samacharsecretary.com

यूपी पंचायत चुनाव से पहले बड़ा अपडेट, अंतिम मतदाता सूची में 40 लाख नाम हटाए गए

लखनऊ  यूपी पंचायत चुनाव के करोड़ों वोटर्स के लिए अच्छी खबर है. उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची 10 जून को जारी हो गई है. जिला स्तर पर ये अंतिम मतदाता सूची जारी की गई है. प्रत्येक पंचायत मतदाताओं को 9 अंक का पहचान नंबर दिया गया है. दावे-आपत्तियों के निस्तारण और सत्यापन के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी की गई है. राज्य निर्वाचन आयोग ने 18 दिसंबर 2025 को अनंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की थी।  इसके अलावा, अप्रैल और मई माह के दौरान मतदाता सूची में दर्ज डुप्लीकेट नामों के सत्यापन का विशेष अभियान भी चलाया गया, जिसकी प्रक्रिया अब पूरी हो चुकी है। आयोग के अधिकारियों के अनुसार सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद बुधवार को अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया जाएगा। पहली बार आयोग पंचायत चुनाव में तकनीकी का भरपूर प्रयोग करेगा। सभी मतदाताओं को स्टेट वोटर नंबर जारी किए गए हैं। मतदाताओं का फोटो सहित ब्योरा आनलाइन उपलब्ध रहेगा। कोई भी व्यक्ति दो बार वोट नहीं डाल सकेगा। मोबाइल एप की मदद से मतदाता की पोलिंग बूथ पर फोटो खींचते ही यह पता चल जाएगा कि इसने पहले वोट डाल दिया है। फाइनल वोटर लिस्ट में करीब 1.81 करोड़ नए मतदाता जोड़े गए हैं. मतदाता सूची से करीब 1.41 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं. पंचायत चुनाव मतदाता सूची में करीब 40.19 लाख वोटर्स की बढ़ोतरी हुई है. अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद पंचायत चुनाव गतिविधियां तेज हो सकती हैं।  गौरतलब है कि इससे पहले अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तारीख में पांच बार बदलाव किया जा चुका है। आज देर शाम तक इस सूची को राज्य निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर पूरी तरह अपलोड कर दिया जाएगा। ​डिजिटल तकनीक से लैस होगा इस बार का चुनाव ​राज्य निर्वाचन आयोग इस बार पंचायत चुनाव में बड़े स्तर पर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने जा रहा है। चुनाव को पूरी तरह पारदर्शी और फर्जी वोटिंग से मुक्त बनाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं:     ​स्टेट वोटर नंबर: इस बार पहली बार सभी मतदाताओं को एक यूनिक 'स्टेट वोटर नंबर' जारी किया जा रहा है।     ​ऑनलाइन फोटो ब्योरा: सभी मतदाताओं का पूरा विवरण फोटो सहित ऑनलाइन उपलब्ध रहेगा।     ​फर्जी वोटिंग पर लगाम: कोई भी व्यक्ति दो बार वोट न डाल सके, इसके लिए विशेष मोबाइल ऐप का इस्तेमाल किया जाएगा। मतदान केंद्र पर वोटर की फोटो खींचते ही ऐप तुरंत बता देगा कि इस व्यक्ति ने पहले कहीं वोट डाला है या नहीं। ​वोटर लिस्ट का गणित: 40 लाख से अधिक बढ़े मतदाता ​23 दिसंबर 2025 को जारी की गई अनंतिम (provisional) मतदाता सूची के अनुसार, इस बार मतदाताओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। ​वर्ष 2021 की मतदाता सूची में कुल 12.29 करोड़ मतदाता थे, जबकि इस बार की अनंतिम सूची में यह संख्या बढ़कर 12.69 करोड़ हो गई है। इस प्रकार पिछले चुनाव की तुलना में 40.19 लाख नए मतदाता बढ़े हैं। इस सूची को तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर फेरबदल किया गया था, जिसमें 1.81 करोड़ नए नाम जोड़े गए, 1.41 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से काटे गए और लगभग 21.08 लाख मतदाताओं के नामों में संशोधन किया गया। ​कहाँ और कैसे देख सकेंगे फाइनल वोटर लिस्ट? ​अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद ग्रामीण क्षेत्र के नागरिक अपना और अपने परिवार का नाम नीचे दिए गए तरीकों से चेक कर सकते हैं:     ​आधिकारिक वेबसाइट: मतदाता राज्य निर्वाचन आयोग (State Election Commission, UP) की ऑफिशियल वेबसाइट sec.up.nic.in पर जाकर 'Search Voter' या 'Voter List Download' के विकल्प पर क्लिक कर अपना नाम देख सकते हैं।     ​जिला/ब्लॉक मुख्यालय: इसके अलावा यह सूची जिला निर्वाचन कार्यालय, विकास खंड (ब्लॉक) कार्यालय और ग्राम पंचायत स्तर पर भी उपलब्ध रहेगी, जहाँ जाकर ग्रामीण अपनी सूची देख सकते हैं। ​ग्राम प्रधानों (प्रशासकों) के लिए जारी हुई नई गाइडलाइन ​यूपी के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब पंचायत चुनाव समय पर न हो पाने के कारण 57,694 निवर्तमान ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 27 मई से प्रशासक के रूप में कार्यभार संभालने के बाद अब उनके लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं: ​नए कार्यों के लिए लेनी होगी DM की मंजूरी: प्रशासक बने पूर्व प्रधान अब अपनी मर्जी से कोई भी नया विकास कार्य शुरू नहीं करा सकेंगे। नया काम कराने के लिए उन्हें जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) के माध्यम से जिलाधिकारी (DM) को प्रस्ताव भेजना होगा। DM की अनुमति के बाद ही नया काम शुरू हो सकेगा। ​हालांकि, जो कार्य 27 मई से पहले स्वीकृत और अनुमोदित हो चुके हैं, जो निर्माण या मरम्मत कार्य वर्तमान में चल रहे हैं, अथवा जो पूरे हो चुके हैं, उनका भौतिक और तकनीकी मूल्यांकन कराकर प्रशासक पहले की तरह ही भुगतान कर सकेंगे। इसके लिए उन्हें नई अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।  

ओबीसी आरक्षण के लिए बनेगा समर्पित आयोग, पंचायत चुनाव में अब वैज्ञानिक तरीके से तय होगा कोटा

लखनऊ उत्तर प्रदेश पंचायत चुनावों को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव होने जा रहा है। राज्य में पहली बार ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 'ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले' (Triple Test Formula) के तहत तय किया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार द्वारा एक 'समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग' का गठन किया जा रहा है। सोमवार को कैबिनेट ने आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। 2021 के पंचायत चुनावों में केवल रैपिड सर्वे के आधार पर ही आरक्षण की सीटें तय कर दी गई थीं, लेकिन इस बार प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक, अनुभवजन्य और विधिक होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2023 के नगर निकाय चुनावों में पहली बार इस फॉर्मूले को आजमाया था, और अब इसे पंचायत चुनावों में भी पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। क्या है ‘ट्रिपल टेस्ट फार्मूला’ ट्रिपल टेस्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित किया गया एक कड़ा विधिक पैमाना है। शीर्ष अदालत ने पहली बार साल 2010 में 'के. कृष्णमूर्ति बनाम भारत संघ' मामले में और बाद में साल 2021 में 'विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में इस फॉर्मूले को स्थानीय निकाय चुनावों के लिए अनिवार्य किया था। इसके तहत राज्य सरकार को आरक्षण लागू करने से पहले तीन मुख्य शर्तों (तीन टेस्ट) को अनिवार्य रूप से पार करना होता है। 1. पहला टेस्ट: समर्पित आयोग का गठन इसके तहत राज्य सरकार को एक विशेष और समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना होता है। इस आयोग का मुख्य काम स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति, प्रभाव और उसकी स्थिति की समकालीन व गहन अनुभवजन्य (Empirical) जांच और अध्ययन करना है। 2. दूसरा टेस्ट: आरक्षण का सटीक अनुपात तय करना आयोग द्वारा जुटाए गए जमीनी और अनुभवजन्य आंकड़ों (Empirical Data) के आधार पर ही स्थानीय निकायवार (Local Body-wise) ओबीसी वर्ग के लिए सीटों के आरक्षण का सटीक प्रतिशत तय किया जाना चाहिए। अदालत के नियमों के मुताबिक, यह आरक्षण बिना किसी वैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन के नहीं दिया जा सकता। 3. तीसरा टेस्ट: 50% की अधिकतम सीमा यह इस फॉर्मूले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके तहत यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि किसी भी स्थानीय निकाय (जैसे कोई ग्राम पंचायत या जिला पंचायत) में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिलाकर दिया जाने वाला कुल आरक्षण किसी भी परिस्थिति में कुल सीटों के 50% से अधिक न हो। आखिर क्यों पड़ी इस कड़े फॉर्मूले की जरूरत? सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि नौकरियों और शिक्षा में मिलने वाला आरक्षण (संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत) और राजनीति या स्थानीय निकाय चुनावों में मिलने वाला प्रतिनिधित्व (अनुच्छेद 243D और 243T के तहत) दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं। राजनीतिक पिछड़ेपन को साबित करने के लिए सरकार के पास पुख्ता और समकालीन आंकड़े होने जरूरी हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि आरक्षण का वास्तविक लाभ धरातल पर मौजूद जरूरतमंदों तक पहुंचे और पूरी चुनावी प्रक्रिया संवैधानिक रूप से वैध रहे नियम यह भी है कि यदि कोई राज्य सरकार इन तीनों शर्तों (ट्रिपल टेस्ट) को पूरा किए बिना या आयोग की रिपोर्ट के बिना चुनाव कराती है, तो उन ओबीसी सीटों को 'सामान्य श्रेणी' (General Category) की सीट मानकर ही चुनाव कराना होगा। यही वजह है कि यूपी सरकार अब पूरी विधिक तैयारी के साथ कदम आगे बढ़ा रही है। जून के पहले हफ्ते तक हो जाएगी आयोग में नियुक्तियां शासन स्तर से मिली जानकारी के अनुसार, समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल 6 महीने का तय किया गया है। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया इस महीने (मई) के अंत तक या जून के प्रथम सप्ताह में पूरी होने की उम्मीद है। यह आयोग जमीनी स्तर पर जाकर पिछड़पेपन की प्रकृति, उसके प्रभावों की समकालीन व सतत जांच करेगा। जिन क्षेत्रों में पिछड़ा वर्ग के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, वहां नए सिरे से सर्वे कराया जाएगा और उसी के आधार पर आरक्षण की रूपरेखा तैयार होगी।

पंचायत चुनाव से पहले OBC आरक्षण पर होगा ट्रिपल टेस्ट, आयोग गठन की तैयारी तेज

लखनऊ यूपी में पंचायत चुनाव समय पर न होने से ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को खत्म हो जाएगा। ऐसे में प्रशासक समिति के माध्यम से ग्राम प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। पंचायती राज विभाग की ओर से शासन को प्रशासक समिति के माध्यम से पंचायत प्रतिनिधियों को ही बागडोर सौंपने का प्रस्ताव भेजा गया है। ग्राम प्रधान के साथ ही ब्लॉक प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल भी प्रशासक समिति के माध्यम से बढ़ाया जाएगा। प्रधानों और अध्यक्षों कार्यकाल बढ़ाकर भाजपा सरकार की कोशिश उनकी हमदर्दी हासिल करने की है। माना जा रहा है कि अब पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही होंगे। ऐसे में कार्यकाल बढ़ाए गए प्रधान और अध्यक्ष विधानसभा चुनाव में भाजपा के काम आ सकते हैं। हालांकि प्रधानी की तैयारी में लगे लोगों को इस फैसले से झटका भी लगेगा। ऐसे में यह लोग नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। पहली बार ट्रिपल टेस्ट से ओबीसी आरक्षण होगा तय वहीं, पंचायत चुनावों में पहली बार समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग गठित कर ट्रिपल टेस्ट के आधार पर ओबीसी का आरक्षण तय किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वर्ष 2023 में नगर निकाय चुनावों में पहली बार इसे लागू कर आयोग गठित किया गया था। वर्ष 2021 के पंचायत चुनाव में रैपिड सर्वे से आरक्षण तय किया गया था। समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल छह महीने का तय किया गया है। अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया इस महीने के अंत तक या जून के प्रथम सप्ताह में होने की उम्मीद है। यह आयोग पिछड़नेपन की प्रकृति व प्रभावों की समकालीन, सतत व अनुभवजन्य जांच और अध्ययन, पिछड़ा वर्ग के आंकड़े न होने पर सर्वे और फिर आरक्षण तय करेगा। वर्ष 2021 में पंचायत चुनाव रैपिड सर्वे से हुआ था और वर्ष 2015 के ओबीसी आंकड़े भी रखे गए थे। क्योंकि उत्तराखंड, मध्य प्रदेश व राजस्थान की तर्ज पर यूपी में भी पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल बढ़ाने की मांग जोर-शोर से उठाई जा रही है। वर्ष 2021 में पंचायत चुनाव चार चरणों में अप्रैल-मई में हुए थे। दूसरी ओर अब राज्य निर्वाचन आयोग भी अपना काम तेजी से करेगा। लगातार पांचवीं बार अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तारीख बढ़ाकर 10 जून की गई है। अब 10 जून को पंचायत चुनाव की अंतिम मतदाता सूची जारी होने की उम्मीदें हैं। विस चुनाव से पहले पंचायत चुनाव की संभावना कम विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव होना आसान नहीं होगा। क्योंकि समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का कार्यकाल जून से अगर शुरू हुआ तो यह नवंबर तक रहेगा। वहीं आयोग ने रिपोर्ट देने में समय लगाया तो शासन इसका कार्यकाल बढ़ा सकता है। फिलहाल, सत्तापक्ष ही नहीं विपक्षी दल भी पंचायत चुनाव समय पर कराए जाने को लेकर शांत हैं। ऐसे में ज्यादा उम्मीदें विधानसभा चुनाव के बाद हों। मामला न्यायालय में विचाराधीन है, ऐसे में वहां से जो दिशा-निर्देश मिलेंगे उसका सरकार पालन करेगी।

चारबाग-वसंतकुंज मेट्रो से लेकर पंचायत चुनाव तक, योगी कैबिनेट में कई बड़े फैसले आज

लखनऊ उत्तर प्रदेश में  गांव-गांव एक ही बात की चर्चा है कि पंचायत चुनाव कब होंगे? ग्राम प्रधान, बीडीसी और जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में हो रही देरी की सबसे बड़ी वजह यूपी में समर्पित ओबीसी आयोग का न होना है. हाईकोर्ट के सख्त तेवर अपनाए जाने के बाद यूपी की योगी सरकार इस दिशा में अपने कदम बढ़ा सकती है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता सोमवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी मिल सकती है? यूपी पंचायत चुनाव को लेकर सस्पेंस बना हुआ, लेकिन अब तस्वीर साफ होती दिख रही है. पंचायत चुनाव में पिछड़ा वर्ग का आरक्षण तय करने के लिए ओबीसी आयोग के गठन पर कैबिनेट में मोहर लग सकती है. इसके साथ ही एक दर्जन से ज्यादा प्रस्ताव को मंजूरी देने का प्रस्ताव है.   यूपी में मौजूदा ओबीसी आयोग का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो गया था, जिसे सरकार ने अक्टूबर 2026 तक के लिए बढ़ा तो दिया है, लेकिन कानूनी रूप से उसके पास समर्पित आयोग के अधिकार नहीं हैं. ओबीसी आयोग अपने तीन साल के मूल कार्यकाल के रहते हुए ही आरक्षण का सर्वे कर सकता है. इसीलिए योगी सरकार सोमवार को कैबिनेट बैठक में ओबीसी आयोग गठन को अमलीजामा पहना सकती है. ओबीसी आयोग गठन को मिलेगी मंजूरी? वैश्विक संकट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मितव्ययता की अपील के बाद सोमवार को पहली कैबिनेट बैठक होगी. इस लिहाज से इसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है. सूबे में पंचायत चुनाव पर छाए सियासी बादल कैबिनेट की बैठक में छंटती हुई दिख सकती हैय कैबिनेट बैठक में ग्राम पंचायतों, ब्लॉक और जिला पंचायतों के निर्वाचन में पिछड़ा वर्ग का आरक्षण तय करने के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन को मंजूरी दे सकती है. ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत चुनावों में पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का स्वरूप तय होगा. सूबे में समर्पित ओबीसी आयोग नहीं होने के चलते पंचायत चुनाव के आरक्षण की प्रक्रिया लटकी हुई है. हाईकोर्ट ने सख्त तेवर अपनाते हुए कहा था कि ओबीसी आयोग में क्यों देरी हो रही है, जिसके बाद ही समर्पित ओबीसी आयोग गठन को कैबिनेट में मंजबूरी देने ही. यूपी में नए ओबीसी आयोग के बाद ही ओबीसी की आबादी का सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का आकलन का सर्वे करेगी. ओबीसी आयोग के सर्वे के आधार पर यह तय होगा कि पंचायतों में ओबीसी आरक्षण कितने प्रतिशत और किन सीटों पर लागू होगा.ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण पहले से ही निर्धारित है. इसके अलावा कौन सीट आरक्षित करनी है और कौन नहीं? चारबाग से वसंतकुंज तक मेट्रो को मंजूरी? योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में होने वाली कैबिनेट बैठक में लखनऊ मेट्रो से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला हो सकता है.मेट्रो परियोजना में पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर (चारबाग से वसंतकुंज) के लिए समझौता ज्ञापन को मंजूरी दी जा सकती है. इसके अलावा आगरा मेट्रो के कॉरिडोर-2 (आगरा कैंट से कालिंदी विहार) में मेट्रो स्टेशन एवं वायडक्ट सेक्शन के निर्माण के लिए भूमि के हस्तांतरण के प्रस्ताव पर भी कैबिनेट विचार कर सकती है. कैबिनेट बैठक में क्या-क्या होंगे फैसले लोक सेवा आयोग के कृत्यों के परिसीमन में बदलाव करने के लिए संशोधन प्रस्ताव भी कैबिनेट के सामने विचार के लिए रखा जाएगा. ग्राम्य विकास विभाग और एचसीएल फाउंडेशन के साथ चल रही समुदाय परियोजना को पांच साल के लिए और बढ़ाया जाएगा. परियोजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और बुनियादी ढांचे का विकास किया जा रहा है. वस्त्रोद्योग को बढ़ावा देने के लिए कौशल विकास परियोजनाओं को मंजूरी कैबिनेट दे सकती है. आपातकाल के खिलाफ आंदोलन में हिस्सा लेने वाले लोकतंत्र सेनानियों को कैबिनेट कैशलेस इलाज की सुविधा देने जा रही है. सोमवार को कैबिनेट बैठक में इसका प्रस्ताव लाया जाएगा. इन्हें मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत कैशलेस इलाज की सुविधा दी जाएगी. कैबिनेट में जन्म और मृत्यु पंजीकरण से जुड़ी नई नियमावली को भी मंजूरी मिल सकती है. हाथरस, बागपत और कासगंज में पीपीपी मोड पर मेडिकल कॉलेज बनाए जाने के प्रस्ताव को भी कैबिनेट सहमति देगी. वहीं, कैबिनेट के सामने ऊर्जा विभाग केनरा बैंक से निकाली गई 1500 करोड़ रुपये की राशि की कार्येत्तर इस्तेमाल के लिए प्रस्ताव रखा जाएगा. कैबिनेट की बैठक में राज्य सरकार और केंद्र सरकार की परियोजनाओं के संबंध में महत्वपूर्ण फैसला लिया जा सकता है. राज्य सरकार की प्रतिभूतियों के संबंध में वर्ष 2007 में जारी किए गए जनरल नोटिफिकेशन में संशोधन का प्रस्ताव पर कैबिनेट विचार करेगी. इसके अलावा भारतीय स्टांप अधिनियम में भी संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दी जा सकती है. वहीं, यूपी राज्य सड़क परिवहन निगम की बसों पर लगने वाले अतिरिक्त कर को रेशनलाइज करने को भी कैबिनेट अपनी मुहर लगा सकती है.