samacharsecretary.com

High Court Summer Vacation 2026: 18 मई से 12 जून तक न्यायालयों में छुट्टियां घोषित

बिलासपुर. समर वेकेशन को लेकर हाईकोर्ट ने अधिसूचना जारी कर दी है. हाईकोर्ट द्वारा जारी नोटिफिकेशन के अनुसार 18 मई 2026 (सोमवार) से 12 जून 2026 (शुक्रवार) तक ग्रीष्म अवकाश रहेगा. 15 जून 2026 (सोमवार) से हाईकोर्ट फिर नियमित रूप से खुलेगा. अवकाश के दौरान भी जरूरी मामलों की सुनवाई जारी रहेगी. इसके लिए वेकेशन जजों की नियुक्ति की गई है, जो सुबह 10:30 बजे से कोर्ट की कार्रवाई  करेंगे और जरूरत पड़ने पर समय बढ़ाया भी जा सकेगा. अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि समर वेकेशन (Bilaspur High Court) के दौरान सिविल, क्रिमिनल और रिट से जुड़े मामलों की फाइलिंग जारी रहेगी, जबकि जरूरी मामलों के लिए अलग से आवेदन देना होगा. जमानत मामलों में अलग से अर्जेंट हियरिंग आवेदन की जरूरत नहीं होगी और उन्हें स्वतः सूचीबद्ध किया जाएगा. अन्य लंबित मामलों की सुनवाई के लिए अर्जेंट आवेदन अनिवार्य रहेगा. इस दौरान रजिस्ट्री कार्यालय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहेगा, लेकिन शनिवार, रविवार और शासकीय अवकाश में बंद रहेगा. कोर्ट ने यह भी तय किया है कि वेकेशन जज 19, 21, 26 और 28 मई और 2, 4, 9 और 11 जून 2026 को सुनवाई करेंगे. वहीं जो मामले तय समय पर नहीं पहुंच पाएंगे, उन्हें अगली तारीख पर अलग सूची में शामिल किया जाएगा. आदेश मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर रजिस्ट्रार (न्यायिक) सुमित कपूर द्वारा जारी किया गया है.

एमपी में ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट में सुनवाई तेज, पक्ष और विपक्ष की याचिकाएं अलग करने का आदेश

जबलपुर  मध्य प्रदेश में  27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण किए जाने से संबंधित याचिकाओं पर सोमवार से तीन दिनों तक लगातार सुनवाई प्रारंभ हुई। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव कुमार सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ ने ओबीसी आरक्षण के पक्ष तथा विपक्ष में दायर याचिकाओं को अलग-अलग करने के निर्देश जारी किए हैं। याचिकाओं पर मंगलवार को भी सुनवाई जारी है। गौरतलब है कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 27 प्रतिशत किए जाने के पक्ष तथा विपक्ष में हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं। आरक्षण के खिलाफ दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंदिरा साहनी तथा मराठा आरक्षण के संबंध में दायर याचिकाओं में स्पष्ट कहा गया है कि आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। कुछ याचिकाओं में फॉर्मूला 87:13 को चुनौती देते हुए 13 प्रतिशत होल्ड पदों पर आपत्ति की गई थी। पक्ष में दायर की गई याचिकाओं में आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग की गई थी। कोर्ट ने तीन दिनों तक नियमित सुनवाई के निर्देश जारी किए थे हाईकोर्ट ने कुछ याचिकाओं की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने पर रोक लगा दी थी। जिसके बाद प्रदेश सरकार सहित अन्य पक्षकारों ने सर्वोच्च न्यायालय में इसी मुद्दे पर एसएलपी दायर की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी एसएलपी को सुनवाई के लिए वापस हाईकोर्ट भेज दिया था। हाईकोर्ट ने 27 अप्रैल से लगातार तीन दिनों तक नियमित सुनवाई के निर्देश जारी किए थे। वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने युगलपीठ को बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने तीन माह में संबंधित याचिकाओं के निराकरण के निर्देश जारी किए हैं। युगलपीठ को याचिका की सुनवाई के दौरान जानकारी दी गई कि ओबीसी आरक्षण के विपक्ष में 70 तथा पक्ष में 30 याचिकाएं दायर की गई हैं। युगलपीठ ने सुनवाई के बाद तर्क प्रस्तुत करने के लिए पक्ष व विपक्ष में दायर याचिकाओं को अलग-अलग करने के आदेश जारी किए हैं।

एंबुलेंस देरी पर सवाल: हाईकोर्ट में जनहित याचिका, ओला-उबर से हुई तुलना

जबलपुर  हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने प्रदेश से गुजरने वाले राजमार्गों में अवैध कट-प्वाइंट्स को चुनौती के मामले में जवाब-तलब कर लिया है। इस सिलसिले में सड़क परिवहन मंत्रालय के सचिव, एनएचएआई, लोक निर्माण विभाग के एसीएस सहित अन्य को नोटिस जारी किए गए हैं। जनहित याचिकाकर्ता डिंडौरी निवासी सेवानिवृत्त अधिकारी महावीर सिंह ने अपना पक्ष स्वयं रखा। उन्होंने दलील दी कि जब ओला-उबर जैसी गाड़ियां दो मिनट के भीतर पहुंच जाती हैं, तो एंबुलेंस क्यों नहीं पहुंचती है। उन्होंने बताया कि भोपाल-जबलपुर हाईवे में डिवाइडर तोड़कर 300 कट बना लिए हैं, इससे स्पीड कम होती है और दुर्घटनाएं भी बढ़ती हैं। प्रदेश से गुजरने वाले राजमार्गों में अवैध कट-प्वाइंट्स के कारण एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती हैं, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। लिहाजा, जनहित याचिका को बेहद गंभीरता से लिया जाए। कोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब-तलब कर लिया है। जवाब आने के बाद आगे दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।

बेअदबी कानून को लेकर हाईकोर्ट में दायर की गई चुनौती, उम्रकैद और राष्ट्रपति की मंजूरी पर कानूनी सवाल

बेअदबी कानून पर कानूनी विवाद: हाईकोर्ट में चुनौती, उम्रकैद और राष्ट्रपति की मंजूरी पर उठे सवाल बेअदबी कानून को लेकर हाईकोर्ट में दायर की गई चुनौती, उम्रकैद और राष्ट्रपति की मंजूरी पर कानूनी सवाल बेअदबी कानून में उम्रकैद और राष्ट्रपति की मंजूरी पर सवाल, हाईकोर्ट में चुनौती दायर चंडीगढ़  पंजाब सरकार द्वारा लागू किए गए जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम, 2026 को लेकर कानूनी विवाद गहरा गया है। इस कानून को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। जालंधर निवासी सिमरनजीत सिंह ने जनहित याचिका दाखिल कर इसे असांविधानिक घोषित करने और रद्द करने की मांग की है।  याचिका में कहा गया है कि यह कानून संविधान की मूल भावना और स्थापित आपराधिक न्याय प्रणाली के विपरीत है। खासतौर पर इसके दंडात्मक प्रावधानों और प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्तियां जताई गई हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि अधिनियम समवर्ती सूची के विषयों को प्रभावित करता है और मौजूदा आपराधिक कानूनों, विशेषकर भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों से टकराव पैदा करता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 254(2) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है, जबकि इस अधिनियम को केवल राज्यपाल की सहमति से लागू कर दिया गया। इसे गंभीर संवैधानिक त्रुटि बताया गया है। धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को कमजोर करने का आरोप अधिनियम पर धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को कमजोर करने का आरोप भी लगाया गया है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसमें केवल एक धार्मिक ग्रंथ को विशेष सुरक्षा देते हुए कठोर दंड का प्रावधान किया गया है, जबकि अन्य धर्मों के ग्रंथों को शामिल नहीं किया गया, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है। सबसे ज्यादा विवाद अधिनियम की धारा 5(3) को लेकर सामने आया है, जिसमें बेअदबी की साजिश जैसे अपराध के लिए उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान किया गया है। याचिका में इसे अनुपातहीन और मनमाना बताया गया है, क्योंकि इस तरह के अपराध में प्रत्यक्ष हिंसा शामिल नहीं होती। इसके अलावा बेअदबी की परिभाषा को अत्यधिक व्यापक बताते हुए कहा गया है कि इसमें शब्दों, संकेतों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों को शामिल किया गया है, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। याचिका में अधिनियम के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की गई है। दलील दी गई है कि यदि बाद में यह कानून असांविधानिक करार दिया जाता है, तो इसके तहत शुरू हुई आपराधिक कार्यवाहियां नागरिकों को अपूरणीय नुकसान पहुंचा सकती हैं। फिलहाल याचिका हाई कोर्ट की रजिस्ट्री में दाखिल हो चुकी है और जल्द ही इसके सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना है।    

हाईकोर्ट का कड़ा कदम: चंडीगढ़ के जज को आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने पर किया सस्पेंड

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ में तैनात एक जज को उनकी कथित आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने के मामले में सस्पेंड कर दिया है। जज को न सिर्फ सस्पेंड किया गया है, बल्कि उन्हें तुरंत प्रभाव से ट्रांसफर कर हरियाणा भी भेज दिया है। सस्पेंशन के दौरान वह हरियाणा के उसी जिले में रहेंगे। चीफ जस्टिस की ओर से जारी इस आर्डर में कहा गया कि उन्हें पता लगा है कि कुछ दिनों से एक जज की आपत्तिजनक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रही है। इसलिए हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए जज को ही निलंबित कर दिया। खास बात यह है कि यह वही जज हैं, जिनकी आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उनसे डेढ़ करोड़ की रंगदारी मांगी जा रही थी। इस मामले में चंडीगढ़ पुलिस को शिकायत भी दी थी, पुलिस ने रोहतक के एक वकील मोहित वर्मा को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज की। इससे पहले जज ने पुलिस को शिकायत दी थी कि कुछ समय पहले उनका मोबाइल खो गया था, जिसमें उनके परिवार की तस्वीरें, वीडियो और स्क्रीन रिकार्डिंग थीं। जज का कहना था कि आरोपित ने उनकी वीडियो एडिट या मैनिपुलेट कर उसकी छवि खराब करने की कोशिश की है। आरोप था कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी जानकारी के अनुसार 18 फरवरी 2026 को जज को एक अज्ञात नंबर से काल और वाट्सएप पर एक वीडियो मिला। जज का आरोप है कि क्लिप में उनकी आपत्तिजनक वीडियो थी। उनका आरोप था कि उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी। पुलिस ने जांच शुरू कर दी और रोहतक के वकील मोहित वर्मा को 11 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस को उससे दो मोबाइल फोन भी बरामद किए गए थे।

NDPS व भ्रष्टाचार के आरोपी कर्मचारियों पर कार्रवाई करें: हाईकोर्ट का पंजाब सरकार को आदेश

चंडीगढ़. पंजाब सरकार में भ्रष्टाचार और एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर मामलों में फंसे कर्मचारियों और अधिकारियों पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रवैया अपनाया है। चीफ जस्टिस शील नागू व जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए पंजाब सरकार द्वारा जवाब दाखिल न करने पर 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने जुर्माना राशि पीजीआई के पुअर पेशेंट रिलीफ फंड में जमा कराने का आदेश दिया है। साथ ही तीन सप्ताह का समय जवाब दाखिल करने के लिए दिया है। खंडपीठ ने कहा कि यह बेहद गंभीर और चिंता का विषय है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून और एनडीपीएस एक्ट के तहत मामले दर्ज हैं और दोषी करार देकर सजा भी सुनाई जा चुकी है, वे अब भी सरकारी नौकरी कर रहे हैं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे कर्मचारियों को नौकरी से बाहर क्यों नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों की ही नहीं, बल्कि उन उच्च अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है, जिन्होंने दोष सिद्ध होने के बावजूद ऐसे कर्मचारियों को नौकरी में बनाए रखने की सिफारिश की। कोर्ट ने कहा कि उन अधिकारियों की जानकारी दी जाए ताकि उन पर भी कार्रवाई की जा सके। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि पंजाब के स्वास्थ्य विभाग में ही ऐसे 20 अधिकारी और कर्मचारी हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार और एनडीपीएस के मामले दर्ज हैं और फिर भी वे सेवा में बने हुए हैं। इनमें से कुछ पर वर्ष 2019 से केस दर्ज हैं लेकिन अब तक उन्हें निलंबित करने पर भी विचार नहीं हुआ। एक क्लर्क को तो एनडीपीएस एक्ट में दोषी करार दिया जा चुका है। बावजूद इसके उसे दोबारा बहाल कर विभाग में नियुक्त कर दिया गया। वह स्वास्थ्य निदेशक के कार्यालय में काम कर रहा है। हाईकोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक यह जानकारी पेश करें कि कितने ऐसे अधिकारी और कर्मचारी अब भी सेवा में हैं। उनके खिलाफ कौन कौन से मामले दर्ज हैं और किसकी सिफारिश पर वे नौकरी में बने हुए हैं।

नर्मदा प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई की तैयारी, जबलपुर हाई कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के पूर्व निर्देश के पालन में नर्मदा नदी को दूषित होने से बचाने के लिए याचिकाकर्ताओं की ओर से सुझाव पेश किए गए। सुझाव में कहा गया कि नर्मदा में मिलने वाले नालों की पहचान कर एसटीपी लगाए जाएं। उपचारित दूषित जल का कृषि, सिंचाई व औद्योगिक क्षेत्रों में उपयोग को गति दी जाए। हाईकोर्ट ने उक्त सुझावों को रिकॉर्ड पर ले लिया। इसी के साथ सभी पक्षों को युगलपीठ ने सुझावों के संदर्भ में जवाब पेश करने के निर्देश देते हुए याचिका पर अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की है। नालों के गंदे व हानिकारक दूषित पानी से सब्जी उगाने के संबंध में लॉ छात्र द्वारा लिखे गए पत्र को संज्ञान में लेते हुए हाईकोर्ट मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में कर रही है। इसके अलावा नर्मदा में मिलने वाले नालों और संक्रमित पानी की आपूर्ति के संबंध में भी दो अन्य याचिकाएं दायर की गई थीं। हाईकोर्ट ने विगत सुनवाई में सभी पक्षों को उक्त समस्याओं के समाधान के लिए ठोस उपाय सुझाने के निर्देश दिए थे। 'पानी पीने, निस्तार और सिंचाई के लिए पूर्णतः अनुपयोगी' न्यायालय ने कहा था कि इंदौर में व्यवस्थाएं दुरुस्त हुई हैं, क्योंकि वहां जनता प्रशासन को पूरा सहयोग करती है। इस पर नर्मदा प्रदूषण रोकने के लिए दूरगामी और ठोस सुझाव देना चाहिए। मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने नालों के पानी की जांच रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया गया कि शहर के लगभग सभी नालों के पानी में भारी मात्रा में सीवेज मिला है, जिस कारण वह अत्यंत दूषित है। यह पानी पीने, निस्तार और सिंचाई के लिए पूर्णतः अनुपयोगी है। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि नालों का यह पानी वाटर पाइपलाइन में मिल गया तो गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होंगी। वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने दी ये दलील वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने दलील दी थी कि गौरीघाट में रोज सैकड़ों लोग तेल के दीये नर्मदा में विसर्जित करते हैं, जिससे पानी दूषित होता है। शहर में 174 मेगालीटर प्रतिदिन वेस्ट वॉटर नालों में जाता है, जिसमें से नगर निगम द्वारा 13 सीवेज प्लांट्स के जरिए केवल 58 मेगालीटर प्रतिदिन पानी का ट्रीटमेंट किया जाता है। यह पानी नर्मदा तथा हिरन नदी में मिलाया जाता है। डेमोक्रेटिक लायर्स फोरम के सचिव रविंद्र गुप्ता ने दलील दी थी कि शीघ्र ही साफ और बिना संक्रमित पानी पीने योग्य घरों में सप्लाई करने हेतु नगर निगम सक्षम नहीं है, इसलिए संपूर्ण मामले पर सही कार्रवाई के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जानी चाहिए। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की चेयरमैनशिप में जबलपुर मेयर, जबलपुर कमिश्नर, जबलपुर कलेक्टर, पीएचई डिपार्टमेंट के हेड, किसी सीनियर सिटीजन, सोशल वर्कर और किसी सीनियर एडवोकेट को इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: MP में संविदा कर्मियों को मिलेगा 10 साल की सेवा का हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभ

MP में संविदा कर्मियों को HC से राहत, 10 साल की सेवा का मिलेगा हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभों से नहीं होंगे वंचित हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: MP में संविदा कर्मियों को मिलेगा 10 साल की सेवा का हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभ MP में संविदा कर्मियों के लिए हाईकोर्ट ने दी राहत, 10 साल की सेवा का हक मिलेगा, न्यूनतम वेतन समेत अन्य लाभ होंगे जारी जबलपुर मध्य प्रदेश में वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मचारियों के लिए हाई कोर्ट से बड़ी राहत सामने आई है। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि 10 वर्ष से अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे संविदा, आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारी वर्गीकरण और उससे जुड़े लाभों के हकदार हैं। आर्थिक न्याय का अधिकार माना कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि लंबे समय से काम कर रहे इन कर्मचारियों को आर्थिक न्याय और सम्मानजनक जीवन स्तर का अधिकार है। ऐसे में उन्हें नीति के तहत वर्गीकृत किया जाए और उनके पद के अनुरूप न्यूनतम वेतन दिया जाए। वर्षों से सेवारत कर्मियों की दलील स्वीकार जबलपुर सहित प्रदेश के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों ने याचिकाएं दायर कर बताया था कि उन्हें वर्ष 2009 में अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था और तब से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान लाभ नहीं दिए जा रहे। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वर्गीकरण और न्यूनतम वेतन को लेकर नीति बनाई है, लेकिन उसका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। संवैधानिक अधिकारों का हवाला याचिकाओं में यह तर्क दिया गया कि नियमितीकरण में भेदभाव हो रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए माना कि पात्र कर्मचारियों को नीति के अनुसार लाभ दिया जाना चाहिए। सरकार को निर्देश हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि 2016 की नीति के तहत पात्र संविदा कर्मचारियों का वर्गीकरण किया जाए और उन्हें सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। यह फैसला प्रदेश के हजारों संविदा कर्मचारियों के लिए राहतकारी माना जा रहा है, जो लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे।  

हाईकोर्ट की फटकार: ‘इतना अश्लील गाना’ पर हनी सिंह और बादशाह को आदेश, विवादित गाने को हटाने का निर्देश

नई दिल्ली  दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाते हुए मशहूर रैपर हनी सिंह और बादशाह के पुराने विवादित गाने ‘माफिया मुंडीर’ (वॉल्यूम 1) को लेकर बड़ा आदेश दिया है. अदालत ने साफ कहा है कि इस गाने को यूट्यूब और स्पॉटिफाई जैसे तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से तुरंत हटा दिया जाए. 2000 के दशक का यह गाना लंबे समय से अपने लीरिक्स और कॉन्टेंट को लेकर विवादों में रहा है, लेकिन अब कोर्ट ने इस पर कानूनी हथौड़ा चला दिया है।  हाईकोर्ट के जज ने मामले की सुनवाई के दौरान इस गाने की कॉन्टेंट पर गहरी नाराजगी और चिंता जताई. जज ने हनी सिंह और बादशाह को फटकार लगाते हुए कहा कि इस गाने के बोल बेहद अश्लील, अभद्र और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले हैं. जज ने कड़े शब्दों में कहा कि इस गाने ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया है. कोर्ट का कहना है कि कोई भी सभ्य समाज ऐसे कंटेंट को इंटरनेट पर मौजूद रहने की अनुमति नहीं दे सकता जो महिलाओं के प्रति इतना अपमानजनक और भद्दा हो।  नए कलाकारों के लिए सीख यह फैसला डिजिटल स्पेस में मौजूद कॉन्टेंट की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. सालों पहले रिलीज हुए इस गाने पर कोर्ट का यह कमेंट उन कलाकारों के लिए भी एक मैसेज है जो अपने काम में अभद्रता परोसते हैं. अब देखना यह है कि सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स इस आदेश का कितनी जल्दी पालन करते हैं और क्या आने वाले समय में ऐसे अन्य गानों पर भी इसी तरह की कार्रवाई होगी. अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि गायक हनी सिंह और बादशाह दोनों ने इस गाने को गाने से इनकार किया है, लेकिन एक कॉन्सर्ट के दौरान इस गाने के बोल प्रस्तुत किए गए थे. मामले को लेकर अदालत ने गंभीर चिंता जताई है और इस तरह के कंटेंट पर सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘माफिया मुंडीर’ हनी सिंह, रफ्तार और बादशाह जैसे कलाकारों का एक ग्रुप था, जो रैप की दुनिया में बेहद पॉपुलर हुआ, लेकिन आपसी मतभेदों की वजह से टूट गया. हनी सिंह ने अब जनवरी 2026 में ‘माफिया मुंडीर 2.0’ (इंटरनेशनल सीजन 1) के साथ कमबैक का ऐलान किया था। 

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना पर कोई दखल नहीं, आय सीमा को लेकर दिया सुझाव

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह सरकार का नीतिगत निर्णय है और ऐसे मामलों में न्यायालय आमतौर पर दखल नहीं देता।   हालांकि कोर्ट ने यह टिप्पणी जरूर की कि यदि योजना को उन लोगों तक सीमित किया जाता जो यात्रा का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं तो यह अधिक न्यायसंगत होता। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ के समक्ष आरटीआई कार्यकर्ता परविंदर सिंह किटना की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि योजना में आय का कोई मापदंड तय नहीं किया गया है जिससे आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी इसका लाभ उठा सकते हैं। साथ ही इसे करदाताओं के पैसे की बर्बादी बताया गया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि 20 नवंबर 2023 को शुरू की गई यह योजना लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लागू की गई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया गया जिसमें हज सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की बात कही गई थी ताकि धन का उपयोग शिक्षा और सामाजिक विकास में हो सके। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप सीमित होता है। साथ ही याचिकाकर्ता को अपनी आपत्तियां और सुझाव राज्य सरकार के समक्ष रखने की स्वतंत्रता दी गई। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन सुझावों पर विचार कर उचित निर्णय लिया जाए।