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एमपी हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पति-पत्नी के अप्राकृतिक संबंध अपराध नहीं, ग्वालियर बेंच ने दी राहत

ग्वालियर   मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने पत्नी के साथ अप्राकृतिक संबंध के मामले में पति को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच अननैचुरल संबंध अपराध नहीं है। इसके साथ ही पति पर दर्ज एफआईआर को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया है। वहीं, अन्य मामले उसके खिलाफ चलते रहेंगे। पति पर पत्नी ने दहेज, मारपीट और प्रताड़ना का आरोप लगाया था। महिला ने पति पर दर्ज करवाया था केस दरअसल, भिंड की महिला ने साल 2023 में अपने पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई थी। उसमें महिला ने कहा था कि ससुराल पक्ष के लोग 10 लाख रुपए और बुलेट की मांग कर रहे हैं। शादी के समय परिवार ने भरपुर दहेज दिया था। इसके बावजूद यह मांग की जा रही है। साथ ही शिकायत में कहा गया था कि मुझे प्रताड़ित किया जा रहा है। पत्नी ने अपने पति अननैचुरल यौन संबंध का भी आरोप लगाया था। कोर्ट ने कहा कि यह अपराध नहीं इस मामले का ट्रायल हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में चल रहा था। अननैचुरल संबंध के मामले में कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। साथ ही कहा है कि पति-पत्नी के बीच बने संबंधों को धारा 377 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता है। इस आधार पर दर्ज की गई एफआईआर को आंशिक रूप से निरस्त किया जाता है। वहीं, मारपीट, दहेज और प्रताड़ना के मामले में सुनवाई जारी रहेगी। महिला की शिकायत पर पुलिस ने आईपीसी की धारा 377, 498 ए और 354 के तहत केस दर्ज किया था। पुलिस अन्य मामलों में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। कोर्ट में अभी ट्रायल चलता रहेगा। ये था पूरा मामला     पत्नी ने अपने पति पर दर्ज करवाया था केस     दहेज, मारपीट और प्रताड़ना के साथ अप्राकृतिक संबंध के मामले     2023 में ये दर्ज हुआ था केस     हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में चल रही सुनवाई पति भी पहुंचा था हाईकोर्ट गौरतलब है कि इस मामले में सुनवाई के दौरान पति भी कोर्ट में उपस्थित था। इस दौरान पति के वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल के खिलाफ मामले को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है। वहीं, महिला के पूर्व और अभी के बयान मेल नहीं खाते हैं। धारा 377 के तहत केस नहीं चलाया जा सकता है। कोर्ट ने पति, ससुर और सास के खिलाफ लगे आरोपों को रद्द करने से इनकार कर दिया है।  

हाईकोर्ट से मजीठिया को बड़ा झटका: मानहानि केस में दोबारा क्रॉस एग्जामिनेशन की अनुमति, लुधियाना में चलेगा ट्रायल

लुधियाना आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पर दर्ज मानहानि केस में बिक्रम मजीठिया को झटका लगा है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए संजय सिंह की याचिका को मंजूर कर लिया है। साथ ही एक बार फिर बिक्रम मजीठिया का क्रॉस करने के आदेश दिए हैं। मजीठिया की याचिका खारिज सरकारी वकील फैरी सोफ्त ने बताया कि बिक्रम सिंह मजीठिया ने संजय सिंह के खिलाफ मानहानि का केस फाइल किया था। 2016 में यह मामला दर्ज करवाया गया था। इस दौरान अदालत ने क्रॉस को निरस्त कर दिया था। इसके बाद संजय सिंह ने 2021 में हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। अब हाईकोर्ट ने फाइल की गई पिटीशन को मंजूर कर लिया है। साथ ही संजय सिंह को मजीठिया का एक बार फिर क्रॉस करने की अनुमति दी है। इसी तरह मजीठिया की तरफ से भी एक एप्लिकेशन लगाई गई थी, जिसमें मामले में तीन गवाहों को शामिल करने संबंधी मांग की गई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। लुधियाना कोर्ट में ट्रायल दोबारा चलेगा। सरकारी वकील फैरी सोफ्त मामले के बारे में जानकारी देते हुए। सरकारी वकील फैरी सोफ्त मामले के बारे में जानकारी देते हुए। यह है सारा मामला 2015-2016 के दौरान पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले AAP नेताओं ने अकाली दल पर नशा (ड्रग्स) तस्करी का आरोप लगाया। संजय सिंह ने मोगा में एक रैली के दौरान बिक्रम सिंह मजीठिया को "ड्रग डीलर" (नशा तस्कर) और ड्रग्स व्यापार से जुड़ा बताया। उन्होंने कहा कि AAP सत्ता में आई तो ऐसे भ्रष्ट नेताओं को जेल भेजा जाएगा। मजीठिया ने इन आरोपों को बिना सबूत के मानहानि करार देते हुए जनवरी 2016 में लुधियाना की अदालत में आपराधिक मानहानि का केस दायर किया (IPC की धारा 499/500 के तहत) दर्ज करवाया था।  

हाई कोर्ट का अहम फैसला: पादरी को अपने धर्म को सच बताने पर दी फटकार, संविधान के खिलाफ ठहराया

 इलाहाबाद धर्मों को लेकर बड़ी टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि कई भी धर्म यह दावा नहीं कर सकता कि केवल वही सच है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए एक पादरी की याचिका खारिज कर दी। पादरी पर जान-बूझकर धार्मिक भावनओं को आहत करने के आरोप लगे थे। पादरी ने खुद के खिलाफ फाइल की गई चार्जशीट के खिलाफ हाई कोर्ट का रुख किया था। यूपी के मऊ जिले में मुहम्मदाबाद थाने में 2023 में पादरी के खिलाफ केस दर्ज किया गया था। उनपर आरोप था कि प्रार्थना सभा के दौरान वह कहते थे कि इस संसार में केवल एक ही धर्म सत्य है और वह है ईसाई धर्म। जस्टिस सौर्भ श्रीवास्तव की बेंच ने सुनवाई करते हुए कहा, भारत ऐसा देश है जहां हर धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। भारत का संविधान कहता है कि भारत के सेक्युलर देश है। ऐसे में यह दावा कतई नहीं किया जा सकता कि कोई एक धर्म ही श्रेष्ठ और सत्य है। बेंच ने कहा कि आईपीसी की धारा 295-ए के तहत अगर किसी भी धर्म को नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है तो इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे में पादरी ने जो कुछ कहा उसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि पादरी के बयानों पर कोई केस नहीं बनता है। पादरी के वकील ने कहा कि केवल उन्हें परेशान करने के लिए यह केस बनाया जा रहा है। उनपर आरोप लगाया गया है कि वह दूसरे धर्मों को नीचा दिखाते हैं और फिर पिछड़े लोगों का धर्मांतरण करने का प्रयास करते हैं जो कि निराधार है। उन्होंने दावा किया कि जांच अधिकारी ने भी यही पाया था कि वह किसी का धर्मांतरण नही करवाते हैं। वकील ने कहा कि बिना निष्पक्ष जांच के ही जांच अधिकारी ने रिपोर्ट फाइल करदी। ऐसे में कानून के साथ भी खिलवाड़ किया गया है। ऐसे में उनके खिलाफ दर्ज केस को रद्द कर दिया जाना चाहिए। वहीं सरकारी वकील ने उनका विरोध किया। जस्टिस श्रीवास्तव की बेंच ने कहा, समन या फिर संज्ञान के लिए प्रथम दृष्ट्या जानकारी की जरूरत होती है और इसपर मैजिट्रेट विचार कर सकते हैं। वर्तमान परिस्थितियों और सबूतों को देखते हुए यह याचिका खारिज की जाती है।

‘मोहम्मद’ दीपक को पुलिस सुरक्षा देने की मांग पर HC की नाराजगी, सोशल मीडिया एक्टिविटी पर उठाए सवाल

देहरादून उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कोटद्वार मामले में दीपक कुमार उर्फ ‘मोहम्मद’ दीपक की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके व्यवहार और मांगों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने दीपक के खिलाफ दर्फ एफआईआर को रद्द करने से इनकार करते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी अपील को दबाव बनाने की रणनीति बताया। कोर्ट ने दीपक को फटकार लगाते हुए पूछा कि एक आरोपी पुलिस सुरक्षा कैसे मांग सकता है। कोर्ट ने कहा, इस तरह की मांगों का मकसद जांच को प्रभावित करना और पूरे मामले को सनसनीखेज बनाना है। कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि जब याचिकाकर्ता खुद एक संदिग्ध आरोपी है तो पुलिस सुरक्षा मांगने के पीछे उसका क्या मतलब है। 26 जनवरी की एक घटना को लेकर मोहम्मद दीपक के खिलाफ दंगा करने, चोट पहुंचाने और शांति भंग करने के इरादे से जानबूझकर अपमानित करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। आरोप है कि कोटद्वार में एक मुस्लिम दुकानदार, वकील अहमद के अपनी दुकान का नाम 'बाबा' रखे जाने पर बजरंग दल के सदस्यों ने आपत्ति जताई थी और मोहम्मद दीपक ने इसका विरोध किया था। इस दौरान बजरंग दल के सदस्यों के साथ दीपक का झगड़ा भी हुआ जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हुआ। उस दौरान जब दीपक से उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने खुद को 'मोहम्मद दीपक' बताया था। कोर्ट ने दीपक की मांगों पर क्यों उठाए सवाल? बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस राकेश थपलिया ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि दीपक कुमार खुद इस मामले में एक संदिग्ध आरोपी हैं। ऐसे में यह समझ से परे है कि वह पुलिस सुरक्षा की मांग कैसे कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि दीपक सोशल मीडिया के जरिए इस मामले को बेफिजूल में तूल दे रहे हैं। जज ने तीखे लहजे में कहा, आप पर कौन दबाव डाल रहा है? आप सोशल मीडिया पर प्रवचन दे रहे हैं और मामले को सनसनीखेज बना रहे हैं। दीपक ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए जांच अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच की मांग की थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि एक आरोपी का ऐसी मांग करना न केवल गलत है, बल्कि यह जांच एजेंसी के मनोबल पर असर डालने जैसा है। सोशल मीडिया पर कमेंट करने पर रोक हाई कोर्ट ने दीपक को सोशल मीडिया पर कमेंट करने से भी रोक दिया है। जस्टिस राकेश थपलियाल साफ किया कि सोशल मीडिया पर चल रही बयानबाजी पुलिस की जांच में बाधा डाल सकती है। कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील पर भी कड़ी नाराजगी जताई जिसमें कहा गया था कि दीपक कुमार जांच में सहयोग करने के बजाय सोशल मीडिया पर व्यस्त हैं। कोर्ट ने दीपक कुमार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए पुलिस को अपनी जांच जारी रखने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने पुलिस को यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि वे 'अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें, क्योंकि इस मामले में सजा सात साल से कम है।

टूटी हालत वाले स्कूलों पर कोर्ट की नजर: 19 मार्च को सुनवाई, 20 हजार करोड़ की योजना पर मांगा जवाब

जयपुर राजस्थान में स्कूलों की जर्जर व्यवस्था को लेकर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। इस दौरान कोर्ट ने राज्य के शिक्षा विभाग से खराब हालत में चल रहे स्कूलों की स्थिति और सुधार की योजनाओं पर विस्तृत जानकारी मांगी है। फंड की कमी पर उठे सवाल शिक्षा विभाग द्वारा हाईकोर्ट में दायर एफिडेविट में बताया गया कि स्कूलों की मरम्मत और जीर्णोद्धार के लिए 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक की आवश्यकता है। इसके मुकाबले प्रदेश के बजट में केवल 950 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल किया कि इतनी बड़ी राशि की जरूरत को सीमित बजट में कैसे पूरा किया जाएगा।   कोर्ट की तीखी टिप्पणियां सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग से पूछा कि 20 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था के लिए क्या ठोस योजना तैयार की गई है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि यदि कोई स्पष्ट योजना नहीं है, तो क्या इस तरह की स्कूली व्यवस्था को बंद कर देना चाहिए। इन टिप्पणियों ने मामले की गंभीरता को रेखांकित किया है।   19 मार्च को अगली सुनवाई मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है, जिसमें हाईकोर्ट शिक्षा विभाग से ठोस जवाब और संभावित कार्ययोजना की अपेक्षा करेगा। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में कोर्ट सख्त निर्देश जारी कर सकता है। हालिया घटना से बढ़ी चिंता इस मामले की पृष्ठभूमि में बाड़मेर की एक घटना भी चर्चा में है, जहां एक सरकारी स्कूल में छात्र के सिर पर पंखा गिरने से वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। इस घटना के बाद स्कूलों की सुरक्षा और आधारभूत ढांचे को लेकर चिंताएं और बढ़ गई हैं।   कमेटी गठन की संभावना पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया था। संभावना जताई जा रही है कि आगामी सुनवाई में इस कमेटी को अंतिम रूप दिया जा सकता है, ताकि जर्जर स्कूलों की स्थिति का आकलन कर सुधार के ठोस उपाय सुझाए जा सकें।

हाई कोर्ट ने नहीं मानी केजरीवाल की दलील, जज स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की याचिका खारिज

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने शराब घोटाला मामले में जज बदलने वाली अरविंद केजरीवाल की मांग ठुकरा दी। केजरीवाल ने मामले में सुनवाई कर रहीं जज स्वर्ण कांता शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाकर मामले को किसी अन्य पीठ को स्थानांतरित करने की मांग की थी। चीफ जस्टिस ने मामले में टिप्पणी भी की। दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि याचिका वर्तमान रोस्टर के अनुसार न्यायमूर्ति शर्मा को सौंपी गई है और प्रशासनिक पक्ष पर आदेश पारित करके इसे स्थानांतरित करने का कोई कारण नहीं पाया जाता। उन्होंने यह भी कहा कि अगर न्यायमूर्ति शर्मा खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग करना चाहें तो यह निर्णय उन्हें लेना है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से 13 मार्च को एक पत्र की जानकारी दी गई थी। यह पत्र उन आठ लोगों को भेजा गया था, जिन्होंने मामले को दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग की थी, जिनमें केजरीवाल भी शामिल थे। चीफ जस्टिस ने मामले में कहा कि प्रशासनिक स्तर पर इस याचिका को किसी अन्य बेंच में ट्रांसफर करने का कोई कारण नहीं दिखता। केजरीवाल के आरोप दरअसल, 11 मार्च को लिखे अपने पत्र में केजरीवाल ने आशंका जताई थी कि यदि मामला जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा के पास ही रहा तो सुनवाई निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से नहीं हो पाएगी। इससे पहले 27 फरवरी को एक ट्रायल कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और 22 अन्य आरोपियों को राहत देते हुए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया था। इसके खिलाफ सीबीआई ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसकी सुनवाई फिलहाल जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा की बेंच में चल रही है। ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों पर जस्टिस शर्मा की रोक 9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने मामले में नोटिस जारी किया था और ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगा दी थी, जिसमें मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को कहा गया था। साथ ही उन्होंने ट्रायल कोर्ट के आदेश की कुछ टिप्पणियों को गलत बताया और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की कार्यवाही को फिलहाल टालने का निर्देश भी दिया। केजरीवाल ने पत्र में क्या मांग की थी केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा था कि 9 मार्च के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस गंभीर त्रुटि के आधार पर बिना दूसरी पक्ष की सुनवाई के ऐसा अंतरिम आदेश दिया गया। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की कार्यवाही टालने का निर्देश दिया, जबकि उस समय अदालत में ईडी पक्षकार भी नहीं थी। आप नेता ने यह भी कहा कि आमतौर पर इस तरह की रिविजन याचिकाओं में पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए चार से पांच सप्ताह का समय दिया जाता है, लेकिन इस मामले में अदालत का रुख जल्दबाजी वाला प्रतीत हुआ, जिससे उन्हें पूर्वाग्रह की आशंका हुई।

केजरीवाल से जुड़े केस में ईडी की याचिका पर हाईकोर्ट की सुनवाई, जज की टिप्पणी बनी चर्चा का विषय

नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति मामले में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने की मांग को लेकर दायर ईडी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि जज की टिप्पणियां संभवतः मामले से सीधे जुड़ी नहीं हो सकतीं और वे सामान्य प्रकृति की भी हो सकती हैं। हाई कोर्ट ने कहा, “जज ने जो कहा है, वह जरूरी नहीं कि इसी मामले के संदर्भ में हो। कई बार जज इस तरह की सामान्य टिप्पणियां करते हैं।” हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हमारा सवाल यह है कि ये जो टिप्पणियां की गई हैं, वे सामान्य प्रकृति की हैं और इनका इस मामले से कोई संबंध नहीं है। आगे कहा कि वह आदेश के संबंधित हिस्सों को देखकर यह तय करेगी कि वे सामान्य टिप्पणियां हैं या फिर इस मामले से जुड़ी हुई हैं। हाई कोर्ट ने क्या कहा बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “आप कह रहे हैं कि आदेश के कुछ पैराग्राफ इस फैसले के संदर्भ में हो सकते हैं? पूरा फैसला वैसे भी चुनौती के दायरे में है, इसलिए जब हम सीबीआई मामले पर सुनवाई करेंगे तो इस निर्णय को भी पढ़ेंगे। इस मामले में नोटिस जारी करेंगे और इसे उसी दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिस दिन ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई होगी।” दरअसल, ईडी ने हाल ही में सीबीआई द्वारा जांच किए जा रहे आबकारी नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य को आरोपमुक्त करते हुए निचली अदालत द्वारा धनशोधन जांच के संबंध में की गई टिप्पणी को हटाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। ईडी का कहना था कि 27 फरवरी का आदेश "न्यायिक अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट उल्लंघन" था क्योंकि अदालत ने एजेंसी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए उसके साक्ष्यों पर ना तो गौर किया और ना ही उसकी बात सुनी। अदालत ने क्या कहा था विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह की अदालत ने पीएमएलए और ईडी जांच के संबंध में कई टिप्पणियां की थीं। आदेश में विशेष रूप से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के विजय मदनलाल चौधरी मामले में कहा था कि एक बार मूल मामला (सीबीआई मामला) समाप्त होने पर ईडी मामला भी अनिवार्य रूप से खत्म हो जाएगा। ईडी की आपत्ति ईडी ने 7 मार्च को दायर अपनी याचिका में आदेश के कई पैराग्राफ का हवाला देते हुए कहा कि अदालत की उसके खिलाफ की गई टिप्पणियां "प्रतिकूल, व्यापक और अवांछित" थीं क्योंकि सुनवाई में ईडी पक्षकार नहीं थी और अदालत के समक्ष केवल सीबीआई की जांच के गुण-दोष पर ही विचार किया जा रहा था। एजेंसी ने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की व्यापक और निराधार टिप्पणियों को बरकरार रहने दिया गया, जिनका आधार ईडी द्वारा एकत्रित किसी भी सामग्री या साक्ष्य पर नहीं है तो इससे सार्वजनिक हित के साथ-साथ ईडी को भी गंभीर और अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।

हाईकोर्ट की महिला जज का बड़ा खुलासा: मेरे चैंबर में घुस आया था शख्स, फिर हुई जमकर पिटाई

ओडिशा ओडिशा हाईकोर्ट की जज सावित्री राठो ने रविवार को खुलकर अपनी कानूनी पेशे की यात्रा पर बात की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था और वह जहां भी जातीं, वहां पहुंच जाता। उन्होंने बताया कि बाद में उस शख्स की जमकर कुटाई भी हुई थी। जस्टिस राठो ने बताया कि कैसे पारिवारिक परेशानी के कारण कॉलेजियम की सिफारिश के बाद भी उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। पीछे पड़ गया था एक शख्स बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस राठो ने बताया कि जब उन्होंने कानूनी पेशे की शुरुआत की, तब एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था। उन्होंने कहा कि वह कोर्ट में जहां भी जातीं, वह उनके पीछे आ जाता। उन्होंने बताया कि बात तब बढ़ गई थी, जब वह उनके चैंबर में तक घुस आया था। जस्टिस राठो ने कहा, 'जब मैंने प्रेक्टिस शुरू की, तो एक शख्स मेरा पीछा करने लगा था। मुझे लगा कि वह हमेशा कोर्ट में है। मेरे पुरुष सहकर्मियों ने मेरी मदद की। एक बार वह मेरे चैंबर में भी आ गया था, लेकिन मैंने ऐसे दिखाया कि मैंने उसे देखा ही नहीं। हालांकि, बाद में उसकी जमकर कुटाई हुई थी।' जज बनने में हुई दिक्कत जस्टिस राठो ने कहा कि कॉलेजियम की तरफ से जज बनने के लिए दो बार उनके नाम की सिफारिश भी की गई थी। उन्होंने कहा, 'मेरे नाम की दो बार सिफारिश की गई थी, लेकिन जो इंचार्ज थे, उन्होंने इसे नहीं माना। उन्हें मेरे परिवार से कुछ परेशानी थी।' पुरुष सहकर्मियों की तारीफ की उन्होंने कहा कि ये आम धारणा है कि इस पेशे में हमेशा एक महिला दूसरी महिला की मदद करती है। उन्होंने कहा कि उनका अनुभव अलग रहा है। जज ने बताया कि करियर की शुरुआत में पुरुष सहकर्मियों ने उनकी काफी मदद की है। उन्होंने कहा कि कई वकील जज लेनदेन के कारण जज बनने में संकोच करते हैं, लेकिन वो उनके लिए कभी चिंता की बात नहीं रही। जस्टिस राठो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित Half the Nation – Half the Bench थीम पर पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस में बोल रहीं थीं। यह आयोजन सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता और महालक्ष्मी पवानी की तरफ से आयोजित किया गया था।  

36 मौतों पर मचा हड़कंप: दूषित पानी केस में हाईकोर्ट में 16 मार्च को बहस, CBI जांच की मांग तेज

इंदौर भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों के मामले में सीबीआइ जांच की मांग करते हुए जनहित याचिका दायर हुई है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में शुक्रवार को याचिका सुनवाई के लिए पहुंची। कोर्ट ने विस्तार से बहस के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है। याचिका अभिभाषक पुनीत शर्मा की ओर से वकील अनिल ओझा ने लगाई। एफआइआर तक दर्ज नहीं कहा है, दूषित पानी से 36 लोगों की जान चली गई, पर किसी जिम्मेदार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एफआइआर तक दर्ज नहीं की गई। अफसरों को बचने का पूरा मौका दिया गया। सिर्फ अफसरों को पद से हटा दिया। उन पर क्रिमिनल केस दर्ज कर जांच होनी चाहिए।   पूर्व निगमायुक्त, प्रदूषण बोर्ड समेत सरकार को बनाया पार्टी – जानबूझकर टेंडर होने के बाद फाइलें दबाई गईं। यह षड्यंत्र के तहत होता नजर आ रहा है। याचिका में तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप यादव को नामजद, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार समेत निगमायुक्त को भी पार्टी बनाया गया है। – दिल्ली के उपकार सिनेमा हॉल अग्निकांड का उदाहरण भी दिया गया। अग्निकांड में लोगों की जान जाने पर अफसरों पर एफआइआर दर्ज कर जांच की गई थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, कहा—एग्जाम में शून्य अंक वालों को नहीं मिल सकती सरकारी नौकरी

जयपुर  राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि उसने रिज़र्व कैटेगरी के तहत क्लास IV सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए कट-ऑफ मार्क्स ज़ीरो क्यों तय किए हैं. कोर्ट ने यह सवाल विनोद कुमार बेटे प्यारेलाल बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सुनवाई के दौरान पूछी है. इस हालात को चौंकाने वाला बताते हुए, जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि यह सरकारी नौकरी में बेसिक स्टैंडर्ड बनाए रखने को लेकर चिंता पैदा करता है। ‘सरकारी कर्मचारी को बेसिक काम तो ठीक से आना ही चाहिए’ कोर्ट ने कहा, ‘अपॉइंटिंग अथॉरिटी के तौर पर, राज्य से उम्मीद की जाती है कि वह रिज़र्व कैटेगरी के लिए भी भर्ती में मिनिमम स्टैंडर्ड पक्का करे, ताकि चुने गए उम्मीदवार बेसिक काम ठीक से कर सकें, चाहे वे क्लास-IV कर्मचारी ही क्यों न हों. जो व्यक्ति लगभग ज़ीरो या नेगेटिव मार्क्स लाता है, उसे सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह आदेश एक रिट पिटीशन पर दिया जिसमें कहा गया था कि हाल ही में एक सरकारी डिपार्टमेंट में क्लास-IV एम्प्लॉई के लिए एक रिक्रूटमेंट प्रोसेस में, कुछ रिज़र्व्ड कैटेगरी के लिए कट-ऑफ मार्क्स 0.0033 जितने कम थे। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।