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हाईकोर्ट ने गुरदासपुर एनकाउंटर पर उठाई कड़ी प्रतिक्रिया, डीजीपी गौरव यादव से पूछताछ के लिए बुलाया

चंडीगढ़  गुरदासपुर के आदियां पुलिस चौकी में दो पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी रणजीत सिंह के एनकाउंटर मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है। अदालत ने डीजीपी गौरव यादव को मामले में जवाब देने के लिए तलब किया है। उन्हें आज दोपहर दो बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखना होगा।  इसी दौरान गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के जेल इंटरव्यू से जुड़े मामले की सुनवाई भी अदालत में होगी। हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे इस मामले में अपना जवाब तैयार रखें। रणजीत सिंह के परिवार ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे फर्जी एनकाउंटर बताया था। परिवार का कहना है कि अभी तक युवक का अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया है। इसी विवाद के बीच हाईकोर्ट ने मामले पर संज्ञान लिया है। यह दूसरा मौका है जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने किसी चर्चित आपराधिक मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। इससे पहले मोहाली में कबड्डी प्रमोटर राणा बलाचौरिया हत्याकांड में भी अदालत ने स्वतः संज्ञान लिया था।  22 फरवरी को गुरदासपुर में भारत-पाकिस्तान सीमा के पास आदियां गांव की पुलिस चेक पोस्ट पर दो पुलिसकर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मृतकों में एएसआई गुरनाम सिंह और होमगार्ड कांस्टेबल अशोक कुमार शामिल थे। पुलिस के अनुसार यह हमला पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर करवाया गया था। आरोप है कि तीन युवकों को करीब 20 हजार रुपये देने का लालच देकर इस वारदात को अंजाम दिलाया गया।  मामले में मुख्य आरोपी 19 वर्षीय रणजीत सिंह, जो आदियां गांव का रहने वाला था, को 25 फरवरी को पुरानाशाला इलाके में पुलिस एनकाउंटर में मार गिराया गया। पुलिस का कहना है कि वह हिरासत से भागने की कोशिश कर रहा था और उसने फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई। पुलिस ने दूसरे आरोपी दिलावर सिंह को पहले ही गिरफ्तार कर लिया था, जबकि तीसरे आरोपी इंदरजीत सिंह को बाद में अमृतसर से पकड़ा गया। हालांकि रणजीत सिंह के एनकाउंटर को लेकर अब विवाद खड़ा हो गया है, जिस पर हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए पंजाब डीजीपी से जवाब मांगा है। पंजाब में पुलिस द्वारा किए जा रहे एनकाउंटर और हिरासत में हुई मौतों के मामले की सीबीआई जांच को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल हुई है। एडवोकेट निखिल सराफ ने यह जनहित याचिका दायर की है। याचिका में गुरदासपुर में युवक की पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत की भी निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। इस याचिका पर आज चीफ जस्टिस की बेंच भी दोपहर बाद सुनवाई करेगी। एक अन्य बैंच ने भी रणजीत मर्डर केस पर संज्ञान लिया है। सुखपाल खैरा ने की सीबीआई जांच की मांग कांग्रेस नेता सुखपाल खैरा ने कहा कि मैं पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा रणजीत सिंह की एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग पर खुद संज्ञान लेने का स्वागत करता हूं, जिन्होंने आज ही डीजीपी को तलब किया है। यह पिछले कुछ महीनों में भगवंत मान सरकार के तहत पुलिस द्वारा बनाई गई 42वीं फेक एनकाउंटर की कहानी है। हम अपील करते हैं कि हाई कोर्ट की निगरानी में सीबीआई द्वारा समय पर जांच हो ताकि सच्चाई सामने आए और उन सभी दोषी पुलिस अधिकारियों और ताकतवर नेताओं को सज़ा मिले जो लोगों को बेरहमी से मारने के ऐसे गैर-कानूनी आदेश देने में शामिल थे। 

पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा- ‘मेरिट सूची में नाम होने से नौकरी का अधिकार नहीं’

चंडीगढ़. करीब डेढ़ दशक पुराने पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) की लाइनमैन भर्ती विवाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने नियुक्ति की मांग कर रहे अभ्यर्थियों की याचिकाएं खारिज कर दी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया में शामिल होना या मेरिट सूची में स्थान लेना उम्मीदवार को नियुक्ति का वैधानिक अधिकार प्रदान नहीं करता। जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ की एकल पीठ ने कई याचिकाओं पर संयुक्त निर्णय सुनाते हुए कहा कि वर्ष 2011 में जारी विज्ञापन के तहत भर्ती को केवल 1000 पदों तक सीमित माना जाएगा और शेष पद भविष्य की रिक्तियां मानी जाएंगी। अदालत ने सभी दावों को निराधार ठहराया। अदालत के समक्ष याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जनवरी 2011 में लगभग 5000 लाइनमैन पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे और उन्होंने चयन प्रक्रिया में सफलतापूर्वक भाग लिया था, लेकिन लंबित जनहित याचिका के कारण नियुक्तियां रोक दी गईं। बाद में बोर्ड आफ डायरेक्टर्स द्वारा शेष पदों की भर्ती रद कर दी गई, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हुए। हालांकि, हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि पूर्व में दायर जनहित याचिका के दौरान अदालत ने केवल 1000 पद भरने की अनुमति दी थी। इसके बाद उत्पन्न होने वाली रिक्तियां नई भर्ती के माध्यम से ही भरी जानी थीं। अदालत ने माना कि भविष्य की रिक्तियों को पुराने विज्ञापन के आधार पर भरना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत अन्य पात्र उम्मीदवारों के अधिकारों का उल्लंघन होगा। हाई कोर्ट ने कहा कि आयु सीमा में दी गई छूट केवल उम्मीदवारों को आगामी भर्तियों में भाग लेने का अवसर देने के लिए थी, इसे नियुक्ति का अधिकार नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता किसी भी प्रकार का योग्य कानूनी अधिकार स्थापित करने में विफल रहे हैं। इस फैसले से लंबे समय से नियुक्ति की उम्मीद लगाए बैठे सैकड़ों अभ्यर्थियों को बड़ा झटका लगा है, जबकि बिजली निगम को भविष्य की भर्तियां नई चयन प्रक्रिया के माध्यम से करने की राहत मिल गई है।

देशविरोधी पोस्ट पर आरोपी को बेल, हाईकोर्ट बोला- शर्त माननी होगी तभी मिलेगी राहत

प्रयागराज इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इंस्टाग्राम पर कथित रूप से ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार युवक फैजान को जमानत दे दी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने फैजान बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में पारित किया। पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिसके बाद सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को लेकर पुलिस ने कार्रवाई की थी। एटा से फैजान की हुई थी गिरफ्तारी फैजान को मई 2025 में एटा जिले के जलेसर थाना क्षेत्र से गिरफ्तार किया गया था। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया, जिनमें धारा 152 भी शामिल थी। यह धारा पूर्व में भारतीय दंड संहिता में राजद्रोह से जुड़े प्रावधान का स्थान लेती है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपी का सोशल मीडिया पोस्ट देश की संप्रभुता और प्रतिष्ठा के खिलाफ था और इससे सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो सकता था। देश के खिलाफ नहीं सोशल मीडिया पोस्ट जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता एनआई जाफरी ने तर्क दिया कि आरोपी द्वारा की गई पोस्ट भले ही आपत्तिजनक प्रतीत हो, लेकिन उसमें भारत के खिलाफ कोई अपमानजनक, अवमाननापूर्ण या विद्रोह भड़काने वाला कथन नहीं था। उन्होंने कहा कि केवल किसी दुश्मन देश के समर्थन का उल्लेख करना स्वतः धारा 152 के तहत अपराध नहीं बनता। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अधिकतम यह मामला धारा 196 बीएनएस के तहत आ सकता है, जिसकी सुनवाई मजिस्ट्रेट द्वारा की जा सकती है और जिसमें तीन से पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। कई शर्तों के साथ आरोपी को जमानत राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। हालांकि अदालत ने अपराध की प्रकृति, उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपी की कथित संलिप्तता, जेलों में भीड़भाड़ और निचली अदालतों में लंबित मामलों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आरोपी को जमानत देने का निर्णय लिया। अदालत ने कड़ी शर्तें लगाते हुए कहा कि आरोपी सोशल मीडिया पर कोई भी ऐसा पोस्ट अपलोड नहीं करेगा जो देश की प्रतिष्ठा या किसी समुदाय के खिलाफ हो। साथ ही वह मामले के गवाहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा और मुकदमे की कार्यवाही में पूरा सहयोग करेगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि जमानत की किसी भी शर्त का उल्लंघन किया गया तो उसकी जमानत को निरस्त भी जा सकता है।  

हाईकोर्ट को मिली बम धमकी, ईमेल में अजमल कसाब का नाम, सुरक्षा एजेंसियों ने बताया अफवाह

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी मिलने से हड़कंप मच गया। यह धमकी एक संदिग्ध ईमेल के जरिए दी गई थी। ईमेल में अजमल कसाब का भी जिक्र होने की बात सामने आई है। धमकी मिलने के बाद एहतियात के तौर पर हाईकोर्ट की सभी अदालतों में सुनवाई रोक दी गई। परिसर की सुरक्षा व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से कड़ा कर दिया गया। डॉग स्क्वायड और बॉम्ब स्क्वायड की टीम मौके पर पहुंची। उन्होंने हाईकोर्ट परिसर की सघन जांच की। जिले के पुलिस कप्तान एसएसपी रजनेश सिंह ने पूरे सर्च ऑपरेशन की निगरानी की। इस दौरान एएसपी और सीएसपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद रहे। हालांकि, गहन जांच के बाद कोई भी संदिग्ध वस्तु बरामद नहीं हुई। पुलिस ने स्पष्ट किया कि धमकी में किए गए दावे केवल दहशत फैलाने की नीयत से किए गए थे। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है।

बिलासपुर हाईकोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी, ई-मेल में कैंपस पर हमला करने की चेतावनी, पुलिस और साइबर टीम जांच में जुटी

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय को बम से उड़ाने की धमकी मिलने की सूचना से बुधवार को न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही उच्च न्यायालय परिसर की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई और बम स्क्वॉड तथा डॉग स्क्वॉड की टीमों को मौके पर तैनात कर सघन तलाशी अभियान शुरू किया गया। बारीकी से हो रही निगरानी पुलिस से मिली प्रारंभिक जानकारी के अनुसार धमकी मिलने के बाद एहतियातन पूरे परिसर को सुरक्षा घेरे में लिया गया। प्रवेश द्वारों पर जांच सख्त कर दी गई है तथा संदिग्ध वस्तुओं की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के साथ-साथ सीसीटीवी निगरानी भी बढ़ा दी गई है। अन्य जिला न्यायालयों को भी मिल चुकीं धमकियां गौरतलब है कि इससे पूर्व भी प्रदेश के अन्य जिला न्यायालयों को इसी प्रकार की धमकियां मिल चुकी हैं। राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा और जगदलपुर के जिला न्यायालयों में भी ऐसी सूचनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियों को अलर्ट पर रखा गया था। हालांकि बाद की जांच में वे सूचनाएं अफवाह साबित हुई थीं। तलाशी और जांच जारी, ढिलाई नहीं… फिलहाल, बिलासपुर उच्च न्यायालय परिसर में तलाशी और जांच की कार्रवाई जारी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए हर पहलू की जांच की जा रही है और सुरक्षा में किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। सुरक्षा व्यवस्था और जांच धमकी के तुरंत बाद हाईकोर्ट परिसर को छावनी में बदल दिया गया। सभी प्रवेश द्वारों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए। डॉग स्क्वायड ने हर कोने की तलाशी ली। बॉम्ब स्क्वायड ने भी अत्याधुनिक उपकरणों से जांच की। पुलिस ने परिसर के चप्पे-चप्पे की पड़ताल की। ईमेल स्रोत की पड़ताल पुलिस अब संदिग्ध ईमेल के स्रोत का पता लगाने में जुटी हुई है। साइबर विशेषज्ञों की मदद से ईमेल भेजने वाले की पहचान की जा रही है। पुलिस इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि इस धमकी के पीछे कौन है। 

हाईकोर्ट की तल्ख नसीहत: आस्था पर आपत्ति है तो धर्म छोड़ने की बात क्यों नहीं?

मद्रास यदि कोई व्यक्ति 'जाति और पंथ' का उल्लेख किसी प्रमाण पत्र में नहीं चाहता है तो फिर उसे अपना धर्म त्यागना होगा। इसके बाद ही उसे 'नो कास्ट, नो रिलीजन' वाला प्रमाण पत्र मिल पाएगा। मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक केस की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। जस्टिस कृष्णन रामस्वामी ने कहा कि हिंदू परंपरा के अनुसार जब तक कोई धर्म त्याग नहीं करता है, तब तक जाति और पंथ के उल्लेख के बिना प्रमाण पत्र जारी नहीं किया जा सकता। ऐसी मांग को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यही नहीं जस्टिस रामस्वामी ने यह भी कहा कि जब कोई इस प्रकार धर्म का त्याग कर देगा तो फिर ऐसे किसी प्रमाण पत्र की जरूरत ही नहीं रहेगी। इस मामले में एक शख्स ने अर्जी दाखिल की थी। उसका कहना था कि तमिलनाडु के तिरुपत्तूर तालुक के तहसीलदार ने ऐसा प्रमाण पत्र जारी करने से इनकार कर दिया है, जिसमें धर्म और जाति का उल्लेखन न हो। तहसीलदार के आदेश को उसने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याची का कहना था कि भले ही मेरे माता-पिता हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते थे। लेकिन मुझे ऐसा प्रमाण पत्र चाहिए, जिसमें जाति और धर्म का उल्लेख न हो। उसकी इस मांग को तहसीलदार ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ऐसे प्रमाण पत्र बनाने के संबंध में कोई सरकारी आदेश नहीं है। याचिका की सुनवाई करते हुए बेंच ने शख्स से पूछा था कि क्या आपने अपना वह धर्म त्याग दिया, जिसमें आपका जन्म हुआ था। इस पर याची ने कहा कि उसने अपना धर्मत्याग नहीं किया है। जस्टिस रामस्वामी ने कहा कि याची जब तक हिंदू धर्म के अनुसार अपना पंथ नहीं त्यागता है, तब तक उसकी अर्जी पर विचार नहीं किया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि शख्स ने अपना धर्म त्यागने के संबंध में कोई प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया है। ऐसी स्थिति में अदालत की ओर से तहसीलदार के आदेश को बरकरार रखा जाता है। बेंच ने अर्जी को खारिज कर दिया। अदालत बोली- धर्म छोड़ने का सबूत लाओ, फिर मिलेगा प्रमाण पत्र इसके साथ ही अदालत ने शख्स को यह राहत भी दी कि वह अपना धर्म छोड़ सकता है और उसका सबूत अथॉरिटी को सौंप सकता है। यदि ऐसे सबूत देते हुए आवेदन किया गया तो फिर विचार किया जा सकता है कि इस संबंध में प्रमाण पत्र जारी किया जाए। यह अपने आप में दिलचस्प मामला था, जिसके तहत शख्स सर्टिफिकेट में जाति और धर्म का उल्लेख नहीं चाहता था।  

लापरवाही पर हाईकोर्ट सख्त: रणवीर सिंह को कोर्ट की दो-टूक, ‘कानून से ऊपर कोई नहीं’

कर्नाटक गोवा में आयोजित इफ्फी 2025 में रणवीर सिंह ने ऋषभ शेट्टी की फिल्म 'कांतारा' के एक सीन की नकल की थी। इसके बाद उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया गया था। अभिनेता के खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने को लेकर शिकायत दर्ज हुई। मामला कोर्ट तक पहुंच चुका है। आज मंगलवार को कर्नाटक हाईकोर्ट की तरफ से उन्हें राहत मिली है। न्यूज एजेंसी के मुताबिक, 'रणवीर सिंह को राहत देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने मंगलवार को पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक स्थानीय देवता का कथित तौर पर मजाक उड़ाने के मामले में बॉलीवुड एक्टर के खिलाफ कोई सख्त कदम न उठाए। बेशक रणवीर सिंह को कोर्ट ने राहत दे दी हो, मगर साथ ही फटकार भी लगाई। गोवा में एक इवेंट के दौरान कर्नाटक के देवता का कथित तौर पर मजाक उड़ाने के लिए एफआईआर रद्द करने की अभिनेता की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एम नागप्रसन्ना की बेंच ने बेंगलुरु पुलिस को यह निर्देश दिया। हालांकि, बेंच ने एक्टर को उनके बर्ताव के लिए फटकार भी लगाई और कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बेंच ने उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा, 'सुपरस्टार कानून से ऊपर नहीं होते'। रणवीर के खिलाफ हुई थी एफआईआर बता दें कि रणवीर सिंह ने 30 नवंबर, 2025 को गोवा में 56वें इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) के समापन समारोह के दौरान 'कांतारा' के सीन की नकल की थी। एक्टर की इस मिमिक्री और टिप्पणी से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए एक वकील ने एक्टर के खिलाफ केस दर्ज करने के लिए शहर की एक अदालत का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट के निर्देश पर शहर की पुलिस ने 'धुरंधर' के लीड एक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। रणवीर सिंह का वर्क फ्रंट बता दें कि ने इफ्फी 2025 में कथित तौर पर चावुंडी (चामुंडा) देवी का मजाक बनाया। इस दौरान 'कांतारा' मूवी फेम कन्नड़ एक्टर-डायरेक्टर ऋषभ शेट्टी भी मौजूद थे। क्लोजिंग सेरेमनी के दौरान रणवीर ने ऋषभ शेट्टी की खूब तारीफ की। उन्होंने 'कांतारा 3' में खुद काम करने की ख्वाहिश भी जताई। साथ ही फिल्म के एक सीन की नकल कर दी। रणवीर सिंह के वर्क फ्रंट की बात करें तो वे अपनी आगामी फिल्म 'धुरंधर 2' को लेकर सुर्खियों में हैं, जो 19 मार्च 2026 को रिलीज होगी।

हाई कोर्ट का सख्त रुख: बिजली चोरी केस में सबूत विश्वसनीय, दोषसिद्धि बरकरार

बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बिजली चोरी के एक मामले में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की आपराधिक अपील खारिज कर दी है. न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाया है. प्रकरण के अनुसार 28 जनवरी 2015 को छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड की सतर्कता टीम ने कवर्धा शहर में एक परिसर का निरीक्षण किया. जांच के दौरान पाया गया कि आरोपी विक्की गुप्ता द्वारा लिए गए बिजली कनेक्शन में मीटर बोर्ड के पीछे सर्विस वायर से छेड़छाड़ कर अतिरिक्त तार और एमसीबी लगाकर मीटर को बायपास किया गया था. इस व्यवस्था के कारण बिजली की खपत तो हो रही थी, लेकिन मीटर में वास्तविक खपत दर्ज नहीं हो रही थी. जांच में कुल 2840 वॉट का घरेलू लोड पाया गया. मौके से तार, एमसीबी और अन्य सामग्री जब्त कर पंचनामा तैयार किया गया. एक लाख से अधिक का जुर्माना आकलित बिजली विभाग ने गणना पत्रक के आधार पर आरोपी पर 1,18,925 का अस्थायी आकलन (प्रोविजनल असेसमेंट) लगाया और सात दिन में राशि जमा करने या आपत्ति दर्ज करने का अवसर दिया. हालांकि आरोपी ने न तो आपत्ति दी और न ही निर्धारित समय में राशि जमा की, जिसके बाद विशेष न्यायालय में परिवाद दायर किया गया. ट्रायल कोर्ट ने दी थी सजा कबीरधाम जिले के विशेष न्यायाधीश (विद्युत अधिनियम) ने 22 नवंबर 2018 को आरोपी को इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 की धारा 135(1)(ए) के तहत दोषी ठहराया. अदालत ने आरोपी को न्यायालय उठने तक की सजा और 1000 के अर्थदंड से दंडित किया था. जुर्माना न देने पर एक माह के साधारण कारावास का प्रावधान रखा गया था. अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा है. गवाहों के बयान में विरोधाभास हैं, और स्वतंत्र गवाह प्रस्तुत नहीं किए गए. यह भी कहा गया कि आरोपी ने आकलित राशि जमा कर दी थी, जिससे आपराधिक मंशा सिद्ध नहीं होती. हाई कोर्ट ने सुनाया फैसला हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद कहा कि सतर्कता टीम द्वारा की गई जांच, जब्ती और दस्तावेजी साक्ष्य विश्वसनीय हैं. अधिकारियों के बयान जिरह में कमजोर नहीं पड़े और साक्ष्य स्पष्ट रूप से मीटर बायपास कर बिजली उपयोग को सिद्ध करते हैं. अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा अत्यंत हल्की और अनुपातिक है, इसलिए उसमें हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता. इसी के साथ कोर्ट ने आपराधिक अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश को यथावत रखा.

झूठा हलफनामा देने पर हाईकोर्ट ने मेट्रो रेल के महाप्रबंधक को व्यक्तिगत किया तलब

जबलपुर. हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश मेट्रो रेल निगम लिमिटेड के महाप्रबंधक हरिओम शर्मा को निर्देश दिए हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर यह स्पष्टीकरण दें कि उन्होंने अदालत में झूठा हलफनामा क्यों पेश किया। जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने महाप्रबंधक को 23 फरवरी को उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। क्या है मामला यह मामला भोपाल मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म क्रमांक छह के समीप चल रहे मेट्रो निर्माण कार्य के कारण उत्पन्न अवरोध एवं बैरिकेडिंग से संबंधित है। भोपाल निवासी श्रीनिवास अग्रवाल व अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि मेट्रो प्रबंधन ने फेंसिंग और बैरिकेडिंग पूरी तरह से नहीं हटाई है। इससे आवागमन में दिक्कत हो रही है। हलफनामे में कहा गया कि बैरिकेडिंग हटा दी गई है इस पर मेट्रो रेल प्रशासन की ओर से हलफनामे में कहा गया कि बैरिकेडिंग हटा दी गई है। इस पर हाई कोर्ट ने कलेक्टर से रिपोर्ट मांगी थी। कलेक्टर भोपाल द्वारा किए गए स्थल निरीक्षण के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया कि याचिकाकर्ताओं को मात्र लगभग 3.75 फीट का संकरा मार्ग उपलब्ध कराया गया है, जो व्यवहारिक उपयोग के लिए पर्याप्त नहीं है। तीनों ओर की बैरिकेडिंग हटाई नहीं गई यह भी बताया गया कि तीनों ओर की बैरिकेडिंग हटाई नहीं गई है, जबकि महाप्रबंधक द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत शपथपत्र में यह उल्लेख किया गया था कि बैरिकेडिंग पूर्णतः हटा दी गई है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शूटरों की याचिका पर सुनाया फैसला, प्रैक्टिस के लिए 1000 रायफलें दी जाएंगी

जबलपुर  भोपाल के शूटरों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से राहत मिली है. भोपाल कलेक्टर द्वारा शूटरों को अभ्यास के लिए प्रदान किये जाने वाले कारतूसों की संख्या कम किये जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. 19 फरवरी को हाईकोर्ट जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने याचिका की सुनवाई करते हुए शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा दिये जाने के आदेश पारित किये हैं. याचिका की सुनवाई के दौरान एकलपीठ को बताया गया कि, ''केन्द्र सरकार ने राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का लायसेंस निरस्त कर दिया है. एकलपीठ ने इस संबंध में आदेश पेश करने के निर्देश दिये हैं. याचिका पर अगली सुनवाई 23 फरवरी को तय की गयी है. भोपाल के शूटर ने दायर की थी याचिका भोपाल निवासी इब्राहिम जावेद खान सहित अन्य 3 लोगों की तरफ से याचिका दायर की गयी थी. याचिका में कहा गया था कि याचिकाकर्ता इब्राहिम जावेद खान एक मशहूर शूटर है और अन्य याचिकाकर्ता शूटर बनना चाहते हैं. उन्हें आर्म्स रूल्स, 2016 के नियमों के तहत कारतूस देने के लिए कोटा निर्धारित किया है. जिला कलेक्टर ने शूटरों को कारतूस प्रदान करने के संबंध में एक कमेटी गठित की थी. कारतूस न होने से प्रतियोगिता में शामिल होना मुश्किल कमेटी ने प्रैक्टिस के लिए एक-एक हजार कारतूस प्रदान करने के आदेश जारी किये थे. कमेटी की सिफारिश के बावजूद भी निर्धारित कोटे को घटाकर सिर्फ 500 कारतूस कर दिया है. याचिका में कहा गया था कि कलेक्टर द्वारा पारित विवादित आदेश के कारण याचिकाकर्ता आने वाले समय में आयोजित प्रतियोगिता में शामिल नहीं हो पाएंगे. प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए अभ्यास करने की आवश्यकता है और उनके पास कारतूस नहीं हैं. सरकार की तरफ से एकलपीठ को बताया गया कि, जनहित में कोटा बढ़ाने का फैसला लिया जा सकता है. जाने-माने शूटर तथा उभरते शूटर को एक हजार कारतूस दिये जायेंगे. जिससे वह आने वाली प्रतियोगिता की तैयारी कर सकें. वह बता सकें कि, सभी कारतूस ट्रेनिंग में समाप्त हो गये हैं तो उन्हें एक हजार कारतूस का कोटा रिन्यू कर दिया जायेगा. शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा आवंटित हो एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा कि, ''शूटरों को एक-एक हजार कारतूस का कोटा आवंटित किया जाये. जिससे वह आने वाली प्रतियोगिता की तैयारी कर सकें. कारतूस का कोटा खत्म होने पर वह जिला कलेक्टर को रिपोर्ट करेंगे. जिला कलेक्टर कारतूस के इस्तेमाल की जांच करने के बाद अभ्यास के लिए कारतूस जारी करना सुनिश्चित करें. इसके अलावा स्पोर्ट कैटेगरी के हथियारों के इस्तेमाल के बारे में भारत सरकार की राय और खिलाड़ियों को दिये जाने वाली कारतूस की संख्या के संबंध में भी हाईकोर्ट में पेश की जाये.'' याचिका की सनुवाई के दौरान केन्द्र सरकार के अधिवक्ता की तरफ से एकलपीठ को बताया गया कि, ''राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया का लाइसेंस कैंसिल कर दिया गया है. उनके द्वारा इस संबंध में कोई आदेश पेश नहीं किया गया.'' एकलपीठ ने केन्द्र सरकार के अधिवक्ता को आदेश पेश करने के निर्देश जारी किये हैं. याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को केंद्रीय गृह विभाग को अनावेदक बनाने के निर्देश भी एकलपीठ ने जारी किये हैं. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता विशाल डेनियल ने पैरवी की.