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हाईकोर्ट का कड़ा कदम: चंडीगढ़ के जज को आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने पर किया सस्पेंड

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ में तैनात एक जज को उनकी कथित आपत्तिजनक वीडियो वायरल होने के मामले में सस्पेंड कर दिया है। जज को न सिर्फ सस्पेंड किया गया है, बल्कि उन्हें तुरंत प्रभाव से ट्रांसफर कर हरियाणा भी भेज दिया है। सस्पेंशन के दौरान वह हरियाणा के उसी जिले में रहेंगे। चीफ जस्टिस की ओर से जारी इस आर्डर में कहा गया कि उन्हें पता लगा है कि कुछ दिनों से एक जज की आपत्तिजनक वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रही है। इसलिए हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए जज को ही निलंबित कर दिया। खास बात यह है कि यह वही जज हैं, जिनकी आपत्तिजनक वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उनसे डेढ़ करोड़ की रंगदारी मांगी जा रही थी। इस मामले में चंडीगढ़ पुलिस को शिकायत भी दी थी, पुलिस ने रोहतक के एक वकील मोहित वर्मा को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज की। इससे पहले जज ने पुलिस को शिकायत दी थी कि कुछ समय पहले उनका मोबाइल खो गया था, जिसमें उनके परिवार की तस्वीरें, वीडियो और स्क्रीन रिकार्डिंग थीं। जज का कहना था कि आरोपित ने उनकी वीडियो एडिट या मैनिपुलेट कर उसकी छवि खराब करने की कोशिश की है। आरोप था कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी जानकारी के अनुसार 18 फरवरी 2026 को जज को एक अज्ञात नंबर से काल और वाट्सएप पर एक वीडियो मिला। जज का आरोप है कि क्लिप में उनकी आपत्तिजनक वीडियो थी। उनका आरोप था कि उस वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी। पुलिस ने जांच शुरू कर दी और रोहतक के वकील मोहित वर्मा को 11 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस को उससे दो मोबाइल फोन भी बरामद किए गए थे।

NDPS व भ्रष्टाचार के आरोपी कर्मचारियों पर कार्रवाई करें: हाईकोर्ट का पंजाब सरकार को आदेश

चंडीगढ़. पंजाब सरकार में भ्रष्टाचार और एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर मामलों में फंसे कर्मचारियों और अधिकारियों पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रवैया अपनाया है। चीफ जस्टिस शील नागू व जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए पंजाब सरकार द्वारा जवाब दाखिल न करने पर 10 हजार रुपये जुर्माना लगाया है। हाईकोर्ट ने जुर्माना राशि पीजीआई के पुअर पेशेंट रिलीफ फंड में जमा कराने का आदेश दिया है। साथ ही तीन सप्ताह का समय जवाब दाखिल करने के लिए दिया है। खंडपीठ ने कहा कि यह बेहद गंभीर और चिंता का विषय है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून और एनडीपीएस एक्ट के तहत मामले दर्ज हैं और दोषी करार देकर सजा भी सुनाई जा चुकी है, वे अब भी सरकारी नौकरी कर रहे हैं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि ऐसे कर्मचारियों को नौकरी से बाहर क्यों नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों की ही नहीं, बल्कि उन उच्च अधिकारियों की भी जिम्मेदारी है, जिन्होंने दोष सिद्ध होने के बावजूद ऐसे कर्मचारियों को नौकरी में बनाए रखने की सिफारिश की। कोर्ट ने कहा कि उन अधिकारियों की जानकारी दी जाए ताकि उन पर भी कार्रवाई की जा सके। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि पंजाब के स्वास्थ्य विभाग में ही ऐसे 20 अधिकारी और कर्मचारी हैं जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार और एनडीपीएस के मामले दर्ज हैं और फिर भी वे सेवा में बने हुए हैं। इनमें से कुछ पर वर्ष 2019 से केस दर्ज हैं लेकिन अब तक उन्हें निलंबित करने पर भी विचार नहीं हुआ। एक क्लर्क को तो एनडीपीएस एक्ट में दोषी करार दिया जा चुका है। बावजूद इसके उसे दोबारा बहाल कर विभाग में नियुक्त कर दिया गया। वह स्वास्थ्य निदेशक के कार्यालय में काम कर रहा है। हाईकोर्ट ने पंजाब के मुख्य सचिव को आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक यह जानकारी पेश करें कि कितने ऐसे अधिकारी और कर्मचारी अब भी सेवा में हैं। उनके खिलाफ कौन कौन से मामले दर्ज हैं और किसकी सिफारिश पर वे नौकरी में बने हुए हैं।

नर्मदा प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई की तैयारी, जबलपुर हाई कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने दिए महत्वपूर्ण सुझाव

जबलपुर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा व जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के पूर्व निर्देश के पालन में नर्मदा नदी को दूषित होने से बचाने के लिए याचिकाकर्ताओं की ओर से सुझाव पेश किए गए। सुझाव में कहा गया कि नर्मदा में मिलने वाले नालों की पहचान कर एसटीपी लगाए जाएं। उपचारित दूषित जल का कृषि, सिंचाई व औद्योगिक क्षेत्रों में उपयोग को गति दी जाए। हाईकोर्ट ने उक्त सुझावों को रिकॉर्ड पर ले लिया। इसी के साथ सभी पक्षों को युगलपीठ ने सुझावों के संदर्भ में जवाब पेश करने के निर्देश देते हुए याचिका पर अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की है। नालों के गंदे व हानिकारक दूषित पानी से सब्जी उगाने के संबंध में लॉ छात्र द्वारा लिखे गए पत्र को संज्ञान में लेते हुए हाईकोर्ट मामले की सुनवाई जनहित याचिका के रूप में कर रही है। इसके अलावा नर्मदा में मिलने वाले नालों और संक्रमित पानी की आपूर्ति के संबंध में भी दो अन्य याचिकाएं दायर की गई थीं। हाईकोर्ट ने विगत सुनवाई में सभी पक्षों को उक्त समस्याओं के समाधान के लिए ठोस उपाय सुझाने के निर्देश दिए थे। 'पानी पीने, निस्तार और सिंचाई के लिए पूर्णतः अनुपयोगी' न्यायालय ने कहा था कि इंदौर में व्यवस्थाएं दुरुस्त हुई हैं, क्योंकि वहां जनता प्रशासन को पूरा सहयोग करती है। इस पर नर्मदा प्रदूषण रोकने के लिए दूरगामी और ठोस सुझाव देना चाहिए। मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने नालों के पानी की जांच रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया गया कि शहर के लगभग सभी नालों के पानी में भारी मात्रा में सीवेज मिला है, जिस कारण वह अत्यंत दूषित है। यह पानी पीने, निस्तार और सिंचाई के लिए पूर्णतः अनुपयोगी है। रिपोर्ट में कहा गया कि यदि नालों का यह पानी वाटर पाइपलाइन में मिल गया तो गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होंगी। वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने दी ये दलील वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने दलील दी थी कि गौरीघाट में रोज सैकड़ों लोग तेल के दीये नर्मदा में विसर्जित करते हैं, जिससे पानी दूषित होता है। शहर में 174 मेगालीटर प्रतिदिन वेस्ट वॉटर नालों में जाता है, जिसमें से नगर निगम द्वारा 13 सीवेज प्लांट्स के जरिए केवल 58 मेगालीटर प्रतिदिन पानी का ट्रीटमेंट किया जाता है। यह पानी नर्मदा तथा हिरन नदी में मिलाया जाता है। डेमोक्रेटिक लायर्स फोरम के सचिव रविंद्र गुप्ता ने दलील दी थी कि शीघ्र ही साफ और बिना संक्रमित पानी पीने योग्य घरों में सप्लाई करने हेतु नगर निगम सक्षम नहीं है, इसलिए संपूर्ण मामले पर सही कार्रवाई के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जानी चाहिए। हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज की चेयरमैनशिप में जबलपुर मेयर, जबलपुर कमिश्नर, जबलपुर कलेक्टर, पीएचई डिपार्टमेंट के हेड, किसी सीनियर सिटीजन, सोशल वर्कर और किसी सीनियर एडवोकेट को इसमें शामिल किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: MP में संविदा कर्मियों को मिलेगा 10 साल की सेवा का हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभ

MP में संविदा कर्मियों को HC से राहत, 10 साल की सेवा का मिलेगा हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभों से नहीं होंगे वंचित हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: MP में संविदा कर्मियों को मिलेगा 10 साल की सेवा का हक, न्यूनतम वेतन और अन्य लाभ MP में संविदा कर्मियों के लिए हाईकोर्ट ने दी राहत, 10 साल की सेवा का हक मिलेगा, न्यूनतम वेतन समेत अन्य लाभ होंगे जारी जबलपुर मध्य प्रदेश में वर्षों से कार्यरत संविदा कर्मचारियों के लिए हाई कोर्ट से बड़ी राहत सामने आई है। न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि 10 वर्ष से अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे संविदा, आउटसोर्स और अंशकालिक कर्मचारी वर्गीकरण और उससे जुड़े लाभों के हकदार हैं। आर्थिक न्याय का अधिकार माना कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि लंबे समय से काम कर रहे इन कर्मचारियों को आर्थिक न्याय और सम्मानजनक जीवन स्तर का अधिकार है। ऐसे में उन्हें नीति के तहत वर्गीकृत किया जाए और उनके पद के अनुरूप न्यूनतम वेतन दिया जाए। वर्षों से सेवारत कर्मियों की दलील स्वीकार जबलपुर सहित प्रदेश के विभिन्न विभागों में कार्यरत कर्मचारियों ने याचिकाएं दायर कर बताया था कि उन्हें वर्ष 2009 में अनुबंध के आधार पर नियुक्त किया गया था और तब से लगातार सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें स्थायी कर्मचारियों के समान लाभ नहीं दिए जा रहे। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वर्गीकरण और न्यूनतम वेतन को लेकर नीति बनाई है, लेकिन उसका लाभ उन्हें नहीं मिल रहा। संवैधानिक अधिकारों का हवाला याचिकाओं में यह तर्क दिया गया कि नियमितीकरण में भेदभाव हो रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए माना कि पात्र कर्मचारियों को नीति के अनुसार लाभ दिया जाना चाहिए। सरकार को निर्देश हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि 2016 की नीति के तहत पात्र संविदा कर्मचारियों का वर्गीकरण किया जाए और उन्हें सभी परिणामी लाभ दिए जाएं। यह फैसला प्रदेश के हजारों संविदा कर्मचारियों के लिए राहतकारी माना जा रहा है, जो लंबे समय से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे थे।  

हाईकोर्ट की फटकार: ‘इतना अश्लील गाना’ पर हनी सिंह और बादशाह को आदेश, विवादित गाने को हटाने का निर्देश

नई दिल्ली  दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाते हुए मशहूर रैपर हनी सिंह और बादशाह के पुराने विवादित गाने ‘माफिया मुंडीर’ (वॉल्यूम 1) को लेकर बड़ा आदेश दिया है. अदालत ने साफ कहा है कि इस गाने को यूट्यूब और स्पॉटिफाई जैसे तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से तुरंत हटा दिया जाए. 2000 के दशक का यह गाना लंबे समय से अपने लीरिक्स और कॉन्टेंट को लेकर विवादों में रहा है, लेकिन अब कोर्ट ने इस पर कानूनी हथौड़ा चला दिया है।  हाईकोर्ट के जज ने मामले की सुनवाई के दौरान इस गाने की कॉन्टेंट पर गहरी नाराजगी और चिंता जताई. जज ने हनी सिंह और बादशाह को फटकार लगाते हुए कहा कि इस गाने के बोल बेहद अश्लील, अभद्र और महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले हैं. जज ने कड़े शब्दों में कहा कि इस गाने ने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर दिया है. कोर्ट का कहना है कि कोई भी सभ्य समाज ऐसे कंटेंट को इंटरनेट पर मौजूद रहने की अनुमति नहीं दे सकता जो महिलाओं के प्रति इतना अपमानजनक और भद्दा हो।  नए कलाकारों के लिए सीख यह फैसला डिजिटल स्पेस में मौजूद कॉन्टेंट की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. सालों पहले रिलीज हुए इस गाने पर कोर्ट का यह कमेंट उन कलाकारों के लिए भी एक मैसेज है जो अपने काम में अभद्रता परोसते हैं. अब देखना यह है कि सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स इस आदेश का कितनी जल्दी पालन करते हैं और क्या आने वाले समय में ऐसे अन्य गानों पर भी इसी तरह की कार्रवाई होगी. अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि गायक हनी सिंह और बादशाह दोनों ने इस गाने को गाने से इनकार किया है, लेकिन एक कॉन्सर्ट के दौरान इस गाने के बोल प्रस्तुत किए गए थे. मामले को लेकर अदालत ने गंभीर चिंता जताई है और इस तरह के कंटेंट पर सख्त रुख अपनाने के संकेत दिए हैं. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘माफिया मुंडीर’ हनी सिंह, रफ्तार और बादशाह जैसे कलाकारों का एक ग्रुप था, जो रैप की दुनिया में बेहद पॉपुलर हुआ, लेकिन आपसी मतभेदों की वजह से टूट गया. हनी सिंह ने अब जनवरी 2026 में ‘माफिया मुंडीर 2.0’ (इंटरनेशनल सीजन 1) के साथ कमबैक का ऐलान किया था। 

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना पर कोई दखल नहीं, आय सीमा को लेकर दिया सुझाव

चंडीगढ़  पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह सरकार का नीतिगत निर्णय है और ऐसे मामलों में न्यायालय आमतौर पर दखल नहीं देता।   हालांकि कोर्ट ने यह टिप्पणी जरूर की कि यदि योजना को उन लोगों तक सीमित किया जाता जो यात्रा का खर्च वहन करने में सक्षम नहीं हैं तो यह अधिक न्यायसंगत होता। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू और जस्टिस रमेश कुमारी की खंडपीठ के समक्ष आरटीआई कार्यकर्ता परविंदर सिंह किटना की याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि योजना में आय का कोई मापदंड तय नहीं किया गया है जिससे आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी इसका लाभ उठा सकते हैं। साथ ही इसे करदाताओं के पैसे की बर्बादी बताया गया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि 20 नवंबर 2023 को शुरू की गई यह योजना लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लागू की गई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया गया जिसमें हज सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की बात कही गई थी ताकि धन का उपयोग शिक्षा और सामाजिक विकास में हो सके। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप सीमित होता है। साथ ही याचिकाकर्ता को अपनी आपत्तियां और सुझाव राज्य सरकार के समक्ष रखने की स्वतंत्रता दी गई। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन सुझावों पर विचार कर उचित निर्णय लिया जाए। 

एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पति-पत्नी के अप्राकृतिक संबंध अपराध नहीं, ग्वालियर बेंच ने दी राहत

ग्वालियर   मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने पत्नी के साथ अप्राकृतिक संबंध के मामले में पति को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच अननैचुरल संबंध अपराध नहीं है। इसके साथ ही पति पर दर्ज एफआईआर को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया है। वहीं, अन्य मामले उसके खिलाफ चलते रहेंगे। पति पर पत्नी ने दहेज, मारपीट और प्रताड़ना का आरोप लगाया था। महिला ने पति पर दर्ज करवाया था केस दरअसल, भिंड की महिला ने साल 2023 में अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। उसमें महिला ने कहा था कि ससुराल पक्ष के लोग 10 लाख रुपए और बुलेट की मांग कर रहे हैं। शादी के समय परिवार ने भरपुर दहेज दिया था। इसके बावजूद यह मांग की जा रही है। साथ ही शिकायत में कहा गया था कि मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है। पत्नी ने अपने पति अननैचुरल यौन संबंध का भी आरोप लगाया था। कोर्ट ने कहा कि यह अपराध नहीं इस मामले का ट्रायल हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में चल रहा था। अननैचुरल संबंध के मामले में कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। साथ ही कहा है कि पति-पत्नी के बीच बने संबंधों को धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता है। इस आधार पर दर्ज की गई एफआईआर को आंशिक रूप से निरस्त किया जाता है। वहीं, मारपीट, दहेज और प्रताड़ना के मामले में सुनवाई जारी रहेगी। महिला की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 377, 498 ए और 354 के तहत केस दर्ज किया था। पुलिस अन्य मामलों में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। कोर्ट में अभी ट्रायल चलता रहेगा। ये था पूरा मामला     पत्नी ने अपने पति पर दर्ज करवाया था केस     दहेज, मारपीट और प्रताड़ना के साथ अप्राकृतिक संबंध के मामले     2023 में ये दर्ज हुआ था केस     हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में चल रही सुनवाई पति भी पहुंचा था हाईकोर्ट गौरतलब है कि इस मामले में सुनवाई के दौरान पति भी कोर्ट में उपस्थित था। इस दौरान पति के वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल के खिलाफ मामले को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है। वहीं, महिला के पूर्व और अभी के बयान मेल नहीं खाते हैं। धारा 377 के तहत केस नहीं चलाया जा सकता है। कोर्ट ने पति, ससुर और सास के खिलाफ लगे आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया है।  

हाईकोर्ट से मजीठिया को बड़ा झटका: मानहानि केस में दोबारा क्रॉस एग्जामिनेशन की अनुमति, लुधियाना में चलेगा ट्रायल

लुधियाना आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पर दर्ज मानहानि केस में बिक्रम मजीठिया को झटका लगा है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए संजय सिंह की याचिका को मंजूर कर लिया है। साथ ही एक बार फिर बिक्रम मजीठिया का क्रॉस करने के आदेश दिए हैं। मजीठिया की याचिका खारिज सरकारी वकील फैरी सोफ्त ने बताया कि बिक्रम सिंह मजीठिया ने संजय सिंह के खिलाफ मानहानि का केस फाइल किया था। 2016 में यह मामला दर्ज करवाया गया था। इस दौरान अदालत ने क्रॉस को निरस्त कर दिया था। इसके बाद संजय सिंह ने 2021 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अब हाईकोर्ट ने फाइल की गई पिटीशन को मंजूर कर लिया है। साथ ही संजय सिंह को मजीठिया का एक बार फिर क्रॉस करने की अनुमति दी है। इसी तरह मजीठिया की तरफ से भी एक एप्लिकेशन लगाई गई थी, जिसमें मामले में तीन गवाहों को शामिल करने संबंधी मांग की गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। लुधियाना कोर्ट में ट्रायल दोबारा चलेगा। सरकारी वकील फैरी सोफ्त मामले के बारे में जानकारी देते हुए। सरकारी वकील फैरी सोफ्त मामले के बारे में जानकारी देते हुए। यह है सारा मामला 2015-2016 के दौरान पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले AAP नेताओं ने अकाली दल पर नशा (ड्रग्स) तस्करी का आरोप लगाया। संजय सिंह ने मोगा में एक रैली के दौरान बिक्रम सिंह मजीठिया को "ड्रग डीलर" (नशा तस्कर) और ड्रग्स व्यापार से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि AAP सत्ता में आई तो ऐसे भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजा जाएगा। मजीठिया ने इन आरोपों को बिना सबूत के मानहानि करार देते हुए जनवरी 2016 में लुधियाना की अदालत में आपराधिक मानहानि का केस दायर किया (IPC की धारा 499/500 के तहत) दर्ज करवाया था।  

हाई कोर्ट का अहम फैसला: पादरी को अपने धर्म को सच बताने पर दी फटकार, संविधान के खिलाफ ठहराया

 इलाहाबाद धर्मों को लेकर बड़ी टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि कई भी धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि केवल वही सच है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए एक पादरी की याचिका खारिज कर दी। पादरी पर जान-बूझकर धार्मिक भावनओं को आहत करने के आरोप लगे थे। पादरी ने खुद के खिलाफ फाइल की गई चार्जशीट के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया था। यूपी के मऊ जिले में मुहम्मदाबाद थाने में 2023 में पादरी के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। उनपर आरोप था कि प्रार्थना सभा के दौरान वह कहते थे कि इस संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह है ईसाई धर्म। जस्टिस सौर्भ श्रीवास्तव की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, भारत ऐसा देश है जहां हर धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। भारत का संविधान कहता है कि भारत के सेक्युलर देश है। ऐसे में यह दावा कतई नहीं किया जा सकता कि कोई एक धर्म ही श्रेष्ठ और सत्य है। बेंच ने कहा कि आईपीसी की धारा 295-ए के तहत अगर किसी भी धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे में पादरी ने जो कुछ कहा उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि पादरी के बयानों पर कोई केस नहीं बनता है। पादरी के वकील ने कहा कि केवल उन्हें परेशान करने के लिए यह केस बनाया जा रहा है। उनपर आरोप लगाया गया है कि वह दूसरे धर्मों को नीचा दिखाते हैं और फिर पिछड़े लोगों का धर्मांतरण करने का प्रयास करते हैं जो कि निराधार है। उन्होंने दावा किया कि जांच अधिकारी ने भी यही पाया था कि वह किसी का धर्मांतरण नही करवाते हैं। वकील ने कहा कि बिना निष्पक्ष जांच के ही जांच अधिकारी ने रिपोर्ट फाइल करदी। ऐसे में कानून के साथ भी खिलवाड़ किया गया है। ऐसे में उनके खिलाफ दर्ज केस को रद्द कर दिया जाना चाहिए। वहीं सरकारी वकील ने उनका विरोध किया। जस्टिस श्रीवास्तव की बेंच ने कहा, समन या फिर संज्ञान के लिए प्रथम दृष्ट्या जानकारी की जरूरत होती है और इसपर मैजिट्रेट विचार कर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों और सबूतों को देखते हुए यह याचिका खारिज की जाती है।

‘मोहम्मद’ दीपक को पुलिस सुरक्षा देने की मांग पर HC की नाराजगी, सोशल मीडिया एक्टिविटी पर उठाए सवाल

देहरादून उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार मामले में दीपक कुमार उर्फ ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके व्यवहार और मांगों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने दीपक के खिलाफ दर्फ एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी अपील को दबाव बनाने की रणनीति बताया। कोर्ट ने दीपक को फटकार लगाते हुए पूछा कि एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है। कोर्ट ने कहा, इस तरह की मांगों का मकसद जांच को प्रभावित करना और पूरे मामले को सनसनीखेज बनाना है। कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब याचिकाकर्ता खुद एक संदिग्ध आरोपी है तो पुलिस सुरक्षा मांगने के पीछे उसका क्या मतलब है। 26 जनवरी की एक घटना को लेकर मोहम्मद दीपक के खिलाफ दंगा करने, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमानित करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार, वकील अहमद के अपनी दुकान का नाम 'बाबा' रखे जाने पर बजरंग दल के सदस्यों ने आपत्ति जताई थी और मोहम्मद दीपक ने इसका विरोध किया था। इस दौरान बजरंग दल के सदस्यों के साथ दीपक का झगड़ा भी हुआ जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ। उस दौरान जब दीपक से उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताया था। कोर्ट ने दीपक की मांगों पर क्यों उठाए सवाल? बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस राकेश थपलिया ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि दीपक कुमार खुद इस मामले में एक संदिग्ध आरोपी हैं। ऐसे में यह समझ से परे है कि वह पुलिस सुरक्षा की मांग कैसे कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि दीपक सोशल मीडिया के जरिए इस मामले को बेफिजूल में तूल दे रहे हैं। जज ने तीखे लहजे में कहा, आप पर कौन दबाव डाल रहा है? आप सोशल मीडिया पर प्रवचन दे रहे हैं और मामले को सनसनीखेज बना रहे हैं। दीपक ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए जांच अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि एक आरोपी का ऐसी मांग करना न केवल गलत है, बल्कि यह जांच एजेंसी के मनोबल पर असर डालने जैसा है। सोशल मीडिया पर कमेंट करने पर रोक हाई कोर्ट ने दीपक को सोशल मीडिया पर कमेंट करने से भी रोक दिया है। जस्टिस राकेश थपलियाल साफ किया कि सोशल मीडिया पर चल रही बयानबाजी पुलिस की जांच में बाधा डाल सकती है। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील पर भी कड़ी नाराजगी जताई जिसमें कहा गया था कि दीपक कुमार जांच में सहयोग करने के बजाय सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं। कोर्ट ने दीपक कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए पुलिस को अपनी जांच जारी रखने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने पुलिस को यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि वे 'अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें, क्योंकि इस मामले में सजा सात साल से कम है।