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छोटी रकम का बड़ा केस: 19 साल बाद खत्म हुआ 7,299 रुपये का यात्रा भत्ता विवाद

 चंडीगढ महज 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता (टीए) बिल को लेकर शुरू हुआ विवाद 19 वर्ष तक अदालतों में चलता रहा, लेकिन आखिरकार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार की नियमित द्वितीय अपील को खारिज करते हुए इस लंबे कानूनी विवाद पर विराम लगा दिया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब मूल वाद की राशि 25 हजार रुपये से कम हो तो सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) की धारा 102 के तहत नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं होती। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने यह फैसला हरियाणा सरकार और उसके अधिकारियों द्वारा दायर अपील पर सुनाया 7299 यात्रा भत्ता बिलों का नहीं किया भुगतान मामले की शुरुआत उस समय हुई जब रोहतक के ओपी खन्ना ने अपने लंबित टीए बिलों के भुगतान के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया। रिकॉर्ड के अनुसार दिसंबर 1999 से अप्रैल 2002 के बीच विभिन्न सरकारी दौरों से संबंधित 7,299 रुपये के यात्रा भत्ता बिलों का भुगतान नहीं किया गया था। खन्ना ने दावा किया कि बिलों का भुगतान अनुचित रूप से रोका गया है और उन्होंने राशि के साथ ब्याज की भी मांग की। दूसरी ओर हरियाणा सरकार का पक्ष था कि संबंधित टीए बिलों को बजट की अनुपलब्धता तथा स्थानीय यात्रा भत्ता और किलोमीटर संबंधी दावों पर उठाई गई आपत्तियों के कारण रोका गया था। विभाग ने यह भी कहा कि मामले को उद्योग निदेशक, हरियाणा के पास स्पष्टीकरण और मार्गदर्शन के लिए भेजा गया था तथा उठाई गई आपत्तियों की जानकारी कर्मचारी को दे दी गई थी। रोहतक की अदालत में दायर की अपील वर्ष 2006 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन), रोहतक ने ओपी खन्ना का मुकदमा खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने जिला जज, रोहतक की अदालत में अपील दायर की प्रथम अपीलीय अदालत ने 1 फरवरी 2007 को निचली अदालत का फैसला पलटते हुए खन्ना के पक्ष में निर्णय दिया। इसी आदेश को चुनौती देते हुए हरियाणा सरकार ने हाई कोर्ट में नियमित द्वितीय अपील दाखिल कर दी। सरकार की ओर से दलील दी गई कि चूंकि मूल विवादित राशि 10 हजार रुपये से कम थी, इसलिए प्रथम अपील ही सुनवाई योग्य नहीं थी। वहीं न्याय मित्र अंकुर मित्तल ने अदालत को बताया कि सीपीसी की धारा 102 स्पष्ट रूप से कहती है कि 25 हजार रुपये से कम राशि वाले मामलों में दूसरी अपील नहीं की जा सकती। इसलिए सरकार की यह अपील प्रारंभिक स्तर पर ही अस्वीकार्य है। कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी में खर्च की हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा बेहद छोटी रकम के मामलों में वर्षों तक मुकदमेबाजी करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि कई बार सरकारी विभाग विवादित राशि से कई गुना अधिक रकम मुकदमेबाजी पर खर्च कर देते हैं। इससे न केवल सार्वजनिक धन की बर्बादी होती है, बल्कि न्यायालयों का बहुमूल्य समय भी ऐसे मामलों में खर्च होता है। जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि मूल वाद की राशि मात्र 7,299 रुपये थी, जो 25 हजार रुपये की वैधानिक सीमा से काफी कम है। ऐसे में सीपीसी की धारा 102 के स्पष्ट परविधान के कारण नियमित द्वितीय अपील सुनवाई योग्य नहीं है। अदालत ने इसी आधार पर हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट के फैसले से PRTC कर्मचारियों की बढ़ी चिंता, नियमितीकरण पर लगी रोक

चंडीगढ़  पंजाब रोडवेज एवं पीईपीएसयू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) के कच्चे कर्मचारियों को नियमित करने के एकल पीठ के आदेश पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए 31 अगस्त 2026 की तारीख निर्धारित की है और तब तक संबंधित कर्मचारियों की सेवाओं के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। डिवीजन बेंच के समक्ष पीआरटीसी की ओर से अपील में 22 अप्रैल 2026 को पारित उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसमें एकल पीठ ने कर्मचारियों की याचिका स्वीकार करते हुए निगम को छह सप्ताह के भीतर उन्हें नियमित करने का निर्देश दिया था। एकल पीठ ने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि निर्धारित अवधि में आदेश का पालन नहीं किया गया तो संबंधित कर्मचारियों को नियमित माना जाएगा। 21 मई के आदेशों का दिया गया हवाला सुनवाई के दौरान पीआरटीसी की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को बताया कि नियमितीकरण से जुड़ा समान कानूनी प्रश्न पहले से ही एक अन्य मामले में हाई कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है। उन्होंने 21 मई 2026 को पारित एक अंतरिम आदेश का हवाला देते हुए कहा कि पीईपीएसयू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम जसदीप सिंह व अन्य मामले में भी यही मुद्दा लंबित है और उस प्रकरण की सुनवाई 31 अगस्त 2026 को निर्धारित है। दलीलों पर विचार करने के बाद डिवीजन बेंच ने मामले में नोटिस जारी कर दिया और वर्तमान अपील को भी उसी तारीख पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया, जिस दिन समान प्रकृति का दूसरा मामला सुना जाएगा। अदालत ने आदेश दिया कि इस अपील को एलपीए-1410-2026 के साथ सुना जाएगा ताकि नियमितीकरण के मुद्दे पर एक समान दृष्टिकोण अपनाया जा सके। यथास्थिति बनाए रखने के दिए आदेश सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए कहा कि निजी प्रतिवादियों यानी कर्मचारियों की सेवाओं के संबंध में संबंधित विभाग यथास्थिति बनाए रखे। इसका अर्थ यह है कि फिलहाल न तो कर्मचारियों को नियमित किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और न ही उनकी मौजूदा सेवा स्थिति में कोई बदलाव किया जाएगा। फिलहाल अदालत के अंतरिम आदेश से एकल पीठ के नियमितीकरण संबंधी निर्देशों के क्रियान्वयन पर रोक लग गई है और अंतिम निर्णय आने तक स्थिति यथावत बनी रहेगी।

मंदिरों में VIP दर्शन को लेकर हाई कोर्ट के तीखे सवाल, आम श्रद्धालुओं के अधिकार पर चर्चा

चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए बीते  पूछा कि भगवान के सामने तो सभी लोग समान होते हैं तो मंदिरों में VIP दर्शन जैसी व्यवस्था क्यों होनी चाहिए। इसकी वजह से आम श्रद्धालुओं को मंदिर के बाहर इंतजार करना पड़ता है। दरअसल, जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की बेंच मंदिरों में वीआईपी दर्शन और स्पेशल दर्शन व्यवस्था को खत्म करने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई कर रही थी, तब उन्होंने यह टिप्पणी की। 'मंदिर में मंत्रियों की प्रतीक्षा नहीं कर रहे भगवान' सुनवाई के दौरान, मद्रास हाईकोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा, 'मंत्रियों और विधायकों को यह ना समझने दें कि वे किसी भी वक्त मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं और भगवान उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। VIP दर्शन की जरूरत ही क्या है? भगवान के सामने सभी समान हैं।' याचिका में की गई VIP दर्शन को खत्म करने की मांग लाइव लॉ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस याचिका में वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांगजन, मंदिर कला से जुड़े कलाकार, नवविवाहित जोड़े, राज्य के प्रमुख, संवैधानिक पदाधिकारी और गर्भवती महिलाओं को छोड़कर बाकी लोगों के लिए VIP दर्शन और विशेष दर्शन व्यवस्था को खत्म करने की मांग की गई है। सुनवाई के दौरान, मद्रास हाईकोर्ट ने पहले यह भी पूछा था कि क्या 15 मई को किसी मंत्री के दर्शन के लिए तिरुपरंकुंद्रम सुब्रमण्यस्वामी मंदिर के बंद होने का वक्त बढ़ाया गया था। 6 हफ्ते बाद होगी मामले की अगली सुनवाई इस पर एडिशनल एडवोकेट जनरल पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने बेंच को बताया कि मंदिर के बंद होने के वक्त में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इस संबंध में एक रिपोर्ट भी हाईकोर्ट के समक्ष पेश की गई है। फिर, पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने बेंच से जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए वक्त मांगा। मद्रास हाईकोर्ट ने इस अपील को स्वीकार करते हुए केस की अगली सुनवाई 6 हफ्ते के लिए स्थगित कर दी। VHP के पदाधिकारी ने दाखिल की है याचिका जान लें कि यह याचिका, मद्रास हाईकोर्ट में विश्व हिंदू परिषद की उत्तर तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पी. चोक्कलिंगम ने दाखिल की है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 6(15)(b) के अंतर्गत उनकी अर्जी विचार योग्य है। सनातन धर्म नहीं सिखाता भेदभाव पी. चोक्कलिंगम ने अपनी याचिका में कहा कि सनातन धर्म, जाति, आर्थिक संपन्नता या सामाजिक हैसियत के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। उन्होंने तर्क दिया कि सनातन धर्म सभी मनुष्यों को एक बराबर मानने की शिक्षा देता है, इसलिए मंदिरों के अंदर वीआईपी और आम श्रद्धालु या अमीर और गरीब के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए। क्या है पूरा मामला? दरअसल, यह पूरा विवाद हाल ही में विजय सरकार में मंत्री बने आर निर्मल कुमार के दौरे को लेकर है। उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने दर्शन के लिए तिरुपरनकुंड्रम स्थित सुब्रमण्य स्वामी मंदिर को बंद करवा दिया था। इसके बाद जब उन्होंने दर्शन कर लिए उसके बाद मंदिर खोला गया। विपक्ष के इन आरोपों को विजय सरकार ने खारिज किया है। मद्रास हाई कोर्ट में यह मामला विश्व हिंदू परिषद तमिलनाडु ईकाई के नेता पी, चोकलिंगम की याचिका पर शुरू हुआ। उन्होंने दावा किया कि निर्मल कुमार की तरह ही कई बार मंत्री और विधायक मंदिरों में वीआईपी दर्शन के लिए जाते हैं, जिसकी वजह से आम जनता को काफी परेशानी होती है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म में धन, सामाजिक स्थिति या जाति के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है और सभी भक्तों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। हालांकि, चोकलिंगम ने अपनी याचिका में वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, गर्भवती महिलाओं, नवविवाहित जोड़ों, मंदिर में सेवा करने वाले कलाकारों, राष्ट्राध्यक्षों और संवैधानिक अधिकारियों सहित कुछ श्रेणियों के लिए छूट की मांग की।

पुलिस थानों में महिला शौचालय और तय ड्यूटी टाइम की मांग हाई कोर्ट पहुंची, पंजाब-हरियाणा सरकार को नोटिस

चंडीगढ़  पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में पुलिस सुधारों को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई हुई। अदालत ने कहा कि पुलिस सुधारों पर फैसला कोर्ट नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन को लेना चाहिए। हालांकि हाई कोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ प्रशासन को इन मुद्दों पर दो महीने में निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं। इस मामले में दायर याचिका में मांग की गई कि पुलिसकर्मियों से लगातार लंबी ड्यूटी न कराई जाए, थानों में महिलाओं के लिए अलग और साफ शौचालय हों, आरोपितों को मीडिया के सामने परेड न कराया जाए और पुलिस व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल बनाया जाए। चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने हालांकि इन मांगों पर सीधे आदेश जारी करने से इन्कार कर दिया, लेकिन पंजाब, हरियाणा और यूटी चंडीगढ़ के मुख्य सचिवों को इन मुद्दों पर विचार कर फैसला लेने के निर्देश जरूर दे दिए। सरकार को करना होगा फैसला अदालत ने कहा कि ये विषय नीतिगत और प्रशासनिक प्रकृति के हैं, जिन पर फैसला सरकार और सक्षम अधिकारियों को ही करना है।यह जनहित याचिका मोहाली निवासी निकिल सराफ ने दायर की थी। याचिका में कहा गया कि पुलिसकर्मियों, खासकर कांस्टेबलों के लिए पदोन्नति के अवसर बेहद सीमित हैं, जिससे पूरे करियर में ठहराव की स्थिति बन जाती है। मांग रखी गई कि प्रत्येक कांस्टेबल को सेवा के दौरान कम से कम तीन प्रमोशन दिए जाएं। साथ ही पुलिसकर्मियों के लिए बेहतर आवास, पर्याप्त अवकाश, मेडिकल जांच और कठिन ड्यूटी के बदले अतिरिक्त वेतन जैसी सुविधाएं देने की भी मांग उठाई गई। महिलाओं के लिए अलग शौचालय नहीं याचिका में पुलिस थानों और चौकियों की स्थिति को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। कहा गया कि कई जगह महिलाओं के लिए अलग शौचालय तक नहीं हैं। लाकअप की हालत भी मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं है। अदालत से मांग की गई कि थानों में साफ-सुथरे और रोशनी वाले लॉकअप बनाए जाएं तथा पुलिस शिकायत प्राधिकरणों की जानकारी हर थाने में प्रमुखता से प्रदर्शित की जाए। इसके अलावा पुलिस बल के डिजिटलीकरण और संसाधनों के बेहतर उपयोग का मुद्दा भी उठाया गया। याचिका में कहा गया कि वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं की सुरक्षा में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती के कारण आम पुलिसिंग प्रभावित होती है। सोशल ऑडिट करवाने की मांग  इस व्यवस्था का स्वतंत्र सोशल ऑडिट कराने की मांग भी रखी गई।सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि याचिका में उठाए गए कई मुद्दे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में लंबित एक अन्य मामले में विचाराधीन हैं। इसके बाद हाई कोर्ट ने केवल उन बिंदुओं पर सुनवाई की जो वहां लंबित नहीं हैं। अंत में हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को 30 दिन के भीतर हरियाणा, पंजाब व चंडीगढ़ प्रशासन को विस्तृत मांग पत्र देने की छूट देते हुए कहा कि संबंधित सरकार और प्रशासन दो महीने के भीतर उस पर स्पीकिंग ऑर्डर पारित कर निर्णय लें।

ग्रीन फील्ड कॉरिडोर परियोजना को झटका, हाईकोर्ट ने लगाया स्टे; मुआवजे पर नया आदेश

इंदौर/उज्जैन   मध्य प्रदेश में स्थित इंदौर और उज्जैन के बीच बनाए जाने वाले ग्रीन फील्ड कॉरिडोर प्रोजेक्ट को हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। जस्टिस प्रणय वर्मा की कोर्ट ने इसमें जिन किसानों ने मुआवजा नहीं लिया है, उनकी जमीनों का कब्जा लेने पर रोक लगा दी है। साथ ही, जिन किसानों ने मुआवजा ले भी लिया है और वे अपना मुआवजा वापस करते हैं तो उनकी जमीन अधिग्रहण पर भी स्टे लागू कर दिया जाएगा। अभिभाषक पूनम महाजन ने बताया, सरकार ने इंदौर से उज्जैन के बीच सिंहस्थ को लेकर 48.1 किलोमीटर का फोरलेन रास्ता बनाने की योजना बनाई है, जिसे ग्रीन फील्ड कॉरिडोर नाम दिया गया है। पितृ-पर्वत से शुरू होकर ये रास्ता सीधे चिंतामण गणेश मंदिर के पास उज्जैन बायपास तक बनना है। इससे इंदौर-उज्जैन के बीच की दूरी केवल 30 मिनट में ही पूरी होने का दावा किया गया है। इसके तहत इंदौर की हातोद तहसील में आने वाले ग्राम सागवाल की 16.496 हेक्टेयर जमीन भी अधिग्रहित की कार्रवाई शुरू की गई थी, लेकिन अधिग्रहण के खिलाफ नाराज किसानों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप : जारी नोटिफिकेशन में सिर्फ एक्सपर्ट ग्रुप की राय ही दी इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि किसानों की जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई कानूनी रूप से गलत है। जमीन अधिग्रहण के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया गया है, उसमें केवल एक्सपर्ट ग्रुप की राय को ही जारी किया गया है, जबकि नोटिफिकेशन में सामाजिक संग्रहात रिपोर्ट की समरी को नोटिफिकेशन में दिया जाना था। इसके साथ ही अन्य कई कानूनी गड़बडि़यां की गई हैं। सरकार बोली कोई उल्लंघन नहीं किया, किसानों ने मय फोटे के साक्ष्य दिए इस याचिका के दायर होने के बाद राज्य के महाधिवक्ता ने 13 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट में बयान दिया था कि राज्य सरकार भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन कानून के सभी प्रावधानों का पालन करेगी। इसका उल्लंघन करते हुए कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। बावजूद किसानों की जमीनों को अधिग्रहित करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी फोटो सहित जानकारी कोर्ट के समक्ष रखकर मांग की थी कि कोर्ट इस पर स्टे जारी करे अन्यथा किसानों के याचिका दायर करने का कोई अर्थ नहीं रहेगा। महाधिवक्ता बोले- कुछ किसान मुआवजा ले चुके हैं और अन्य भी तैयार महाधिवक्ता ने कोर्ट में कहा कि, याचिका दायर करने वाले किसानों के मामले में जो भी कार्यवाही की जाएगी, वो कानून के मुताबिक ही की जाएगी। साथ ही बताया कि याचिका दायर करने वाले कुछ किसान पहले ही मुआवजा ले चुके हैं और कुछ अन्य भी मुआवजा लेने को तैयार हैं। जो केस लड़ना चाहते हैं उन्हें मुआवजा राशि वापस करनी होगी- कोर्ट कोर्ट ने माना, चूंकि कोर्ट में याचिकाओं पर सुनवाई जारी है और अगर इस बीच जमीनों का कब्जा ले लिया जाता है तो इसकी संभावना ज्यादा है कि, उस स्थिति में याचिकाओं का कोई मतलब नहीं रहेगा। इसके चलते जिन्होंने मुआवजा प्राप्त नहीं किया है, उनकी जमीन की जो स्थिति है उसे वैसे ही रखा जाएगा और जिन्होंने मुआवजा प्राप्त कर लिया है, किंतु जो इस केस को लड़ना चाहते हैं उन्हें मुआवजे की राशि वापस करनी होगी। जिस तारीख से वो पैसा वापस करेंगे, उस तारीख से उनकी जमीन पर स्टे रहेगा। बावजूद कोई यदि मुआवजा लेने का इच्छुक है तो वो ऐसा कर सकता है। उस स्थिति में सरकार तय कानून के हिसाब से आगे की कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र होगी।  

नियमित नियुक्ति की शर्त पर ही संविदाकर्मी की सेवा समाप्ति वैध: हाईकोर्ट

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने संविदा व अस्थायी कर्मचारियों का अनुबंध खत्म होने के बाद उनकी जगह अस्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए क्रेडा द्वारा जारी विज्ञापन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने ऊर्जा सचिव सहित अन्य अफसरों को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने के निर्देश दिए हैं। छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) द्वारा सेवाकर्ता इकाई संविदा भर्ती के लिए नया विज्ञापन जारी किया था, जिसे लेकर सेवाकर्ता इकाइयों द्वारा अधिवक्ता नरेंद्र मेहेर के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच में हुई। याचिका की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने क्रेडा द्वारा जारी विज्ञापन पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सेवाकर्ता इकाई के पद पर वित्तीय वर्ष 2025-2026 के लिए हुई थी, जिनका अनुबंध 31 मार्च 2026 को समाप्त हुआ। अनुबंध समाप्त होने के बाद क्रेडा ने याचिकाकर्ताओ की सेवावृद्धि न करते हुए उनके स्थान पर नया विज्ञापन जारी कर दिया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने पैरवी करते हुए कहा कि किसी भी संविदा अथवा अस्थायी कर्मचारियों को उनकी जगह अन्य अस्थायी कर्मचारी रखने की शर्त पर कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता है। ऐसे कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी नियुक्त किए जाने की स्थिति में ही हटाया जा सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी ने सुप्रीम कोर्ट के न्याय दृष्टांत मनीष गुप्ता विरुद्ध अध्यक्ष जन भागीदारी समिति तथा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के न्यायदृष्टांत मंजू गुप्ता विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन तथा अंकिता नामदेव विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन का हवाला दिया। सीनियर एडवोकेट ने बताया कि पूर्व में भी छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) द्वारा टेक्नीशियन संविदा के पद विज्ञापन जारी किया गया था, जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने जारी किए गए विज्ञापन पर रोक लगा दी थी। याचिका की सुनवाई के बाद कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण (क्रेडा) द्वारा सेवाकर्ता इकाई के पद पर जारी विज्ञापन पर रोक लगा दिया है। कोर्ट ने ऊर्जा विभाग के सचिव, अधीक्षण अभियंता (क्रेडा), कार्यपालन अभियंता जोनल कार्यालय तथा सहायक अभियंता को नोटिस जारी कर जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। 52 कर्मियों ने दायर की है याचिका क्रेडा द्वारा जारी विज्ञापन को चुनौती देते हुए रायपुर जिले के कमलेश कुमार साहू व अन्य नौ, राजनांदगांव जिले के योगेश कुमार साहू व अन्य छह, बेमेतरा जिले से लीलाधर साहू व अन्य छह, खैरागढ़ -गंडई-छईखदान जिले से नरेंद्र कुमार साहू वह अन्य पांच, जयपुर जिले से गणेश कुमार साहू व अन्य 26 ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है।

दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों की याचिका पर हाईकोर्ट ने दी चेतावनी, सुप्रीम कोर्ट आदेश का पालन जरूरी

बिलासपुर  हाईकोर्ट ने गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रशासन को आदेश दिया है कि नियमित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को 15 दिनों के भीतर नियमित पद के अनुरूप वेतन दिया जाए। यह मामला लंबे समय से चल रहे नियमितीकरण विवाद और पूर्व आदेशों के पालन नहीं होने को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं का है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वर्ष 2023 में हाईकोर्ट द्वारा आदेश पारित किए जाने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान सभी लाभ अब तक नहीं दिए हैं। पक्षकारों ने कहा कि 6 मार्च 2023 के आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संबंधित कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी माना जाएगा तथा उनकी सेवाओं का नियमितीकरण 26 अगस्त 2008 से प्रभावी समझा जाएगा। साथ ही उन्हें नियमित कर्मचारियों के बराबर सभी सुविधाएं और लाभ भी दिए जाने थे। हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर निर्देश जानकारी के अनुसार,  सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों को न तो नियमित किया गया है और न ही देयकों का पेमेंट किया गया है। जिसके खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में न्यायालय की अवमानना याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट SLP और रिव्यू पीटीशन खारिज कर चुका जानकारी के अनुसार, सेंट्रल यूनिवर्सिटी की ओर से दायर एसएलपी और रिव्यू पीटीशन सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। फिर भी अब तक नियमित कर्मचारियों की तहर दैनिभो कर्मियों को वेतन नहीं दिया जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि, साल 2023 में पारित आदेश के बावजूद विश्वविद्यालय अब तक कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी के समान पूरा लाभ नहीं दे रहा है। यूनिवर्सिटी ने जबाव में दी सफाई मामले में  यूनिवर्सिटी की ओर से वकील ने कोर्ट को बताया कि कर्मचारियों का नियमितीकरण कर दिया गया है, लेकिन कुछ दस्तावेजों के सत्यापन की प्रोसेस बाकी है। विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि कर्मचारियों से आवश्यक दस्तावेज मांगे गए थे,जो उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे लाभ देने में देरी हो रही है। इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि संबंधित आदेश और पत्राचार कर्मचारियों को उपलब्ध ही नहीं कराया गया था। हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिए दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि 27 अप्रैल 2026 का पत्राचार 12 मई तक सभी याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद कर्मचारियों को एक हफ्ते के भीतर जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे।  हाईकोर्ट ने कहा- 15 दिन में नियमित पद का वेतन दिया जाए सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यूनिवर्सिटी भले नियमितीकरण का दावा कर रही हो, लेकिन अब तक कर्मचारियों को नियमित पद का वेतन नहीं दिया जा रहा है। इस पर विवि की ओर से कहा गया कि दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया 15 दिनों में पूरी कर ली जाएगी और जो कर्मचारी नियमित पद पर कार्यरत हैं, उन्हें नियमित पद के अनुसार वेतन दिया जाएगा। हाईकोर्ट ने इस यूनिवर्सिटी के पक्षकार वकीलों के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि नियमित कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे याचिकाकर्ताओं को 15 दिनों के भीतर नियमित पद का वेतन भुगतान किया जाए। सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा इस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका और पुनर्विचार याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी है। इसके बावजूद कर्मचारियों को पूरा लाभ नहीं मिल पाया। दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से कहा गया कि कर्मचारियों से आवश्यक दस्तावेज मांगे गए थे, लेकिन दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण प्रक्रिया में देरी हुई। इस पर दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि 27 अप्रैल 2026 का पत्र सभी याचिकाकर्ताओं को 12 मई तक उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद कर्मचारी एक सप्ताह के भीतर जरूरी दस्तावेज जमा करेंगे। सुनवाई के दौरान कर्मचारियों ने यह मुद्दा भी उठाया कि विश्वविद्यालय नियमितीकरण का दावा तो कर रहा है, लेकिन उन्हें अब भी नियमित पद के अनुरूप वेतन नहीं दिया जा रहा। इस पर विश्वविद्यालय ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया 15 दिनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी और नियमित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को उसी अनुरूप वेतन दिया जाएगा। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए स्पष्ट कर दिया कि जो कर्मचारी नियमित पदों पर कार्य कर रहे हैं, उन्हें 15 दिनों के भीतर नियमित वेतनमान का लाभ दिया जाना अनिवार्य होगा।

हाईकोर्ट में सुरक्षित फैसला, प्राइमरी शिक्षक भर्ती की नई मेरिट लिस्ट बनेगी

जबलपुर  प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2025 के परीक्षा परिणामों में गड़बड़ी और अपात्र उम्मीदवारों को गलत तरीके से फीसदी बोनस अंक दिए जाने के आरोप लगा है। बीते दिन इस मामले को लेकप मप्र हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस विशाल धगट की सिंगल बेंच ने सभी पक्षों को सुनने के बाद मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। बता दें कि मामले में आरोप है कि बिना आवश्यक आरसीआई (RCI) सर्टिफिकेट के करीब 15 हजार उम्मीदवारों को बोनस अंक दे दिए गए, जिससे पूरी चयन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। यह भर्ती प्रक्रिया कुल 13,089 पदों के लिए आयोजित की गई थी, जिसके बाद जारी की गई मेरिट लिस्ट को अब अदालत में चुनौती दी गई है। ये है पूरा मामला नरसिंहपुर निवासी सोनम अगरैया एवं अन्य दो उम्मीदवारों ने याचिका में कहा कि प्राइमरी स्कूल शिक्षक चयन परीक्षा 2025 भर्ती विज्ञापन के तहत केवल उन उम्मीदवारों को 5 फीसदी बोनस अंक मिलने थे, जिनके पास भारतीय पुनर्वास परिषद से मान्यता प्राप्त विशेष शिक्षा में डिप्लोमा है। चयन सूची में लगभग 14,964 उम्मीदवारों ने खुद को इस श्रेणी में दिखाकर बोनस अंक प्राप्त कर लिए हैं। भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआइ) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कोर्ट को बताया गया कि पूरे प्रदेश में आरसीआइ के पोर्टल पर केवल 2,194 कार्मिक और 3,077 पेशेवर ही पंजीकृत हैं। लगभग 15,000 उम्मीदवारों का विशेष शिक्षा प्रमाणपत्र धारक होना प्रथम दृष्टया फर्जी प्रतीत होता है। याचिका में 27 फरवरी, 2026 को जारी दोषपूर्ण मेरिट लिस्ट को निरस्त करने की मांग की गई। केवल वैध आरसीआई प्रमाण-पत्र धारकों को ही बोनस अंक देकर नई मेरिट सूची जारी करने के निर्देश देने का आग्रह किया गया। संचालनालय को संदेह लोक शिक्षण संचालनालय ने भी जनवरी 2026 में विभाग को आगाह किया था कि लगभग 18,000 उम्मीदवारों ने हां का विकल्प चुना है, जो अत्यधिक प्रतीत होता है। सुधार के लिए पोर्टल खोलने के बाद भी मंडल के द्वारा उम्मीदवारों से आरसीआई की पंजीकरण संख्या या प्रमाणपत्र नहीं मांगा गया। इसके चलते बड़ी संख्या में फर्जी बोनस वाले अभ्यर्थी मेरिट लिस्ट में आ गए। याचिका में 27 फरवरी 2026 को जारी मेरिट लिस्ट को रद्द करने की मांग की गई। भर्ती प्रकिया पर उठे सवाल इस पूरे विवाद नें शिक्षक भर्ती प्रकिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही सरकारी चय प्रणाली पर भी गंभीर सवार खड़े कर दिए गए हैं। हाइकोर्ट ने जो संकेत दिए हैं उससे लगता है कि मेरिट लिस्ट दोबारा से बनानी पडे़गी।

सिवनी हवाला कांड में हाईकोर्ट ने दी राहत, डीएसपी समेत 3 की एफआईआर रद्द, कोर्ट ने कहा- काल डिटेल से अपराध सिद्ध नहीं होता

सिवनी सिवनी हवाला कांड एक बार फिर सुर्खियों में है, जब इस मामले की सुनवाई कर रही हाई कोर्ट ने आरोपियों को बड़ी राहत प्रदान की है। कोर्ट ने डीएसपी पंकज मिश्रा, आरक्षक प्रमोद सोनी और व्यापारी पंजू गिरी गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई के बाद एफआईआर रद्द करने के आदेश जारी किए हैं। हालांकि, इसी केस में आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज कर दी गई है। यह मामला पिछले साल अक्टूबर में सामने आया था, जब पुलिस ने सीलादेही चौक पर महाराष्ट्र के हवाला कारोबारी सोहन लाल परमार की कार से 2.96 करोड़ रुपये की नकदी जब्त की थी। विवाद तब शुरू हुआ जब पुलिस रिकॉर्ड में केवल 1.45 करोड़ रुपये की रकम दर्ज की गई। इस पर आरोप लगे कि रकम की असली मात्रा छुपाई गई। इसके बाद लखनवाड़ा थाना में सिवनी पुलिस की तत्कालीन एसडीओपी पूजा पाण्डेय और डीएसपी पंकज मिश्रा सहित 11 पुलिसकर्मियों के खिलाफ केस दर्ज किया गया। 81 फोन कॉल और व्हाट्सएप चैट थे आधार राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में बताया गया कि घटना के दौरान मिश्रा और पूजा पांडे के बीच 81 बार फोन पर बातचीत हुई थी। साथ ही आरोप लगाया गया कि मिश्रा ने अपने मोबाइल से कुछ अहम व्हाट्सएप चैट और वीडियो हटाए (डिलीट किए), जिससे उनकी भूमिका संदिग्ध बनती है। हाईकोर्ट ने खारिज कर दी FIR? जस्टिस हिमांशु जोशी की सिंगल बेंच ने केस डायरी का विश्लेषण करते हुए पाया कि केवल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) किसी अपराध को साबित करने के लिए काफी नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा कि बातचीत का कोई रिकॉर्ड या ट्रांसक्रिप्ट पेश नहीं किया गया, जिससे साजिश साबित हो सके। पंकज मिश्रा को न पैसा मिला, न नाम आया कोर्ट ने यह भी माना कि मिश्रा के पास से कोई भी रकम बरामद नहीं हुई और न ही किसी गवाह या शिकायतकर्ता ने उनका नाम लिया। साथ ही यह भी कहा गया कि सूचना साझा करना एक पुलिस अधिकारी की ड्यूटी का हिस्सा हो सकता है। SC केस का हवाला देकर FIR और चार्जशीट की रद्द जबलपुर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित भजन लाल केस का हवाला देते हुए कहा कि जब FIR में प्रथमदृष्टया (पहली नजर में) अपराध नहीं बनता, तो ऐसी कार्यवाही जारी रखना न्याय के खिलाफ है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संदेह कितना भी गहरा हो, वह सबूत की जगह नहीं ले सकता। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने DSP पंकज मिश्रा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत दर्ज FIR और चार्जशीट को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही, उन्हें पूरी तरह आरोपों से मुक्त कर दिया है। हाई कोर्ट ने दी तीन आरोपियों को राहत हाई कोर्ट में बुधवार को हुई सुनवाई में तीन आरोपियों के पक्ष में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पैरवी की। कोर्ट ने याचिकाओं को स्वीकार करते हुए एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया। कोर्ट के अनुसार, मामले में कोई ठोस साक्ष्य नहीं हैं जो साजिश या आपसी मिलीभगत साबित करते हों। 2.96 करोड़ जब्त किए रिकॉर्ड में 1.45 करोड़ दिखाए यह मामला 8 अक्टूबर 2025 को सिवनी में सामने आए हवाला कांड से जुड़ा है। उस समय डीएसपी पूजा पाण्डेय के नेतृत्व में पुलिस टीम ने सीलादेही चौक पर महाराष्ट्र के हवाला कारोबारी सोहनलाल परमार की कार से करीब 2.96 करोड़ रुपए नकद जब्त किए थे। आरोप था कि पुलिस टीम ने पूरी रकम जब्त की, लेकिन रिकॉर्ड में सिर्फ 1.45 करोड़ रुपए ही दिखाए गए। मामला सामने आने पर लखनवाड़ा थाना में एसडीओपी पूजा पाण्डेय, डीएसपी पंकज मिश्रा सहित 11 पुलिसकर्मियों पर केस दर्ज किया गया था। साजिश या समझौते का ठोस सबूत नहीं मामले की सुनवाई जस्टिस हिमांशु जोशी की अदालत में हुई। कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपियों के बीच पहले से कोई साजिश या आपसी समझौता था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोप केवल शक और अनुमान पर आधारित हैं। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) मात्र से अपराध सिद्ध नहीं होता। साजिश के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं। ऐसे में मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 310(2), 126(2), 140(3), 61(2) और 238(b) के आवश्यक तत्व इन आरोपियों पर लागू नहीं होते, इसलिए चार्जशीट और सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाती है। नीरज राजपूत को राहत नहीं सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि जिस टीम ने कार रोकी और नकदी बरामद की, उसमें उसकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, इसलिए उसके खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि केवल कॉल रिकॉर्ड या संदेह के आधार पर किसी को आपराधिक मुकदमे में नहीं फंसाया जा सकता। जांच एजेंसियों को गंभीर मामलों में भी ठोस साक्ष्य पेश करना अनिवार्य है। कोर्ट का निर्णय: आरोप आधारहीन और शक पर आधारित हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि मामला केवल अनुमान और संदेह पर आधारित है। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर कोई अपराध सिद्ध नहीं होता। इसका कोई सुनिश्चित सबूत नहीं मिला है कि आरोपितों के बीच मिलीभगत या अपराधिक साजिश रची गई हो। चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही पर रोक कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 310(2), 126(2), 140(3), 61(2) और 238(b) के अनुसार यह माना कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा चलाना कानून का दुरुपयोग होगा। इसलिए चार्जशीट को निरस्त करते हुए आपराधिक कार्यवाही रद्द करने का निर्देश दिया। आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका खारिज हालांकि, आरक्षक नीरज राजपूत की याचिका को कोर्ट ने खारिज किया है। कोर्ट के अनुसार, उसने टीम के साथ कार रोकी और रकम की जब्ती में भूमिका निभाई थी, इसलिए उसके खिलाफ ट्रायल जारी रहेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शक और कॉल रिकॉर्ड के आधार पर किसी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के आपराधिक मुकदमे में नहीं लाया जा सकता। यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण मिसाल है कि अब उन्हें गंभीर मामलों में स्पष्ट और मजबूत साक्ष्य पेश करना होगा।

2646 नर्सिंग ऑफिसर और सिस्टर ट्यूटर पदों पर भर्ती, हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद आवेदन फिर से शुरू

जबलपुर  मध्यप्रदेश में नर्सिंग क्षेत्र के अभ्यर्थियों के लिए एक बार फिर भर्ती प्रक्रिया शुरू हो गई है। नर्सिंग ऑफिसर और सिस्टर ट्यूटर के 2,646 पदों के लिए संयुक्त भर्ती परीक्षा-2026 आयोजित की जा रही है। यह भर्ती लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत होगी, जिसका संचालन मध्यप्रदेश कर्मचारी चयन मंडल (ESB) द्वारा किया जाएगा। खास बात यह है कि इस भर्ती से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश के तहत अभ्यर्थियों को आवेदन करने की अनुमति दी गई है। उम्मीदवारों को आवेदन प्रक्रिया, पात्रता और अन्य शर्तों को ध्यानपूर्वक समझकर ही आवेदन करना होगा। इस भर्ती से संबंधित विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत देते हुए आवेदन करने की अनुमति दी है। इसके तहत पात्र याचिकाकर्ता अभ्यर्थी 29 अप्रैल से 3 मई 2026 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। यह अवसर केवल उन्हीं अभ्यर्थियों के लिए है, जो संबंधित याचिकाओं में शामिल हैं। प्रोविजनल रहेगी अभ्यर्थिता, परिणाम पर रोक उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार इन याचिकाकर्ता अभ्यर्थियों की अभ्यर्थिता पूरी तरह प्रावधिक (प्रोविजनल) रहेगी। इसके साथ ही, उनके परीक्षा परिणाम अंतिम निर्णय आने तक रोके (Withheld) रखे जाएंगे। यानी चयन प्रक्रिया में शामिल होने के बावजूद अंतिम नियुक्ति न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगी। गलत जानकारी देने पर रद्द होगी अभ्यर्थिता आवेदकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आवेदन पत्र में दी गई सभी जानकारी पूरी तरह सही और सत्य हो। किसी भी स्तर पर जानकारी गलत या भ्रामक पाए जाने पर अभ्यर्थिता निरस्त कर दी जाएगी। साथ ही, निर्धारित समय सीमा में आवेदन नहीं करने पर अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल नहीं हो सकेंगे, जिसकी जिम्मेदारी स्वयं उम्मीदवार की होगी। संयुक्त भर्ती में 2,646 पद भरे जाएंगे मध्यप्रदेश में संयुक्त भर्ती में 2,646 पद भरे जाएंगे। नर्सिंग ऑफिसर के 1,256 पद सरकारी अस्पतालों में और 954 पद सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भरे जाएंगे। सिस्टर ट्यूटर के 218 पद भी इसी संयुक्त परीक्षा से भरे जाएंगे। पदों का स्वरूप और सैलरी नर्सिंग ऑफिसर- लेवल-7, वेतनमान 28,700 रुपए। यह पद नियमित और तृतीय श्रेणी सेवा के अंतर्गत आते हैं। सिस्टर ट्यूटर- लेवल-9, वेतनमान 36,200 रुपए। पद नियमित और तृतीय श्रेणी सेवा के अंतर्गत आते हैं। केवल ऑनलाइन होंगे आवेदन संयुक्त परीक्षा के लिए आवेदन केवल ऑनलाइन होंगे। आधार आधारित पंजीयन अनिवार्य है। आवेदन संख्या सुरक्षित रखना जरूरी है। परीक्षा में फोटो आईडी (आधार, पैन, वोटर आईडी आदि) अनिवार्य है। रोजगार कार्यालय में जीवित पंजीयन भी जरूरी है। सामान्य वर्ग को 500 रुपए देने होंगे संयुक्त भर्ती परीक्षा के लिए सामान्य वर्ग को 500 रुपए शुल्क देना होगा। MP के SC/ST/OBC/EWS/दिव्यांग उम्मीदवारों को 250 रुपए फीस देनी होगी। बैकलॉग पद के लिए कोई शुल्क नहीं है। पोर्टल शुल्क 60 रुपए (कियोस्क) और 20 रुपए (स्वयं लॉगिन) तय है। परीक्षा का पैटर्न भर्ती परीक्षा में 100 सवाल होंगे। हर प्रश्न 1 अंक का होगा। समय 2 घंटे मिलेगा। 25 अंक के सवाल सामान्य ज्ञान, हिंदी, अंग्रेजी, गणित और विज्ञान से होंगे। नर्सिंग विषय के 75 अंक के सवाल होंगे। परीक्षा दो शिफ्ट में होगी। पहली शिफ्ट 10 से 12 बजे और दूसरी 3 से 5 बजे होगी। चयन लिखित परीक्षा की मेरिट के आधार पर होगा। सामान्य वर्ग के लिए 50% और आरक्षित वर्ग के लिए 40% न्यूनतम अंक हैं। मेरिट के बाद नियुक्ति विभाग की जरूरत और सत्यापन पर निर्भर होगी।