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अमेरिकी प्रतिबंधों की आहट, चाबहार प्रोजेक्ट पर भारत के विकल्पों पर मंथन

नई दिल्ली   ईरान के चाबहार पोर्ट और रूस से तेल आयात को लेकर भारत जटिल कूटनीतिक स्थिति का सामना कर रहा है। अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों की समयसीमा समाप्त होने के करीब है, जिससे भारत के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि वह अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों को कैसे सुरक्षित रखे। अगर पाबंदियों में छूट नहीं मिलती है तो चाबहार परियोजना में भारत की भूमिका प्रभावित हो सकती है, जो क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए बेहद अहम मानी जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत चाबहार पोर्ट में अपनी भागीदारी को लेकर कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। इनमें अस्थायी रूप से संचालन अधिकार किसी तीसरे पक्ष को सौंपना या निवेश ढांचे में बदलाव करना शामिल हो सकता है, ताकि अमेरिकी प्रतिबंधों से सीधे टकराव से बचा जा सके। हालांकि, यह भी साफ किया गया है कि भारत इस प्रोजेक्ट से पूरी तरह बाहर निकलने का इरादा नहीं रखता, बल्कि किसी भी तरह अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखना चाहता है। चाबहार पोर्ट भारत के लिए कितना अहम चाबहार पोर्ट भारत के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि यह उसे पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच मुहैया कराता है। यह बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक प्रमुख हिस्सा माना जाता है, जो भारत के व्यापारिक विस्तार और भू-राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने में मदद करता है। ऐसे में इस परियोजना से दूरी बनाना भारत के दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचा सकता है और क्षेत्र में उसकी भूमिका कमजोर कर सकता है। जानकारों का कहना है कि भारत को अमेरिकी दबाव में आकर चाबहार प्रोजेक्ट से बाहर नहीं निकलना चाहिए। नई दिल्ली की विदेश नीति हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रही है और उसे अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने चाहिए। अगर भारत इस परियोजना से पीछे हटता है, तो इससे न केवल उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होगी बल्कि क्षेत्रीय साझेदारों के साथ उसके संबंध भी कमजोर हो सकते हैं। रूस से तेल की खरीद कितनी जरूरी इसी तरह रूस से तेल खरीद का मुद्दा भी भारत के लिए बेहद अहम है। रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में बड़ी भूमिका निभा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से तेल खरीद कम करता है, तो इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अस्थिर बनी हुई हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अमेरिका, ईरान और रूस के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी अहम है, वहीं दूसरी ओर ईरान और रूस के साथ आर्थिक व भू-राजनीतिक संबंध भी उतने ही जरूरी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को संतुलित और स्वतंत्र नीति अपनाते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए, ताकि वह बदलते वैश्विक हालात में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रख सके।

रूस के तेल पर भारत का बड़ा खेल, जंग के दौरान चीन को मिला तगड़ा झटका

नई दिल्‍ली ईरान और अमेरिका के बीच जंग से होर्मुज स्‍ट्रेट से तेल-गैस की सप्‍लाई बाधित हुई तो भारत ने रूसी तेल के आयात में जबरदस्‍त इजाफा किया है. भारत ने मार्च में रूस से कच्चे तेल की खरीद में भारी बढ़ोतरी दर्ज की. टाइम्‍स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने फरवरी की तुलना में मार्च में 90 फीसदी ज्‍यादा तेल का आयात किया है।  वहीं वेस्‍ट एशिया में चल रहे वॉर के कारण देश के कुल कच्चे तेल की खपत में लगभग 15% की गिरावट आई. ब्‍लूबर्ग की रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि जंग के कारण होमुर्ज बंद होने से भारत पर तेल-गैस की सप्‍लाई प्रभावित हुई है, जिस कारण पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के आयात में 40% की गिरावट आई. साथ ही नेचुरल गैस की सप्‍लाई भी बाधित हुई है।  इस कारण भारत को दूसरे विकल्‍प की तलाश करनी पड़ी और यही कारण रहा कि भारत ने रूसी तेल की जबरदस्‍त खरीद की. रिपोर्ट यह भी कहती है कि यह उछाल अमेरिका के 30 दिनों की छूट के बाद आई है. हालांकि रूस के अलावा भारत ने कुछ और देशों से तेल का आयात बढ़ाया है।  रूस के साथ इन देशों से भी तेल का आयात  इसमें अंगोला, गैबॉन, घाना और कांगो जैसे अफ्रीकी देश शामिल हैं, जहां से भातर की ओर कच्‍चे तेल की खेप भरकर आ रही है, लेकिन यह रूसी तेल की तुलना में कम है. केप्‍लर के अनुसार, मिडिल ईस्‍ट सप्‍लायर द्वारा होर्मुज को बाईपास करने वाली पाइपलाइनों के माध्यम से आपूर्ति को फिर से शुरू करने से कुछ राहत मिली, जिसमें सऊदी और यूएई की पाइपलाइन शामिल हैं.  इन वैकल्पिक मार्गों ने समुद्री बाधाओं के बावजूद आंशिक आपूर्ति बनाए रखने में मदद की।  ईरान और वेनेजुएला से भी तेल सप्‍लाई  छूट के कारण अप्रैल तक भारत रूसी तेल की खरीद तो कर सकता है, जिससे भारत के पास पर्याप्‍त स्‍टॉक हो सकता है. हालांकि इसके साथ ही भारत के पास वेनेजुएला और ईरान के तेल का ऑप्‍शन भी खुला हुआ है. ईरान से भारत ने कुछ तेल का आयात किया है, जो आगे भी जारी रह सकता है।  कहां से पूरी हो रही गैस की सप्‍लाई  रूस के साथ ही भारत की गैस सप्‍लाई अमेरिका, ओमान, अंगोला और नाइजीरिया से हो रही है, क्‍योंकि कतर से एलएनज आयात में 92 फीसदी की गिरावट आई है. भारत कतर से सबसे ज्‍यादा गैस का आयात करता था, लेकिन अब सप्‍लाई बाधित होने से भारत ने अपने पोर्टफोलियो को बढ़ाया है।  चीन को झटका इधर, भारत द्वारा रूसी तेल के आयात में इजाफा किए जाने के कारण चीन को झटका लगा है. कुछ रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन द्वारा रूसी तेल आयात में कमी देखी गई है, लेकिन यह बहुत बड़ी गिरावट नहीं है. जनवरी फरवरी में चीन ने रूस से ज्‍यादा तेल आयात किया था, लेकिन मार्च में इसमें 5 फीसदी से ज्‍यादा की गिरावट आई है।