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दुर्लभ बीमारी से जंग जीतकर बच्चा बचा, डॉक्टरों ने रचा चमत्कार

जयपुर जयपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो चिकित्सा विज्ञान की ताकत के साथ-साथ उम्मीद और इंसानियत की मिसाल भी बन गई है। जहां एक तरफ दुर्लभ बीमारी ने एक परिवार के दो मासूमों की जिंदगी छीन ली, वहीं तीसरे बच्चे को महज 56 रुपए के इलाज ने नया जीवन दे दिया। यह चमत्कार हुआ जयपुर के जेके लोन अस्पताल में, जहां डॉक्टरों की सूझबूझ और समय पर सही पहचान ने मौत को मात दे दी। जब हर सांस बन गई थी जंग 10 मार्च का दिन… एक पिता अपनी गोद में नन्हीं सी जिंदगी लेकर अस्पताल की दहलीज पर पहुंचा। बच्चे की हालत बेहद नाजुक थी। जन्म के कुछ ही दिनों बाद संक्रमण ने उसे जकड़ लिया था। परिवार पहले भी यही दर्द झेल चुका था—दो बच्चों को इसी रहस्यमयी बीमारी ने 40 और 55 दिनों में छीन लिया था। इस बार डर और उम्मीद दोनों साथ थे। प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद आखिरकार परिवार जेके लोन हॉस्पिटल पहुंचा। यहां से शुरू हुई एक ऐसी जंग, जिसमें हर मिनट कीमती था। जब शरीर ने खून बनाना छोड़ दिया डॉक्टरों ने जांच की तो चौंकाने वाला सच सामने आया। बच्चे का ‘एब्सोल्यूट न्यूट्रोफिल काउंट’ (ANC) महज 82 था। मेडिकल साइंस के अनुसार, अगर यह 500 से नीचे चला जाए तो संक्रमण से बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इतना ही नहीं, बच्चे का बोनमैरो भी काम करना बंद कर चुका था। यानी शरीर खून नहीं बना पा रहा था और इम्यून सिस्टम लगभग फेल हो चुका था। स्थिति ऐसी थी कि हर पल मौत का खतरा मंडरा रहा था। दुर्लभ बीमारी का खुलासा मेडिकल जेनेटिक्स विभाग के डॉक्टरों ने जब गहराई से जांच की, तो पता चला कि बच्चा ‘ट्रांसकोबालामिन-2 डिफिशिएंसी’ नाम की बेहद दुर्लभ जेनेटिक बीमारी से जूझ रहा है। यह बीमारी इतनी रेयर है कि दुनिया भर में इसके सिर्फ 60 केस ही अब तक सामने आए हैं। इस बीमारी में शरीर विटामिन B12 को कोशिकाओं तक नहीं पहुंचा पाता, जिससे खून बनना बंद हो जाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाती है। समय पर इलाज न मिले तो यह सीधे मौत की ओर ले जाती है। 14 रुपए का इंजेक्शन बना जिंदगी का सहारा अब कहानी में आता है सबसे बड़ा मोड़। डॉक्टरों ने बिना समय गंवाए हाइड्रॉक्सीकॉबालामिन इंजेक्शन का प्रोटोकॉल शुरू किया। एक इंजेक्शन की कीमत—सिर्फ 14 रुपए! हफ्ते में एक बार लगने वाले इस इंजेक्शन के चार डोज दिए गए। कुल खर्च—महज 56 रुपए। लेकिन असर? चमत्कार से कम नहीं। कुछ ही दिनों में बच्चे का ANC लेवल 82 से बढ़कर 6000 के पार पहुंच गया। बोनमैरो ने फिर से काम करना शुरू कर दिया और धीरे-धीरे मासूम मौत के मुंह से बाहर निकल आया। परिवार के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं बच्चे के पिता की आंखों में आंसू थे, लेकिन इस बार दर्द के नहीं, राहत के। उन्होंने कहा, “हमारे लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। पहले दो बच्चों को हमने यूं ही खो दिया, हमें समझ ही नहीं आया कि बीमारी क्या है। इस बार डॉक्टरों ने हमारे बच्चे को नई जिंदगी दे दी।” डॉक्टरों की टीम बनी फरिश्ता डॉक्टरों का कहना है कि सही समय पर जेनेटिक पहचान और तुरंत शुरू किया गया इलाज ही बच्चे की जिंदगी बचा सका। अगर थोड़ी भी देरी होती, तो परिणाम पहले जैसा ही हो सकता था। उम्मीद का संदेश यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की नहीं, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद है, जो दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे हैं। यह बताती है कि सही समय पर सही जांच और इलाज हो, तो लाखों का खर्च नहीं, बल्कि 56 रुपए भी जिंदगी बचा सकते हैं। जयपुर की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया—जब डॉक्टर ठान लें, तो किस्मत भी हार मान जाती है।

चिकित्सा क्षेत्र में इतिहास, PGI चंडीगढ़ ने 2 वर्षीय बच्चे के ब्रेन ट्यूमर का किया सफल ऑपरेशन

चंडीगढ़ दुनिया में पहली बार पीजीआई चंडीगढ़ के दो विभागों के डॉक्टरों की संयुक्त टीम ने सबसे बड़े और दुर्लभ मेनिन्जियो ट्यूमर की एंडोस्कोपी के जरिए सफल सर्जरी कर इतिहास रच दिया है। यह ट्यूमर सिर के निचले हिस्से (स्कल बेस) में बनने वाला अत्यंत दुर्लभ ब्रेन मेनिन्जियोमा था। इस जटिल सर्जरी को न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रो. धंडापानी और ईएनटी (ओटोलैरिंगोलॉजी) विभाग के प्रो. अनुराग की टीम ने करीब 9 घंटे की मैराथन सर्जरी के दौरान अंजाम दिया। यह सर्जरी सोनीपत के 2 वर्षीय बच्चे पर नाक के रास्ते एंडोस्कोपिक तकनीक से की गई। सर्जरी की सफलता के बाद पीजीआई के डॉक्टरों ने न सिर्फ अपनी विशेषज्ञता साबित की, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारत को एक बार फिर दुनिया में अग्रणी साबित किया है। इससे पहले वर्ष 2020 में स्पेन में इसी तकनीक से सर्जरी की गई थी, लेकिन उस समय मरीज की उम्र 12 साल थी और ट्यूमर का आकार भी छोटा था। दुर्लभ ट्यूमर के कारण कई समस्याओं से जूझ रहा था बच्चा 2 साल का यह बच्चा लंबे समय से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित था, लेकिन परिवार को बीमारी की जानकारी नहीं थी। बच्चे की बाईं आंख का बाहर की ओर निकल आना, आंखों की मूवमेंट रुकना, तेज खर्राटे, नाक में बार-बार गांठ दिखना और आंखों से अधिक पानी आना जैसे लक्षण सामने आ रहे थे। जब परिजन बच्चे को पीजीआई लाए तो डॉक्टरों ने सीटी स्कैन और एमआरआई करवाई, जिसमें पता चला कि बच्चे के सिर के निचले हिस्से में 7 सेंटीमीटर का ट्यूमर है, जो साइनस, ब्रेन और ऑर्बिट (आंख की कोटर) तक फैल चुका था। बायोप्सी के बाद पुष्टि हुई कि यह बेहद दुर्लभ मेनिन्जियो ट्यूमर है। बेहद चुनौतीपूर्ण थी सर्जरी मेडिकल साइंस में स्कल बेस मेनिन्जियो ट्यूमर की सर्जरी को अत्यंत चुनौतीपूर्ण माना जाता है, खासकर 2 साल के बच्चे में यह जोखिम और भी ज्यादा था। सर्जरी के दौरान हाइपोथर्मिया, अत्यधिक रक्तस्राव और फ्लूइड डिस्टरबेंस से बच्चे की जान को खतरा हो सकता था। इन जोखिमों को देखते हुए ईएनटी, न्यूरोसर्जरी और न्यूरो-एनेस्थीसिया विभागों की एक विशेष टीम बनाई गई। एंडोस्कोपिक तकनीक से टाला गया बड़ा जोखिम रवायती ओपन सर्जरी के जोखिमों को ध्यान में रखते हुए डॉक्टरों ने सभी सुरक्षित विकल्पों पर विचार कर एंडोस्कोपिक तकनीक से सर्जरी करने का फैसला लिया। सर्जरी के दौरान यह सामने आया कि ट्यूमर नाक के जरिए मैक्सिलरी साइनस और सामने की गाल की हड्डी तक फैल चुका था। इसके बाद उन्नत एंडोस्कोपिक तकनीक, 45 डिग्री नेविगेशन एंगल वाले एंडोस्कोप और विशेष उपकरणों की मदद से ब्रेन के बेहद करीब फंसे ट्यूमर को सावधानीपूर्वक निकाला गया। डॉक्टरों ने बताया कि ट्यूमर में अत्यधिक रक्त वाहिकाएं और कई हड्डियों तक फैलाव था, इसके बावजूद टीम ने पूरी सतर्कता के साथ 9 घंटे में नाक के रास्ते ट्यूमर को पूरी तरह निकालने में सफलता हासिल की, जिससे ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ी।   पूरी तरह स्वस्थ है बच्चा सर्जरी के अंतिम चरण में स्कल बेस में बने सभी लेयर्स को रिपेयर किया गया। सर्जरी के बाद की गई एमआरआई में पुष्टि हुई कि ट्यूमर पूरी तरह निकाल दिया गया है। फिलहाल बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है और उसकी हालत में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। पीजीआई के डॉक्टरों की इस अद्भुत और ऐतिहासिक सर्जरी को चिकित्सा जगत में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।