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भारत ने विकसित किया ब्रह्मास्त्र, 5th जेन जेट और हाई-टेक डिवाइस बनाने की तैयारी तेज

नई दिल्ली चीन जिसके दम पर दुनिया पर राज करना चाहता है और जिसपर उसकी सुपरमेसी है, अब उसका अंत होने वाला है. भारत के हाथ ऐसा ‘ब्रह्मास्‍त्र’ लगा है, जिससे ड्रैगन की मनमानी पर नकेल कसना आसान हो जाएगा. आंध्र प्रदेश की 974 किलोमीटर लंबी कोस्‍ट लाइन में रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स का विशाल रिजर्व मिला है. एक्‍सपर्ट का कहना है कि आंध्र प्रदेश के समुद्री तटों पर जो रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स मिले हैं, वे हाई-क्‍वालिटी के हैं. रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स के बिना फाइटर जेट, स्‍मार्टफोन, मिसाइल, इलेक्ट्रिक व्‍हीकल आदि को बना पाना असंभव है. चीन का मौजूदा रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स के 85 फीसद पर कब्‍जा है. अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर को लेकर चीन ने इसके एक्‍सपोर्ट पर नकेल कस दी थी. ऐसे में भारत जैसे देशों में हाई क्‍वालिटी प्रोडक्‍ट्स के डेवलपमेंट पर बुरा असर पड़ा. मौजूदा हालात को देखते हुए भारत ने इस सेक्‍टर में आत्‍मनिर्भर बनने का फैसला किया है. इसके बाद से ही रेयर अर्थ मैटिरियल्‍स का पता लगाने के साथ ही उसके प्रोसेसिंग पर फोकस बढ़ गया है. आंध्र तट पर मिले भंडार का इस्‍तेमाल करने पर भारत 5th जेनरेशन फाइटर जेट के साथ ही iPhone जैसे कटिंग एज डिवाइस अपने दम पर बना सकेगा. साथ ही एक्‍सपोर्ट से बड़ी मात्रा में राजस्‍व भी अर्जित किया जा सकता है. आंध्र प्रदेश की 974 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा सिर्फ खूबसूरत समुद्र तटों और मछली पकड़ने के बंदरगाहों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि इसके नीचे छिपी रेत भारत के भविष्य के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है. श्रीकाकुलम से लेकर नेल्लोर तक फैले समुद्री किनारों की भारी और गहरी रेत में रेयर अर्थ मिनरल्स (दुर्लभ खनिज) का विशाल भंडार मौजूद है, जो ग्रीन एनर्जी, डिफेंस और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में भारत की जरूरतें पूरी कर सकता है. समुद्री रेत में मोनाजाइट नामक खनिज बड़ी मात्रा में पाया जाता है. मोनाजाइट रेयर अर्थ एलिमेंट्स और थोरियम का प्रमुख स्रोत है. इसके अलावा इल्मेनाइट, रूटाइल, जिरकॉन, गार्नेट और सिलिमेनाइट जैसे मूल्यवान खनिज भी यहां मौजूद हैं. खास बात यह है कि आंध्र प्रदेश के तट से निकलने वाले मोनाजाइट में 55 से 60 प्रतिशत तक रेयर अर्थ ऑक्साइड पाया जाता है, जो वैश्विक स्तर पर हाई क्‍वालिटी का माना जाता है. इसमें 8 से 10 प्रतिशत थोरियम भी होता है, जिसे भारत के भविष्य के परमाणु रिएक्टरों के लिए संभावित ईंधन माना जा रहा है. रेयर अर्थ मिनरल्‍स का कहां-कहां इस्‍तेमाल?     फाइटर जेट     इलेक्ट्रिक व्‍हीकल     मिसाइल     स्‍मार्टफोन     टेलीविजन     पेंट     मेडिकल इक्विपमेंट्स कहां-कहां मिले हैं रेयर अर्थ मिनरल्‍स? इन खनिजों में लैंथेनम, सेरियम, नियोडिमियम, प्रसीओडिमियम, समेरियम और यूरोपियम जैसे हल्के रेयर अर्थ एलिमेंट्स शामिल हैं. ये तत्व इलेक्ट्रिक वाहनों के स्थायी मैग्नेट, पवन ऊर्जा टरबाइन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, उपग्रह तकनीक, फाइबर ऑप्टिक्स और मॉडर्न मेडिकल इक्विपमेंट में अहम भूमिका निभाते हैं. जीयोलॉजिकल सर्वेक्षणों के अनुसार, आंध्र प्रदेश के तट पर भीमुनिपट्टनम, कलिंगपट्टनम, काकीनाडा, नरसापुर, मछलीपट्टनम, चिराला, वोडारेवु, रामयापट्टनम और दुगराजपट्टनम जैसे क्षेत्रों में लगातार खनिज बेल्ट फैली हुई है.  रिपोर्ट के अनुसार, अनुमान है कि भारत में कुल 30 करोड़ टन से अधिक भारी खनिज रेत भंडार है, जिसमें 1.2 से 1.5 करोड़ टन मोनाजाइट शामिल है. इसमें से 30 से 35 प्रतिशत हिस्सा अकेले आंध्र प्रदेश में होने का अनुमान है. लंबे समय तक ये समुद्री तट परमाणु नियमों, सीमित प्रोसेसिंग क्षमता और नीतिगत अड़चनों के कारण पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाए. लेकिन अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में तनाव बढ़ने और चीन पर निर्भरता कम करने की जरूरत के चलते आंध्र प्रदेश रणनीतिक रूप से केंद्र में आ गया है. फिलहाल चीन दुनिया की लगभग 85 प्रतिशत रेयर अर्थ प्रोसेसिंग क्षमता को नियंत्रित करता है. रेयर अर्थ मिनरल्‍स क्‍या होते हैं? रेयर अर्थ मिनरल्‍स कुल 17 तत्‍वों का समूह है, जिनमें नियोडिमियम, लैंथेनम, सेरियम, डिस्‍प्रोसियम और यट्रियम जैसे तत्‍व शामिल हैं. ये नाम से भले ही रेयर लगते हों, लेकिन ये धरती पर मिलते तो हैं, पर बहुत कम मात्रा में और अलग-अलग जगह बिखरे होते हैं. इन्‍हें निकालना और शुद्ध करना मुश्किल और महंगा होता है. रेयर अर्थ मिनरल्‍स को इतना अहम क्‍यों माना जा रहा है? क्‍योंकि आधुनिक तकनीक इन पर टिकी है. मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रिक वाहन, पवन चक्‍की, सोलर पैनल, मिसाइल, रडार और सेमीकंडक्‍टर चिप्‍स तक में रेयर अर्थ मिनरल्‍स का इस्‍तेमाल होता है. बिना इनके आज की हाई-टेक दुनिया की कल्‍पना करना मुश्किल है. क्‍या आम आदमी की जिंदगी में भी इनका असर है? बिलकुल…आपके हाथ में मौजूद स्‍मार्टफोन का स्‍पीकर, हेडफोन के मैग्‍नेट, टीवी की स्‍क्रीन, एसी और फ्रिज जैसे घरेलू उपकरण- इन सबमें रेयर अर्थ मिनरल्‍स इस्‍तेमाल होते हैं. यानी ये सीधे-सीधे आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक वाहनों में इनकी क्‍या भूमिका है? हरित ऊर्जा के लक्ष्‍य पूरे करने में रेयर अर्थ मिनरल्‍स बेहद जरूरी हैं. पवन चक्‍कियों में लगने वाले ताकतवर मैग्‍नेट और इलेक्ट्रिक कारों की मोटर में नियोडिमियम और डिस्‍प्रोसियम जैसे तत्‍व लगते हैं. अगर इनकी सप्‍लाई बाधित होती है, तो ग्रीन एनर्जी और ईवी सेक्‍टर पर सीधा असर पड़ता है. रक्षा और राष्‍ट्रीय सुरक्षा के लिए ये कितने अहम हैं? रक्षा उपकरणों में रेयर अर्थ मिनरल्‍स की अहम भूमिका है. मिसाइल गाइडेंस सिस्‍टम, जेट इंजन, रडार और कम्‍युनिकेशन उपकरणों में इनका उपयोग होता है. यही वजह है कि कई देश इन्‍हें रणनीतिक खनिज मानते हैं और इनकी सप्‍लाई को राष्‍ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं. दुनिया में इनका सबसे बड़ा उत्‍पादक कौन है? फिलहाल चीन रेयर अर्थ मिनरल्‍स का सबसे बड़ा उत्‍पादक और प्रोसेसर है. वैश्विक सप्‍लाई का बड़ा हिस्‍सा चीन के हाथ में है. इसी कारण अमेरिका, यूरोप, जापान और भारत जैसे देश वैकल्पिक स्रोत खोजने और घरेलू उत्‍पादन बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं. भारत के लिए रेयर अर्थ मिनरल्‍स क्‍यों अहम हैं? भारत साफ ऊर्जा, सेमीकंडक्‍टर और रक्षा उत्‍पादन में आत्‍मनिर्भर बनने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए रेयर अर्थ मिनरल्‍स जरूरी हैं. देश की लंबी समुद्री तटरेखा और कुछ राज्‍यों में इनके भंडार मौजूद हैं, जिनका सही उपयोग भारत को रणनीतिक रूप से मजबूत बना सकता है. आंध्र प्रदेश ने क्‍या उठाया कदम? इस अवसर … Read more

तेल नहीं, अब चुंबक है नया सोना! भारत के पास मिला खजाना, चीन की दबदबे पर लगाम

नई दिल्ली रेयर अर्थ मिनरल्‍स की वजह से वर्ल्ड वॉर तक हो सकती है. इसके दम पर चीन ने पूरी दुनिया का टेटुआ दबा रखा है. जिससे रिलेशन खराब होता है, उसे रेयर अर्थ मिनरल्‍स नहीं देता है. इससे स्‍मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक कार तक की मैन्‍यूफैक्चरिंग प्रभावित होती है. भारत के साथ संबंध जब पटरी से उतरा तो चीन ने इस अमूल्‍य खजाने के एक्‍सपोर्ट को लिमिटेड कर दिया, जिसका असर साफ तौर पर देखा गया. रेयर अर्थ मिनरल्‍स पर फिलहाल चीन की मोनोपोली यानी एकाधिकार है. अमेरिका से लेकर भारत तक इसके लिए चीन पर निर्भर हैं. क्‍लाइमेट चेंज को देखते हुए फॉसिल फ्यूल्‍स (जैसे पेट्रोलियम प्रोडक्‍ट्स और कोयला आदि) के दिन लदने वाले हैं. इलेक्‍ट्रॉनिक इक्विपमेंट्स का बोलबाला बढ़ने वाला है, जिसकी तस्‍वीर दिखने भी लगी है. इलेक्ट्रिक कार के बढ़ते बाजार से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. इसके अलावा स्‍मार्टफोन आज लोगों के जीवन का अ‍हम हिस्‍सा बन चुके हैं. रेयर अर्थ मिनरल्‍स के बिना इनकी मैन्‍यूफैक्‍चरिंग संभव नहीं है और चीन का इसपर एकाधिकार है. लिहाजा, यह पूरी तरह से चीन पर निर्भर है कि किस देश में इस तरह की इंडस्‍ट्री फलेगी-फुलेगी. लेकिन, अब एक शुभ समाचार सामने आया है. रेयर अर्थ मिनरल्‍स के रिजर्व के मामले में भारत का तीसरा स्‍थान है और एक अनुमान के अनुसार देश में 70 लाख टन ऐसे म‍िनरल्‍स हैं अनुमान है कि चीन की जमीन में 4.4 करोड़ टन रेयर अर्थ मिनरल्‍स हैं. दूसरे नंबर पर कौन है? जी हां…दूसरे नंबर पर ब्रिक्‍स का ही एक और मेंबर कंट्री ब्राज़ील है. अनुमान है कि ब्राज़ील की जमीन में 2.1 करोड़ टन रेयर अर्थ दबे हैं यानी इस गेम में ब्राज़ील दुनिया का बड़ा खिलाड़ी बन सकता है, क्योंकि आने वाला टाइम तो इलेक्ट्रिक गाड़ियों का ही दिख रहा है. पेट्रोल डीजल के जमाने लदने वाले हैं. सऊदी अरब से लेकर कतर वगैरह सब आगे की प्‍लानिंग कर रहे हैं, जब उनके तेल से कमाई के दिन खत्म होने वाले हैं. पहले देखते थे कि किस देश के पास कितना तेल का भंडार है. अब जमाना आएगा रेयर अर्थ के भंडार का. इस मामले में फिलहाल चीन बेताज बादशाह है. ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है. आपको पता है कि इस मामले में तीसरे स्‍थान पर कौन है. अपना भारतवर्ष. देश में करीब 70 लाख टन रेयर अर्थ मिनरल्‍स होने का अनुमान है. भारत के लिए गेम चेंजर भारत में रेयल अर्थ मिनरल्‍स अभी भंडार ही हैं. जमीन में ही हैं. इसको निकालना, साफ़ करना, रिफ़ाइन करना, फिर उसके मैगनेट बनाने के लिए पूरा सिस्टम तैयार करना पड़ेगा. अच्‍छी बात यह है कि भारत अब इस काम में लग गया है. इसमें टाइम तो लगेगा. चीन कई साल से ऐसा कर रहा है और शुरू में तो कोई देश उतना सस्ता और उतनी क्षमता की रिफाइनिंग कर भी ना पाए, लेकिन लगे रहना पड़ेगा. एक सरकारी घोषणा आपने सुनी होगी. भारत नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू कर रहा है. ये उसी काम का मिशन है. इसमें कुछ साल लगेंगे. तब तक चीन से ही लेना होगा. अब चुंबक का आया जमाना! कैसे धरती में दबी ताकत से पूरी दुनिया का टेंटुआ दबा रहा चीन तेल के खेल से पूरी दुनिया अच्छी तरह वाक़िफ है. 70 के दशक में अरब देशों ने दिखा दिया था कि तेल पर कंट्रोल मतलब पूरी दुनिया पर दबाव. लेकिन अब ज़माना बदल गया है. खेल का नया खिलाड़ी है ‘रेयर अर्थ मिनरल‘ और नया सुपरपावर बन बैठा है चीन. रेयर अर्थ मिनरल्स आखिर हैं क्या? ये कोई जादुई चीज़ नहीं, बल्कि 17 धातुओं का एक समूह है. जैसे लोहा या तांबा होता है, वैसे ही ये भी खनिज हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि इन्हें जमीन से निकालना और रिफाइन करना बेहद मुश्किल और महंगा काम है. लंबे समय तक इनका कोई बड़ा इस्तेमाल नहीं था. लेकिन जैसे ही इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक गाड़ियों का जमाना आया, इनकी कीमत आसमान छूने लगी. असली ताकत चुंबक की इन रेयर अर्थ मिनरल्स से बनते हैं सुपर मैगनेट. ये छोटे से पुर्जे दिखने वाले मैगनेट आज पूरी टेक्नोलॉजी की रीढ़ हैं. – स्मार्टफोन में – इलेक्ट्रिक गाड़ियों में – टीवी स्क्रीन में – हवाई जहाज के इंजन में – बिजली के टर्बाइन में खासकर इलेक्ट्रिक कारें इन चुंबकों के बिना असंभव हैं. मतलब इलॉन मस्क की टेस्ला हो या कोई और कंपनी, अगर रेयर अर्थ मैगनेट न मिले तो उनका काम खत्म. चीन कैसे बना राजा? 30-40 साल पहले चीन ने दूरदर्शिता दिखाई. उसने देखा कि इलेक्ट्रॉनिक्स का जमाना आने वाला है. उसने बड़े पैमाने पर खदानें खोलीं, रिफाइनिंग प्लांट लगाए और चुंबक बनाने की फैक्ट्रियां खड़ी कर दीं. नतीजा ये हुआ कि आज दुनिया का 90% रेयर अर्थ रिफाइनिंग चीन में होती है और 60-70% खदानें भी वहीं हैं. इतना ही नहीं, चीन ने म्यांमार, अफ्रीका और पाकिस्तान के बलूचिस्तान तक में खदानों पर कब्जा कर लिया है. यानी सिर्फ अपने देश ही नहीं, दूसरे देशों की जमीन से भी रेयर अर्थ निकालकर अपने कंट्रोल में कर लिया. बाकी दुनिया क्यों फंसी? अमेरिका जैसे देश पहले खुद खनन करते थे. लेकिन चीन ने इतने सस्ते दाम पर चुंबक बेचना शुरू किया कि बाकी देशों ने खदानें बंद कर दीं. 2002 में अमेरिका ने अपना बड़ा प्लांट ही बंद कर दिया. सबको लगा चीन से खरीदना आसान है. लेकिन जब इलेक्ट्रिक कारों का दौर आया तो चीन ने सप्लाई रोककर सबका टेंटुआ दबा दिया. भारत और दुनिया की स्थिति आज चीन के पास अनुमानित 4.4 करोड़ टन रेयर अर्थ मिनरल का भंडार है. दूसरे नंबर पर ब्राज़ील है 2.1 करोड़ टन के साथ. तीसरे नंबर पर आता है भारत, जहां करीब 70 लाख टन का भंडार है. फर्क बस इतना है कि चीन 40 साल से इस धंधे में है और भारत अभी शुरुआत कर रहा है. भारत ने ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ लॉन्च किया है. लक्ष्य साफ है- अपने भंडार को निकालना, रिफाइन करना और खुद मैगनेट बनाना. लेकिन इसमें वक्त लगेगा. तब तक चीन से लेना ही मजबूरी है. आने वाला समय कैसा होगा? जैसे कभी तेल पर कंट्रोल रखने वाले अरब देश पूरी दुनिया को ब्लैकमेल करते थे, वैसे ही … Read more