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ISRO Headquarters Bomb Threat: बेंगलुरु मुख्यालय खाली, धमकी के बाद सुरक्षा व्यवस्था कड़ी

बेंगलुरु कर्नाटक की राजधानीबेंगलुरु में स्थित इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) के हेडक्वार्टर को बम से उड़ाने की धमकी मिली है। सूचना मिलने के बाद अलर्ट जारी किया गया। मौके पर पुलिस और बम स्क्वाड हेडक्वार्टर में जांच-पड़ताल की। पुलिस के मुताबिक, ISRO के चेयरमैन डॉ. वी. नारायणन के ऑफिस को धमकी भरा ईमेल आया था। इसके बाद इसरो के कैंपस को खाली कराया गया। कई टीमें संदिग्ध वस्तुओं की जांच की। अधिकारियों के अनुसार इसरो को धमकी भरा मेल गाजियाबाद से भेजा गया था। वहां पर उस व्यक्ति का पता लगाकर उसे पकड़ लिया गया है। कैंपस खाली करवाकर सर्च ऑपरेशन पुलिस के मुताबिक एहतियात के तौर पर सभी कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया गया और इमारत की बारीकी से तलाशी ली जा रही है। एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली और बाद में धमकी को झूठा करार दिया गया है। पुलिस ने ईमेल भेजने वाले से पूछताछ कर रही है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का मुख्यालय बेंगलुरु, कर्नाटक में न्यू बीईएल रोड पर स्थित 'अंतरिक्ष भवन' में स्थित है। 29 जून को बम धमकी के फर्जी ईमेल भेजने वाला पकड़ा गया इससे पहले दिल्ली पुलिस ने कई संगठनों और एक एयर इंडिया की उड़ान को बम की धमकी वाले फर्जी ईमेल भेजने के आरोप में एक व्यक्ति को पकड़ा है। अधिकारियों ने गुरुवार को बताया कि यह व्यक्ति गाजियाबाद का निवासी है। 36 वर्षीय आरोपी 2008 से मानसिक बीमारी का इलाज करा रहा है। 29 जून को भेजे गए इन ईमेल में राष्ट्रीय जांच एजेंसी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय  सहित कई उच्च सुरक्षा प्रतिष्ठानों में बम होने का दावा किया गया था। नई दिल्ली से न्यूयॉर्क जाने वाली एयर इंडिया की उड़ान के लिए भी एक धमकी भरा ईमेल भेजा गया। इससे तत्काल सुरक्षा जांच शुरू हुई और कई एजेंसियों को सतर्क किया गया। पुलिस ने बताया कि सभी संबंधित संगठनों और सुरक्षा एजेंसियों को सूचित किया गया था। मानक सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया गया और धमकियां फर्जी पाई गईं। घटना के बाद पुलिस ने जांच शुरू की, जिसमें ईमेल के डिजिटल ट्रेल को ट्रैक किया गया। तकनीकी जांच के दौरान, पुलिस ने दो मेल खातों का विश्लेषण किया। इन खातों का उपयोग ईमेल भेजने के लिए किया गया था। ईमेल ट्रेल की विस्तृत जांच से जांचकर्ताओं को खातों से जुड़े एक मोबाइल नंबर तक पहुंचने में मदद मिली। तकनीकी निगरानी का उपयोग करते हुए, पुलिस दल ने 30 जून को संदिग्ध को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के संयोग नगर में खोज निकाला। पुलिस मौके पर पहुंची और उसके निवास पर संदिग्ध निशांत त्यागी की जांच की। पुलिस के अनुसार, त्यागी ने ओपन स्कूलिंग के माध्यम से अपनी शिक्षा पूरी की थी। उसने 2010 में स्नातक डिग्री कार्यक्रम में दाखिला लिया था लेकिन उसे पूरा नहीं किया। मानसिक स्वास्थ्य और आगे की जांच प्रारंभिक जांच में सामने आया कि वह कथित तौर पर 2008 से मानसिक बीमारी से पीड़ित है। वह वर्षों से विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में इलाज करा रहा है। उसके परिवार के सदस्यों ने भी पुलिस को उसके लंबे चिकित्सा इतिहास के बारे में बताया। पुलिस ने बताया कि जांच के दौरान कोई विस्फोटक या संदिग्ध सामग्री बरामद नहीं हुई। ईमेल भेजने के पीछे के मकसद और परिस्थितियों का पता लगाने के लिए जांच जारी है, जिसके परिणाम के आधार पर आगे कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसरो का गतिविधियों का होता है प्रबंधन इसरो का मुख्यालय होने के कारण इस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था काफी चाक चौबंद रहती है। बेंगलुर से इसरो की सभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष गतिविधियों का प्रबंधन किया जाता है। इसकी स्थापना 15 अगस्त 1969 को हुई थी। मूल इकाई (INCOSPAR) के रूप में यह 1962 में अस्तित्व में आया था और 1972 में इसे अंतरिक्ष विभाग (DOS) के अंतर्गत लाया गया। अंतरिक्ष भवन जो कि इसरो का प्रशासनिक केंद्र है। यह लगभग 4.3 एकड़ (17,400 वर्ग मीटर) के परिसर में फैला हुआ है। इसरो के मुख्यालय को उड़ाने की धमकी देने वाले शख्स की गिरफ्तारी के बाद बेंगलुरु पुलिस उत्तर प्रदेश पुलिस के संपर्क में है। अरेस्ट किए गए शख्स से पूछताछ करने के साथ उसका बैकग्राउंड खंगाला जा रहा है। 

चंद्रयान-2 ने रीवा के सौरभ को ISRO में वैज्ञानिक बनने की प्रेरणा दी

रीवा  कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो छोटे से गांव की मिट्टी भी आसमान छूने का हौसला दे देती है। ऐसा ही कर दिखाया है रीवा जिले की जवा तहसील के गांव पुरौना के होनहार युवा सौरभ द्विवेदी ने, जिनका चयन देश की प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्था इसरो (ISRO) में वैज्ञानिक पद पर हुआ है। साधारण परिवार से आने वाले सौरभ ने यह साबित कर दिया कि सफलता संसाधनों की मोहताज नहीं, बल्कि मेहनत, लगन और सपनों की उड़ान पर टिकी होती है। उनके पिता शैलेन्द्र द्विवेदी एक शिक्षक हैं, जिन्होंने बेटे को शुरू से ही शिक्षा का महत्व समझाया, वहीं मां गीता द्विवेदी ने हर मुश्किल घड़ी में उनका हौसला बढ़ाया।  आईआईटी दिल्ली से एमटेक किया सौरभ की शुरुआती पढ़ाई शासकीय मार्तण्ड उत्कृष्ट क्रमांक-एक विद्यालय से हुई। इसके बाद उन्होंने भोपाल से बीटेक और देश के शीर्ष संस्थान आईआईटी दिल्ली से एमटेक की पढ़ाई पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। चंद्रयान- दो  के प्रक्षेपण से मिली थी प्रेरणा सौरभ बताते हैं कि उनका सपना तब आकार लेने लगा, जब उन्होंने चंद्रयान-दो  के प्रक्षेपण को देखा। उसी पल उन्होंने ठान लिया था कि एक दिन वे भी देश के अंतरिक्ष मिशनों का हिस्सा बनेंगे और आज उनकी मेहनत रंग लाई है। पुरौना गांव में जश्न का माहौल यह सफलता सिर्फ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा है। सौरभ अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र में वैज्ञानिक के रूप में देश की अंतरिक्ष उपलब्धियों में योगदान देंगे और रीवा जिले का नाम राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित करेंगे। गांव पुरौना से लेकर पूरे रीवा जिले तक खुशी और गर्व का माहौल है। हर कोई सौरभ की इस उपलब्धि को सलाम कर रहा है। 

विज्ञान मंथन यात्रा: सतना के 17 छात्रों को ISRO और श्रीहरिकोटा जाने का अवसर, चयन व्यंकट-वन स्कूल से

सतना  मध्यप्रदेश के सतना के मेधावी छात्रों के लिए एक बहुत बड़ी खुशखबरी सामने आई है। मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (MP CST) की विज्ञान मंथन यात्रा के तहत व्यंकट-वन स्कूल के 17 स्टूडेंट्स का सिलेक्शन हुआ है। ये होनहार बच्चे अब बेंगलुरु स्थित ISRO हेडक्वार्टर और श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर की सैर करेंगे। 95% से ज्यादा नंबर लाने वाले इन छात्रों को रॉकेट साइंस और अंतरिक्ष की बारीकियों को लाइव समझने का शानदार मौका मिलेगा। छात्र 20 से 27 अप्रैल तक देश की प्रमुख अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के बेंगलुरु (कर्नाटक) मुख्यालय और श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) की सैर करेंगे। दल के लिए रसायन विज्ञान के शिक्षक डॉ. रामानुज पाठक और भौतिक विज्ञान की शिक्षिका नविता जायसवाल को ग्रुप हेड नियुक्त किया गया है, जिनके नेतृत्व में विद्यार्थी प्रयोग, अवलोकन और विश्लेषण की वैज्ञानिक पद्धति को प्रत्यक्ष रूप से समझेंगे। 95% से अधिक अंक लाने वाले विद्यार्थियों का होता है चयन एमपी सीएसटी की विज्ञान मंथन यात्रा के लिए प्रदेश के एमपी बोर्ड, सीबीएसई और आईसीएसई के विज्ञान संकाय के 10वीं, 11वीं और 12वीं के मेधावी छात्र-छात्राओं का चयन होता है। इसमें वे विद्यार्थी पात्र होते हैं जिन्होंने अपनी पिछली कक्षा में 95 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हों। विज्ञान मंथन के लिए चयनित विद्यार्थियों के लिए बाद में एक परीक्षा भी आयोजित की जाती है। इस परीक्षा में सफल होने वाले प्रतिभागियों को 5 साल तक प्रतिमाह 1200 से 1500 रुपए की छात्रवृत्ति भी प्रदान की जाती है। व्यंकट-वन स्कूल के इन विद्यार्थियों को मिला अवसर एक्सीलेंस स्कूल व्यंकट-1 से चयनित छात्र-छात्राओं में 12वीं कक्षा से तोषी गौतम, पल्लवी राठौड़, ऋषिका त्रिपाठी और रुद्राक्ष त्रिपाठी शामिल हैं। 11वीं कक्षा से आदित्य पांडेय, अखंड प्रताप यादव, कंचन चौधरी, रितिक तिवारी और नेहा पटेल का चयन हुआ है। वहीं, 10वीं कक्षा से कृष्णा गुप्ता, मोहिना गुप्ता, प्राची कुशवाहा, राधे गुप्ता और अंशराज सिंह तोमर को यह अवसर मिला है। प्राचार्य बोले- नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना है उद्देश्य एक्सीलेंस स्कूल के प्राचार्य केएस बघेल ने बताया कि, "मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद द्वारा आयोजित विज्ञान मंथन यात्रा का उद्देश्य राज्य में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार और नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देना है। स्कूली बच्चों में वैज्ञानिक प्रतिभा की पहचान, उनमें वैज्ञानिक समझ को सुदृढ़ करना और उन्हें वैज्ञानिक विकास की सक्रिय भागादारी के प्रति प्रेरित करना है।" यह 11वीं पंचवर्षीय योजना के तहत राज्य सरकार की अति महत्वाकांक्षी योजना है। ISRO-श्रीहरिकोटा टूर का पूरा शेड्यूल ये शानदार साइंटिफिक जर्नी 20 अप्रैल से शुरू होकर 27 अप्रैल तक चलेगी। इस दौरान बच्चे बेंगलुरु स्थित इसरो (ISRO) के मुख्यालय का दौरा करेंगे। साथ ही वे श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC) भी जाएंगे। वहां वे देखेंगे कि रॉकेट और सैटेलाइट कैसे काम करते हैं। इस टीम की लीडरशिप केमिस्ट्री के टीचर डॉ. रामानुज पाठक करेंगे। उनके साथ फिजिक्स की टीचर नविता जायसवाल भी मौजूद रहेंगी। व्यंकट-वन स्कूल के इन बच्चों ने किया नाम रोशन     व्यंकट-वन स्कूल के कई होनहार बच्चों ने इस लिस्ट में जगह बनाई है।      12वीं कक्षा से तोषी, पल्लवी, ऋषिका और रुद्राक्ष का चयन हुआ है।      11वीं से आदित्य, अखंड, कंचन, रितिक और नेहा को अवसर मिला है।      वहीं 10वीं कक्षा से कृष्णा, मोहिना, प्राची, राधे और अंशराज शामिल हैं।      ये सभी बच्चे अंतरिक्ष विज्ञान को करीब से देखने के लिए उत्साहित हैं। किसे मिलता है विज्ञान मंथन यात्रा का मौका इस यात्रा के लिए चयन की प्रक्रिया बहुत ही कड़ी होती है। केवल वही छात्र इसके लिए एलिजिबल होते हैं जिनके नंबर 95% से अधिक हों। इसमें एमपी बोर्ड, सीबीएसई और आईसीएसई के विज्ञान छात्र शामिल होते हैं। 10वीं, 11वीं और 12वीं कक्षा के मेधावी छात्रों को प्रॉयोरिटी दी जाती है। ये बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने की एक बहुत अच्छी पहल है। साइंटिफिक कॉन्शसनेस को बढ़ावा देना है लक्ष्य विज्ञान मंथन यात्रा (Vigyan Manthan Yatra) सिर्फ एक टूर या सैर-सपाटा नहीं है। चयनित विद्यार्थियों के लिए बाद में एक विशेष परीक्षा आयोजित की जाएगी। जो छात्र इस परीक्षा को पास करेंगे, उन्हें स्कॉलरशिप दी जाएगी। उन्हें अगले 5 साल तक पर मंथ 12 सौ से 15 सौ रुपए मिलेंगे।  इससे उनकी आगे की पढ़ाई में काफी मदद मिल सकेगी। स्कूल के प्राचार्य केएस बघेल ने इस अचीवमेंट पर खुशी जताई है। उन्होंने बताया कि इस टूर का मेन ऑब्जेक्टिव साइंटिफिक कांशसनेस फैलाना है। ये योजना 11वीं फाइव ईयर प्लान के तहत शुरू की गई थी। ISRO क्या है? ISRO का फुल फॉर्म Indian Space Research Organisation है। सरल शब्दों में कहें तो यह भारत की एक सरकारी संस्था  है जो अंतरिक्ष यान, सैटेलाइट और रॉकेट बनाने का काम करती है। इसका हेडक्वार्टर बेंगलुरु में है। इसरो का काम है नई-नई टेक्नोलॉजी विकसित करना, जैसे कि चंद्रयान या मंगलयान। यह वो 'दिमाग' है जो पूरी प्लानिंग करता है कि भारत स्पेस की दुनिया में कैसे आगे बढ़ेगा। श्रीहरिकोटा क्या है? श्रीहरिकोटा असल में एक जगह का नाम है, जो आंध्र प्रदेश के तट पर स्थित एक छोटा सा आइलैंड है। यहां पर इसरो का Sathish Dhawan Space Centre (SDSC) बना हुआ है। आप इसे भारत का 'रॉकेट पोर्ट' कह सकते हैं। इसरो जो भी रॉकेट या सैटेलाइट बनाता है, उसे लॉन्च करने के लिए श्रीहरिकोटा लाया जाता है। यहां से रॉकेट अंतरिक्ष में उड़ान भरते हैं। समुद्र के किनारे होने के कारण यह जगह रॉकेट लॉन्चिंग के लिए सबसे सुरक्षित और सही मानी जाती है।

अंतरिक्ष में भारत की बड़ी छलांग! ISRO ने किया ड्रीम प्रोजेक्ट का आगाज़

बेंगलुरु  भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाते हुए अपने स्‍वदेशी स्थायी स्पेस स्टेशन के निर्माण की दिशा में काम शुरू कर दिया है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो-ISRO) ने भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station – BAS) की आधारशिला रखने की प्रक्रिया तेज कर दी है. योजना के अनुसार, इसका पहला मॉड्यूल वर्ष 2028 तक अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जबकि 2035 तक इसे पूरी तरह से वर्किंग स्‍पेस स्‍टेशन के रूप में विकसित किया जाएगा. इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) ने हाल ही में भारतीय कंपनियों से ‘एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट’ (EoI) जारी कर BAS-01 नामक पहले मॉड्यूल के निर्माण में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया है. यह पहली बार है जब भारत ने अपने स्थायी मानवयुक्त अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण की दिशा में औपचारिक और ठोस कदम उठाया है. यह स्टेशन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की तर्ज पर विकसित किया जाएगा, लेकिन पूरी तरह स्वदेशी तकनीक और संसाधनों के बल पर. ISRO के अधिकारियों के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के बाद अगला कदम है. गगनयान के जरिए भारत अपने अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की कक्षा तक भेजने की तैयारी कर रहा है, जबकि BAS के माध्यम से लक्ष्य अंतरिक्ष में लंबे समय तक इंसानी उपस्थिति स्थापित करना है. सरल शब्दों में कहें तो भारत अब केवल अंतरिक्ष में जाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वहां रहकर वैज्ञानिक शोध और तकनीकी प्रयोग भी करेगा. क्‍या है BAS-01 मॉड्यूल? BAS-01 मॉड्यूल का स्‍ट्रक्‍चर अल्‍ट्रा मॉडर्न होगा. प्रत्येक मॉड्यूल का व्यास लगभग 3.8 मीटर और ऊंचाई करीब 8 मीटर होगी. इन्हें हाई-पावर्ड एल्यूमिनियम एलॉय (AA-2219) से तैयार किया जाएगा, जो ह्यूमन मिशनों के लिए मान्यता प्राप्त सामग्री है. ISRO ने स्पष्ट किया है कि इन मॉड्यूल्स को वही सुरक्षा और गुणवत्ता मानक पूरे करने होंगे, जो गगनयान मिशन के लिए अनिवार्य हैं, क्योंकि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री इन्हीं मॉड्यूल्स के भीतर रहकर काम करेंगे. क्‍या है ISRO की योजना? ISRO ने दो पूर्ण सेट मॉड्यूल धरती पर तैयार करने की योजना बनाई है, ताकि परीक्षण और गुणवत्ता मूल्यांकन के बाद सर्वश्रेष्ठ हार्डवेयर को अंतरिक्ष में भेजा जा सके. यह कार्य सामान्य निर्माण प्रक्रिया से कहीं अधिक जटिल है. कंपनियों को विशेष वेल्डिंग तकनीकों का विकास करना होगा और हाई स्‍टैंडर्ड का पालन करना होगा. आधे मिलीमीटर की भी त्रुटि स्वीकार्य नहीं होगी. इसके अलावा प्रेशर टेस्ट, लीक टेस्ट और नॉन-डिस्ट्रक्टिव टेस्टिंग जैसी कठोर प्रक्रियाओं से गुजरना अनिवार्य होगा. पूरी तरह से स्‍वदेशी इस परियोजना की एक खास बात यह है कि यह पूरी तरह भारतीय प्रयास होगा. सरकार की ओर से उत्पादन सुविधाएं स्थापित करने के लिए कोई वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी और न ही किसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को आउटसोर्स करने की अनुमति होगी. इसरो कंपनियों को कच्चा माल, तकनीकी ड्रॉइंग और थ्री-डी मॉडल उपलब्ध कराएगा, लेकिन हाई क्‍वालिटी वाला हार्डवेयर समय पर तैयार करने की पूरी जिम्मेदारी सेलेक्‍टेड कंपनियों की होगी. स्‍पेस स्‍टेशन क्‍यों जरूरी? ISRO का मानना है कि भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन देश के वैज्ञानिक और तकनीकी भविष्य में अहम भूमिका निभाएगा. यहां माइक्रोग्रैविटी में दीर्घकालिक प्रयोग किए जा सकेंगे (मानव शरीर पर अंतरिक्ष वातावरण के प्रभावों का अध्ययन होगा और नई तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा) जो भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए आवश्यक होंगी. यदि तय समयसीमा के अनुसार काम आगे बढ़ता है, तो 2028 तक भारत का पहला स्पेस स्टेशन मॉड्यूल पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हो सकता है. यह उपलब्धि भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी, जिन्होंने न केवल अंतरिक्ष में मानव भेजा है, बल्कि वहां स्थायी मानव उपस्थिति स्थापित करने की क्षमता भी हासिल की है. यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में एक नया अध्याय होगा और आने वाले दशकों में देश की वैज्ञानिक क्षमताओं को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सहायक बनेगा.

इसरो का मिशन असफल, ‘अन्वेषा’ ऑर्बिट से पहले ही अंतरिक्ष में खो गया

बेंगलुरु  इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO), 2026 के पहले ऑर्बिटल मिशन की लॉन्चिंग सफलतापूर्वक हो गई लेकिन सैटेलाइट तैनात नहीं हो सका. PSLV-C62 रॉकेट श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था. यह मिशन सतीश धवन स्पेस सेंटर के फर्स्ट लॉन्च पैड से उड़ान भरा था. इस मिशन का मुख्य हिस्सा EOS-N1 अन्वेषा था, जो डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन द्वारा विकसित एक हाइपरस्पेक्ट्रल सैटेलाइट है. अन्वेषा सैटेलाइट एडवांस्ड अर्थ ऑब्जर्वेशन एप्लीकेशन के लिए डिज़ाइन किया गया था.  भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के PSLV-C62 मिशन को झटका लगा है। रॉकेट पीएसएलवी-सी62 सोमवार को अपने सफल प्रक्षेपण के बाद उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करने में विफल रहा। ISRO की ओर से एक्स पर पोस्ट करके कहा गया, 'वाहन ने तीसरे चरण के दौरान अपनी ओरिएंटेशन (दिशा-स्थिति) पर नियंत्रण खो दिया है। यह लगातार दूसरा PSLV मिशन है, जिसमें ISRO को PSLV के तीसरे चरण में समस्या का सामना करना पड़ा है। अधिक जानकारी का इंतजार है, लेकिन फिलहाल स्थिति अच्छी नहीं लग रही है।' इसरो के अध्यक्ष डॉ. वी नारायणन ने मिशन कंट्रोल सेंटर से वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए इस विफलता की पुष्टि की। उन्होंने कहा, 'पीएसएलवी -सी 62 मिशन के पहले तीन चरणों का प्रदर्शन पूरी तरह सामान्य था। इसके बाद एक विसंगति पाई गई और उड़ान अपने तय रास्ते से भटक गई, जिसके कारण मिशन सफल नहीं हो सका।' इसरो प्रमुख ने आगे बताया कि वैज्ञानिक डेटा का विश्लेषण कर रहे हैं और जल्द ही विफलता के सटीक कारणों के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाएगी। मिशन फेल होने के बाद क्या बोले इसरो चीफ?   अन्वेषा सैटेलाइट की लॉन्चिंग फेल हो गई, जिसके बाद इसरो चीफ ने बयान जारी किया है. इसरो चीफ ने बताया, "तीसरे स्टेज में दिक्कत आई और दिशा में परिवर्तन हो गया. डेटा एनालिसिस किया जा रहा है, जो भी अपडेट आएगा बताया जाएगा." इसरो ने सोशल मीडिया पोस्ट में बताया, "PSLV-C62 मिशन में PS3 स्टेज के आखिर में एक गड़बड़ी हुई. इसकी विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है."  ISRO की लॉन्चिंग सफल, सैटेलाइट सेपरेशन फेल   इसरो की PSLV-C62 मिशन फेल हो चुका है. रॉकेट सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ. लेकिन तीसरे स्टेज के बाद आंकड़ा देरी से मिलने लगा. चौथा स्टेज शुरू तो हुआ लेकिन उसके बाद कोई अपडेट नहीं मिला. मिशन कंट्रोल सेंटर में सन्नाटा पसर गया. पता नहीं चल रहा है कि सैटेलाइट सेपरेट हुआ या नहीं. अन्वेषा के साथ थे 15 और छोटे उपग्रह PSLV-C62 रॉकेट अपने साथ रणनीतिक उद्देश्यों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किया गया DRDO का अन्वेषा (ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट) और 15 अन्य अंतरराष्ट्रीय उपग्रह लेकर गया था। आज के लॉन्च में कुल 15-18 अन्य छोटे उपग्रह भी शामिल थे, जिनमें से कई भारतीय स्टार्टअप्स और विश्वविद्यालयों के थे। हैदराबाद की कंपनी ध्रुवा स्पेस ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई और कुल 7 उपग्रहों में योगदान दिया। कंपनी ने 4 उपग्रह खुद बनाए, जिनमें कम डेटा रेट संचार वाले सैटेलाइट शामिल हैं। यह मिशन न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड की ओर से संचालित 9वां व्यावसायिक अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशन था। पीएसएलवी को दुनिया के सबसे भरोसेमंद रॉकेट्स में से एक माना जाता है, जिसने पहले चंद्रयान-1, मंगलयान और आदित्य-एल1 जैसी बड़ी मिशनों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। हालांकि, 12 जनवरी को PSLV-C62 के सफल लॉन्च के बाद उसे ऑर्बिट में लैंड कराने में समस्या आ गई।

ISRO का PSLV रॉकेट: 63 में से 60 सफल मिशन, अब नई उड़ान की ओर बढ़ेगा

 नई दिल्ली PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का वर्कहॉर्स (मुख्य काम करने वाला रॉकेट) इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह बहुत विश्वसनीय और बार-बार इस्तेमाल होने वाला रॉकेट है. यह 1993 से लगातार काम कर रहा है. विभिन्न प्रकार के सैटेलाइट्स (छोटे से बड़े, भारतीय और विदेशी) को सटीक ऑर्बिट में पहुंचाने में माहिर है. अगली लॉन्चिंग कौन सी और कब? अगली PSLV लॉन्च PSLV-C62 है, जो 12 जनवरी 2026 को सुबह 10:17 बजे IST श्रीहरिकोटा के फर्स्ट लॉन्च पैड से होगी. यह इसरो की 2026 की पहली ऑर्बिटल लॉन्च होगी. मुख्य पेलोड EOS-N1 (Anvesha) नामक हाइपरस्पेक्ट्रल अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट (DRDO द्वारा विकसित) है. साथ में 18 अन्य को-पैसेंजर सैटेलाइट्स (भारतीय और अंतरराष्ट्रीय) जाएंगे. यह PSLV की 64वीं उड़ान होगी. यह लॉन्च PSLV-C61 की 2025 वाली असफलता के बाद वापसी का प्रतीक है. विश्वसनीयताः 94% से ज्यादा सफलता दर (कई दशकों में सिर्फ 2-3 असफलताएं). लचीलापनः अलग-अलग वेरिएंट (XL, QL, DL, CA) से 100 ग्राम से 1700 किग्रा तक पेलोड ले जा सकता है. मल्टी-सैटेलाइट लॉन्चः एक ही उड़ान में 100+ सैटेलाइट्स लॉन्च कर चुका है (2017 में 104 सैटेलाइट्स का विश्व रिकॉर्ड). महत्वपूर्ण मिशनः चंद्रयान-1, मंगलयान (Mangalyaan), आदित्य-L1, Astrosat जैसे बड़े मिशन इसी ने किए. यह ISRO की कॉमर्शियल लॉन्च सर्विस (NSIL के जरिए) का सबसे बड़ा आधार है, जिससे विदेशी सैटेलाइट्स लॉन्च करके भारत को कमाई और विश्वसनीयता मिलती है. PSLV की लॉन्चिंग कब शुरू हुई? PSLV की पहली लॉन्च 20 सितंबर 1993 को हुई थी (PSLV-D1). यह विकास चरण था. असफल रहा था. पहली सफल लॉन्च 15 अक्टूबर 1994 में हुई. अब तक कितनी सफल और असफल? जनवरी 2026 तक PSLV की कुल उड़ानें 63 (PSLV-C61 तक) हो चुकी हैं.       सफलः  60 (लगभग 95% सफलता दर).     असफलः 3 (पूर्ण या आंशिक). असफलताओं के कारण     1993 (PSLV-D1) — पहली विकास उड़ान, सॉफ्टवेयर और इंजन कंट्रोल में समस्या से रॉकेट नियंत्रण खो बैठा.     2017 (PSLV-C39/IRNSS-1H) — हीट शील्ड (फेयरिंग) अलग नहीं हुआ, सैटेलाइट ऑर्बिट में नहीं पहुंचा.     2025 (PSLV-C61/EOS-09) — तीसरे स्टेज में चैंबर प्रेशर गिरने से थ्रस्ट कम हुआ, सैटेलाइट ऑर्बिट में नहीं पहुंचा. संभावित कारण: नोजल या सॉलिड मोटर में तकनीकी खराबी (पूर्ण रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई). PSLV का भविष्य क्या है? PSLV का भविष्य बहुत उज्ज्वल है. यह अभी भी ISRO का सबसे भरोसेमंद रॉकेट है और आने वाले सालों में भी मुख्य रहेगा.       प्राइवेट सेक्टर का रोलः 2022 से PSLV का उत्पादन और ऑपरेशन प्राइवेट कंसोर्टियम (L&T, HAL आदि) को सौंपा जा रहा है. 2026 में पहली प्राइवेट PSLV लॉन्च संभावित है.     नई तकनीकः 3D प्रिंटेड पार्ट्स, बेहतर इंजन (जैसे PS4 में सुधार) से लागत कम और विश्वसनीयता बढ़ रही है.     भविष्य के मिशनः छोटे सैटेलाइट्स, कमर्शियल राइडशेयर, रिमोट सेंसिंग, नेविगेशन और अंतरिक्ष विज्ञान मिशन इसी पर निर्भर रहेंगे.     प्रतिस्पर्धाः SSLV और LVM3 जैसे नए रॉकेट्स आएंगे, लेकिन PSLV की सटीकता और कम लागत के कारण यह वर्कहॉर्स बना रहेगा. PSLV ने भारत को अंतरिक्ष में विश्वसनीयता दी है. आने वाले दशकों में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. PSLV-C62 की सफलता इसकी मजबूती को फिर साबित करेगी. 

ISRO की 2040 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की योजना, पूर्व प्रमुख ने किया खुलासा

अहमदाबाद भारत 2040 तक चंद्रमा पर अपने अंतरिक्ष यात्री भेजने की योजना बना रहा है, यह जानकारी पूर्व भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) प्रमुख ए. एस. किरण कुमार ने बुधवार को दी।कुमार, जो वर्तमान में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (PRL) के प्रबंधन परिषद के अध्यक्ष हैं, यह बयान 5वें भारतीय खगोलशास्त्र समाज (ASI) सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान दे रहे थे। कुमार ने कहा, "अब से 2040 तक कई अंतरिक्ष मिशन होंगे। 2040 तक हमारा लक्ष्य भारतीयों को चंद्रमा पर भेजना और सुरक्षित रूप से वापस लाना है। इसके अलावा, भारत 2040 तक एक अंतरिक्ष स्टेशन बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है।" इस कार्यक्रम के दौरान, कुमार ने मीडिया से बात करते हुए भारत के अंतरिक्ष रोडमैप के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा, "निकट भविष्य में चंद्रयान का एक अनुसरण मिशन होगा, और जापान के साथ मिलकर लैंडर और रोवर पर काम चल रहा है। हम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में कुछ विशिष्ट जानकारी प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यह केवल शुरुआत है, इसके बाद कई गतिविधियाँ होंगी। भारत अंतरिक्ष अवलोकन और ब्रह्मांड को समझने के लिए प्रतिबद्ध है।" उन्होंने आगे कहा कि यह मिशन भारतीय शैक्षिक संस्थानों, इंजीनियरिंग संस्थानों और निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष अन्वेषण में योगदान देने के कई अवसर खोलेगा।कुमार ने अपने उद्घाटन भाषण में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में कहा, "भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसने मुख्य रूप से समाजिक लाभ के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का निर्माण किया और न कि सैन्य उपयोग के लिए।" उन्होंने डॉ. विक्रम साराभाई के योगदान की भी सराहना की, जिनके प्रयासों से देश के स्वतंत्रता के 10 वर्षों बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में महत्वपूर्ण विकास हुआ था। साराभाई ने यह समझने की कोशिश की कि कैसे अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से प्रसारण संचार और मौसम निगरानी में सुधार किया जा सकता है। यह तीन दिवसीय सत्र खगोलशास्त्र, अंतरिक्ष विज्ञान, ग्रह विज्ञान, वायुमंडलीय विज्ञान और उभरते हुए क्षेत्रों, जैसे क्वांटम विज्ञान और प्रौद्योगिकियों में ऑप्टिक्स और उन्नत उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका पर केंद्रित है। उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय रेडियो एस्टोफिजिक्स केंद्र के निदेशक प्रोफेसर यशवंत गुप्ता, भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान, बैंगलोर की निदेशक प्रोफेसर अन्नपूर्णी सुब्रमणियम और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के निदेशक प्रोफेसर अनिल भारद्वाज भी उपस्थित थे।  

साल 2026 में भारत का गगनयान मिशन, ISRO की मानव अंतरिक्ष उड़ान से अंतरिक्ष में होगी धाक

नई दिल्ली यह नया साल 2026 अंतरिक्ष में मानव की उड़ान के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होने जा रहा है. इस वर्ष भारत और अमेरिका दो अलग-अलग लेकिन समान रूप से ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी में हैं. भारत का गगनयान कार्यक्रम जहां देश को स्वतंत्र मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता की श्रेणी में ले जाएगा, वहीं अमेरिका का आर्टेमिस-II मिशन मानव जाति को पांच दशक बाद एक बार फिर गहरे अंतरिक्ष यानी चंद्रमा से आगे की यात्रा पर ले जाने वाला है. इन दोनों मिशनों का संयुक्त प्रभाव यह संकेत देता है कि अब मानव अंतरिक्ष उड़ान केवल कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह एक बहुध्रुवीय (Multipolar) अंतरिक्ष युग की ओर बढ़ रही है. साल 2026 केवल 2 स्पेस मिशनों का ही साल नहीं होगा, बल्कि यह मानव जाति के अंतरिक्ष भविष्य की दिशा बदलने वाला साल साबित हो सकता है. भारत का गगनयान: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम के तहत पहला बिना मानव वाला ऑर्बिटल टेस्ट मिशन G1 वर्ष 2026 के मार्च महीने के आसपास करने का लक्ष्य तय किया है. यह मिशन मानव-रेटेड LVM3 (Gaganyaan-Mk3) रॉकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा. 2026 में पहला बड़ा ऑर्बिटल टेस्ट साबित होगा. इसमें व्योममित्रा नामक एक मानवरूपी (Humanoid) रोबोट को भेजा जाएगा, जिसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि वह अंतरिक्ष यात्रियों जैसी गतिविधियों और प्रतिक्रियाओं का अनुकरण कर सके. G1 मिशन के दौरान गगनयान को लगभग 300 से 400 किलोमीटर की निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में संचालित किया जाएगा. इसका मुख्य उद्देश्य मानव मिशन से पहले सभी महत्वपूर्ण प्रणालियों की कठोर परीक्षा करना है. गगनयान क्यों है भारत के लिए ऐतिहासिक? गगनयान भारत के लिए केवल एक अंतरिक्ष मिशन नहीं, बल्कि पूर्णतः स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रमाण है. इस मिशन के तहत कई अहम प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा, इसमें जीवन-रक्षा प्रणाली के साथ ही क्रू मॉड्यूल का सुरक्षित वायुमंडलीय पुनः प्रवेश, पैराशूट आधारित समुद्री रिकवरी, मिशन नियंत्रण और संचार व्यवस्था शामिल है. अंतरिक्ष की उड़ान में अहम पड़ाव   यदि G1 और इसके बाद के परीक्षण सफल रहते हैं, तो भारत उन गिने-चुने देशों की सूची में शामिल हो जाएगा जो स्वतंत्र रूप से अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने और सुरक्षित वापस लाने की क्षमता रखते हैं. इससे भविष्य में भारतीय स्पेस स्टेशन, निजी मानव अंतरिक्ष सेवाओं और व्यावसायिक मिशनों के रास्ते खुलेंगे, साथ ही विदेशी साझेदारों पर निर्भरता भी कम होगी. अमेरिका का आर्टेमिस-II: इंसानों की 50 साल बाद गहरे अंतरिक्ष में वापसी होगी. दूसरी ओर, अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने बहुप्रतीक्षित आर्टेमिस-II मिशन की तैयारी में है, जिसे अब 5 फरवरी 2026 से पहले नहीं लॉन्च किए जाने की योजना है. यह मिशन चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर लगभग 10 दिनों की यात्रा पर जाएगा, जिसमें वे चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे. यह 1972 में अपोलो-17 के बाद पहली बार होगा जब इंसान निम्न पृथ्वी कक्षा से बाहर जाएगा. आर्टेमिस-II का महत्व क्या है? आर्टेमिस-II, नासा के स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान के लिए एक निर्णायक परीक्षण उड़ान है. इस मिशन में कुछ अहम पहलुओं की जांच की जाएगी, जिसमें गहरे अंतरिक्ष में नेविगेशन और संचार, अंतरिक्ष रेडिएशन से सुरक्षा, दीर्घकालिक जीवन-रक्षा प्रणालियां और पृथ्वी से बहुत दूर मिशन संचालन शामिल होगा. यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा से कम से कम 5,000 नॉटिकल मील आगे तक जाएंगे, जो मानव इतिहास की अब तक की सबसे दूर की मानव उड़ान होगी. यह मिशन भविष्य में चंद्र सतह पर लैंडिंग, स्थायी चंद्र अड्डों और अंततः मंगल मिशन की नींव रखेगा. मानव अंतरिक्ष उड़ान का बहुध्रुवीय भविष्य गगनयान और आर्टेमिस-II मिलकर यह स्पष्ट करते हैं कि 2030 के दशक में मानव अंतरिक्ष उड़ान एक नए चरण में प्रवेश करने जा रही है, जहां भारत निम्न पृथ्वी कक्षा तक पहुंच को मजबूत कर रहा है. वहीं अमेरिका अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ गहरे अंतरिक्ष में वापसी कर रहा है. इन मिशनों से विकसित होने वाली तकनीकें- चालक दल की सुरक्षा, अंतरिक्ष यान प्रणालियां, मिशन प्रबंधन और दीर्घकालिक जीवन समर्थन- आने वाले वर्षों में व्यावसायिक स्पेसफ्लाइट, राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन और डीप-स्पेस अन्वेषण की दिशा और गति तय करेंगी.  

LVM3 रॉकेट से ISRO ने लॉन्च किया दुनिया का सबसे भारी सेटेलाइट, ब्लूबर्ड ब्लॉक-3

श्रीहरिकोटा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) बुधवार सुबह 8.55 बजे अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3 से अमेरिकी कंपनी AST स्पेसमोबाइल की ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 संचार सैटेलाइट को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया. यह इस रॉकेट की छठी ऑपरेशनल उड़ान (LVM3-M6) है. ये मिशन है न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और AST स्पेसमोबाइल के बीच हुए समझौते के तहत किया जा रहा है. इस मिशन से लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में दुनिया का सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट तैनात होगा, जो सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड इंटरनेट प्रदान करेगा. ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट की विशेषताएं ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 AST स्पेसमोबाइल की अगली पीढ़ी की संचार सैटेलाइट्स सीरीज का हिस्सा है. यह सैटेलाइट दुनिया भर में उन इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए डिजाइन की गई है जहां ग्राउंड नेटवर्क नहीं पहुंच पाता. मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं…     वजन: लगभग 6100 से 6500 किलोग्राम (यह LVM3 द्वारा भारतीय मिट्टी से लॉन्च किया गया अब तक का सबसे भारी पेलोड है).     आकार: इसमें 223 वर्ग मीटर (लगभग 2,400 स्क्वायर फीट) का फेज्ड ऐरे एंटीना लगा है, जो इसे लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात होने वाला सबसे बड़ा कॉमर्शियल संचार सैटेलाइट बनाता है.     क्षमता: यह 4G और 5G नेटवर्क सपोर्ट करता है. सामान्य स्मार्टफोन को सीधे स्पेस से हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड प्रदान करेगा.     स्पीड: प्रति कवरेज सेल में 120 Mbps तक की पीक डेटा स्पीड, जो वॉइस कॉल, वीडियो कॉल, टेक्स्ट, स्ट्रीमिंग और डेटा सर्विसेज को सपोर्ट करेगी.     उद्देश्य: यह सैटेलाइट AST स्पेसमोबाइल की ग्लोबल कांस्टेलेशन का हिस्सा है, जो दुनिया भर में 24/7 कनेक्टिविटी उपलब्ध कराएगी. इससे दूरदराज के इलाकों, समुद्रों और पहाड़ों में भी मोबाइल नेटवर्क पहुंचेगा.     पिछली सैटेलाइट्स: कंपनी ने सितंबर 2024 में ब्लूबर्ड 1-5 सैटेलाइट्स लॉन्च की थीं, जो अमेरिका और कुछ अन्य देशों में कंटीन्यूअस इंटरनेट कवरेज प्रदान कर रही हैं. ब्लॉक-2 इससे 10 गुना ज्यादा बैंडविड्थ कैपेसिटी वाली है. यह सैटेलाइट लगभग 600 किलोमीटर की ऊंचाई वाली लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात की जाएगी. LVM3 रॉकेट की विशेषताएं LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3), जिसे पहले GSLV Mk-III कहा जाता था, इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है. इसे इसरो ने पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित किया है. मुख्य स्पेसिफिकेशंस…     ऊंचाई: 43.5 मीटर     लिफ्ट-ऑफ वजन: 640 टन     स्टेज: तीन स्टेज वाला रॉकेट     दो सॉलिड स्ट्रैप-ऑन बूस्टर्स (S200)     लिक्विड कोर स्टेज (L110)     क्रायोजेनिक अपर स्टेज (C25)     पेलोड क्षमता: जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (GTO) में: 4,200 किलोग्राम तक. लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में: 8,000 किलोग्राम तक.     पिछले सफल मिशन: LVM3 ने चंद्रयान-2, चंद्रयान-3 और दो वनवेब मिशनों (कुल 72 सैटेलाइट्स) को सफलतापूर्वक लॉन्च किया है. इसका पिछला मिशन LVM3-M5/CMS-03 था, जो 2 नवंबर 2025 को सफल रहा. यह रॉकेट भारत की अंतरिक्ष क्षमता का प्रतीक है और भविष्य में गगनयान मानव मिशन के लिए भी इस्तेमाल होगा. यह मिशन इसरो के कॉमर्शियल लॉन्चेस में एक नया कीर्तिमान स्थापित करेगा. AST स्पेसमोबाइल दुनिया की पहली स्पेस-बेस्ड सेल्युलर ब्रॉडबैंड नेटवर्क बना रही है, जो स्टारलिंक जैसी सेवाओं से कॉम्पीट करेगी. भारत से लॉन्च होने से इसरो की ग्लोबल लॉन्च सर्विसेज में मजबूती आएगी.

डा. निलेश एम. देसाई ने मऊ के परिषदीय विद्यालयों में 1500 छात्रों से किया संवाद, बच्चों में जागी अंतरिक्ष में रुचि

इसरो स्पेस एप्लीकेशन सेंटर के डायरेक्टर डा. निलेश एम.देसाई पहुंचे मऊ परिषदीय विद्यालयों की 1500 छात्र-छात्राओं से किया सीधा संवाद     बच्चों में विज्ञान एवं अंतरिक्ष के प्रति जिज्ञासा और अभिरुचि उत्पन्न लखनऊ स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (इसरो) के डायरेक्टर डाक्टर निलेश एम. देसाई शुक्रवार को जनपद मऊ पहुंचे। यहां पर इन्होंने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर स्टेडियम में परिषदीय विद्यालयों की लगभग 1500 छात्र-छात्राओं से सीधा संवाद किया। बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए इसरो डायरेक्टर डाक्टर निलेश एम. देसाई ने कहा कि आज भारत को विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्थान हासिल कराने के लिए वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता है, जिसमें बच्चे अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाकर देश का नाम रौशन करें। इसके पूर्व जनपद के विकास खण्ड घोसी के अंतर्गत पूर्व माध्यमिक विद्यालय धरौली पर मुख्य अतिथि एवं निदेशक के नाम से स्थापित डॉ. निलेश एम. देसाई अंतरिक्ष एवं स्टेम प्रयोगशाला का उद्घाटन किया। उसके उपरांत बच्चों की अंतरिक्ष एवं इसरो की आगामी योजनाओं तथा भविष्य की संभावनाओं से संबंधित सवालों का उत्तर दिया।        इस दौरान जिलाधिकारी मऊ प्रवीण मिश्र ने बताया कि मऊ का सौभाग्य है कि मऊ के बेसिक शिक्षा में अध्ययनरत बच्चों को देश के इतने बड़े वैज्ञानिक का सानिध्य प्राप्त हुआ है। वहीं मुख्य विकास अधिकारी प्रशांत नागर ने कहा कि आने वाले समय में बच्चों को और भी अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे बच्चों की वैज्ञानिक सोच विकसित हो सके। जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी संतोष कुमार उपाध्याय ने जिलाधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी सहित इसरो की पूरी टीम का आभार ज्ञापित किया और विश्वास दिलाया कि जनपद मऊ के बेसिक के बच्चे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में उत्कृष्ट योगदान देंगे।        उल्लेखनीय है कि जनपद मऊ के 7 विकास खण्डों में अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र स्थापित तथा क्रियाशील हैं, जिसमें हजारों बच्चे भ्रमण एवं कार्यशाला में शामिल होकर अंतरिक्ष विज्ञान एवं रोबोटिक्स की जानकारियों को हासिल कर रहे हैं। इसी वर्ष मई में विभिन्न विकास खण्डों में से परीक्षा एवं साक्षात्कार द्वारा चयनित 13 बच्चों ने गुजरात राज्य में स्थित इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र का भ्रमण कर कृत्रिम उपग्रहों की बनावट तथा विभिन्न प्रकार के सेंसर के बारे में जाना एवं केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों से संवाद स्थापित किया था।        इस अवसर पर प्रमुख अतिथि दीपक सिंह (वरिष्ठ वैज्ञानिक गगनयान), फाउंडेशन से गोविंद, जिला समन्वयक समेकित शिक्षा विभाग से अमित कुमार श्रीवास्तव, अनिल चौरसिया, आलोक सिंह, अरविंद पाण्डेय ,राकेश कन्नौजिया, डॉ राम विलास भारती , सहेंद्र सिंह सहित शिक्षक, अभिभावक और छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।