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केजीएमयू की बड़ी सफलता: जटिल सर्जरी में मासूम बच्चे को मिली नई जिंदगी

लखनऊ  किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के चिकित्सकों ने एक बार फिर अपनी विशेषज्ञता का लोहा मनवाया है। विभाग के डॉक्टरों ने महज 10 किलोग्राम वजन के एक छोटे बच्चे के शरीर से डेढ़ किलोग्राम का विशाल ट्यूमर सफलतापूर्वक निकालकर उसे नई जिंदगी दी है। यह ऑपरेशन अत्यंत जटिल और जोखिम भरा था, क्योंकि बच्चे के कुल वजन का लगभग पंद्रह प्रतिशत हिस्सा अकेले ट्यूमर का था। ऐसे में सर्जरी के दौरान हर पल सतर्कता बरतना अनिवार्य था। ऑपरेशन की टीम पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. जेडी रावत के नेतृत्व में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने यह सर्जरी बड़ी कुशलता और धैर्य के साथ संपन्न किया। ऑपरेशन में सीनियर रेजिडेंट डॉ. श्रेया श्रीवास्तव, डॉ. मानिष राजपूत तथा अन्य चिकित्सकों व नर्सिंग स्टाफ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सहायक नर्सिंग सुपरिटेंडेंट सुधा सिंह सहित पूरी टीम ने ऑपरेशन को सफल बनाने में अथक परिश्रम किया। बच्चे की सेहत सर्जरी के बाद बच्चे की सेहत में लगातार सुधार हो रहा है और वह खतरे से बाहर है। बच्चे की मां ने डॉक्टरों की टीम के प्रति आभार जताते हुए कहा कि उनके बेटे को नई जिंदगी मिली है। केजीएमयू प्रशासन ने भी पीडियाट्रिक सर्जरी टीम की इस उपलब्धि की सराहना की है और इसे संस्थान के लिए गौरव का क्षण बताया है।

12 घंटे की जटिल सर्जरी के बाद दोनों हाथ प्रत्यारोपण सफल

नई दिल्ली दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में एक ऐसी सर्जरी हुई है, जिसने एक महिला की जिंदगी बदल दी. दो बच्चों की मां जिसने एक हादसे में अपने दोनों हाथ खो दिए थे, अब फिर से सामान्य जीवन की ओर लौटने की उम्मीद कर रही है. अस्पताल के डॉक्टरों ने उसका सफलतापूर्वक दोनों हाथों का ट्रांसप्लांट किया है. जानकारी के मुताबिक, महिला के दोनों हाथ चारा काटने वाली मशीन में कट गए थे. इस हादसे के बाद वह अपने रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी खुद नहीं कर पाती थी. खाना खाना, कपड़े पहनना, बच्चों की देखभाल करना, हर काम के लिए उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था. ऐसे में हाथों का ट्रांसप्लांट उसके लिए नई जिंदगी जैसा साबित हुआ. ब्रेन-डेड व्यक्ति था डोनर यह सर्जरी तब संभव हो सकी जब एक ब्रेन-डेड व्यक्ति के परिवार ने उसके हाथ दान करने की सहमति दी. उनके इस फैसले ने एक जरूरतमंद महिला को फिर से जीने का मौका दिया. अस्पताल ने इस परिवार के प्रति आभार जताया और इसे इंसानियत की मिसाल बताया. 12 घंटे तक चली सर्जरी डॉक्टरों के अनुसार, यह सर्जरी करीब 12 घंटे तक चली. इसमें डोनर के दोनों हाथ महिला के शरीर से जोड़े गए. दाहिना हाथ कोहनी के ऊपर से और बायां हाथ कलाई के पास से जोड़ा गया. डॉक्टरों ने हड्डियां, नसें, मांसपेशियां, खून की नलियां और टेंडन बहुत सावधानी से जोड़े, ताकि हाथों में फिर से ब्लड सर्कुलेशन और हरकत आ सके. अस्पताल के विशेषज्ञों ने बताया कि यह बेहद कठिन और संवेदनशील प्रक्रिया होती है, जिसमें हर मिनट की अहमियत होती है. अगर समय पर सही तरीके से काम न हो, तो ट्रांसप्लांट किए गए अंग को बचाना मुश्किल हो सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि सर्जरी सफल होने के बाद भी असली सफर अब शुरू हुआ है. महिला को लंबे समय तक दवाएं लेनी होंगी ताकि शरीर नए हाथों को स्वीकार कर सके. इसके साथ ही उसे नियमित फिजियोथेरेपी और अभ्यास की जरूरत होगी, जिससे वह धीरे-धीरे हाथों का इस्तेमाल सीख सके. यह अस्पताल में किया गया दूसरा ऐसा ट्रांसप्लांट है. इस पूरी प्रक्रिया में प्लास्टिक सर्जरी, हड्डी रोग, एनेस्थीसिया, न्यूरोलॉजी, फिजियोथेरेपी और कई अन्य विभागों के डॉक्टर शामिल थे.