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42 साल बाद मिला पेंशन का अधिकार, हाईकोर्ट ने सेना से निकाले गए जवान की विधवा के पक्ष में सुनाया फैसला

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेना से महज सात साल की सेवा के बाद अमान्य होकर बाहर किए गए जवान की विधवा की पेंशन का रास्ता चार दशक से अधिक समय बाद साफ कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर कि सैनिक ने दस साल की न्यूनतम अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी, उसे अमान्य पेंशन के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। मामले में सैनिक की होशियारपुर निवासी विधवा ने करीब 42 साल बाद अपने पति के पेंशन संबंधी अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की थी। मामला ऐसे सैनिक का है, जो 18 अगस्त 1971 को भारतीय सेना में भर्ती हुआ था। वर्ष 1978 में उसे सेना से अमान्य घोषित कर सेवा से बाहर कर दिया गया था। उसे उस समय अमान्य ग्रेच्युटी और मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी का भुगतान किया गया था।  बाद में उसकी विधवा ने अपने पति को मिलने वाले पेंशन लाभ का दावा किया। केंद्र सरकार ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि सैनिक ने दस साल की अर्हकारी सेवा पूरी नहीं की थी। इसके अलावा सरकार ने यह भी आपत्ति उठाई कि विधवा ने पेंशन के लिए करीब 42 साल की देरी से दावा किया। हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए कहा कि कानून की स्थापित स्थिति के अनुसार अमान्य पेंशन के लिए दस साल की सेवा पूरी होना अनिवार्य बाधा नहीं है। अदालत ने मामले में पेंशन अधिकार को केवल देरी के आधार पर खत्म करने के बजाय लागू पेंशन नियमों और पहले से स्थापित न्यायिक सिद्धांतों को महत्व दिया।       

झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC-JSSC CGL अधिसूचना पर रोक रखी बरकरार, अगली सुनवाई 7 अक्टूबर

रांची झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने जेपीएससी और जेएसएससी सीजीएल परीक्षाओं के विज्ञापन को रद्द करने के राज्य सरकार की अधिष्टा को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में प्रार्थियों व राज्य सरकार का पक्ष सुना पक्ष सुनने के बाद अदालत ने अधिसूचना पर रोक को अगले आदेश तक बरकरार रखा. सिर्फ अधिसूचना से नौकरी नहीं छिन सकती: हाईकोर्ट अदालत ने कहा कि सिर्फ एक अधिसूचना से सरकार विभिन्न विभागों में नियुक्त हो चुके अभ्यार्थियों को बिना नेचुरल जस्टिस का पालन किये सेवा से नहीं हटा सकती. अदालत ने एसआईटी जांच के मामले में नोडल अधिकारी बनाया है. वहीं नियुक्त अभ्यर्थियों की किसी तरह की परेशानियों के समाधान की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी रिटायर जस्टिस गौतम कुमार चौधरी को दी गई है. अदालत ने कहा है कि अगर एसआईटी किसी अभ्यर्थी को अनावश्यक परेशान करती है, तो वे जस्टिस गौतम चौधरी के पास अपनी शिकायत कर सकते हैं. मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को 11:30 बजे से होगी. अगली सुनवाई 7 अक्टूबर अदालत ने सभी पक्षों की सहमति से मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तिथि निर्धारित की. राज्य सरकार की ओर से मामले में शपथ पत्र दायर किया गया जिस पर प्रति उत्तर दायर करने के लिए प्रार्थियों की ओर से समय देने का आग्रह किया गया, जिसे अदालत में स्वीकार कर लिया. दोनों पक्षों ने अदालत में रखा अपना पक्ष राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट की वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा व महाधिवक्ता रोहित राय ने पक्ष रखा, जबकि प्रार्थियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पटवालिया, पूर्व महाधिवक्ता राजीव रंजन, अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, अधिवक्ता अमृतांश वत्स एवं अन्य ने पैरवी की. उल्लेखनीय है कि प्रार्थी आकाश गौरव एवं अन्य, निरोज खेस एवं अन्य की ओर से अलग-अलग याचिका दायर कर राज्य सरकार की योजना को चुनौती दी गई है.

झारखंड हाईकोर्ट ने 5.13 एकड़ जमीन के म्यूटेशन पर सुनाया फैसला, अपील मंजूर

 रांची  झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने रांची के नामकुम अंचल स्थित 5.13 एकड़ जमीन के म्यूटेशन से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए एकल पीठ के आदेश को रद कर दिया। खंडपीठ ने रॉबर्ट एंथनी बारला की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए 15 अक्टूबर 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें एकल पीठ ने उपायुक्त, भूमि सुधार उप-समाहर्ता और अंचल अधिकारी के म्यूटेशन के आदेशों को रद कर दिया गया था। खंडपीठ ने निजी प्रतिवादियों को संबंधित जमीन को लेकर लंबित टाइटल सूट में अपना दावा रखने की छूट दी है। मामला रांची के मौजा-गुंडू, थाना-हटिया की खाता संख्या 16 की जमीन से संबंधित है। कुल 26.53 एकड़ जमीन वर्ष 1944 में विरोनिका तिर्की ने रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से खरीदी थी। इसमें से 8.80 एकड़ जमीन रोमन कैथोलिक मिशन को दान कर दी गई। विरोनिका तिर्की की वर्ष 1983 में मृत्यु के बाद उनके चार पुत्रों ने शेष 17.73 एकड़ जमीन का पारिवारिक बंटवारा कर लिया। इसमें 5.13 एकड़ जमीन जॉन फ्रांसिस कुजूर के हिस्से में आई। जॉन फ्रांसिस कुजूर की मृत्यु के बाद वर्ष 1992 में उक्त जमीन का सक्सेशन म्यूटेशन उनकी पत्नी डॉ. लुईसा बारला कुजूर के नाम हुआ। उनके नाम म्यूटेशन को रद कराने के लिए जान के भाइयों ने जमाबंदी केस दायर किया था, जिसे वर्ष 2007 में खारिज कर दिया गया। डॉ. लुईसा बारला कुजूर की मृत्यु के बाद उनके कथित दत्तक पुत्र राबर्ट एंथनी बारला ने जमीन के लिए सक्सेशन म्यूटेशन का आवेदन दिया। नामकुम के अंचल अधिकारी ने 16 जनवरी 2017 को म्यूटेशन उनके नाम कर दिया। इसके खिलाफ अपील और रिवीजन भी खारिज हो गई। निजी प्रतिवादियों की ओर से दायर रिट याचिका पर एकल पीठ ने राजस्व अधिकारियों के तीनों आदेशों को रद कर दिया था। अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि एकल पीठ ने इस तथ्य को गलत समझा कि राबर्ट बारला के पक्ष में म्यूटेशन ट्रांसफर के आधार पर किया गया था। जबकि म्यूटेशन आवेदन और संबंधित दस्तावेजों से स्पष्ट था कि आवेदन सक्सेशन म्यूटेशन के लिए किया गया था। अदालत ने कहा कि म्यूटेशन केस में 16 जनवरी 2017 के आदेश में जमीन को बेचने और सेल डीड का उल्लेख होना टाइपिंग या अनजाने में हुई त्रुटि प्रतीत होती है। राजस्व कर्मचारी की रिपोर्ट में भी राबर्ट बारला को लुईसा बारला कुजूर का एकमात्र कानूनी उत्तराधिकारी और जमीन पर कब्जे में बताया गया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर अंचल अधिकारी ने म्यूटेशन किया था।

सहकारी मिल में अफसर नहीं चला सकता मनमानी, पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने विभागीय कार्रवाई की रद्द

चंडीगढ़  सहकारी संस्थाओं में सरकारी हिस्सेदारी या किसी अधिकारी का पद उसे संस्था के वैधानिक अधिकारों से अधिक शक्ति नहीं देता। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने सोनीपत सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ हुई विभागीय कार्रवाई को रद करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि किसी सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने का अधिकार मिल की अपनी प्रबंधन समिति के पास है। केवल उपयुक्त पद पर बैठे अधिकारी या हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ के प्रबंध निदेशक के पत्र के आधार पर ऐसी कार्रवाई नहीं की जा सकती। मामला सोनीपत सहकारी चीनी मिल के तत्कालीन प्रबंध निदेशक अश्वनी कुमार से जुड़ा है। वह हरियाणा सिविल सेवा के अधिकारी हैं और तीन सितंबर 2019 को उन्हें मिल का प्रबंध निदेशक नियुक्त किया गया था। मिल के विस्तार से जुड़ी एक परियोजना में ठेकेदार को भुगतान किए जाने के बाद तकनीकी सलाहकार ने काम और उपकरणों की आपूर्ति को लेकर आपत्तियां उठाई थीं। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू हुई। अश्वनी कुमार को 13 फरवरी 2023 को आरोपपत्र जारी किया गया। विभागीय जांच पूरी होने के बाद उन पर 25 जुलाई 2025 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति की बड़ी सजा लगा दी गई। आरोप था कि काम में कमियां सामने आने और सक्षम अधिकारियों के निर्देशों के बावजूद उन्होंने ठेकेदार को भुगतान जारी कर दिया, जिससे सहकारी संस्था को आर्थिक नुकसान हुआ। अश्वनी कुमार ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का अधिकार उपयुक्त प्रबंधन समिति के पास था, लेकिन ऐसा कोई प्रस्ताव रिकॉर्ड में नहीं है। हाई कोर्ट ने हरियाणा सहकारी समितियां अधिनियम की धारा 25, 31 और 39 तथा संबंधित उपनियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि सहकारी संस्था की अंतिम सत्ता उसके सदस्यों की सामान्य सभा में निहित होती है और संस्था का संचालन उसके निदेशक मंडल के माध्यम से होता है। प्रबंध निदेशक भी समिति के नियंत्रण और अधीक्षण में काम करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हरियाणा राज्य सहकारी चीनी मिल संघ और सोनीपत सहकारी चीनी मिल दो अलग-अलग सहकारी संस्थाएं हैं। शुगरफेड सदस्य मिलों को सलाह, तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन दे सकता है, लेकिन उसके प्रबंध निदेशक को किसी सदस्य चीनी मिल के प्रबंध निदेशक पर अनुशासनात्मक नियंत्रण हासिल नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उपायुक्त यदि पदेन अध्यक्ष भी हों, तब भी अध्यक्ष का पद उन्हें प्रबंधन समिति की सामूहिक शक्तियां अकेले इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं देता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मिला, जिसमें मिल की प्रबंधन समिति ने भुगतान रोकने या प्रबंध निदेशक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का निर्णय लिया हो। हाई कोर्ट ने माना कि कार्रवाई की पूरी नींव ही अधिकार क्षेत्र की गलती पर आधारित थी। अदालत ने 25 जुलाई 2025 का अनिवार्य सेवानिवृत्ति आदेश और उससे जुड़ी पूरी विभागीय कार्रवाई रद कर दी। अश्वनी कुमार को कानून के अनुसार सभी परिणामी सेवा लाभ देने के भी निर्देश दिए गए। फैसला 20 अगस्त 2026 को सुनाया गया।ो  

हाईकोर्ट का बड़ा आदेश! DGP को सर्कुलर जारी करने के निर्देश, पुलिस अधिकारियों पर की कड़ी टिप्पणी

ग्वालियर मध्य प्रदेश में अपराधियों को कानूनी लूपहोल (कमियों) का फायदा पहुंचाकर कोर्ट से छुड़ाने वाले और अपनी ड्यूटी में घोर लापरवाही बरतने वाले पुलिस अफसरों पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बड़ा और कड़ा प्रहार किया है। हाई कोर्ट की डबल बेंच ने तल्ख लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा है कि "कुछ पुलिस अधिकारी वर्दी तो कानून की पहनते हैं, लेकिन उनका दिल अपराधियों के साथ धड़कता है।" न्यायालय ने साफ कर दिया है कि अगर कोई पुलिस अधिकारी किसी आरोपी को गिरफ्तार करते समय उसकी गिरफ्तारी का लिखित आधार नहीं सौंपता है, तो यह माना जाएगा कि उसने आरोपी को कोर्ट से रिहा कराने के उद्देश्य से 'जानबूझकर' ऐसा किया है। कोर्ट ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को एक महीने के भीतर सभी थाना प्रभारियों और जांच अधिकारियों के लिए 'सख्त चेतावनी सर्कुलर' जारी करने का अल्टीमेटम दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखा रहे मैदानी अफसर हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस मुख्यालय (PHQ) भोपाल की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर नाराजगी जताई। कोर्ट ने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्देशों (मिहिर राजेश शाह मामला) के पालन में पुलिस मुख्यालय भोपाल द्वारा इसी साल 13 फरवरी 2026 को एक सर्कुलर जारी किया जा चुका है। इस सर्कुलर के बावजूद जमीनी स्तर पर थानों में पदस्थ जांच अधिकारी नियमों को सरेआम ठेंगा दिखा रहे हैं और आरोपियों को बिना लिखित कारण बताए गिरफ्तार कर रहे हैं, जिससे शातिर अपराधी तकनीकी आधार पर कोर्ट से बच निकलते हैं। कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति समाज के लिए बेहद खतरनाक है। पुलिस विभाग का काम अपराधियों पर मुकदमा चलाना और निर्दोषों की रक्षा करना है, न कि अपराधियों को कानूनी चोर रास्तों से बचाना। गांजा तस्करी के आरोपी भाई को बचाने लगाई थी याचिका जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने यह तल्ख आदेश धर्मेंद्र लोधी द्वारा दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता धर्मेंद्र ने दतिया जिले के बसई थाने में दर्ज एनडीपीएस (NDPS) एक्ट के एक मामले में अपने भाई की गिरफ्तारी को इस आधार पर चुनौती दी थी कि पुलिस ने उसे गिरफ्तारी के कारण लिखित में नहीं दिए थे, इसलिए उसकी गिरफ्तारी अवैध है। हालांकि, जब कोर्ट ने रिकॉर्ड खंगाला तो पाया कि पुलिस ने आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 का लिखित नोटिस दिया था और उसके पास से 86.850 किलोग्राम गांजा जब्त हुआ था। कोर्ट ने इसे कानूनी रूप से पर्याप्त मानते हुए तस्कर भाई को राहत देने से इनकार कर दिया और याचिका खारिज कर दी, लेकिन पुलिस की इस आम ढर्रे वाली कार्यप्रणाली पर गहरा रोष जताया। हाईकोर्ट के आदेश की मुख्य बातें · नियम: किसी भी आरोपी को कस्टडी में लेते समय उसे उसकी गिरफ्तारी के पुख्ता कारण लिखित में देना अनिवार्य है। · लापरवाही का मतलब: लिखित आधार न देना अब सिर्फ 'लापरवाही' नहीं, बल्कि अपराधी को फायदा पहुंचाने की 'जानबूझकर की गई साजिश' माना जाएगा। · निशाना: वर्दी की आड़ में अपराधियों से साठगांठ करने वाले पुलिसकर्मियों को विभाग से बाहर का रास्ता दिखाया जाए।

HC का बड़ा आदेश, सरकारी संपत्ति की सुरक्षा में कोताही बर्दाश्त नहीं, दोषी अफसरों पर होगा एक्शन

 जबलपुर  हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने सरकारी संपत्ति की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी संपत्ति की रक्षा करना सरकार और उसके अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है। इसमें किसी भी तरह की लापरवाही जनता के विश्वास के साथ विश्वासघात मानी जाएगी। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा में नाकाम रहने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की जानी चाहिए। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर ऐसे अधिकारियों के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज की जा सकती है। वर्षों तक फाइल दबाए रखने वालों को संदेश हाई कोर्ट का यह आदेश सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में लंबे समय तक कार्रवाई नहीं करने वाले अधिकारियों के लिए सख्त संदेश माना जा रहा है। कोर्ट ने कहा कि यदि अधिकारियों की लापरवाही के कारण सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो केवल सरकारी खजाने पर इसका भार नहीं डाला जा सकता। ऐसी स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। कोर्ट ने प्रशासनिक निष्क्रियता को केवल सामान्य चूक नहीं माना, बल्कि इसे जनता की संपत्ति की सुरक्षा के संवैधानिक दायित्व की अनदेखी बताया। बैतूल की 5.5 हेक्टेयर सरकारी जमीन का मामला यह मामला बैतूल जिले के सूरगांव स्थित करीब 5.5 हेक्टेयर सरकारी भूमि के विवाद से जुड़ा है। इस मामले में हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जो वर्ष 2004 के निर्णय के खिलाफ लगभग 12 साल बाद दायर की गई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारियों को मामले की पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद उन्होंने समय रहते आवश्यक कानूनी कदम नहीं उठाए। अदालत ने इसे गंभीर लापरवाही माना। सार्वजनिक संसाधनों की सरकार ट्रस्टी अपने आदेश में हाई कोर्ट ने पब्लिक ट्रस्ट डाक्ट्रिन का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार सार्वजनिक संसाधनों की मालिक नहीं, बल्कि उनकी ट्रस्टी होती है। इसलिए सरकारी जमीन को निजी हाथों में जाने से रोकना अधिकारियों की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण में विफल रहने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो। कलेक्टर से पटवारी तक जांच की अनुमति हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को तत्कालीन कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और पटवारियों के विरुद्ध विभागीय जांच शुरू करने की स्वतंत्रता दी है। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जांच में जिम्मेदारी तय होती है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई भी की जा सकती है।

पेंशन बढ़ाने की मांग पर MP हाईकोर्ट का फैसला, एरियर और अतिरिक्त वेतन वृद्धि देने से किया इनकार

जबलपुर  हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने वेतन पुनरीक्षण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतन पुनरीक्षण के समय कर्मचारियों द्वारा चुना गया विकल्प बाद में बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने अतिरिक्त वेतनवृद्धि के आधार पर पेंशन और एरियर बढ़ाने की मांग को खारिज करते हुए कहा कि स्वेच्छा से संशोधित वेतनमान स्वीकार करने वाला कर्मचारी बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था का लाभ नहीं मांग सकता। पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका निरस्त मामले में पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की ओर से याचिका दायर की गई थी। याचिका में अतिरिक्त इंक्रीमेंट को आधार बनाकर पेंशन के पुनर्निर्धारण और एरियर भुगतान की मांग की गई थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद याचिका को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के नियम-नौ में कर्मचारियों को दो स्पष्ट विकल्प दिए गए हैं। संशोधित वेतनमान स्वीकार करने के बाद पुरानी व्यवस्था का लाभ नहीं युगलपीठ ने कहा कि यदि किसी कर्मचारी ने एक जनवरी, 2006 से संशोधित वेतनमान लागू करने का विकल्प चुना है तो वह बाद में पुरानी वेतन व्यवस्था में अतिरिक्त इंक्रीमेंट जोड़कर पेंशन पुनर्निर्धारण की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नियम कर्मचारियों को स्वतंत्र रूप से विकल्प चुनने का अधिकार देते हैं, लेकिन विकल्प चुनने के बाद उसके परिणामों से पीछे हटने की अनुमति नहीं दी जा सकती। नियम-नौ को कोर्ट ने माना वैध हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के नियम-नौ को वैध ठहराते हुए कहा कि कर्मचारी एक साथ दो वित्तीय लाभ का दावा नहीं कर सकते। इसी आधार पर कोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका को खारिज कर दिया।

High Court Verdict: इस्लाम अपनाने के बाद OBC दर्जा और आरक्षण का लाभ नहीं, कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला

चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में धर्म परिवर्तन और आरक्षण को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के उस आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जाति से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को 'बैकवर्ड क्लास मुस्लिम' का दर्जा और आरक्षण देने की बात कही गई थी। जस्टिस जी आर स्वामीनाथन और जस्टिस पी बी बालाजी की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ एक मुस्लिम होता है। पीठ ने कहा, “कोई भी शख्स इस्लाम अपनाने के बाद सिर्फ 'एक मुसलमान' रह जाता है, बस बात यहीं खत्म। वह बैकवर्ड क्लास मुस्लिम के दर्जे या आरक्षण का दावा कतई नहीं कर सकता।" क्या था मामला? यह मामला थूथुकुडी जिले के रहने वाले समीर अहमद की याचिका के बाद सामने आया। पहले उसका नाम परमशिवम था। परमशिवम का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। 2015 में उसने इस्लाम धर्म अपनाकर अपना नाम समीर अहमद रख लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों से शादी की। धर्म परिवर्तन के बाद समीर ने तहसीलदार के पास 'मुस्लिम लेब्बाई' जाति का कम्युनिटी सर्टिफिकेट पाने के लिए आवेदन किया। इस जाति को तमिलनाडु में 'पिछड़े वर्ग के मुसलमानों' का दर्जा प्राप्त है। तहसीलदार ने समीर का आवेदन खारिज कर दिया था। इसके बाद समीर ने हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु सरकार के 9 मार्च 2024 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें कनवर्टेड मुस्लिमों को आरक्षण देने की बात कही गई थी। तमिलनाडु सरकार ने दलील दी कि कनवर्ट होने वाले व्यक्ति को आरक्षण इसीलिए दिया जा रहा है ताकि वह अपनी पुरानी आरक्षित श्रेणी का लाभ उठा सके। हालांकि हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार की दलील को खारिज कर दिया। क्या बोला मद्रास हाईकोर्ट? कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हालांकि मुस्लिम समाज में भी कई ऐसे समुदाय मौजूद हैं, लेकिन इन समुदायों की सदस्यता केवल जन्म से तय होती है। बेंच ने कहा, “बेझिझक यह कहा जा सकता है कि वे हिंदू धर्म की जातियों के समान हैं। जैसे जाति जन्म से तय होती है, वैसे ही कोई व्यक्ति जन्म से ही राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम होता है। यह कहना बेतुका है कि किसी को राउथर मुस्लिम में बदला जा सकता है।” मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार के इस सरकारी आदेश को संविधान और इस्लाम दोनों के सिद्धांतों के खिलाफ बताया। बेंच ने साल 1951 के 'जी माइकल बनाम एस वेंकटेश्वरन' मामले का हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया था कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपनाता है, तो वह 'सिर्फ एक मुसलमान' बनता है और मुस्लिम समाज में उसका स्थान उसकी पिछली जाति से तय नहीं होता। सिर्फ आरक्षण के लिए नहीं दे सकते लाभ अदालत ने कहा, "ईसाई मिशनरियों और इस्लामिक उपदेशकों ने दशकों और सदियों तक यह प्रचार किया कि उनके धर्मों में सामाजिक समानता है, जबकि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था है। धर्म-परिवर्तन के लिए ऐसा रुख अपनाने के बाद, अब यह दावा करना गलत है कि इस्लाम में भी ऊंच-नीच है। हमारी राय में, कुछ समुदायों को 'पिछड़ा' और बाकी को 'अगड़ा' मानना ​​कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है। इस्लाम एक ऐसा समाज बनाना चाहता है जिसमें सब बराबर हों। अल्लाह की नजर में सब समान हैं। वहां कोई सामाजिक ऊंच-नीच नहीं है।" अदालत ने कहा कि राज्य सरकार सिर्फ इसलिए विभिन्न जातियों के कनवर्टेड मुस्लिमों का एक समूह बनाकर उन्हें आरक्षण नहीं दे सकती कि वे लाभ उठाते रहें।

High Court Verdict: प्रोजेक्ट बंद होने पर संविदा वैज्ञानिक को नहीं मिली राहत, सेवा बहाली की याचिका खारिज

चंडीगढ़ पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पंजाब स्टेट काउंसिल फार साइंस एंड टेक्नोलॉजी में कार्यरत संविदा वैज्ञानिक दिव्या कौशिक को राहत देने से इनकार करते हुए उनकी  अपील   खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिस परियोजना के लिए उनकी नियुक्ति की गई थी, वह 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है और ऐसी स्थिति में संविदा सेवा को जारी रखने का कोई आधार नहीं बनता। जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी की खंडपीठ ने यह फैसला उस अपील पर सुनाया, जिसमें एकल पीठ द्वारा पारित 23 मार्च और 6 अप्रैल 2026 के अंतरिम आदेशों को चुनौती दी गई थी। अदालत ने कहा कि मूल  याचिका अभी भी एकल पीठ के समक्ष लंबित है और अपील केवल अंतरिम आदेशों के खिलाफ दायर की गई है, इसलिए हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं है। 2011 में जॉइन की थी सेवा याचिकाकर्ता दिव्या कौशिक की ओर से कहा गया कि उन्हें वर्ष 2011 में पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर (पीआईसी) में वैज्ञानिक के पद पर संविदा आधार पर नियुक्त किया गया था और समय-समय पर उनका कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा। उन्होंने  याचिका में उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके पद को समाप्त कर दिया गया था। एकल पीठ ने 16 जुलाई 2024 को यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। हालांकि बाद में परिषद की ओर से दायर आवेदन पर एकल पीठ ने 23 मार्च 2026 को आदेश में संशोधन करते हुए कहा था कि यदि परियोजना 31 मार्च 2026 के बाद भी बढ़ाई जाती है तो यथास्थिति का आदेश जारी रहेगा, अन्यथा परिषद उस आदेश से बाध्य नहीं होगी। इस आदेश को वापस लेने की मांग भी 6 अप्रैल 2026 को खारिज कर दी गई थी। 5 वर्षों के लिए थी परियोजना सुनवाई के दौरान परिषद की ओर से अदालत को बताया गया कि 'पेटेंट इनफार्मेशन सेंटर' परियोजना पांच वर्ष की अवधि के लिए थी और यह 31 मार्च 2026 को पूरी हो चुकी है। इसलिए परियोजना के साथ सह-समाप्त (को-टर्मिनस) संविदा नियुक्ति भी स्वत  समाप्त हो गई। परिषद ने यह भी बताया कि नियुक्ति पत्र में स्पष्ट शर्त थी कि परियोजना की अवधि समाप्त होने पर अनुबंध समाप्त माना जाएगा। खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ द्वारा पारित आदेश न तो अवैध हैं और न ही उनमें किसी प्रकार की त्रुटि है। चूंकि परियोजना का विस्तार नहीं हुआ और वह पूर्ण हो चुकी है, इसलिए संविदा कर्मचारी की सेवा जारी रखने का कोई कानूनी आधार नहीं बचता। इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने अपील खारिज कर दी

हाईकोर्ट की टिप्पणी- भरण-पोषण जरूरतमंद के लिए, 14 लाख कमाने वाली पत्नी को नहीं मिलेगा मेंटिनेंस

भोपाल  भोपाल की रहने वाली एक महिला की ओर से पति से अंतरिम भरण-पोषण (मेंटिनेंस) की मांग को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति को भरण-पोषण नहीं दिया जा सकता। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शेक्सपीयर के प्रसिद्ध नाटक ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का जिक्र करते हुए टिप्पणी की कि यह मांग पति से “एक पाउंड मांस” वसूलने के प्रयास जैसी प्रतीत होती है, जिसकी अनुमति न्यायालय नहीं दे सकता। मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने की। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें तलाक संबंधी लंबित प्रकरण के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था। 2022 में हुई थी शादी, 2023 से अलग रह रहे दंपति का विवाह 4 नवंबर 2022 को हुआ था। 2023 से दोनों अलग रह रहे हैं। पति ने फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी, जबकि पत्नी ने अंतरिम भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने 18 फरवरी 2026 को आदेश दिया था कि तलाक प्रकरण लंबित रहने के दौरान महिला को कोई मेंटिनेंस नहीं दिया जाएगा। इसी आदेश को महिला ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पहले 20 लाख, अब 14 लाख सालाना आय का दावा महिला ने अदालत में स्वीकार किया कि वह नौकरी करती हैं। पहले उनकी वार्षिक आय लगभग 20 लाख रुपए थी, जबकि पति की आय 30 लाख रुपए से ज्यादा बताई गई थी। बाद में महिला ने कहा कि उनकी आय घटकर करीब 14 लाख रुपए सालाना रह गई है, इसलिए उन्हें आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने वेतन रिकॉर्ड देखे हाईकोर्ट ने महिला की आय से जुड़े दस्तावेजों की जांच की। रिकॉर्ड के अनुसार महिला की मासिक आय लगभग 1.25 लाख रुपए है, जिससे उनकी वार्षिक आय करीब 14.81 लाख रुपए बनती है। अदालत ने कहा कि यह आय स्वयं का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त है। ऐसे में महिला को आर्थिक रूप से आश्रित नहीं माना जा सकता। कोई संतान नहीं, आय में भी बड़ा अंतर नहीं कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि दंपति की कोई संतान नहीं है। साथ ही पति और पत्नी की आय में इतना बड़ा अंतर भी नहीं है कि आर्थिक निर्भरता का आधार बनाया जा सके। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य आर्थिक रूप से जरूरतमंद या आश्रित जीवनसाथी की सहायता करना है, न कि समान आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति को अतिरिक्त वित्तीय लाभ देना। फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के आदेश को यथावत रखा। अदालत ने अपने फैसले में दोहराया कि मेंटिनेंस का प्रावधान आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी की मदद के लिए है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं पर्याप्त आय अर्जित कर रहा है और अपना खर्च उठाने में सक्षम है, तो उसे भरण-पोषण का लाभ नहीं दिया जा सकता।