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US-South Korea सैन्य अभ्यास पर उत्तर कोरिया की चेतावनी, किम जोंग-उन की बहन ने कहा—परिणाम होंगे खतरनाक

 उत्तर कोरिया कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। उत्तर कोरिया के सनकी किंग किम जोंग उन की बहन किम यो जोंग ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया के संयुक्त सैन्य अभ्यास की कड़ी आलोचना करते हुए चेतावनी दी है कि उत्तर कोरिया की सुरक्षा को चुनौती देने वाला कोई भी कदम “भयानक परिणाम” ला सकता है। यह बयान उस समय आया जब अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने सोमवार से 11 दिन तक चलने वाले संयुक्त सैन्य अभ्यास Freedom Shield की शुरुआत की है।  इस अभ्यास में हजारों सैनिक हिस्सा ले रहे हैं और इसका उद्देश्य बदलते युद्ध परिदृश्यों के बीच दोनों देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता का परीक्षण करना है।किम यो जोंग ने बिना सीधे ईरान का नाम लिए कहा कि ऐसे समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध चल रहे हैं और वैश्विक सुरक्षा ढांचा तेजी से कमजोर हो रहा है, अमेरिका और दक्षिण कोरिया का यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल सकता है। उन्होंने कहा कि उत्तर कोरिया बाहरी खतरों के खिलाफ अपनी सैन्य शक्ति और युद्ध निरोधक क्षमता को लगातार मजबूत करता रहेगा। किम यो जोंग ने उत्तर कोरिया के बढ़ते परमाणु कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि देश अपने दुश्मनों को बार-बार अपनी “घातक युद्ध निरोधक क्षमता” का एहसास कराता रहेगा। प्योंगयांग लंबे समय से अमेरिका और दक्षिण कोरिया के संयुक्त सैन्य अभ्यासों को संभावित हमले की तैयारी बताता रहा है और अक्सर इन्हें अपने हथियार परीक्षणों को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल करता है। हालांकि अमेरिका और दक्षिण कोरिया का कहना है कि यह अभ्यास पूरी तरह रक्षात्मक प्रकृति का है और इसका उद्देश्य केवल संभावित खतरों के खिलाफ संयुक्त तैयारी को मजबूत करना है। aइसी अभ्यास के साथ Warrior Shield नामक फील्ड-ट्रेनिंग कार्यक्रम भी आयोजित किया जा रहा है। उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय ने पिछले सप्ताह अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों की भी आलोचना की थी और इसे “फर्जी शांति के बहाने किया गया अवैध आक्रामक कृत्य” बताया था। विश्लेषकों के अनुसार उत्तर कोरिया और ईरान उन कुछ देशों में शामिल हैं जिन्होंने यूक्रेन पर रूसी हमले का समर्थन किया है और दोनों पर रूस को सैन्य उपकरण देने के आरोप भी लगते रहे हैं।

क्या जंग के मुहाने पर हैं अमेरिका और ईरान: सैन्य ताकत, पलटवार की योजना और युद्ध के असर

अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष की आहट बढ़ती जा रही है। डोनाल्ड ट्रंप ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़ों को ईरान की खाड़ी पर तैनात करने  के आदेश दे दिए। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। ईरान ने भी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक युद्धाभ्यास कर इस क्षेत्र को पूरी तरह बंद करने का संकेत दिया, जो वैश्विक तेल सप्लाई में बाधा पहुंचाने वाला कदम साबित हो सकता है। यानी अमेरिका से लेकर यूरोप और अफ्रीका से लेकर पूरे एशिया के लिए आने वाले दिन कूटनीतिक स्तर पर काफी अहम होने वाले हैं। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर अमेरिका और ईरान के बीच हालिया विवाद क्यों और कब से उभरा है? अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं? ईरान इस स्थिति से निपटने के लिए कैसे तैयारी कर रहा है? अगर दोनों देशों के बीच संघर्ष भड़कता है तो इसका क्या असर हो सकता है? पहले जानें- ईरान-अमेरिका के बीच कैसे-क्यों भड़का है तनाव? ईरान-अमेरिका के बीच तनाव ईरान में महंगाई को लेकर विरोध प्रदर्शनों और उसके खिलाफ सरकारी कार्रवाई के बीच बढ़ा। तनाव की एक और वजह इस दौरान अमेरिका की ओर से पश्चिम एशिया में की गई सैन्य तैनाती भी रही, जिसके जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के अयातुल्ला शासन को खत्म करने की चेतावनी दे रहे हैं। इन सबके साथ ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही दोनों पक्षों में तनाव का बड़ा कारण रहा है। 1. परमाणु कार्यक्रम अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना चाहता है और राष्ट्रपति ट्रंप एक नए परमाणु समझौते के लिए दबाव बना रहे हैं। 2. आंतरिक विरोध प्रदर्शन दिसंबर 2025 में ईरान में बढ़ती कीमतों और गिरती मुद्रा के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों पर ईरानी सरकार की सख्त कार्रवाई हुई। इसमें हजारों लोगों के मारे जाने की खबर है। बताया जाता है कि इन घटनाओं को खुद अमेरिका ने भड़काया, ताकि वह ईरान के मामलों में दखल दे सके। 3. क्षेत्रीय सुरक्षा ईरान का लगातार बढ़ता बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और इस्राइल जैसे अमेरिकी सहयोगियों पर बढ़ता खतरा भी दोनों देशों के बीच तनाव का बड़ा कारण है। इसके अलावा सऊदी अरब, यूएई भी अलग-अलग मौकों पर ईरान को लेकर खतरा जताते रहे हैं। अमेरिका की तरफ से कौन से हथियार और बेड़े पश्चिम एशिया की तरफ भेजे गए हैं? अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के सूत्रों और सैटेलाइट तस्वीरों के हवाले से अमेरिकी मीडिया ने दावा किया है कि ईरान के साथ बढ़ते तनाव के बीच पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में 2003 के इराक आक्रमण के बाद से अब तक की सबसे बड़ी सैन्य लामबंदी की गई है। इन सैन्य बेड़ों में अमेरिका के सबसे घातक एफ-22 रैप्टर लड़ाकू विमान से लेकर सबसे बड़े और खतरनाक युद्धपोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड शामिल हैं। 1. नौसैनिक बेड़े विमानवाहक पोत: अमेरिका ने इस क्षेत्र में दो परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत तैनात किए हैं। पहला यूएसएस अब्राहम लिंकन है, जो जनवरी के अंत में अरब सागर पहुंच चुका है। इसके बाद दुनिया के सबसे बड़े और आधुनिक विमानवाहक पोत यूएसएस जेराल्ड आर. फोर्ड को भी क्षेत्र में पहुंचने का आदेश दिया गया है। यह मौजूदा समय में अटलांटिक महासागर से पश्चिम एशिया के रास्ते पर है। विध्वंसक पोत: वर्तमान में क्षेत्र में कुल 13 विध्वंसक पोत तैनात किए जा चुके हैं। इनमें यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ आए तीन प्रमुख पोत- यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन जूनियर, यूएसएस स्प्रुआंस और यूएसएस माइकल मर्फी शामिल हैं। ये पोत उन्नत रडार और बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों से लैस हैं। 2. वायु शक्ति और लड़ाकू विमान लड़ाकू विमान: अमेरिका ने बड़ी संख्या में एफ-22 रैप्टर और एफ-35 लाइटनिंग II जैसे स्टील्थ फाइटर जेट तैनात किए हैं। इनके अलावा एफ-15 और एफ-16  फैल्कन लड़ाकू विमानों की स्क्वाड्रन भी भेजी गई हैं। सहायक विमान: हवाई अभियानों के संचालन के लिए ई-3 सेंट्री (अवाक्स) टोही विमान, केसी-135 रिफ्यूलिंग टैंकर और ई-11 युद्धक्षेत्र संचार विमान तैनात किए गए हैं। ड्रोन और बमवर्षक: जॉर्डन के मुवाफ्फाक साल्टी एयर बेस पर कम से कम पांच एमक्यू-9 रीपर ड्रोन देखे गए हैं। इसके अलावा, डिएगो गार्सिया द्वीप पर बी-2 स्टील्थ बमवर्षक विमानों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है। इन्हीं बी-2 बमवर्षक विमानों के जरिए अमेरिका ने पिछले साल ऑपरेशन मिडनाइट हैमर को अंजाम दिया था और ईरान के परमाणु ठिकानों पर जीबीयू-57 बम बरसाए थे। 3. मिसाइल और रक्षा प्रणालियां हमलावर मिसाइलें: अमेरिकी युद्धपोत टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल पहले भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले के दौरान रक्षा व्यवस्थाओं को ध्वस्त करने के लिए किया जा चुका है। हवाई रक्षा प्रणालियां: ईरानी मिसाइलों के जवाबी हमले से सुरक्षा के लिए पेंटागन ने क्षेत्र में अतिरिक्त पैट्रियट और एयर डिफेंस सिस्टम (THAAD) हवाई रक्षा प्रणालियां तैनात की हैं। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर: विमानवाहक पोतों पर इलेक्ट्रॉनिक-वारफेयर विमान और एएन/एसएलक्यू-25ए निक्सी जैसे डिकॉय सिस्टम भी मौजूद हैं, जो दुश्मन के हथियारों को भ्रमित कर सकते हैं और अपने किसी भी हथियार को हमले से बचा सकते हैं। मौजूदा समय में कहां है अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा? अमेरिका का यह सैन्य जमावड़ा ईरान के इर्द-गिर्द कई रणनीतिक स्थानों पर तैनात है, इनमें प्रमुख एयरबेस और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र जॉर्डन, सऊदी अरब और ओमान के पास स्थित हैं। इसके अलावा अरब सागर, हिंद महासागर, बहरीन और कतर में भी अमेरिका के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने और सुविधाएं मौजूद हैं। पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ईरान कैसे कर रहा अमेरिका के हमले का जवाब देने की तैयारी? अमेरिका के बढ़ते सैन्य दबाव के जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य और रणनीतिक तैयारियां तेज कर दी हैं। 1. सैन्य हाई अलर्ट और जवाबी हमले की चेतावनी 25 जनवरी को ईरान ने घोषणा की कि उसके सशस्त्र बल पूर्ण सतर्कता की स्थिति में आ गए हैं। ईरान के संयुक्त राष्ट्र मिशन ने चेतावनी दी है कि यदि उसे उकसाया गया, तो वह ऐसा जवाब देगा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। 2. रणनीतिक नौसैनिक अभ्यास होर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने अपनी ताकत दिखाने के लिए कई लाइव-फायर ड्रिल्स की हैं। ईरान का यह अभ्यास इसलिए भी अहम है, क्योंकि … Read more

वेनेजुएला अमेरिका से मुकाबले में कमजोर, फिर भी रूस-चीन और ईरान से हथियार खरीद रहा

कैरेकस वेनेजुएला की सेना मुख्य रूप से रूस, चीन और ईरान से हथियार खरीदती है. अमेरिका ने 2006 से ही वेनेजुएला पर हथियारों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है, क्योंकि उसे आतंकवाद विरोधी प्रयासों में सहयोग न करने का आरोप लगाया गया. इसलिए, राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार इन तीन देशों पर निर्भर है. अमेरिकी नौसेना की कैरिबियन में तैनाती से पैदा हुए हालिया तनाव के बीच वेनेजुएला ने इन देशों से और मदद मांगी है. मुख्य हथियार सप्लायर और हालिया डील्स रूस (सबसे बड़ा सप्लायर): पिछले 20 सालों में अरबों डॉलर के हथियार दिए, जैसे Su-30MK2 फाइटर जेट (करीब 24), T-72 टैंक, S-300VM एयर डिफेंस सिस्टम, Buk-M2E और Pantsir-S1 मिसाइल सिस्टम, Igla-S शोल्डर-फायर्ड मिसाइलें (करीब 5,000), AK-103 असॉल्ट राइफलें (स्थानीय उत्पादन भी) और Dragunov स्नाइपर राइफलें. 2025 में: मादुरो ने रूस से Su-30 जेट की मरम्मत, रडार और मिसाइलें मांगीं. रूसी सांसद ने Oreshnik बैलिस्टिक और Kalibr क्रूज मिसाइलें देने की बात कही (अभी कन्फर्म नहीं). अक्टूबर 2025 में रूसी Il-76 कार्गो प्लेन काराकास पहुंचा. कहा जा रहा था कि उसमें संभवतः हथियार थे.      चीन: बख्तरबंद वाहन (VN-4), K-8 ट्रेनर जेट, C-802 एंटी-शिप मिसाइलें, रडार सिस्टम.     2025 में: मादुरो ने चीन से रडार उत्पादन तेज करने और सैन्य सहयोग बढ़ाने की अपील की. चीन वेनेजुएला का बड़ा आर्थिक पार्टनर है, तेल के बदले लोन देता है.     ईरान: ड्रोन टेक्नोलॉजी (शाहेद जैसे मिसाइल-कैरिंग ड्रोन), CM-90 एंटी-शिप मिसाइलें, GPS जैमर, पैसिव डिटेक्शन सिस्टम.     2025 में: ईरान से ड्रोन और मिलिट्री इक्विपमेंट की डिलीवरी हुई. परिवहन मंत्री ने 1000 किमी रेंज वाले ड्रोन मांगे. SIPRI के आंकड़ों से 2023 में वेनेजुएला ने करीब 98 मिलियन डॉलर के हथियार आयात किए, लेकिन आर्थिक संकट और प्रतिबंधों से खरीद कम हुई है. पहले पुराने अमेरिकी F-16 जेट थे, लेकिन अब मेंटेनेंस मुश्किल हो गई है.  तेल टैंकरों के आने-जाने पर पूरी तरह नाकेबंदी का आदेश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने  वेनेजुएला में आने और जाने वाले सभी प्रतिबंधित किए गए तेल टैंकरों की पूरी तरह से नाकेबंदी का आदेश दिया है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी घोषणा की है। उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर आरोप लगाया कि उनकी सरकार पर चोरी की तेल संपत्ति का इस्तेमाल अपराध, आतंकवाद और मानव तस्करी को बढ़ावा देने में कर रही है। वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिकी सैन्य घेरा ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा कि 'वेनेजुएला पूरी तरह से दक्षिण अमेरिका के इतिहास में अब तक के सबसे बड़े नौसैनिक बेड़े से घिरा हुआ है।' इसके साथ चेतावनी दी कि काराकस अमेरिका का तेल, जमीन और दूसरी संपत्ति वापस नहीं करता, तब तक यह घेराबंदी और बढ़ेगी। उन्होंने लिखा, 'यह और भी बड़ा होगा और उन्हें ऐसा झटका लगेगा जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं देखा होगा, जब तक वे अमेरिका से चुराए गए सभी तेल, जमीन और दूसरी संपत्ति वापस नहीं कर देते।' वेनेजुएला पर आतंकवाद को फाइनेंस करने का आरोप अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि मादुरो सरकार को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया गया है, जिसमें ड्रग तस्करी, अपहरण, मानव तस्करी और हिंसा के आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि वेनेजुएला के खेतों से तेल चुराकर इसका इस्तेमाल आतंकवाद को फाइनेंस करने के लिए किया जा रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका अब इस सिस्टमैटिक चोरी और आपराधिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं करेगा। अमेरिका से मुकाबला: क्या संभव है? वेनेजुएला अमेरिका का सीधा मुकाबला नहीं कर सकता. ग्लोबल फायरपावर 2025 रैंकिंग में अमेरिका नंबर 1 है, वेनेजुएला 50वें स्थान पर. मुख्य अंतर…     सैनिक संख्या: अमेरिका – 13 लाख एक्टिव + 8 लाख रिजर्व. वेनेजुएला – करीब 1.09-1.23 लाख एक्टिव + 8,000 रिजर्व + मिलिशिया (दावा 45 लाख, लेकिन असल कम और कमजोर ट्रेनिंग).     हवाई ताकत: अमेरिका – 13,000+ कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (F-22, F-35 जैसे स्टेल्थ). वेनेजुएला – सिर्फ 229 (ज्यादातर पुराने रूसी Su-30, कई ऑपरेशनल नहीं).     नौसेना: अमेरिका – 440 जहाज (एयरक्राफ्ट कैरियर, न्यूक्लियर सबमरीन). वेनेजुएला – 34 जहाज.     बजट: अमेरिका – 895 बिलियन डॉलर. वेनेजुएला – करीब 2-4 बिलियन डॉलर.     टेक्नोलॉजी और अनुभव: अमेरिका की सेना आधुनिक, ग्लोबल ऑपरेशन का  अनुभव. वेनेजुएला की सेना पुरानी, मेंटेनेंस की कमी, मुख्य काम प्रदर्शन कंट्रोल. क्या और भी देश कूदेंगे जंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर दबाव बढ़ा रहे हैं. वे ड्रग तस्करी और तेल निर्यात रोकने के नाम पर कैरिबियन सागर में बड़ा सैन्य जमावड़ा कर चुके हैं. नौसेना के जहाज तैनात किए हैं. संभव सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं. इस बीच, वेनेजुएला रूस और चीन से हथियार खरीद रहा है या मदद मांग रहा है. रूस ने पहले सुखोई जेट, S-300 मिसाइल सिस्टम और टैंक दिए हैं, जबकि हालिया तनाव में मादुरो ने रूस से मिसाइलें, रडार और जेट की मरम्मत मांगी है. चीन रडार और आर्थिक मदद दे रहा है. हालांकि रूस और चीन वेनेजुएला के करीबी सहयोगी हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वे सीधे जंग में नहीं कूदेंगे. रूस पहले ही यूक्रेन युद्ध में उलझा है. चीन अपनी घरेलू प्राथमिकताओं को जोखिम में नहीं डालेगा. ईरान ने भी ड्रोन और मिसाइलें दी हैं, लेकिन बड़ा हस्तक्षेप मुश्किल. अन्य देश जैसे क्यूबा या निकारागुआ समर्थन दे सकते हैं, लेकिन सीमित. कुल मिलाकर, अगर अमेरिका हमला करता है तो वेनेजुएला अकेला पड़ सकता है. यह संघर्ष क्षेत्रीय स्तर पर ही रहेगा. आसमान से समंदर तक अमेरिकी घेरेबंदी में है वेनेजुएला पेंटागन ने वेनेजुएला को डराने और दबाव बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कैरेबियन सागर में दुनिया का सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R. Ford तैनात किया गया है। अक्टूबर में दो घातक B-1 लांसर बॉम्बर्स ने वेनेजुएला के तट के पास उड़ान भरी थी, जिसे एक सीधे सैन्य संदेश के रूप में देखा जा रहा है। व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी विल्स ने एक इंटरव्यू में बेहद चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति की नीति 'तब तक घेरेबंदी की है जब तक मादुरो घुटने न टेक दें'।

इतिहासिक क्षण: 79 साल बाद सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शरा पहुंचे अमेरिका

 वॉशिंगटन सीरिया के राष्ट्रपति अहमद अल शरा अमेरिका के दौरे पर पहुंचे हैं। यह दौरा बेहद ऐतिहासिक है क्योंकि साल 1946 के बाद पहली बार कोई सीरियाई राष्ट्रपति अमेरिका के आधिकारिक दौरे पर वॉशिंगटन पहुंचे हैं। सीरियाई राष्ट्रपति का अमेरिका दौरा ऐसे समय हो रहा है, जब अमेरिका ने सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शरा का नाम आतंकवादी सूची से एक दिन पहले ही हटाया है। सोमवार को होगी ट्रंप से मुलाकात सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल शरा वॉशिंगटन में सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात करेंगे। इससे पहले जब मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब का दौरा किया था, उस वक्त सऊदी अरब के रियाद शहर में भी ट्रंप की अहमद अल शरा से मुलाकात हुई थी। सीरिया में अमेरिका के राजदूत टॉम बराक ने उम्मीद जताई कि अहमद अल शरा के इस अमेरिका दौरे पर सीरिया की सरकार, आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने के समझौते पर हस्ताक्षर कर सकती है। शरा का नाम आतंकवादी सूची से हटा मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका, सीरियाई राजधानी दमिश्क के पास एक सैन्य अड्डा बनाने की योजना बना रहा है। इस सैन्य अड्डे का मकसद मानवीय सहायता के काम में समन्वय बताया जा रहा है। अमेरिका के विदेश विभाग ने पुष्टि की है कि अहमद अल शरा को आतंकवादी सूची से हटा दिया गया है क्योंकि शरा ने सीरिया में लापता अमेरिकियों का पता लगाने और बचे हुए रसायनिक हथियारों को खत्म करने की सहमति दी है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी अहमद अल शरा पर लगे प्रतिबंधों को हटा लिया था, जिसके बाद शरा ने सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा को भी संबोधित किया। ऐसा करने वाले भी शरा पहले सीरियाई राष्ट्रपति हैं। आतंकी संगठन अल कायदा से रहा है जुड़ाव अहमद अल शरा के पूर्व के संगठन हयात तहरीर अल-शाम (HTS) का खूंखार आतंकी संगठन अल-कायदा से जुड़ाव था। यही वजह थी कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने शरा का नाम आतंकवादी सूची में डाला हुआ था। हालांकि बाद में शरा सक्रिय राजनीति में उतरे और बीते साल बशर अल असद के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। सत्ता संभालने के बाद से, शरा और सीरिया के नए नेतृत्व ने खुद को अपने उग्रवादी अतीत से दूर कर सीरियाई लोगों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने एक अधिक उदार छवि पेश करने की कोशिश की है।

भारत-अमेरिका की संयुक्त कार्रवाई में सफलता, जॉर्जिया से पकड़े गए हरियाणा के दो कुख्यात अपराधी

जॉर्जिया सुरक्षा एजेंसियों और हरियाणा पुलिस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी सफलता मिली है। विदेशों में छिपे गैंगस्टरों के खिलाफ चलाए गए एक विशेष ऑपरेशन के तहत भारत के दो मोस्ट वांटेड अपराधी वेंकटेश गर्ग और भानु राणा को क्रमश: जॉर्जिया और अमेरिका में हिरासत में ले लिया गया है। ये दोनों गैंगस्टर हरियाणा और पंजाब में कई संगीन आपराधिक मामलों में वांछित थे। जॉर्जिया में वेंकटेश गर्ग गिरफ्तार कुख्यात गैंगस्टर वेंकटेश गर्ग को जॉर्जिया में हिरासत में लिया गया है। वह लंबे समय से विदेश भागकर अपने आपराधिक नेटवर्क को सक्रिय रखे हुए था। वेंकटेश गर्ग कुख्यात गैंगस्टर कपिल सांगवान उर्फ नंदू के गैंग से जुड़ा हुआ है। इसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उसे जल्द ही जॉर्जिया से प्रत्यर्पित (Extradited) किया जाएगा। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हरियाणा पुलिस अधीक्षक के नेतृत्व में एक विशेष टीम जॉर्जिया पहुंच चुकी है।  अमेरिका में पकड़ा गया कुख्यात अपराधी भानु राणा दूसरी तरफ हरियाणा का कुख्यात गैंगस्टर भानु राणा अमेरिका में हिरासत में लिया गया है। यह गिरफ्तारी भारत की ओर से दिए गए इनपुट और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का हिस्सा है। भानु राणा को भी जल्द ही अमेरिका से डिपोर्ट करके भारत भेजा जाएगा।  लॉरेंस बिश्नोई गैंग कनेक्शन पुलिस जांच में सामने आया है कि भानु राणा लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़ा हुआ है। उसका नेटवर्क हरियाणा, पंजाब और दिल्ली तक फैला हुआ है। पंजाब में हुए एक ग्रेनेड हमले की जांच में उसका नाम सामने आया था। जांच एजेंसियों के अनुसार अमेरिका में बैठे उसके कुछ संपर्क भी इस नेटवर्क से जुड़े थे। पुलिस पहले ही भानु राणा के कई साथियों को गिरफ्तार कर चुकी है और उसके खिलाफ कई मामलों में चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है। फिलहाल सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि विदेशों में छिपे गैंगस्टरों के खिलाफ यह अभियान लगातार जारी रहेगा।  

डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा! अमेरिका ने किया जी-20 से बायकॉट, जानें वजह

वाशिंगटन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि इस साल दक्षिण अफ्रीका में होने वाले जी-20 सम्मेलन में कोई भी अमेरिकी प्रतिनिधि हिस्सा नहीं लेगा। उन्होंने कहा है कि इस अफ्रीकी देश में श्वेत किसानों के साथ भेदभाव होता है। डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही कह दिया था कि वह जी-20 सम्मेलन में हिस्सा लेने नहीं जाएंगे। पहले बताया गया था कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस दक्षिण अफ्रीका जा सकते हैं। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में कहा, यह बड़ा ही अपमानजनक है कि जी-20 सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में हो रहा है। ट्रंप ने बुधवार को मियामी में ‘अमेरिका बिजनेस फोरम’ में कहा, ‘‘मैं नहीं जा रहा हूं। दक्षिण अफ्रीका में जी-20 की बैठक है। दक्षिण अफ्रीका को जी-20 में ही नहीं होना चाहिए क्योंकि वहां जो हुआ है वह बहुत बुरा है। मैंने उन्हें बता दिया है कि मैं नहीं आ रहा हूं। मैं वहां अपने देश का प्रतिनिधित्व नहीं करने वाला…।’’ दक्षिण अफ्रीका ने एक दिसंबर 2024 को एक साल के लिए जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण की थी और वह 22 और 23 नवंबर को जोहानिसबर्ग में समूह के नेताओं की शिखर बैठक की मेज़बानी करेगा। यह पहली बार है जब जी-20 शिखर सम्मेलन अफ्रीकी धरती पर आयोजित किया जाएगा। भारत दिसंबर 2022 से नवंबर 2023 तक जी-20 का अध्यक्ष था और उसने सितंबर 2023 में नई दिल्ली में 18वें जी-20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी की थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए थे। जी-20 में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ब्राज़ील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये, ब्रिटेन और अमेरिका के साथ-साथ यूरोपीय संघ और अफ्रीकी संघ शामिल हैं। भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ही अफ्रीकी संघ आधिकारिक तौर पर दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के समूह में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हुआ था। न्यूयॉर्क सिटी के नवनिर्वाचित मेयर ‘‘कम्युनिस्ट’’ जोहरान ममदानी की आलोचना करते हुए ट्रंप ने कहा कि मियामी पीढ़ियों से दक्षिण अफ्रीका में कम्युनिस्ट अत्याचार से भागने वालों के लिए एक आश्रय स्थल रहा है। ट्रंप ने कहा, ‘‘मेरा मतलब है कि दक्षिण अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है, इस पर एक नजर डालिए। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्या हो रहा है इस पर एक नजर डालिए।

ट्रंप के फैसलों के बीच पीएम मोदी की दूरी — जानिए असली कारण

नई दिल्ली कभी मंच साझा करते हुए ‘दो मजबूत नेताओं’ की दोस्ती का प्रतीक माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अब रिश्तों की गर्माहट noticeably कम हो गई है। न अमेरिका में आमने-सामने मुलाकात, न किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में साझा उपस्थिति बस औपचारिक बधाइयों और प्रशंसाओं का सिलसिला जारी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर दोनों के बीच यह दूरी क्यों बढ़ रही है?   निमंत्रण पर ‘ना’ और बढ़ती खामोशी इस साल जून में ट्रंप ने पीएम मोदी को कनाडा से लौटते वक्त अमेरिका रुकने का निमंत्रण दिया, मगर मोदी ने वह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इसके बाद शर्म अल-शेख सम्मेलन के लिए भी आमंत्रण आया — जो ट्रंप की मध्यपूर्व शांति पहल का जश्न था पर प्रधानमंत्री ने इसमें भी शिरकत नहीं की और भारत की ओर से एक जूनियर मंत्री को भेजा गया। अब जब ट्रंप मलेशिया में हो रहे आसियान शिखर सम्मेलन में पहुंचे, मोदी ने वहां भी वर्चुअल माध्यम से भाग लिया। यह पिछले एक दशक में दूसरा मौका है जब प्रधानमंत्री ने आसियान मंच पर भौतिक उपस्थिति दर्ज नहीं की। आगामी नवंबर में जब दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में G20 शिखर सम्मेलन होगा, ट्रंप ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे उसमें शामिल नहीं होंगे। यानि, दोनों नेताओं की आमने-सामने मुलाकात अब लगभग एक साल बाद ही संभव दिख रही है।  अब ट्रंप मलेशिया में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन में हैं, जिसमें पीएम मोदी ने भाग नहीं लिया, बल्कि वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए. यह पिछले दस वर्षों में सिर्फ दूसरी बार है, जब उन्होंने आसियान सम्मेलन में उपस्थिति नहीं दर्ज की. और अब नवंबर में प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग जाने वाले हैं, जहां G20 शिखर सम्मेलन आयोजित होगा. लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि वे उस सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे. इसका मतलब है कि दोनों नेताओं की आमने-सामने मुलाकात अब लगभग एक साल तक नहीं होगी. पिछली बार उनकी मुलाकात फरवरी में वॉशिंगटन डीसी में हुई थी. कई लोगों को यह दूरी कुछ अजीब लग रही है. क्वाड शिखर सम्मेलन की तारीख को लेकर भी अब तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है. कभी दो ‘मजबूत नेताओं’ के बीच हाई-प्रोफाइल ‘ब्रोमांस’ कहा जाने वाला रिश्ता अब एक अजीब कूटनीतिक दूरी में बदल गया है. अब मुलाकातें कम हो गई हैं. हाल ही में दोनों नेताओं के बीच तीन बार फोन पर बातचीत हुई है, लेकिन कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया. इस बीच सार्वजनिक बयानों में गर्मजोशी बनी हुई है. पीएम मोदी ट्रंप की ‘शांति प्रयासों’ की प्रशंसा करते हैं और ट्रंप उन्हें ‘अच्छा दोस्त’ कहते हैं, लेकिन सतह के नीचे यह रिश्ता कुछ तनावपूर्ण दिखाई देता है. तो सवाल है कि आखिर दोनों एक-दूसरे से बच क्यों रहे हैं? पुरानी नज़दीकी कैसे बन गई दूरी 2019-2020 के दौरान मोदी-ट्रंप के रिश्ते बहुत सार्वजनिक रूप से मजबूत दिखाई देते थे. ‘हाउडी मोदी!’ और ‘नमस्ते ट्रंप!’ जैसे विशाल आयोजनों ने इस दोस्ती की झलक पूरी दुनिया को दिखाई. दोनों नेता बड़े वादे करते थे… भारत-अमेरिका व्यापार बढ़ाना, रक्षा सहयोग गहरा करना, ऊर्जा समझौते करना. भारत के लिए ट्रंप एक ऐसे सहयोगी थे, जिनके साथ नई दिल्ली अपनी वैश्विक भूमिका मजबूत करना चाहती थी, जबकि अमेरिका के लिए भारत हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार था. जब ट्रंप ने इस साल की शुरुआत में राष्ट्रपति पद संभाला, तो पीएम मोदी ने फरवरी में उनसे मुलाकात की. दोनों ने अगली मुलाकात भारत में क्वाड शिखर सम्मेलन के दौरान करने का वादा किया, लेकिन मई आते-आते रिश्तों में दरारें दिखने लगीं. ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाया था. हालांकि पीएम मोदी ने सार्वजनिक रूप से इस दावे को खारिज कर दिया. जून तक आते-आते दोनों के रिश्ते में तनाव और बढ़ गया. रिश्ते में खटास के प्रमुख कारण 1. ट्रेड और टैरिफ: अमेरिका ने भारत के साथ व्यापार असंतुलन को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. भारत पर 50% तक टैरिफ लगाया गया है और अमेरिका भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में प्रवेश की मांग कर रहा है. मोदी ने साफ कहा है कि भारत समझौता नहीं करेगा. 2. रूसी तेल का खेल: भारत अभी भी रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है. अमेरिका चाहता है कि भारत इसे कम करे. यह विवाद का बड़ा मुद्दा बन गया है. हाल ही में भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप के उस दावे को खारिज किया कि भारत ‘लगभग शून्य’ स्तर तक रूसी तेल खरीद घटा देगा. 3. कूटनीतिक छवि: दोनों नेताओं के अपने घरेलू राजनीतिक आधार हैं जो उन्हें ताकतवर छवि बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं, न कि समझौता करने के लिए. 4. रणनीतिक स्वायत्तता बनाम गठजोड़: भारत हमेशा यह रेखांकित करता है कि वह अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर चलेगा, किसी एक देश के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ेगा. इन सभी तत्वों ने एक गर्मजोशी भरे रिश्ते को कठिन बना दिया है. क्या मोदी ट्रंप से मुलाकात टाल रहे हैं? ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री मोदी किसी असहज या अनुचित माहौल में बैठक से बचना चाहते हैं. जैसे 47वें आसियान शिखर सम्मेलन (कुआलालंपुर) में उन्होंने वर्चुअल रूप से शामिल होना चुना, जिसे व्यापक रूप से ट्रंप से आमने-सामने मुलाकात से बचने के रूप में देखा गया. ट्रंप ने अपनी यात्रा के दौरान फिर से यह दावा दोहराया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान संघर्ष को खत्म कराया और भारत रूस से तेल खरीदना बंद करने वाला है, जबकि भारतीय अधिकारियों ने ऐसे किसी भी फोन कॉल या बातचीत से इनकार किया. ऐसी स्थितियों में सार्वजनिक विरोधाभास से दोस्ती की छवि कमजोर पड़ती है. पीएम मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि भारत किसी बाहरी दबाव में नहीं झुकेगा. ट्रंप से मिलना और वहां किसी ‘समझौते’ का संकेत देना, घरेलू राजनीति के लिहाज से मोदी के लिए असुविधाजनक हो सकता है. उसी तरह, ट्रंप भी ऐसी बैठक में दिलचस्पी नहीं रखते जहां उन्हें कोई ‘स्पष्ट जीत’ दिखाई न दे. इसलिए भारत का यह रवैया (बहुत जल्दी मुलाकात न करना) एक रणनीतिक लचीलापन बनाए रखने की कोशिश है. शर्म अल-शेख समिट में क्यों नहीं गए मोदी पीएम मोदी ने शर्म अल-शेख समिट में शामिल होने के लिए अमेरिकी न्योते … Read more

तालिबान ने कहा — इस्लामिक स्टेट को NATO-अमेरिका ने पनपाया, हमने जड़ से मिटाया

तालिबान अफगानिस्तान के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी ने दावा किया कि आतंकी संगठन ISIS को अफगान जमीन से पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद इस्लामिक अमीरात ने पूरे देश में सुरक्षा और नियंत्रण स्थापित कर लिया है। नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में सोमवार को मुत्तकी ने कहा, 'जब अमेरिका और नाटो की मौजूदगी थी, तब विभिन्न प्रांतों में आईएसआईएस के बड़े केंद्र थे। उस समय भी हमें संघर्षों का सामना करना पड़ा। लेकिन इस्लामिक अमीरात ने पूरे देश पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद मजबूत अभियान चलाया। शुक्र है कि अब अफगानिस्तान की एक इंच जमीन पर भी ISIS या कोई अन्य समूह सक्रिय नहीं है।' आमिर खान मुत्तकी ने भारतीय उद्योग जगत को आश्वासन दिया कि तालिबान शासित देश में शांति स्थापित हो गई है। भारत के साथ आर्थिक संबंधों को बढ़ावा देने के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं। भारतीय उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि वीजा एक गंभीर समस्या बनी हुई है और दोनों पक्षों के व्यापारियों की सुगम आवाजाही के लिए इस मुद्दे का तुरंत समाधान करने जरूरत है। फिक्की ने अफगान मंत्री के हवाले से बयान में कहा, ‘अफगानिस्तान के विदेश मंत्री ने भारतीय उद्योग जगत को आश्वासन दिया कि आवश्यक शांति स्थापित हो गई है और दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ाने के लिए अनुकूल परिस्थितियां तैयार की गई हैं।’ उन्होंने कहा कि द्विपक्षीय व्यापार पहले ही एक अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुका है। अमृतसर और काबुल-कंधार के बीच जल्द सीधी उड़ानें अफगान विदेश मंत्री मुत्तकी ने कहा कि अमृतसर और काबुल व कंधार के बीच जल्द ही सीधी उड़ानें शुरू होंगी। उन्होंने इसे व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने की दिशा में एक कदम बताया। राज्यसभा सांसद और वाणिज्य पर संसदीय स्थायी समिति के सदस्य डॉ. विक्रमजीत सिंह साहनी ने इस कदम को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि नई उड़ानें भारत और अफगानिस्तान के बीच तेज और सुरक्षित हवाई पुल बनाएंगी। वहीं, आमिर खान मुत्तकी ने कहा कि भारत को चाबहार बंदरगाह पर प्रतिबंध हटाने के लिए अमेरिका के साथ बातचीत करनी चाहिए। वह रणनीतिक रूप से स्थित चाबहार बंदरगाह के अधिकतम इस्तेमाल के पक्ष में हैं। उन्होंने अमेरिका के साथ अपनी बैठकों में प्रतिबंध हटाने का मुद्दा भी उठाया है।

अमेरिका को यूरोप का धोखा? स्पेन ने F-35 छोड़ तुर्की के KAAN फाइटर जेट में दिखाई दिलचस्पी

मैड्रिड अमेरिका के सुपर एडवांस्ड F-35 स्टील्थ फाइटर जेट को लेकर यूरोप का भरोसा अब डगमगा गया है. बढ़ती लागत, सॉफ्टवेयर देरी और लगातार हो रही तकनीकी गड़बड़ियों के बीच स्पेन ने अमेरिकी F-35 को ठुकरा दिया है. अब खबर है कि यूरोप का यह अहम देश तुर्की के KAAN फाइटर जेट को खरीदने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. यह कदम न केवल यूरोप की रक्षा रणनीति को नया मोड़ देगा बल्कि अमेरिका के वर्चस्व पर भी सीधा झटका माना जा रहा है. स्पेन का यह फैसला ऐसे वक्त में आया है जब कई अन्य देश कनाडा, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड भी F-35 प्रोग्राम से दूरी बना रहे हैं. वजह वही: बढ़ते खर्चे, लगातार सॉफ्टवेयर फेलियर और अमेरिकी नियंत्रण को लेकर उठे सवाल. दरअसल, अमेरिका पर आरोप है कि F-35 का सोर्स कोड वह खुद तक सीमित रखता है. इससे यह जेट इस्तेमाल करने वाले देशों की डिजिटल निर्भरता उसी पर बनी रहती है. अब यूरोप ने “Rearm Europe Program” के तहत अमेरिका पर अपनी रक्षा निर्भरता घटाने का फैसला किया है. F-35 छोड़ अब स्पेन की नजर तुर्की के KAAN पर स्पेन ने अपने 2023 के रक्षा बजट में 6.25 बिलियन यूरो (करीब 7.24 अरब डॉलर) नए फाइटर जेट्स के लिए रखे थे. शुरुआत में माना जा रहा था कि स्पेन Eurofighter Typhoon या फिर Future Combat Air System (FCAS) में से किसी एक को चुनेगा. लेकिन अब स्पेनिश बिज़नेस डेली “El Economista” के मुताबिक मैड्रिड सरकार तुर्की के KAAN फाइटर जेट को खरीदने पर विचार कर रही है. जो फिलहाल विकास के दौर में है और 2030 के शुरुआती दशक में सेवा में आने की उम्मीद है. क्यों डगमगा रहा है यूरोप का FCAS प्रोजेक्ट? यूरोप का महत्वाकांक्षी Future Combat Air System (FCAS) प्रोजेक्ट अब गंभीर संकट में है. फ्रांस की Dassault Aviation और जर्मनी की Airbus Defence के बीच नियंत्रण को लेकर खींचतान ने इस कार्यक्रम की रफ्तार लगभग रोक दी है. पहले इसका परीक्षण उड़ान 2027-29 के बीच होने की उम्मीद थी, लेकिन अब यह टाइमलाइन पूरी तरह बिगड़ चुकी है. ब्रिटिश मीडिया द इकोनॉमिक टाइम्स और फाइनेंशियल टाइम्स ने रिपोर्ट किया है कि FCAS “पूरी तरह ध्वस्त” भी हो सकता है. इस बीच स्पेन को अगले दशक में अपने पुराने F-18 और F-5 विमानों को बदलने की जरूरत है. ऐसे में तुर्की का KAAN एक व्यावहारिक और तेजी से उपलब्ध विकल्प बन रहा है. स्पेन-तुर्की रक्षा साझेदारी गहराती दिख रही है स्पेन और तुर्की के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुआ है. दिसंबर 2024 में दोनों देशों ने 24 Hürjet एडवांस्ड जेट ट्रेनर विमानों के लिए समझौता किया था. सितंबर 2025 में स्पेन के मंत्रिमंडल ने 45 Hürjet विमान खरीदने को मंजूरी दे दी. जिनकी कीमत 3.68 अरब यूरो बताई जा रही है. अब KAAN की संभावित डील इस रिश्ते को और आगे बढ़ाएगी. KAAN की ताकत- F-35 को टक्कर देने वाला जेट तुर्की का KAAN फाइटर जेट फरवरी 2024 में अपनी पहली उड़ान भर चुका है. इसे Turkish Aerospace Industries (TUSAŞ) ने तैयार किया है. तुर्की ने घोषणा की है कि 2028 तक 20 ऐसे विमान उसकी वायुसेना में शामिल हो जाएंगे. KAAN को “पांचवीं पीढ़ी” का जेट माना जाता है, जिसमें स्टील्थ डिजाइन, एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड कॉम्बैट क्षमता, और हाई-स्पीड एवियोनिक्स सिस्टम शामिल हैं. TUSAŞ के सीईओ Temel Kotil ने मई 2024 में दावा किया था, “KAAN, F-35 से बेहतर विमान है.” इंडोनेशिया बना पहला ग्राहक, स्पेन हो सकता है दूसरा इंडोनेशिया पहले ही 48 KAAN जेट्स खरीदने का करार कर चुका है, जिसकी डिलीवरी 10 साल में पूरी होगी. वहीं, अज़रबैजान, पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई भी इसमें दिलचस्पी दिखा चुके हैं. अगर स्पेन यह डील साइन करता है, तो वह KAAN का दूसरा अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बन जाएगा जो तुर्की की रक्षा क्षमता के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि होगी.  

F-35 फाइटर जेट की बिक्री पर अमेरिका का बड़ा कदम, कनाडा को लेकर कड़ा रुख

न्यूयॉर्क कनाडा और अमेरिका के बीच रक्षा सौदे को लेकर तनाव बढ़ गया है. कनाडा अपने 88 F-35 फाइटर जेट्स खरीदने के प्लान की समीक्षा कर रहा है. 22 सितंबर तक फैसला आने की उम्मीद है. अगर कनाडा इस डील को रद्द करता है, तो अमेरिका ने गंभीर परिणामों की चेतावनी दी है. कनाडा स्वीडिश ग्रिपेन जेट को विकल्प के रूप में देख रहा है, लेकिन अमेरिका दो अलग-अलग फाइटर फ्लीट चलाने के खिलाफ है. यही विमान अमेरिका भारत को भी बेंचना चाहता है. लेकिन अभी तक भारत ने इस प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.   F-35 डील क्या है और कनाडा क्यों कर रहा है समीक्षा? F-35 अमेरिकी कंपनी लॉकहीड मार्टिन द्वारा बनाया गया एक एडवांस स्टील्थ फाइटर जेट है. यह पांचवीं पीढ़ी का विमान है, जो रडार से बचने की क्षमता रखता है. आधुनिक हथियारों से लैस है. कनाडा ने 2010 के दशक में 88 ऐसे जेट्स खरीदने का फैसला किया था, जिसकी अनुमानित लागत 19 बिलियन कनाडाई डॉलर (करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये) है. यह सौदा कनाडा की पुरानी CF-18 फाइटर जेट्स को बदलने के लिए था. कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल सरकार ने इस साल मार्च में इस डील की समीक्षा शुरू की. कारण ये है कि F-35 प्रोग्राम में देरी और लागत में बढ़ोतरी हो रही है. अमेरिकी सरकारी संगठन GAO (गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस) ने 3 सितंबर 2025 को रिपोर्ट जारी की, जिसमें बताया गया कि F-35 प्रोजेक्ट में और देरी और खर्च बढ़ रहा है. कनाडा के तत्कालीन डिफेंस मिनिस्टर (अब प्रधानमंत्री) मार्क कार्नी ने समीक्षा का आदेश दिया, ताकि यह देखा जा सके कि क्या यह सौदा देश के हित में है. कनाडा की सेना ने अगस्त 2025 में सिफारिश की कि F-35 ही खरीदना चाहिए, लेकिन सरकार अभी फैसला ले रही है. अमेरिका ने साफ कह दिया है कि अगर कनाडा F-35 डील रद्द करता है, तो गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे. अमेरिकी राजदूत पीट होकस्ट्रा ने मई 2025 में CTV को इंटरव्यू में कहा कि यह कनाडा-अमेरिका के संयुक्त NORAD (नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड) गठबंधन को खतरा पहुंचा सकता है. NORAD दोनों देशों की हवाई रक्षा के लिए है. इसके लिए दोनों को एक ही तरह के विमान उड़ाने चाहिए. होकस्ट्रा ने कहा कि अगर कनाडा एक विमान उड़ाएगा और हम दूसरा, तो वे एक-दूसरे के साथ बदलाव योग्य नहीं रहेंगे. अगस्त 2025 में होकस्ट्रा ने पॉडकास्टर जैस्मिन लेन को बताया कि कनाडा दो फाइटर प्रोग्राम नहीं चला सकता. होकस्टा ने कहा कि आपको फैसला करना चाहिए कि F-35 चाहिए या कोई और. लेकिन दोनों नहीं चला सकते. अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि F-35 डील रद्द करने से कनाडा को स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव और ट्रेनिंग में दिक्कत होगी. इससे दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते भी प्रभावित हो सकते हैं.  डिफेंस इंडस्ट्री के सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने कनाडा को चेतावनी दी है कि यह सौदा रद्द करने से रक्षा सहयोग कमजोर हो जाएगा. ग्रिपेन: कनाडा का विकल्प क्यों? कनाडा स्वीडन की कंपनी साब द्वारा बनाए गए ग्रिपेन (JAS 39 Gripen) जेट को वैकल्पिक विकल्प के रूप में देख रहा है. ग्रिपेन एक हल्का, सस्ता और बहुमुखी फाइटर जेट है, जो F-35 से कम खर्चीला है. कनाडा को लगता है कि इससे पैसे बचेंगे और घरेलू उद्योग को फायदा होगा. लेकिन अमेरिका इसका विरोध कर रहा है, क्योंकि ग्रिपेन F-35 जितना उन्नत नहीं है और NORAD में एकरूपता बिगड़ जाएगी. कनाडा पहले से ही पुराने F-18 जेट्स चला रहा है. दो अलग फ्लीट चलाना महंगा और जटिल होगा. कनाडा का फाइटर जेट प्रोग्राम कनाडा की वायुसेना को नई फाइटर जेट्स की सख्त जरूरत है. पुराने CF-18 जेट्स 1980 के दशक के हैं और अब खराब हो रहे हैं. 2010 में कनाडा ने F-35 चुना लेकिन लागत और देरी की शिकायतें बढ़ीं. 2022 में कनाडा ने औपचारिक रूप से F-35 के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन किया, लेकिन अब समीक्षा हो रही है. यह विवाद दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को दिखाता है, खासकर ट्रेड और डिफेंस में. दुनिया में F-35 प्रोग्राम एफ-35 कार्यक्रम में वर्तमान में 17 देश भाग ले रहे हैं. अब तक, 1870 से अधिक पायलटों और 13,500 रखरखाव कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया है. एफ-35 बेड़े ने 602,000 से अधिक संचयी उड़ान घंटों को पार कर लिया है. क्रैश होने का खतरा  दुनिया का सबसे खतरनाक स्टेल्थ फाइटर जेट F-35 कई बार क्रैश हो चुका है. एक विमान गिरने पर अमेरिका को करीब 832 करोड़ रुपए का नुकसान होता. यह अमेरिका का सबसे महंगे जेट प्रोग्राम का विमान था. पिछले साल न्यू मेक्सिको के अल्बुकर्क इंटरनेशनल एयरपोर्ट से टेकऑफ करते ही अमेरिकी एयरफोर्स का F-35 लाइटनिंग-2 स्टेल्थ फाइटर जेट क्रैश हो गया.  इससे पहले साउथ कैरोलिना में ऐसा ही एक फाइटर जेट लापता हो गया था. जो बाद में एक घर के पीछे क्रैश मिला. इसका मलबा साउथ कैरोलिना के ज्वाइंट बेस चार्ल्सटन से 96 KM दूर विलियम्सबर्ग काउंटी में मिला.