंत में झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस का पद संभालने जा रहे हैं। वह झारखंड हाईकोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस तारलोक सिंह चौहान के रिटायर होने के बाद यह जिम्मेदारी संभालेंगे। बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट की प्रिंसिपल सीट के सेंट्रल कोर्टरूम में उनके लिए विदाई समारोह का आयोजन किया गया था। 'बार की चुप्पी को माफ करना बहुत मुश्किल' मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अपने संबोधन में जस्टिस सोनक ने कहा कि जजों को अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए तारीफ की जरूरत नहीं होनी चाहिए। उन्होंने अमेरिकी न्यायविद ओलिवर वेंडेल होम्स का हवाला देते हुए कहा कि अक्सर लोग आलोचना से बचकर तारीफ में डूब जाना पसंद करते हैं, जबकि गलत रास्ते पर जाने वाले जज को सुधारना कहीं ज्यादा जरूरी और अहम होता है। जस्टिस सोनक ने आगे कहा कि इसी जगह पर बार की बड़ी जिम्मेदारी शुरू होती है। उन्होंने दोहराया कि जहां बोलना जरूरी हो, वहां चुप रहना अपराध है। उन्होंने कहा कि संस्थान अपने दुश्मनों के अपमान को तो भूल सकता है, लेकिन अपने असली रक्षक यानी बार की चुप्पी को भूलना और माफ करना बहुत मुश्किल होता है। कौन हैं जस्टिस सोनक? जस्टिस एम एस सोनक बॉम्बे हाईकोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज रहे हैं। उनका जन्म 28 नवंबर 1964 को हुआ था। उन्होंने गोवा के पणजी स्थित एमएस कॉलेज ऑफ लॉ से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद साल 1988 में उन्होंने वकालत शुरू की और बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच में प्रैक्टिस की। इस दौरान उन्होंने सिविल, संवैधानिक, लेबर, सर्विस, पर्यावरण और टैक्स से जुड़े मामलों की पैरवी की। वह राज्य सरकार और वैधानिक निगमों के स्पेशल काउंसल भी रहे। 21 जून 2013 को उन्हें एडिशनल जज नियुक्त किया गया। गोवा बेंच में वरिष्ठ प्रशासनिक जज रहते हुए उन्होंने सार्वजनिक रूप से लिविंग विल रजिस्टर कराई और अंगदान का संकल्प लिया। अहम फैसले पद पर रहते हुए जस्टिस सोनक ने कई अहम फैसले सुनाए। इन फैसलों में पोरवोरिम पुलिस स्टेशन के कांस्टेबलों द्वारा एक वकील पर कथित हमले के मामले में स्वत संज्ञान लेना भी शामिल है। वहीं पिछले साल जुलाई में जस्टिस सोनक की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि मुंबई का विकास जरूरी है, लेकिन यह ऐतिहासिक और विरासत वाली इमारतों की सुरक्षा को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता।

सिर्फ 30 दिन में हाई कोर्ट जज का तबादला, उठ रहे सवाल और चर्चाओं का दौर

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उच्च न्यायालयों के कई जजों के स्थानांतरण की सिफारिश की है। इस बीच सबसे ज्यादा चर्चा दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण मोंगा की है। उन्हें राजस्थान हाई कोर्ट भेजा गया है, जहां से एक महीने पहले ही वह दिल्ली आए थे और 21 जुलाई को शपथ ली थी। ऐसे में इस बात को लेकर चर्चा है कि आखिर एक महीने के अंदर ही ऐसा क्या हो गया कि उच्च न्यायालय के जज को राजस्थान वापस भेज दिया गया। कुल 14 जजों का बुधवार को ट्रांसफर करने की सिफारिश कॉलेजियम की ओर से की गई। चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली कॉलेजियम की मीटिंग 25 और 26 अगस्त को हुई थी। दिल्ली हाई कोर्ट के एक और जज टीवी गंजू का कर्नाटक हाई कोर्ट में हुआ है। इसके अलाला राजस्थान हाई कोर्ट से जस्टिस दिनेश मेहता और जस्टिस अवनीश झिंगन का ट्रांसफर भी दिल्ली उच्च न्यायालय हुआ है। केरल से जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा को भेजा गया है। कॉलेजियम की सिफारिशों पर मुहर लगने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय में जजों की संख्या 45 हो जाएगी। इस उच्च न्यायालय में मंजूर जज के पदों की संख्या 60 है। आमतौर पर पूरा कोरम किसी भी उच्च न्यायालय में कम ही रहता है। खासतौर पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में ऐसा मुश्किल होता है, जहां जज के पदों की मंजूर संख्या 160 है। फिलहाल यहां 84 जज ही हैं। बता दें कि जस्टिस अवनीश झिंगन का ट्रांसफर पहले पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से गुजरात हुआ था। फिर वह राजस्थान लाए गए और अब दिल्ली की तैयारी है। बता दें कि जस्टिस अरुण मोंगा तो मूलत: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के ही जज हैं। उन्हें राजस्थान भेजा गया था और फिर दिल्ली आए तो 21 जुलाई को शपथ ली थी। लेकिन अब एक महीने के अंतराल पर ही वापस राजस्थान हाई कोर्ट भेजने की तैयारी है। अरुण मोंगा ने वकालत की प्रैक्टिस 1991 में शुरू की थी। दिल्ली में करीब 20 साल तक वकालत करने के बाद 2018 में वह हाई कोर्ट के जज बने थे।