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VSK ऐप मामले में शिक्षकों को राहत, हाईकोर्ट ने अनुशासनात्मक कार्रवाई पर लगाई अंतरिम रोक

बिलासपुर। VSK ऐप को लेकर प्रदेश के शिक्षकों के लिए राहत भरी खबर आई है। हाईकोर्ट ने VSK ऐप को लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट के इस आदेश के बाद फिलहाल याचिकाकर्ता शिक्षक को ऐप इंस्टॉल करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकेगा और याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई पर भी रोक रहेगी। मामले की सुनवाई जस्टिस एन के चंद्रवंशी की सिंगल बेंच में हुई। दरअसल, शिक्षक कमलेश सिंह बिसेन ने VSK ऐप की अनिवार्यता को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। जिसमें कहा गया, कि सरकार किसी भी थर्ड पार्टी ऐप को शिक्षकों पर जबरन लागू नहीं कर सकती। उन्होंने इसे शिक्षकों की निजता का उल्लंघन बताते हुए कहा कि शिक्षकों के व्यक्तिगत मोबाइल फोन का उपयोग शासकीय कार्यों के लिए बाध्यकारी रूप से नहीं कराया जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत तर्कों को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दो सप्ताह में विस्तृत जवाब पेश करने कहा है। हालांकि ये आदेश कोर्ट ने सिर्फ याचिकाकर्ता शिक्षक के संदर्भ में ही जारी किया है, इसका लाभ अन्य शिक्षकों को भी मिलेगा या नहीं, ये अभी साफ नहीं है। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक राज्य सरकार शिक्षकों को VSK ऐप लागू करने के लिए बाध्य नहीं करेगी। साथ ही, इस मुद्दे को लेकर किसी भी शिक्षक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। मामले में याचिकाकर्ता कमलेश सिंह बिसेन ने खुद अदालत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि याचिका में दो प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है। पहला, शिक्षकों की निजता का प्रश्न और दूसरा, निजी संसाधनों के अनिवार्य उपयोग का विषय। उनके अनुसार, यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा संवेदनशील विषय है।

972 करोड़ की योजना पर हाई कोर्ट भड़का: ‘क्या डायल 112 के लिए मर्सिडीज चलानी है?’

जबलपुर  मध्य प्रदेश में डायल 112 फेज-2 प्रोजेक्ट को लेकर छिड़ा विवाद अब हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। 972 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत और टेंडर की शर्तों को लेकर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर तीखी टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान परियोजना की लागत पर हैरानी जताई। जब यह तथ्य सामने आया कि 1200 वाहनों के इस प्रोजेक्ट पर 972 करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं, तो कोर्ट ने मौखिक रूप से पूछा- 'क्या आप डायल 112 में मर्सिडीज कार चला रहे हैं?' यह टिप्पणी सीधे तौर पर सरकारी धन के उपयोग और प्रोजेक्ट की प्लानिंग पर सवाल उठाती है। अदालत ने 6 करोड़ 29 लाख रुपए के सीएडी (कंप्यूटर आधारित प्रेषण) सॉफ्टवेयर के लिए जारी नए टेंडर पर अंतरिम रोक लगा दी है। कोर्ट ने सरकार को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और पुलिस विभाग से वर्तमान सॉफ्टवेयर की कार्यक्षमता पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। विवाद की क्या है मुख्य वजह? ईएमआरआई ग्रीन हेल्थ सर्विसेज (EMRI) के अनुसार, उन्हें मार्च 2025 में सिस्टम इंटीग्रेटर नियुक्त किया गया था और सितंबर 2025 से सेवाएं शुरू हो चुकी हैं। कंपनी का आरोप है कि दिसंबर 2025 में सॉफ्टवेयर के लिए अलग टेंडर जारी करना मूल अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है। राज्य सरकार और पुलिस विभाग का तर्क है कि 972 करोड़ रुपए में केवल वाहन ही नहीं, बल्कि डेटा सेंटर, तकनीकी ढांचा और परिचालन लागत भी शामिल है। उनका दावा है कि वर्तमान सॉफ्टवेयर में तकनीकी खामियां हैं, जिन्हें दूर करने के लिए नया टेंडर अनिवार्य था। प्रोजेक्ट की क्या है स्थिति? फेज-2 के तहत 1200 वाहनों के माध्यम से पुलिस सहायता को आधुनिक बनाने का लक्ष्य है। हालांकि, तकनीकी और कानूनी पेच ने फिलहाल इस महत्वाकांक्षी परियोजना की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है।

हाई कोर्ट का फैसला: पति-पत्नी जैसा व्यवहार, होटल की रातों को देखते हुए आरोपी को मिली राहत

कलकत्ता  कलकत्ता हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि अगर शादी नहीं हो पाती है और रिश्ता में कड़वाहट आती है, तो सिर्फ इसलिए ही सहमति से बने शारीरिक संबंधों को रेप नहीं माना जा सकता। जज ने कहा कि शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा होना चाहिए था। साथ ही कहा कि जिस तरह से महिला और पुरुष बर्ताव कर रहे थे, उससे सहमति के संकेत मिल रहे थे। क्या था मामला मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार को हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज केस रद्द कर दिया। आरोप थे कि उसने शादी का वादा कर महिला के साथ बलात्कार किया और जबरन गर्भपात कराया है। कोर्ट ने कहा कि दोनों साथ में घूमे, रहे और पति पत्नी की तरह रहे। ऐसे में यह आपसी सहमति दिखाता है। जस्टिस चैताली चटर्जी (दास) मामले की सुनवाई कर रहीं थीं। अदालत ने क्या कहा उन्होंने कहा, 'शुरुआत से ही (संबंध बनते समय) धोखा देने या गलत इरादा होना चाहिए था, जिसके कारण महिला को यौन संबंध बनाने के लिए प्रेरित किया गया हो।' जज ने कहा है कि जिस तरह से उस पुरुष और महिला ने एक-दूसरे के साथ व्यवहार किया, वह 'साफ तौर पर आपसी सहमति और साथ को दिखाता है न कि 'धोखाधड़ी के से उकसावे या प्रलोभन' को।' जज ने कहा, 'रिश्ता… साल 2017 में शुरू हुआ और साल 2022 में खटास आने तक जारी रहा। रिश्ते के दौरान… उन्होंने शारीरिक संबंध बनाए, दीघा, पार्क स्ट्रीट, खड़गपुर और गोवा के कई होटलों में साथ रातें गुजारीं और पति-पत्नी की तरह रहे। यह भी स्वीकार किया गया है कि महिला गर्भवती हो गई थी और पीड़िता और आरोपी की सहमति से गर्भपात कराया गया था।' उन्होंने कहा, 'आरोपी के खिलाफ कोई शिकायत करने के बजाए महिला ने रिश्ता जारी रखा…। ऐसे में किसी भी बात से यह साफ नहीं होता कि वह बीते 5 या 6 सालों से किसी भी तरह की गलतफहमी में थीं।' शिकायत इस मामले में महिला साल 2017 में रिश्ते में आई थीं। उन्होंने आरोप लगाए थे कि साल 2018 में आरोपी ने उन्हें कुछ पिलाकर बलात्कार किया, लेकिन वह चुप रही क्योंकि उसने शादी का वादा किया था। इसके बाद दोनों दीघा और गोवा ट्रिप पर गए थे। साल 2020 में महिला गर्भवती हो गई थी और बाद में गर्भपात भी कराया गया। महिला ने आरोप लगाए कि वह शादी के वादे के कारण गर्भपात के लिए तैयार हुई थी। जब आरोपी ने उससे शादी करने से इनकार कर दिया, तो महिला ने 16 फरवरी 2022 में पश्चिम मिदनापुर में पुलिस शिकायत दर्ज कराई। 23 फरवरी को आरोपी को गिरफ्तार किया गया था।

लंबे समय तक सहमति से संबंध के बाद शादी से मुकरना अपराध नहीं: हाई कोर्ट

उत्तराखंड उत्तराखंड हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सहमति से लंबे समय तक संबंध बनाने के बाद शादी का वादा तोड़ना रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि जब दो व्यस्कों के बीच सहमति से संबंध नते हैं तो रेप केस के लिए यह साबित करना जरूरी है कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लंबे समय तक संबंध में हों तो शादी के वादे को पूरा न करना आईपीसी की धारा 376 के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि वादा शुरू से ही झूठा था। इस मामले में मसूरी की एक महिला ने सूरज बोरा नामक आदमी पर शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाया। बोरा ने 45 दिनों के भीतर शादी का आश्वासन देने के बाद बाद में इनकार कर दिया। जांच के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दायर किया जिसे बोरा ने हाई कोर्ट में चुनौती दी। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष वयस्क थे और लंबे समय से आपसी सहमति से संबंध बनाए हुए थे। एफआईआर में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि रिश्ते की शुरुआत में आरोपी का इरादा कपटपूर्ण था। यह केवल एक असफल रिश्ता था और आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। दूसरी ओर, राज्य सरकार और पीड़िता का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़िता की सहमति पूरी तरह से शादी के आश्वासन पर आधारित थी, जिसे आरोपी बाद में पूरा करने में विफल रहा। उन्होंने आगे कहा कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था, यह केवल मुकदमे के दौरान सबूतों के आधार पर ही निर्धारित किया जा सकता है। इसलिए, कार्यवाही को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस आशीष नैथानी ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी वयस्क महिला द्वारा दी गई सहमति मात्र इसलिए अमान्य नहीं हो जाती क्योंकि संबंध शादी में नहीं बदला। इसे धारा 376 के तहत अपराध मानने के लिए यह सिद्ध करना आवश्यक है कि शादी का वादा केवल संबंध बनाने के लए सहमति पाने का एक साधन था और आरोपी का शादी करने का कोई इरादा नहीं था। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष लंबे समय से रिश्ते में थे और उनके बीच बार-बार शारीरिक संबंध बने थे, जिससे प्रारंभिक धोखाधड़ी के बजाय आपसी सहमति का संकेत मिलता है। हाई कोर्ट ने यह निर्धारित किया कि ठोस आधार के अभाव में आपराधिक कार्यवाही जारी रखना आरोपी का उत्पीड़न होगा। हाई कोर्ट ने देहरादून के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामला और सूरज बोरा के खिलाफ 22 जुलाई 2023 की चार्जशीट को पूरी तरह रद्द कर दिया।  

पति को फंसाने की साजिश नाकाम: झूठे दहेज आरोपों पर हाईकोर्ट सख्त, पत्नी को लगाई फटकार

बिलासपुर बिलासपुर से एक अहम कानूनी फैसले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज कराई गई झूठी और निराधार दहेज प्रताड़ना शिकायत को मानसिक क्रूरता करार दिया है। कोर्ट ने माना कि इस तरह के आरोप लगाकर पति और उसके परिजनों को जेल भिजवाने की कोशिश करना वैवाहिक रिश्ते को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है। मामले में पति ने धमतरी परिवार न्यायालय में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे परिवार न्यायालय ने खारिज कर दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में अपील की। जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद पति की अपील स्वीकार करते हुए उसे तलाक का हकदार माना। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी द्वारा सास के खिलाफ निराधार और मानहानिकारक आरोप लगाना, पति और उसके परिवार के बरी होने के बावजूद उच्च अदालतों में अपील दायर करना और उन्हें सजा दिलाने के प्रयास करना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। गौरतलब है कि महिला ने 2017 में आईपीसी की धारा 498A के तहत पति, उसके भाई और मां के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया था। ट्रायल कोर्ट ने सभी को बरी कर दिया था। इसके खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की, लेकिन उसे राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट के इस फैसले को वैवाहिक मामलों में झूठे आपराधिक आरोपों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।  

HC ने 28 सप्ताह की गर्भावस्था में 13 साल की लड़की को अबॉर्शन की मंजूरी दी, विवादित फैसला

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 24 हफ्ते की सीमा पार हो जाने के बाद भी 13 साल की एक रेप पीड़िता को अबॉर्शन कराने की इजाजत दी है। बच्ची 28 सप्ताह की प्रेग्नेंट है। पीड़िता और उसके परिवार की इच्छा को तरजीह देते हुए अदालत ने डॉक्टरों को सुरक्षित तरीके से अबॉर्शन करने को कहा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच में जस्टिस विशाल मिश्रा ने कहा कि कानून 24 सप्ताह के बाद मेडिकल टर्मिनेशन (MTP) को बाधित करता है, पर गर्भ को जारी रखने का फैसला गर्भवती पर निर्भर है। इस केस में नाबालिग बच्ची और उसके माता-पिता ने साफ तौर पर कहा है कि वे गर्भ को जारी नहीं रखना चाहते हैं। इस मामले को सागर जिले के खुराई स्थित एक अदालत ने हाई कोर्ट के सामने पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि गर्भ को जारी रखने और जन्म देने के लिए गर्भवती की सहमति सबसे ऊपर है, नाबालिग के मामले में भी। अदालत ने बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के मेडिकल बोर्ड के विचार का भी संज्ञान लिया जिसमें कहा गया है कि चिकित्सकीय गर्भपात संभव है। हालांकि, कुछ जोखिम जरूर है। अदालत ने मेडिकल बोर्ड से कहा है कि बच्ची और उसके परिजनों को जोखिमों के बार में बताया जाए और एक्सपर्ट डॉक्टरों की टीम के द्वारा गर्भपात कराया जाए।

हाईकोर्ट ने तलाक मामले में कहा- व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग के सबूत मान्य

बिलासपुर. हाईकोर्ट ने पति-पत्नी से संबंधित विवाद के मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मंजूर करने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने मामले में पत्नी की याचिका खारिज करते हुए कहा है कि परिवार न्यायालय के पास यह विशेष शक्ति है कि मामले के प्रभावी निपटारे के लिए किसी भी दस्तावेज या जानकारी को बतौर सबूत स्वीकार कर सकते हैं। बता दें कि रायपुर निवासी ने पत्नी से तलाक की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता पति ने पत्नी की अन्य लोगों के साथ व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को रिकॉर्ड में लेने के लिए आवेदन किया था। पत्नी ने इसका विरोध करते हुए इसे निजता के अधिकार का उल्लंघन बताया। हालांकि फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका मंजूर कर ली, जिसके खिलाफ पत्नी हाईकोर्ट पहुंची। हाईकोर्ट ने भी परिवार न्यायालय के आदेश पर मुहर लगाते हुए पति को राहत दी है और प्राइवेसी से अहम फेयर ट्रायल को माना है।

नियुक्ति निरस्त करने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट का स्टे, 66 उप अभियंता बहाल

रायपुर ग्रामीण अभियांत्रिक सेवा की वर्ष 2011 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ में बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। हाईकोर्ट द्वारा 66 उप अभियंताओं (सिविल) की नियुक्तियां नियमों के विरुद्ध बताते हुए रद्द किए जाने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। दरअसल, इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने अधिवक्ता शाल्विक तिवारी के माध्यम से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। 3 फरवरी 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने भर्ती को अवैध करार देते हुए 66 उप अभियंताओं की नियुक्तियां निरस्त कर दी थीं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि भर्ती विज्ञापन के अनुसार अभ्यर्थियों के पास कट-ऑफ तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक योग्यता होना अनिवार्य था, जबकि कई चयनित अभ्यर्थियों ने आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा बाद में प्राप्त किया। ऐसे में उनकी नियुक्तियां प्रारंभ से ही अवैध मानी गईं। कोर्ट ने यह भी पाया कि 275 पदों के लिए जारी विज्ञापन के बावजूद उससे अधिक पदों पर नियुक्तियां की गईं, जो सेवा कानून के सिद्धांतों के विपरीत है। सुनवाई के दौरान नियुक्त उप अभियंताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि वे करीब 14 वर्षों से सेवा दे रहे हैं, इसलिए उनके मामलों में सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि लंबी सेवा अवधि किसी अवैध नियुक्ति को वैध नहीं बना सकती। इसके बाद कोर्ट ने क्वो वारंटो का रिट जारी करते हुए नियुक्तियां रद्द कर दी थीं। हाईकोर्ट के फैसले को दी गई चुनौती, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए प्रभावित कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली का रुख किया। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 11 फरवरी 2026 को छत्तीसगढ़ राज्य को नोटिस जारी किया और हाईकोर्ट के आदेश के प्रभाव एवं क्रियान्वयन पर स्थगन आदेश पारित किया है। यह प्रकरण लगभग 60 शासकीय कर्मचारियों की सामूहिक सेवा-समाप्ति से संबंधित है, जिन्हें प्रारंभिक रूप से पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में उप अभियंता (सिविल) के पद पर नियुक्त किया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहते हुए उनकी सेवाएं समाप्त करने का निर्देश दिया था कि संबंधित अभ्यर्थियों के पास भर्ती विज्ञापन के अनुसार आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक अर्हता उपलब्ध नहीं थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश के अनुसार, संबंधित कर्मचारियों की सेवा की निरंतरता अब सर्वोच्च न्यायालय में लंबित विशेष अनुमति याचिका (SLP) के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। मामले में याचिकाकर्ताओं एवं निजी प्रत्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, परमेश्वर के. तथा गौरव अग्रवाल ने पक्ष रखा। उनके साथ अधिवक्ता हर्षवर्धन परगनिहा, चंद्रशेखर ए. चकलाब्बी (AOR) और सुधांशु प्रकाश (AOR) भी उपस्थित रहे।

12 साल पुराना विवाद, रजनीकांत की फिल्म पर HC का ₹2.52 करोड़ का जुर्माना—क्या है पूरा मामला?

मद्रास रजनीकांत और दीपिका पादुकोण की 2014 में रिलीज तमिल फिल्‍म 'कोचादाइयां' अचानक चर्चा में आ गई है। मद्रास हाई कोर्ट ने फिल्‍म के प्रोड्यूसर जे मुरली मनोहर और उनके प्रोडक्शन हाउस, मीडियावन ग्लोबल एंटरटेनमेंट लिमिटेड पर ₹2.52 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। यही नहीं, कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि मेकर्स या तो चार हफ्ते के अंदर यह जुर्माना चुकाएं या फिर छह महीने जेल की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाएं। यकीनन, आप भी यही सोच रहे होंगे कि आख‍िर 12 साल बाद ऐसा क्‍या हो गया, तो आइए इस पूरे मामले को तफ्तील से समझाते हैं। Kochadaiiyaan को रजीनकांत की बेटी सौंदर्या रजनीकांत ने डायरेक्‍ट किया है। फिल्‍म में रजनीकांत और दीपिका पादुकोण के अलावा जैकी श्रॉफ भी थे। यह फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई थी। लेकिन रजनीकांत के कारण इसने खूब चर्चा बटोरी थी। हाई कोर्ट का यह मामला असल में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी को मुआवजा देने और चेक बाउंस होने से जुड़ा है। आइए, पहले जानते हैं कि कोर्ट में क्‍या हुआ। 2021 और 2023 में भी सुनाई गई थी सजा मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस सुंदर मोहन ने फिल्‍म के प्रोड्यूसर जे मुरली मनोहर और उनकी प्रोडक्शन कंपनी द्वारा दायर एक क्रिमिनल रिवीजन केस को कुछ हद तक मंजूरी दी है। यह केस 2021 में एक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा उन्हें दी गई सजा और 2023 में एक सिटी सिविल कोर्ट द्वारा कन्फर्म किए जाने के खिलाफ दायर किया गया था। करोड़ों का कर्ज, नहीं चुकाए बकाया पैसे हाई कोर्ट ने मनोहर को 4 हफ्ते के अंदर एडवरटाइजिंग एजेंसी, 'एडब्यूरो एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड' को ₹2.52 करोड़ देने या 6 महीने जेल की सजा भुगतने का निर्देश दिया है। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और गड़बड़ियों पर सवाल उठाने के बाद, फैसला सुनाया कि ऐड एजेंसी ने सिर्फ ₹10 करोड़ उधार दिए थे और उसे ₹8.74 करोड़ चुका दिए गए थे, जिससे ₹1.26 करोड़ का बैलेंस रह गया। इसलिए सजा को बदलकर ₹2.52 करोड़ का जुर्माना कर दिया गया, जो उस पर बकाया रकम से दोगुना था। 2014 में प्रोडक्‍शन हाउस ने लिया था 20 करोड़ रुपये का कर्ज 'द हिंदू' ने इससे पहले एक रिपोर्ट में बताया कि एडब्यूरो एडवरटाइजिंग प्राइवेट लिमिटेड के अबीरचंद नाहर ने प्रोड्यूसर मोहन के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें कहा गया कि उनकी फर्म ने 25 अप्रैल, 2014 को मीडियावन ग्लोबल एंटरटेनमेंट के साथ एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) किया था। उन्होंने फोटोरियलिस्टिक मोशन-कैप्चर मूवी के पोस्ट-प्रोडक्शन के लिए प्रोडक्शन हाउस को ₹20 करोड़ का कर्ज दिया था। प्रोडक्शन हाउस ने फाइनेंसर को बताया था कि 'कोचादाइयां' के लीज राइट्स की बिक्री से कम से कम ₹20 करोड़ मिलेंगे। ऐड एजेंसी ने किया था गारंटी मुनाफा का वादा, चेक हुआ बाउंस ऐड एजेंसी ने अपनी शिकायत में कहा कि किसी तीसरे पक्ष को राइट्स बेचने से पहले उसे बिक्री से होने वाली कमाई का 20% या कम से कम ₹2.40 करोड़ के गारंटी मुनाफे का वादा किया गया था। ऐड एजेंसी ने 28 अप्रैल, 2014 को प्रोडक्शन हाउस के बैंक अकाउंट में ₹10 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। लेकिन दिसंबर 2014 में, प्रोडक्शन हाउस की तरफ से एजेंसी को जारी किया गया चेक बाउंस हो गया। 2021 में कोर्ट ने प्रोड्यूसर मोहन को माना दोषी दिसंबर 2021 में एक मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मोहन को दोषी ठहराया और उन्‍हें छह महीने जेल की सजा सुनाई। उन्‍हें तब ₹7.70 करोड़ देने या छह महीने की और जेल की सजा भुगतने का भी आदेश दिया गया। फिर अगस्त 2023 में, एक सिविल कोर्ट ने सजा को जारी रखा। लेकिन प्रोड्यूसर ने ₹12.75 करोड़ चुकाने का दावा किया। उसने ऐड एजेंसी पर बाद में दिए गए चेक को गारंटी के तौर पर इस्तेमाल करने का भी आरोप लगाया। रजनीकांत की पत्‍नी लता का भी धोखाधड़ी केस में आया नाम मामले में एक और ट्व‍िस्‍ट तब आया, जब ऐड एजेंसी ने 2016 में रजनीकांत की पत्नी लता के खिलाफ भी धोखाधड़ी का केस किया था। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के राइट्स बेचने के बारे में तब उन्हें नोटिस जारी किया था। साल 2018 में, सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने उन्हें ₹6.20 करोड़ देने का आदेश दिया था।

हाईकोर्ट ने खारिज किया भतीजे का दावा, कहा- मुस्लिम व्यक्ति को वसीयत के लिए वारिसों की सहमति जरूरी

बिलासपुर  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति का एक तिहाई से अधिक हिस्सा वसीयत के जरिए किसी को नहीं दे सकता। जब तक कि बाकी वैध वारिस अपनी सहमति न दें। हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून में वारिसों के अधिकारों की सुरक्षा एक मूल सिद्धांत है। यह फैसला कोरबा जिले से जुड़े एक मामले में आया है। जहां एक विधवा को उसके पति की संपत्ति में हिस्सा देने से निचली अदालतों ने इनकार कर दिया था। जानिए पूरा मामला दरअसल, 64 साल की जैबुननिशा ने अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की जायदाद पर हक मांगते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। उन्होंने कोरबा के द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के फैसले को चुनौती दी थी। कोर्ट ने उनके केस को 2015 और 2016 में खारिज कर दिया था। जैबुननिशा के पति की 2004 में मौत हो गई थी। जिसके बाद भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने एक वसीयत पेश की, जिसमें दावा किया गया कि सारी जायदाद उसे मिलेगी। सिकंदर ने खुद को ‘’पालक बेटा' बताया था। जैबुननिशा ने इस वसीयत को फर्जी बताया और कहा कि यह उनकी सहमति के बिना बनाई गई थी। लोअर कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील जैबुननिशा ने पहले निचली अदालतों में मुकदमा दायर किया था, लेकिन दोनों अदालतों ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस बीडी गुरु की सिंगल बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालतों के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतें विधवा के वैध कानूनी अधिकार की रक्षा करने में असफल रही थी। मुस्लिम लॉ एक्ट में है यह प्रावधान हाईकोर्ट ने मुस्लिम लॉ के सेक्शन 117 और 118 का हवाला देते हुए कहा कि वसीयत के जरिए जायदाद देने की एक सीमा है। मुस्लिम व्यक्ति अपनी जायदाद का सिर्फ एक तिहाई हिस्सा ही वसीयत कर सकता है। अगर इससे ज्यादा जायदाद वसीयत की जाती है, या किसी वारिस को दी जाती है, तो उसके लिए बाकी वारिसों की सहमति जरूरी है। जस्टिस बीडी गुरु ने यह भी कहा कि निचली अदालतों ने गलती की कि उन्होंने विधवा पर वसीयत को गलत साबित करने का बोझ डाल दिया। असल में यह सिकंदर की जिम्मेदारी थी कि वह साबित करे कि जैबुननिशा ने पति की मौत के बाद अपनी मर्जी से और पूरी समझदारी से वसीयत के लिए सहमति दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ चुप रहने या केस दायर करने में देरी करने को रजामंदी नहीं माना जा सकता। इस मामले में कोई भी गवाह यह साबित नहीं कर पाया कि जैबुननिशा ने पूरी जायदाद वसीयत करने की इजाजत दी थी। हाईकोर्ट ने निरस्त किया लोअर कोर्ट का आदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सिकंदर की वसीयत असली भी होती, तब भी वह जायदाद का एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा नहीं मांग सकता था। हाईकोर्ट ने लोअर कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और इस बात पर जोर दिया है कि वारिसों के हक की हिफाजत मुस्लिम कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है। कोर्ट ने कहा, 'कानूनी एक तिहाई से ज्यादा की वसीयत वारिसों की मौत के बाद की रजामंदी के बिना प्रभावी नहीं हो सकती।