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मोहन भागवत ने Gen Z प्रदर्शनों पर कहा, नीतियां जनता की राय से तय नहीं होती

नई दिल्ली  विजयादशमी के कार्यक्रम में RSS यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भारत को पड़ोसी देशों में हुईं अशांति की घटनाओं पर बात की। उन्होंने कहा कि जब सरकार लोगों और उनकी परेशानियों से दूर रहती है, तो उसके खिलाफ प्रदर्शन होते हैं। हालांकि, उन्होंने हिंसक प्रदर्शनों को गलत बताया है और कहा है कि इस तरीके से कभी किसी का फायदा नहीं हुआ। हाल ही में नेपाल में Gen Z आंदोलन हुआ, जिसमें युवाओं ने सरकार के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन किए थे। भागवत ने कहा, 'श्रीलंका में, बाद में बांग्लादेश में, बाद में नेपाल में। हमारे पड़ोसी देशों में हमने इसका अनुभव किया है। अब कभी कभी हो जाता है। प्रशासन जनता के पास नहीं रहता, संवेदनशील नहीं रहता। उनकी जनता की अवस्थाओं को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनती, तो असंतोष रहता है। परंतु उस असंतोष को इस प्रकार व्यक्त होना, किसी के लाभ की बात नहीं है।' उन्होंने कहा, '…अगर हम अभी तक का इतिहास देखेंगे तो जब से उथल पुथल वाली तथाकथित क्रांतियां आई हैं। किसी क्रांति ने अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं किया। राजा के खिलाफ फ्रांस की राज्य क्रांति हुई, उसकी परिणाम क्या हुआ? नेपोलियन बादशाह बन गया। वही राज्यतंत्र कायम है। इतनी सारी तथाकथित साम्यवादी क्रांतियां हुईं, सभी साम्यवादी देश आज पूंजीवादी तंत्र पर चल रहे हैं।' संघ प्रमुख ने कहा कि अगर देश में स्थिति खराब होती है, तो बाहर की ताकतें हावी होने की कोशिश करती हैं। उन्होंने कहा, 'ऐसे हिंसक प्रदर्शनों से उद्देश्य प्राप्त नहीं हुआ, बल्कि अराजकता की स्थिति में देश की बाहर की ताकतों को अपने खेल खेलने का मौका मिलता है। इसलिए हमारे पड़ोसी देशों में जो उथल पुथल हो रही है। ये हमारे ही जैसे हैं, ये हमसे दूर नहीं हैं। ये हमारे अपने है। उनमें इस प्रकार की अस्थिरता होना, वह आत्मीयता के संबंध के चलते चिंता का विषय है।' इस साल विजयदशमी उत्सव के अवसर पर आरएसएस अपने स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का जश्न भी मना रहा है। इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी उपस्थित थे।  

मोहन भागवत का इंदौर आगमन, 13 सितंबर को करेंगे पुस्तक विमोचन; 8 महीने में चौथा दौरा

इंदौर  RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत 13 सितंबर को इंदौर में रहेंगे। सरसंघचालक भागवत का यह इंदौर में साल का चौथा दौरा है। इस बार मोहन भागवत इंदौर में पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे हैं। भागवत 14 सितंबर रविवार शाम तक इंदौर में रहेंगे। रविवार दोपहर 3.15 बजे स्थानीय ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर में पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे। सूत्रों की माने तो मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, राज्य मंत्रिमंडल के कई सदस्य और कुछ गणमान्य लोग भी समारोह में उपस्थित रहेंगे। बता दें की पटेल ने यह पुस्तक अपनी नर्मदा परिक्रमा के दौरान लिखी थी। उन्होंने दो बार 1994 और 2007 में पैदल नर्मदा परिक्रमा की थी। संघ प्रमुख का यह चौथा दौरा संघ प्रमुख का पिछले 8 महीने में यह चौथा इंदौर का दौरा है। इससे पहले वह 3 जनवरी 2025, 13 जनवरी 2025 और 10 अगस्त 2025 में इंदौर आ चुके हैं। इस साल इन कार्यक्रम में आ चुके हैं संघ प्रमुख     डॉ. मोहन भागवत इस साल सबसे पहले 3 जनवरी को इंदौर आए थे। वह इंदौर में आरएसएस के शताब्दी कार्यक्रम स्वर शतकम में हुए शामिल थे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि हर अग्रपंक्ति में हमारा देश होना चाहिए। ऐसा भारत संघ के कार्य से खड़ा होगा और इसलिए संघ कार्य में जो करना आवश्यक होगा, वह मैं करूंगा।     दूसरी बार डॉ. भागवत इंदौर में 13 जनवरी को आए थे। इस दौरान उन्होंने इंदौर में श्री रामजन्म भूमि तीर्थ ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय को देवी अहिल्या राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। तब उन्होंने कहा था कि लोग पूछते थे कि राम मंदिर क्यों जरूरी? रोजगार, गरीबी, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं की बात क्यों नहीं करते। मैं कहता था कि रोजगार, खुशहाली का रास्ता भी राम मंदिर से होकर जाता है। हमने हमेशा समाजवाद, रोजगार, गरीबी की बात की, लेकिन क्या हुआ। हमारे साथ चले जापान-इजराइल आज कहां से कहां पहुंच गए।     तीसरी बार संघ प्रमुख 10 अगस्त यानी रक्षाबंधन के दूसरे इंदौर में आए थे। इस दौरान मोहन भागवत ने 96 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुए कैंसर केयर हॉस्पिटल का उद्घाटन किया था। तब भागवत ने सभी जाति-बिरादरी के प्रमुखों से कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने के लिए मिलकर प्रयास करने की अपील की। उन्होंने कहा देश में आज शिक्षा और स्वास्थ्य आम लोगों की पहुंच से बाहर हो गए हैं। इन दोनों ही सेवाओं को कमर्शियल बना दिया गया है।

महाकुंभ में अनुपस्थित रहने पर मोहन भागवत का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली साल की शुरुआत में प्रयागराज में आयोजित हुए महाकुंभ में करोड़ों भक्तों ने संगम में स्नान किया। इसमें राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शामिल थे, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत महाकुंभ में स्नान के लिए नहीं पहुंचे। ऐसे में उस समय लोगों ने सवाल भी किया कि आखिर मोहन भागवत महाकुंभ क्यों नहीं गए। अब आरएसएस चीफ भागवत ने खुद इसकी वजह बताई है। उन्होंने कहा है कि हम लोगों को जहां बताया जाता है, वहां जाते हैं। हमें बताया गया था कि वहां बहुत भीड़ होगी। वहां संघ के लोग थे और कोलकाता में संगम का जल मंगवाकर स्नान किया था। आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर दिल्ली के विज्ञान भवन में तीन दिवसीय कार्यक्रम के अंतिम दिन मोहन भागवत से सवाल किया गया, ''पूरा भारत कुंभ में उमड़ा, लेकिन आप इससे दूर रहे, ऐसा क्यों?'' इस पर भागवत ने कहा, ''ऐसा इसलिए, क्योंकि हम लोगों को जहां बताया जाता है, वहां जाते हैं। मैं यहां इसलिए हूं और आपसे बात कर रहा हूं, क्योंकि हमारे लोगों ने तय किया कि यहां कार्यक्रम होना है और आपको बोलना है। मैंने यह भी कहा कि पिछली बार मैंने बोला था तो किसी अन्य लोगों से कहो। लेकिन वे नहीं माने तो मुझे करना पड़ा। ऐसे ही कुंभ में मैंने डेट निकाली थी आने की। वहां हमारे सभी अधिकारी गए थे। वहां संघ था, लेकिन मैं नहीं था। क्योंकि हमको बताया गया कि उस समय बहुत भीड़ रहेगी।'' उन्होंने आगे कहा, ''अन्य कार्यक्रम जो आगे-पीछे तारीख में हैं, उसमें डिस्टर्ब हो सकता है, आप मत आइए। मैंने कहा कि पुण्य सबलोग ले रहे हैं, मुझे आप वंचित कर रहे हो। कम से कम मुझे पानी भेज दो कोलकाता में। ऐसे में कृष्णगोपाल जी ने मेरे लिए कुंभ का जल भेजा और मौनी अमावस्या के दिन उस जल से स्नान किया। संघ अगर कहेगा कि नर्क में जाओगे तो मैं जाऊंगा।'' बता दें कि इस साल जनवरी-फरवरी में यूपी के प्रयागराज में संगम के तट पर महाकुंभ आयोजित किया गया था। यूपी सरकार न दावा किया था कि इसमें देश-दुनिया से 66 करोड़ से ज्यादा भक्तों ने पवित्र संगम के जल से स्नान किया था।  

मोहन भागवत का बड़ा बयान: हिंदू राष्ट्र सत्ता की राजनीति से अलग

नई दिल्ली ऐसे समय में जब देश में हिंदू राजनीति अपने चरमोत्कर्ष की ओर जा रही हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का मंगलवार को दिया गया भाषण महत्वपूर्ण हो जाता है. भागवत कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र शब्द का सत्ता से कोई मतलब नहीं है. भाजपा सरकार पर विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि वह इस विचारधारा को सत्ता पाने और उसमें बने रहने के औजार के रूप में इस्तेमाल करती है. आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि संघ बीजेपी को समय समय पर बौद्धिक खुराक देता रहा है. अपने तमाम मतभेदों के बावजूद संघ और बीजेपी एक बिंदु पर जाकर एक हो जाते हैं. जाहिर है कि भागवत का कथन सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि संघ की मूल वैचारिक धारा को तो व्यक्त करता ही है देश में सत्तासीन बीजेपी सरकार के लिए एक दिशा का निर्धारण भी करता है. पर सवाल यह है कि संघ प्रमुख के इस बयान के मायने क्या हैं?  क्या यह सीधे -सीधे बीजेपी नेताओं को संदेश देता है? राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश भागवत का यह ताज़ा बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्ष भाजपा पर लगातार यह आरोप लगा रहा है कि वह बहुसंख्यकवाद और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है. भाजपा लगातार दूसरी बार केंद्र में सत्तासीन है और कई राज्यों में भी उसके हाथ में ताकत है. ऐसे में संघ प्रमुख का यह कहना कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ सत्ता से नहीं है, एक राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है. इसके साथ ही इस तरह भी देखा जा सकता है कि संघ अब बीजेपी को हिंदू राष्ट्र के मुद्दे को थोड़ा नरम करके चलने का संकेत देना चाहता हो. आरएसएस अपनी स्थापना के शुरुआती दिनों से ही हिंदू राष्ट्र की बात पर मुखर रहा है. गोलवलकर, जिन्हें गुरुजी कहा जाता है ने इसे परिभाषित करते हुए कहा था कि भारत की आत्मा हिंदू है और यहां की संस्कृति की जड़ें हिंदुत्व से निकली हैं. संघ का शुरू से ही मानना रहा है कि हिंदू शब्द सिर्फ धार्मिक नहीं है. इसमें सभ्यता, परंपरा, जीवनशैली और सामाजिक मूल्य सभी शामिल हैं. यही कारण है कि संघ हमेशा कहता रहा कि मुसलमान, ईसाई, पारसी या अन्य धार्मिक समूह भी इस राष्ट्र के उतने ही हिस्से हैं, जितने हिंदू.  संघ अपनी पुरानी लाइन पर] बीजेपी के लिए इस बयान की टाइमिंग महत्वपूर्ण इसलिए यह बिल्कुल सीधा और साफ है कि भागवत का बयान संघ की पुरानी लाइन को ही दोहराता हैृ.चूंकि आरएसएस सीधे सत्ता की राजनीति में शामिल नहीं होता.  संघ की असली ताकत समाज-निर्माण, शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक कार्य में है. इसलिए संघ प्रमुख के इस बात में कुछ भी नया नहीं है कि हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य संसद में बहुमत पाना नहीं है, बल्कि समाज को ऐसा बनाना है जिसमें नैतिकता, समरसता और सांस्कृतिक एकता हो. हां लेकिन उनकी इस बात की टाइमिंग महत्वपूर्ण है. यह हो सकता है कि संघ प्रमुख बीजेपी के लिए कोई सीमा रेखा खींच रहे हैं या अल्पसंख्यकों को कोई संदेश दे रहे हों. अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर बीजेपी से नरम रुख चाहता है संघ दरअसल भारत में हिंदू राष्ट्र का सीधा संबंध अक्सर मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना से लिया जाता है. विपक्ष इसे बहुसंख्यकवादी एजेंडा मानता है. यही कारण रहा है कि कांग्रेस नेताओं के मुंह से बीजेपी के बजाय आरएसएस के लिए ज्यादा अपशब्द निकलता रहा है. शायद यही कारण है कि भागवत कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र का सत्ता से कोई संबंध नहीं है तो यह संदेश जाता है कि संघ का उद्देश्य किसी पर वर्चस्व थोपना नहीं है. बल्कि यह अवधारणा सबको साथ लेकर चलने वाली सांस्कृतिक पहचान की है. जरूरी बात यह है कि संघ यह बात बार-बार क्यों दुहरा रहा है. कहीं यह बीजेपी को अगले विधानसभा चुनावों के लिए इशारा तो नहीं है  . क्योंकि भारतीय जनता पार्टी बिहार और बंगाल विधानसभा चुनावों में डेमोग्रेफी चेंज और मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर अल्पसंख्यकों पर लगातार जुबानी हमले कर रही है. हो सकता है कि संघ यह चाहता हो कि बीजेपी को अपने रुख में थोड़ी नरमी लानी चाहिए. बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों पर भी फोकस जरूरी भागवत का बयान भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से यह याद दिलाता है कि संघ की दृष्टि सत्ता से आगे है. भाजपा हिंदू राष्ट्र को राजनीतिक नारे के रूप में इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिए कर सकती है. भागवत का यह बयान केवल वैचारिक नहीं बल्कि जमीनी राजनीति से भी जुड़ा हो सकता है .क्योंकि बार-बार यह सवाल उठ रहा है कि देश में बेरोजगारी, किसान संकट जैसे मुद्दे हिंदू-मुसलमान की राजनीति के चलते गौण हो गए हैं. संघ शायद यह संदेश देना चाहता है कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ इन समस्याओं से मुंह मोड़ना नहीं बल्कि इन्हें समाज-आधारित समाधान देना है. भागवत के इस उपदेश का भविष्य में ये असर हो सकता है. -भाजपा-विरोधी दलों का आरोप कमजोर हो सकता है कि हिंदू राष्ट्र सिर्फ सत्ता हथियाने का औजार है. -भाजपा को अपनी भाषा और नीतियों में “समावेशिता” दिखानी पड़ सकती है. -अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह संदेश भी जाएगा कि भारत का राष्ट्रवाद अधिनायकवादी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और समावेशी है. -भागवत का कहना है कि स्वाभाविक धर्म समन्वय है संघर्ष नहीं है. इससे कम से कम हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन धर्म में तो समन्वय दिखाई ही देगा. राष्ट्रवादी मुसलमानों में भी हिंदू धर्म के साथ समन्वयव की उम्मीद जगेगी.