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हाईकोर्ट की महिला जज का बड़ा खुलासा: मेरे चैंबर में घुस आया था शख्स, फिर हुई जमकर पिटाई

ओडिशा ओडिशा हाईकोर्ट की जज सावित्री राठो ने रविवार को खुलकर अपनी कानूनी पेशे की यात्रा पर बात की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था और वह जहां भी जातीं, वहां पहुंच जाता। उन्होंने बताया कि बाद में उस शख्स की जमकर कुटाई भी हुई थी। जस्टिस राठो ने बताया कि कैसे पारिवारिक परेशानी के कारण कॉलेजियम की सिफारिश के बाद भी उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। पीछे पड़ गया था एक शख्स बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस राठो ने बताया कि जब उन्होंने कानूनी पेशे की शुरुआत की, तब एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था। उन्होंने कहा कि वह कोर्ट में जहां भी जातीं, वह उनके पीछे आ जाता। उन्होंने बताया कि बात तब बढ़ गई थी, जब वह उनके चैंबर में तक घुस आया था। जस्टिस राठो ने कहा, 'जब मैंने प्रेक्टिस शुरू की, तो एक शख्स मेरा पीछा करने लगा था। मुझे लगा कि वह हमेशा कोर्ट में है। मेरे पुरुष सहकर्मियों ने मेरी मदद की। एक बार वह मेरे चैंबर में भी आ गया था, लेकिन मैंने ऐसे दिखाया कि मैंने उसे देखा ही नहीं। हालांकि, बाद में उसकी जमकर कुटाई हुई थी।' जज बनने में हुई दिक्कत जस्टिस राठो ने कहा कि कॉलेजियम की तरफ से जज बनने के लिए दो बार उनके नाम की सिफारिश भी की गई थी। उन्होंने कहा, 'मेरे नाम की दो बार सिफारिश की गई थी, लेकिन जो इंचार्ज थे, उन्होंने इसे नहीं माना। उन्हें मेरे परिवार से कुछ परेशानी थी।' पुरुष सहकर्मियों की तारीफ की उन्होंने कहा कि ये आम धारणा है कि इस पेशे में हमेशा एक महिला दूसरी महिला की मदद करती है। उन्होंने कहा कि उनका अनुभव अलग रहा है। जज ने बताया कि करियर की शुरुआत में पुरुष सहकर्मियों ने उनकी काफी मदद की है। उन्होंने कहा कि कई वकील जज लेनदेन के कारण जज बनने में संकोच करते हैं, लेकिन वो उनके लिए कभी चिंता की बात नहीं रही। जस्टिस राठो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित Half the Nation – Half the Bench थीम पर पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस में बोल रहीं थीं। यह आयोजन सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता और महालक्ष्मी पवानी की तरफ से आयोजित किया गया था।  

36 मौतों पर मचा हड़कंप: दूषित पानी केस में हाईकोर्ट में 16 मार्च को बहस, CBI जांच की मांग तेज

इंदौर भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों के मामले में सीबीआइ जांच की मांग करते हुए जनहित याचिका दायर हुई है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में शुक्रवार को याचिका सुनवाई के लिए पहुंची। कोर्ट ने विस्तार से बहस के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है। याचिका अभिभाषक पुनीत शर्मा की ओर से वकील अनिल ओझा ने लगाई। एफआइआर तक दर्ज नहीं कहा है, दूषित पानी से 36 लोगों की जान चली गई, पर किसी जिम्मेदार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एफआइआर तक दर्ज नहीं की गई। अफसरों को बचने का पूरा मौका दिया गया। सिर्फ अफसरों को पद से हटा दिया। उन पर क्रिमिनल केस दर्ज कर जांच होनी चाहिए।   पूर्व निगमायुक्त, प्रदूषण बोर्ड समेत सरकार को बनाया पार्टी – जानबूझकर टेंडर होने के बाद फाइलें दबाई गईं। यह षड्यंत्र के तहत होता नजर आ रहा है। याचिका में तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप यादव को नामजद, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार समेत निगमायुक्त को भी पार्टी बनाया गया है। – दिल्ली के उपकार सिनेमा हॉल अग्निकांड का उदाहरण भी दिया गया। अग्निकांड में लोगों की जान जाने पर अफसरों पर एफआइआर दर्ज कर जांच की गई थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, कहा—एग्जाम में शून्य अंक वालों को नहीं मिल सकती सरकारी नौकरी

जयपुर  राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि उसने रिज़र्व कैटेगरी के तहत क्लास IV सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए कट-ऑफ मार्क्स ज़ीरो क्यों तय किए हैं. कोर्ट ने यह सवाल विनोद कुमार बेटे प्यारेलाल बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सुनवाई के दौरान पूछी है. इस हालात को चौंकाने वाला बताते हुए, जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि यह सरकारी नौकरी में बेसिक स्टैंडर्ड बनाए रखने को लेकर चिंता पैदा करता है। ‘सरकारी कर्मचारी को बेसिक काम तो ठीक से आना ही चाहिए’ कोर्ट ने कहा, ‘अपॉइंटिंग अथॉरिटी के तौर पर, राज्य से उम्मीद की जाती है कि वह रिज़र्व कैटेगरी के लिए भी भर्ती में मिनिमम स्टैंडर्ड पक्का करे, ताकि चुने गए उम्मीदवार बेसिक काम ठीक से कर सकें, चाहे वे क्लास-IV कर्मचारी ही क्यों न हों. जो व्यक्ति लगभग ज़ीरो या नेगेटिव मार्क्स लाता है, उसे सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह आदेश एक रिट पिटीशन पर दिया जिसमें कहा गया था कि हाल ही में एक सरकारी डिपार्टमेंट में क्लास-IV एम्प्लॉई के लिए एक रिक्रूटमेंट प्रोसेस में, कुछ रिज़र्व्ड कैटेगरी के लिए कट-ऑफ मार्क्स 0.0033 जितने कम थे। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।  

हाईकोर्ट ने गुरदासपुर एनकाउंटर पर उठाई कड़ी प्रतिक्रिया, डीजीपी गौरव यादव से पूछताछ के लिए बुलाया

चंडीगढ़  गुरदासपुर के आदियां पुलिस चौकी में दो पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी रणजीत सिंह के एनकाउंटर मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने डीजीपी गौरव यादव को मामले में जवाब देने के लिए तलब किया है। उन्हें आज दोपहर दो बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखना होगा।  इसी दौरान गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के जेल इंटरव्यू से जुड़े मामले की सुनवाई भी अदालत में होगी। हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में अपना जवाब तैयार रखें। रणजीत सिंह के परिवार ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे फर्जी एनकाउंटर बताया था। परिवार का कहना है कि अभी तक युवक का अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया है। इसी विवाद के बीच हाईकोर्ट ने मामले पर संज्ञान लिया है। यह दूसरा मौका है जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने किसी चर्चित आपराधिक मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। इससे पहले मोहाली में कबड्डी प्रमोटर राणा बलाचौरिया हत्याकांड में भी अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया था।  22 फरवरी को गुरदासपुर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास आदियां गांव की पुलिस चेक पोस्ट पर दो पुलिसकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतकों में एएसआई गुरनाम सिंह और होमगार्ड कांस्टेबल अशोक कुमार शामिल थे। पुलिस के अनुसार यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर करवाया गया था। आरोप है कि तीन युवकों को करीब 20 हजार रुपये देने का लालच देकर इस वारदात को अंजाम दिलाया गया।  मामले में मुख्य आरोपी 19 वर्षीय रणजीत सिंह, जो आदियां गांव का रहने वाला था, को 25 फरवरी को पुरानाशाला इलाके में पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया। पुलिस का कहना है कि वह हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था और उसने फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई। पुलिस ने दूसरे आरोपी दिलावर सिंह को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि तीसरे आरोपी इंदरजीत सिंह को बाद में अमृतसर से पकड़ा गया। हालांकि रणजीत सिंह के एनकाउंटर को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है, जिस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए पंजाब डीजीपी से जवाब मांगा है। पंजाब में पुलिस द्वारा किए जा रहे एनकाउंटर और हिरासत में हुई मौतों के मामले की सीबीआई जांच को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई है। एडवोकेट निखिल सराफ ने यह जनहित याचिका दायर की है। याचिका में गुरदासपुर में युवक की पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत की भी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। इस याचिका पर आज चीफ जस्टिस की बेंच भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी। एक अन्य बैंच ने भी रणजीत मर्डर केस पर संज्ञान लिया है। सुखपाल खैरा ने की सीबीआई जांच की मांग कांग्रेस नेता सुखपाल खैरा ने कहा कि मैं पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा रणजीत सिंह की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग पर खुद संज्ञान लेने का स्वागत करता हूं, जिन्होंने आज ही डीजीपी को तलब किया है। यह पिछले कुछ महीनों में भगवंत मान सरकार के तहत पुलिस द्वारा बनाई गई 42वीं फेक एनकाउंटर की कहानी है। हम अपील करते हैं कि हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई द्वारा समय पर जांच हो ताकि सच्चाई सामने आए और उन सभी दोषी पुलिस अधिकारियों और ताकतवर नेताओं को सज़ा मिले जो लोगों को बेरहमी से मारने के ऐसे गैर-कानूनी आदेश देने में शामिल थे। 

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा- ‘मेरिट सूची में नाम होने से नौकरी का अधिकार नहीं’

चंडीगढ़. करीब डेढ़ दशक पुराने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) की लाइनमैन भर्ती विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने नियुक्ति की मांग कर रहे अभ्यर्थियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया में शामिल होना या मेरिट सूची में स्थान लेना उम्मीदवार को नियुक्ति का वैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने कई याचिकाओं पर संयुक्त निर्णय सुनाते हुए कहा कि वर्ष 2011 में जारी विज्ञापन के तहत भर्ती को केवल 1000 पदों तक सीमित माना जाएगा और शेष पद भविष्य की रिक्तियां मानी जाएंगी। अदालत ने सभी दावों को निराधार ठहराया। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जनवरी 2011 में लगभग 5000 लाइनमैन पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे और उन्होंने चयन प्रक्रिया में सफलतापूर्वक भाग लिया था, लेकिन लंबित जनहित याचिका के कारण नियुक्तियां रोक दी गईं। बाद में बोर्ड आफ डायरेक्टर्स द्वारा शेष पदों की भर्ती रद कर दी गई, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हुए। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पूर्व में दायर जनहित याचिका के दौरान अदालत ने केवल 1000 पद भरने की अनुमति दी थी। इसके बाद उत्पन्न होने वाली रिक्तियां नई भर्ती के माध्यम से ही भरी जानी थीं। अदालत ने माना कि भविष्य की रिक्तियों को पुराने विज्ञापन के आधार पर भरना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत अन्य पात्र उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि आयु सीमा में दी गई छूट केवल उम्मीदवारों को आगामी भर्तियों में भाग लेने का अवसर देने के लिए थी, इसे नियुक्ति का अधिकार नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार का योग्य कानूनी अधिकार स्थापित करने में विफल रहे हैं। इस फैसले से लंबे समय से नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे सैकड़ों अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है, जबकि बिजली निगम को भविष्य की भर्तियां नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से करने की राहत मिल गई है।

देशविरोधी पोस्ट पर आरोपी को बेल, हाईकोर्ट बोला- शर्त माननी होगी तभी मिलेगी राहत

प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इंस्टाग्राम पर कथित रूप से ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार युवक फैजान को जमानत दे दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने फैजान बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में पारित किया। पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की थी। एटा से फैजान की हुई थी गिरफ्तारी फैजान को मई 2025 में एटा जिले के जलेसर थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया, जिनमें धारा 152 भी शामिल थी। यह धारा पूर्व में भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह से जुड़े प्रावधान का स्थान लेती है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी का सोशल मीडिया पोस्ट देश की संप्रभुता और प्रतिष्ठा के खिलाफ था और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता था। देश के खिलाफ नहीं सोशल मीडिया पोस्ट जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एनआई जाफरी ने तर्क दिया कि आरोपी द्वारा की गई पोस्ट भले ही आपत्तिजनक प्रतीत हो, लेकिन उसमें भारत के खिलाफ कोई अपमानजनक, अवमाननापूर्ण या विद्रोह भड़काने वाला कथन नहीं था। उन्होंने कहा कि केवल किसी दुश्मन देश के समर्थन का उल्लेख करना स्वतः धारा 152 के तहत अपराध नहीं बनता। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अधिकतम यह मामला धारा 196 बीएनएस के तहत आ सकता है, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है और जिसमें तीन से पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। कई शर्तों के साथ आरोपी को जमानत राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। हालांकि अदालत ने अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपी की कथित संलिप्तता, जेलों में भीड़भाड़ और निचली अदालतों में लंबित मामलों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया। अदालत ने कड़ी शर्तें लगाते हुए कहा कि आरोपी सोशल मीडिया पर कोई भी ऐसा पोस्ट अपलोड नहीं करेगा जो देश की प्रतिष्ठा या किसी समुदाय के खिलाफ हो। साथ ही वह मामले के गवाहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा और मुकदमे की कार्यवाही में पूरा सहयोग करेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया तो उसकी जमानत को निरस्त भी जा सकता है।  

हाईकोर्ट को मिली बम धमकी, ईमेल में अजमल कसाब का नाम, सुरक्षा एजेंसियों ने बताया अफवाह

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से हड़कंप मच गया। यह धमकी एक संदिग्ध ईमेल के जरिए दी गई थी। ईमेल में अजमल कसाब का भी जिक्र होने की बात सामने आई है। धमकी मिलने के बाद एहतियात के तौर पर हाईकोर्ट की सभी अदालतों में सुनवाई रोक दी गई। परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से कड़ा कर दिया गया। डॉग स्क्वायड और बॉम्ब स्क्वायड की टीम मौके पर पहुंची। उन्होंने हाईकोर्ट परिसर की सघन जांच की। जिले के पुलिस कप्तान एसएसपी रजनेश सिंह ने पूरे सर्च ऑपरेशन की निगरानी की। इस दौरान एएसपी और सीएसपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। हालांकि, गहन जांच के बाद कोई भी संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं हुई। पुलिस ने स्पष्ट किया कि धमकी में किए गए दावे केवल दहशत फैलाने की नीयत से किए गए थे। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है।

बिलासपुर हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, ई-मेल में कैंपस पर हमला करने की चेतावनी, पुलिस और साइबर टीम जांच में जुटी

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय को बम से उड़ाने की धमकी मिलने की सूचना से बुधवार को न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही उच्च न्यायालय परिसर की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और बम स्क्वॉड तथा डॉग स्क्वॉड की टीमों को मौके पर तैनात कर सघन तलाशी अभियान शुरू किया गया। बारीकी से हो रही निगरानी पुलिस से मिली प्रारंभिक जानकारी के अनुसार धमकी मिलने के बाद एहतियातन पूरे परिसर को सुरक्षा घेरे में लिया गया। प्रवेश द्वारों पर जांच सख्त कर दी गई है तथा संदिग्ध वस्तुओं की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी निगरानी भी बढ़ा दी गई है। अन्य जिला न्यायालयों को भी मिल चुकीं धमकियां गौरतलब है कि इससे पूर्व भी प्रदेश के अन्य जिला न्यायालयों को इसी प्रकार की धमकियां मिल चुकी हैं। राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और जगदलपुर के जिला न्यायालयों में भी ऐसी सूचनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया था। हालांकि बाद की जांच में वे सूचनाएं अफवाह साबित हुई थीं। तलाशी और जांच जारी, ढिलाई नहीं… फिलहाल, बिलासपुर उच्च न्यायालय परिसर में तलाशी और जांच की कार्रवाई जारी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए हर पहलू की जांच की जा रही है और सुरक्षा में किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है। 

हाईकोर्ट की तल्ख नसीहत: आस्था पर आपत्ति है तो धर्म छोड़ने की बात क्यों नहीं?

मद्रास यदि कोई व्यक्ति 'जाति और पंथ' का उल्लेख किसी प्रमाण पत्र में नहीं चाहता है तो फिर उसे अपना धर्म त्यागना होगा। इसके बाद ही उसे 'नो कास्ट, नो रिलीजन' वाला प्रमाण पत्र मिल पाएगा। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक केस की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। जस्टिस कृष्णन रामस्वामी ने कहा कि हिंदू परंपरा के अनुसार जब तक कोई धर्म त्याग नहीं करता है, तब तक जाति और पंथ के उल्लेख के बिना प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता। ऐसी मांग को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यही नहीं जस्टिस रामस्वामी ने यह भी कहा कि जब कोई इस प्रकार धर्म का त्याग कर देगा तो फिर ऐसे किसी प्रमाण पत्र की जरूरत ही नहीं रहेगी। इस मामले में एक शख्स ने अर्जी दाखिल की थी। उसका कहना था कि तमिलनाडु के तिरुपत्तूर तालुक के तहसीलदार ने ऐसा प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया है, जिसमें धर्म और जाति का उल्लेखन न हो। तहसीलदार के आदेश को उसने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याची का कहना था कि भले ही मेरे माता-पिता हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते थे। लेकिन मुझे ऐसा प्रमाण पत्र चाहिए, जिसमें जाति और धर्म का उल्लेख न हो। उसकी इस मांग को तहसीलदार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ऐसे प्रमाण पत्र बनाने के संबंध में कोई सरकारी आदेश नहीं है। याचिका की सुनवाई करते हुए बेंच ने शख्स से पूछा था कि क्या आपने अपना वह धर्म त्याग दिया, जिसमें आपका जन्म हुआ था। इस पर याची ने कहा कि उसने अपना धर्मत्याग नहीं किया है। जस्टिस रामस्वामी ने कहा कि याची जब तक हिंदू धर्म के अनुसार अपना पंथ नहीं त्यागता है, तब तक उसकी अर्जी पर विचार नहीं किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि शख्स ने अपना धर्म त्यागने के संबंध में कोई प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया है। ऐसी स्थिति में अदालत की ओर से तहसीलदार के आदेश को बरकरार रखा जाता है। बेंच ने अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत बोली- धर्म छोड़ने का सबूत लाओ, फिर मिलेगा प्रमाण पत्र इसके साथ ही अदालत ने शख्स को यह राहत भी दी कि वह अपना धर्म छोड़ सकता है और उसका सबूत अथॉरिटी को सौंप सकता है। यदि ऐसे सबूत देते हुए आवेदन किया गया तो फिर विचार किया जा सकता है कि इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी किया जाए। यह अपने आप में दिलचस्प मामला था, जिसके तहत शख्स सर्टिफिकेट में जाति और धर्म का उल्लेख नहीं चाहता था।  

लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त: रणवीर सिंह को कोर्ट की दो-टूक, ‘कानून से ऊपर कोई नहीं’

कर्नाटक गोवा में आयोजित इफ्फी 2025 में रणवीर सिंह ने ऋषभ शेट्टी की फिल्म 'कांतारा' के एक सीन की नकल की थी। इसके बाद उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया था। अभिनेता के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने को लेकर शिकायत दर्ज हुई। मामला कोर्ट तक पहुंच चुका है। आज मंगलवार को कर्नाटक हाईकोर्ट की तरफ से उन्हें राहत मिली है। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, 'रणवीर सिंह को राहत देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक स्थानीय देवता का कथित तौर पर मजाक उड़ाने के मामले में बॉलीवुड एक्टर के खिलाफ कोई सख्त कदम न उठाए। बेशक रणवीर सिंह को कोर्ट ने राहत दे दी हो, मगर साथ ही फटकार भी लगाई। गोवा में एक इवेंट के दौरान कर्नाटक के देवता का कथित तौर पर मजाक उड़ाने के लिए एफआईआर रद्द करने की अभिनेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एम नागप्रसन्ना की बेंच ने बेंगलुरु पुलिस को यह निर्देश दिया। हालांकि, बेंच ने एक्टर को उनके बर्ताव के लिए फटकार भी लगाई और कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बेंच ने उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, 'सुपरस्टार कानून से ऊपर नहीं होते'। रणवीर के खिलाफ हुई थी एफआईआर बता दें कि रणवीर सिंह ने 30 नवंबर, 2025 को गोवा में 56वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) के समापन समारोह के दौरान 'कांतारा' के सीन की नकल की थी। एक्टर की इस मिमिक्री और टिप्पणी से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए एक वकील ने एक्टर के खिलाफ केस दर्ज करने के लिए शहर की एक अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट के निर्देश पर शहर की पुलिस ने 'धुरंधर' के लीड एक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। रणवीर सिंह का वर्क फ्रंट बता दें कि ने इफ्फी 2025 में कथित तौर पर चावुंडी (चामुंडा) देवी का मजाक बनाया। इस दौरान 'कांतारा' मूवी फेम कन्नड़ एक्टर-डायरेक्टर ऋषभ शेट्टी भी मौजूद थे। क्लोजिंग सेरेमनी के दौरान रणवीर ने ऋषभ शेट्टी की खूब तारीफ की। उन्होंने 'कांतारा 3' में खुद काम करने की ख्वाहिश भी जताई। साथ ही फिल्म के एक सीन की नकल कर दी। रणवीर सिंह के वर्क फ्रंट की बात करें तो वे अपनी आगामी फिल्म 'धुरंधर 2' को लेकर सुर्खियों में हैं, जो 19 मार्च 2026 को रिलीज होगी।