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हाई कोर्ट ने नहीं मानी केजरीवाल की दलील, जज स्वर्ण कांता शर्मा को हटाने की याचिका खारिज

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट ने शराब घोटाला मामले में जज बदलने वाली अरविंद केजरीवाल की मांग ठुकरा दी। केजरीवाल ने मामले में सुनवाई कर रहीं जज स्वर्ण कांता शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाकर मामले को किसी अन्य पीठ को स्थानांतरित करने की मांग की थी। चीफ जस्टिस ने मामले में टिप्पणी भी की। दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा कि याचिका वर्तमान रोस्टर के अनुसार न्यायमूर्ति शर्मा को सौंपी गई है और प्रशासनिक पक्ष पर आदेश पारित करके इसे स्थानांतरित करने का कोई कारण नहीं पाया जाता। उन्होंने यह भी कहा कि अगर न्यायमूर्ति शर्मा खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग करना चाहें तो यह निर्णय उन्हें लेना है। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से 13 मार्च को एक पत्र की जानकारी दी गई थी। यह पत्र उन आठ लोगों को भेजा गया था, जिन्होंने मामले को दूसरी बेंच में ट्रांसफर करने की मांग की थी, जिनमें केजरीवाल भी शामिल थे। चीफ जस्टिस ने मामले में कहा कि प्रशासनिक स्तर पर इस याचिका को किसी अन्य बेंच में ट्रांसफर करने का कोई कारण नहीं दिखता। केजरीवाल के आरोप दरअसल, 11 मार्च को लिखे अपने पत्र में केजरीवाल ने आशंका जताई थी कि यदि मामला जस्टिस स्वर्णा कांत शर्मा के पास ही रहा तो सुनवाई निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से नहीं हो पाएगी। इससे पहले 27 फरवरी को एक ट्रायल कोर्ट ने आबकारी नीति मामले में केजरीवाल और 22 अन्य आरोपियों को राहत देते हुए उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया था। इसके खिलाफ सीबीआई ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसकी सुनवाई फिलहाल जस्टिस स्वर्ण कांत शर्मा की बेंच में चल रही है। ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों पर जस्टिस शर्मा की रोक 9 मार्च को जस्टिस शर्मा ने मामले में नोटिस जारी किया था और ट्रायल कोर्ट के उस निर्देश पर रोक लगा दी थी, जिसमें मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई करने को कहा गया था। साथ ही उन्होंने ट्रायल कोर्ट के आदेश की कुछ टिप्पणियों को गलत बताया और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की कार्यवाही को फिलहाल टालने का निर्देश भी दिया। केजरीवाल ने पत्र में क्या मांग की थी केजरीवाल ने अपने पत्र में कहा था कि 9 मार्च के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि किस गंभीर त्रुटि के आधार पर बिना दूसरी पक्ष की सुनवाई के ऐसा अंतरिम आदेश दिया गया। उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों की कार्यवाही टालने का निर्देश दिया, जबकि उस समय अदालत में ईडी पक्षकार भी नहीं थी। आप नेता ने यह भी कहा कि आमतौर पर इस तरह की रिविजन याचिकाओं में पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए चार से पांच सप्ताह का समय दिया जाता है, लेकिन इस मामले में अदालत का रुख जल्दबाजी वाला प्रतीत हुआ, जिससे उन्हें पूर्वाग्रह की आशंका हुई।

केजरीवाल से जुड़े केस में ईडी की याचिका पर हाईकोर्ट की सुनवाई, जज की टिप्पणी बनी चर्चा का विषय

नई दिल्ली दिल्ली हाईकोर्ट ने आबकारी नीति मामले में ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने की मांग को लेकर दायर ईडी की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि जज की टिप्पणियां संभवतः मामले से सीधे जुड़ी नहीं हो सकतीं और वे सामान्य प्रकृति की भी हो सकती हैं। हाई कोर्ट ने कहा, “जज ने जो कहा है, वह जरूरी नहीं कि इसी मामले के संदर्भ में हो। कई बार जज इस तरह की सामान्य टिप्पणियां करते हैं।” हाई कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हमारा सवाल यह है कि ये जो टिप्पणियां की गई हैं, वे सामान्य प्रकृति की हैं और इनका इस मामले से कोई संबंध नहीं है। आगे कहा कि वह आदेश के संबंधित हिस्सों को देखकर यह तय करेगी कि वे सामान्य टिप्पणियां हैं या फिर इस मामले से जुड़ी हुई हैं। हाई कोर्ट ने क्या कहा बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा, “आप कह रहे हैं कि आदेश के कुछ पैराग्राफ इस फैसले के संदर्भ में हो सकते हैं? पूरा फैसला वैसे भी चुनौती के दायरे में है, इसलिए जब हम सीबीआई मामले पर सुनवाई करेंगे तो इस निर्णय को भी पढ़ेंगे। इस मामले में नोटिस जारी करेंगे और इसे उसी दिन सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जा रहा है, जिस दिन ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सुनवाई होगी।” दरअसल, ईडी ने हाल ही में सीबीआई द्वारा जांच किए जा रहे आबकारी नीति मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य को आरोपमुक्त करते हुए निचली अदालत द्वारा धनशोधन जांच के संबंध में की गई टिप्पणी को हटाने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था। ईडी का कहना था कि 27 फरवरी का आदेश "न्यायिक अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट उल्लंघन" था क्योंकि अदालत ने एजेंसी के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए उसके साक्ष्यों पर ना तो गौर किया और ना ही उसकी बात सुनी। अदालत ने क्या कहा था विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह की अदालत ने पीएमएलए और ईडी जांच के संबंध में कई टिप्पणियां की थीं। आदेश में विशेष रूप से कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के विजय मदनलाल चौधरी मामले में कहा था कि एक बार मूल मामला (सीबीआई मामला) समाप्त होने पर ईडी मामला भी अनिवार्य रूप से खत्म हो जाएगा। ईडी की आपत्ति ईडी ने 7 मार्च को दायर अपनी याचिका में आदेश के कई पैराग्राफ का हवाला देते हुए कहा कि अदालत की उसके खिलाफ की गई टिप्पणियां "प्रतिकूल, व्यापक और अवांछित" थीं क्योंकि सुनवाई में ईडी पक्षकार नहीं थी और अदालत के समक्ष केवल सीबीआई की जांच के गुण-दोष पर ही विचार किया जा रहा था। एजेंसी ने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की व्यापक और निराधार टिप्पणियों को बरकरार रहने दिया गया, जिनका आधार ईडी द्वारा एकत्रित किसी भी सामग्री या साक्ष्य पर नहीं है तो इससे सार्वजनिक हित के साथ-साथ ईडी को भी गंभीर और अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।

हाईकोर्ट की महिला जज का बड़ा खुलासा: मेरे चैंबर में घुस आया था शख्स, फिर हुई जमकर पिटाई

ओडिशा ओडिशा हाईकोर्ट की जज सावित्री राठो ने रविवार को खुलकर अपनी कानूनी पेशे की यात्रा पर बात की। उन्होंने बताया कि शुरुआत में एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था और वह जहां भी जातीं, वहां पहुंच जाता। उन्होंने बताया कि बाद में उस शख्स की जमकर कुटाई भी हुई थी। जस्टिस राठो ने बताया कि कैसे पारिवारिक परेशानी के कारण कॉलेजियम की सिफारिश के बाद भी उनके नाम पर विचार नहीं किया गया। पीछे पड़ गया था एक शख्स बार एंड बेंच के अनुसार, जस्टिस राठो ने बताया कि जब उन्होंने कानूनी पेशे की शुरुआत की, तब एक शख्स उनके पीछे पड़ गया था। उन्होंने कहा कि वह कोर्ट में जहां भी जातीं, वह उनके पीछे आ जाता। उन्होंने बताया कि बात तब बढ़ गई थी, जब वह उनके चैंबर में तक घुस आया था। जस्टिस राठो ने कहा, 'जब मैंने प्रेक्टिस शुरू की, तो एक शख्स मेरा पीछा करने लगा था। मुझे लगा कि वह हमेशा कोर्ट में है। मेरे पुरुष सहकर्मियों ने मेरी मदद की। एक बार वह मेरे चैंबर में भी आ गया था, लेकिन मैंने ऐसे दिखाया कि मैंने उसे देखा ही नहीं। हालांकि, बाद में उसकी जमकर कुटाई हुई थी।' जज बनने में हुई दिक्कत जस्टिस राठो ने कहा कि कॉलेजियम की तरफ से जज बनने के लिए दो बार उनके नाम की सिफारिश भी की गई थी। उन्होंने कहा, 'मेरे नाम की दो बार सिफारिश की गई थी, लेकिन जो इंचार्ज थे, उन्होंने इसे नहीं माना। उन्हें मेरे परिवार से कुछ परेशानी थी।' पुरुष सहकर्मियों की तारीफ की उन्होंने कहा कि ये आम धारणा है कि इस पेशे में हमेशा एक महिला दूसरी महिला की मदद करती है। उन्होंने कहा कि उनका अनुभव अलग रहा है। जज ने बताया कि करियर की शुरुआत में पुरुष सहकर्मियों ने उनकी काफी मदद की है। उन्होंने कहा कि कई वकील जज लेनदेन के कारण जज बनने में संकोच करते हैं, लेकिन वो उनके लिए कभी चिंता की बात नहीं रही। जस्टिस राठो अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित Half the Nation – Half the Bench थीम पर पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस में बोल रहीं थीं। यह आयोजन सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता और महालक्ष्मी पवानी की तरफ से आयोजित किया गया था।  

36 मौतों पर मचा हड़कंप: दूषित पानी केस में हाईकोर्ट में 16 मार्च को बहस, CBI जांच की मांग तेज

इंदौर भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौतों के मामले में सीबीआइ जांच की मांग करते हुए जनहित याचिका दायर हुई है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में शुक्रवार को याचिका सुनवाई के लिए पहुंची। कोर्ट ने विस्तार से बहस के लिए 16 मार्च की तारीख तय की है। याचिका अभिभाषक पुनीत शर्मा की ओर से वकील अनिल ओझा ने लगाई। एफआइआर तक दर्ज नहीं कहा है, दूषित पानी से 36 लोगों की जान चली गई, पर किसी जिम्मेदार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एफआइआर तक दर्ज नहीं की गई। अफसरों को बचने का पूरा मौका दिया गया। सिर्फ अफसरों को पद से हटा दिया। उन पर क्रिमिनल केस दर्ज कर जांच होनी चाहिए।   पूर्व निगमायुक्त, प्रदूषण बोर्ड समेत सरकार को बनाया पार्टी – जानबूझकर टेंडर होने के बाद फाइलें दबाई गईं। यह षड्यंत्र के तहत होता नजर आ रहा है। याचिका में तत्कालीन निगमायुक्त दिलीप यादव को नामजद, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य सरकार समेत निगमायुक्त को भी पार्टी बनाया गया है। – दिल्ली के उपकार सिनेमा हॉल अग्निकांड का उदाहरण भी दिया गया। अग्निकांड में लोगों की जान जाने पर अफसरों पर एफआइआर दर्ज कर जांच की गई थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, कहा—एग्जाम में शून्य अंक वालों को नहीं मिल सकती सरकारी नौकरी

जयपुर  राजस्थान हाई कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार से यह बताने को कहा कि उसने रिज़र्व कैटेगरी के तहत क्लास IV सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए कट-ऑफ मार्क्स ज़ीरो क्यों तय किए हैं. कोर्ट ने यह सवाल विनोद कुमार बेटे प्यारेलाल बनाम राजस्थान राज्य के मामले में सुनवाई के दौरान पूछी है. इस हालात को चौंकाने वाला बताते हुए, जस्टिस आनंद शर्मा ने कहा कि इस मामले पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है, क्योंकि यह सरकारी नौकरी में बेसिक स्टैंडर्ड बनाए रखने को लेकर चिंता पैदा करता है। ‘सरकारी कर्मचारी को बेसिक काम तो ठीक से आना ही चाहिए’ कोर्ट ने कहा, ‘अपॉइंटिंग अथॉरिटी के तौर पर, राज्य से उम्मीद की जाती है कि वह रिज़र्व कैटेगरी के लिए भी भर्ती में मिनिमम स्टैंडर्ड पक्का करे, ताकि चुने गए उम्मीदवार बेसिक काम ठीक से कर सकें, चाहे वे क्लास-IV कर्मचारी ही क्यों न हों. जो व्यक्ति लगभग ज़ीरो या नेगेटिव मार्क्स लाता है, उसे सही नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह आदेश एक रिट पिटीशन पर दिया जिसमें कहा गया था कि हाल ही में एक सरकारी डिपार्टमेंट में क्लास-IV एम्प्लॉई के लिए एक रिक्रूटमेंट प्रोसेस में, कुछ रिज़र्व्ड कैटेगरी के लिए कट-ऑफ मार्क्स 0.0033 जितने कम थे। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, यह पूरा मामला तब सामने आया जब एक उम्मीदवार ने कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें बताया गया कि हाल ही में हुई एक भर्ती प्रक्रिया में कुछ आरक्षित श्रेणियों के लिए कट-ऑफ महज 0.0033 रखी गई थी। माइनस में नंबर, फिर भी नौकरी ना मिलने की शिकायत दिलचस्प बात यह है कि याचिकाकर्ता ने अदालत का दरवाजा इसलिए खटखटाया क्योंकि उसके अंक शून्य से भी कम थे और इसी आधार पर उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई थी। उसने कोर्ट से शिकायत की कि जब सरकार ने पास होने के लिए कोई न्यूनतम नंबर तय ही नहीं किए हैं, तो उसे फेल क्यों किया गया? जांच में पता चला कि कुछ श्रेणियों में कट-ऑफ महज 0.0033 थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि या तो परीक्षा का पेपर जरूरत से ज्यादा कठिन था या फिर भर्ती प्रक्रिया में लापरवाही बरती गई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि उन्होंने पास होने के लिए कम से कम नंबर की सीमा तय क्यों नहीं की? अब राजस्थान हाईकोर्ट ने संबंधित विभाग के प्रमुख सचिव से जवाब मांगा है। उन्हें हलफनामा देकर यह बताना होगा कि भविष्य में ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। मामले की अगली सुनवाई 9 मार्च को होगी।  

हाईकोर्ट ने गुरदासपुर एनकाउंटर पर उठाई कड़ी प्रतिक्रिया, डीजीपी गौरव यादव से पूछताछ के लिए बुलाया

चंडीगढ़  गुरदासपुर के आदियां पुलिस चौकी में दो पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी रणजीत सिंह के एनकाउंटर मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने डीजीपी गौरव यादव को मामले में जवाब देने के लिए तलब किया है। उन्हें आज दोपहर दो बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखना होगा।  इसी दौरान गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के जेल इंटरव्यू से जुड़े मामले की सुनवाई भी अदालत में होगी। हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में अपना जवाब तैयार रखें। रणजीत सिंह के परिवार ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे फर्जी एनकाउंटर बताया था। परिवार का कहना है कि अभी तक युवक का अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया है। इसी विवाद के बीच हाईकोर्ट ने मामले पर संज्ञान लिया है। यह दूसरा मौका है जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने किसी चर्चित आपराधिक मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। इससे पहले मोहाली में कबड्डी प्रमोटर राणा बलाचौरिया हत्याकांड में भी अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया था।  22 फरवरी को गुरदासपुर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास आदियां गांव की पुलिस चेक पोस्ट पर दो पुलिसकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतकों में एएसआई गुरनाम सिंह और होमगार्ड कांस्टेबल अशोक कुमार शामिल थे। पुलिस के अनुसार यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर करवाया गया था। आरोप है कि तीन युवकों को करीब 20 हजार रुपये देने का लालच देकर इस वारदात को अंजाम दिलाया गया।  मामले में मुख्य आरोपी 19 वर्षीय रणजीत सिंह, जो आदियां गांव का रहने वाला था, को 25 फरवरी को पुरानाशाला इलाके में पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया। पुलिस का कहना है कि वह हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था और उसने फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई। पुलिस ने दूसरे आरोपी दिलावर सिंह को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि तीसरे आरोपी इंदरजीत सिंह को बाद में अमृतसर से पकड़ा गया। हालांकि रणजीत सिंह के एनकाउंटर को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है, जिस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए पंजाब डीजीपी से जवाब मांगा है। पंजाब में पुलिस द्वारा किए जा रहे एनकाउंटर और हिरासत में हुई मौतों के मामले की सीबीआई जांच को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई है। एडवोकेट निखिल सराफ ने यह जनहित याचिका दायर की है। याचिका में गुरदासपुर में युवक की पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत की भी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। इस याचिका पर आज चीफ जस्टिस की बेंच भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी। एक अन्य बैंच ने भी रणजीत मर्डर केस पर संज्ञान लिया है। सुखपाल खैरा ने की सीबीआई जांच की मांग कांग्रेस नेता सुखपाल खैरा ने कहा कि मैं पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा रणजीत सिंह की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग पर खुद संज्ञान लेने का स्वागत करता हूं, जिन्होंने आज ही डीजीपी को तलब किया है। यह पिछले कुछ महीनों में भगवंत मान सरकार के तहत पुलिस द्वारा बनाई गई 42वीं फेक एनकाउंटर की कहानी है। हम अपील करते हैं कि हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई द्वारा समय पर जांच हो ताकि सच्चाई सामने आए और उन सभी दोषी पुलिस अधिकारियों और ताकतवर नेताओं को सज़ा मिले जो लोगों को बेरहमी से मारने के ऐसे गैर-कानूनी आदेश देने में शामिल थे। 

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा- ‘मेरिट सूची में नाम होने से नौकरी का अधिकार नहीं’

चंडीगढ़. करीब डेढ़ दशक पुराने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) की लाइनमैन भर्ती विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने नियुक्ति की मांग कर रहे अभ्यर्थियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया में शामिल होना या मेरिट सूची में स्थान लेना उम्मीदवार को नियुक्ति का वैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने कई याचिकाओं पर संयुक्त निर्णय सुनाते हुए कहा कि वर्ष 2011 में जारी विज्ञापन के तहत भर्ती को केवल 1000 पदों तक सीमित माना जाएगा और शेष पद भविष्य की रिक्तियां मानी जाएंगी। अदालत ने सभी दावों को निराधार ठहराया। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जनवरी 2011 में लगभग 5000 लाइनमैन पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे और उन्होंने चयन प्रक्रिया में सफलतापूर्वक भाग लिया था, लेकिन लंबित जनहित याचिका के कारण नियुक्तियां रोक दी गईं। बाद में बोर्ड आफ डायरेक्टर्स द्वारा शेष पदों की भर्ती रद कर दी गई, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हुए। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पूर्व में दायर जनहित याचिका के दौरान अदालत ने केवल 1000 पद भरने की अनुमति दी थी। इसके बाद उत्पन्न होने वाली रिक्तियां नई भर्ती के माध्यम से ही भरी जानी थीं। अदालत ने माना कि भविष्य की रिक्तियों को पुराने विज्ञापन के आधार पर भरना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत अन्य पात्र उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि आयु सीमा में दी गई छूट केवल उम्मीदवारों को आगामी भर्तियों में भाग लेने का अवसर देने के लिए थी, इसे नियुक्ति का अधिकार नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार का योग्य कानूनी अधिकार स्थापित करने में विफल रहे हैं। इस फैसले से लंबे समय से नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे सैकड़ों अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है, जबकि बिजली निगम को भविष्य की भर्तियां नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से करने की राहत मिल गई है।

देशविरोधी पोस्ट पर आरोपी को बेल, हाईकोर्ट बोला- शर्त माननी होगी तभी मिलेगी राहत

प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इंस्टाग्राम पर कथित रूप से ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार युवक फैजान को जमानत दे दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने फैजान बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में पारित किया। पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की थी। एटा से फैजान की हुई थी गिरफ्तारी फैजान को मई 2025 में एटा जिले के जलेसर थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया, जिनमें धारा 152 भी शामिल थी। यह धारा पूर्व में भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह से जुड़े प्रावधान का स्थान लेती है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी का सोशल मीडिया पोस्ट देश की संप्रभुता और प्रतिष्ठा के खिलाफ था और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता था। देश के खिलाफ नहीं सोशल मीडिया पोस्ट जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एनआई जाफरी ने तर्क दिया कि आरोपी द्वारा की गई पोस्ट भले ही आपत्तिजनक प्रतीत हो, लेकिन उसमें भारत के खिलाफ कोई अपमानजनक, अवमाननापूर्ण या विद्रोह भड़काने वाला कथन नहीं था। उन्होंने कहा कि केवल किसी दुश्मन देश के समर्थन का उल्लेख करना स्वतः धारा 152 के तहत अपराध नहीं बनता। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अधिकतम यह मामला धारा 196 बीएनएस के तहत आ सकता है, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है और जिसमें तीन से पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। कई शर्तों के साथ आरोपी को जमानत राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। हालांकि अदालत ने अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपी की कथित संलिप्तता, जेलों में भीड़भाड़ और निचली अदालतों में लंबित मामलों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया। अदालत ने कड़ी शर्तें लगाते हुए कहा कि आरोपी सोशल मीडिया पर कोई भी ऐसा पोस्ट अपलोड नहीं करेगा जो देश की प्रतिष्ठा या किसी समुदाय के खिलाफ हो। साथ ही वह मामले के गवाहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा और मुकदमे की कार्यवाही में पूरा सहयोग करेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया तो उसकी जमानत को निरस्त भी जा सकता है।  

हाईकोर्ट को मिली बम धमकी, ईमेल में अजमल कसाब का नाम, सुरक्षा एजेंसियों ने बताया अफवाह

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से हड़कंप मच गया। यह धमकी एक संदिग्ध ईमेल के जरिए दी गई थी। ईमेल में अजमल कसाब का भी जिक्र होने की बात सामने आई है। धमकी मिलने के बाद एहतियात के तौर पर हाईकोर्ट की सभी अदालतों में सुनवाई रोक दी गई। परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से कड़ा कर दिया गया। डॉग स्क्वायड और बॉम्ब स्क्वायड की टीम मौके पर पहुंची। उन्होंने हाईकोर्ट परिसर की सघन जांच की। जिले के पुलिस कप्तान एसएसपी रजनेश सिंह ने पूरे सर्च ऑपरेशन की निगरानी की। इस दौरान एएसपी और सीएसपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। हालांकि, गहन जांच के बाद कोई भी संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं हुई। पुलिस ने स्पष्ट किया कि धमकी में किए गए दावे केवल दहशत फैलाने की नीयत से किए गए थे। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है।

बिलासपुर हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, ई-मेल में कैंपस पर हमला करने की चेतावनी, पुलिस और साइबर टीम जांच में जुटी

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय को बम से उड़ाने की धमकी मिलने की सूचना से बुधवार को न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही उच्च न्यायालय परिसर की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और बम स्क्वॉड तथा डॉग स्क्वॉड की टीमों को मौके पर तैनात कर सघन तलाशी अभियान शुरू किया गया। बारीकी से हो रही निगरानी पुलिस से मिली प्रारंभिक जानकारी के अनुसार धमकी मिलने के बाद एहतियातन पूरे परिसर को सुरक्षा घेरे में लिया गया। प्रवेश द्वारों पर जांच सख्त कर दी गई है तथा संदिग्ध वस्तुओं की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी निगरानी भी बढ़ा दी गई है। अन्य जिला न्यायालयों को भी मिल चुकीं धमकियां गौरतलब है कि इससे पूर्व भी प्रदेश के अन्य जिला न्यायालयों को इसी प्रकार की धमकियां मिल चुकी हैं। राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और जगदलपुर के जिला न्यायालयों में भी ऐसी सूचनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया था। हालांकि बाद की जांच में वे सूचनाएं अफवाह साबित हुई थीं। तलाशी और जांच जारी, ढिलाई नहीं… फिलहाल, बिलासपुर उच्च न्यायालय परिसर में तलाशी और जांच की कार्रवाई जारी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए हर पहलू की जांच की जा रही है और सुरक्षा में किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है।