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अरुणाचल में चीन से मुकाबले के लिए ITBP मजबूत करेगी ताकत, ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम पर खास जोर

 नई दिल्ली एक तरफ अरुणाचल प्रदेश में भारत और चीन के सैनिकों के बीच कई स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति की खबरें हैं, तो दूसरी तरफ भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) अपनी ऑपरेशनल क्षमता को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी है. दुर्गम पहाड़ों में जवानों की तेज आवाजाही से लेकर ड्रोन वॉरफेयर, एंटी-ड्रोन सिस्टम, विशेष कमांडो ट्रेनिंग और भूमिगत बंकरों तक, सीमा सुरक्षा की रणनीति में व्यापक बदलाव की तैयारी है. इसी कड़ी में करीब दो दर्जन क्विक रिस्पांस फाइटिंग व्हीकल (QRFV) खरीदने की योजना अहम मानी जा रही है।  भारत-चीन सीमा पर चुनौती केवल दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं है. वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के कई हिस्सों में ऊंचे पहाड़, बेहद कम तापमान, बर्फ से ढके रास्ते और सीमित सड़क संपर्क सुरक्षा बलों के सामने अलग तरह की चुनौतियां पैदा करते हैं।  ऐसे हालात में किसी संवेदनशील स्थान पर अचानक तनाव बढ़ने पर जवानों को कितनी तेजी से वहां पहुंचाया जा सकता है, यह सुरक्षा तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है.अरुणाचल प्रदेश में हाल के दिनों में सामने आई फेस-ऑफ की स्थितियों के बीच ITBP की वाहन क्षमता और आधुनिक तैयारियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. इसका उद्देश्य केवल जवानों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षित, संगठित और प्रभावी तरीके से तैनात करने की क्षमता बढ़ाना।  1. करीब दो दर्जन QRFV से मजबूत होगी त्वरित कार्रवाई की क्षमता ITBP की योजना करीब दो दर्जन क्विक रिस्पांस फाइटिंग व्हीकल खरीदने की है. इन वाहनों का मकसद संवेदनशील परिस्थितियों में जवानों की आवाजाही और त्वरित तैनाती की क्षमता बढ़ाना है. चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) पहले से ही सीमा के निकट सैनिकों की आवाजाही के लिए बेहतर सड़क नेटवर्क और आधुनिक वाहनों का इस्तेमाल करती है. ऐसे में भारतीय पक्ष के लिए भी मजबूत मोबिलिटी एक अहम जरूरत है।  QRFV यानी Quick Response Fighting Vehicle का मूल उद्देश्य है कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बल कम समय में निर्धारित स्थान तक पहुंच सकें. सामान्य परिवहन वाहन और इस तरह के विशेष सैन्य वाहन के बीच बड़ा अंतर उनकी सुरक्षा, कठिन भूभाग में संचालन और ऑपरेशनल परिस्थितियों के अनुरूप डिजाइन में होता है.यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू है रिएक्शन टाइम यानी प्रतिक्रिया देने में लगने वाला समय. सीमा पर तनाव की स्थिति में बेहतर सड़क संपर्क, उपलब्ध वाहन और प्रशिक्षित जवान मिलकर त्वरित कार्रवाई की क्षमता बढ़ाते हैं. अगर किसी स्थान पर आमने-सामने की स्थिति बनती है, तो वहां तक अतिरिक्त बल पहुंचाने की क्षमता हालात को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  2. चीन की चुनौती और भारत की बदलती रणनीति भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है.इसको लेकर कई बार दोनों देशों के बीच बैठकें  भी हो चुकीं है.जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने यह स्पष्ट कर दिया था कि सीमा पर किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए केवल पारंपरिक गश्त पर्याप्त नहीं है. बेहतर बुनियादी ढांचा, संचार, निगरानी और तेजी से बल तैनात करने की क्षमता भी जरूरी है।  अरुणाचल प्रदेश में हाल के दिनों में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच फेस-ऑफ की स्थिति सामने आने के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों को कितनी तेजी से सहायता उपलब्ध कराई जा सकती है.ITBP भारत-चीन सीमा की सुरक्षा करने वाला प्रमुख बल है।  इसका दायित्व ऐसे इलाकों में गश्त करना, सीमा पर निगरानी रखना और प्रतिकूल परिस्थितियों में चौकियों की सुरक्षा करना है, जहां ऊंचाई और मौसम दोनों बड़ी चुनौतियां हैं.QRFV जैसी गाड़ियों की खरीद इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है. इसका उद्देश्य केवल वाहनों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि जवानों की सुरक्षित आवाजाही और कठिन परिस्थितियों में कार्रवाई की क्षमता को बेहतर बनाना है।  3. पहाड़ों में गाड़ी चलाना ही सबसे बड़ी चुनौती मैदानी इलाकों में किसी स्थान तक पहुंचने और ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्र में पहुंचने के बीच बहुत बड़ा अंतर होता है. पहाड़ों में संकरी सड़कें, तीखे मोड़, ढलान, भूस्खलन, बर्फबारी और कम तापमान वाहनों की परिचालन क्षमता को प्रभावित करते हैं.कई सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क संपर्क सीमित है. कुछ जगहों पर अंतिम चौकी तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है. मौसम खराब होने पर यात्रा का समय और बढ़ सकता है।  ऐसे में ITBP के लिए केवल अधिक वाहन खरीदना पर्याप्त नहीं होगा. वाहनों का पहाड़ी भूभाग के अनुकूल होना, नियमित रखरखाव, चालकों का विशेष प्रशिक्षण और ईंधन तथा स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता भी जरूरी होगी.QRFV जैसी गाड़ियों से मिलने वाला वास्तविक लाभ इसी बात पर निर्भर करेगा कि उन्हें किन इलाकों में तैनात किया जाता है और वहां की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार उनकी क्षमता कितनी प्रभावी रहती है।  4. बख्तरबंद वाहनों की खासियत क्या होती है? क्विक रिएक्शन फाइटिंग व्हीकल श्रेणी के कई आधुनिक सैन्य वाहनों में सुरक्षा और गतिशीलता को ध्यान में रखकर डिजाइन तैयार किया जाता है. वाहन के मॉडल के आधार पर इनमें बख्तरबंद बॉडी, चार पहियों से चलने वाली ड्राइव प्रणाली, विशेष टायर और कठिन परिस्थितियों में संचालन की सुविधाएं हो सकती हैं।  कुछ बख्तरबंद वाहनों में गोलीबारी और विस्फोट से सुरक्षा देने वाली संरचना भी होती है. कुछ में भीतर बैठे जवानों को सुरक्षा के साथ जवाबी कार्रवाई करने में मदद देने वाली सुविधाएं दी जाती हैं. लेकिन इन क्षमताओं का स्तर हर मॉडल में अलग होता है.यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि QRFV एक व्यापक श्रेणी का नाम भी है।  भारतीय सेना के लिए विकसित किसी खास वाहन की सीटिंग क्षमता, इंजन की शक्ति, ऊंचाई पर संचालन की सीमा या सुरक्षा स्तर को ITBP की प्रस्तावित खरीद पर स्वतः लागू नहीं किया जा सकता.ITBP के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरूरत ऐसी गाड़ियों की होगी, जो उसके परिचालन क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुकूल हों और जरूरत पड़ने पर जवानों को तेजी से उनके निर्धारित स्थान तक पहुंचा सकें।    5. ड्रोन से लेकर एंटी-ड्रोन सिस्टम तक, ITBP का आधुनिकीकरण वाहनों की खरीद ITBP की व्यापक आधुनिकीकरण योजना का केवल एक हिस्सा है. बल की तैयारियों में ड्रोन, एंटी-ड्रोन तकनीक, विशेष प्रशिक्षण और सीमा पर बेहतर सुरक्षा ढांचे पर भी जोर दिया जा रहा … Read more

अरुणाचल प्रदेश में चीन से Face-Off जारी, ITBP ने बढ़ाई निगरानी और सुरक्षा तैयारियां

 नई दिल्ली भारत और चीन के बीच लगी वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन ITBP के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया कि अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में जुलाई से चीनी पीएलए सैनिकों के साथ आमने-सामने की स्थिति बनी हुई है।  उन्होंने राजस्थान के अलवर में अपने जवानों को संबोधित करते हुए बताया कि असफिला जैसे क्षेत्रों में चीनी सैनिकों ने भारत की समझ वाली एलएसी से महज छह-सात किलोमीटर दूर तंबू लगा रखे हैं. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उत्तरी सीमा पर बढ़ते तनाव की आधिकारिक स्वीकारोक्ति है, जो ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और 1962 के युद्ध की सालगिरह के आसपास भी जारी रही।  आईटीबीपी, जो 1962 में गठित हुई थी और लगभग 3488 किलोमीटर लंबी एलएसी की सुरक्षा करती है, अब इस स्थिति को सिर्फ पारंपरिक तरीकों से नहीं, बल्कि आधुनिक युद्धकौशल से निपटने की तैयारी कर रही है. महानिदेशक ने चीन को भारत का सबसे बड़ा विरोधी बताया और कहा कि पारंपरिक युद्ध के तरीके अब पुराने पड़ चुके हैं।  यह पुष्टि इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि इससे पहले आधिकारिक स्तर पर इतने स्पष्ट शब्दों में अरुणाचल में जारी फेस-ऑफ की बात नहीं कही गई थी. महानिदेशक ने शौर्य कमांडो प्लाटून की सराहना की, जिन्होंने इन आमने-सामने की स्थितियों में प्रभावी जवाब दिया. उन्होंने बताया कि शौर्य कमांडो अब हर बॉर्डर बटालियन में होंगे और आईटीबीपी को एक अलग पहचान देंगे।  ये कमांडो गलवान जैसी स्थितियों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित हैं, जहां 2020 में चीनी सैनिकों ने पत्थर, नाखून लगे डंडे और लोहे की छड़ों से हमला किया था, जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए थे. चीन ने बाद में सिर्फ चार मौतों की बात कही थी, लेकिन कई रिपोर्टों में चीनी पक्ष के नुकसान को ज्यादा बताया गया था. अब आईटीबीपी इन सब सबकों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बदल रहा है।  ड्रोन युद्ध और आधुनिकीकरण की नई दिशा आईटीबीपी महानिदेशक ने यूक्रेन-रूस युद्ध और ईरान-अमेरिका संघर्ष का उदाहरण देते हुए बताया कि आज के समय में ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक कितनी महत्वपूर्ण हो गई है. उन्होंने कहा कि रूस जैसा बड़ा देश और महाशक्ति भी यूक्रेन के खिलाफ लड़ते हुए हर महीने दस से पंद्रह हजार सैनिक खो रहा है।  यह चौथे साल भी जारी है, जबकि रूस सोचता था कि एक-दो महीने में काम हो जाएगा. इसी तरह ईरान ने बिना पारंपरिक वायुसेना, नौसेना या सेना के अमेरिकी महाशक्ति को चुनौती दी. इन उदाहरणों से साफ है कि पारंपरिक सेनाओं की भूमिका बदल चुकी है. महानिदेशक ने जोर देकर कहा कि ड्रोन अब चुनौती भी हैं और अवसर भी।  चीन ने अपनी पीएलए को बत आधुनिक बना लिया है और भारी निवेश किया है, इसलिए पारंपरिक तरीकों से मुकाबला मुश्किल है. लेकिन ड्रोन ऐसी तकनीक है जिससे छोटा देश भी बड़े देश को मुंहतोड़ जवाब दे सकता है.इसी सोच के साथ आईटीबीपी ने हर सीमा सुरक्षा बटालियन में ड्रोन प्लाटून तैयार कर ली है।  लगभग 95,000 कर्मियों वाली यह बल पहाड़ी युद्ध में प्रशिक्षित है. सरकार से मिले 400 करोड़ रुपये के फंड में से 70 प्रतिशत हिस्सा ड्रोन युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने में लगाया जा रहा है. होम मिनिस्ट्री ने सिद्धांत रूप में 4000 करोड़ रुपये की बड़ी आधुनिकीकरण योजना को मंजूरी दी है, जिसमें से 1000 करोड़ रुपये सिर्फ ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम के लिए रखे जाएंगे. ITBP अब खुद ड्रोन बना रहा है ताकि बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम हो।   ड्रोन पायलटों की ट्रेनिंग भी जोर-शोर से चल रही है. यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक युद्ध में हवा से निगरानी, हमला और बचाव तीनों में ड्रोन की भूमिका बढ़ गई है. अरुणाचल जैसे दुर्गम इलाकों में जहां सड़कें कम हैं और मौसम कठोर है, ड्रोन से तुरंत जानकारी मिल सकती है और जवाबी कार्रवाई तेज हो सकती है।  स्ट्राइक कोर्स और शौर्य कमांडो: गलवान जैसी स्थितियों की तैयारी आईटीबीपी ने ‘स्ट्राइक’ नाम का एक नया कोर्स तैयार किया है, जो गलवान जैसी स्थितियों से निपटने के लिए बनाया गया है. अब तक करीब दस हजार जवानों को यह ट्रेनिंग दी जा चुकी है और 330 मास्टर ट्रेनर तैयार किए गए हैं. पूरा बल 2027 के अंत तक इस ट्रेनिंग से गुजरेगा. यह कोर्स सिर्फ शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि मानसिक तैयारियों, क्लोज कॉम्बैट और आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल पर जोर देता है।  इसके अलावा शौर्य कमांडो टीम बनाई गई है, जिसने अरुणाचल में जारी फेस-ऑफ के दौरान अपनी क्षमता दिखाई. ये कमांडो हर बॉर्डर बटालियन में तैनात होंगे. महानिदेशक ने कहा कि चीन मोर्चा सबसे कठिन सीमा है और वहां पारंपरिक तरीकों से काम नहीं चलेगा. इसलिए आईटीबीपी को विशेष हाई-एल्टीट्यूड मांउटेन लड़ाकू बल बनाने की योजना बनाई गई है।  पुराने हथियारों को भी बदला जा रहा है, जिनमें से कुछ पचास साल पुराने हैं. नई ऑल-ट्रेन वाहन, ग्राउंड वाहन और क्विक रिएक्शन वाहन खरीदे जा रहे हैं ताकि दुर्गम इलाकों में तेजी से पहुंच बनाई जा सके. ‘कोल्ड स्टार्ट किट’ दी गई है, जिससे बर्फीले मौसम में वाहन एक क्रैंक में चालू हो जाते हैं. यह अनुभव कोसोवो मिशन से लिया गया था, जहां सब-जीरो तापमान में वाहन आसानी से स्टार्ट होते थे।  भूमिगत बंकर और जवानों की सुविधाएं: नए युद्ध की जरूरत आधुनिक युद्ध में ऊपर की इमारतें आसान लक्ष्य बन जाती हैं. इसलिए आईटीबीपी भूमिगत शेल्टर यानी बंकर बड़े पैमाने पर बना रहा है. पायलट प्रोजेक्ट चल रहा है और आने वाले वर्षों में इन भूमिगत आश्रयों में ऊपर वाली इमारतों जैसी सुविधाएं होंगी. यह सबक पाकिस्तान के साथ ऑपरेशन सिंदूर जैसे संघर्षों से भी लिया गया है।  जवानों की सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जा रहा है. सब-जीरो तापमान वाले इलाकों में 383 बैरकों में से 342 को इंसुलेट किया गया है. 141 जनरेटर सेट लगाए गए हैं ताकि दूरदराज के पोस्ट पर बिजली रहे. सोलर वॉटर हीटर भी लगाए गए हैं. नई डाइट प्लान शुरू की गई है, जिसमें चीनी और तेल की मात्रा कम की गई है. जवानों से फिट रहने को कहा गया है।  महानिदेशक ने चिंता जताई कि 2020 के बाद अल्कोहल डिपेंडेंस सिंड्रोम के मामले दोगुने-तिगुने हो … Read more