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‘साढ़े चार बम’ की रणनीति: इजरायल ने 40 दिनों में ईरान और लेबनान को दी कितनी ज़बरदस्त चोट

तेल अवीव इजरायल ने ईरान के साथ चल रही जंग में अब तक 18,000 से ज्यादा बम गिराए हैं. इजरायली सेना (IDF) की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उन्होंने ईरान में 4,000 से ज्यादा अलग-अलग ठिकानों को निशाना बनाया. यह आंकड़ा लगभग 40 दिनों (28 फरवरी 2026 से शुरू होकर अप्रैल 2026 तक) की लड़ाई का है।इजरायल की एयर फोर्स ने 1000 से ज्यादा हमले की सीरीज चलाई. कुल 10,800 से अधिक अलग-अलग हमले किए. हर टारगेट पर औसतन साढ़े चार बम या उससे ज्यादा गोला-बारूद गिराने की रणनीति अपनाई गई ताकि कोई भी लक्ष्य बच न सके. यह इजरायल की अब तक की सबसे भारी हवाई कार्रवाई में से एक मानी जा रही है।  28 फरवरी 2026 को शुरू हुए संघर्ष में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इजरायली सेना ने ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्चर, हथियार बनाने वाली फैक्टरियां, न्यूक्लियर से जुड़े ठिकाने, आईआरजीसी के मुख्यालय और कई सैन्य कमांडरों को निशाना बनाया। ईरान की मिसाइल और हथियार उत्पादन क्षमता को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा है. कई पेट्रोकेमिकल प्लांट, स्टील फैक्टरियां और मिसाइल बनाने के प्लांट तबाह हो गए. इजरायल का दावा है कि ईरान की डिफेंस इंडस्ट्री का बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया है. ईरान ने भी इजरायल पर मिसाइलें दागीं, लेकिन इजरायली डिफेंस सिस्टम ने ज्यादातर को रोक लिया। ईरान में इन हमलों से हजारों लोग मारे गए और घायल हुए. सैन्य ठिकानों के अलावा कुछ नागरिक इलाकों में भी नुकसान हुआ. ईरान की अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत दोनों को भारी झटका लगा है. इजरायल का कहना है कि इन हमलों से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता, एयर डिफेंस और परमाणु कार्यक्रम को काफी नुकसान पहुंचा है। इजरायल ने ईरान के साथ-साथ लेबनान में हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर भी लगातार हमले जारी रखे. 8 अप्रैल 2026 को एक ही दिन में इजरायल ने लेबनान पर 10 मिनट के अंदर 100 से ज्यादा हमले किए. इसमें बेरूत के घनी आबादी वाले इलाकों, दक्षिणी लेबनान और बेकां घाटी को निशाना बनाया गया। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय और सिविल डिफेंस के अनुसार उस एक दिन में 250 से 350 से ज्यादा लोग मारे गए और 1100 से अधिक घायल हुए. यह लेबनान में हाल के सालों का सबसे खूनी दिन था. पूरे अभियान में लेबनान में 1000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और हजारों लोग घायल हुए हैं।इजरायल ने हिजबुल्लाह के कमांड सेंटर, हथियार डिपो, ब्रिज और रसद मार्गों को नष्ट किया. कई पुल टूट गए जिससे दक्षिणी लेबनान में मदद पहुंचना मुश्किल हो गया है. इजरायल का दावा है कि इन हमलों में सैकड़ों हिजबुल्लाह लड़ाके मारे गए. लेबनान में लाखों लोग बेघर हो गए और देश में बड़ी तबाही मची है। इजरायल हर एक महत्वपूर्ण टारगेट को पूरी तरह खत्म करने के लिए बहुत ज्यादा बम गिरा रहा है. औसतन हर टारगेट पर 4.5 बम या उससे ज्यादा गोला-बारूद का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसका मकसद है कि कोई भी सैन्य सुविधा, मिसाइल या कमांड सेंटर बच न सके।        इजरायल ने 800 से ज्यादा हमले की लहरों में यह रणनीति अपनाई. इससे ईरान और हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता को जड़ से कमजोर करने का प्रयास किया गया. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी भारी बमबारी दुर्लभ है और इससे इलाके में लंबे समय तक असर रहेगा। यह 40 दिनों का संघर्ष फरवरी के अंत में शुरू हुआ जब इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू किए. इसका मुख्य लक्ष्य ईरान की मिसाइल क्षमता, न्यूक्लियर कार्यक्रम और हिज्बुल्लाह जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को कमजोर करना था. ईरान के सुप्रीम लीडर की मौत की भी खबरें आईं जिससे स्थिति और गर्म हो गई।  अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का सीजफायर हुआ, लेकिन इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ हमले जारी रखे. इजरायल कहता है कि ये हमले आत्मरक्षा के लिए जरूरी हैं क्योंकि हिजबुल्लाह अभी भी खतरा बना हुआ है। दूसरी तरफ ईरान और लेबनान इन हमलों को आक्रामकता बता रहे हैं. दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं. लेबनान सरकार ने राष्ट्रीय शोक घोषित किया है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगी है। यह युद्ध दिखाता है कि मध्य पूर्व में तनाव कितना गहरा है. इजरायल ने अपनी एयर पावर का पूरा जोर लगाया, लेकिन इससे आम लोगों की मौत और बड़ी तबाही भी हुई है. आने वाले दिनों में सीजफायर की कोशिशें जारी रहेंगी, लेकिन शांति अभी दूर नजर आ रही है। 

इजरायल के सामने लेबनानी सेना ने किया सरेंडर, भागे हथियार डालकर, इजरायल का कब्जा अब तक किस पर?

बेरूत  ट्रंप अब ईरान के साथ समझौते की रणनीति पर उतर आए हैं लेकिन इजरायल लगातार अपनी जंग लड़ रहा है. मिडिल ईस्ट के कई देशों में चल रही खौफनाक बमबारी के बीच लेबनान की सेना ने हथियार डाल दिए हैं. 1 महीने लंबी लड़ाई लड़ने के बाद लेबनानी सेना दक्षिणी लेबनान के दो प्रमुख शहरों, रमीश (Rmeish) और ऐन एबेल (Ain Ebel) से अपने कदम पीछे खींचते हुए चली गई है. सेना का हटना इस बात का बड़ा संकेत है कि इजरायली डिफेंस फोर्सेस (IDF) अब मिडिल ईस्ट में अपना मकसद मजबूत करती जा रही है।  क्या लेबनान ने सच में ‘हथियार डाल दिए’ हैं? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबित लेबनान की आधिकारिक सेना हिजबुल्लाह के मुकाबले काफी कमजोर और कम संसाधनों वाली है. वो इजरायल की आधुनिक मशीनरी और एयरफोर्स का सामना करने की स्थिति में नहीं है. रमीश और ऐन एबेल जैसे शहरों से पीछे हटना इजरायल को लेबनान के भीतर घुसने का ‘खुला निमंत्रण’ देने जैसा है।  लेबनानी सेना के पीछे हटने का सीधा मतलब ये है कि नेतन्याहू का संकल्प पूरा हुआ. इजरायल लंबे समय से दक्षिण लेबनान में एक बफर जोन बनाना चाहता है ताकि हिजबुल्लाह के रॉकेट हमलों को रोका जा सके. लेबनान की सेना के हटते ही अब वहां सिर्फ हिजबुल्लाह के लड़ाके और इजरायली टैंक ही आमने-सामने होंगे।  अब तक लेबनानी सेना की मौजूदगी एक ‘बैरियर’ का काम करती थी लेकिन अब हिजबुल्लाह को अपनी रक्षा खुद करनी होगी. इजरायल के लिए अब इन इलाकों पर कब्जा करना और भी आसान हो गया है।  मिडिल ईस्ट की जंग में इसके बड़े मायने गाजा और ईरान के बाद अब लेबनान में इजरायल को बिना लड़े ही रास्ता मिल रहा है. ये बेंजामिन नेतन्याहू के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और सैन्य जीत है. हिजबुल्लाह ईरान का सबसे बड़ा और ताकतवर प्रॉक्सी ग्रुप है. लेबनान की सरकारी सेना का पीछे हटना यह दिखाता है कि लेबनान के भीतर भी अब हिजबुल्लाह को लेकर समर्थन कम हो रहा है या वहां का प्रशासन अब और तबाही नहीं झेलना चाहता।  सेना के हटते ही इन इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों में भारी खौफ है. लोग घर छोड़कर उत्तर की ओर भाग रहे हैं, जिससे लेबनान में एक बड़ा मानवीय संकट खड़ा हो सकता है।  अगला कदम क्या होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि लेबनानी सेना का हटना इस बात की पुष्टि है कि अगले 24 से 48 घंटों में इजरायली टैंक रमीश और ऐन एबेल की सड़कों पर नजर आ सकते हैं. इजरायल अब लेबनान के भीतर ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ चलाएगा ताकि हिजबुल्लाह के ठिकानों और सुरंगों को जड़ से मिटाया जा सके।  1948 से शुरू हुआ सीमाओं का विस्तार इजरायल के नक्शे का इतिहास युद्धों की कहानियों से भरा पड़ा है. साल 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने जब विभाजन की योजना पेश की थी, तब इजरायल के लिए केवल 14,500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र प्रस्तावित किया गया था, लेकिन 1948 में इजरायल की स्थापना के तुरंत बाद शुरू हुए पहले अरब-इजरायल युद्ध ने सब कुछ बदल दिया. इस जंग के खत्म होने तक इजरायल ने अपनी प्रस्तावित सीमाओं को तोड़ते हुए लगभग 20,700 वर्ग किलोमीटर के इलाके पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था. यहीं से इजरायल के भौगोलिक विस्तार के उस दौर की शुरुआत हुई, जिसने मध्य-पूर्व की राजनीति को हमेशा के लिए अस्थिर कर दिया।  सिक्स डे वॉर और कब्जे का सबसे बड़ा दौर इजरायल के इतिहास में 1967 की सिक्स डे वॉर मील का पत्थर साबित हुई. इस छोटी सी लेकिन भीषण जंग में इजरायल ने अपने पड़ोसी देशों को चौंकाते हुए वेस्ट बैंक, गाजा पट्टी, गोलन हाइट्स और सिनाई प्रायद्वीप जैसे विशाल क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया. इस युद्ध के बाद इजरायल का आकार कई गुना बढ़ गया था. हालांकि बाद में शांति समझौतों के तहत सिनाई प्रायद्वीप को मिस्र को वापस लौटा दिया गया, लेकिन गोलन हाइट्स और वेस्ट बैंक जैसे इलाके आज भी विवाद और कब्जे के केंद्र में बने हुए हैं. यही वे इलाके हैं, जिनके लिए आज भी खून बह रहा है।  ईरान-इजरायल युद्ध और मौजूदा हालात आज के दौर में जब ईरान और इजरायल के बीच सीधी जंग छिड़ी हुई है, तो जमीन का यह विवाद और भी गहरा गया है. ईरान लगातार इजरायल पर फिलिस्तीनी और अरब जमीनों पर अवैध कब्जे का आरोप लगाता रहा है. मौजूदा संघर्ष में जहां इजरायल को अमेरिका का खुला समर्थन प्राप्त है, वहीं ईरान इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बता रहा है. जानकारों का मानना है कि इजरायल द्वारा समय-समय पर अपनी सीमाओं को आगे बढ़ाना ही ईरान और उसके सहयोगियों के गुस्से की सबसे बड़ी वजह है. इस युद्ध में इजरायल को कड़ी चुनौती मिल रही है, जिससे उसकी विस्तारवादी नीति पर सवाल उठने लगे हैं।  कितना बढ़ गया इजरायल का कुल क्षेत्रफल? आंकड़ों की नजर से देखें तो इजरायल का विस्तार काफी चौंकाने वाला है. जिस देश की शुरुआत करीब 14,000 वर्ग किलोमीटर से होनी थी, उसका आधिकारिक क्षेत्रफल आज लगभग 22,072 वर्ग किलोमीटर होने का अनुमान है. इसमें गोलन हाइट्स जैसे वे इलाके भी शामिल हैं, जिन्हें इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय विरोध के बावजूद अपने नक्शे में मिला रखा है. इजरायल का यह बदलता नक्शा न केवल क्षेत्र में उसकी सैन्य शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि भविष्य के युद्धों के पीछे जमीन की यह पुरानी लड़ाई ही सबसे बड़ी और मुख्य जड़ है।  ग्रेटर इजरायल की विचारधारा और इसका विवाद इजरायल के इर्द-गिर्द घूमने वाला सबसे बड़ा विवाद ग्रेटर इजरायल की विचारधारा है. यह कोई आधिकारिक सरकारी योजना नहीं है, लेकिन एक ऐसी विचारधारा है जो इजरायल के विस्तार की वकालत करती है. इस विचारधारा के समर्थक बाइबिल के आधार पर प्राचीन यहूदी राज्य की उन सीमाओं की कल्पना करते हैं जो आधुनिक इजरायल से कहीं ज्यादा बड़ी हैं. इस विचार के तहत फिलिस्तीन, लेबनान और सीरिया जैसे पड़ोसी देशों के हिस्सों को भी इजरायल के दायरे में लाने की बात की जाती है. यही वह विचारधारा है जिसे ईरान और अन्य अरब देश क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।  मध्य-पूर्व और अमेरिका की रणनीतिक भागीदारी इस पूरे भौगोलिक विस्तार और युद्धों के पीछे अमेरिका … Read more

ईरान के दो प्रमुख कमांडरों की हत्या, इजरायल का एक ही दिन में IRGC और बासिज फोर्स पर हमला

तेहरान  इजरायल के ताजा हमले में ईरान को 2 तगड़े झटके लगे हैं. ईरान ने कहा है कि इजरायली हवाई हमले में इस्लामिक रिव्यूलेशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के प्रवक्ता अली मोहम्मद नैनी की मौत हो गई है. इसके अलावा एक दूसरे हमले में ईरान के बासिज फोर्स के खुफिया प्रमुख जनरल इस्माइल अहमदी की मौत हो गई है।  ब्रिगेडियर जनरल अली मोहम्मद नैनी ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के प्रवक्ता और जनसंपर्क के उप-प्रमुख थे. उन्हें जुलाई 2024 में IRGC के कमांडर-इन-चीफ़ हुसैन सलामी ने इस पद पर नियुक्त किया गया था. 1957 में जन्मे नैनी ईरान-इराक युद्ध के अनुभवी सैनिक थे. इस जंग के दौरान वह जख्मी भी हुए थे।  नैनी के पास उनके पास सेकेंड ब्रिगेडियर जनरल का पद था. नैनी अक्सर IRGC की ओर से बयान जारी करते थे, जिनमें ईरान की सैन्य तत्परता, मिसाइल और ड्रोन क्षमताओं के बारे में चेतावनियां होती थीं।  IRGC के प्रवक्ता थे अली मोहम्मद नैनी मार्च 2026 के मध्य में बढ़ते संघर्ष के बीच उन्होंने दावा किया कि ईरान कम से कम छह महीने तक चलने वाले हाई इंटेंसिटी वाले युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार है. उन्होंने कहा कि कई नई पीढ़ी की मिसाइलों और ड्रोनों का अभी तक उपयोग नहीं किया गया है।  मोहम्मद नैनी ईरान-इराक जंग (1980-88) की पूरी अवधि के दौरान फ्रंटलाइन पर रहे. लगभग 8 साल तक उन्होंने जंग में अलग अलग रोल में काम किया।  युद्ध के पहले साल उन्होंने क़द्र बटालियन के जनसंपर्क प्रमुख के रूप में सेवा की. उन्होंने सर्पोल-ए जहाब में अबूजर बैरक में भी जनसंपर्क और ऑपरेशंस की जिम्मेदारी संभाली. बाद में वे नजफ मुख्यालय में फ्रंटलाइन प्रचार के डिप्टी के रूप काम कर रहे थे।  इजरायल ने कहा है कि उसने ईरानी शासन से जुड़ी 130 से ज़्यादा इंफ्रास्ट्रक्चर साइटों पर हमला किया है. इन टारगेट में पश्चिमी और मध्य ईरान में बैलिस्टिक मिसाइल साइटें, UAV और डिफेंस सिस्टम शामिल थीं।  इजरायल ने बयान में कहा गया, "इजरायल वायु सेना पश्चिमी और मध्य ईरान में हमले जारी रखे हुए है, ताकि वहां से इजरायल की ओर होने वाली गोलाबारी के दायरे को जितना हो सके कम किया जा सके और ईरान पर अपनी हवाई श्रेष्ठता का विस्तार किया जा सके।  बासिज फोर्स के इंटेलिजेंस चीफ थे जनरल इस्माइल अहमदी बासिज के खुफिया विभाग के प्रमुख जनरल इस्माइल अहमदी IRGC से जुड़े एक अधिकारी थे. वे संगठन में सुरक्षा और खुफिया भूमिका निभाते थे. वे बुशहर प्रांत के मूल निवासी थे।  उनकी भूमिका बासिज में सुरक्षा और खुफिया से जुड़ी थी. वे  कई बार IRGC कमांडर हुसैन सलामी द्वारा सम्मानित किए गए थे. वे बासिज के कमांडर शहीद घुलामरज़ा सुलेमानी के सहयोगी और डिप्टी थे. बासिज के खुफिया प्रमुख के रूप में संगठन में उनकी भूमिका आंतरिक सुरक्षा, जासूसी-रोकथाम और वैचारिक निगरानी की थी।  17  मार्च को अली लारिजानी मारे गए इससे पहले इजरायल के हमले में ईरान के डी फैक्टो लीडर अली लारिजानी की 17 मार्च 2026 को मौत हो गई थी. यह हमला रात में हुआ था जब वे अपनी बेटी के घर पर थे. इस हमले में उनके बेटे, कुछ अंगरक्षक और अन्य साथी भी मारे गए।  लारिजानी को खामेनेई की मौत के बाद ईरान का अस्थायी प्रमुख माना जा रहा था. उनकी मौत ने ईरान के नेतृत्व में बड़ा संकट पैदा किया है। 

इजरायल ने 90 दिन पहले खामेनेई को मारने की बनाई थी योजना

तेहरान  इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज ने 5 मार्च 2026 को एक टीवी इंटरव्यू में बड़ा खुलासा किया है कि देश ने पिछले साल नवंबर में ही अयातुल्ला अली खामेनेई को मारने का फैसला कर लिया था. यह फैसला प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ एक बहुत छोटी और गोपनीय बैठक में लिया गया था। शुरू में योजना थी कि यह काम छह महीने बाद यानी मध्य 2026 में किया जाएगा लेकिन बाद में हालात इतने तेजी से बदल गए. अमेरिका और इजरायल ने मिलकर फरवरी के अंत में ही हमला शुरू कर दिया. इस हमले के पहले ही घंटों में खामेनेई की मौत हो गई, जो दुनिया के इतिहास में किसी देश के सबसे बड़े नेता को हवाई हमले से मारने का पहला मामला बन गया है. अब यह संयुक्त हवाई अभियान एक हफ्ते से ज्यादा चल चुका है. पूरे क्षेत्र में युद्ध की आग फैल गई है। नवंबर 2025 में क्या हुआ और नेतन्याहू ने क्यों लिया यह फैसला रक्षा मंत्री काट्ज ने इजरायल के चैनल 12 टीवी को बताया कि नवंबर 2025 में प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने एक बहुत छोटे समूह के साथ बैठक बुलाई थी. इसमें सिर्फ चुनिंदा लोग थे. उस बैठक में नेतन्याहू ने साफ कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई को खत्म करना हमारा लक्ष्य है।  उस समय योजना बनाई गई कि यह ऑपरेशन मध्य 2026 में किया जाएगा क्योंकि इजरायल को लगता था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइलें इजरायल के लिए अस्तित्व का खतरा बन चुकी हैं. इजरायल का मानना है कि ईरान हथियार बना रहा है जो इजरायल को पूरी तरह नष्ट कर सकता है. इसलिए इस खतरे को जड़ से खत्म करने का फैसला किया गया। जनवरी 2026 में योजना क्यों बदली गई और US को कब बताया गया काट्ज ने आगे बताया कि दिसंबर के बाद जनवरी 2026 में ईरान में बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. ईरान के लोग अपने नेता और सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे. इजरायल को डर था कि यह दबाव झेल रहे शासक किसी भी समय इजरायल और अमेरिकी ठिकानों पर हमला कर सकते हैं। इसलिए योजना को तेज कर दिया गया. इजरायल ने इस पूरे प्लान को अमेरिका को बताया. दोनों देशों ने मिलकर तैयारी शुरू कर दी. रक्षा मंत्री ने कहा कि हम नहीं चाहते थे कि ईरान पहले हमला कर दे इसलिए प्लान को बदला गया। 28 फरवरी 2026 को शनिवार के दिन अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़ा हवाई अभियान शुरू किया. पहले ही कुछ घंटों में खामेनेई को उनके घर और दफ्तर वाले इलाके में मार दिया गया. यह हमला इतना सटीक था कि ईरान के कई बड़े सैन्य नेता भी उसी में मारे गए। हमले ने पूरे क्षेत्र को युद्ध में झोंक दिया अब यह अमेरिका-इजरायल का संयुक्त हवाई हमला एक हफ्ते से ज्यादा चल रहा है. शुरू के दिनों में ही ईरान के कई बड़े नेता मारे गए जिससे ईरान का शासन हिल गया है. ईरान ने जवाब में इजरायल पर मिसाइलें दागीं गल्फ देशों और इराक में भी हमले किए। इजरायल ने ईरान के करीबी सहयोगी हिजबुल्लाह पर लेबनान में हमले तेज कर दिए हैं. पूरा मध्य पूर्व अब युद्ध की आग में जल रहा है. ईरान की सरकार ने कहा है कि वह लड़ाई जारी रखेगी. लेकिन इजरायल का कहना है कि हमारा मकसद सिर्फ खतरा खत्म करना है। इजरायल के असली लक्ष्य क्या हैं – परमाणु कार्यक्रम और शासन बदलना इजरायल ने साफ कहा है कि उसका मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट को पूरी तरह खत्म करना है. इजरायल को लगता है कि ईरान ये हथियार बना लेगा तो इजरायल के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं बचेगी। इसके अलावा इजरायल चाहता है कि ईरान में शासन बदल जाए यानी वहां मौजूदा सरकार गिर जाए और एक नई सरकार आए जो शांतिप्रिय हो. रक्षा मंत्री काट्ज ने कहा कि अगर ईरान नया नेता चुनता है तो वह भी इजरायल का निशाना बनेगा क्योंकि इजरायल किसी भी ऐसे नेता को बर्दाश्त नहीं करेगा जो इजरायल को नष्ट करने की सोचे। ईरान की स्थिति और भविष्य में क्या हो सकता है ईरान ने अब तक कोई संकेत नहीं दिया है कि वह सत्ता छोड़ेगा या बातचीत करेगा. उल्टे ईरान ने इजरायल और अमेरिका पर कई जगहों पर हमले किए हैं जिससे तेल की सप्लाई प्रभावित हो रही है. गल्फ के देश डर में हैं. इजरायल और अमेरिका का कहना है कि अभियान तब तक चलेगा जब तक ईरान का परमाणु खतरा पूरी तरह खत्म न हो जाए. यह पूरा मामला दशकों पुरानी इजरायल-ईरान दुश्मनी का सबसे बड़ा मोड़ है।  

कैमरों से तेहरान को पढ़ रहा था इजरायल, नेतन्याहू ने कहा- युद्ध जल्दी खत्म होगा

तेहरान  ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की मौत के बाद एक सवाल लोगों के ज़ेहन में है. सवाल ये है की अमेरिका और इजरायल ने आख़िर कैसे इतना सटीक निशाना लगाया और खामेनेई के साथ तमाम टॉप लीडरशिप पर बॉम्बिंग कर दी |  Financial Times की एक बड़ी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इजरायल ने कई सालों तक तेहरान के ट्रैफिक कैमरा सिस्टम में सेंध लगाई |  सिर्फ कैमरे ही नहीं, मोबाइल नेटवर्क तक पहुंच बनाई गई. मकसद था ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्ला अली खामेनेई और उनके सुरक्षा घेरे की हर गतिविधि पर नजर रखना |  रिपोर्ट कहती है कि तेहरान के ज्यादातर ट्रैफिक कैमरे इजरायल की निगरानी में थे. फुटेज को एन्क्रिप्ट कर बाहर भेजा जाता था. इससे एक पूरा मूवमेंट पैटर्न तैयार हुआ. कौन कब निकला. कौन साथ था. कौन सा रूट लिया गया. सब रिकॉर्ड होता रहा |  ऑपरेशन कैसे चला? बताया गया है कि यह काम एक-दो महीने का नहीं था. यह लंबा ऑपरेशन था. इजरायल की खुफिया यूनिट 8200 और मोसाद ने टेक सिस्टम में गहरी घुसपैठ की |  कैमरों की लाइव फीड एक्सेस की गई. मोबाइल नेटवर्क डेटा भी जोड़ा गया. इससे सिक्योरिटी स्टाफ की आवाजाही समझी गई. बॉडीगार्ड्स कहां पार्क करते हैं. किस समय गार्ड बदलते हैं. किस रास्ते से मूवमेंट होता है. धीरे-धीरे एक पैटर्न ऑफ़ लाइफ तैयार हुआ. यानी रोजमर्रा की आदतों का पूरा डिजिटल नक्शा |  कैमरे कैसे हथियार बने? आज शहरों में लगे CCTV सिर्फ ट्रैफिक कंट्रोल के लिए नहीं हैं. अगर कोई सिस्टम में घुस जाए तो वही कैमरे निगरानी का टूल बन जाते हैं|  रिपोर्ट के मुताबिक फुटेज को सीधे बाहर के सर्वर पर भेजा गया. यानी डेटा शहर के अंदर नहीं रहा|  मोबाइल नेटवर्क की घुसपैठ से यह पता चलता है कि कौन सा फोन किस लोकेशन पर था. इससे सिक्योरिटी मूवमेंट और साफ दिखने लगता है|  इजरायल ने ऐसे बनाया एक्शन प्लान  रिपोर्ट में दावा है कि जब पर्याप्त जानकारी इकट्ठा हो गई, तब सटीक एक्शन प्लान बनाया गया|  लोकेशन, टाइमिंग और सिक्योरिटी गैप को समझकर आगे की रणनीति तय की गई|  हालांकि आधिकारिक स्तर पर सभी दावों की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन यह साफ है कि डिजिटल निगरानी इस पूरे मामले में अहम रही|  डिजिटल युद्ध: साइबर वॉर      विशेषज्ञ कहते हैं कि अब युद्ध सिर्फ जमीन या आसमान में नहीं लड़ा जाता|      डिजिटल सिस्टम नया मोर्चा है. कैमरे. मोबाइल नेटवर्क. इंटरनेट. सब संभावित टारगेट हैं|      जो देश साइबर क्षमता में मजबूत हैं, वे बिना गोली चलाए भी बड़ी बढ़त बना सकते हैं|  क्या सेफ हैं कैमरा? मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से बढ़ा हुआ है. इजरायल और ईरान के बीच टकराव खुला रहस्य है. ऐसे माहौल में अगर शहर का इंफ्रास्ट्रक्चर ही निगरानी टूल बन जाए, तो यह नई तरह की जंग है|  यह मामला दिखाता है कि अब साइबर वॉरफेयर असली दुनिया के फैसलों को प्रभावित कर रही है|  इस रिपोर्ट ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या शहरों के कैमरे सुरक्षित हैं? क्या मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह सुरक्षित हैं? और क्या आने वाले समय में ऐसे ऑपरेशन आम हो जाएंगे? ये युद्ध कई साल तक नहीं चलेगा… नेतन्याहू  इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ईरान के खिलाफ जल्द और निर्णायक सैन्य कार्रवाई का ऐलान किया है. उन्होंने कहा है कि यह सैन्य संघर्ष अंतहीन नहीं होगा और इसे वर्षों तक खींचने की योजना नहीं है |  इस बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप मंगलवार दोपहर 2 बजे वित्त और ऊर्जा सचिवों के साथ व्हाइट हाउस में बैठक कर रहे हैं. अमेरिका और इजरायल संयुक्त रूप से ईरान में सत्ता परिवर्तन के लिए परिस्थितियां बना रहे हैं |  इजरायल का मानना है कि ईरान के खिलाफ यह सैन्य कदम सऊदी अरब के साथ संभावित शांति के द्वार खोल सकते हैं |  नेतन्याहू का युद्ध और ईरान पर रुख नेतन्याहू ने जोर देकर कहा है कि इजरायल ईरान के साथ लंबे युद्ध की स्थिति में नहीं जाना चाहता है. उनका मानना है कि ईरान के खिलाफ जो कार्रवाई की जा रही है, वह त्वरित और निर्णायक होगी. उन्होंने यह भी कहा कि ईरान में सत्ता परिवर्तन की अंतिम जिम्मेदारी वहां की जनता की है. अमेरिका और इजरायल मिलकर ऐसी परिस्थितियां बना रहे हैं, जो ईरानी लोगों को अपने शासन को बदलने में सक्षम बनाएंगी. इजरायल के मुताबिक, यह सैन्य कार्रवाई कुछ वक्त तक जारी रह सकती है लेकिन यह लंबी अवधि की प्रक्रिया नहीं होगी | सऊदी-इजरायल शांति और ट्रंप की बैठक नेतन्याहू ने यह भी इशारा किया कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई सऊदी अरब और इजरायल के बीच शांति स्थापना में मदद कर सकती है |  इस बड़े घटनाक्रम के बीच व्हाइट हाउस से सूचना मिली है कि राष्ट्रपति ट्रंप मंगलवार को दोपहर 2 बजे वित्त सचिव और ऊर्जा सचिव के साथ बैठक करेंगे. इस बैठक को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, विशेषकर ईरान के खिलाफ रणनीतिक आर्थिक और ऊर्जा संबंधी फैसलों के संदर्भ में. प्रशासन इस स्थिति को लेकर लगातार सक्रिय है और कूटनीतिक और सैन्य दोनों स्तरों पर समन्वय बना रहा है | 

इजरायल का विवादित कदम: वेस्ट बैंक में कब्जा करने की तैयारी, 8 मुस्लिम देशों ने विरोध जताया

तेल अवीव इजरायल सरकार ने पश्चिमी तट में जमीन पंजीकरण प्रक्रिया शुरू करने के हालिया फैसले की आठ मुस्लिम देशों द्वारा निंदा करने वाले संयुक्त बयान को बेबुनियाद और गुमराह करने वाला बताया है। मंगलवार को तुर्की, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्रियों ने पश्चिमी तट में जमीन को सरकारी सम्पति घोषित करने और उनके पंजीकरण और मालिकाना हक के सेटलमेंट के लिए प्रक्रिया को मंजूरी देने के इजरायली सरकार के फैसले की निंदा की। मंत्रालय ने आज एक बयान में कहा, 'यह बयान असल में बेबुनियाद और जानबूझकर गुमराह करने वाला है। फिलिस्तीनी अधिकारी ही क्षेत्र सी में गैर-कानूनी जमीन पंजीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे है, जो कानून और मौजूदा समझौतों का उल्लंघन है।' मंत्रालय ने बताया कि इजरायली सरकार ने सिविल और सम्पति कानून के तहत प्रशासनिक कदम को मंजूरी दी है। क्या बोला सऊदी अरब सऊद अरब के विदेश मंत्रालय ने बयान में कहा कि यह कदम कब्जे वाले इलाके में एक नई कानूनी और प्रशासनिक हकीकत को थोपता है, जिससे द्वि-राष्ट्र समाधान और फिलिस्तीनी अधिकार कमज़ोर होते हैं। मंत्रालय ने कहा कि फिलिस्तीनी जमीन पर इजरायल का कोई हक नहीं है। मंत्रालय ने इन कदमों को फिलिस्तीनी लोगों के चार जून, 1967 की सीमाओं पर एक आजाद देश बनाने के कानूनी हक पर हमला बताया, जिसकी राजधानी पूर्वी येरुशलम हो। प्रस्ताव उल्लेखनीय है कि इजरायली सरकार ने कब्जे वाले वेस्ट बैंक के बड़े इलाकों को अपनी भूमि के तौर पर वर्गीकृत करने की योजना को मंजूरी दी, अगर फिलिस्तीनी मालिकाना हक साबित नहीं कर पाते। यह प्रस्ताव दक्षिणपंथी मंत्रियों बेज़ालेल स्मोट्रिच (वित्त), यारिव लेविन (न्याय), और इजरायल काट्ज (रक्षा) ने रखा था। स्मोट्रिच ने इस योजना को 'हमारी सभी जमीनों पर नियंत्रण करने के लिए समाधान क्रांति' का अगला कदम बताया, जबकि लेविन ने इसे इज़रायल के अपने सभी हिस्सों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने की प्रतिबद्धता का प्रदर्शन बताया। इस मंजूरी से ज़मीन के मालिकाना हक के समाधान की प्रक्रिया फिर से शुरू हो गई हैं, जो 1967 में वेस्ट बैंक पर इजरायल के कब्जे के बाद से रुके हुए थे।

गाजा विवाद पर इजरायल की सख्ती, ट्रंप की मीटिंग में होंगे 8 मुस्लिम देश और पाकिस्तान

गाजा  अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चौंकाने वाले फैसले लेने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने गाजा के मसले पर बोर्ड ऑफ पीस का गठन किया है और इसकी पहली मीटिंग 19 फरवरी को होने वाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति का कहना है कि इस बैठक में चर्चा होगी कि कैसे गाजा में विकास के काम दोबारा शुरू किए जाएं और वहां जंग समाप्त हो। इस बोर्ड में इजरायल भी सदस्य है, लेकिन उसे ही इसमें झटका भी लगता दिख रहा है। मामला यह है कि वह पाकिस्तान को कभी भी तवज्जो नहीं देना चाहता, लेकिन इस बोर्ड में डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ भी शामिल होंगे। यही नहीं तुर्की भी इसमें शामिल रहेगा, जो फिलिस्तीन के मसले पर खुलकर इजरायल का विरोधी रहा है। ऐसी स्थिति में यदि गाजा के भविष्य को लेकर बन रहे किसी प्लान में यदि शहबाज शरीफ शामिल होंगे तो यह इजरायल के लिए चिंता की बात होगी। वह पहले भी कह चुका है कि हम पाकिस्तान को शामिल नहीं करना चाहते। फिर भी उसकी एंट्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए चिंता की बात है। पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ 18 फरवरी को ही वॉशिंगटन पहुंच जाएंगे और 19 को होने वाले समिट में हिस्सा लेंगे। यह आयोजन यूएस इंस्टिट्यूट ऑफ पीस में होना है। इस बैठक में चर्चा होगी कि कैसे गाजा में जंग के बाद पुनर्निर्माण शुरू किया जाए। इस बैठक में कई देशों के नेता और कुछ अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट और हस्तियां भी इसमें रहेंगी। इस मीटिंग में पाकिस्तान और तुर्की समेत कुल 8 मुसलमान देश शामिल होंगे। इनमें सऊदी अरब, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, कतर और यूएई हैं। दरअसल इजरायल की चिंता यह है कि मीटिंग में शामिल सभी मुसलमान देश एकजुट होकर कोई स्टैंड ले सकते हैं। खासतौर पर सीजफायर के उल्लंघन को लेकर इजरायल पर कठिन शर्तें थोपे जाने का खतरा है। इसके अलावा कुछ गारंटी भी उससे ली जा सकती है। मुसलमान देशों का कहना है कि गाजा में पुनर्निर्माण और शांति तभी संभव है, जब इजरायल के ऐक्शन पर कुछ लगाम लग सके। 22 देशों को अमेरिका की ओर से मिला था न्योता अमेरिका की ओर से कुल 22 देशों को बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया गया है। इनमें से ज्यादातर ने सहमति जताई है, लेकिन फ्रांस जैसे उसके मित्र देश ही दूरी बना रहे हैं। इसके अलावा भारत ने भी फिलहाल देखो और इंतजार करो की नीति अपना ली है। अब तक भारत की ओर से इसमें हिस्सा लेने की पुष्टि नहीं की गई है। माना जा रहा है कि भारत नहीं चाहता कि वह ऐसे किसी प्रयास में आगे दिखे, जिसे भविष्य में संयुक्त राष्ट्र संघ के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है।

गाजा में इजरायल का घातक एयरस्ट्राइक, 3-मंजिला इमारत को किया निशाना, खौफनाक दृश्य कैमरे में कैद

गाजा सीजफायर लागू होने के बावजूद इजरायली सेना ने पूर्वी गाजा सिटी के जैतून इलाके में एक रिहायशी क्षेत्र को निशाना बनाते हुए एयरस्ट्राइक की. रिपोर्ट के मुताबिक हमला असकुला जंक्शन के पास स्थित तीन मंजिला इमारत पर किया गया. हमले के बाद इलाके में आग की लपटें और घना धुआं उठता देखा गया, जिससे स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई. यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका प्रशासन ने जनवरी में घोषणा की थी कि युद्धविराम समझौते का दूसरा चरण शुरू हो चुका है. इस चरण में गाजा से इजरायली सेना की अतिरिक्त वापसी और पुनर्निर्माण कार्यों की शुरुआत शामिल है. संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि गाजा के पुनर्निर्माण पर करीब 70 अरब डॉलर का खर्च आ सकता है. अक्टूबर 2023 में शुरू हुई इजरायली सैन्य कार्रवाई एक साल से अधिक समय तक चली थी. इस अभियान में गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार करीब 72 हजार फिलिस्तीनी मारे गए और 1.71 लाख से अधिक घायल हुए. इसके अलावा गाजा के लगभग 90 प्रतिशत बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा या वह नष्ट हो गया.   युद्धविराम लागू होने के बाद भी हालात पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं. गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि इस अवधि में इजरायली कार्रवाइयों में 574 लोगों की मौत हुई और 1,518 अन्य घायल हुए हैं. इन आंकड़ों के सामने आने के बाद समझौते के पालन और क्षेत्र में स्थिरता को लेकर नए सवाल उठने लगे हैं.   फिलहाल क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर स्थिति पर टिकी है. आगे की घटनाओं और प्रतिक्रियाओं का इंतजार किया जा रहा है, जबकि युद्धविराम के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

इजरायल ने दिया बड़ा झटका: हमास और इस्लामिक जिहाद के प्रमुख कमांडर्स को किया ढेर, गाजा में बढ़ा तनाव

गाजा   अक्टूबर 2025 में हुए सीजफायर (युद्धविराम) के बाद इजरायल ने अब तक का सबसे बड़ा हमला किया है. इजरायली सेना (IDF) ने दावा किया है कि उन्होंने बुधवार को एक बड़े ऑपरेशन में ‘फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद’ (PIJ) के टॉप कमांडर अली राजियाना को मार गिराया है. इजरायल के मुताबिक, यह सीजफायर के बाद की सबसे बड़ी कामयाबी है. कौन था अली राजियाना?   द यरूशलेम पोस्ट के अनुसार, इजरायली सेना और उनकी खुफिया एजेंसी ‘शिन बेट’ के मुताबिक, अली राजियाना ‘नार्दर्न गाजा ब्रिगेड’ का चीफ था. वह न सिर्फ इस्लामिक जिहाद की मिलिट्री काउंसिल का हिस्सा था, बल्कि हमास के साथ मिलकर इजरायली सैनिकों पर हमलों की प्लानिंग भी करता था. सेना ने बताया कि युद्ध के दौरान बंधकों को कैद में रखने में भी इसकी बड़ी भूमिका थी और सीजफायर के बाद यह अपनी ब्रिगेड को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था. नोआ मार्सियानो के हत्यारे का भी अंत बुधवार को ही इजरायल ने एक और बड़ी जानकारी दी. उन्होंने मुहम्मद इसाम हसन अल-हबील को भी मार गिराया है. इजरायल का कहना है कि इसी शख्स ने इजरायली सैनिक नोआ मार्सियानो की हत्या की थी, जिसे 7 अक्टूबर 2023 को बंधक बनाया गया था. सेना का कहना है कि इससे नोआ के परिवार को इंसाफ मिला है. हमलों में 23 लोगों की जान गई एक तरफ इजरायल इसे आतंकियों के खिलाफ एक्शन बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार इन हमलों में 23 फिलिस्तीनियों की मौत हो गई है. इनमें 7 बच्चे भी शामिल हैं. दक्षिण गाजा के खान यूनिस में एक मेडिकल वर्कर भी मारा गया, जो घायलों की मदद करने पहुंचा था. वहीं उत्तरी गाजा में एक 5 महीने के बच्चे की मौत की खबर भी सामने आई है. क्या सीजफायर का उल्लंघन हो रहा है? इजरायल का कहना है कि उन्होंने ये हमले इसलिए किए क्योंकि चरमपंथियों ने इजरायली सैनिकों पर गोलीबारी की थी, जिसमें एक सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गया था. इसे सीजफायर का उल्लंघन बताते हुए इजरायल ने जवाबी कार्रवाई की. दूसरी ओर, हमास ने कहा कि इजरायल की ये हरकतें शांति की कोशिशों को खत्म कर रही हैं. हमास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजरायल पर दबाव बनाने की मांग की है. राफा बॉर्डर को लेकर सस्पेंस सीजफायर समझौते के तहत गाजा और मिस्र के बीच ‘राफा बॉर्डर’ को खोला गया था ताकि बीमार मरीजों को इलाज के लिए बाहर भेजा जा सके. हालांकि, इजरायल ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए मरीजों के जाने पर अस्थायी रोक लगा दी थी. मिस्र के सूत्रों का कहना है कि अब मामला सुलझ गया है और काम फिर से शुरू हो गया है. अब तक का नुकसान  सीजफायर के बाद: इजरायली हमलों में अब तक लगभग 560 लोगों की मौत हुई है (गाजा अधिकारियों के अनुसार), जबकि 4 इजरायली सैनिक मारे गए हैं. युद्ध की शुरुआत से: अक्टूबर 2023 से अब तक 71,000 से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं. इजरायल में नुकसान: 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले में करीब 1,200 इजरायली मारे गए थे. जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीजफायर के दूसरे फेज का एलान किया था, जिसमें गाजा के पुनर्निर्माण पर बात होनी थी. लेकिन इजरायली सेना की वापसी और हमास के हथियारों को छोड़ने जैसे बड़े मुद्दों पर अब भी पेंच फंसा हुआ है.

इजरायल की शक्तिशाली स्ट्राइक में हिज्बुल्लाह का प्रमुख सदस्य अली दाऊद अमिच ढेर

तेल अवीव इजरायली सेना (IDF) ने दावा किया है कि उसने रविवार, 1 फरवरी को हिज्बुल्लाह के आतंकवादी अली दाऊद अमिच पर हमला कर उसे मार गिराया है। इजरायल के लिए अली दाऊद अमिच को रास्ते से हटाना एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। बताया गया है कि दाऊद हिज्बुल्लाह के इंजीनियरिंग विभाग में एक शाखा के प्रमुख के तौर पर काम कर रहा था। इजरायली सेना के मुताबिक, यह आतंकी दक्षिणी लेबनान के अल-द्विर क्षेत्र में हिज्बुल्लाह के लिए सैन्य बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहा था और इजरायली बलों के खिलाफ आतंकी साजिशों को बढ़ावा दे रहा था। सोशल मीडिया पर IDF का बयान इजरायली सुरक्षा बलों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा, “एलिमिनेट कर दिया गया: अली दाऊद अमिच, जो हिज्बुल्लाह के इंजीनियरिंग विभाग में ब्रांच हेड के रूप में काम करता था। अली दक्षिणी लेबनान के अल-द्विर इलाके में हिज्बुल्लाह के आतंकी बुनियादी ढांचे को फिर से स्थापित करने और IDF सैनिकों के खिलाफ आतंकी हमलों को आगे बढ़ाने के प्रयासों में शामिल था। यह इजरायल और लेबनान के बीच हुई अंडरस्टैंडिंग का उल्लंघन है।” सीजफायर समझौते का जिक्र गौरतलब है कि पिछले साल 2025 में अमेरिका की मध्यस्थता में इजरायल और लेबनान के बीच सीजफायर समझौता हुआ था। इसके बाद से इजरायल को उम्मीद है कि लेबनानी सेना हिज्बुल्लाह को निरस्त्र करेगी। दरअसल, दोनों देशों के बीच हुए सीजफायर समझौते में यह शर्त शामिल थी कि हिज्बुल्लाह को निरस्त्र किया जाएगा। लेबनानी सेना ने सभी नॉन-स्टेट समूहों को हथियारों से मुक्त करने के अपने कई चरणों वाले प्लान के पहले हिस्से को पूरा करने के लिए 2025 के अंत तक की डेडलाइन खुद तय की थी। संघर्ष विराम के बावजूद जारी हमले 27 नवंबर 2024 को संघर्ष विराम लागू होने के बावजूद, इजरायली सेना हिज्बुल्लाह से खतरे का हवाला देते हुए लेबनान में हमले जारी रखे हुए है। इसके साथ ही इजरायल ने लेबनान सीमा पर पांच प्रमुख स्थानों पर अपनी स्थिति भी बनाए रखी है।