महाभारत युद्ध की असली कहानी द्रौपदी से भी पहले शुरू हुई, सत्यवती और भीष्म की प्रतिज्ञा बनी बड़ी वजह
महाभारत की कई रोचक और रहस्यमयी कहानियां हम बचपन से सुनते आ रहे हैं. इस महाकाव्य में युद्ध, राजनीति, रिश्ते, प्रतिज्ञाएं, प्रेम, त्याग और महत्वाकांक्षा की ऐसी कई कहानियां हैं, जिनका असर आगे की घटनाओं पर पड़ा. आमतौर पर महाभारत युद्ध की चर्चा होती है तो द्रौपदी के अपमान, हस्तिनापुर के सिंहासन को लेकर विवाद और दुर्योधन के अहंकार को इसके प्रमुख कारणों में गिना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस महायुद्ध की जड़ें इससे भी बहुत पहले की घटनाओं में खोजी जाती हैं? पौराणिक कथाओं में महाभारत के युद्ध के पीछे कई कारण बताए गए हैं. इनमें एक कथा ऐसी भी है, जो इस पूरे घटनाक्रम को राजा शांतनु, माता गंगा और सत्यवती से जोड़ती है. तो आखिर सत्यवती का महाभारत के युद्ध से क्या संबंध था? कैसे एक प्रतिज्ञा ने हस्तिनापुर के उत्तराधिकार की पूरी कहानी बदल दी? आइए जानते हैं. राजा महाभिषेक को मिला था ब्रह्मा जी का श्राप पौराणिक मान्यता के अनुसार, महाभारत की कहानी की एक महत्वपूर्ण कड़ी राजा महाभिषेक से जुड़ी हुई है. कहा जाता है कि महाभिषेक एक धर्मात्मा और तपस्वी राजा थे. एक बार उनकी तपस्या और धार्मिक आचरण से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें ब्रह्मलोक आने का अवसर दिया था. उसी दौरान ब्रह्मा जी की सभा में देवी गंगा भी उपस्थित थीं. तभी तेज हवा के कारण गंगा के वस्त्र का एक हिस्सा खिसक गया. सभा में मौजूद सभी देवताओं ने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन महाभिषेक की नजरें गंगा पर ही टिकी रहीं. इससे ब्रह्मा जी क्रोधित हुए और उन्होंने महाभिषेक को मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया था. कथा के अनुसार, देवी गंगा को भी मनुष्य रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप मिला. यही श्राप आगे चलकर महाभारत की कहानी में एक महत्वपूर्ण मोड़ बनता है. महाभिषेक बने राजा शांतनु श्राप के प्रभाव से महाभिषेक ने पृथ्वी पर राजा शांतनु के रूप में जन्म लिया. शांतनु हस्तिनापुर के पराक्रमी राजा बने. एक दिन शिकार करते हुए उनकी नजर एक बेहद सुंदर स्त्री पर पड़ी. वह कोई और नहीं बल्कि देवी गंगा थीं. शांतनु गंगा के रूप पर मोहित हो गए और उन्होंने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा था. गंगा ने विवाह के लिए एक शर्त रखी. उन्होंने कहा कि शांतनु कभी उनसे कोई सवाल नहीं करेंगे और न ही उनके किसी काम में बाधा डालेंगे. जिस दिन उन्होंने ऐसा किया, उसी दिन गंगा उन्हें छोड़कर चली जाएंगी. शांतनु ने यह शर्त स्वीकार कर ली और दोनों का विवाह हो गया था. गंगा ने अपनी सात संतानों को नदी में बहा दिया कुछ समय बाद गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया. लेकिन पुत्र के जन्म के बाद वह उसे लेकर नदी के किनारे गईं और उसे नदी में प्रवाहित कर दिया. यह देखकर शांतनु का हृदय टूट गया, लेकिन विवाह के समय दिए गए वचन के कारण वह गंगा से कुछ पूछ नहीं सके. इसके बाद एक-एक करके उनके सात पुत्र हुए और गंगा ने सभी को नदी में प्रवाहित कर दिया. शांतनु के लिए यह सब देखना बेहद पीड़ादायक था, लेकिन वह अपने वचन से बंधे हुए थे. आठवें पुत्र को बचाने के लिए टूट गया शांतनु का वचन जब गंगा ने आठवें पुत्र को जन्म दिया और उसे भी नदी में ले जाने लगीं, तो इस बार शांतनु खुद को रोक नहीं सके. उन्होंने गंगा से पूछ लिया कि वह अपने ही बच्चों को नदी में क्यों बहा रही हैं. शांतनु का वचन टूट चुका था. तब गंगा ने उन्हें बताया कि वह उनके आठवें पुत्र को अपने साथ ले जा रही हैं. यही पुत्र आगे चलकर देवव्रत के नाम से प्रसिद्ध हुआ. गंगा ने देवव्रत का पालन-पोषण किया और उन्हें युद्ध, राजनीति, शास्त्र और धर्म की शिक्षा दिलाई. कई वर्षों बाद गंगा अपने पुत्र देवव्रत को शांतनु के पास वापस लेकर आईं. देवव्रत एक महान योद्धा और विद्वान बन चुके थे. यही देवव्रत आगे चलकर भीष्म पितामह कहलाए. सत्यवती के लिए भीष्म ने ली ऐसी प्रतिज्ञा समय बीता और एक दिन राजा शांतनु की नजर सत्यवती पर पड़ी. सत्यवती को कई कथाओं में पहले मत्स्यगंधा के नाम से भी जाना जाता है. उनके शरीर से मछली जैसी गंध आने के कारण उन्हें यह नाम मिला था. पौराणिक कथा के अनुसार, बाद में ऋषि पराशर के वरदान से उनके शरीर की दुर्गंध समाप्त हुई और उनसे सुगंध आने लगी. इसी प्रसंग से उनके जीवन में एक और महत्वपूर्ण घटना जुड़ी. ऋषि पराशर और सत्यवती के पुत्र के रूप में महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ. आगे चलकर सत्यवती राजा शांतनु के जीवन में आईं और शांतनु उनसे विवाह करना चाहते थे. लेकिन सत्यवती के पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी से पैदा होने वाला पुत्र ही हस्तिनापुर के सिंहासन का उत्तराधिकारी बने. यह स्थिति शांतनु के लिए कठिन थी, क्योंकि उनके बड़े पुत्र देवव्रत पहले से ही युवराज थे. अपने पिता की इच्छा और प्रेम को समझते हुए देवव्रत ने ऐसा फैसला लिया, जिसने इतिहास बदल दिया. उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया और यह प्रतिज्ञा की कि वह कभी हस्तिनापुर के सिंहासन पर अपना अधिकार नहीं जताएंगे. उनकी इस भयंकर प्रतिज्ञा के कारण ही देवव्रत को भीष्म कहा गया. सत्यवती के पुत्रों से आगे बढ़ा हस्तिनापुर का वंश शांतनु और सत्यवती के दो पुत्र हुए- चित्रांगद और विचित्रवीर्य. चित्रांगद की मृत्यु युद्ध में हो गई. इसके बाद विचित्रवीर्य हस्तिनापुर के राजा बने. उनका विवाह अंबिका और अंबालिका से हुआ, लेकिन उनके कोई संतान नहीं हुई. कुछ समय बाद विचित्रवीर्य की भी मृत्यु हो गई. अब हस्तिनापुर के सामने सबसे बड़ी समस्या वंश और उत्तराधिकार की थी. सत्यवती ने अपने पहले पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया. पौराणिक कथा के अनुसार, नियोग परंपरा के माध्यम से अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न हुई. अंबिका से धृतराष्ट्र और अंबालिका से पांडु का जन्म हुआ. एक अन्य दासी से विदुर का जन्म हुआ. यहीं से महाभारत की आगे की कहानी की नींव तैयार होती है. धृतराष्ट्र और पांडु के पुत्रों से शुरू हुआ नया संघर्ष धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाए और पांडु के पुत्र पांडव. समय के साथ दोनों पक्षों के बीच सिंहासन को लेकर विवाद बढ़ता गया. दुर्योधन और … Read more