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हाई कोर्ट का सख्त रुख: बिजली चोरी केस में सबूत विश्वसनीय, दोषसिद्धि बरकरार

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बिजली चोरी के एक मामले में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया है. प्रकरण के अनुसार 28 जनवरी 2015 को छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड की सतर्कता टीम ने कवर्धा शहर में एक परिसर का निरीक्षण किया. जांच के दौरान पाया गया कि आरोपी विक्की गुप्ता द्वारा लिए गए बिजली कनेक्शन में मीटर बोर्ड के पीछे सर्विस वायर से छेड़छाड़ कर अतिरिक्त तार और एमसीबी लगाकर मीटर को बायपास किया गया था. इस व्यवस्था के कारण बिजली की खपत तो हो रही थी, लेकिन मीटर में वास्तविक खपत दर्ज नहीं हो रही थी. जांच में कुल 2840 वॉट का घरेलू लोड पाया गया. मौके से तार, एमसीबी और अन्य सामग्री जब्त कर पंचनामा तैयार किया गया. एक लाख से अधिक का जुर्माना आकलित बिजली विभाग ने गणना पत्रक के आधार पर आरोपी पर 1,18,925 का अस्थायी आकलन (प्रोविजनल असेसमेंट) लगाया और सात दिन में राशि जमा करने या आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया. हालांकि आरोपी ने न तो आपत्ति दी और न ही निर्धारित समय में राशि जमा की, जिसके बाद विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया गया. ट्रायल कोर्ट ने दी थी सजा कबीरधाम जिले के विशेष न्यायाधीश (विद्युत अधिनियम) ने 22 नवंबर 2018 को आरोपी को इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 135(1)(ए) के तहत दोषी ठहराया. अदालत ने आरोपी को न्यायालय उठने तक की सजा और 1000 के अर्थदंड से दंडित किया था. जुर्माना न देने पर एक माह के साधारण कारावास का प्रावधान रखा गया था. अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा है. गवाहों के बयान में विरोधाभास हैं, और स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत नहीं किए गए. यह भी कहा गया कि आरोपी ने आकलित राशि जमा कर दी थी, जिससे आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती. हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद कहा कि सतर्कता टीम द्वारा की गई जांच, जब्ती और दस्तावेजी साक्ष्य विश्वसनीय हैं. अधिकारियों के बयान जिरह में कमजोर नहीं पड़े और साक्ष्य स्पष्ट रूप से मीटर बायपास कर बिजली उपयोग को सिद्ध करते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा अत्यंत हल्की और अनुपातिक है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता. इसी के साथ कोर्ट ने आपराधिक अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश को यथावत रखा.

झूठा हलफनामा देने पर हाईकोर्ट ने मेट्रो रेल के महाप्रबंधक को व्यक्तिगत किया तलब

जबलपुर. हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश मेट्रो रेल निगम लिमिटेड के महाप्रबंधक हरिओम शर्मा को निर्देश दिए हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर यह स्पष्टीकरण दें कि उन्होंने अदालत में झूठा हलफनामा क्यों पेश किया। जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने महाप्रबंधक को 23 फरवरी को उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। क्या है मामला यह मामला भोपाल मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक छह के समीप चल रहे मेट्रो निर्माण कार्य के कारण उत्पन्न अवरोध एवं बैरिकेडिंग से संबंधित है। भोपाल निवासी श्रीनिवास अग्रवाल व अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि मेट्रो प्रबंधन ने फेंसिंग और बैरिकेडिंग पूरी तरह से नहीं हटाई है। इससे आवागमन में दिक्कत हो रही है। हलफनामे में कहा गया कि बैरिकेडिंग हटा दी गई है इस पर मेट्रो रेल प्रशासन की ओर से हलफनामे में कहा गया कि बैरिकेडिंग हटा दी गई है। इस पर हाई कोर्ट ने कलेक्टर से रिपोर्ट मांगी थी। कलेक्टर भोपाल द्वारा किए गए स्थल निरीक्षण के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया कि याचिकाकर्ताओं को मात्र लगभग 3.75 फीट का संकरा मार्ग उपलब्ध कराया गया है, जो व्यवहारिक उपयोग के लिए पर्याप्त नहीं है। तीनों ओर की बैरिकेडिंग हटाई नहीं गई यह भी बताया गया कि तीनों ओर की बैरिकेडिंग हटाई नहीं गई है, जबकि महाप्रबंधक द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत शपथपत्र में यह उल्लेख किया गया था कि बैरिकेडिंग पूर्णतः हटा दी गई है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शूटरों की याचिका पर सुनाया फैसला, प्रैक्टिस के लिए 1000 रायफलें दी जाएंगी

जबलपुर  भोपाल के शूटरों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली है. भोपाल कलेक्टर द्वारा शूटरों को अभ्यास के लिए प्रदान किये जाने वाले कारतूसों की संख्या कम किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. 19 फरवरी को हाईकोर्ट जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा दिये जाने के आदेश पारित किये हैं. याचिका की सुनवाई के दौरान एकलपीठ को बताया गया कि, ''केन्द्र सरकार ने राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का लायसेंस निरस्त कर दिया है. एकलपीठ ने इस संबंध में आदेश पेश करने के निर्देश दिये हैं. याचिका पर अगली सुनवाई 23 फरवरी को तय की गयी है. भोपाल के शूटर ने दायर की थी याचिका भोपाल निवासी इब्राहिम जावेद खान सहित अन्य 3 लोगों की तरफ से याचिका दायर की गयी थी. याचिका में कहा गया था कि याचिकाकर्ता इब्राहिम जावेद खान एक मशहूर शूटर है और अन्य याचिकाकर्ता शूटर बनना चाहते हैं. उन्हें आर्म्स रूल्स, 2016 के नियमों के तहत कारतूस देने के लिए कोटा निर्धारित किया है. जिला कलेक्टर ने शूटरों को कारतूस प्रदान करने के संबंध में एक कमेटी गठित की थी. कारतूस न होने से प्रतियोगिता में शामिल होना मुश्किल कमेटी ने प्रैक्टिस के लिए एक-एक हजार कारतूस प्रदान करने के आदेश जारी किये थे. कमेटी की सिफारिश के बावजूद भी निर्धारित कोटे को घटाकर सिर्फ 500 कारतूस कर दिया है. याचिका में कहा गया था कि कलेक्टर द्वारा पारित विवादित आदेश के कारण याचिकाकर्ता आने वाले समय में आयोजित प्रतियोगिता में शामिल नहीं हो पाएंगे. प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता है और उनके पास कारतूस नहीं हैं. सरकार की तरफ से एकलपीठ को बताया गया कि, जनहित में कोटा बढ़ाने का फैसला लिया जा सकता है. जाने-माने शूटर तथा उभरते शूटर को एक हजार कारतूस दिये जायेंगे. जिससे वह आने वाली प्रतियोगिता की तैयारी कर सकें. वह बता सकें कि, सभी कारतूस ट्रेनिंग में समाप्त हो गये हैं तो उन्हें एक हजार कारतूस का कोटा रिन्यू कर दिया जायेगा. शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा आवंटित हो एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि, ''शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा आवंटित किया जाये. जिससे वह आने वाली प्रतियोगिता की तैयारी कर सकें. कारतूस का कोटा खत्म होने पर वह जिला कलेक्टर को रिपोर्ट करेंगे. जिला कलेक्टर कारतूस के इस्तेमाल की जांच करने के बाद अभ्यास के लिए कारतूस जारी करना सुनिश्चित करें. इसके अलावा स्पोर्ट कैटेगरी के हथियारों के इस्तेमाल के बारे में भारत सरकार की राय और खिलाड़ियों को दिये जाने वाली कारतूस की संख्या के संबंध में भी हाईकोर्ट में पेश की जाये.'' याचिका की सनुवाई के दौरान केन्द्र सरकार के अधिवक्ता की तरफ से एकलपीठ को बताया गया कि, ''राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का लाइसेंस कैंसिल कर दिया गया है. उनके द्वारा इस संबंध में कोई आदेश पेश नहीं किया गया.'' एकलपीठ ने केन्द्र सरकार के अधिवक्ता को आदेश पेश करने के निर्देश जारी किये हैं. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को केंद्रीय गृह विभाग को अनावेदक बनाने के निर्देश भी एकलपीठ ने जारी किये हैं. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता विशाल डेनियल ने पैरवी की.

VSK ऐप मामले में शिक्षकों को राहत, हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक कार्रवाई पर लगाई अंतरिम रोक

बिलासपुर। VSK ऐप को लेकर प्रदेश के शिक्षकों के लिए राहत भरी खबर आई है। हाईकोर्ट ने VSK ऐप को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल याचिकाकर्ता शिक्षक को ऐप इंस्टॉल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा और याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई पर भी रोक रहेगी। मामले की सुनवाई जस्टिस एन के चंद्रवंशी की सिंगल बेंच में हुई। दरअसल, शिक्षक कमलेश सिंह बिसेन ने VSK ऐप की अनिवार्यता को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जिसमें कहा गया, कि सरकार किसी भी थर्ड पार्टी ऐप को शिक्षकों पर जबरन लागू नहीं कर सकती। उन्होंने इसे शिक्षकों की निजता का उल्लंघन बताते हुए कहा कि शिक्षकों के व्यक्तिगत मोबाइल फोन का उपयोग शासकीय कार्यों के लिए बाध्यकारी रूप से नहीं कराया जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत तर्कों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में विस्तृत जवाब पेश करने कहा है। हालांकि ये आदेश कोर्ट ने सिर्फ याचिकाकर्ता शिक्षक के संदर्भ में ही जारी किया है, इसका लाभ अन्य शिक्षकों को भी मिलेगा या नहीं, ये अभी साफ नहीं है। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक राज्य सरकार शिक्षकों को VSK ऐप लागू करने के लिए बाध्य नहीं करेगी। साथ ही, इस मुद्दे को लेकर किसी भी शिक्षक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। मामले में याचिकाकर्ता कमलेश सिंह बिसेन ने खुद अदालत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि याचिका में दो प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है। पहला, शिक्षकों की निजता का प्रश्न और दूसरा, निजी संसाधनों के अनिवार्य उपयोग का विषय। उनके अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय है।

972 करोड़ की योजना पर हाई कोर्ट भड़का: ‘क्या डायल 112 के लिए मर्सिडीज चलानी है?’

जबलपुर  मध्य प्रदेश में डायल 112 फेज-2 प्रोजेक्ट को लेकर छिड़ा विवाद अब हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। 972 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत और टेंडर की शर्तों को लेकर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर तीखी टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान परियोजना की लागत पर हैरानी जताई। जब यह तथ्य सामने आया कि 1200 वाहनों के इस प्रोजेक्ट पर 972 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तो कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा- 'क्या आप डायल 112 में मर्सिडीज कार चला रहे हैं?' यह टिप्पणी सीधे तौर पर सरकारी धन के उपयोग और प्रोजेक्ट की प्लानिंग पर सवाल उठाती है। अदालत ने 6 करोड़ 29 लाख रुपए के सीएडी (कंप्यूटर आधारित प्रेषण) सॉफ्टवेयर के लिए जारी नए टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने सरकार को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और पुलिस विभाग से वर्तमान सॉफ्टवेयर की कार्यक्षमता पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। विवाद की क्या है मुख्य वजह? ईएमआरआई ग्रीन हेल्थ सर्विसेज (EMRI) के अनुसार, उन्हें मार्च 2025 में सिस्टम इंटीग्रेटर नियुक्त किया गया था और सितंबर 2025 से सेवाएं शुरू हो चुकी हैं। कंपनी का आरोप है कि दिसंबर 2025 में सॉफ्टवेयर के लिए अलग टेंडर जारी करना मूल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है। राज्य सरकार और पुलिस विभाग का तर्क है कि 972 करोड़ रुपए में केवल वाहन ही नहीं, बल्कि डेटा सेंटर, तकनीकी ढांचा और परिचालन लागत भी शामिल है। उनका दावा है कि वर्तमान सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामियां हैं, जिन्हें दूर करने के लिए नया टेंडर अनिवार्य था। प्रोजेक्ट की क्या है स्थिति? फेज-2 के तहत 1200 वाहनों के माध्यम से पुलिस सहायता को आधुनिक बनाने का लक्ष्य है। हालांकि, तकनीकी और कानूनी पेच ने फिलहाल इस महत्वाकांक्षी परियोजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

हाई कोर्ट का फैसला: पति-पत्नी जैसा व्यवहार, होटल की रातों को देखते हुए आरोपी को मिली राहत

कलकत्ता  कलकत्ता हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि अगर शादी नहीं हो पाती है और रिश्ता में कड़वाहट आती है, तो सिर्फ इसलिए ही सहमति से बने शारीरिक संबंधों को रेप नहीं माना जा सकता। जज ने कहा कि शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा होना चाहिए था। साथ ही कहा कि जिस तरह से महिला और पुरुष बर्ताव कर रहे थे, उससे सहमति के संकेत मिल रहे थे। क्या था मामला मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार को हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया। आरोप थे कि उसने शादी का वादा कर महिला के साथ बलात्कार किया और जबरन गर्भपात कराया है। कोर्ट ने कहा कि दोनों साथ में घूमे, रहे और पति पत्नी की तरह रहे। ऐसे में यह आपसी सहमति दिखाता है। जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) मामले की सुनवाई कर रहीं थीं। अदालत ने क्या कहा उन्होंने कहा, 'शुरुआत से ही (संबंध बनते समय) धोखा देने या गलत इरादा होना चाहिए था, जिसके कारण महिला को यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया गया हो।' जज ने कहा है कि जिस तरह से उस पुरुष और महिला ने एक-दूसरे के साथ व्यवहार किया, वह 'साफ तौर पर आपसी सहमति और साथ को दिखाता है न कि 'धोखाधड़ी के से उकसावे या प्रलोभन' को।' जज ने कहा, 'रिश्ता… साल 2017 में शुरू हुआ और साल 2022 में खटास आने तक जारी रहा। रिश्ते के दौरान… उन्होंने शारीरिक संबंध बनाए, दीघा, पार्क स्ट्रीट, खड़गपुर और गोवा के कई होटलों में साथ रातें गुजारीं और पति-पत्नी की तरह रहे। यह भी स्वीकार किया गया है कि महिला गर्भवती हो गई थी और पीड़िता और आरोपी की सहमति से गर्भपात कराया गया था।' उन्होंने कहा, 'आरोपी के खिलाफ कोई शिकायत करने के बजाए महिला ने रिश्ता जारी रखा…। ऐसे में किसी भी बात से यह साफ नहीं होता कि वह बीते 5 या 6 सालों से किसी भी तरह की गलतफहमी में थीं।' शिकायत इस मामले में महिला साल 2017 में रिश्ते में आई थीं। उन्होंने आरोप लगाए थे कि साल 2018 में आरोपी ने उन्हें कुछ पिलाकर बलात्कार किया, लेकिन वह चुप रही क्योंकि उसने शादी का वादा किया था। इसके बाद दोनों दीघा और गोवा ट्रिप पर गए थे। साल 2020 में महिला गर्भवती हो गई थी और बाद में गर्भपात भी कराया गया। महिला ने आरोप लगाए कि वह शादी के वादे के कारण गर्भपात के लिए तैयार हुई थी। जब आरोपी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, तो महिला ने 16 फरवरी 2022 में पश्चिम मिदनापुर में पुलिस शिकायत दर्ज कराई। 23 फरवरी को आरोपी को गिरफ्तार किया गया था।

लंबे समय तक सहमति से संबंध के बाद शादी से मुकरना अपराध नहीं: हाई कोर्ट

उत्तराखंड उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाने के बाद शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यस्कों के बीच सहमति से संबंध नते हैं तो रेप केस के लिए यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में हों तो शादी के वादे को पूरा न करना आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था। इस मामले में मसूरी की एक महिला ने सूरज बोरा नामक आदमी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। बोरा ने 45 दिनों के भीतर शादी का आश्वासन देने के बाद बाद में इनकार कर दिया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दायर किया जिसे बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क थे और लंबे समय से आपसी सहमति से संबंध बनाए हुए थे। एफआईआर में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि रिश्ते की शुरुआत में आरोपी का इरादा कपटपूर्ण था। यह केवल एक असफल रिश्ता था और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता की सहमति पूरी तरह से शादी के आश्वासन पर आधारित थी, जिसे आरोपी बाद में पूरा करने में विफल रहा। उन्होंने आगे कहा कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था, यह केवल मुकदमे के दौरान सबूतों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है। इसलिए, कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस आशीष नैथानी ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी वयस्क महिला द्वारा दी गई सहमति मात्र इसलिए अमान्य नहीं हो जाती क्योंकि संबंध शादी में नहीं बदला। इसे धारा 376 के तहत अपराध मानने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि शादी का वादा केवल संबंध बनाने के लए सहमति पाने का एक साधन था और आरोपी का शादी करने का कोई इरादा नहीं था। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय से रिश्ते में थे और उनके बीच बार-बार शारीरिक संबंध बने थे, जिससे प्रारंभिक धोखाधड़ी के बजाय आपसी सहमति का संकेत मिलता है। हाई कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि ठोस आधार के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी का उत्पीड़न होगा। हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामला और सूरज बोरा के खिलाफ 22 जुलाई 2023 की चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया।  

पति को फंसाने की साजिश नाकाम: झूठे दहेज आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, पत्नी को लगाई फटकार

बिलासपुर बिलासपुर से एक अहम कानूनी फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज कराई गई झूठी और निराधार दहेज प्रताड़ना शिकायत को मानसिक क्रूरता करार दिया है। कोर्ट ने माना कि इस तरह के आरोप लगाकर पति और उसके परिजनों को जेल भिजवाने की कोशिश करना वैवाहिक रिश्ते को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है। मामले में पति ने धमतरी परिवार न्यायालय में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे परिवार न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद पति की अपील स्वीकार करते हुए उसे तलाक का हकदार माना। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी द्वारा सास के खिलाफ निराधार और मानहानिकारक आरोप लगाना, पति और उसके परिवार के बरी होने के बावजूद उच्च अदालतों में अपील दायर करना और उन्हें सजा दिलाने के प्रयास करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। गौरतलब है कि महिला ने 2017 में आईपीसी की धारा 498A के तहत पति, उसके भाई और मां के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था। ट्रायल कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया था। इसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट के इस फैसले को वैवाहिक मामलों में झूठे आपराधिक आरोपों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।  

HC ने 28 सप्ताह की गर्भावस्था में 13 साल की लड़की को अबॉर्शन की मंजूरी दी, विवादित फैसला

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 24 हफ्ते की सीमा पार हो जाने के बाद भी 13 साल की एक रेप पीड़िता को अबॉर्शन कराने की इजाजत दी है। बच्ची 28 सप्ताह की प्रेग्नेंट है। पीड़िता और उसके परिवार की इच्छा को तरजीह देते हुए अदालत ने डॉक्टरों को सुरक्षित तरीके से अबॉर्शन करने को कहा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच में जस्टिस विशाल मिश्रा ने कहा कि कानून 24 सप्ताह के बाद मेडिकल टर्मिनेशन (MTP) को बाधित करता है, पर गर्भ को जारी रखने का फैसला गर्भवती पर निर्भर है। इस केस में नाबालिग बच्ची और उसके माता-पिता ने साफ तौर पर कहा है कि वे गर्भ को जारी नहीं रखना चाहते हैं। इस मामले को सागर जिले के खुराई स्थित एक अदालत ने हाई कोर्ट के सामने पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि गर्भ को जारी रखने और जन्म देने के लिए गर्भवती की सहमति सबसे ऊपर है, नाबालिग के मामले में भी। अदालत ने बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड के विचार का भी संज्ञान लिया जिसमें कहा गया है कि चिकित्सकीय गर्भपात संभव है। हालांकि, कुछ जोखिम जरूर है। अदालत ने मेडिकल बोर्ड से कहा है कि बच्ची और उसके परिजनों को जोखिमों के बार में बताया जाए और एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम के द्वारा गर्भपात कराया जाए।

हाईकोर्ट ने तलाक मामले में कहा- व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग के सबूत मान्य

बिलासपुर. हाईकोर्ट ने पति-पत्नी से संबंधित विवाद के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मंजूर करने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने मामले में पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि परिवार न्यायालय के पास यह विशेष शक्ति है कि मामले के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को बतौर सबूत स्वीकार कर सकते हैं। बता दें कि रायपुर निवासी ने पत्नी से तलाक की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता पति ने पत्नी की अन्य लोगों के साथ व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड में लेने के लिए आवेदन किया था। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया। हालांकि फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका मंजूर कर ली, जिसके खिलाफ पत्नी हाईकोर्ट पहुंची। हाईकोर्ट ने भी परिवार न्यायालय के आदेश पर मुहर लगाते हुए पति को राहत दी है और प्राइवेसी से अहम फेयर ट्रायल को माना है।