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जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का आदेश, AAP बोली- ‘हम भुगतने को तैयार हैं

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी (आप) इन दिनों जहां एक तरफ पार्टी में टूट के संकट से जूझ रही है तो दूसरी तरफ पार्टी के बड़े नेता अदालती लड़ाई में भी उलझे हैं। खुद पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ बहिष्कार वाला सत्याग्रह छेड़ दिया है, जिसमें अब उनके अलावा मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक भी शामिल हो गए हैं। कथित शराब घोटाले से जुड़े केस की सुनवाई कर रहीं जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में बुधवार को इन नेताओं की ओर से ना तो कोई वकील पेश हुआ और ना ही इनकी ओर से कोई जवाब दिया गया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की ओर से दिए गए ‘अंतिम मौके’ पर 'आप' ने एक बार फिर अपना रुख जाहिर कर दिया है। आप के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में 'सत्याग्रह' जारी रखने की बात कहते हुए कहा कि परिणाम भुगतने को तैयार हैं और सबकुछ सोचकर फैसला लिया गया है कि जहां न्याय की उम्मीद नहीं है वहां पेश होने का फायदा नहीं है। अनुराग ने कहा, 'मुझे लगता है कि अरविंद केजरीवाल जी की तरफ से, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक की तरफ से साफ कह दिया गया है कि वह इन कार्यवाही में हिस्सा नहीं लेंगे। यह सत्याग्रह है हम लोगों का।' परिणाम भुगतने को तैयार, सोचकर लिया फैसला: केजरीवाल आप नेता ने कहा कि कानूनी विकल्प अपनाए जाएंगे पर अभी यह साफ है कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में तीनों ही नेता अपना केस नहीं लड़ेंगे। उन्होंने कहा, 'सत्याग्रह इसलिए कि हमने कानूनी प्रक्रिया अपनाई, रिक्यूजल के प्रोसेस में गए और सबकुछ किया। इसके बाद दो फैक्ट्स को मानते हुए जज कहती हैं कि मैं ही इस केस को सुनूंगी तो उनके सामने जाने का क्या फायदा, जब हमको पता है कि हमें इंसाफ मिलेगा या नहीं मिलेगा। सत्याग्रह जारी है। जब राजघाट गए थे तो इस प्रण को दृठ करते हुए कि दुष्परिणाम के लिए तैयार हैं। सारी चीजों को सोचकर फैसला लिया है। जहां न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है वहां पेश होने का फायदा नहीं है। जो भी कानूनी विकल्प होंगे उन्हें अपनाएंगे। लेकिन अभी तक स्पष्ट है कि ना तीनों ही नेता जाएंगे और ना ही वकील के माध्यम से पक्ष रखेंगे।' जज ने दिया आखिरी मौका आप के नेताओं ने न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के सामने सुनवाई का बहिष्कार किया है। हालांकि, जज ने उन्हें अपना जवाब दाखिल करने का एक अंतिम मौका दिया है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि 'हम रिकॉर्ड मंगवाएंगे और सोमवार से सुनवाई शुरू करेंगे' और निर्देश दिया कि रिकॉर्ड कल तक मंगवा लिया जाए। अदालत ने यह भी गौर किया कि कई पक्षों ने अपने-अपने जवाब दाखिल कर दिए हैं लेकिन बरी किए गए कुछ आरोपियों ने अब तक ऐसा नहीं किया है। अदालत ने कहा, '(अदालत) उन्हें जवाब दाखिल करने का एक और आखिरी मौका देगी। वे शनिवार तक जवाब दाखिल कर दें।' जस्टिस शर्मा ने खुद को अलग करने से किया इनकार, केजरीवाल का बहिष्कार जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा शर्मा ने 20 अप्रैल को इस मामले से खुद को अलग करने संबंधी केजरीवाल और सिसोदिया की याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इसके बाद आप नेताओं ने खुला पत्र लिखकर कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से या किसी वकील के माध्यम से जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में पेश नहीं होंगे। केजरीवाल समेत अन्य आप नेताओं ने जस्टिस पर हितों के टकराव समेत कुछ आरोप लगाए हैं और आशंका जाहिर की है कि उनकी अदालत में न्याय नहीं मिल पाएगा।

अरविंद केजरीवाल मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा का बड़ा बयान: ‘गरिमा को चुनौती दी गई थी’

नई दिल्ली दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल और अन्य लोगों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दिल्ली आबकारी नीति मामले से उन्हें हटाने की मांग की गई थी। एक कड़े फैसले में जस्टिस शर्मा ने अपने ऊपर लगे पक्षपात के आरोपों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि अविश्वास के बीज बोने के लिए दरवाजे नहीं खोले जा सकते। जस्टिस शर्मा ने कहा कि मुझे पता है कि मुझे कितना और क्या करना है। अगर मैं बिना सुने अलग हो जाती तो मैं अपना कर्तव्य त्याग देती। याचिकाएं न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करने जैसा बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा कि जज के निष्पक्ष होने की एक धारणा होती है। जो पक्षकार जज को हटाने की मांग करता है उसे इस निष्पक्षता की धारणा को गलत साबित करना होता है। जस्टिस शर्मा ने फैसला सुनाया कि केजरीवाल और अन्य लोगों द्वारा दायर की गई याचिकाएं न्यायपालिका को ही कटघरे में खड़ा करने जैसा था। उन्होंने कहा कि मुकदमा लड़ने वाले ने न्यायपालिका संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। मैंने विवाद को सुलझाने का रास्ता चुना है। न्यायपालिका की ताकत उसके आरोपों पर फैसला करने के पक्के इरादे में निहित है। मैंने बिना किसी चीज से प्रभावित हुए यह आदेश लिखा है। जजों के बच्चों को वकालत करने से नहीं रोका जा सकता इस दलील के संबंध में कि जज के बच्चे केंद्र सरकार के पैनल वकील हैं और उनके द्वारा इस मामले की सुनवाई करने में हितों का टकराव होगा, जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस तरह का टकराव इस विशेष मामले में स्पष्ट रूप से दिखाया जाना चाहिए। जज शर्मा ने कहा कि अगर किसी राजनेता की पत्नी राजनेता बन सकती है, अगर किसी राजनेता के बच्चे राजनेता बन सकते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी जज के बच्चे कानून के पेशे में नहीं आ सकते? इसका मतलब होगा कि जजों के परिवार के मौलिक अधिकार छीन लिए जाएं। झूठ को कई बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता उन्होंने आगे कहा कि उनके बच्चों में से कोई भी आबकारी नीति मामले से जुड़ा हुआ नहीं है। जज ने आगे कहा कि सच अपनी ताकत सिर्फ इसलिए नहीं खो देता कि झूठ को कई बार दोहराया गया हो। इस अदालत के एक अधिकारी के तौर पर मुझे इस बात का पूरा एहसास है कि झूठ, चाहे अदालत में या सोशल मीडिया पर हजार बार भी दोहराया जाए, सच नहीं बन जाता। वह झूठा ही रहता है। संस्था की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता जज ने कहा कि सिर्फ यह कह देना कि कोर्ट से राहत नहीं मिलेगी, जज को केस से हटाने की मांग करने का आधार नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जज खुद को केस से हटा लेते हैं तो इससे लोगों को यह लगने लगेगा कि जज किसी खास राजनीतिक पार्टी या विचारधारा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि मामले से स्वयं को अलग रखने के निर्णय के संविधान पर गंभीर प्रभाव पड़ेंगे और संस्था की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ेगा। न्यायालय आरोपों और इशारों से प्रभावित नहीं हो सकता जज शर्मा ने कहा कि आवेदनों में दिए गए विवरण अनुमानों पर आधारित थे। अगर मैं उन्हें स्वीकार कर लेती हूं तो यह एक चिंताजनक मिसाल कायम करेगा। मैंने अपने समक्ष सभी प्रश्नों का निडरता से निर्णय लिया है। यह न्यायालय आरोपों और इशारों से प्रभावित नहीं हो सकता। यह न्यायालय तब तक पीछे नहीं हटेगा जब तक ऐसा करने से संस्था की विश्वसनीयता पर ही असर पड़ेगा। यह न्याय का प्रशासन नहीं बल्कि न्याय का प्रबंधन होगा। फैसले में कहा गया है कि आवेदकों की व्यक्तिगत आशंका पूर्वाग्रह की उचित आशंका की कसौटी पर खरी नहीं उतरी है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी बर्खास्तगी की याचिका सबूतों के साथ नहीं, बल्कि संकेतों के साथ दायर की गई थी। याचिका सबूतों के साथ नहीं आई थी जज ने कहा कि अंत में मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगी कि बर्खास्तगी की याचिका सबूतों के साथ नहीं आई थी। यह मेरे पास मेरी सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और तटस्थता पर लांछन, संकेतों और संदेहों के साथ आई थी। जज ने कहा कि गहरी चिंता की बात यह है कि मीडिया द्वारा निर्मित कथा को कार्यवाही से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें जवाबदेही के बिना मानहानि के उदाहरण भी शामिल हैं। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि बर्खास्तगी विवेक नहीं, बल्कि कर्तव्य का त्याग और आत्मसमर्पण का कार्य होगा। सवाल जज की निष्पक्षता के बारे में था अपने फैसले में जस्टिस शर्मा ने कहा कि इस मामले में बहस एक जज की निष्पक्षता और खुद संस्था के बारे में थी। जब मैंने यह फैसला लिखना शुरू किया तो कोर्टरूम में सन्नाटा छा गया था। जो बचा था, वह था एक जज होने का शांत बोझ। एक ऐसा जज जिसने भारत के संविधान की शपथ ली थी। मुझे एहसास हुआ कि एक जज के तौर पर मेरी चुप्पी ही असल में कसौटी पर थी और अब सवाल जज की निष्पक्षता और खुद संस्था के बारे में था। मेरी निष्पक्षता और गरिमा पर सवाल उठाए गए थे उन्होंने कहा कि केजरीवाल और अन्य लोगों की तरफ से दी गई खुद को मामले से अलग करने की अर्जियों ने उनकी निष्पक्षता और गरिमा को चुनौती दी थी। यह बात साफ थी कि मुझे खुद को इस मामले से अलग कर लेना चाहिए या नहीं। मेरी निष्पक्षता और गरिमा पर सवाल उठाए गए थे। आसान रास्ता यही होता कि मैं अर्जी पर सुनवाई किए बिना ही खुद को अलग कर लेता। लेकिन मैंने अर्जी पर फैसला करने का निर्णय लिया, क्योंकि यह एक संस्था का मामला था। मैंने तय किया कि मैं इन आरोपों से प्रभावित हुए बिना ही इस पर फैसला करूंगी। केजरीवाल के तर्कों में विरोधाभास था उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि केजरीवाल द्वारा दिए गए तर्कों में विरोधाभास था। कहा कि जिस बात ने इस काम को मुश्किल बना दिया है, वह यह है कि बहस के दौरान विरोधाभासी रुख अपनाए गए हैं। उन्होंने … Read more