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सुशांत गोल्फ सिटी में 846 बड़े भूखंडों पर संकट, बैनामे रद्द कराने की तैयारी

लखनऊ यूपी की राजधानी लखनऊ में सुशांत गोल्फ सिटी में कंसोर्टियम की 1000 करोड़ की जमीन खरीदने वाले 846 प्रभावशाली लोगों की रजिस्ट्री अब निरस्त होगी। कंसोर्टियम के नियमों का उल्लंघन कर करीब 19-19 हजार वर्ग फुट के बड़े भूखंड खरीदने वालों के आवंटन और बैनामे निरस्त कराने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। खास बात यह है कि इन खरीदारों को एलडीए की ओर से किसी तरह का मुआवजा भी नहीं दिया जाएगा। प्रमुख सचिव आवास पी गुरुप्रसाद ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है। अवैध बैनामों को ‘विधि शून्य’ घोषित कराने के लिए सक्षम न्यायालय में कानूनी चुनौती देने को भी कहा है। इन प्रभावशाली लोगों में आईएएस अधिकारियों, कारोबारियों, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं और जनप्रतिनिधियों के शामिल हैं। 149.459 हेक्टेयर जमीन की बिक्री जांच के घेरे में: कंसोर्टियम की कुल 163.18 हेक्टेयर जमीन में से करीब 149.459 हेक्टेयर जमीन की बिक्री को लेकर सवाल उठे हैं। एलडीए को योजना का हैंडओवर मिलने के बाद इस जमीन की बिक्री और इससे जुड़े बैनामों की जांच कराई जाएगी। कंसोर्टियम से बेचे गए 846 भूखंडों का औसत आकार करीब 19 हजार आठ वर्ग फुट है। इतने बड़े भूखंडों का इस्तेमाल फार्महाउस या निवेश के लिए किए जाने की बात सामने आई है। एलडीए सक्षम न्यायालय में उचित प्रक्रिया के तहत बैनामों को चुनौती देकर निरस्त कराने की कार्रवाई करेगा। शासन ने ट्रांजेक्शन एडवाइजर रखने का दिया आदेश: एलडीए अब आईआरपी अथवा एनसीएलटी के माध्यम से परियोजना की देनदारियों और संपत्तियों को हासिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा। इसके लिए पेशेवर ट्रांजेक्शन एडवाइजर की मदद से संपत्तियों और देनदारियों का अध्ययन कराया जाएगा। इसके बाद परियोजना के टेकओवर की कार्ययोजना तैयार होगी। 12 गांवों के विवादित भूखंड हैं शामिल 846 भूखंड लखनऊ के 12 गांवों में हैं। यह सभी सुशांत गोल्फ सिटी टाउनशिप के भीतर हैं। इनमें बरौना में 243, पहाड़नगर टिकरिया में 156, सोनेई कजेहरा में 131, हसनपुर खेवली में 66, दाउदनगर में 64, निजामपुर मजिगांव में 59, माढर मऊ कला में 51, अहमामऊ में 24, मुजफ्फरनगर घुसवल में 22, यूसुफनगर बगियामऊ में 17, हरिहरपुर में आठ और देवामऊ में पांच भूखंड शामिल हैं। आईएएस, कारोबारी और नेताओं की खरीद फंसी इन 846 बड़े भूखंडों को खरीदने वालों में आईएएस अधिकारियों, कारोबारियों, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं और जनप्रतिनिधियों के शामिल होने की बात सामने आई है। यही वजह है कि शासन ने कड़ा रुख अपनाया है। प्रमुख सचिव आवास ने एलडीए को आईआरपी व एनसीएलटी के समक्ष मजबूती से पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं। मामला कंसोर्टियम एग्रीमेंट के उल्लंघन और डबल सेलिंग से जुड़ा है। हाईटेक टाउनशिप नीति के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के भूमिधरों की जमीन को कंसोर्टियम व्यवस्था में शामिल किया गया था। व्यवस्था के अनुसार भूमिधर कंसोर्टियम के सदस्य रहते और परियोजना से मिलने वाले लाभ में हिस्सेदार होते। आरोप है कि अंसल बिल्डर की ओर से कंसोर्टियम सदस्यों को जमीन का भुगतान किए जाने के बाद भी कुछ सदस्यों ने उसी जमीन के हिस्से दूसरे लोगों को बेच दिए।

प्रॉपर्टी खरीदारों को झटका: भोपाल की 551 शहरी लोकेशन पर जमीन के दाम बढ़ेंगे

भोपाल भोपाल में जमीन और मकान खरीदना अब महंगा होने वाला है। जिला मूल्यांकन समिति ने आगामी वित्तीय वर्ष के लिए कलेक्टर गाइडलाइन का नया प्रस्ताव तैयार कर लिया है। शनिवार को कलेक्ट्रेट में आयोजित बैठक में शहर की कई प्राइम लोकेशन पर दरों में भारी बढ़ोतरी का सुझाव दिया गया है। कलेक्टर गाइडलाइन का नया प्रस्ताव तैयार भोपाल कलेक्ट्रेट में शनिवार को कलेक्टर कौशलेंद्र विक्रम सिंह की अध्यक्षता में जिला मूल्यांकन समिति की महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। इस बैठक में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए प्रस्तावित कलेक्टर गाइडलाइन का खाका पेश किया गया। पंजीयन अधिकारियों ने जिले भर की प्रॉपर्टी दरों की समीक्षा के बाद अपना प्रस्ताव समिति के समक्ष रखा।   551 लोकेशन पर 11 प्रतिशत तक बढ़ेंगे दाम प्रस्ताव के अनुसार, जिले में प्रॉपर्टी की दरों में औसत वृद्धि करीब डेढ़ प्रतिशत प्रस्तावित की गई है। हालांकि, भोपाल के शहरी क्षेत्रों की स्थिति इससे अलग है। अधिकारियों ने बताया कि शहर की 551 चुनिंदा लोकेशन ऐसी हैं, जहां विकास और मांग को देखते हुए प्रॉपर्टी की दरों में 11 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का प्रस्ताव दिया गया है। इन क्षेत्रों में हाल के दिनों में संपत्तियों की रजिस्ट्री और बाजार मूल्यों में बड़ा उछाल देखा गया है।   राजस्व और विकास को ध्यान में रखकर लिया गया निर्णय बैठक में कलेक्टर ने पंजीयन अधिकारियों के प्रस्ताव पर चर्चा की और क्षेत्रवार दरों की समीक्षा की। इस वृद्धि के पीछे का मुख्य उद्देश्य बाजार दरों और सरकारी गाइडलाइन के बीच के अंतर को कम करना है। प्रस्तावित गाइडलाइन पर अब आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी, जिससे शासन के राजस्व में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है।