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सऊदी अरब के तेल निर्यात पर भी असर, होर्मुज संकट से 16-17 मिलियन बैरल की सप्लाई बाधित होने का दावा

नई दिल्ली  पश्चिम एशिया में पिछले सात महीनों से जारी युद्ध ने अब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक सऊदी अरब को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। होर्मुज स्ट्रेट 28 फरवरी से बंद है, जबकि 10 सितंबर को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब के कच्चे तेल के निर्यात का पश्चिमी रास्ता भी बंद हो गया है। इन रुकावटों के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़कर 109.4 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, अभी ये 104.2 डॉलर पर हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पर हस्ताक्षर करने के बाद सप्लाई में रुकावट और बढ़ सकती है। ट्रंप ने यूएन में कहा कि अमेरिकी कांग्रेस चुनावों के बाद ईरान के पास या तो पूरी तरह खत्म होने या फिर डील करने का विकल्प है। सात दिनों के भीतर ही ईरान ने संकेत दिया कि वह डील करना पसंद करेगा। 16-17 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है सप्लाई संकट स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पहले दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती थी। इसमें करीब 1.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और 50 लाख बैरल पेट्रोलियम उत्पाद शामिल थे। होर्मुज के रास्ते को आंशिक रूप से बायपास करने के लिए सऊदी अरब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए करीब 40 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल निर्यात कर रहा था। वहीं, यूएई हबशन-फुजैराह पाइपलाइन के जरिए करीब 15 लाख बैरल प्रतिदिन तेल बाहर भेज रहा था। दोनों देश होर्मुज से बाहर तेल पहुंचाने के लिए शटल सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे थे, जहां उसे दूसरे जहाजों में ट्रांसफर कर आगे भेजा जा सकता था। ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के बंद होने से कच्चे तेल की सप्लाई में कम से कम 13-14 मिलियन बैरल प्रतिदिन की रुकावट आ सकती है। रूस अभी हर दिन लगभग 3.5 मिलियन बैरल तेल एक्सपोर्ट करता है। अगर ग्राहम एक्ट लागू किया जाता है और जिन देशों को टारगेट किया गया है, वे मान जाते हैं, तो ग्लोबल ऑयल सप्लाई में रुकावट 16-17 मिलियन बैरल प्रति दिन तक बढ़ सकती है। इस कमी को पूरा करने के लिए कोई दूसरा जरिया नहीं है। LNG और पेट्रोलियम उत्पादों पर भी असर इस रुकावट का असर सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और एनएनजी पर भी पड़ेगा। एलएनजी को करीब -163 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है और समुद्र के बीच इसे आसानी से दूसरे जहाज में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता। भारत सरकार ने ग्राहम एक्ट को लेकर कहा है कि इसके प्रभाव सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं होंगे, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी असर पड़ेगा। मौजूदा हालात को देखते हुए यह चिंता और महत्वपूर्ण हो गई है। अमेरिका में भी बढ़ी कीमतों की मार ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी से तेहरान पर दबाव तो बनता है, लेकिन इससे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों पर भी असर पड़ रहा है। इससे ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगातार बंद रखने के रुख के और मजबूत होने की आशंका है। अमेरिका में भी इसका असर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। 4.30 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई हैं, जो 4 डॉलर प्रति गैलन से अधिक है। जबकि डीज़ल की कीमतें 6.75 डॉलर प्रति गैलन तक बढ़ गई हैं, जिससे चुनावी साल में खेती-बाड़ी के क्षेत्र पर असर पड़ रहा है। ग्राहम एक्ट लागू करने से न सिर्फ उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान हो सकता है जिन्हें निशाना बनाया गया है, बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी नुकसान हो सकता है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ने से अमेरिका में भी कीमतें बढ़ेंगी। अमेरिका के बेंचमार्क WTI की कीमत पहले ही 27 फरवरी को 67.02 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर अब 92.41 डॉलर हो गई है। यमन में सऊदी समर्थित बलों को झटका इस बीच यमन में सऊदी समर्थित बलों को भी नुकसान उठाना पड़ा है। हूतियों ने मोचा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया है और पेरिम द्वीप पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इसके अलावा सऊदी अरब के सीमावर्ती शहरों और रियाद पर भी हमले किए गए हैं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के सीधे सैन्य हस्तक्षेप के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन फिलहाल खुफिया जानकारी और लॉजिस्टिक सहायता तक सीमित बताया गया है। तुर्की और पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब के समर्थन में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इससे पहले 2015 में भी पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियान में सीधे हस्तक्षेप से इनकार किया था। भारत पर क्यों बढ़ सकता है दबाव? भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन उसने यह खरीद तब की थी जब अमेरिका ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। बाइडेन प्रशासन की 'प्राइस कैप' (कीमत की सीमा) पॉलिसी के तहत रूसी कच्चा तेल खरीदने की इजाजत थी, लेकिन छूट के साथ। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने भी समय-समय पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए लाइसेंस दिए थे। यह कानून भारत को तब निशाना बना रहा है जब उसने अमेरिकी तेल और गैस की खरीद बढ़ा दी है। अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान, भारत ने 8.2 अरब डॉलर का रूसी कच्चा तेल आयात किया। इस साल अगस्त में अमेरिका LNG आयात का सबसे बड़ा स्रोत भी बनकर उभरा है। पश्चिम एशिया संकट का असर भारत के लिए सीधे तौर पर भी दिख रहा है। भारत के क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत 26 फरवरी को 70.61 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब बढ़कर 123.67 डॉलर प्रति बैरल बताई जा रही है। इसी अवधि में स्पॉट एलएनजी की कीमतों में करीब 150 फीसदी की वृद्धि हुई है। कतर से लंबे समय तक होने वाली सप्लाई बंद होने के बाद से भारत की खरीद में स्पॉट LNG का हिस्सा बढ़ गया है। ऐसे में लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतें भारत के आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव डाल सकती हैं। राजनीतिक समाधान से ही राहत की उम्मीद जब … Read more

Iran Retaliates: US हमले के बाद ईरान का पलटवार, कुवैत, बहरीन और खाड़ी देशों में हाई अलर्ट; क्या बंद होगा होर्मुज?

तेहरान  अमेरिका ने बुधवार को ईरान पर बड़े सैन्य हमले किए. अमेरिकी सेना ने इन हमलों को शक्तिशाली बताया है. अमेरिका का कहना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजर रहे तीन व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में यह कार्रवाई की गई. इस घटना के बाद अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक ईरान ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया था. इसी के जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के कुछ ठिकानों पर हमले किए. इन सैन्य हमलों से कुछ ही समय पहले अमेरिका ने ईरान को दी गई एक अस्थायी प्रतिबंध छूट भी वापस ले ली. इस छूट के तहत ईरान को जून में हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के आधार पर कच्चे तेल का उत्पादन, बिक्री और आपूर्ति करने की अनुमति मिली हुई थी. यह छूट 21 अगस्त तक लागू रहने वाली थी, लेकिन अमेरिका ने इसे समय से पहले ही समाप्त कर दिया।  अब तक क्या-क्या हुआ?     होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे तीन जहाजों, जिनमें कतर और सऊदी अरब के तेल टैंकर भी शामिल हैं, पर हुए हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान पर शक्तिशाली सैन्य हमले शुरू कर दिए।      ईरानी मीडिया के मुताबिक ईरान के सीरिक बंदरगाह शहर, बंदर अब्बास और केश्म द्वीप में कई धमाकों की आवाज़ें सुनी गई हैं।      अमेरिका ने 17 जून को वॉशिंगटन और तेहरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के तहत ईरान को तेल बेचने की दी गई विशेष छूट (वेवर) भी रद्द कर दी है।  इजरायली लड़ाकू विमानों ने किए लेबनान में हमले लेबनान की सरकारी समाचार एजेंसी नेशनल न्यूज एजेंसी (NNA) के अनुसार, इजरायली लड़ाकू विमानों ने रात के दौरान दक्षिणी लेबनान में तीन चरणों में हवाई हमले किए. रिपोर्ट के मुताबिक, ये हमले बिंत जुबैल जिले के बैत याहून, कुनिन और ब्राचीत कस्बों के बीच के इलाकों को निशाना बनाकर किए गए. फिलहाल इन हमलों में हुए नुकसान या किसी के हताहत होने की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।  होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों को खतरा, यूएस ने किया अलर्ट तनाव बढ़ने के बाद अमेरिकी नौसेना की निगरानी में काम करने वाले जॉइंट मैरीटाइम इंफॉर्मेशन सेंटर (JMIC) ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों के लिए खतरे का स्तर बढ़ा दिया है. जहाजों को ज्यादा सतर्क रहने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं. समुद्री एजेंसियों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस इलाके में नौसैनिक गश्त और सुरक्षा जांच और बढ़ सकती है।  ईरान पहले भी कहता रहा है कि होर्मुज से गुजरने वाले जहाज उसके तय किए गए रास्ते का ही इस्तेमाल करें. जिन जहाजों पर हमला हुआ, वे ओमान और यूएई के पास वाले वैकल्पिक मार्ग से गुजर रहे थे. इसी वजह से आशंका जताई जा रही है कि यह हमला दूसरे जहाजों को चेतावनी देने के लिए किया गया हो. हालांकि, ईरान ने अब तक इन हमलों की जिम्मेदारी नहीं ली है।  कतर ने अपने टैंकर पर हुए हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताया है. वहीं बहरीन ने भी सऊदी अरब और कतर के जहाजों पर हमलों की निंदा करते हुए समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।  इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज को लेकर चल रही बातचीत भी फिलहाल रुकती हुई नजर आ रही है. दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने से पूरे खाड़ी क्षेत्र में फिर से अनिश्चितता का माहौल बन गया है. हालांकि, अली खामेनेई के जनाजे के बीच दोनों देशों की बातचीत आधिकारिक रूप से रुकी हुई है।  बहरीन में तीसरी बार बजे एयर रेड सायरन, ईरान अमेरिकी मिलिट्री बेस पर कर रहा हमले बहरीन में को तीसरी बार एयर रेड सायरन बजाए गए हैं. इसके बाद बहरीन के गृह मंत्रालय ने लोगों से तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने और अधिकारियों के निर्देशों का पालन करने की अपील की है. इसी बीच, ईरान के सरकारी प्रसारक IRIB ने दावा किया है कि बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान ने मिसाइल हमलों का एक नया दौर शुरू कर दिया है. IRIB ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा- बहरीन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ईरान के नए मिसाइल हमले शुरू हो गए हैं. हालांकि, ईरान के इस दावे की अभी तक अमेरिका या बहरीन की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।   ईरान के बुशेहर शहर के आसपास सुने गए धमाके ईरान की मेहर समाचार एजेंसी के अनुसार, बुधवार सुबह दक्षिणी बंदरगाह शहर बुशेहर और उसके आसपास के इलाकों में कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं. हालांकि, एजेंसी ने होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थित खार्ग द्वीप पर हमले की खबरों को खारिज कर दिया है. मेहर ने अपने स्थानीय संवाददाता के हवाले से कहा कि खार्ग द्वीप पर किसी तरह का हमला नहीं हुआ है. फिलहाल धमाकों के कारण और किसी संभावित नुकसान को लेकर आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।  IRGC ने किया दावा- बहरीन के शेख ईसा एयर बेस को बनाया निशाना ईरान की सेना ने दावा किया है कि उसने बहरीन स्थित शेख ईसा एयर बेस पर तैनात अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाकर ड्रोन हमला किया है. ईरान का कहना है कि यह कार्रवाई दक्षिणी ईरान पर अमेरिका के ताजा हवाई हमलों के जवाब में की गई. ईरानी सेना ने बयान जारी कर कहा कि अमेरिका ने बार-बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है. सेना ने चेतावनी दी कि अमेरिका की इस कार्रवाई के बाद क्षेत्र में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकाने अब ईरान के सैन्य ड्रोन के वैध लक्ष्य होंगे. यह बयान ऐसे समय आया है, जब बहरीन में आज सुबह दूसरी बार एयर रेड सायरन बजाए गए. गृह मंत्रालय ने लोगों से शांत रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की है. इससे पहले ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया था कि उसने बहरीन और कुवैत में मौजूद अमेरिकी सेना के 85 सैन्य ठिकानों को मिसाइल और ड्रोन हमलों में निशाना बनाया है।   बहरीन में फिर बजे एयर रेड सायरन बहरीन में आज सुबह दूसरी बार एयर रेड सायरन बजाए गए हैं. इसके … Read more

चार महीने बंद रहा होर्मुज, फिर भी नहीं थमी भारत की रफ्तार, जानिए कैसे

नई दिल्ली  मिडिल ईस्ट में संघर्ष और होर्मुज के बंद होने के कारण पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ था। वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भी भारत सीना तान खड़ा रहा है और अपनी कुशल रणनीति और पूर्व तैयारी के बल पर ईंधन संकट को पूरी तरह टाल लिया। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग के चार महीने तक बंद रहने के बावजूद देश में पेट्रोल पंपों पर कोई लंबी कतारें नहीं लगीं, घरों में एलपीजी सिलेंडर की कमी नहीं हुई और आर्थिक गतिविधियां लगभग सामान्य रहीं। सरकार के दूरदर्शी बुनियादी ढांचा विकास, आपूर्ति विविधीकरण और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता ने इस अभूतपूर्व चुनौती को सफलतापूर्वक पार किया। दरअसल, 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों के जवाब में तेहरान ने होर्मुज स्ट्रेट को पूरी तरह बंद कर दिया। यह समुद्री जल मार्ग विश्व के कुल तेल परिवहन का लगभग पांचवां हिस्सा संभालता है। बंदी के तुरंत बाद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी व्यवधान उत्पन्न हो गया और कीमतों में आग लग गई। यहां आपको बता दें कि भारत अपने कच्चे तेल का करीब 90 प्रतिशत और एलपीजी का 60 प्रतिशत आयात करता है, विशेष रूप से प्रभावित होने वाला देश था। देश के कुल तेल आयात का लगभग 50 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता था। संकट लगभग चार महीने तक चला। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश होने के कारण इस संकट का सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने की आशंका थी। कीमतों में भारी उछाल संकट लंबा खिंचने से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चली गईं। भारतीय कच्चे तेल की कीमतें संकट से पहले के 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से बढ़कर चार सप्ताह के अंदर 120 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गईं। ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल के सर्वकालिक उच्चतम स्तर को छू गया। सऊदी अरब में एलपीजी अनुबंध मूल्य में फरवरी से जून के बीच करीब 46 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे 14.2 किलोग्राम वाले सिलेंडर की आयात लागत 1600 रुपये से ऊपर पहुंच गई। युद्ध-जोखिम बीमा दरों में कई गुना वृद्धि हुई, जिससे आयात और महंगा हो गया। भारत की सफल रणनीति सरकार ने संकट शुरू होते ही कुछ ही दिनों में सख्त नियंत्रण आदेश जारी कर दिए। रणनीति के तहत सरकार ने घरेलू उत्पादन में तीव्र वृद्धि की। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में छूट, आक्रामक आपूर्ति स्रोत विविधीकरण और सक्रिय ऊर्जा कूटनीति पर जो दिया। सरकार ने मांग प्रबंधन पर जोर दिया और फैसला लिया कि लागत का बोझ आम परिवारों पर न डाला जाए, बल्कि इसे सार्वजनिक क्षेत्र की विपणन कंपनियों के माध्यम से वहन किया जाए। इस फैसले से ईंधन की घरेलू उपलब्धता बनी रही। पिछले दस वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए किए गए भारी निवेश ने संकट के समय काम किया। एलपीजी आयात टर्मिनलों की संख्या 2014 में 11 से बढ़कर वर्तमान में 22 हो गई है। आयात क्षमता भी 12 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़कर 2026 में 32.3 मिलियन टन प्रति वर्ष पहुंच गई। कच्चे तेल की खरीद के स्रोतों में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ। 2014 में 27 देशों से आयात करने वाला भारत अब 2026 में 41 देशों से तेल खरीद रहा है। लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए आपूर्तिकर्ता जुड़े, जबकि अमेरिका और रूस से आयात में खासी बढ़ोतरी हुई। परिणामस्वरूप, होर्मुज पर निर्भरता पहले की तुलना में काफी कम हो गई। वहीं, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के विस्तार से भी हर साल कच्चे तेल के आयात में बड़ी बचत हो रही है, जो संरचनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुआ। आर्थिक प्रभाव और सरकार का खर्च दो महीने से अधिक समय तक खुदरा कीमतों को स्थिर रखने के बाद विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 7 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। फिलहाल तेल कंपनियां प्रतिदिन करीब 650 करोड़ रुपये की वसूली में असफल हो रही हैं, जो पहले 1000 करोड़ रुपये के उच्चतम स्तर पर थी। सरकार ने 27 मार्च को पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, जिससे राजस्व में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस तिमाही में तेल और गैस कंपनियों को 1 लाख से 1.2 लाख करोड़ रुपये तक का नुकसान होने का अनुमान है। हालांकि, सरकार का कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और होर्मुज के फिर से खुलने से आने वाले महीनों में खुदरा कीमतों में गिरावट आएगी। अन्य देशों की तुलना में भारत का बेहतर प्रदर्शन होर्मुज संकट से निपटने के लिए दुनिया भर के देशों ने अलग-अलग रणनीतियां अपनाईं। कई एशियाई आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को ईंधन की कमी का सामना करना पड़ा। श्रीलंका ने दो सप्ताह में पेट्रोल राशनिंग लागू कर दी और सरकारी कामकाज को चार दिन के सप्ताह में सीमित कर दिया। पाकिस्तान ने स्कूल बंद किए और कार्य सप्ताह छोटा किया। म्यांमार ने विषम-सम ड्राइविंग और क्यूआर कोड आधारित राशनिंग लागू की। बांग्लादेश ने तेल भंडारों पर सेना तैनात कर दी, जबकि इथियोपिया ने कुछ क्षेत्रों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह रोक दी। धनी देशों ने भी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का इस्तेमाल किया। जापान ने भंडार कम किए और सब्सिडी दी, दक्षिण कोरिया ने 30 वर्षों में पहली बार कीमतों पर नियंत्रण लगाया। यूरोपीय संघ के 22 सदस्य देशों ने अप्रैल के मध्य तक 9 अरब यूरो से अधिक की राहत पैकेज घोषित किए। इसके विपरीत, भारत ने न तो आपातकाल घोषित किया, न राशनिंग लगाई और न ही स्कूल या कार्य घंटे कम किए। केवल व्यावसायिक और थोक एलपीजी, डीजल तथा एविएशन ईंधन के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाए गए, ताकि घरेलू जरूरतें पूरी हो सकें। आर्थिक स्थिरता बरकरार संकट के दौरान भारत की विदेशी मुद्रा भंडार 728 अरब डॉलर से अधिक के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया और पूरे संकट काल में स्थिर रहा। जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी रही। चालू खाता घाटा नियंत्रण में रहा और खुदरा मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के लक्ष्य के अंदर रही। होर्मुज खुलने के बाद अब क्या? जून में अमेरिका-ईरान शांति समझौते के … Read more