पंजाब के इस गांव में 165 साल से चली आ रही अनूठी परंपरा, सिर्फ 1000 रुपये में होता है रावण दहन
फतेहगढ़ साहिब जहां देशभर में विजयादशमी पर कागज और पटाखों से बने विशाल रावण का दहन होता है, वहीं फतेहगढ़ साहिब जिले के सबसे बड़े गांव चनारथल कलां (आबादी लगभग 7,000) में यह परंपरा अनोखी और पर्यावरण-अनुकूल है। यहां दशहरे के अगले दिन यानी एकादशी तिथि को रावण दहन का आयोजन किया जाता है। इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां प्रदूषण फैलाने वाले पुतलों की जगह लोहे के स्थाई रावण का इस्तेमाल होता है। परंपरा निभाने के लिए पुतले के सिर्फ मुकुट पर एक छोटा सा बम लगाकर रस्म पूरी की जाती है, जिससे पर्यावरण और संसाधनों की बचत होती है।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में प्रभु श्री राम ने इस गांव में छप्पड़ के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम किया था। इसके अलावा, आयोजन स्थल के चौक पर 165 वर्ष पुराना कुंभकर्ण का सीमेंट निर्मित बुत स्थापित है। यह बुत गांव के ऐतिहासिक इतिहास को दर्शाने के साथ-साथ लोगों को बुराई के प्रति जागरूक करने का काम करता है। श्री रामलीला कमेटी हनुमान जी के झंडा मार्च से सवा महीने पहले ही तैयारियां शुरू कर देती है। अष्टमी की रात से रामायण के मुख्य अंशों पर आधारित झांकियां निकाली जाती हैं, नवमी से खेल मेले की शुरुआत होती है और एकादशी के दिन रावण दहन के साथ मेले का समापन होता है। लोहे का स्थाई रावण और मात्र 1000 का खर्च इस गांव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि प्रदूषण फैलाने वाले कागज या लकड़ी के पुतलों की जगह लोहे के स्थाई पुतले का इस्तेमाल किया जाता है। परंपरा को जीवित रखने और पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने के लिए पुतले के सिर्फ सिर पर रंग-बिरंगे कागजों की टोपी बनाकर एक पटाखा लगाया जाता है। एकादशी के दिन भगवान श्री राम तीर चलाकर रस्म पूरी करते हैं। इस पूरे आयोजन में महज एक हजार रुपये का खर्च आता है और प्रदूषण भी नहीं फैलता। 165 साल पुराना दिलचस्प इतिहास गांव के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों हरिंदर सिंह, संजीव कुमार, कुलवंत सिंह, तरसाम सिंह, मनदीप सिंह के अनुसार, इस अनोखी परंपरा के पीछे 165 साल पुराना इतिहास है। करीब 157 वर्ष पहले वर्ष 1861 तक यहां दशमी के दिन ही दशहरा मनाया जाता था। उस समय गांव में करीब 100 परिवार रहते थे जो मुख्य रूप से पशुपालक थे। दशहरे वाले दिन गांव के करीब 400 पशु खेतों में चरते हुए रहस्यमयी तरीके से गायब हो गए। काफी खोजबीन के बाद भी वे नहीं मिले, लेकिन अगले दिन एकादशी तिथि को सभी पशु सुरक्षित वापस लौट आए। पशुओं के सही-सलामत लौटने की खुशी में ग्रामीणों ने एकादशी के दिन उत्सव मनाते हुए रावण दहन की शुरुआत की, जो आज भी कायम है। कुंभकर्ण का सीमेंट से बना गांव में यह भी गहरी धार्मिक मान्यता है कि त्रेता युग में भगवान श्री राम यहां आए थे और उन्होंने गांव के बाहर बने छप्पड़ के पास एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम किया था। श्री राम के आराम करने के बाद उस पीपल पर पतासे लगने लगे थे।इसके अलावा, गांव के चौक पर कुंभकर्ण का सीमेंट से बना 165 वर्ष पुराना बुत स्थापित है। इसका मकसद गांव के इतिहास को लोगों के समक्ष रखना और बुराई के प्रति जागरूक करना है। एक ही परिवार कर रहा निशुल्क सेवा रावण का पुतला और झांकियां तैयार करने में गांव के ही एक परिवार की 5 पीढ़ी निश्शुल्क सेवा निभा रही है। वर्तमान में सेवा संभाल रहे 25 वर्षीय कृष्ण गोपाल ने बताया कि उनके परदादा भगत पूर्ण चंद ने संतान प्राप्ति के आशीर्वाद के बाद इस परंपरा की शुरुआत की थी। उनके बाद फकीर चंद, रमेश कुमार और अब 5 पीढ़ी इस पावन परंपरा को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रही है।