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72 घंटे में भारत की जीत, अमेरिकी विशेषज्ञ ने साझा किया रणनीति का विश्लेषण

 नई दिल्ली अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ पर कहा है कि भारत ने इस संघर्ष में रणनीतिक रूप से बड़ी जीत हासिल की. उन्होंने बताया कि 10 मई की सुबह तक भारत ने हवाई क्षेत्र में पूरी श्रेष्ठता बना ली थी, जबकि पाकिस्तान अपने हवाई ऑपरेशनों को जारी रखने में कमजोर हो चुका था।  यह नतीजा किसी एक हमले या छोटी लड़ाई का परिणाम नहीं था, बल्कि कई दिनों तक चली सावधानीपूर्वक योजना और दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम को नष्ट करने की मुहिम का नतीजा था. मई 2025 में भारत ने 6-7 मई की रात पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर हमले किए।  जब पाकिस्तान ने भारत के शहरों और सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला किया, तब भारत ने भी पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर मजबूत जवाब दिया. यह चार दिन का संघर्ष 10 मई को पाकिस्तान की मांग पर युद्धविराम के साथ खत्म हुआ. इस दौरान भारत ने पाकिस्तानी एयरबेस, एयर डिफेंस सिस्टम और कई अन्य सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाया।  भारत की रणनीति कैसे काम की अमेरिकी सेना के पूर्व मेजर जॉन स्पेंसर अब मैडिसन पॉलिसी फोरम में वॉर स्टडीज के चेयर और अर्बन वारफेयर इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हैं. उन्होंने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर विस्तार से बताया कि भारत ने कैसे पाकिस्तान की हवाई रक्षा को कमजोर किया. उन्होंने कहा कि 8 मई को भारत ने पाकिस्तानी हवाई रक्षा ठिकानों पर हमले किए, जिनमें चूनियां और पासरूर में अर्ली वार्निंग रडार और कम से कम एक HQ-9 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी शामिल थी. 9 मई को भी और हमले किए गए।  ये हमले ज्यादातर लॉइटरिंग मुनिशन से किए गए. इनका मकसद था कि पाकिस्तान के रडार और मिसाइल सिस्टम को लगातार दबाव में रखा जाए, चाहे वे पहले हमलों से बचे हों या नई जगह पर तैनात किए गए हों. स्पेंसर ने लिखा कि इन हमलों से पाकिस्तान की देखने, कॉर्डिनेशन करने और जवाब देने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई. हवाई युद्ध में यह बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे पहले कि लड़ाकू विमान आमने-सामने आएं, दुश्मन की रक्षा प्रणाली ही ध्वस्त हो जाती है।  S-400 ने बदला खेल, पाकिस्तानी विमानों पर हालत खराब हो गई स्पेंसर ने एक और महत्वपूर्ण बात बताई. भारत की S-400 मिसाइल सिस्टम ने एक हाई वैल्यू एयरबोर्न प्लेटफॉर्म को करीब 300 किलोमीटर दूर से निशाना बनाया. इससे पाकिस्तान एयर फोर्स को यह सोचना पड़ा कि वे कहां और कैसे अपने विमानों को उड़ा सकते हैं. इस वजह से पाकिस्तानी विमानों का ऑपरेशन क्षेत्र सीमित हो गया. उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी पड़ी।  स्पेंसर ने माना कि शुरू के कुछ घंटों में पाकिस्तान ने कुछ भारतीय विमानों को गिराने में सफलता हासिल की. यह शुरुआती सफलता पाकिस्तान के लिए प्रचार का अच्छा मौका बनी, लेकिन स्पेंसर कहते हैं कि छोटी-मोटी सफलता पूरे अभियान की जीत नहीं तय करती।  पाकिस्तान ने बाद में सैकड़ों ड्रोन, CM-400एकेजी मिसाइलें, फतेह और हत्फ रॉकेट दागे, लेकिन भारत की एकीकृत एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें रोक लिया. भारत ने अपनी स्वदेशी आईएसीसीसीएस (Integrated Air Command, Control and Communication System) और आकाशतीर प्रणाली का इस्तेमाल किया, जिसने पाकिस्तानी हमलों को नाकाम कर दिया।  आधुनिक युद्ध: सिर्फ विमान नहीं, पूरा सिस्टम लड़ता है जॉन स्पेंसर ने जोर देकर कहा कि आधुनिक युद्ध में सिर्फ लड़ाकू विमान एक-दूसरे से नहीं लड़ते. इसमें एंटी-एयरक्राफ्ट गन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, कमांड नेटवर्क और एकीकृत सिस्टम बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. भारत के पास बड़े पैमाने, गहराई और बेहतर एकीकरण था. इसी वजह से भारत शुरुआती झटके को सहन कर सका और फिर अपना ऑपरेशनल टेम्पो पाकिस्तान पर थोप दिया।  दूसरी ओर पाकिस्तान मुख्य रूप से चीन से मिले हथियारों पर निर्भर था. शुरुआत में इनसे कुछ सफलता मिली, लेकिन जब भारत ने पाकिस्तान की महत्वपूर्ण नोड्स को नष्ट कर दिया तो पाकिस्तान लड़ने लायक नहीं बचा।  रणनीतिक जीत भारत की ऑपरेशन सिंदूर में भारत ने दिखाया कि अच्छी योजना, स्वदेशी तकनीक और मजबूत एकीकरण से छोटी-मोटी शुरुआती असफलताओं को भी पलटकर बड़ी जीत हासिल की जा सकती है. जॉन स्पेंसर जैसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि भारत ने हवाई श्रेष्ठता हासिल कर पाकिस्तान को ऑपरेशन करने लायक ही नहीं छोड़ा. यह संघर्ष दिखाता है कि भविष्य के युद्धों में सिस्टम की मजबूती और निरंतर दबाव कितना निर्णायक साबित होता है। 

भारत-वियतनाम रिश्तों में मजबूती, 13 समझौते और जल्द ही UPI का फास्ट पेमेंट सिस्टम से कनेक्शन

नई दिल्ली  वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम के भारत दौरे को दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में गति देने वाला माना जा रहा है. भारत और वियतनाम अपनी व्यापक रणनीतिक साझेदारी के तहत सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. दोनों देशों के बीच बुधवार को 13 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं।  पीएम मोदी ने बताया कि हमारी साझा विरासत को जीवंत रखने के लिए, हम वियतनाम के प्राचीन चम्पा सभ्यता के मी सॉन और न्हान टवर मंदिरों का पुनर्निमाण कर रहे हैं. अब हम चम्पा सभ्यता की मनुस्क्रिप्ट को भी डिजिटलाइज करेंगे, और इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करेंगे।  मोदी ने कहा कि हिंद-प्रशांत के लिए दोनों देशों का नजरिया एक जैसा है और दोनों पक्ष कानून के राज, शांति, स्थिरता और खुशहाली में योगदान देते रहेंगे. ऐसा समझा जाता है कि दोनों पक्षों के बीच प्रतिनिधिमंडल स्तर की बातचीत में चीन की बढ़ती मिलिट्री ताकत पर भी चर्चा हुई।  लाम, एक उच्च स्तर प्रतिनिधिमंडल के साथ, मंगलवार को भारत की अपनी तीन दिन की यात्रा पर निकले. इस महीने राष्ट्रपति चुने जाने के बाद यह देश की उनकी पहली सरकारी यात्रा है।  पीएम मोदी ने अपने मीडिया स्टेटमेंट में कहा कि भारत और वियतनाम ने रिश्तों को बेहतर व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक ले जाने का फैसला किया है।  मोदी ने कहा, "वियतनाम भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और विज़न ओशन का एक अहम स्तंभ है. हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी, हम एक जैसी सोच रखते हैं." उन्होंने कहा, "हमारे मजबूत रक्षा और सुरक्षा सहयोग के जरिए, हम कानून के राज, शांति, स्थिरता और खुशहाली में योगदान देते रहेंगे।  प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत वियतनाम के सहयोग से आसियान (Association of Southeast Asian Nations) के साथ अपने संबंधों को और बढ़ाएगा. उन्होंने कहा कि वित्तीय संपर्क को बढ़ावा देने के लिए हमने दोनों देशों के सेंट्रल बैंकों के बीच सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है।  उन्होंने कहा कि भारत का यूपीआई और वियतनाम का फास्ट पेमेंट सिस्टम जल्द ही जुड़ जाएगा. अपनी बात में लैम ने कहा कि दोनों पक्ष राजनीतिक विश्वास को गहरा करने और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने पर सहमत हुए।  पिछले साल, दोनों पक्षों ने सबमरीन सर्च, रेस्क्यू और व्यवस्था के लिए एक फ्रेमवर्क बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. उन्होंने द्विपक्षीय रक्षा उद्योग सहयोग को मजबूत करने के लिए एक आशय का पत्र (LoI) पर भी हस्ताक्षर किया। 

हॉर्मुज बंद, फिर भी UAE और सऊदी से भारत में आयी भारी मात्रा में तेल, जानिए चौंकाने वाले आंकड़े

 नई दिल्‍ली अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्‍ता पूरी तरह से ब्‍लॉक है. अमेरिका का दावा है कि इस रास्‍ते से कोई तेल की जहाज नहीं गुजर रही है, क्‍योंकि उसकी सेना ने पूरी तरह से नाकाबंदी कर दी है. इतना ही नहीं अमेरिका ने वहां से गुजरने वाले जहाजों को देखते ही उड़ाने का भी आदेश दिया है।  यह वह रास्‍ता है, जहां से भारत और चीन जैसे देश मिडिल ईस्‍ट से भारी मात्रा में तेल का आयात करते हैं. इस बीच, एक ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जो आपको भी हैरान कर देगा. दरअसल, मार्च की तुलान में भारत के तेल आयात का डाटा जारी हुआ है, जिसके मुत‍ाबिक भारत ने होर्मुज बंद रहने के बाद भी मिडिल ईस्‍ट के देशों से खूब तेल का आयात किया है. हालांकि, रूसी तेल खरीद में छूट मिलने के बाद भी कमी देखी गई है।  रूसी तेल का आयात गिरा  कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात अप्रैल में मार्च की रिकॉर्ड खरीद की तुलना में 21 प्रतिशत गिर गया. अप्रैल में हरदिन 1.56 मिलियन बैरल (एमबीडी) तेल का आयात यूक्रेन में हड़ताल के बाद एक प्रमुख रूसी टर्मिनल पर लोडिंग में आई बाधाओं से प्रभावित हुआ. यह मार्च की तुलना में भारी गिरावट है , जब भारत का आयात 1.98 मिलियन बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्‍तर पर था।  भारत के किस कंपनी ने कितना तेल मंगाया?  इंडियन ऑयल ने हर दिन 677,000 बैरल तेल खरीदा और नंबर वन पर है. इसकी खरीद मार्च की तुलना में 14 फीसदी ज्‍यादा है. रिलायंस इंडस्ट्रीज 235,000 बैरल प्रतिदिन तेल खरीदकर दूसरे स्थान पर है. भारत पेट्रोलियम ने प्रतिदिन 176,000 बैरल तेल आयात किया, जो मार्च से 38 प्रतिशत कम है।  नाकाबंदी के बाद भी बढ़ी तेल खरीद  ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण मार्ग होर्मुज की नाकाबंदी के बावजूद, अप्रैल में पश्चिम एशियाई देशों से भारत में तेल की आपूर्ति में सुधार देखने को मिला है. सऊदी अरब से हरदिन 704,000 बैरल तेल का आयात हुआ, जो मार्च की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से आयात में 191 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह बढ़कर हरदिन 591,000 बैरल पहुंच गया।  नाकाबंदी के बाद भी कैसे भारत आया तेल?  तेल को सऊदी अरब की यानबू और यूएई की फुजैराह पाइपलाइनों के माध्यम से भेजा गया था, जो होमुज को बाईपास करती हैं और वैश्विक ऊर्जा आयात के लिए महत्वपूर्ण मार्गों के तौर पर उभर रही है. वेस्‍ट एशिया में चल रहे जंग के बीच, भारत ने वेनेजुएला, ईरान, ब्राजील और नाइजीरिया से भी तेल का आयात बढ़ाया है।  ईरान से इतना हुआ तेल का आयात  सात साल के अंतराल के बाद, भारत ने अप्रैल में ईरान से तेल की खरीद फिर से शुरू की और प्रतिदिन 137,000 बैरल तेल का आयात किया, जब अमेरिका ने प्रतिबंधों में 30 दिनों की छूट की घोषणा की. भारत ईरान से कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है. 2018 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधों को कड़ा करने के बाद, मई 2019 से आयात बंद हो गया, और इसकी जगह पश्चिम एशियाई, अमेरिकी और अन्य ग्रेड के माल ने ले ली. करीब एक साल के अंतराल के बाद, इस महीने वेनेजुएला से तेल का आयात 298,000 बैरल प्रति दिन रहा।  इन सभी आयातों के बीच, कुल आयात में कमी देखने को मिली है. ईरान युद्ध के बाद होर्मुज की नाकाबंदी के चलते, भारत का कच्चे तेल का आयात अप्रैल में घटकर 4.3 मिलियन बैरल हर दिन हो गया, जो पिछले महीने के 4.4 मिलियन बैरल से कम है, यह जानकारी केप्लर के आंकड़ों से मिलती है। 

2030 से पहले CO2 उत्सर्जन में गिरावट आ सकती है, 2025 में भारत का उत्सर्जन सिर्फ 0.7% बढ़ा

भोपाल  एक नए विश्लेषण से पता चला है कि भारत के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में वर्ष 2025 में केवल 0.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो दो दशकों से अधिक समय में सबसे धीमी वृद्धि है। जलवायु विज्ञान, नीति और ऊर्जा पर केंद्रित ब्रिटेन स्थित ऑनलाइन प्रकाशन कार्बन ब्रीफ के लिए सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) द्वारा किए गए विश्लेषण के अनुसार, भारत के कुल कार्बन2 उत्सर्जन के लगभग आधे हिस्से के लिए जिम्मेदार विद्युत क्षेत्र से होने वाला उत्सर्जन 2025 में लगभग 3.8 प्रतिशत कम हो गया और यह उस वर्ष के कुल उत्सर्जन में कमी का प्रमुख कारण हो सकता है। हाल के वर्षों में भारत के CO2 उत्सर्जन में 4 से 11 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो विश्व में सबसे तेज़ वृद्धि दरों में से एक है। विश्लेषण के अनुसार, 2025 में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि कोविड काल को छोड़कर 2001 के बाद से सबसे कम थी। भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कार्बन डाइऑक्साइड का योगदान लगभग 80 प्रतिशत है । भारत के उत्सर्जन की वृद्धि दर में कमी आना पर्यावरण की दृष्टि से वैश्विक स्तर पर अच्छी खबर है, क्योंकि भारत ग्रीनहाउस गैसों का तीसरा सबसे बड़ा उत्सर्जक है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती या औद्योगिक गतिविधियों और मांग में गिरावट का संकेत भी हो सकता है। हालांकि आधिकारिक उत्सर्जन डेटा तैयार करने और संकलित करने में वर्षों लग जाते हैं – भारत के उत्सर्जन पर नवीनतम आधिकारिक डेटा 2020 से संबंधित है – सीआरईए जैसे अध्ययन देश के उत्सर्जन का अनुमान लगाने के लिए बिजली उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन और ईंधन खपत पर आवधिक डेटा जैसे विभिन्न संकेतकों का उपयोग करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक उत्सर्जन की धीमी पड़ती यह रफ्तार कोई संयोग नहीं, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में गहरे बदलाव का संकेत है। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर तेजी से बढ़ते कदम, कोयला आधारित बिजली में गिरावट और बिजली मांग की धीमी रफ्तार इन तीनों ने मिलकर नई उम्मीदें पैदा की हैं। ऊर्जा क्षेत्र बना बदलाव की धुरी रिपोर्ट के मुताबिक सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव बिजली क्षेत्र में देखने को मिला है, जहां 2025 में उत्सर्जन में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसके पीछे स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड बढ़ोतरी बड़ी वजह रही, जिससे हर साल करीब 90 टेरावाट-घंटे अतिरिक्त बिजली उत्पादन की संभावना तैयार हुई है। वहीं, बिजली की मांग में भी साफ सुस्ती दिखी, जो 2019 से 2023 के बीच 7.4 फीसदी की दर से बढ़ रही थी, वह 2025 में घटकर करीब एक फीसदी रह गई। ये संकेत साफ तौर पर दर्शाते हैं कि अब देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में स्वच्छ ऊर्जा तेजी से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और पारंपरिक स्रोतों की पकड़ कमजोर पड़ने लगी है। जीवाश्म ईंधनों की कमजोर पड़ती पकड़ विश्लेषण में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि 2025 में तेल, गैस और कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों की मांग में भी नरमी देखी गई, जो ऊर्जा क्षेत्र में बदलती प्राथमिकताओं की कहानी कहती है। तेल की मांग में हो रही वृद्धि सिमटकर महज 0.4 फीसदी रह गई, जबकि गैस की मांग में 4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। सबसे बड़ा बदलाव आयातित कोयले में देखने को मिला, जिसकी खपत 20 फीसदी तक घट गई, वहीं गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी आई है। ये आंकड़े सिर्फ गिरावट नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत हैं। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत अब धीरे-धीरे विदेशी ईंधनों पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है, जिससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो रही है, बल्कि देश वैश्विक ईंधन संकटों के झटकों से भी खुद को बेहतर तरीके से बचाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उद्योग बढ़ा रहे उत्सर्जन हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि तस्वीर पूरी तरह सकारात्मक नहीं है, क्योंकि उद्योग अब भी उत्सर्जन बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। खासकर इस्पात और सीमेंट जैसे बुनियादी उद्योगों में तेजी से विस्तार देखने को मिला है, जहां इस्पात उत्पादन में 8 फीसदी और सीमेंट उत्पादन में 10 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। यही वजह है कि कुल कार्बन उत्सर्जन में हल्की बढ़ोतरी बनी रही, जो यह संकेत देती है कि स्वच्छ ऊर्जा की प्रगति के बावजूद औद्योगिक क्षेत्र में बदलाव अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। क्या आ गया निर्णायक मोड़? विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का बिजली क्षेत्र अब एक 'टर्निंग पॉइंट' पर पहुंच सकता है, जहां स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ोतरी, बिजली मांग से बराबरी या उससे आगे निकल जाए। सीआरईए के प्रमुख विश्लेषक लाउरी मायल्लीवीरता के मुताबिक अगर यही रुझान जारी रहा तो यह कोयला आधारित बिजली में स्थाई गिरावट की शुरुआत हो सकती है। दिलचस्प बात यह है कि गुजरात, राजस्थान और तमिलनाडु जैसे राज्य पहले ही इस बदलाव की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। उन्होंने उम्मीद जताई है कि देश के लिए 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, जब अक्षय ऊर्जा क्षमता में बढ़ोतरी पहली बार बिजली मांग के विस्तार को पीछे छोड़ दे, यह बदलाव भारत के बिजली क्षेत्र की दिशा और भविष्य दोनों को निर्णायक रूप से बदलने का संकेत होगा। रिपोर्ट और सीआरईए से जुड़ी विश्लेषक अनुभा अग्रवाल का इस बारे में कहना है कि जीवाश्म ईंधनों की खपत में गिरावट से न सिर्फ आयात घटा है, बल्कि वैश्विक तेल-गैस संकट के असर से भी देश को राहत मिली है। उनका कहना है कि 2025 में तापीय बिजली संयंत्रों में आयातित कोयले की खपत 20 फीसदी तक घट गई, जबकि कुल गैस आयात में भी 6 फीसदी की कमी दर्ज की गई। यह बदलाव बेहद अहम है, क्योंकि इससे देश की मौजूदा वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति संकट के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है। उनके मुताबिक, स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना सिर्फ जलवायु के लिए नहीं, बल्कि बेहतर हवा और मजबूत ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी है। हालांकि इस सकारात्मक रुझान के बीच एक चिंता भी बनी हुई है। भारत अभी भी कोयला आधारित बिजली क्षमता और जीवाश्म ईंधन आधारित उद्योगों के विस्तार की योजना बना रहा है, जो आने वाले वर्षों में उत्सर्जन की दिशा तय करेगा। बिजली … Read more

भारत के लिए बड़ा मौका: UAE के फैसले से रुपये में मिलेगा तेल, डॉलर की जरूरत नहीं

नई दिल्ली  संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा UAE के OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) से बाहर निकलने की खबर को वैश्विक तेल बाजार में एक बड़े बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इसे UAE का ‘मास्टरस्ट्रोक’ कहा जा रहा है, क्योंकि इससे वह अपनी तेल उत्पादन नीति पर अधिक स्वतंत्रता पा सकता है। लेकिन, इस फैसले का सबसे दिलचस्प असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर पड़ सकता है। आइए जरा विस्तार से समझते हैं कि इसका भारत को कितना लाभ मिलेगा? अब तक OPEC (Organization of the Petroleum Exporting Countries) के सदस्य देशों को उत्पादन कोटा और कीमतों को लेकर संगठन के नियमों का पालन करना पड़ता था। UAE के बाहर आने के बाद वह अपनी शर्तों पर उत्पादन बढ़ा सकता है और नए व्यापारिक समझौते कर सकता है। यही वह प्वाइंट है, जहां भारत के लिए एक बड़ा अवसर बनता दिख रहा है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर डॉलर आधारित भुगतान का भारी दबाव रहता है। अगर UAE भारत के साथ रुपये में तेल व्यापार करने के लिए सहमत होता है, तो यह भारत के लिए किसी लॉटरी से कम नहीं होगा। इससे भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (foreign exchange reserves) मजबूत होगा और डॉलर पर निर्भरता कम हो सकती है। रुपये में तेल खरीदने का मतलब है कि भारत को हर बार डॉलर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जिससे रुपया स्थिर रह सकता है। साथ ही यह कदम भारत और UAE के बीच व्यापारिक संबंधों को और मजबूत करेगा। दोनों देशों के बीच पहले से ही मजबूत आर्थिक रिश्ते हैं और यह पहल उन्हें नई ऊंचाइयों तक ले जा सकती है। हालांकि, इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। वैश्विक तेल बाजार बेहद संवेदनशील होता है और OPEC से बाहर निकलने के बाद UAE को कीमतों और मांग के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा रुपये में व्यापार को बड़े स्तर पर लागू करना भी आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए वित्तीय ढांचे और भरोसेमंद सिस्टम की जरूरत होती है। फिर भी अगर यह रणनीति सफल होती है, तो यह न केवल भारत के लिए बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए भी एक नया मॉडल बन सकती है। कुल मिलाकर UAE का यह कदम आने वाले समय में तेल की राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों को नई दिशा दे सकता है, जिसमें भारत एक बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।

भारत की आर्थिक ताकत में तेजी, वैश्विक शांति में अहम भूमिका निभा सकता है: वैश्विक विशेषज्ञ

नई दिल्ली   भारत तेजी से एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है और वैश्विक स्तर पर छवि विश्व शांति व्यवस्था को आकार देने वाले, आर्थिक स्थिरता और टेक्नोलॉजी को बढ़ाने वाले देश की बन रही है। यह बयान बुधवार को ग्लोबल एक्सपर्ट्स की ओर से दिया गया। राष्ट्रीय राजधानी में इकोनॉमिस्ट एंटरप्राइज के 'रेजिलिएंट फ्यूचर्स समिट 2026' के साइडलाइन के दौरान आईएएनएस से ​​बातचीत में उन्होंने भू-राजनीतिक अनिश्चितता से निपटने, बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करने और एआई और उभरती टेक्नोलॉजी में इनोवेशन को बढ़ावा देने में भारत के बढ़ते प्रभाव का जिक्र किया। सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी के ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में अर्थशास्त्र के ली का शिंग प्रोफेसर डैनी क्वाह ने कहा कि वैश्विक आतंकवाद की बदलती प्रकृति और व्यापारिक गतिशीलता में आए बदलावों ने विश्व अर्थव्यवस्था में काफी अनिश्चितता पैदा कर दी है। क्वाह ने कहा कि व्यापारिक व्यवधानों से परे, एक गहरी चिंता वैश्विक विश्वास में कमी और बहुपक्षीय प्रणालियों का कमजोर होना है, जो पारंपरिक रूप से अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आधार रही हैं। उन्होंने आईएएनएस को बताया,“भारत इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है और अगर भारत कोशिश करे तो शांति कायम होगी। लोग शांति लाने के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। मुझे लगता है कि लोग उचित नेतृत्व के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। उचित नेतृत्व क्या होगा, यह तय करना अभी भारत पर निर्भर है।” वहीं, लंदन के विज्ञान संग्रहालय के निदेशक इयान ब्लैचफोर्ड ने एआई के प्रति भारत के विशिष्ट और आशावादी दृष्टिकोण का जिक्र किया। ब्लैचफोर्ड ने कहा, “अगर आप अमेरिका और यूरोप के सार्वजनिक सर्वेक्षणों को देखें, तो अधिकांश आबादी एआई को लेकर चिंतित है। भारत में स्थिति इसके विपरीत है। भारत एआई केंद्रों के लिए क्षमता निर्माण कर रहा है और साथ ही इसके प्रभावों पर गहराई से विचार भी कर रहा है।” ब्लैचफोर्ड ने वैश्विक दक्षिण की व्यापक उपलब्धियों, विशेष रूप से भारत की विकास यात्रा की सराहना की। ब्लैचफोर्ड ने आईएएनएस को बताया, “देश आर्थिक विकास और जीवन स्तर में सुधार की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास कर रहा है, जबकि वह ऊर्जा की बढ़ती मांग जैसी चुनौतियों से भी जूझ रहा है।”उन्होंने आगे कहा, “यह पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत है, जिन्हें दशकों से समृद्धि का लाभ मिल रहा है।”

UAE के OPEC छोड़ने से भारत को फायदा, पाकिस्तान को नुकसान: जानिए किसे कितना फायदा हुआ

नई दिल्ली संयुक्त अरब अमीरात ने अपने हालिया कदमों से साफ संकेत दे दिया है कि वह पाकिस्तान-सऊदी अरब गठजोड़ के खिलाफ रणनीति बना रहा है. तेल उत्पादक देशों के संगठन OPEC से बाहर निकलने का उसका फैसला सऊदी अरब को बड़ा झटका देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. वहीं ये फैसला पाकिस्तान के लिए भी बड़ा मैसेज बनकर सामने आया है, जिसने पड़ोसी मुल्क की पेशानी पर निशान ला दिए हैं।  पाकिस्तान को झटका तो क्या भारत को लाभ? इसे पूरे मामले को भारत के लिहाज से देखें तो सवाल उठता है कि क्या ये फैसला भारत के पक्ष में जा सकता है? असल में यूएई के इस फैसले से ग्लोबल मार्केट में तेल की सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में कमी आ सकती है. इसका सीधा फायदा भारत जैसे आयात करने वाले देशों को मिल सकता है, क्योंकि उनका तेल खर्च कम होगा और महंगाई पर भी असर पड़ेगा. एक्सपर्ट्स के नजरिये को समझें तो यह कदम भारत की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक साबित हो सकता है।  ऐसे में जहां भारत को सस्ते तेल और मजबूत ऊर्जा साझेदारी का फायदा मिल सकता है, वहीं पाकिस्तान के लिए यह स्थिति आर्थिक दबाव और रणनीतिक असहजता बढ़ाने वाली बन सकती है। UAE ने क्यों लिया ऐसा फैसला?  अब इस पूरे फैसले को कैनवस पर और बड़ा करके देखें तो नजर आता है कि इससे पहले कई घटनाक्रम तेजी से सामने आए. ईरान के साथ टकराव के दौरान यूएई को सीधे हमलों का सामना करना पड़ा, जबकि खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों से उसे वह समर्थन नहीं मिला जिसकी उसे उम्मीद थी. वहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एकतरफा युद्धविराम की घोषणा कर खुद को पीछे खींच लिया है, जिससे यूएई खुद को सैन्य रूप से असुरक्षित महसूस करने लगा।  रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजराइल और अमेरिका की ओर से तेहरान पर हमलों के बाद सबसे ज्यादा जवाबी कार्रवाई का सामना यूएई को करना पड़ा. अबू धाबी के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 8 अप्रैल तक उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने 537 बैलिस्टिक मिसाइल, 26 क्रूज मिसाइल और 2256 ड्रोन को इंटरसेप्ट किया।  पाकिस्तान को लेकर क्या है UAE की राय? यूएई का मानना है कि पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाकर ईरान के खिलाफ सख्त रुख नहीं अपनाया, जिससे अबू धाबी में नाराजगी बढ़ी. विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई इस संघर्ष को “ब्लैक-वाइट” की तरह देख रहा है, जहां बीच की कोई लाइन नहीं है. यही कारण है कि पाकिस्तान की मध्यस्थता उसे रास नहीं आई।  इसी नाराजगी के चलते यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज समय से पहले लौटाने की मांग कर दी, जो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा था. हालांकि बाद में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का कर्ज देकर राहत दी और 5 अरब डॉलर की क्रेडिट लाइन देने का वादा किया।  पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा समझौता सितंबर 2025 में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच एक रक्षा समझौता भी हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान जरूरत पड़ने पर रियाद की सुरक्षा के लिए अपने परमाणु और मिसाइल संसाधन दे सकता है. ईरान के हमलों के बाद पाकिस्तान ने सऊदी अरब को इस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।  UAE और भारत के मजबूत संबंध इन घटनाओं के बीच खाड़ी देशों के भीतर दरार साफ नजर आने लगी है. जहां यूएई भारत के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है, वहीं सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक नए रणनीतिक गठजोड़ की चर्चा हो रही है. यमन और सूडान जैसे क्षेत्रों में भी सऊदी अरब और यूएई के बीच मतभेद बढ़े हैं।  यमन में 2015 के सैन्य हस्तक्षेप के दौरान दोनों देश साथ थे, लेकिन बाद में रणनीति को लेकर टकराव बढ़ गया. सऊदी अरब ने हूती विद्रोहियों के साथ राजनीतिक समाधान की कोशिश की, जबकि यूएई ने अलगाववादियों का समर्थन किया. इसी तरह, सूडान में भी दोनों देश अलग-अलग गुटों का समर्थन कर रहे हैं।  तेल उत्पादन को लेकर भी दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं. दशकों से सऊदी अरब OPEC का नेतृत्व करता रहा है, लेकिन यूएई अब अपने उत्पादन पर किसी तरह की पाबंदी नहीं चाहता. OPEC से बाहर निकलने के बाद यूएई अब अपनी पूरी क्षमता से तेल उत्पादन कर सकेगा, जो वैश्विक बाजार में उसके लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद हो सकता है।  सऊदी के साये में नहीं रहना चाहता UAE यूएई के ऊर्जा मंत्री सुनील मोहम्मद अल माजुरी ने कहा कि यह फैसला देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और बाजार की जरूरतों के अनुरूप लिया गया है. वहीं उद्योग मंत्री सुल्तान अल जाबर ने इसे राष्ट्रीय हित और वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिहाज से जरूरी कदम बताया।  करीब 59 साल बाद OPEC से अलग होने का यूएई का यह फैसला वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब के साथ उसके संबंध पूरी तरह खत्म हो गए हैं. दोनों देश अब भी बड़े व्यापारिक साझेदार हैं और GCC के सदस्य हैं. लेकिन इतना तय है कि अबू धाबी ने यह साफ कर दिया है कि वह अब सऊदी नेतृत्व के साए में रहने को तैयार नहीं है. मौजूदा युद्ध, नाकेबंदी और बदलते गठजोड़ के बीच यूएई का यह कदम खाड़ी राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत कर सकता है। 

मोदी सरकार ने 6 साल में 9 देशों के साथ की ‘खास डील’, ट्रंप के टैरिफ का किया मुकाबला

नई दिल्ली रूस-युक्रेन की बीच युद्ध हो, इजरायल-फिलिस्तीन का संघर्ष हो, अमेरिका-ईरान की जंग हो या फिर दुनिया को डराने वाला ट्रंप टैरिफ, बीते कुछ सालों में तमाम ग्लोबल चुनौतियां सामने आई हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) की रफ्तार तेज बनी हुई है. दुनिया ने भारत का लोहा माना है और ऐसा हो भी क्यों न आखिर जब दुनिया ट्रेड से लेकर महंगाई तक के जोखिम से जूझती रही, तो मोदी सरकार ने एक के बाद एक कमाल किया. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बीते छह सालों में भारत ने 9 देशों के साथ फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट यानी FTA साइन किए हैं, जो अमेरिकी टैरिफ की काट साबित हुए हैं. सबसे ताजा डीन न्यूजीलैंड के साथ की गई है।  दनादन सरकार द्वारा तमाम देशों के साथ किए जा रहे एफटीए से जहां भारतीय सामानों के निर्यात के लिए नए और बड़े बाजार मिल रहे हैं, तो वहीं आयात पर सीमित निर्भरता भी कम हो रही है. इसके अलावा भारत में निवेश आने के रास्ते खुले हैं और रोजगार के अवसर बढ़ाने में भी ये कारगर साबित हो रहे हैं।  UK से लेकर EU तक से एफटीए इससे पहले भारत ने कई देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किए हैं. इनमें मॉरिसस, ब्रिटेन से लेकर यूरोपीय यूनियन (EU) तक के साथ किए गए एफटीए शामिल हैं।   नंबर-1: नंबर में मोदी सरकार ने मॉरिसस के साथ समझौता (India-Mauritius FTA) किया था और ये पहली बार था जबकि भारत ने किसी अफ्रीकन देश के साथ FTA किया था।  नंबर-2: 2022 में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट साइन किया गया था. इस FTA के चलते जो टारगेट सेट किया गया था, उसके अनुरूप दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार को FY 2025 तक 100 अरब डॉलर पहुंचा।  नंबर-3: 2022 में ही भारत ने एक और डील डन की. इस बार भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर सहमति बनी और इस पर साइन किए गए. ये भारत द्वारा किया गया ऐसा पहला एफटीए थी, जिसमें 100 फीसदी निर्यात पर टैरिफ जीरो किया गया।  नंबर-4: 2024 के मार्च महीने की 10 तारीख को भारत और ईएफटीए (EFTA – स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन) देशों के बीच व्यापार और आर्थिक साझेदारी समझौते (TEPA) पर साइन किए गए. ये समझौता 1 अक्टूबर 2025 से प्रभावी हुआ. इसका लक्ष्य 15 साल में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश लाना रहा।  नंबर-5: 2025 में भारत और ब्रिटेन के बीच समझौता हुआ. जुलाई महीने में दोनों देशों ने  ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर साइन किए. इस एफटीए के तहत भारत के 99% निर्यात किए जाने वाले सामानों को ब्रिटेन में ड्यूटूी फ्री एक्सेस मिलने की राह पक्की हुई. इसके अलावा इस डील का उद्देश्य India-UK के बीच द्विपक्षीय व्यापार को 2030 तक 120 अरब डॉलर तक ले जाना है।  नंबर-6: 2025 के अंत में यानी दिसंबर महीने में फिर मोदी सरकार ने एक डील को अंजाम तक पहुंचा दिया. Trump Tariff को लेकर दुनिया में फैले खौफ के बीच भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (India-Oman CEPA) पर साइन किए गए. इसके तहत ओमान भारत को अपनी 98.08% टैरिफ लाइनों तक टैरिफ फ्री (Tariff Free) पहुंच प्रदान करेगा. इसमें भारत द्वारा ओमान को निर्यात की जाने वाली 99.38% वस्तुएं शामिल है. वहीं दूसरी ओर भारत ने अपनी कुल टैरिफ लाइन में से 77.79% पर शुल्क में राहत की पेशकश की है, जो ओमान से आयात होने वाले 94.81% सामान को कवर करती है।  नंबर-7: 2026 की शुरुआत यानी जनवरी महीने में भारत ने यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक डील की. India-EU FTA को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (Mother Of All Deals) कहा गया. डील के तहत भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय संघ के देशों में जीरो टैरिफ एक्सपोर्ट (Zero Tariff Export) का एक्सेस मिला. ये डील सबसे ज्यादा कपड़ा-परिधान सेक्टर के लिए फायदे का सौदा है, क्योंकि अमेरिका के बाद इस सेक्टर में भारतीय निर्यात के लिए ईयू सबसे बड़ा मार्केट है, जिसका आकार 22 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है. इसके अलावा देशों ने इस डील के तहत अपने मार्केट एक-दूसरे के लिए खोलने पर सहमति जताई और दोनों के 90 फीसदी तक प्रोडक्‍ट्स पर टैरिफ कम या समाप्‍त करने का ऐलान हुआ।  नंबर-8: 2026 में फरवरी महीने में टैरिफ से दुनिया को डराने वाले अमेरिका और भारत के बीच अंतरिम व्‍यापार समझौते के फ्रेमवर्क पर सहमति बनी. दोनों देशों ने कई चीजों को लेकर अपनी सहमति जाहिर की है. अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद के कारण लगे एक्‍स्‍ट्रा 25 प्रतिशत टैरिफ को हटा दिया और रेसिप्रोकल टैरिफ को भी 25 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी कर दिया है, जो 7 फरवरी से प्रभावी है।  नंबर-9: भारत द्वारा सबसे ताजा एफटीए यानी Free Trade Agreement न्यूजीलैंड के साथ हुआ है और इस पर 27 अप्रैल को साइन किए गए हैं. India-New Zealand FTA पर केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और न्यूजीलैंड के ट्रेड मिनिस्टर टॉड मैक्ले ने साइन किए. सबसे खास बात ये है कि ये समझौता महज 9 महीनों में हो गया. ये फ्री ट्रेड एग्रीमेंट इस साल के अंत तक लागू हो सकता है।  FTA के तहत न्यूजीलैंड भारत को अपने बाजार में जीरो टैरिफ (Zero Tariff) एंट्री देगा और भारत से जाने वाले करीब 95% टैरिफ फ्री या कम टैरिफ से साथ पहुंचेंगे. इस डील का टारगेट दोनों देशों के बीच के द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करके 5 अरब डॉलर तक ले जाना है. इसके अलावा न्यूजीलैंड अगले 15 साल में भारत में 20 अरब डॉलर का निवेश करेगा। 

न्यूजीलैंड से FTA समझौते में आम भारतीय के लिए बड़ी राहत, 5000 वीजा और 0 ड्यूटी का फायदा

नईदिल्ली  कल तक जो सिर्फ फाइलों का हिस्सा था आज वो हकीकत बन चुका है. दिल्ली और वेलिंगटन के बीच समुद्र की दूरियां अब व्यापार के सेतु से सिमट गई हैं। जब दुनिया के बड़े-बड़े देश ट्रेड वॉर और मंदी के साये में दुबके हैं, तब भारत ने महज 270 दिनों के भीतर न्‍यूजीलैंड के साथ वो महाकरार कर लिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर तहलका मचा दिया है। यह सिर्फ सरकारों के बीच का हाथ मिलाना नहीं है बल्कि भारत के उस मध्यमवर्गीय युवा के सपनों की उड़ान है जो विदेश में करियर बनाना चाहता है और उस छोटे उद्यमी की हिम्मत है जो अपना सामान दुनिया के कोने-कोने में बेचना चाहता है। 5000 वीजा का वो ब्रह्मास्त्र और जीरो ड्यूटी की वो चाबी अब आपके हाथ में है। आइए, इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं।  समझौते की 5 सबसे बड़ी ताकत · 5,000 वीजा का ‘एक्सप्रेस-वे’: अब हर साल कम से कम 5,000 ‘Temporary Employment Entry Visa’ की गारंटी मिलेगी. इसके तहत स्किल्ड प्रोफेशनल्स 3 साल तक न्यूजीलैंड में रहकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकेंगे।  · 100% ड्यूटी फ्री एक्सेस: अब न्यूजीलैंड के बाजार में ‘मेड इन इंडिया’ का डंका बजेगा. भारत से जाने वाले टेक्सटाइल, लेदर, प्लास्टिक और इंजीनियरिंग सामान पर अब जीरो ड्यूटी लगेगी, जिससे भारतीय व्यापारियों का मुनाफा कई गुना बढ़ जाएगा।  · $20 बिलियन का ‘इन्वेस्टमेंट बूस्टर’: अगले 15 वर्षों में न्यूजीलैंड भारत में 20 बिलियन डॉलर (लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये) का भारी-भरकम निवेश करेगा जिससे भारत के बुनियादी ढांचे और स्टार्टअप्स को नई उड़ान मिलेगी।  · किसानों के लिए ‘कीवी’ तकनीक: केवल व्यापार ही नहीं बल्कि अब न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भारतीय किसानों को कीवी, सेब और शहद के उत्पादन में वैश्विक स्तर की तकनीक सिखाएंगे. यह साझेदारी भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।  · शराब और वाइन पर रियायत: भारत से जाने वाली वाइन और स्पिरिट्स को वहां ड्यूटी-फ्री एंट्री मिलेगी, जबकि न्यूजीलैंड की वाइन पर भारत में मिलने वाली रियायतें 10 वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ाई जाएंगी।  कैसे संभव हुआ यह ‘एक्सप्रेस’ एग्रीमेंट? आमतौर पर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) होने में वर्षों का समय लगता है लेकिन न्यूज़ीलैंड के साथ यह महज 9 महीनों में पूरा हो गया. इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित रहे: · रणनीतिक तालमेल: न्यूज़ीलैंड की कृषि और डेयरी विशेषज्ञता और भारत की विशाल मार्केट और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता एक-दूसरे की पूरक (Complementary) हैं।  · चीन से हटकर विकल्प की तलाश: दोनों देश अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करने के लिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते हैं. यह साझा सुरक्षा और आर्थिक हित इस समझौते की सबसे बड़ी प्रेरक शक्ति बना।  · विश्वास की नींव: पीयूष गोयल के नेतृत्व में भारतीय टीम ने पिछले साढ़े तीन साल में 7 समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. यह ‘स्पीड’ भारत के नए वर्क कल्‍चर को दर्शाती है, जहां जटिल मुद्दों को सुलझाने के लिए डेडलाइन पर काम किया गया।  पाइपलाइन में और क्या है? न्यूज़ीलैंड तो बस शुरुआत है. भारत का असली लक्ष्य दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सीधा व्यापारिक गलियारा बनाना है: · यूरोपीय संघ (EU) और अमेरिका: आने वाले कुछ महीनों में इन दो दिग्गजों के साथ समझौते होने की उम्मीद है. यह भारत के लिए अब तक की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी. ईयू के साथ जनवरी में मदर ऑफ ऑल डील हुई थी. इसके पूरी तरह से लागू होने की प्रक्रियाएं जारी हैं।  · 9 समझौतों का जादुई आंकड़ा: इन समझौतों के बाद भारत के कुल 9 FTA हो जाएंगे. ये कोई साधारण देश नहीं बल्कि 38 विकसित देश होंगे।  · ग्लोबल GDP पर प्रभाव: इसके पूरा होते ही भारत की पहुंच दुनिया के लगभग दो-तिहाई व्यापार और 65-70% वैश्विक जीडीपी तक सीधे तौर पर हो जाएगी।  विकसित भारत 2047 के लिए यह क्यों जरूरी है? 1. मार्केट एक्सेस: भारतीय किसानों, कारीगरों और MSMEs को अब ग्लोबल मार्केट में अपनी जगह बनाने के लिए ऊंचे टैक्स (Tariffs) का सामना नहीं करना पड़ेगा।  2. निवेश का प्रवाह: न्यूज़ीलैंड का $20 बिलियन का वादा केवल शुरुआत है. अमेरिका और EU के साथ समझौते से भारत में अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आएगा।  3. सर्विस सेक्टर की ताकत: भारत के आईटी और सर्विस सेक्टर के युवाओं के लिए इन विकसित देशों में काम करने और सेवा देने के रास्ते और आसान हो जाएंगे।  सवाल-जवाब न्यूज़ीलैंड के साथ FTA इतनी जल्दी (9 महीनों में) कैसे पूरा हो गया? यह दोनों देशों के बीच साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, विश्वास और चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीतिक जरूरत की वजह से संभव हुआ. पीयूष गोयल ने इसे “भरोसे और मजबूत रिश्तों” का परिणाम बताया है।  क्या भारत का अमेरिका के साथ भी कोई समझौता होने वाला है? जी हाँ, वाणिज्य मंत्री के अनुसार आगामी कुछ महीनों में अमेरिका और यूरोपीय संघ (EU) के साथ दो बड़े समझौते पाइपलाइन में हैं।  इन 9 FTA समझौतों का भारत की जीडीपी पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इन समझौतों के बाद भारत की पहुंच दुनिया की लगभग 65-70% ग्लोबल जीडीपी तक हो जाएगी, जिससे भारत के एक्सपोर्ट में भारी बढ़ोतरी और अर्थव्यवस्था में तेज उछाल आने की उम्मीद है।  इस समझौते से आम युवाओं को क्या फायदा होगा? यह FTA स्टार्टअप्स, डिजिटल इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी सेक्टर में नए मौके पैदा करेगा. साथ ही, युवाओं के लिए ग्लोबल मार्केट में कौशल और प्रतिभा दिखाने के रास्ते खुलेंगे।   

भारत का रक्षा खर्च 8.66 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा, ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव

  नई दिल्ली स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) ने 27 अप्रैल 2026 को अपनी नई रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार साल 2025 में पूरी दुनिया का सैन्य खर्च रिकॉर्ड 28.87 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2024 की तुलना में 2.9 प्रतिशत ज्यादा है. दुनिया भर में लगातार संघर्ष और युद्ध बढ़ रहे हैं, इसलिए हर देश अपनी सुरक्षा के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. यह 11वां साल है जब दुनिया का सैन्य खर्च लगातार बढ़ा है।  भारत 2025 में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा रक्षा खर्च करने वाला देश रहा. भारत ने अपना सैन्य खर्च 8.9 प्रतिशत बढ़ाकर 8.66 लाख करोड़ रुपये कर लिया. इस बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह मई 2025 में पहलगाम हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर था।  इस ऑपरेशन के बाद भारत ने ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, एयर डिफेंस सिस्टम और आधुनिक हथियारों की खरीद तेज कर दी। पाकिस्तान का रक्षा खर्च भी 11 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  दुनिया के टॉप तीन देश: अमेरिका, चीन और रूस दुनिया के सबसे ज्यादा रक्षा खर्च करने वाले तीन देश अमेरिका, चीन और रूस हैं. इन तीनों ने मिलकर 2025 में 13.91 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो पूरी दुनिया के सैन्य खर्च का 51 प्रतिशत है. अमेरिका ने 2025 में लगभग 8.97 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2024 से 7.5 प्रतिशत कम है।  मुख्य वजह यह थी कि साल भर में यूक्रेन को नई सैन्य मदद नहीं दी गई. लेकिन अमेरिका ने अपने परमाणु और सामान्य हथियारों में निवेश बढ़ाया ताकि चीन को इंडो-पैसिफिक में रोका जा सके।  यूरोप में 14% की भारी बढ़ोतरी 2025 में यूरोप का सैन्य खर्च सबसे तेजी से बढ़ा. यह 14% बढ़कर 8.12 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. रूस का खर्च 5.9% बढ़कर 1.79 लाख करोड़ रुपये हो गया, जो उसके कुल जीडीपी का 7.5% है. यूक्रेन ने 20% बढ़ोतरी के साथ 7.9 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो उसके जीडीपी का 40% है।  NATO के 29 यूरोपीय देशों ने कुल 5.25 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जर्मनी का खर्च 24 प्रतिशत बढ़कर 1.07 लाख करोड़ रुपये हो गया. स्पेन का खर्च तो 50 प्रतिशत बढ़कर 3.78 लाख करोड़ रुपये हो गया।  मध्य पूर्व में खर्च लगभग स्थिर मध्य पूर्व का सैन्य खर्च 2025 में 2.05 लाख करोड़ रुपये रहा, जो 2024 से सिर्फ 0.1% ज्यादा है. इजरायल का खर्च 4.9% घटकर 4.54 लाख करोड़ रुपये रह गया क्योंकि जनवरी 2025 में हमास के साथ संघर्ष विराम हो गया था. लेकिन तुर्की का खर्च 7.2% बढ़कर 2.82 लाख करोड़ रुपये हो गया. ईरान का खर्च दूसरी बार घटा और 5.6% कम होकर 69,560 करोड़ रुपये रह गया।  एशिया और ओशिनिया में सबसे तेज बढ़ोतरी एशिया और ओशिनिया में सैन्य खर्च 8.1 प्रतिशत बढ़कर 6.40 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया. यह 2009 के बाद सबसे तेज सालाना बढ़ोतरी है. चीन ने 7.4 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 3.16 लाख करोड़ रुपये खर्च किए. जापान का खर्च 9.7 प्रतिशत बढ़कर 5.85 लाख करोड़ रुपये हो गया. ताइवान ने 14 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 1.71 लाख करोड़ रुपये खर्च किए।  मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया. इसके बाद भारत सरकार ने रक्षा खरीद को बहुत तेज कर दिया. खासतौर पर ड्रोन, काउंटर-ड्रोन सिस्टम, एयर डिफेंस और आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म्स पर जोर दिया गया. SIPRI रिपोर्ट साफ बताती है कि भारत अब अपनी सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए लगातार खर्च बढ़ा रहा है।  दुनिया क्यों बढ़ा रही है रक्षा खर्च? SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।  SIPRI की रिपोर्ट कहती है कि दुनिया में संघर्ष बढ़ रहे हैं – यूक्रेन-रूस युद्ध, मध्य पूर्व में तनाव, चीन-ताइवान की स्थिति और भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव. हर देश अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर रहा है. 2026 में अमेरिका का खर्च और बढ़ने की उम्मीद है।  भारत का 8.66 लाख करोड़ रुपये का रक्षा बजट दिखाता है कि देश अपनी सीमाओं की सुरक्षा और आधुनिक हथियारों को प्राथमिकता दे रहा है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह बढ़ोतरी भारत की मजबूत रक्षा नीति का प्रमाण है।